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DHYAN SET -17..कुण्डलिनी शक्ति/षट्चक्र

कुण्डलिनी शक्ति:-

02 FACTS;-

1-कुण्डलिनी की सर्वत्र व्याख्या एक ऐसी शक्ति की रूप में की गयी है जिसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती | यह सर्वशक्तिमान की अधिष्ठात्री शक्ति है|मानव जीवन का दुर्लभतम वरदान है यह जिसको साध लेने से जन्म-जन्मान्तर के भाव-बंधन टूट जाते हैं समस्त विश्वव्यापी संसार में जो अनंत-कोटि ब्रह्माण्ड हैं, उनकी यात्रा, इसी मानव शरीर में कराती हुई, अंत में जब यह परात्पर पुरुष के वाम भाग में विराजती है तो मनुष्य की चेतना अपने पूर्णतम विकास को प्राप्त करती है अर्थात अपने आत्म स्वरुप में ही अवस्थित हो जाती हैं |कुण्डलिनी शक्ति मूलाधार चक्र के नीचे, सर्प की भांति, साढ़े तीन कुंडली मार कर सोई हुई है |कहते हैं कि यह सोई हुई कुण्डलिनी शक्ति जब पहली बार जागती है तो शरीर में भूकंप सा अहसास होता है यद्यपि प्रत्येक साधक के अपने स्वतंत्र निजी अनुभव हो सकते हैं लेकिन शरीर उस समय विचित्र पीड़ा के दौर से गुजरता है- एक ऐसा अनुभव जैसा पहले कभी ना हुआ हो |

2-इसीलिए योगाचार्यों ने कहा है कि बिना सुयोग्य गुरु की देखरेख में कुण्डलिनी जगाने का प्रयास नहीं करना चाहिए | निरंतर साधना एवं अभ्यास से जब कुण्डलिनी जागती है तो वह ऊपर की तरफ उठती है | उस समय सुषुम्ना नाड़ी, प्राणवायु के लिए राजपथ बन जाती है | जैसे एक राजा, राजमार्ग से, अपने पूरे ऐश्वर्य के साथ निकलता है, वैसे ही प्राणवायु, सुषुम्ना नाड़ी में सुखपूर्वक बहती है|उस समय चित्त यानि मन निरालम्ब हो जाता है और योगी को किसी भी प्रकार का भय नहीं रह जाता | तंत्रशास्त्रों में सुषुम्ना नाड़ी की बहुत महिमा बखान की गयी है|इसे शून्य पदवी, ब्रह्मरन्ध्र, महापथ, श्मशान, शाम्भवी, मध्यमार्ग आदि नाम दिए गए हैं | कुण्डलिनी के जागरण में महामुद्रा का विशेष विधान है|इस महामुद्रा को आदिनाथ आदि महासिद्धों ने प्रकट किया था |इस महामुद्रा से पञ्च महाक्लेष –अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, और अभिनिवेश रुपी शोक-मोह आदि नष्ट हो जाते हैं | जागने के बाद, जब कुण्डलिनी शक्ति ऊपर की तरफ उठती है तो सारे चक्र खिल जाते हैं, ब्रह्म ग्रंथि, विष्णु ग्रंथि, और रूद्र ग्रंथि खुल जाती हैं तथा शरीर में स्थित षट्चक्र पूर्ण विकसित होते हुए खुल जाते हैं |

नाड़ी चक्र:-

02 FACTS;-

1-लेकिन कुण्डलिनी तंत्र को समझने से पहले नाड़ी चक्र के विज्ञान को समझना अनिवार्य है | मानव-शरीर में नाड़ियों की संख्या बहत्तर हज़ार बतायी गयी है | ये नाड़ियाँ पेड़ के पत्तों की अतिसूक्ष्म शिराओं की भांति शरीर में रहती हैं | ये नाड़ियाँ, मनुष्य शरीर में, लिंग से ऊपर और नाभि के नीचे के स्थान (जिसे मूलाधार भी कहते हैं) से निकल कर पूरे शरीर में व्याप्त हैं |

इन बहत्तर हज़ार नाड़ियों में भी बहत्तर नाड़ियाँ प्रमुख हैं | ये सभी नाड़ियाँ, चक्र के समान शरीर में स्थित होकर शरीर तथा शरीर में स्थित पाँचों प्रकार की वायु (प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान) का आधार बनी हुई हैं | इन बहत्तर नाड़ियों में भी दस नाड़ियाँ प्रधान हैं जिनके नाम-इड़ा, पिन्गला, सुषुम्ना, गान्धारी, हस्तिजिव्हा, पूषा, यशस्विनी, अलम्बुषा, कुहू और शन्खिनी हैं |

इन दस नाड़ियों में भी प्रथम तीन नाड़ियाँ इड़ा, पिन्गला और सुषुम्ना विशेष महत्व की हैं जो प्राणवायु के मार्ग में स्थित हैं | शरीर के मेरुदंड के वाम भाग में या बाएं नासारंध्र (नाक) में इड़ा और दायीं तरफ (दाहिनी नाक में) पिन्गला नाड़ी है | मेरुदंड के बीचोबीच सुषुम्ना नाड़ी है | इन तीनों ही नाड़ियों में प्राणवायु बहती है |

2-इसके अतिरिक्त बायीं आँख में गांधारी, दाहिनी आँख में हस्तिजिव्हा, दायें कान में पूषा, बाएं कान में यशस्विनी, मुख में अलम्बुषा, लिंग में कुहू, और गुदा में शन्खिनी स्थित है | शरीर के दस द्वारों पर ये दस नाड़ियाँ स्थित हैं | इनमे इड़ा नाड़ी में चन्द्र, पिन्गला नाड़ी में सूर्य तथा सुषुम्ना में अग्नि देवता स्थित हैं |जो लोग इड़ा (चन्द्र), और पिंगला (सूर्य) नाड़ी से प्राणवायु का अभ्यास, स्वरोदय शास्त्र के अनुसार, निरंतर करते हैं उनकी दृष्टि त्रैकालिक होने लगती है यानी उन्हें भविष्य का भान होने लगता है | इन नाड़ियों के स्वर से शुभ-अशुभ, किसी कार्य के सिद्ध होने या बेकार जाने का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है |इड़ा नाड़ी चलने का अर्थ है बायीं नाक से श्वाँस का चलना और पिंगला नाड़ी चलने का अर्थ है दाहिनी नाक से श्वाँस का चलना | किस समय कौन सी नाड़ी चल रही है इसका अनुभव आप अपनी नासिका छिद्रों के पास अपनी अँगुलियों को ले जाकर कर सकते हैं | स्वरोदय-शास्त्र में इनकी विस्तार से चर्चा है |इन समस्त नाड़ियों का सञ्चालन करने वाली शक्ति ही कुण्डलिनी शक्ति है |

षट्चक्र का क्या अर्थ है?-

शरीर के मेरुदंड के भीतर, ब्रह्मनाड़ी में अनेक चक्रों की कल्पना की गयी है लेकिन मुख्य रूप से छह चक्र होते हैं | इन