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PREFACE for adding

1-वैष्णव पद्धति और तंत्र पद्धति में साधना विधि, पूजा का प्रकार, न्यास सभी कुछ लगभग एक जैसा ही होता हैं, बस अंतर होता हैं, तो दोनों के मंत्र विन्यास में, तांत्रोक्त मंत्र अधिक तीक्ष्ण होता हैं! जीवन की किसी भी विपरीत स्थिति में तंत्र अचूक और अनिवार्य विधा हैं।महानिर्वाण तंत्र में भगवान भोलेनाथ माता पार्वती से कहते हैं कि कलयुग में तंत्र ही एकमात्र मोक्ष प्राप्त का रास्ता होगा।अशुद्धता के कारण वैष्णव मंत्र विषहीन सर्प की भांति फलित नहीं होंगे।इसलिए आज के युग में तंत्र ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।चाहे ज्योतिष हो या वास्तु ..दोनों ही 360-डिग्री के भचक्र पर आधारित है ।एक 180 डिग्री पर है वैष्णव पद्धति और दूसरी 180 डिग्री पर है ..तंत्र पद्धति।जिसने मिर्च नहीं खाई उसे मिठाई का स्वाद भी पता नहीं चलेगा। कड़वा खाने के बाद ही मीठा अच्छा लगता है। तो दोनों साइड्स की 180 डिग्री को जानना जरूरी है।अन्यथा ना तो तुम पूरे 360-डिग्री को जान पाओगे और ना ही सेंटर में आ पाओगे।

2-सेंटर का अर्थ है मध्य में होना ;साम्यावस्था प्राप्त करना ।दोनों ही पद्धतियों को जानकर /समझ कर, हम साम्यावस्था प्राप्त कर सकते हैं।दोनों ही पद्धतियां नाम जप सुमिरन ,ध्यान आदि पर विश्वास करती हैं।वैष्णव पद्धति में ईश्वर को भावपूर्ण ढंग से नहलाना ,खिलाना,भोग लगानाआदि विधियां हैं।शैव पद्धति में यही मानसिक ध्यान के द्वारा किया जाता है।दोनों ही पद्धतियों में हवन होते हैं।दोनों ही पद्धतियों में ईश्वर से प्रेमाभक्ति की विधियां है।वैष्णव पद्धति में गोपी प्रेम है अथार्त गोपी बनकर प्रेम करने का ढंग है जैसे मीरा।परंतु शैव पद्धति में भैरव- भैरवी साधना का इस्तेमाल भी किया गया ।केवल यहीं पर एक अंतर आता है और यही सबसे बड़ी समस्या का कारण है।मीरा की पद्धति में समाज को कोई परेशानी नहीं है।परंतु इस पद्धति (भैरवी साधना)से समाज में समस्याएं उत्पन्न होती है और यही कारण है कि राजा भोज ने एक लाख तांत्रिक जोड़ियों की हत्या करवा दी थी ;तो हमें इस पद्धति की समस्या को समझना पड़ेगा।

क्या समस्या है इस पद्धति में ?क्यों बड़े बड़े गुरु लोग भी इस पद्धति में फँस कर अपना जीवन बर्बाद कर देते हैं?-

05 FACTS;-

1-हमारे शास्त्रों (शिव पुराण) में दिया गया है कि देवी सती ने शिव को पाने के लिए नृत्य ,संगीत का सहारा लिया और उन्हें भैरव रूप में पा लिया।हमने इस बात को अच्छी तरह समझ लिया और सब इसी का पालन करने लगे। परंतु हम यह भूल गए कि जब देवी पार्वती ने संगीत का , रुद्राक्ष का सहारा लिया तो शिव ने नेत्र भी नहीं खोला ।और जब उन्होंने भैरवी रूप धारण किया और कामदेव की सहायता ली ...तो परिणाम सभी को मालूम है।शिव का तीसरा नेत्र खुल गया ;कामदेव को भस्म होना पड़ा और देवी पार्वती को हजारों साल तपस्या करनी पड़ी।शिव भी चाहते थे कि देवी पार्वती 'शिव तत्व' का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करें। तब कहीं जाकर देवी पार्वती, शिव तक पहुंच पाई।

2-हमने देवी पार्वती को नहीं समझा और देवी सती को फॉलो करने लगे और यही हमारे लिए सबसे बड़ी भूल बन गई।हम ना संगीत से और ना ही रुद्राक्ष आदि से शिव तक पहुंच सकते है।देवी सती को शिव का ज्ञान नहीं था।वह बहुत ही इनोसेंट थी।परंतु देवी पार्वती को शिवज्ञान था, इसलिए शिव उन्हें उस विधि से नहीं मिले। हमें देवी पार्वती की ज्ञानविधि को

समझना पड़ेगा। तांत्रिक जोड़ों ने भैरव- भैरवी साधना विधि के द्वारा शिव तक पहुंचने की कोशिश की।बहुत से गुरुओं ने भी यह कोशिश की। परिणाम यह हुआ कि वे अपमानित हुए ;जेल गए आदि-आदि।भैरव- भैरवी साधना विधि का सिर्फ इतना ही अर्थ है कि गृहस्थ जीवन में भी हम पति-पत्नी कामवासना को प्रेम में ट्रांसफार्म कर दें और ईश्वर तक पहुंच जाएं। तंत्र साधना में शक्तियों के लालच में यह क्रिया की गई और शिव का तीसरा नेत्र खुला।

3-बड़े-बड़े ज्ञानी गुरुओं ने भी यह गलती की।तो हम यह समझ ले कि हम शिव को भैरव- भैरवी साधना विधि के द्वारा नहीं पा सकते और यदि हमने ऐसा करने का प्रयास किया तो शिव का तीसरा नेत्र खुलेगा।इसमें कोई दो राय नहीं है।अब हमें यह जानना है कि शिव तक पहुंचने का रास्ता क्या है। वास्तव में 'एलिमेंट्स आर नेक्स्ट टू गॉड' और इसलिए हमें एलिमेंट को समझना पड़ेगा।सभी त्रिदोष- त्रिगुण (6) में हमें शिव को देखना पड़ेगा और साम्यावस्था बनानी पड़ेगी तो ही हम शिव तक पहुंच पाएंगे।हमें यह भी समझना पड़ेगा कि शिव तक पहुंचने के लिए कोई भी डायरेक्ट सीधा/ मार्ग नहीं है।देवी शक्ति ही हमें उन तक पहुंचा सकती है परंतु देवी शक्ति भी हमें तभी पहुंचाती है जब हमारा कारण पर्सनल ना होकर जनकल्याण का होता है।

4-वैष्णव पद्धति में षोडशोपचार पूजन होता है, लेकिन तंत्र में पंचोपचार पूजन होता है।फिर हम पांच तत्वों से त्रिगुण में ,द्वैत में और अंत में हम अद्वैत तक पहुंच जाते हैं।वैष्णव पद्धति हमें स्थूल का ज्ञान करा देती है और तंत्र हमें सूक्ष्म से सूक्ष्मतर अथार्त 16 से 5; 5 से 3; 3 से 2 और अंत में अद्वैत की ओर ले जाता हैं।यह विद्या उनके लिए है।जिनके दिमाग में 'संसार 'है।जब सारे संसार के 6 प्रकार के लोगों में शिव दिखने लगता है तो सभी पूरा संसार शिवमय हो जाता है।फिर हम या तो 'संसार के लिए' कुछ करना चाहते हैं या 'संसार में' कुछ करना चाहते हैं ।'संसार के लिए' या 'संसार में' यह दोनों ही शब्द बड़े महत्वपूर्ण है। 'में'और 'के' में जमीन आसमान का अंतर है।जब हम संसार 'में' कुछ करना चाहते हैं तो हम 'ग्रेट अलेक्जेंडर' जैसे बन जाते हैं।परंतु जब हम संसार 'के लिए' कुछ करना चाहते हैं तो हम गॉड बन जाते हैं।उदाहरण के लिए श्री राम,श्रीकृष्ण,गौतम बुद्ध आदि।तो कुंडलिनी साधना के बाद या तो आप संसार में कुछ करेंगे या संसार के लिए कुछ करेंगे और दोनों ही चीजें आवश्यक है।ईश्वर तो दोनों के लिए मार्ग प्रशस्त करता है क्योंकि आपके मन में 'संसार' तो है।

5-मानव शरीर में 114 चक्र हैं।इन एक सौ चौदह चक्रों में से दो भौतिक क्षेत्र के बाहर हैं। ज्यादातर इंसानों के लिए ये दोनों चक्र बहुत अस्पष्ट होते हैं,और तभी जाग्रत होते हैं जब आपके भीतर भौतिकता से परे कोई आयाम सक्रिय होता है।तब आपके सिर पर एक एंटीना बन जाता है जो आपको जीवन का एक खास नजरिया प्रदान करता है!हमारी ऊर्जा प्रणाली में 112 चक्र हैं। इनमें से कुछ चक्र शरीर में एक ही जगह होते हैं, जबकि कुछ अन्य चक्र गतिशील होते हैं।इन चक्र का हमारे विचारों, भावनाओं पर असर पड़ता है;हमें ये चक्र प्रभावित करते हैं।इन एक सौ बारह चक्रों का इस्तेमाल आपकी परम प्रकृति तक पहुंचने के एक सौ बारह मार्गों के रूप में किया जा सकता है।इसी वजह से आदियोगी शिव ने परमतत्व की प्राप्ति के लिए विज्ञान भैरव तंत्र में एक सौ बारह विधियां/तरीके बताए हैं।

6-तंत्र प्रैक्टिकल है...इसमें सबसे पहले यह स्वीकार करना होता है कि मेरे अंदर अष्टधा प्रकृति के अष्ट विकार हैं-काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, मोह, आलस्य और भय।महानिर्वाण तंत्र में भगवान् शिव कहते हैं कि ...

6-1-''कलयुग में आगम शास्त्र को छोड़कर जो व्यक्ति दूसरा मार्ग अपनाएगा ,उसका उद्धार नहीं होगा।जैसे पेड़ के तने की सिंचाई करने से उसकी डालियां,सभी पत्ते आदि संतुष्ट होते हैं।उसी प्रकार से इस परमब्रह्म की आराधना से सभी देवता आदि संतुष्ट होते हैं। परमब्रह्म की उपासना में परिश्रम नहीं है, उपवास नहीं है ,शरीर संबंधी कोई कष्ट नहीं है।आचार आदि कोई नियम नहीं है।बहुत से उपचार की आवश्यकता नहीं है।दिशा, काल का विचार नहीं है। मुद्रा और न्यास अपेक्षित नहीं है।यह विश्व उसी से उत्पन्न है और उत्पन्न विश्व उसी में स्थित है।प्रलय काल में यह चराचर जगत उसी में लय हो जाता है।वह सर्वरूपमय है।

6-2-'''वह ब्रह्म उपासक सब धर्म ,अर्थ, काम, मोक्ष ...चार पुरुषार्थ को पाकर इस लोक और परलोक में आनंद का भोग करता है।परमब्रह्म की पूजा में ना आव्हान होता है और ना ही विसर्जन।सभी समय,सभी स्थान में ब्रह्म की साधना हो सकती है।नहाकर या बिना नहाये , खाकर या बिना खाए, किसी भी अवस्था में, किसी समय शुद्ध मन /शुद्ध चित्त होकर परमात्मा की पूजा करें। इसमें समय-असमय ,पवित्र अपवित्र की व्यवस्था नहीं है।जिस समय ,जिस स्थान में, जिसके द्वारा ब्रह्म अर्पित प्रसाद प्राप्त

हो;उसका भोजन बिना विचारे करना चाहिए।इस महामंत्र के साधन के बारे में मानसिक संकल्प का वर्णन किया जाता है।हे देवी; ब्रह्म साधक सभी के ब्रह्ममय होने की भावना करें''।

6-3-''गुरु बिना विचार किए शिष्य को अपना मंत्र से सकता है।पिता-पुत्र को, भाई -भाई को ,पति -पत्नी को ,मामा- भांजे को, और नाना- नानी, को दीक्षित कर सकता है।अपना मंत्र देने में जो दोष कहा गया है और पिता आदि से दीक्षा प्राप्ति में जो दोष हैं ;वे सभी दोष इस महासिद्ध मंत्र में लागू नहीं होते।इस महामंत्र के साधन के अतिरिक्त सुख और मोक्ष के लिए अन्य कोई उपाय नहीं है।ब्रह्म साधन में शास्त्रीय विधियां दासी स्वरूपा हो जाती हैं।ऐसे ब्रह्म साधन का परित्याग करके अन्य किसका सहारा लिया जा सकताहै? फिर जो ब्रह्म स्वरूप हो जाता है उन्हें अन्य बहुत से साधनों की क्याआवश्यकता है? शाक्त हो ,शैव हो ,गणपत हो, या वैष्णव का भी उपासक हो, ब्राह्मण हो या अन्य किसी धर्म, वर्ण, जाति का हो सभी ब्रह्म मंत्र के अधिकारी हैं।ब्रह्म मंत्र में स्थित होकर मनुष्य सब पापों से मुक्त होकर ब्रह्मसायुज्य प्राप्त करते हैं। ''

7-वह ब्रह्म मंत्र है ;ll ॐ सत्- चित् -एकमब्रह्म: ll यह परम ब्रह्म का मंत्र ही तंत्र का ,112 विधियों का आधार है।विज्ञानं भैरव तंत्र की यह 112 विधियां संपूर्ण मानवता के लिए हैं।यह किसी विशेष धर्म, जाति, आदि से संबंधित

नही है और पूर्ण वैज्ञानिक है।युगो से ये विधियां मानवता का मार्गदर्शन करती आ रही है ;चाहे वह श्रीकृष्ण हो ,या गौतम बुद्ध हो और आगे युगो में भी करती रहेंगी ।

8-ये विधियां साधकों, कुंडलिनी साधकों, मेडिटेटर्स और साधारण ग्रहस्थ के लिए भी महत्वपूर्ण है।साधारण ग्रहस्थ के माध्यम से ही दिव्य आत्माये संसार में आती है इसलिए यह विधियां उनके लिए तो अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।आवश्यकता है कि हम इन 112 विधियों का आत्मदर्शन के लिए उपयोग करें।ये सभी विधियां वेदांत दर्शन पर आधारित है।परन्तु इन विधियों का प्रयोग अगर भैरव-भैरवी के रूप में किया जाएगा ...तो विनाशकारी होगा...शिव का तीसरा नेत्र खुल जायेगा।इस चेतावनी के साथ मैं परम ब्रह्म परमेश्वर से प्रार्थना करती हूं कि हम सब मनुष्यों को मार्गदर्शन दें हम सबका कल्याण करें,और हमारी अज्ञानता का

नाश करें ...आपकी जय हो...आपकी जय हो...आपकी जय हो।


...SHIVOHAM...