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DHYAN SET-10-क्या है वे त्रिविध ताप?-

क्या है वे त्रिविध ताप?-

03 FACTS;-

1-आधिदैहिक ताप(Caused by Supernatural/ Spirituality);-

शरीर से, मन से होने वाली बीमारियाँ आधिदैहिक ताप के अन्तर्गत आती हैं। इस शरीर को स्वतः अपने ही कारणों से जो कष्ट होता है उसे दैहिक ताप (physical/ self generated sufferings) कहा जाता है। इसे आध्यात्मिक ताप भी कहते हैं क्योंकि इसमें आत्म या अपने को अविद्या, राग, द्वेष, मू्र्खता, बीमारी आदि से मन और शरीर को कष्ट होता है। मनुष्य इस पर भी पूर्ण नियंत्रण नहीं कर पाया है।आध्यात्मिक ताप अज्ञान जनित कष्ट होते हैं। मनुष्य जब तक ज्ञानार्जन नहीं करता तब तक वह संसार में तिरस्कृत होता रहता है।

2-आधिभौतिक ताप(Caused by created beings);-

02 POINTS;-

1-आस-पास के वातावरण से प्राप्त अशान्ति को, दुःख आधिभौतिक ताप ( worldly sufferings) कहते हैं।जो कष्ट भौतिक जगत के बाह्य कारणों से या आस-पास के वातावरण से प्राप्त अशान्ति से होता है उसे आधिभौतिक या भौतिक ताप कहा जाता है।शत्रु आदि स्वयं से परे वस्तुओं या जीवों के कारण ऐसा कष्ट उपस्थित होता है।इस संसार में रहने वाले हर जीव का स्वभाव भिन्न होता है।वह कब और किस समय अपनी कोई भी क्या प्रतिक्रिया दे दे, इस विषय में कहा नहीं न सकता।

2-प्राणी विशेष के द्वारा दिया जाने वाला कष्ट आधिभौतिक है।आधिभौतिक ताप सांसारिक वस्तुओं अथवा जीवों से प्राप्त होने वाला कष्ट होता है।आधिभौतिक दु:खों पर भी पूर्ण नियंत्रण मनुष्य के द्वारा नहीं हो पाता है।

3-आधिदैविक ताप(Caused by destiny);-

04 POINTS;-

1-अज्ञात स्रोत के कारण होने वाली दुःखद घटनाओं से प्राप्त ताप को आधिदैविक ताप (act of god) कहते हैं।जो कष्ट दैवीय कारणों से उत्पन्न होता है उसे आधिदैविक या दैविक ताप कहा जाता है। अत्यधिक गर्मी, सूखा, भूकम्प, अतिवृष्टि आदि अनेक कारणों से होने वाले कष्ट को इस श्रेणी में रखा जाता है। आधिदैविक, आधिभौतिक व आध्यात्मिक। दैवीय शक्तियों के रुष्ट होने से जो दु:ख होता है उससे अतिवृष्टि, अनावृष्टि, राष्ट्र विप्लव, भूकंप, सुनामी आदि,होता है। इस पर मनुष्य का कोई नियंत्रण नहीं है। 2-आधिदैविक वह ’सत्यता’ है जिसे प्रकृति की सूक्ष्म किन्तु अत्यन्त शक्तिशाली ’सत्ताएँ’ संचालित करती हैं।जैसे अग्नि, वायु, पृथ्वी, जल तथा अकाश एक ओर भौतिक रूप में ग्रहण किए जाते हैं, वैसे ही उनकी ’आधिदैविक’ सत्ता भी है जो मनुष्य और जगत् के जीवन को निर्धारित करती हैं ।

3-आधिदैविक ताप दैवी शक्तियों द्वारा दिये गये या पूर्वजन्मों में स्वयं के किए गये कर्मों से प्राप्त कष्ट कहलाता है।मनुष्य जब जन्म लेता है तो उसका भाग्य उसके साथ ही इस धरा पर आ जाता है। इस सृष्टि के प्रारम्भ से इस वर्तमान जन्म तक न जाने कितने ही जन्म उसने लिए होते हैं। उन सभी जन्मों में किए गए उसके सुकर्मो और दुष्कर्मो के फल का भुगतान तो उसे करना ही पड़ता है।उन सब शुभाशुभ कर्मो का फल भोगते हुए कई प्रकार के उतार-चढावों को पार करना मानो उसकी नियति बन जाती है।

4-इसके साथ-साथ अतिवृष्टि, अनावृष्टि, ओलावृष्टि, सुनामी, बाढ़, भूकम्प आदि दैविक तापों उसे सताते रहते हैं, मनुष्य को उनसे मुक्ति नहीं मिलती जब तक वह इन सब को भोग नहीं लेता।सांसारिक विघ्न-बाधाएँ भी उसे कदम-कदम पर डराती रहती हैं और तब मनुष्य विवश होकर इसे ही अपने भाग्य का फैसला मानकर अपना सिर झुका लेता है।