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DHYAN SET-14-क्या है बुद्धि की चार श्रेणियां?

क्या है बुद्धि की चार श्रेणियां?-

04 FACTS;-

बुद्धि चार प्रकार की होती है-

1) बुद्धि

2) मेधा बुद्धि

3) ऋतम्भरा बुद्धि और

4) प्रज्ञा बुद्धि ।

1) बुद्धि;-

बुद्धि वह होती है जो यथार्थ निर्णय देने वाली हो । हमारे नेत्र के पिछले बिभाग में पीला पटल है , इस पीले पटल में तन्मात्राएँ/5 Senses लगी है । तन्मात्राओं के पश्चात मन है । मन का सम्बन्ध बुद्धि से है । इस प्रकार जो पदार्थ नेत्रों के समक्ष आता है वह मन के द्वारा बुद्धि तक पहुचता है और हम यथार्थ निर्णय लेते है ।इन्द्रिय जो भी कार्य करती है तो यह सब विषय मन के द्वारा बुद्धि तक पहुँचते है और बुद्धि उनका निर्णयात्मक उत्तर देती है।जब मानव के ह्रदय में यह विचार आता है कि सब कुछ प्रभु का रचाया हुआ है और वह सर्वव्यापक है , तो इन्द्रिय किसी प्रकार का पाप नहीं कर सकती । परन्तु जो प्रभु को सर्वव्यापक कहते तो है पर विश्वास नहीं करते , उनसे यह आशा नहीं की जा सकती कि वे पाप नहीं करेंगे ।

2) मेधा बुद्धि;-

02 POINTS;-

1-मेधावी बुद्धि उसको कहते है जिसके आने के पश्चात मानव के जन्म जन्मान्तरों के संस्कार जाग्रत हो जाते है।मेधावी बुद्धि का सम्बन्ध अंतरिक्ष से होता है।जो वाणी अंतरिक्ष में रमण करती है , मेधावी बुद्धि प्राप्त होने पर उसको जान लिया जाता है।मेधावी बुद्धि अंतरिक्ष में संसार के ज्ञान विज्ञान को देखा करती है कि यह संसार का विज्ञान और कौन कौन से वाक्य अंतरिक्ष में रमण कर रहे है ।मेधावी बुद्धि उस विवेक का नाम है जब मानव संसार से विवेकी होकर परमात्मा के रचाये हुए तत्वों पर विवेकी होकर जाता है ।

2-इस मेधावी बुद्धि का क्षेत्र है , पृथ्वी के गर्भ में नाना प्रकार कि धाराए तथा खनिज , समुद्रो की तरंगो में रमण करने वाली धातुए तथा प्राणी, वायुमंडल में रमण करने वाले, रजोगुणी, तमोगुणी तथा सतोगुणी परमाणु , इन परमाणुओ तथा वाणी का मंथन करना इसका क्षेत्र है । मानव मेधावी बुद्धि का विवेकी बनकर परमात्मा के रचाये हुए विज्ञान को जानता हुआ यह आत्मा ऋतम्भरा बुद्धि के द्वार चला जाता है ।

ऋतम्भरा बुद्धि ;-

ऋतम्भरा बुद्धि उसको कहते है जब मानव योगी और जिज्ञासु बनने के लिए परमात्मा की गोद में जाने के लिए लालयित होता है तो वही मेधावी बुद्धि , ऋतम्भरा बुद्धि बन जाती है । पांचो प्राण ऋतम्भरा बुद्धि के अधीन हो जाते है । योगी जब इन पांचो प्राण को अपने अधीन करके उनसे मिलान कर लेता है तो आत्मा इन प्राणो पर सवार हो जाता है और सर्वप्रथम मूलाधार में रमण करता है ।

11 POINTS;-

1) मूलाधार में लगभग 6 ग्रन्थियां लगी है , आत्मा के यहाँ पहुचने पर ये ग्रन्थियां स्पष्ट हो जाती है , इस आत्मा का प्राणो के सहित आगे को उत्थान हो जाता है ।

2) आगे चलकर यह आत्मा नाभि चक्र में आता है , जिसमे 12 ग्रन्थियां होती है , यह ग्रथि 72 करोड़ , 72 लाख, 10 हज़ार , 2 सौ 2 नाड़ियों का समूह है । आत्मा के यहाँ पहुचने पर वे भी स्पष्ट हो जाती है ।

3) इसके आगे यह आत्मा गंगा , यमुना, सरस्वती में स्नान करता हुआ ह्रदय चक्र में पहुचता है । इसको अविनाश चक्र भी कहते है । यह 24 ग्रन्थियां का समूह माना जाता है , आत्मा के यहाँ पहुचने पर ये भी स्पष्ट हो जाती है ।

4) इसके आगे यह आत्मा कंठ चक्र में जाता है जिसे उदान चक्र या ब्राह्यी चक्र भी कहते है । इसमें लगभग 47 ग्रन्थियां होती है, आत्मा के यहाँ पहुचने पर ये भी स्पष्ट हो जाती है ।

5) इसके आगे यह आत्मा घ्राण चक्र में जाता है , आत्मा के यहाँ पहुचने पर ये भी स्पष्ट हो जाती है ।

6) आगे वह स्थान आता है जहाँ इड़ा, पिंगला , सुषुम्ना नाम की नाड़ियों , जिन्हे गंगा, यमुना, सरस्वती भी कहते है, का मिलान होता है , इसे त्रिवेणी या आज्ञाचक्र भी कहते है ।

7) आत्मा प्राणो सहित त्रिवेणी में स्नान करता हुआ ब्रह्मरंध्र में पहुँचता है , उस स्थान पर सूर्य का प्रकाश भी फीका पड़ जाता है । 8) इतने प्रबल प्रकाश से आगे चलकर आत्मा रीढ़ में जाकर जहाँ कुंडली जाग्रत हो जाती है ।इस कुंडली के जाग्रत होने का नाम ही परमात्मा से मिलन होना है ।

9) हमारा विज्ञानं दो प्रकार का होता है पहला भौतिक विज्ञानं और दूसरा आध्यात्मिक विज्ञानं । भौतिक विज्ञानं को समझने तथा रिसर्च करने के लिए हमें बुद्धि और मेधा बुद्धि की आवश्यकता होती है तथा आध्यात्मिक विज्ञानं में घुसने के लिये हमें ऋतम्बरा और प्रज्ञा बुद्धि की आवस्यकता होती है। बुद्धि और मेधा बुद्धि हमें यन्त्र विज्ञानं के सहारे ग्रहों तक पहुंचा देती है तथा ऋतंबरा बुद्धि और प्रज्ञा बुद्धि हमें गृह मंडल से आगे क्या है उस क्षेत्र की जानकारी देती हैं।

10) ऋतंबरा बुद्धि 5 इन्द्रिय और 5 प्राणो को एक सूत्र में बाँध कर उन पर सवार होकर अंतरिक्ष में रमन करती है।और ऋतम्बरा बुद्धि जानकारी देती है कि अंतरिक्ष लोक में क्या है.इसके बाद काम शुरू होता है प्रज्ञा बुद्धि का ।प्रज्ञा बुद्धि ऋतम्बरा बुद्धि को छोड़ 3 नाड़ियों इडा पिंगलाऔर सुषुम्ना पर सवार होकर कुंडलनी को जागृत करती हुई ब्रह्मरन्द्र को पार करती हुई जब समाधि में लीन हो जाती है । तो प्रज्ञा बुद्धि ही फिर वहाँ क्या हो रहा है ..उसकी

जानकारी देती है ।ऋतम्बरा बुद्धि और प्रज्ञा बुद्धि वाले लोग ही समाधि में जा सकते है तथा उन महान लोगों को ही ब्रह्म ज्ञान प्राप्त होता है । 11) अगर आप भी मेधा बुद्धि ,ऋतम्बरा बुद्धि और प्रज्ञा बुद्धि में रमण करना चाहते है तो सबसे पहले आपको भौतिक विज्ञानं का अध्यन करना चाहिए इससे आपको मेधा बुद्धि प्राप्त होगी । उसके बाद आपको ज्योतिष विज्ञानं (गृह विज्ञानं ) और धार्मिक ग्रंथो का अध्यन करना चाहिए । इससे आपको ऋतम्बरा बुद्धि प्राप्त होगी । उसके बाद आपको आध्यात्मिक विज्ञानं का अध्ययन और ध्यान अभ्यास करना चाहिए । इससे आपको प्रज्ञा बुद्धि प्राप्त होगी. प्रज्ञा बुद्धि की प्राप्ति के बाद तो आप सभी लोको में भ्रमण कर सकते हो । तथा भगवान को प्राप्त कर सकते है ।

प्रज्ञा बुद्धि;-

07 POINTS;-

1) -प्रज्ञा बुद्धि उस ऋषि को प्राप्त होती है जो मुक्ति को प्राप्त कर लेता है । हमारे कंठ के निचले भाग में ह्रदय चक्र होता है , उस चक्र में मेधावी बुद्धि का संक्षेप रमण करता है । उसमे ब्रह्माण्ड के सारे के सारे ज्ञान और विज्ञानं रमण करने लगता है । जैसे अंतरिक्ष में हमारे वाक्य रमण करते है , उस विद्या से जो वाक्य हम उच्चारण करना चाहते है , वही वाक्य अंतरिक्ष से हमारे समीप आने लगते है । उसी वाक्य के आरम्भ होने को मेधावी बुद्धि का ” ऋद्धि भूषणम ” कहा जाता है । इस भूषण को धारण करने से मानव का जीवन विकासदायक बनता है । वह नाना प्रकार के छल , दम्भ, आडम्बर आदि से दूर हो जाता है । और वह योगी त्रिकालदर्शी यानि भूत, भविष्यत् और वर्तमान तीनो कालों का ज्ञाता हो जाता है।

2) -महर्षि पतंजलि अपने योग सूत्रों में योग साधना की जिन उपलब्धियों की चर्चा करते हैं, उनमें यह उपलब्धि विशेष है। प्रज्ञा या बौद्धिक चेतना हमारे जीवन रथ की संचालक है। इसकी अवस्था ही जीवन की दिशा का निर्धारण करती है। सामान्य क्रम में बुद्धि सन्देह, भ्रम की वजह से चंचल रहती है। इस चंचलता की वजह से ही इसकी निर्णय क्षमता एवं विश्लेषण क्षमता पर असर पड़ता है। बौद्धिक दिशाभ्रम के कारणों में पूर्वाग्रहों, स्वार्थपरता एवं हठधर्मिता का भारी हाथ रहता है। इनके कारण बुद्धि में वह समझदारी नहीं पनप पाती, जिसकी आवश्यकता है।

3) -अन्तर्यात्रा विज्ञान के प्रयोग- विशेष तौर पर ध्यान की प्रणालियाँ, बुद्धि के इस कल्मष को दूर करती है। इस कल्मष के दूर होने से इसमें सहज निर्मलता आती है। इसके विकार दूर होने से इसमें न केवल सत्य का आकलन करने की योग्यता विकसित होती है, बल्कि इसमें ऋत् दर्शन की दृष्टि भी पनपती है।सत्य के दो रूप है। एक वह जो सामान्य इन्द्रियों एवं साधारण बौद्धिक समझ से देखा व जाना जाता है। जिसके रूप काल एवं परिस्थिति के हिसाब से बदलते रहते हैं। उदाहरण के लिए टेबल में पुस्तक रखी है। यह सत्य है, किन्तु यह सत्य एक सीमित स्थान एवं सीमित समय के लिए है। समय एवं स्थान के परिवर्तन के साथ ही यह सत्य- सत्य नहीं रह जाएगा। 4) -सत्य के इस सामान्य रूप के अलावा एक अन्य रूप है, जो सर्वकालिकम एवं सार्वभौमिक है। यह अपरिवर्तनीय है। क्योंकि यह किसी एक स्थान से नहीं, बल्कि सम्पूर्ण अस्तित्व से जुड़ा है। यह सत्य अस्तित्व के नियमों का है। भौतिक ही नहीं, अभौतिक या पराभौतिक प्रकृति इस दायरे में आते हैं। यह न बदलता है और न मिटता है। इसे जानने वाला सृष्टि एवं स्रष्टा के नियमों से परिचित हो जाता है। इसकी प्राप्ति किसी तार्किक अवधारणा या फिर किसी विवेचन, विश्लेषण से नहीं होती। बल्कि इसके लिए सम्पूर्ण अस्तित्व से एक रस होना पड़ता है। और ऐसा तभी होता है, जब योग साधक के चित्त को निर्विकार की भावदशा प्राप्त हो। 5) -ऋतम्भरा में सत्य की शाश्वतता के साथ परमात्मा की सरसता है ; जो हमारा अन्तरतम होने के साथ सभी का अन्तरतम है। जब योगी को निर्विचार समाधि की अवस्था प्राप्त होती है, तो उसकी प्रज्ञा ऋतम्भरा से आलोकित- आपूरित हो जाती है। उसमें ब्रह्माण्ड की समस्वरता स्पन्दित होने लगती है। यहाँ न कोई द्वन्द्व है और न किसी अव्यवस्था की उलझन। जहाँ कहीं जो भी नकारात्मक है, जो भी विषैला है, वह सबका सब विलीन, विसर्जित हो जाता है। ध्यान रहे कि यहाँ किसी को निकाल फेंकने की जरूरत नहीं रहती, क्योंकि सम्पूर्णता में सबको जीवन के सभी तत्त्वों को उनका अपना स्थान मिल जाता है। 6) -यहाँ पहुँचते ही जीवन चेतना शिकायतों- सन्देहों, उलझनों, भ्रमों से मुक्त हो जाती है। सब कुछ समझ में आने लगता है, एकदम साफ- साफ और सुस्पष्ट। प्रत्येक तत्त्व की स्थिति ही नहीं, उसका औचित्य भी स्पष्ट हो जाता है। और तब पता चलता है कि यथार्थ में परेशान होने का कोई कारण ही नहीं है। यही विशेषता है-इस भावदशा का।ऋतम्भरा में सर्वत्र सम्पूर्णता ही है। और इस सम्पूर्ण में सभी कुछ इतनी समस्वरता एवं संगीत लिए है कि बस माधुर्य के अलावा कुछ बचता ही नहीं। यहाँ केवल जीवन ही नहीं, मृत्यु का भी अपूर्व सौन्दर्य है। हर वस्तु नए प्रकाश में आलोकित होता है। पीड़ा भी, दुःख भी एक नए गुणवत्ता के साथ स्वयं को प्रकट करते हैं। यहाँ असुन्दर भी सुन्दर हो जाता है, क्योंकि तब पहली बार समझ में आता है कि विपरीतता, विषमता क्यों आवश्यक है। और तब ये सब और इनमें से कुछ भी असुविधाजनक नहीं रहता। सब का सब एक दूसरे के संपूरक हो जाता है। यह बड़ा ही स्पष्ट अनुभव होता है- ये सभी तत्त्व एक दूसरे की मदद के लिए हैं। 7) -सामान्य बोलचाल में- जिसे हम सब कहते- सुनते हैं, भगवान् का प्रत्येक विधान मंगलमय है। उसकी सही समझ चेतना की इसी अवस्था में समझ आती है। प्रज्ञा के ऋतम्भरा होने पर ही भगवान् के मंगलमय विधान का बोध होता है। अभी वर्तमान में एक कोरा कथन है- जिसमें शब्द तो बोले जाते हैं, परन्तु उनमें कोई अर्थ नहीं होता। बस एक ध्वनि बनकर कानों में गूँज जाती है। इसमें अस्तित्व के प्राण नहीं बसते। परन्तु प्रज्ञा के ऋतम्भरा होने पर इस मंगलमयता की प्रतिपल प्रतिक्षण अनुभूति होती रहती है। और योगी बन जाता है—मीरा की तरह, सुकरात की भाँति। उसे प्राप्त होती है महात्मा ईसा की अवस्था, जिसमें विष का प्याला, सूली की चुभन भी मंगलमय नजर आती है; क्योंकि तब इसकी बहुमूल्यता अनुभूत होने लगती है।

स्वयं के भीतर प्रवेश करने के लिए ,कोई कैसे तृतीय प्रकार के सुनने की कला तक पहुंच सकता है?- 02 FACTS;- 1-तीन प्रकार के Element है और तीन प्रकार की सुनने की विधिया है... प्रथम- बुद्धि द्वारा सुनना -Air Element द्वितीय-भाव, सहानुभूति व प्रेम द्वारा सुनना-Water Element तृतीय-श्रद्धा के द्वारा समग्रता से सुनना--Fire Element 2-तीन Element .5 हैं..तीनो के समन्वय से Totality की यात्रा शरू होती हैं ।तभी हम अस्तित्व / बीइंग तक पहुंच पाते है अथार्त दूसरा .5 ... पूर्णता ।

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प्रथम- बुद्धि द्वारा सुनना ;-

08 FACTS;-

।-बुद्धि द्वारा सुनने का तात्पर्य है ;जब मन कई विचारों से भरा हुआ हो, तो जो कुछ भी उस तक आता है, उसे वह अपने रंग देता चला जाता है।तब मन वह नहीं सुनता जो कि कहा जा रहा है, बल्कि वह सुनता है,जो कि वह सुनना चाहता है।आप सुन रहे हैं और भीतर लगातार तर्क चल रहा है कि क्या सही है और क्या गलत है; तो आप अपनी धारणाओं, अपने आदर्शों, अपने तरीकों से तुलना कर रहे हैं।भीतर के इतने शोरगुल में आप केवल चुनाव करते है, छोड़ते है और अपने ही अर्थ लगाते है। तभी कुछ भीतर घुस पाता है। पर तब उसकी दूसरी ही शक्ल हो जाती है;वह वही नहीं होगा जो कहा गया होगा।

2-यदि आप, जो कुछ भी कहा जा रहा है उसे गहराई से समझना चाहते हैं, तो आपको इस भीतरी शोरगुल को बंद करना पड़ेगा।अन्यथा आप लगातार अपने द्वारा ही ऐसी संभावनाएं नष्ट कर रहे हैं जिससे कि आप पर कुछ भी घटित हो। आप चूक सकते हैं, और प्रत्येक बहुत कुछ चूक रहा है।हम अपने ही मन के घेरे में बंद रहते हैं और वही घेरा हम सब जगह साथ ले जाते हैं। इसलिए जो भी हम देखते हैं, जो भी हम सुनते हैं, जो भी हमारे चारों ओर हो रहा होता है, वह कभी भी सीधे हमारे भीतर तक नहीं पहुंचाया जाता। मन सदैव ही बीच में अपनी चालाकियां दिखलाने आ जाता है ।

3-दूसरी श्रेणी की सुनने की कला तक पहुंचने के लिए यह पहली बात है कि आपका मन जो भी कर रहा हो, उसके प्रति होश रहे। वह बीच में आ रहा है। जहां भी आप जाते हो, वह आपसे पहले ही पहुंच जाता है। यह कोई छाया की तरह नहीं है कि आपके पीछे-पीछे आए।लेकिन यह

आपसे पहले चला जाता है और हर वस्तु को रंग दे देता है। और इस तरह आप कभी भी किसी वस्तु के सत्य रूप से परिचित नहीं हो सकते।मन एक कल्पना निर्मित करता है।आपको मन के इस तरह काम करने की व्यवस्था से अवगत हो जाना चाहिए।

4-परन्तु हम कभी भी इस बात को नहीं जान पाते, क्योंकि हम तो मन से तादात्म्य जोड़े होते हैं--हम कभी नहीं जान पाते कि मन अपने आप कुछ करता चला जाता है।आप में और आपके मन के बीच कोई अंतराल नहीं है। आप तादात्म्य जोड़े हैं और वस्तुतः यही सारी समस्या है।और यही एक तरीका है जिससे कि मन आपके साथ चालाकी कर सकता है।आप एक विचार अथवा विचार की प्रक्रिया से अपना तादात्म्य जोड़ लेते है।और यह बड़ा विचित्र है, क्योंकि केवल दो दिन पहले वह आपका विचार नहीं था। आपने उसे कहीं सुन लिया। अब आपने उसे पकड़ लिया और अब वह

आपका हो गया! और अब यह विचार कहेगा--नहीं, यह बात ठीक नहीं है,

क्योंकि यह मेरे विचार के अनुसार नहीं है।

5-आप यह अंतर नहीं महसूस कर पाएंगे कि यह तो मन बोल रहा है, स्मृति बोल रही है ,यांत्रिकता बोल रही है और आपको उससे अलग रहना चाहिए।यहां तक कि यदि आपको तुलना करनी हो, जांचना हो, तो भी आपको अपनी स्मृति से, मन से, अतीत से अलग रहना चाहिए।मन

बदला जा सकता है और यदि आप उसके साथ तादात्म्य जोड़ेंगे, तो आप अपनी स्वतंत्रता खो देंगे।अपने मन से स्वतंत्र होना बहुत बड़ी स्वतंत्रता है, क्योंकि यह बहुत सूक्ष्म दासता है। इतनी गहरी दासता हैं कि आप इसे कभी अनुभव ही नहीं कर पाते हैं। यह कैद खाना ही आपका घर बन जाता है।

6-सदैव सजग रहें कि आपका मन आपकी चेतना नहीं है। और जितने ही आप सजग रहेंगे, आप पाएंगे कि चेतना एक बिलकुल ही भिन्‍न बात है। चेतना उर्जा है और मन मात्र विचार है,आप उसके मालिक हो जाएं। उसे अपना मालिक न बनने दें। उसे स्वयं से पहले कहीं न जाने दें। उसे अपने पीछे-पीछे आने दें। उसका उपयोग करें, परन्तु उसके द्वारा आप उपयोग न किए जाएं। वह एक यंत्र है, परन्तु हम उसके साथ तादात्म्य जोड़े बैठे हैं। इसलिए इस तादात्म्य को तोड़े।स्मरण रखें कि आप मन नहीं हैं।मन ही

बंधन है, और वस्तुतः आपका शरीर प्रकृति से आता है, परमात्मा से आता है परन्तु आपका मन समाज से आता है। इसलिए शरीर के पास सौंदर्य है, परन्तु मन के पास कदापि नहीं।

7-मन हमेशा ही कुरूप है। वह संस्कारित है, एक झूठा निर्माण है। शरीर एक सुंदर संदेश है। यदि आप मन को गिरा सकें, तो आप शरीर के साथ कोई संघर्ष नहीं पाएंगे। तब शरीर उस विराट के लिए ...उस असीम विस्तार के लिए;एक द्वार बन जाता है। शरीर में कुछ कुरूप नहीं ...वह तो स्वाभाविक फूल का खिलना है परन्तु तथा कथित धार्मिक लोग हमेशा ही शरीर के विरोध में रहे हैं और मन के पक्ष में रहे हैं।उन्होंने बड़ी

अजीब उलझन पैदा की है। उन्होंने सारी संवेदनशीलता समाप्त कर दी, क्योंकि शरीर ही सारी संवेदनशीलता का स्रोत है। एक बार आप शरीर के खिलाफ हो जाएं, तो आप संवेदनशील हो जाएंगे।

8-मन मात्र अतीत के अनुभव, ज्ञान व सूचनाओं का संकलन है। वह केवल एक कम्प्यूटर है।हम उससे ही तादात्म्य बनाए हुए हैं- कोई ईसाई है, कोई हिंदू है, कोई कम्युनिस्ट है, कोई कैथोलिक है, कोई यह है, कोई वह है। कोई भी स्वयं नहीं है, बल्कि सदैव ही किसी अन्य से कहीं और जगह तादात्म्य बनाए है। इसे स्मरण रखें और इसके प्रति सजग रहें। कभी भी स्वयं के व अपने शरीर के बीच दूरी न बनाए। अपने व अपने मन के बीच ही दूरी बनाए। तब आप और अधिक जीवंत होंगे, बच्चे के समान, ज्यादा निर्दोष और ज्यादा सजग होंगे। इसलिए पहली बात दूरी बनाने की है-- अथार्त तादात्म्य न जोड़े। याद रखें कि आप मन नहीं हैं, तब पहले प्रकार

का सुनना दूसरी प्रकार के सुनने में परिवर्तित हो जाएगा।

द्वितीय...भाव, सहानुभूति व प्रेम द्वारा सुनना:-

04 FACTS;-

1-दूसरी प्रकार का सुनना भावात्मक है--गहरे में अनुभूत, सहानुभूतिपूर्ण। यह एक प्रेमपूर्ण रुख है।आप कोई संगीत सुन रहे हैं या कोई नृत्य देख रहे हैं, तब आप बुद्धि की बात याद नहीं रखते।आप उसमें भाग लेने लगते हैं। जब आप एक नृत्य को देख रहे होते हैं, आपके पांव भी उसमें भाग लेने लगते हैं। जब आप एक संगीत सुनते हैं, आपके हाथ भी उसमें भाग लेने लगते हैं। आप उसके एक हिस्से होने लगते हैं। यह एक सहानुभूतिपूर्ण तरीका है सुनने का, जो कि बुद्धि से ज्यादा गहरा है।

2-जब आप अपने हृदय से सुनते हैं और उसे अनुभव करते हैं, तो आप उपर उठ गए महसूस करते हैं ।वास्तव में तो आप इसी दुनिया में होते

हैं,परन्तु आप ऐसा अनुभव करते हैं जैसे कि आप इस दुनिया में नहीं हैं। क्योंकि आप बुद्धि की दुनिया में नहीं होते। एक भिन्‍न ही आयाम खुलता है और आप उसमें अपने को प्रक्रिया रूप से पाते हैं।बुद्धि सदैव ही एक दर्शन

है-बाहर खड़ी हुई-अंदर कभी भी नहीं। इसलिए जितनी अधिक बुद्धि संसार में बढ़ती है, उतने ही हर बात में हम निष्क्रिय दर्शक होते जाते हैं। आप नहीं नाचेंगे , परन्तु आप दूसरों को नाचते हुए देखेंगे!

3-यदि ऐसा दिन-प्रतिदिन होता गया जैसा कि हो रहा है, तो जल्दी ही आप कुछ भी नहीं कर रहे होंगे। आप सिर्फ दूसरों की ओर देखते रहेंगे।आप दूसरों को गाते हुए, नाचते हुए ,खेलते हुए देख रहे हैं। एक दिन आप प्रेम भी नहीं करेंगे; केवल दूसरों को प्रेम करते हुए देखेंगे। आप एक फिल्म में भी दूसरों को प्यार करते हुए ही देखते हैं।आप सिर्फ एक देखने वाले हैं एक मृत, निष्क्रिय दर्शक क्योंकि बुद्धि एक दर्शक है ;भागीदार नहीं। यदि हम बुद्धि के चारों ओर दुनिया बनाए तो यह क्रिया शून्य देखना घटित होगा।

4-द्वितीय केंद्र अधिक संलग्न हो गया है, तो आप उसमें भाग लेने लगेंगे ,अधिक समझने लगेंगे।क्योंकि जिस क्षण भी आप सहानुभूतिपूर्ण होते हैं, आपका मन अधिक खुल जाता है।अब मन खुला है, ग्राहक है, निमंत्रण देता हुआ है।परन्तु भाव भी एक भाग ही है ,बुद्धि भी एक भाग है। क्रिया का स्रोत दूसरा ही है। आपके अस्तित्व में, बीइंग में, बहुत से भाग हैं, स्वरूप हैं। आप उनके द्वारा अधिक अच्छा सुन सकते हैं, परन्तु फिर भी

वह एक भाग ही है।और जब आप भाव से सुनेगे , तब आपकी बुद्धि सो जाएंगी, अन्यथा वह दखल देगी।

तृतीय...समग्रता से सुनना--

15 FACTS;-

1-गहन से गहन ज्ञान तभी संभव है, जबकि आप उसके साथ एक हो गए हों।यह श्रद्धा से होता है।न केवल भाग लेना है, बल्कि उसके साथ एक हो जाना है।कोई एक बुद्धि से नृत्य देखता है, दूसरा नृत्य को अनुभव करता है और उसमें भाग लेने लगता है ;ताल को मिलाने लगता है।और तीसरा है, स्वयं नृत्य ही हो जाना..नर्तक नहीं, बल्कि नृत्य ही। पूरा होना संलग्न हो गया।आप वही हैं।

2-इसे कैसे पाएँ?...अपनी बुद्धि के प्रति सजग रहें,अपने मन से तादात्म्य न जोड़े। फिर दूसरे पर आए अथार्त भावना पर। तब फिर ध्यान रहे कि भावना भी एक हिस्सा ही है और आपका पूरा अस्तित्व मृत पड़ा है। वह वहां नहीं है। इसलिए उस समग्र को आगे लाएं।जब आप समग्र को आगे लाते हैं, तो ऐसा नहीं है कि बुद्धि को मना कर दिया गया है अथवा भावना को मना कर दिया गया है। आप ही उनमें हैं, परन्तु एक भिन्‍न ही समन्वय में। कुछ भी निषेध नहीं किया गया है। सब कुछ वहां पर मौजूद है, परन्तु एक भिन्‍न ही ढांचे में।अब उसमें आपका समग्र अस्तित्व ही हिस्सा ले रहा है- वही हो गया है।

3-इसलिए जब आप सुनें, तो इस तरह से सुनें जैसे कि आप सुनना ही हो गए हैं।जब कोई कुछ कह रहा हैं, तो उसमें लड़े नहीं, उससे सहानुभूतिपूर्ण न हों, बल्कि वही हो जाएं। समग्र हो जाए, वही हो जाएं। उसे आने दें और उसे भीतर गूंजने दें बिना किसी मुकाबले के, बिना किसी भावना के, वरन पूरी समग्रता से। उसे साथ प्रयोग करें और आप जीने का एक नया आयाम अनुभव करेंगे--खाली सुनने के लिए ही नहीं, वरन प्रत्येक चीज के लिए। आप उस तरह से खाना खा सकते हैं , चल सकते हैं ,सो सकते हैं ...आप उस भांति जी सकते हैं।

4-उदाहरण के लिए एक दिन संत कबीर की गायों के लिए भोजन नहीं था, इसलिए उसने अपने बेटे कमाल को खेत से घास काट लाने को कहा। कमाल जाता है और लौट कर नहीं आता है। दोपहर गुजर गई, शाम भी आ रही है। कबीर प्रतीक्षा करते हैं और गाए भूखी हैं। कहां गया कमाल? तो

संत कबीर कमाल की खोज में जाते हैं।कमाल एक घास के खेत में खड़ा है। सूरज डूब रहा है। हवा चल रही है। घास लहरों की तरह झूम रही है और कमाल भी लहरों की तरह उनके साथ झूम रहा है। सारा दिन इस तरह बीत गया है और संत कबीर उसके पास जाते हैं और कहते हैं, कमाल, क्या पागल हो गए हो? क्या कर रहे हो?

5-अचानक कमाल दूसरी ही दुनिया में लौटता है और कहता है--मैं तो भूल ही गया था कि मैं कमाल हूं। मैं वही हो गया था: मैं तो एक घास ही हो गया था। मैं उसी के साथ हिल रहा था, मैं उसी के साथ नाच रहा था। और मैं यह भूल ही गया कि मैं यहां किस लिए आया था। बतलाएं मुझे कि मैं यहां क्यों आया था?संत कबीर कहते हैं--घास काटने के लिए। इस पर कमाल हंसने लगता है और कहता है--कैसे कोई स्वयं को काट सकता है? आज तो यह संभव नहीं है। मैं फिर कभी आउंगा और कोशिश करूंगा, परन्तु मैं वादा नहीं कर सकता, क्योंकि मैंने एक दूसरी ही दुनिया जानी है, एक दूसरा ही जगत मेरे समझ खुला है। संत कबीर ने उसी दिन उसका नाम कमाल रख दिया। कमाल का अर्थ होता है चमत्कार। यह एक चमत्कार है।

6-यदि आप किसी भी बात में समग्र हो जाएं, तो चमत्कार घटित हो जाता है। यह मात्र सुनने के लिए ही नहीं है। यह हर बात के लिए है। समग्र हो जाएं ,समग्रता से गति करें। कभी भी स्वयं को विभाजित न करें।कैसा भी विभाजन आत्मघातक है,अपनी शक्ति को नष्ट करना है। यदि आप प्रेम करते हैं, तो समग्रता से करें। यदि आप सुनते हैं, तो पूरी समग्रता से सुनें। कुछ भी पीछे न बचाएँ। बस बिलकुल समग्रता में बढ़े।केवल यह समग्र

गति ही आत्मानुभव लाती है ।अहंकार बुद्धि के साथ ,भावना के साथ पाया जा सकता है, क्योंकि बुद्धि का अपना कोई केंद्र नहीं होता।परन्तु वह हमारी समग्रता के साथ कभी भी नहीं पाया जा सकता।बुद्धि को तो अपना केंद्र निर्मित करना पड़ता है और वही अहंकार बन जाता है।

7-भावना भी समग्र को नहीं आने देगी क्योंकि उसका अपना केंद्र होता है। वह अहंकार हो जाता है। इसलिए स्त्री और पुरुषों के भिन्‍न-भिन्‍न प्रकार के अहंकार होते हैं। पुरुष का अहंकार बुद्धि-केंद्रित होता है और स्त्री का भाव-केंद्रित। उनके अहंकार के अलग-अलग गुण-धर्म होते हैं।इसीलिए एक पुरुष कभी भी स्त्री को नहीं समझ पाता और एक स्त्री एक पुरुष को कभी भी नहीं समझ पाती।क्योंकि उनके अलग-अलग केंद्र और अलग-अलग उनकी भाषाएं होती हैं।जब बुद्धि कहती हैं हां,

तो उसका मतलब होता है हां। जब भाव 'हां' कहता है, तो जरूरी नहीं होता कि उसका अर्थ 'हां' ही हो।जब भाव कहता है 'ना', तो उसका मतलब 'हां' हो सकता है ।

8-वह एक निमंत्रण हो सकता है कि आगे अभी और भी फुसलाया जाए। और यदि आप एक स्त्री को उसके शब्द पर ही लेंगे तो आप मुश्‍किल में पड़ेंगे, क्योंकि उसका शब्द बुद्धि से नहीं आया है। उसका चलने का अपना अलग मार्ग है, एक अलग गुण है। बुद्धि का अहंकार सीधा गणित की तरह होता है। आप उसे सीधे, साफ, सरलता से समझ सकते हैं। इसलिए एक आदमी को समझना बड़ा कठिन नहीं है, क्योंकि उसका तर्क सीधा है--दो और दो चार होते हैं। एक स्त्री को समझना कठिन बात है, क्योंकि उसका तर्क सीधा नहीं होता, वह वर्तुल में चलता है, इसलिए दो और दो कभी भी चार नहीं होते। उनसे कुछ भी बन सकता है, परन्तु चार कभी भी नहीं।उनका तर्क तो भाव वर्तुल में चलता है। तर्क व बुद्धि एक सीधी रेखा में चलते हैं।

9-जब कुछ वर्तुल में चलता है, तो आप कभी भी निश्‍चित नहीं हो सकते, क्योंकि उसका तात्पर्य बिलकुल उल्टा भी हो सकता है। वह चक्र में घूमेगा और वह अपनी ही धारणा के विपरीत हो जाएगा।उदाहरण के लिए सुकरात, जो एक बहुत बुद्धिशील,जीनियस आदमी था, तर्क का हर एक पहलू जानता है, परन्तु अपनी पत्नी के साथ आराम से नहीं हो पाता था। वह समझ ही नहीं पाता था कि वह क्या कह रही है। वह समझ पाता था जो वह कहती थी, परन्तु वह नहीं समझ पाता था, जो कि उसका मतलब था। वह इतना तर्कपूर्ण था कि वह हमेशा मुद्दे को चूक जाता था। वह सीधा रेखा में चलता था और उसकी पत्नी वर्तुल में चलती थी।

10-बुद्धि का अपना अहंकार होता है-सीधा, रेखाबद्ध। भावना का अपना अहंकार होता है-वर्तुलाकार। परन्तु समग्रता का कोई अहंकार नहीं होता। समग्रता ही इंण्डिविजुअलिटी है, निजता है, होना है। इसलिए जब आप समग्रता को उपलब्ध होते है, तो आप न तो पुरुष होते हैं और न स्त्री। आप