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DHYAN SET-15 क्या रहस्य है षडरिपु और अष्ट सिद्धियों का

षडरिपु का रहस्य ;-

03 FACTS;-

1-वे गतिविधियाॅं जो मन को स्थूल पदार्थों की ओर खींचती हैं और प्रकृति के नियमों के विरुद्ध कार्य करातीं है ये अविद्यामाया से उत्पन्न होती हैं।अविद्यामाया षडरिपु की जन्मदाता है।षड रिपु का अर्थ है छै शत्रु, इन्हें शत्रु इसलिये कहा जाता है क्योंकि ये इकाई चेतना को सूक्ष्मता की ओर जाने से रोककर स्थूलता में अवशोषित करने का कार्य करते हैं। इकाई चेतना का उच्चतम स्तर सूक्ष्म है अतः उस ओर जाने से रोकने वाला शत्रु हुआ।आदमी के आध्यात्मिक उत्थान के मार्ग में षड रिपु बाधा बने रहते हैं।वास्तव में, ये बाधाएँ छह नहीं हैं, एक ही के छह रूप हैं।ये सभी एक दुसरे से अपना अपना रूप धरे चले आते हैं। कामना से मोह, मोह से लोभ, लोभ से मत्सर, मत्सर से ही मद का संचार होता है और परिणामतः क्रोध फूटता है ।

2-गीता के दूसरे अध्याय में कहा गया है-''इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करते हुए मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, ऎसी आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है।

क्रोध से अत्यन्त पूर्ण मोह उत्पन्न होता है, मोह से स्मरण-शक्ति में भ्रम उत्पन्न होता है, स्मरण-शक्ति में भ्रम हो जाने से बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धि के नष्ट होने से मनुष्य का अधो-पतन हो जाता है।जिस मनुष्य की इन्द्रियाँ वश में नहीं होती है उस मनुष्य की न तो बुद्धि स्थिर होती है, न मन स्थिर होता है और न ही शान्ति प्राप्त होती है ।


3-काम, क्रोध, लोभ, मद मोह, और मात्सर्य ये षडरिपु है ...

1-Kāma means desire and lust.

2-Krodha means anger.

3--Lobha means greed.

4-Moha means delusion.

5-Mada means Ego and pride.

6-Mātsarya means Jealousy, excessive competition.।


क्या रहस्य है सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा का?-

04 FACTS;-

1-प्रत्येक मनुष्य के पास आभामण्डल या औरा के अतिरिक्त एक भावमण्डल भी होता है यह भावमण्डल हमारी चेतना है । मनुष्य का जैसा भावमण्डल होता है वैसा ही उसका आभामण्डल होता है। यह आभामण्डल उस भावमण्डल के अनुसार परिवर्तित होता रहता है। साधना के बल पर औरा या आभामण्डल को जागृत करके उस शक्ति का विकास कर उसकी ऊर्जा शक्ति को अपने अंदर संचित कके मन पर एकाग्रचितता व नियंत्रण करने की क्षमता बढ़ाई जा सकती है। इसका प्रभाव केवल हमारे शरीर पर ही नहीं पड़ता, बल्कि यह हमारी सभी कर्मेंद्रियों, ज्ञानेन्द्रियों को बलिष्ठ बनाता है, मन की नकारात्मकता को दूर कर उसमें सकारात्मकता व सृजनात्मकता के भाव जगाता है।

2-साधु संतों का आभामण्डल इतना विकसित होता है कि वे अपने पास आई negativity को positivity में change कर देते हैं, लेकिन हम ऎसा नहीं कर पाते क्योकि हमारा aura पहले से इतना पोषित नहीं होता कि सामने वाले की negative waves को हटा सकें बल्कि सामने वाले की negative waves हमारे आभामण्डल को नुकसान पहुंचा देती है, आपने देखा होगा कि आप किसी के पास बैठते हो तो उसके पास ही बैठे रहने का मन करता है, क्योकिं उसकी positively waves आप catch कर रहे हो और आपका आभमण्डल विकसित हो रहा है। इसीलिए आपका मन नहीं करता उसके पास से हटने को, और ठीक इसके opposite स्वभाव का आपके पास कोई व्यक्ति आ जाए तो आप मन में सोचते हो कि ये कब जाएगा या कुछ ऎसा

हो कि मैं यहां से निकल जाऊं ।इसका मतलब कि आपका आभामण्डल उसकी negatively waves से क्षीण हो रहा है इसीलिए आपका मन उस व्यक्ति को repell कर रहा है ।यह सभी प्रक्रिया सूक्ष्म जगत् में सम्पन्न होती है ।

3-The law of conservation of energy states that energy can neither be created nor destroyed - only converted from one form of energy to another. This means that a system always has the same amount of energy, unless it's added from the outside. ... The only way to use energy is to transform energy from one form to another। उर्जा संरक्षण का नियम (law of conservation of energy) है कि उर्जा का न तो निर्माण सम्भव है न ही विनाश; केवल इसका रूप बदला जा सकता है।ये छै शत्रु negative energy है परन्तु ये भी उर्जा है जो

प्रत्येक अज्ञानी और अहंकारी व्यक्ति के पीछे लगे रहते हैं और तरह-तरह के त्रास देते रहते हैं तथा यही भवबंधन है। भव बंधन जो कुसंस्कारों के रूपों में व्यक्ति के स्वभाव का अंग बन जाते हैं और जन्म जन्मांतर तक साथ चलते हैं एवं त्रास देते रहते हैं।परन्तु Negative Energy का न तो निर्माण सम्भव है न ही विनाश; केवल इसका रूप बदला जा सकता है।

4-इसीलिए सबसे अच्छा उपाय हैं कि काम को प्रभु प्रेम से,क्रोध को क्षमा से,लोभ को गुप्तदान से,मोह को प्रभु के प्रति

मोह से,मात्सर्य को प्रभु के प्रति कृतज्ञता से ,मद को प्रभु के प्रति भक्ति से रूपांतरण करना चाहिए ।

जो व्यक्ति अपनी 5 कर्मेंद्रियों, 5 ज्ञानेन्द्रियों और मन को प्रभु की सेवा में विनियोग कर देगा तो उसके भी षडरिपु भाव के दोष का शमन हो जाएगा। प्रभु एक पारस पत्थर की तरह हैं । इसीलिए जो भी उनके संपर्क में आता है चाहे वह लोहा, तांबा

हो, वह सब सोने के रूप में बदल जाता है। हम अपने इन षडरिपु से नफरत करके मुक्ति नहीं पा सकते।केवल हम उन्हें रूपांतरित कर सकते हैंऔर यह केवल ईश्वर के सानिध्य में ही संभव है। मोक्ष यानी षडरिपु के आक्रमण से मुक्ति।

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अष्ट सिद्धियों का रहस्य ;- हनुमान चालीसा की चौपाई ''अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता अस वर दीन जानकी माता'' जिसे श्री राम चरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है। इस चौपाई का अर्थ है बजरंग बली अपने भक्तो को आठ प्रकार की सिद्धियां तथा नौ प्रकार की निधियां प्रदान कर सकते हैं। उन्हें यह सिद्धियां और निधियां देने का वरदान माता जानकी ने दिया था। यह अष्ट सिद्धियां चमत्कारिक हैं और प्रत्येक साधक को प्राप्त होती है ।वास्तव में हमारे शास्त्रों में कहानियों के माध्यम से ज्ञान दिया

गया है। जिससे सभी सामान्य जन बात को समझ सके।आठ चक्र हैं और आठ सिद्धियां। प्रत्येक चक्र पर हमको एक सिद्धि प्राप्त होती है। हमारा चक्र जितने परसेंटेज तक विकसित हुआ है;उसी के अनुपात से सिद्धियां भी हमें प्राप्त होती हैं। ।

प्रत्येक सिद्धि की एक कथा है और उस कथा के माध्यम से ही हम उस सिद्धि का अर्थ समझ सकते हैं।तो पहले हम कथा

समझेंगे और उसके बाद वास्तविक अर्थ।वह आठ सिद्धियों इस प्रकार है .. 1=सबसे पहली सिद्धि है अणिमा/ ART OF BRIEFING;-

कथा;-

इस सिद्धि के बल पर हनुमान जी कभी अति सूक्ष्म रूप धारण कर सकते हैं। इस सिद्धि का प्रयोग हनुमान जी ने तब किया था। जब वे समुद्र पार कर लंका पहुंचे थे। इस सिद्धि का उपयोग करके ही हनुमान जी पूरी लंका निरीक्षण किया था। अति सूक्ष्म होने के कारण हनुमान जी के बारे में किसी को पता ही नहीं चल सका था।

वास्तविक अर्थ;-

मूलाधार चक्र जागृत होने पर हमें अपने समाज कल्याण के शुभ इंटेंशन को अच्छे ढंग से व्यक्त करना आ जाता है। 2=दूसरी सिद्धि है महिमा/ ART OF MINUTE DETAILING;-

कथा;-

इस सिद्धि के बल पर हनुमान जी ने कई बार विशाल रूप धारण किया है। जब हनुमान जी समुद्र पार करके लंका जा रहे थे तब बीच रास्ते में सुरसा नाम की राक्षसी ने उनका रास्ता रोक लिया था। उस समय सुरसा को परास्त करने के लिए हनुमान जी स्वंय का रूप सौ योजन तक बड़ा कर लिया था। इसके अलावा माता सीता को श्री राम की वानर सेना पर विश्वास दिलाने के लिए महिमा सिद्धि का प्रयोग करते हुए स्वंय का रूप अत्यंत विशाल कर लिया था।

वास्तविक अर्थ;-

स्वाधिष्ठान चक्र जागृत होने पर हमें कल्याण के शुभ इंटेंशन को महिमा मंडित करना भी आ जाता है।

अथार्त हमारा इंटेंशन समाज के लिए कैसे किस प्रकार से महत्वपूर्ण है ...यह बताना और समझाना आ जाता है। 3=तीसरी सिद्धि है गरिमा /ADDING FACTS (DETAILS MENTIONED IN MAHIMA) ;-

कथा;-

इस सिद्धि की मदद से हनुमान जी स्वंय का भार किसी विशाल पर्वत के समान कर सकते हैं।गरिमा सिद्धि का उपयोग हनुमान जी ने महाभारत काल में भीम के समक्ष किया था जब उसे अपनी शक्ति पर घमंड हो गया था। उस समय भीम के घमंड को तोड़ने के लिए हनुमान जी ने एक वृद्ध वानर का रूप धारण करके रास्ते में अपनी पूंछ फैलाकर बेठे हुए थे। भीम ने जब हनुमान जी की पूंछ उठाई तो वह उनकी पूंछ को उठा नहीं सका।

वास्तविक अर्थ;-

मणिपूर चक्र के जाग्रत होने पर हमें यह बताना आ जाता है कि समाज के लिए महत्वपूर्ण कार्य

को किस प्रकार से किया जा सकता है। 4=चौथी सिद्धि है लघिमा /WEIGHTLESSNESS ..FEELING LIGHT FROM HEART;-

कथा;-

इस सिद्धि से हनुमान जी स्वंय का भार बिल्कुल हल्का कर सकते हैं और पलभर में वे कहीं भी आ जा सकते हैं। जब हनुमान जी अशोक वाटिका में पहुंचे तब वे अणिमा और लघिमा सिद्धि के बल पर सूक्ष्म रूप धारण करके अशोक वाटिका के पत्तो में छिप गए। इन पत्तों में बैठे- बैठे ही उन्होंने माता सीता को अपना परिचय दिया था। जिसके बाद माता सीता ने हनुमान जी को सामने प्रकट होने के लिए कहा था।

वास्तविक अर्थ;-

अनाहद चक्र के जाग्रत होने पर हमारा हृदय भार हीन हो जाता है।हमारा ओरा हमको प्रोटेक्ट करता है ,

शांत करता है और प्रसन्नता देता है। 5=पांचवीं सिद्धि है प्राप्ति /GAIN;-

कथा;-

इस सिद्धि के बल पर हनुमान जी किसी भी वस्तु को तुरंत ही प्राप्त कर लेते हैं। पशु पक्षियों की भाषा को समझ लेते हैं आने वाले समय को देख सकते हैं। रामायण में इस सिद्धि के उपयोग से हनुमान जी ने सीता माता की खोज करते समय कई पशु पक्षियो से चर्चा की थी। जिससे वह यह जान सके थे कि माता सीता इस समय में कहा पर है। जिसके बाद हनुमान जी ने माता सीता को अशोक वाटिका में खोज लिया था।

वास्तविक अर्थ;-

जब हमारा हृदय भार हीन हो जाता है तो हम शांत हो जाते हैं और प्राप्ति के लायक बन जाते हैं।अथार्त विशुद्धि चक्र के जाग्रत होने पर हम जिस कार्य को करना चाहते हैं उस कार्य को कर पाते हैं। 6=छठी सिद्धि है प्राकाम्य/BANDWITH OF VISION;-

कथा;-

इसी सिद्धि की मदद से हनुमान जी पृथ्वी की गहराईयों में पाताल तक जा सकते हैं। आकाश में उड़ सकते हैं और मनचाहे समय तक पानी में जीवित रह सकते हैं। इस सिद्धि से हनुमान जी चिरकाल तक युवा ही रहेंगे। इसके साथ ही वे अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी देह को धारण कर सकते हैं। इस सिद्धि से वे किसी भी वस्तु को चिरकाल तक प्राप्त कर सकते हैं।


वास्तविक अर्थ;-

प्राप्ति के बाद आती है प्राकाम्य ।वास्तव में, कुछ साधक प्राप्ति के बाद संतुष्ट हो जाते हैं क्योंकि उनका सोचने का दायरा बहुत छोटा होता है।इस सिद्धि के माध्यम से वह अपने सोचने का दायरा बढ़ा देते हैं।अगर उसने पहले अपने परिवार के लिए सोचा था तो अपने समाज के लिए सोचता है।यदि उसने समाज के लिए सोचा था तो अपने प्रदेश के लिए सोचता है और जिसने प्रदेश के लिए सोचा था, वह देश के लिए सोचता है ।जैसे ही उसका दायरा बढ़ता है तो जिसने देश के लिए सोचा था वह विश्व के लिए सोचता है और वैसे ही उसकी क्षमता भी बढ़ जाती है।

7=सातवीं सिद्धि है वशित्व /THE POWER OF MESMERISM/HYPNOSIS;-

कथा;-

इस सिद्धि के प्रभाव से हनुमान जी जितेंद्रिय हैं और मन पर नियंत्रण रखते हैं। वशित्व के कारण हनुमान जी किसी भी प्राणी को तुरंत ही अपने वश में कर सकते हैं। हनुमान जी के वश में आने के बाद प्राणी उनकी इच्छा के अनुसार ही कार्य करता है। इसी के प्रभाव से हनुमान जी अतुलित बल के धाम हैं।

वास्तविक अर्थ;-

प्राकाम्य के बाद आता है ''वशित्व''।जब व्यक्ति का इंटेंशन शुभ होता है अथार्त मनुष्य कल्याण या विश्व कल्याण के लिए होता है तो लोग उनकी बात को बहुत ध्यान से सुनते हैं और फॉलो करते हैं।उदाहरण के लिए महात्मा गांधी को लाखों लोग सुनते और फॉलो करते थे क्योंकि उनकी वाणी में ''वशित्व'' की सिद्धि थी। 8=आठवीं और आखिरी सिद्धि है ईशित्व/"अहं ब्रह्मास्मि" /YOUR OWN CREATION;-

कथा;-

इस सिद्धि की मदद से हनुमान जी को दैवीय शक्तियां प्राप्त हुई हैं।ईशित्व के प्रभाव से हनुमान जी ने पूरी वानर सेना का कुशल नेतृत्व किया था और सभी वानरों पर श्रेष्ठ नियंत्रण रखा था। साथ ही इस सिद्धि से हनुमान जी किसी मृत प्राणी को भी फिर से जीवित कर सकते हैं।

वास्तविक अर्थ;-

और अंतिम सिद्धि है''ईशित्व''।जब किसी व्यक्ति के लाखों फॉलोअर्स होते हैं।तब वह स्वयं इस लायक बन जाता है कि क्रिएशन कर सके।क्रिएशन करना ब्रह्म का गुण है और इस प्रकार उसे अहम् ब्रह्मास्मि सिद्ध हो जाता है।

चक्रों के नाम>>> सम्बंधित >>> तत्व>>>> प्रतीक चिह्न >>>स्थित>>>लोक>>>देवता>>>आधार >>>सिद्धि

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1-मूलाधार चक्र;- भौतिक>पृथ्वीतत्व>7 सूंडों वाला एक हाथी>जननेन्द्रिय और गुदा के बीच स्थित>भूः लोक(प्रथ्वी) >ब्रह्मा - शक्ति डाकिनी>Pure Concept>अणिमा

2-स्वाधिष्ठान चक्र;-प्राणाधार>जलतत्व>मगरमच्छ >उपस्थ में स्थित>भुवः लोक (वायु/राक्षस तथा भूत पिशाच)>विष्णु -शक्ति राकिनी>Faith>महिमा

3-मणिपूर चक्र;-काम या विद्युत केंद्र>अग्नितत्व,>मेढ़ा >नाभिमंडल में स्थित>स्वः लोक/अन्तरिक्ष/ ध्रुवलोक>रूद्र - शक्ति लाकिनी>Devotion> गरिमा

4-अनाहद चक्र;-आदित्य केन्द्र >वायुतत्व,>हिरण>हृदय के पास स्थित>महर्लोक /आदित्य लोक >रुद्र -काकिनी शक्ति>Love> लघिमा

5-विशुद्धि चक्र;-चंद्र केन्द्र>आकाशतत्व> एक सफेद हाथी>कंठकूप में स्थित> जनः लोक/ चन्द्र लोक >सदाशिव -शक्ति शाकिनी>Surrender> प्राप्ति

6-आज्ञा चक्र;- नक्षत्र केन्द्र >प्रकाशतत्व >एक श्वेत शिवलिंगम् /शुद्ध मानव और दैवीय गुण>भ्रमध्य में स्थित >तपः लोक/ नक्षत्रलोक >ज्ञानदाता शिव -शक्ति हाकिनी >Solution>प्राकाम्य

7-बिन्दु चक्र;-ब्रह्मा केन्द्र>दैवीय गुण>सिर के शीर्ष भाग पर केशों के गुच्छे के नीचे स्थित>सत्य लोक(ब्रह्मा धाम)> वशित्व

8-सहस्त्रार चक्र;-दिव्‍य>शिवतत्व>दैवीय>मस्तिष्क के शिखर पर स्थित/"ब्रह्म रन्ध्र” में स्थित>निर्गुण ब्रह्म ...कई विद्वान इसे चक्र नहीं मानते क्योंकि इसमें ईड़ा और पिंगला का प्रभाव नहीं पड़ता।> ईशित्व

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....SHIVOHAM.....