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DHYAN SET 13-THE ROLE OF BREATH



क्या है श्वास और मन के वैज्ञानिक नियम?-

15 FACTS;-

1- श्वास जीवन है।लेकिन लोग इसकी उपेक्षा कर देते हैं, वे इस पर बिलकुल ध्यान

नहीं देते।लोग पूर्णता से श्वास नहीं ले सकते और तुम्हारे जीवन में जो भी बदलाहट आयेगी वह श्वास में बदलाहट द्वारा ही आयेगी।श्वास का विशेष ध्यान रखना होगा क्योंकि यह एक बहुत महत्वपूर्ण बात है।यदि तुम पूर्णता से श्वास नहीं ले रहे तो तुम पूर्णता से जी भी न सकोगे।तब तुम पूरा वार्तालाप न करोगे;कुछ न कुछ बच रहेगा।एक बार श्वास ठीक हो जाये तो सब सही

रास्ते पर आ जाता है।यदि तुम वर्षों से गलत ढग से श्वास ले रहे हो, अथार्त उथला श्वास, तो तुम्हारी मांस-पेशियां जम जाती हैं। तब यह तुम्हारी इच्छा-शक्ति की बात नहीं रह जाती। यह ऐसा ही है कि कोई वर्षों से हिला-जुला न हो, उसकी मांस-पेशियां सिकुड़ गयी हों; मृत हो गयी हों और रक्त जम गया हो। अब अचानक वह व्यक्ति लंबी सैर का विचार करे-तो केवल सोचने से यह घटित न होगा।अब उसे बहुत संघर्ष करना होगा।

2-श्वास की नली की मांस-पेशियां एक विशेष ढंग से बनी होती हैं और यदि तुम गलत ढंग से श्वास लेते रहे हो- और लगभग सभी लोग गलत ढंग से लेते हैं- तो मांस-पेशियां जम जाती हैं। अब इन्हें अपने प्रयत्न करके बदलने में बहुत समय व्यर्थ जायेगा। गहरी मालिश से, यह मांस-पेशियां शिथिल हो जाती हैं और तुम फिर दोबारा प्रारंभ कर सकते हो। लेकिन एक बार तुमने सही श्वास लेना शुरू कर दिया तो पुन: पुरानी आदत में न लौटे । श्वास के अंतर से आपके मन का अंतर पड़ना शुरू होगा। यानी यह असंभव है कि एक आदमी श्वास को शांत रखे और क्रोध कर ले। ये दोनों बातें एक साथ नहीं घट सकतीं। इससे उलटा भी संभव है कि अगर आप उसी तरह की श्वास लेने लगें जैसी आप क्रोध में लेते हैं, तो आप थोड़ी देर में पाएं कि आपके भीतर क्रोध जग गया।

3-आर्टिफीशियल ब्रीदिंग और नेचरल ब्रीदिंग को भी समझना है। जिसको आप नेचरल कह रहे हैं, वह भी नेचरल नहीं है; । बल्कि वह ऐसी आर्टिफीशियल ब्रीदिंग है जिसके आप आदी हो गए हैं, जिसको आप बहुत दिन से ;बचपन से कर रहे हैं । आपको पता नहीं है कि नेचरल ब्रीदिंग क्या है। इसलिए दिन भर आप एक तरह सेआर्टिफीशियल श्वास लेते हैं , रात में आप दूसरी तरह से लेते हैं। क्योंकि रात में नेचरल शुरू होती है जो कि आपकी हैबिट के बाहर है।तो रात की ही श्वास की प्रक्रिया

ज्यादा स्वाभाविक है । दिन में तो हमने आदत डाली है ब्रीदिंग की, और आदत के लिए हमारे पास कई कारण हैं। जब आप भीड़ में चलते हैं ,और जब आप अकेले में बैठते हैं तब एहसास करें, तो आप पाएंगे आपकी ब्रीदिंग बदल गई। भीड़ में आप और तरह से श्वास लेते हैं, अकेले में और तरह से। क्योंकि भीड में आप टेंस होते हैं। चारों तरफ लोग हैं, तो आपकी ब्रीदिंग छोटी हो जाएगी; पूरी गहरी नहीं होगी। जब आप आराम से बैठे हैं, अकेले हैं, तो वह पूरी गहरी होगी।

4-पेट से श्वास लेना निर्दोषता का लक्षण हैं। इसलिए बच्चे एक तरह से ब्रीदिंग ले रहे हैं। अगर बच्चे को सुलाएं, तो आप पाएंगे

उसका पेट हिल रहा है, और आप ब्रीदिंग ले रहे हैं तो छाती हिल रही है।बच्चा नेचरल ब्रीदिंग ले रहा है। अगर बच्चा जिस ढंग से श्वास ले रहा है, आप लें, तो आपके मन में वही स्थितियां पैदा होनी शुरू हो जाएंगी जो बच्चे की हैं। उतनी इनोसेंस आनी शुरू हो जाएगी जितनी बच्चे की है। या अगर आप इनोसेंट हो जाएंगे तो आपकी ब्रीदिंग पेट से शुरू हो जाएगी।

5-इसलिए हिंदुस्तान में बुद्ध का पेट छोटा है; जापानी और चीनी मुल्कों में बुद्ध का पेट बड़ा है, छाती छोटी है। हमें बेहूदी लगती है कि यह बेडौल कर दिया। लेकिन वही ठीक है। क्योंकि बुद्ध जैसा शांत आदमी जब श्वास लेगा तो वह पेट से ही लेगा।

उतना इनोसेंट आदमी छाती से श्वास नहीं ले सकता,इसलिए पेट बड़ा हो जाएगा। वह पेट जो बड़ा है, वह प्रतीक है।सब झेन मास्टर्स का पेट बड़ा है। वह प्रतीक है। उतना बड़ा न भी रहा हो, लेकिन वह बड़ा ही डिपिक्ट किया जाएगा। उसका कारण है कि वह श्वास जो है, वह पेट से ले रहा है; वह छोटे बच्चे की तरह हो गया है।

6-तो जब हमें यह खयाल में साफ हो गया हो, तो नेचरल ब्रीदिंग की तरफ हमें कदम उठाने चाहिए। हमारी ब्रीदिंग आर्टिफीशियल है।हम आर्टिफीशियल ब्रीदिंग कर रहे हैं। तो जैसे ही हमें समझ बढ़ेगी, हम नेचरल ब्रीदिंग की तरफ कदम उठाएंगे। और जितनी नेचरल ब्रीदिंग हो जाएगी, उतने ही जीवन की अधिकतम संभावना हमारे भीतर से प्रकट होनी शुरू होगी।

और यह भी समझने जैसा है कि कभी-कभी एकदम आकस्मिक रूप से अप्राकृतिक ब्रीदिंग करने के भी बहुत फायदे हैं। और एक बात तो साफ ही है कि जहां बहुत फायदे हैं वहीं बहुत हानियां हैं।

7-एक आदमी दुकानदारी कर रहा है, तो जितनी हानियां हैं ;उतने फायदे हैं। एक आदमी जुआ खेल रहा है, तो जितने फायदे हैं उतनी हानियां हैं। क्योंकि फायदा और हानि का अनुपात तो वही होनेवाला है। तो बहुत खतरे हैं, वह आधी बात है।वहां बहुत संभावनाएं भी हैं।

वह जुआरी का दांव है।तो अगर हम कभी किसी क्षण में थोड़ी देर के लिए बिलकुल ही अस्वाभाविक -अस्वाभाविक इस अर्थों में कि जिसको हमने अभी तक नहीं की है ..इस तरह की ब्रीदिंग करें, तो हमें अपने ही भीतर नई स्थितियों का पता चलना शुरू होता है। उन स्थितियों में हम पागल/विक्षिप्त भी हो सकते हैं और उन स्थितियों में हम मुक्त भी हो सकते

हैं।

8-और चूंकि उस स्थिति को हम ही पैदा कर रहे हैं, इसलिए किसी भी क्षण उसे रोका जा सकता है। इसलिए खतरा नहीं है। जब आपने ही पैदा किया है तो आप तत्काल रोक सकते हैं।खतरे का डर तब है, जबकि आप रोक न सकें। और आपको प्रतिपल अनुभव होता है कि आप किस तरफ जा रहे हैं। आप आनंद की तरफ जा रहे हैं, कि दुख की तरफ जा रहे हैं, कि खतरे में जा रहे हैं, कि शांति में जा रहे हैं, वह आपको बहुत साफ एक -एक कदम पर मालूम होने लगता है।

9-अजनबी स्थिति के कारण मूर्च्छा पर चोट..और जब बिलकुल ही आकस्मिक रूप से, तेजी से ब्रीदिंग बदली जाए, तो आपके भीतर की पूरी की पूरी स्थिति एकदम से बदलती है । जो हमारी सुनिश्चित आदत हो गई है श्वास लेने की, उसमें हमें कभी पता नहीं चल सकता कि मैं शरीर से अलग हूं। उसमें सेतु / ब्रिज बन गया है। शरीर और आत्मा के बीच श्वास की एक

निश्चित आदत ने एक ब्रिज बना दिया है। उसके हम आदी हो गए हैं।यानी वह मामला ऐसा ही है कि जैसे आप रोज अपने घर जाते हैं और कार का आप व्हील घुमा लेते हैं और आपको कभी न सोचना पड़ता है, न विचार करना पड़ता है, आप अपने घर पर जाकर खड़े हो जाते हैं।

10-लेकिन अचानक ऐसा हो कि व्हील आप दाएं मुडाएं और व्हील बाएं मुड़ जाए, कि जो रास्ता रोज आपका था, अचानक आप पाएं कि वह रास्ता आज पूरा का पूरा घूम गया है और दूसरा रास्ता उसकी जगह आ गया है, तब एक स्ट्रेजनेस की हालत में आप पहुंचेंगे, और पहली दफा आप होश से भर जाएंगे। वह जो आप होश से भर जाएंगे… किसी भी चीज का अजनबीपन/स्ट्रेजनेस, वह आपकी मूर्च्छा को तत्काल तोड़ देता है।व्यवस्थित दुनिया, जहां सब रोज वही हुआ है, वहां आपकी मूर्च्छा कभी नहीं टूटती; आपकी मूर्च्छा वहां टूटती है , जहां अचानक कुछ हो जाता है।

11-जैसे कि कोई टेबल एक शब्द भी बोल दे तो आप सब इतनी अवेयरनेस में पहुंच जाएंगे जिसमें आप कभी नहीं गए; क्योंकि वह स्ट्रेज है, और स्ट्रेंज आपके भीतर की सब स्थिति तोड़

देता है।तो श्वास के अनूठे अनुभव जब स्ट्रेजनेस में ले जाते हैं, तो आपके भीतर बड़ी नई संभावनाएं होती हैं और आप होश उपलब्ध कर पाते हैं और कुछ देख पाते हैं। और अगर कोई आदमी होशपूर्वक पागल हो सके, तो इससे बड़ा कीमती अनुभव नहीं है।तो यह एक

प्रयोग सा है कि भीतर आपका पूरा होश है और बाहर आप बिलकुल पागल हो गए हैं।भीतर तो आपको पूरा होश है और आप देख रहे हैं कि मैं नाच रहा हूं। और आप जानते हैं कि अगर यह कोई भी दूसरा आदमी कर रहा होता तो मैं कहता कि यह पागल है।

12-अब आप अपने को पागल कह सकते हैं। लेकिन दोनों बातें एक साथ हो रही हैं ...आप यह जान भी रहे हैं कि यह हो रहा है। इसलिए आप पागल भी नहीं हैं; क्योंकि आप होश में पूरे

हैं और फिर भी वही हो रहा है जो पागल को होता है।इस हालत में आपके भीतर एक ऐसा स्ट्रेज मोमेंट आता है कि आप अपने को अपने शरीर से अलग कर पाते हैं। कर नहीं पाते, हो ही जाता है। अचानक आप पाते हैं कि सब तालमेल टूट गया। जहां कल रास्ता जुड़ता था वहां नहीं जुड़ता और जहां कल आपका ब्रिज जोड़ता था वहां नहीं जुड़ता; जहां व्हील घूमता था वहां नहीं घूमता। सब विसंगत हो गया है।

13-वह जो रोज -रोज की रेलेवेंसी थी , वह टूट गई है; कहीं कुछ और हो रहा है। आप हाथ को नहीं घुमाना चाह रहे हैं, और वह घूम रहा है; आप नहीं रोना चाह रहे हैं, और आंसू बहे जा रहे हैं; आप चाहते हैं कि यह हंसी रुक जाए, लेकिन यह नहीं रुक रही है।तो ऐसे स्ट्रेंज

मोमेंट्स पैदा करना अवेयरनेस के लिए बड़े अदभुत हैं। और श्वास से जितने जल्दी ये हो जाते हैं, और किसी प्रयोग से नहीं होते।प्रयोग में वर्षों लगाने पड़ते हैं, श्वास में दस मिनट में भी हो सकता है। क्योंकि श्वास का हमारे व्यक्तित्व में इतना गहरा संबंध है कि उस पर जरा सी लगी चोट... सब तरफ प्रतिध्वनित हो जाती है।

14-तो श्वास के जो प्रयोग थे, वे बड़े कीमती थे। लेकिन प्राणायाम के व्यवस्थित प्रयोग में उनकी स्ट्रेजनेस चली जाती है। जैसे एक आदमी एक -दो श्वास इस नाक से लेता है, फिर दो इससे लेता है। फिर इतनी देर रोकता है, फिर इतनी देर निकालता है। इसका अभ्यास कर लेता है। तो यह भी उसका अभ्यास का हिस्सा हो जाने के कारण सेतु बन जाता है। एमेथॉडिकल हो जाता है।लेकिन यहाँ जिस श्वास को कहा जा रहा है ;वह बिलकुल नॉन

-मेथॉडिकल है, एब्सर्ड है। उसमें न कोई रोकने का सवाल है, न छोड़ने का सवाल है। वह एकदम से स्ट्रेंज फीलिंग पैदा करने की बात है कि आप एकदम से ऐसी झंझट में पड़ जाएं कि इस झंझट को आप व्यवस्था न दे पाएं।

15-अगर व्यवस्था दे दी, तो आपका मन बहुत होशियार है, वह उसमें भी राजी हो जाएगा कि ठीक है। वह इस नाक को दबा रहा है, इसको खोल रहा है; इतनी निकाल रहा है, उतनी बंद कर रहा है; तो उसका कोई मतलब नहीं है, वह एक नया सिस्टम

हो जाएगा, लेकिनस्ट्रेजनेस/ अजनबीपन उसमें नहीं आएगा।आपकी जो भी रूट्स हैं, जितनी भी जड़ें हैं और जितना भी आपका अपना परिचय है, वह सब का सब किसी क्षण में एकदम उखड़ जाए। एक दिन आप अचानक पाएं कि न कोई जड़ है मेरी, न मेरी कोई पहचान है, न मेरी कोई मां है, न मेरा कोई पिता है, न कोई भाई है, न यह शरीर मेरा है। आप एकदम ऐसी एब्सर्ड हालत में पहुंच जाएं जहां कि आदमी पागल होता है। लेकिन अगर आप इस हालत में अचानक पहुंच जाएं आपकी बिना किसी कोशिश के, तो आप पागल हो जाएंगे। और अगर आप अपनी ही कोशिश से इसमें पहुंचें तो आप कभी पागल नहीं हो सकते, क्योंकि यह आपके हाथ में है, अभी आप इसी सेकेंड वापस लौट सकते हैं।

अजनबी स्थिति के कारण मूर्च्छा पर चोट:

और जब बिलकुल ही आकस्मिक रूप से, तेजी से ब्रीदिंग बदली जाए, तो आपके भीतर की पूरी की पूरी स्थिति बदलती है एकदम से। जो हमारी सुनिश्चित आदत हो गई है श्वास लेने की, उसमें हमें कभी पता नहीं चल सकता कि मैं शरीर से अलग हूं। उसमें सेतु बन गया है, ब्रिज बन गया है। शरीर और आत्मा के बीच श्वास की एक निश्चित आदत ने एक ब्रिज बना दिया है। उसके हम आदी हो गए हैं।

यानी वह मामला ऐसा ही है कि जैसे आप रोज अपने घर जाते हैं और कार का आप व्हील घुमा लेते हैं और आपको कभी न सोचना पड़ता है, न विचार करना पड़ता है, आप अपने घर पर जाकर खड़े हो जाते हैं। लेकिन अचानक ऐसा हो कि व्हील आप दाएं मुडाएं और व्हील बाएं मुड़ जाए, कि जो रास्ता रोज आपका था, अचानक आप पाएं कि वह रास्ता आज पूरा का पूरा घूम गया है और दूसरा रास्ता उसकी जगह आ गया है, तब एक स्ट्रेजनेस की हालत में आप पहुंचेंगे, और पहली दफा आप होश से भर जाएंगे। वह जो होश से भर जाएंगे आप…… स्ट्रेजनेस जो है न, किसी भी चीज का अजनबीपन, वह आपकी मूर्च्छा को तोड़ देता है तत्काल। व्यवस्थित दुनिया, जहां सब रोज वही हुआ है, वहां आपकी मूर्च्छा कभी नहीं टूटती; आपकी मूर्च्छा टूटती है वहां, जहां अचानक कुछ हो जाता है।

जैसे कि मैं बोल रहा हूं इसमें आपकी मूर्च्छा न टूटेगी। अचानक आप पाएं कि यह टेबल बोलने लगी, तो यहां एक आदमी भी बेहोश नहीं रह जाएगा। उपाय नहीं है बेहोश रहने का। यह टेबल अचानक बोल उठे, एक शब्द बोले—मैं हजार शब्द बोल रहा हूं तो भी आप मूर्च्छित सुनेंगे—लेकिन यह टेबल एक शब्द बोल दे तो आप सब इतनी अवेयरनेस में पहुंच जाएंगे जिसमें आप कभी नहीं गए; क्योंकि वह स्ट्रेज है, और स्ट्रेंज आपके भीतर की सब स्थिति तोड़ देता है।

तो श्वास के अनूठे अनुभव जब स्ट्रेजनेस में ले जाते हैं, तो आपके भीतर बड़ी नई संभावनाएं होती हैं और आप होश उपलब्ध कर पाते हैं और कुछ देख पाते हैं। और अगर कोई आदमी होशपूर्वक पागल हो सके, तो इससे बड़ा कीमती अनुभव नहीं है—होशपूर्वक अगर पागल हो सके।

यह प्रयोग जो है ऐसा है कि भीतर आपका पूरा होश है और बाहर आप बिलकुल पागल हो गए हैं। जो कि आप कोई भी आदमी अगर कर रहा होता तो आप कहते, पागल है। भीतर तो आपको पूरा होश है और आप देख रहे हैं कि मैं नाच रहा हूं। और आप जानते हैं कि अगर यह कोई भी दूसरा आदमी कर रहा होता तो मैं कहता कि यह पागल है। अब आप अपने को पागल कह सकते हैं। लेकिन दोनों बातें एक साथ हो रही हैं— आप यह जान भी रहे हैं कि यह हो रहा है। इसलिए आप पागल भी नहीं हैं; क्योंकि आप होश में पूरे हैं और फिर भी वही हो रहा है जो पागल को होता है।

इस हालत में आपके भीतर एक ऐसा स्ट्रेज मोमेंट आता है कि आप अपने को अपने शरीर से अलग कर पाते हैं। कर नहीं पाते, हो ही जाता है। अचानक आप पाते हैं कि सब तालमेल टूट गया। जहां कल रास्ता जुड़ता था वहां नहीं जुड़ता और जहां कल आपका ब्रिज जोड़ता था वहां नहीं जुड़ता; जहां व्हील घूमता था वहां नहीं घूमता। सब विसंगत हो गया है। वह जो रेलेवेंसी थी रोज—रोज की, वह टूट गई है; कहीं कुछ और हो रहा है। आप हाथ को नहीं घुमाना चाह रहे हैं, और वह घूम रहा है; आप नहीं रोना चाह रहे हैं, और आंसू बहे जा रहे हैं; आप चाहते हैं कि यह हंसी रुक जाए, लेकिन यह नहीं रुक रही है।

तो ऐसे स्ट्रेंज मोमेंट्स पैदा करना अवेयरनेस के लिए बड़े अदभुत हैं। और श्वास से जितने जल्दी ये हो जाते हैं, और किसी प्रयोग से नहीं होते। और प्रयोग में वर्षों लगाने पड़े, श्वास में दस मिनट में भी हो सकता है। क्योंकि श्वास का इतना गहरा संबंध है हमारे व्यक्तित्व में कि उस पर जरा सी लगी चोट सब तरफ प्रतिध्वनित हो जाती है।

अव्यवस्थित श्वास का प्रयोग कीमती:

तो श्वास के जो प्रयोग थे, वे बड़े कीमती थे। लेकिन प्राणायाम के जो व्यवस्थित प्रयोग हैं उन पर मेरा बहुत आग्रह नहीं है। क्योंकि जैसे ही वे व्यवस्थित हो जाते हैं, वैसे ही उनकी स्ट्रेजनेस चली जाती है। जैसे एक आदमी एक—दो श्वास इस नाक से लेता है, फिर दो इससे लेता है। फिर इतनी देर रोकता है, फिर इतनी देर निकालता है। इसका अभ्यास कर लेता है। तो यह भी उसका अभ्यास का हिस्सा हो जाने के कारण सेतु बन जाता है। एमेथॉडिकल हो जाता है।

तो मैं जिस श्वास को कह रहा हूं वह बिलकुल नॉन—मेथॉडिकल है, एब्सर्ड है। उसमें न कोई रोकने का सवाल है, न छोड़ने का सवाल है। वह एकदम से स्ट्रेंज फीलिंग पैदा करने की बात है कि आप एकदम से ऐसी झंझट में पड़ जाएं कि इस झंझट को आप व्यवस्था न दे पाएं। अगर व्यवस्था दे दी, तो आपका मन बहुत होशियार है, वह उसमें भी राजी हो जाएगा कि ठीक है। वह इस नाक को दबा रहा है, इसको खोल रहा है; इतनी निकाल रहा है, उतनी बंद कर रहा है; तो उसका कोई मतलब नहीं है, वह एक नया सिस्टम हो जाएगा, लेकिन स्ट्रेजनेस, अजनबीपन उसमें नहीं आएगा।

और आपको मैं चाहता हूं कि किसी क्षण में आपकी जो भी रूट्स हैं, जितनी भी जड़ें हैं और जितना भी आपका अपना परिचय है, वह सब का सब किसी क्षण में एकदम उखड़ जाए। एक दिन आप अचानक पाएं कि न कोई जड़ है मेरी, न मेरी कोई पहचान है, न मेरी कोई मां है, न मेरा कोई पिता है, न कोई भाई है, न यह शरीर मेरा है। आप एकदम ऐसी एब्सर्ड हालत में पहुंच जाएं जहां कि आदमी पागल होता है। लेकिन अगर आप इस हालत में अचानक पहुंच जाएं आपकी बिना किसी कोशिश के, तो आप पागल हो जाएंगे। और अगर आप अपनी ही कोशिश से इसमें पहुंचें तो आप कभी पागल नहीं हो सकते, क्योंकि यह आपके हाथ में है, अभी आप इसी सेकेंड वापस लौट सकते हैं।

ध्यान प्रयोग द्वारा पागलपन से मुक्ति:

तो मेरा तो मानना है कि अगर हम पागल को भी इतनी श्वास— और मैं यहां चाहूंगा कि यह प्रयोग करने जैसा है— अगर हम पागल को भी यह श्वास का प्रयोग करवाएं तो उसके स्वस्थ हो जाने की पूरी संभावना है। क्योंकि अगर वह पागलपन को भी देख सके कि मैं पैदा कर लेता हूं तो वह यह भी जान पाएगा कि मैं मिटा भी सकता हूं। अभी पागलपन उसके ऊपर उतर आया है, वह उसके हाथ की बात नहीं है।

इसलिए यह जो प्रयोग है, इसके खतरे हैं, लेकिन खतरे के भीतर उतनी ही संभावनाएं हैं। और पागल भी अगर इसको करे तो ठीक हो सकता है। और इधर मेरा खयाल है पीछे कि इसको पागल के लिए भी इस प्रयोग को करवाने जैसा है। और जो आदमी इस प्रयोग को करता है उसकी गारंटी है कि वह कभी पागल नहीं हो सकता। वह इसलिए पागल नहीं हो सकता कि पागलपन को पैदा करने की उसके पास खुद ही कला है। जिस चीज को वह ऑन करता है उसको ऑफ भी कर लेता है। इसलिए आप उसको कभी पागल नहीं बना सकते। यानी किसी दिन ऐसा नहीं हो सकता कि वह अपने वश के बाहर हो जाए। क्योंकि उसने, जो वश के बाहर था, उसको भी वश में करके देख लिया है।

जिस श्वास की बात मैं कह रहा हूं वह श्वास बिलकुल ही नॉन—रिदमिक नॉन—मेथॉडिकल है। और कल जैसा किया था, वैसा भी आज नहीं कर सकते आप, क्योंकि उसका कोई मेथड ही नहीं है। कल जैसा किया था, वैसा भी आज नहीं कर सकते; अभी शुरू जैसा किया था, अंत करते तक भी वैसा नहीं कर सकते। वह जैसी होगी! और खयाल सिर्फ इतना है कि आपकी सब जो कंडीशनिंग है माइंड की वह ढीली पड़ जाए।

वह जो दरवेश कह रहा है, वह ठीक कह रहा है कि कई नट और कई बोल्ट ढीले पड जाएंगे। वे करने हैं ढीले। वे नट— बोल्ट बहुत सख्ती से पकड़े हुए हैं और आत्मा और शरीर के बीच फासला नहीं हो पाता उनकी वजह से। वे एकदम से ढीले पड़ जाएं तो ही आपको पता चले कि कुछ और भी है भीतर, जो जुड़ा था और अलग हो गया है। लेकिन चूंकि वे श्वास की चोट से ही ढीले हुए हैं, वे श्वास की चोट जाते ही से अपने आप कस जाते हैं; उनको अलग से कसने के लिए कोई इंतजाम नहीं करना पड़ता। उनको इंतजाम करने की कोई जरूरत नहीं है।

हां, अगर श्वास पागलपन की हो जाए आपके भीतर, कि आपके वश के बाहर हो, आब्सेशन बन जाए और चौबीस घंटे उस ढंग से चलने लगे, तो फिर वह स्थिति खराब हो जा सकती है। लेकिन कोई घंटे भर के लिए अगर यह प्रयोग कर रहा है, और प्रयोग शुरू करता है और प्रयोग बंद कर देता है, तो जैसे ही वह प्रयोग बंद करता है, वैसे ही वे सब के सब अपनी जगह वापस सेट हो जाते हैं। आपको अनुभव भर रह जाता है पीछे कि एक अनुभव हुआ था जब मैं अलग था और अब सब चीजें फिर अपनी जगह सेट हो गई हैं। लेकिन अब सेट हो जाने के बाद भी आप जानते हैं कि मैं अलग हूं—जुड़ गया हूं संयुक्त हूं लेकिन फिर भी अलग हूं।

श्वास के बिना तो काम ही नहीं हो सकता है। ही, यह बात वह ठीक कह रहा है कि खतरे हैं। तो खतरे तो हैं ही, और जितने बड़े जीवन की हमारी खोज है उतने बड़े खतरे के लेने की हमें तैयारी होनी चाहिए। फर्क मैं इतना ही करता हूं कि एक तो वह खतरा है जो हम पर अचानक आ जाता है, उससे हम बच नहीं सकते; और एक वह खतरा है जो हम पैदा करते हैं, उससे हम कभी भी बच सकते हैं। यानी अब इतना मूवमेंट होता है शरीर का—इतना—रो रहा है कोई, चिल्ला रहा है, नाच रहा है, और एक सेकेंड उसको कि नहीं, तो वह सब गया। चूकि यह क्रिएटेड है, यह उसने ही पैदा किया है सब, यह एक बात है। और यह अपने आप हो जाता है जब—कि एक आदमी सड़क पर खड़े होकर नाच रहा है—खुद नहीं उसने कुछ किया है, अब वह रोक भी नहीं सकता, क्योंकि कहां से यह आया, कैसे यह हुआ, उसे कुछ पता नहीं।

तो मेरी तो अपनी समझ यह है कि यह आज नहीं कल, जो मैं कह रहा हूं यह एक बहुत बड़ी थैरेपी सिद्ध होगी। और आज नहीं कल, पागल को स्वस्थ करने के लिए यह अनिवार्य रास्ता बन जाएगा। और अगर हम प्रत्येक बच्चे को स्कूल में इसे करा सकें तो हम उस बच्चे के पागल नहीं होने की व्यवस्था किए दे रहे हैं, वह कभी पागल नहीं हो सकता। वह इम्यून हो जाएगा—स्प। और वह मालिक हो जाएगा—इन सारी स्थितियों का मालिक हो जाएगा।

सूफी दरवेश के ढंग

अब जैसे कि सूफी दरवेश है, वह दूसरे ढंग से इस तरफ पहुंचा है; उसके ढंग और हैं। जैसे सूफी जो है, वह निद्रा पर चोट करेगा, श्वास पर नहीं। तो नाइट विजिल्स की बड़ी कीमत है दरवेश के लिए। महीनों जागता रहेगा! लेकिन जागने से भी वही स्ट्रेजनेस पैदा हो जाती है जो श्वास से पैदा होती है। अगर महीने भर जाग जाएं तो आप उसी तरह पागल हालत में पहुंच जाते हैं जिस हालत में श्वास से पहुंचेंगे।

तो एक तो नींद पर वह चोट करेगा, क्योंकि नींद बड़ी स्वाभाविक व्यवस्था है। उस पर चोट करने से फौरन आपके भीतर विचित्रताए शुरू हो जाती हैं। लेकिन उसमें भी खतरे इतने ही हैं, बल्कि इससे ज्यादा हैं, क्योंकि लंबा प्रयोग करना पड़े। एक दिन की नींद के तोड्ने से नहीं होता वह। महीने भर, दो महीने की नींद तोड देनी पड़े।

लेकिन दो महीने की नींद तोड़कर अगर कुछ हो जाए तो एक सेकेंड में आप बंद नहीं कर सकते उसको। लेकिन दस मिनट की श्वास से कुछ भी हो जाए तो एक सेकेंड में बंद हो जाता है। दो महीने की नींद अगर नहीं ली है, तो आप अगर आज सो भी जाओ तो भी दो महीने की नींद आज पूरी नहीं होनेवाली। और दो महीने जो नहीं सोया है, वह आज शायद सो भी न पाए; क्योंकि वह जरा खतरनाक जगह से उसने काम शुरू किया है।

तो नाइट विजिल का बड़ा उपयोग है, फकीर रात—रात भर जागकर प्रतीक्षा करेंगे कि क्या होता है। तो उन्होंने उससे शुरू किया है। दूसरा उन्होंने नृत्य से भी शुरू किया है।

नृत्य का उपयोग:

नृत्य को भी उपयोग किया जा सकता है शरीर से अलग होने के लिए। लेकिन वे भी उनके प्रयोग ऐसे ही हैं कि अगर नृत्य सीखकर किया आपने तो नहीं हो सकेगा। जैसा कि मैंने कहा कि प्राणायाम से नहीं होगा, क्योंकि वह व्यवस्थित है। अब एक आदमी ने अगर नृत्य सीख लिया, तो वह शरीर के साथ एक हो जाता है। नहीं, आप—जो कि नाच जानते नहीं— आप से मैं कहूं—नाचिए! और आप एकदम नाचना शुरू कर दें, कूदना—फांदना, तो हो जाएगा। हो जाएगा इसलिए कि यह इतना स्ट्रेज मामला है कि आप इसके साथ अपने को एक न कर पाएंगे कि यह मैं नाच रहा हूं! यह आप एक न कर पाएंगे। तो नाच से उन्होंने प्रयोग शुरू किए हैं, रात की नींद से शुरू किए हैं।

ऊन के वस्त्र, उपवास, कांटे की शय्या:

और तरह की उपद्रव की चीजें, जैसे कि ऊन के वस्त्र हैं। अब ठेठ रेगिस्तान की गरम हालत में ऊन पहने हुए हैं! तो शरीर के विपरीत चल रहे हैं। कोई उपवास कर रहा है, वह भी शरीर के विपरीत चल रहा है। कोई कांटे पर पैर रखे बैठा है, कोई कांटे की शय्या बिछाकर उस पर लेट गया है, वे सब स्ट्रेजनेस पैदा करने की तरकीबें हैं।

लेकिन एक पथ के राही को कभी खयाल में नहीं आता, और स्वभावत: नहीं भी आता है, कि दूसरे पथ से भी ठीक यही स्थिति पैदा हो सकती है।

तो वह दरवेश को तो कुछ पता नहीं प्राणायाम के बाबत। हां, अगर वह कुछ करेगा तो नुकसान उठा सकता है। वह कुछ करेगा तो नुकसान उठा सकता है और खतरे ज्यादा हो सकते हैं। खतरे ऐसे हो सकते हैं, जैसे कि एक बैलगाड़ी की कील को आपने कार के चाक में लगा दिया हो। तो वह कहेगा कि भई, यह कील बड़ी खतरनाक है, कभी मत लगाना, क्योंकि इससे तो हमारी गाड़ी खराब हो गई।

अब जो आदमी रात भर जग रहा है, अगर वह प्राणायाम का प्रयोग करे तो पागल हो जाएगा—फौरन पागल हो जाएगा। उसके कारण हैं; क्योंकि ये दोनों चोटें एक साथ व्यक्तित्व नहीं सह सकता।

लंबे उपवास में आसन और प्राणायाम हानिप्रद:

इसलिए जैनों ने प्राणायाम का प्रयोग नहीं किया, क्योंकि उपवास से वे स्ट्रेजनेस पैदा कर रहे हैं। अगर उपवास के साथ प्राणायाम करें तो बहुत खतरे में पड़ जाएंगे। एकदम खतरे में पड़ जाएंगे। इसलिए जैन के लिए कोई प्राणायाम का उपयोग नहीं रहा; बल्कि वह जैन साधु कहेगा कि कोई जरूरत नहीं है। मगर उसे पता नहीं है कि वह प्राणायाम को इनकार नहीं कर रहा है, वह सिर्फ इतना ही कह रहा है कि उसकी व्यवस्था में उसके लिए कोई जगह नहीं है, वह दूसरी चीज से वही काम पैदा कर ले रहा है।

इसलिए जैनों ने कोई योगासन वगैरह के लिए फिकर नहीं की। क्योंकि उपवास की हालत में, लंबे उपवास की हालत में, योगासन वगैरह बहुत खतरनाक सिद्ध हो सकते हैं। तो उनके लिए बहुत मृदु आहार चाहिए, घी चाहिए, दूध चाहिए, अत्यंत तृप्तिदायी आहार चाहिए। उपवास कर देता है रूखा भीतर बिलकुल, और जठराग्नि इतनी बढ़ जाती है, क्योंकि उपवास से बिलकुल पेट आग हो जाता है। इस आग की हालत में कोई भी आसन खतरनाक हो सकते हैं। यह आग मस्तिष्क तक चढ़ सकती है और पागल कर सकती है। तो जैन संन्यासी कह देगा कि नहीं—नहीं, आसन वगैरह में कुछ सार नहीं है, सब बेकार है।

लेकिन जिस रास्ते पर उनका उपयोग है, उस रास्ते पर उनकी कीमत बड़ी अदभुत है। अगर ठीक आहार लिया जाए, तो आसन अदभुत काम कर सकते हैं। लेकिन उसके लिए शरीर का बड़ा स्निग्ध होना जरूरी है। बिलकुल ऐसा ही मामला है जैसे कि लुब्रीकेटिंग हालत होनी चाहिए बॉडी की, क्योंकि एक—एक हड्डी और एक—एक नस और एक—एक स्नायु को फिसलना है, बदलना है। उसमें जरा भी रूखापन हुआ तो टूट जाएगी। अत्यंत लोचपूर्ण चाहिए। और उस लोचपूर्ण हालत में अगर शरीर को ये सारी की सारी जो……..

आसन : अनोखी देह—स्थितियां:

अब ये जो आसन हैं, ये भी स्ट्रेंज पोजीशस हैं, जिनमें आप कभी नहीं होते। और हमें खयाल नहीं है कि हमारी सब पोजीशन हमारे चित्त से बंधी हुई है। अब एक आदमी चिंतित होता है और सिर खुजाने लगता है। कोई पूछे कि तुम सिर किसलिए खुजा रहे हो? चिंता से सिर खुजाने का क्या संबंध है? लेकिन अगर आप उसका हाथ पकड़ लें तो आप पाएगे—वह चिंतित नहीं हो सकता। उसके चिंतित होने के लिए अनिवार्य है कि वह अपने सिर पर हाथ ले जाए। अगर उसका हाथ पकड़ लिया जाए तो वह चिंता नहीं कर सकता। क्योंकि उस चिंता के लिए उतना एसोसिएशन जरूरी है कि वह हाथ की मसल्‍स इस जगह पहुंचें, अंगुलियां इस स्थान को छुए, इस स्नायु को छुए, इस पोजीशन में जब वह हो जाएगा तो बस तत्काल उसकी चिंता सक्रिय हो जाएगी। अब इसी तरह की सारी की सारी मुद्राएं हैं, आसन हैं।

तो वे बहुत अनुभव से…… .जैसा मैं अभी सुबह ही कह रहा था कि अब यह ध्यान का जो प्रयोग हुआ इसमें अपने—आप आसन बनेंगे, अपने—आप मुद्राएं आएंगी। निरंतर हजारों प्रयोग के बाद यह पता चल गया कि चित्त की कौन सी दशा में कौन सी मुद्रा बन जाती है। तब फिर उलटा काम भी शुरू हो सका—वह मुद्रा बनाओ तो चित्त की वैसी दशा के बनने की संभावना बढ़ जाती है। जैसे कि बुद्ध बैठे हुए हैं, अगर आप ठीक उसी हालत में बैठें, तो आपको बुद्ध की चित्त—दशा में जाने में आसानी होगी। क्योंकि चित्त—दशा भी शरीर की दशाओं से बंधी हुई है। बुद्ध जैसे चलते हैं, अगर आप वैसे ही चलो, बुद्ध जैसी श्वास लेते हैं, अगर वैसी श्वास लो, बुद्ध जैसे लेटते हैं, वैसे लेटो; तो बुद्ध की जो चित्त की दशा है उसको पाना आपके लिए सुगमतर होगा। और या आप बुद्ध की चित्त—दशा को पा लो तो आप पाओगे कि आपके चलने, उठने, बैठने में बुद्ध से तालमेल होने लगा। ये दोनों चीजें पैरलल हैं।

अब जैसे कि गुरजिएफ जैसे लोगों को, जो कि एक अर्थ में अपरूटेड हैं, इनके पीछे कोई हजारों वर्ष का काम नहीं है, तो इनको पता नहीं है। इनको पता नहीं है, हजारों वर्ष का काम नहीं है। और फिर इस आदमी ने दस—पच्चीस अलग—अलग तरह के लोगों से मिलकर कुछ इकट्ठा किया है। उसमें कई यंत्रों के सामान यह ले आया है। वे सब अपनी—अपनी जगह ठीक थे, लेकिन सब इकट्ठे होकर बड़े अजीब हो गए हैं। उनमें से कभी कोई किसी पर काम कर जाता है, लेकिन पूरा किसी पर काम नहीं कर पाता। इसलिए गुरजिएफ के पास जितने लोगों ने काम किया, पूर्णता पर उनमें से कोई भी नहीं पहुंच सका। वह पहुंच नहीं सकता। क्योंकि जब वह आता है तो कोई चीज एक काम कर जाती है उस पर, तो वह उत्सुक तो हो जाता है और प्रवेश कर जाता है, लेकिन दूसरी चीजें उलटा काम करने लगती हैं। क्योंकि सिस्टम जो है, पूरी की पूरी सिस्टम नहीं है एक। कहना चाहिए कि मल्टी—सिस्टम्स का बहुत कुछ उसमें ले लिया है उसने।

अच्छा और कुछ सिस्टम्स का उसे बिलकुल पता नहीं है। उसके पास उनकी जानकारी नहीं है। उसकी ज्यादा जानकारी सूफी दरवेशों से है। उसे तिबेतन योग का कोई विशेष पता नहीं है; उसे हठयोग का भी कोई बहुत विशेष पता नहीं है। जो उसने सुना है, वह भी विरोधियों के मुंह से सुना है; वह भी दरवेशों से सुना है। वह हठयोगी नहीं है। तो उसकी जो जानकारी हठयोग के बाबत या कुंडलिनी के बाबत जो भी जानकारी है, वह दुश्मन के मुंह से सुनी गई जानकारी है, विपरीत पथगामियों के द्वारा सुनी गई जानकारी है। उस जानकारी के आधार पर वह जो कह रहा है वह बहुत अर्थों में तो कभी असंगत ही हो जाता है।

जैसे कुंडलिनी के बाबत तो उसने निपट नासमझी की बात कही; उसका उसे कुछ पता ही नहीं है। वह उसको कुंडा—बफर ही कहे चला जा रहा है। और बफर अच्छा शब्द नहीं है। वह यह कह रहा है कि कुंडलिनी एक ऐसी चीज है, जिसके कारण आप ज्ञान को उपलब्ध नहीं हो पाते, वह बफर की तरह काम कर रही है। और उसको पार करना जरूरी है। उसे मिटाकर पार कर जाना जरूरी है। इसलिए उसको जगाने की तो चिंता में ही मत पड़ना।

अब उसे पता ही नहीं है कि वह क्या कह रहा है। बफर्स हैं व्यक्तित्व में, ऐसी चीजें हैं जिनकी वजह से हम कई तरह के शॉक्स झेल जाते हैं। कुंडलिनी वह नहीं है; कुंडलिनी तो शॉक है। मगर उसे पता नहीं है। कुंडलिनी तो खुद बड़े से बड़ा शॉक है। जब कुंडलिनी जगती है तो आपको बड़े से बड़ा शॉक लगता है आपके व्यक्तित्व में। बफर और हैं दूसरे आपके भीतर, जिनसे वह शॉक एज्जार्बर्स की तरह वे काम करते हैं, वे पी जाते हैं उसे। उन बफर्स को तोड्ने की जरूरत है। लेकिन वह उसको ही बफर समझ रहा है। और उसका कारण है कि उसे कुछ पता नहीं है। अनुभव तो है ही नहीं उसे उसका, जिनको अनुभव है उनके पास बैठकर उसने कोई बात भी नहीं सुनी।

झेन फकीरों के अनोखे उपाय:

अब जैसे झेन फकीर है, वह एक आदमी को खिड़की से उठाकर फेंक देगा। सिर्फ स्ट्रेजनेस पैदा होती है, और कुछ नहीं। लेकिन वह कह देगा, प्राणायाम की कोई जरूरत नहीं है; यह भस्त्रिका से क्या होगा? उसका कारण है। लेकिन भस्त्रिका से नहीं होगा तो एक आदमी को खिड़की से फेंकने से क्या होगा? बुद्ध से, महावीर से जाकर कहो, किसी को खिड़की से फेंकने से ज्ञान हो गया। तो वे कहेंगे, पागल! आदमी रो