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क्या हैअन्नमय कोष की ..उपवास ,आसन, तत्व शुद्धि, और तपश्चर्या साधना?

1-ऋग्वेद में पंचकोशों को पाँच ऋषियों की संज्ञा देतेहु ए कहा गया है कि मनुष्य जीवन्त अवस्था में ही सारेजीवन उद्यान को पवित्र-सुरम्य बना सकते हैं ।ये पाँच कोश हैं -

अन्नमय कोश - अन्न तथा भोजन से निर्मित ..शरीर और मस्तिष्क ।

प्राणमय कोश - प्राणों से बना ।

मनोमय कोश - मन से बना ।

विज्ञानमय कोश - अंतर्ज्ञान या सहज ज्ञान से बना ।

आनंदमय कोश - आनंदानुभूति से बना ।

आत्मा के पांच कोशों मे प्रथम कोश का नाम ‘ अन्नमय कोश’ है | अन्न का सात्विक अर्थ है ‘ पृथ्वी का रस ‘| पृथ्वी से जल , अनाज , फल , तरकारी , घास आदि पैदा होते है | उन्ही से दूध , घी , माँस आदि भी बनते हैं | यह सभी अन्न कहे जाते हैं , इन्ही के द्वारा रज , वीर्य बनते हैं और इन्ही से इस शरीर का निर्माण होता है | अन्न द्वारा ही देह बढ़ती है और पुष्ट होती है और अंत मे अन्न रूप पृथ्वी मे ही भष्म होकर या सड़ गल कर मिल जाती है | अन्न से उत्पन्न होने वाला और उसी मे जाने वाला यह देह इसी प्रधानता के कारण ‘अन्नमय कोश ‘ कहा जाता है |

यहाँ एक बात ध्यान रखने की है की हाड -माँस का जो यह पुतला दिखाई पड़ता है वह अन्नमय कोश की अधीनता मे है पर उसे ही अन्नमय कोश न समझ लेना चाहिए | मृत्यु हो जाने पर देह तो नष्ट हो जाती है पर अन्नमय कोश नष्ट नहीं होता है | वह जीव के साथ रहता है | बिना शरीर के भी जीव भूत-योनी मे या स्वर्ग नर्क मे उन भूख -प्यास , सर्दी -गर्मी , चोट , दर्द आदि को सहता है जो स्थूल शरीर से सम्बंधित है | इसी प्रकार उसे उन इन्द्रीय भोगों की चाह रहती है जो शरीर द्वारा ही भोगे जाने संभव हैं | भूतों की इच्छाएं वैसी ही आहार विहार की रहती है , जैसी मनुष्य शरीर धारियों की होती है | इससे प्रकट है की अन्नमय कोश शरीर का संचालक , कारण , उत्पादक उपभोक्ता आदि तो है पर उससे पृथक भी है | इसे सूक्ष्म शरीर भी कहा जा सकता है |

चिकित्सा पद्धतियों की पहुच स्थूल शरीर तक है जबकी कितने ही रोग ऐसे हैं जो अन्न मय कोश की विकृति के कारण उत्पन्न होते हैं और जिसे चिकित्सक ठीक करने मे प्रायः असमर्थ हो जाते हैं |

अन्नमय कोश की स्थिति के अनुसार शरीर का ढांचा और रंग -रूप बनता है | उसी के अनुसार इन्द्रियों की शक्तियां होती हैं | बालक जन्म से ही कितनी ही शारीरिक त्रुटियों , अपूर्णताएं या विशेषताएं लेकर आता है | किसी की देह आराम्भ से ही मोती , किसी की जन्म से ही पतली होती है | आँखों की दृष्टि , वाणी की विशेषता , मष्तिष्क का भोडा या तीव्र होना , किसी विशेष अंग का निर्बल या न्यून होना अन्नमय कोश की स्थिति के अनुरूप होता है | माता -पिता के राज-वीर्य का भी उसमे थोडा प्रभाव होता है पर विशेषता अपने कोश की ही रहती है | कितने ही बालक माता- पिता की अपेक्षा अनेक बातों मे बहुत भिन्न पाए जाते हैं |

शरीर जिस अन्न से बनता – बढ़ता है उसके भीतर सूक्ष्म जीवन तत्व रहता है जो की अन्न मय कोश को बनाता है | जैसे शरीर मे पांच कोश हैं वैसे ही अन्न मे भी तीन कोश हैं ..

१. स्थूल कोश २. सूक्ष्म कोश ३. कारण कोश

स्थूल मे स्वाद और भार , सूक्ष्म मे पराभव और गुण तथा कारण कोश मे अन्न का संस्कार होता है | जिह्वा से केवल अन्न का स्वाद मालुम होता है , पेट उसके भार का अनुभव करता है , रस मे उसकी मादकता , उष्णता प्रकट होती है | अन्नमय कोश पर उसका संस्कार जमता है | माँस आदि कितने अभक्ष्य पदार्थ ऐसे हैं जो जीभ को स्वादिष्ट लगते हैं , देह को मोटा बनाने मे भी सहायक होते हैं , पर उनमे सूक्ष्म संस्कार ऐसा होता है जो अन्नमय कोश को विकृत कर देता है और उसका परिणाम अदृश्य रूप से आकस्मिक रोगों के रूप मे तथा जन्म जन्मांतर तक कुरूपता एवँ शारीरिक अपूर्णता के रूप मे चलता है | इसलिए आत्म -विद्या के ज्ञाता सदा सात्विक सुसंस्कारी अन्न पर जोर देते हैं ताकि स्थूल शरीर मे बीमारी, कुरूपता , अपूर्णता , आलस्य एवँ कमजोरी की बढोत्तरी न हो | अभक्ष्य खाने वाले आज नहीं तो भविष्य मे इसके शिकार हो ही जायेंगे | इस प्रकार अनीति से उपार्जित धन या पाप की कमाई प्रकट मे आकर्षक लगने पर भी अन्नमय कोश को दूषित करती हैं और अंत मे शरीर को विकृत तथा चिर रोगी बना देती है | धन संपन्न होने पर भी ऐसी दुर्दशा भोगने के अनेक उदाहरण प्रत्यक्ष दिखाई दिया करते हैं |

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अन्नमय कोश की साधना के दो मुख्य अंग हैं- (१) आहार-विहार सम्बन्धी शुद्धता (२) सूक्ष्म साधनाएँ। गायत्री उपासना में दोनों ही अंगों का साथ-साथ ध्यान रखा जाना चाहिए। आहार-विहार सम्बन्धी शुद्धता के बिना सूक्ष्म साधना ओं का अभ्यास असम्भव है। आहार शुद्धि पर इसलिए जोर दिया जाता है कि मन की शुद्धता-अशुद्धता का आधार वही है। यदि अन्न अशुद्ध होगा, तो मन भी अशुद्ध रहेगा और अशुद्ध मन न कभी ध्यान, भजन में एकाग्र होता है और न श्रद्धा-विश्वास को ही ग्रहण करता है। मन का परिशोधन अन्न की शुद्धि पर नि र्भर है। इसलिए साधना समर में उतरने वाले को सबसे पहले आहर शुद्धि पर ध्यान देना पड़ता है। शुद्ध कमाई का, शुद्धतापूर्वक बनाया हुआ, भगवान का प्रसाद मानकर औषधि एवं अमृत की भावना से भोजन करना आवश्यक है। स्वाद के लिए नहीं, हीं वरन् शरीर रक्षा के लिए ही खाया जाना चाहिए। पेट की थैली को देखते हुए उसमें आधा आहार, चौथाई जल और चौथाई वायु के लिए स्थान रहने देना चाहिए। अर्थात् भोजन की मात्रा इतनी रहनी चाहिए जिससे पेट पर अनावश्यक भार न पड़े, आलस्य न आवे। जल्दी-जल्दी नहीं, हीं वरन् धीरे-धीरे अच्छी तरह चबा कर ग्रास की उदरस्थ किया जाय। यह सब बातें जान लेना ही पर्याप्त नहीं, हीं वरन् लाभ तभी है, जब अभ्यास में लाया जाय। अन्न से मन बनता है। जैसे संस्कारों का अन्न खाया जाता है मन की प्रवृत्ति वैसी ही बन जाती है। मन को शुद्ध, संयमी, स्थिर और सन्मार्गगामी बनाने का प्रधा न उपाय अन्न पर संयम करना है।अभक्ष खाने वाले, माँस, मदिरा, नशेवाजी में ग्रस्त मनुष्य आत्मकल्याण के मार्ग पर दूर तक चल सकेंगे यह संदिग्ध है। जिह्वा को चटोरापन मन में उसी प्रकार चंचलता उत्पन्न करता है जिस प्रकार तेज हवा चलने से जलाशय में लहरें उठने लगती हैं। अनीति की कमाई की रोटी खाने वाला वह आन्तरिक स्वच्छता कैसे प्राप्त कर सकेगा, जिसमें भगवान का विराजमान हो सकना संभव होता है। साधना का प्रथम चरण अन्न की शुद्धि है। दूध, मलाई खाकर शरीर मोटा हो सकता है पर मन को निर्मल बनाने के लिए अन्त में सात्विकता की आवश्यक मात्रा का मिला होना आवश्यक है। अस्वाद व्रत एवं उपवास आत्मिक साधना के आवश्यक अंग हैं। एक सप्ताह में दो दिन नमक-शक्कर छोड़कर अस्वाद व्रत रखना चाहिए। ये दिन गुरुवार और रविवार रखे जा सकते हैं। साधनात्मक दृष्टि से इन दोनों दिनों का विशेष महत्त्व है। पर जिन्हें किसी कारण से इन दिनों में असुविधा हो वे सुविधानुसार अन्य दिन भी चुन सकते हैं साधक के भोजन में एक समय एक साथ अनेक प्रकार की वस्तुएँ न होनी चाहिए। हर वस्तु का पाचन काल न्यूनाधिक होता है। उनके लिए पाचक रसों की आवश्यकता भी प्रथम प्रकार की रहती है। यदि अनेक प्रकार के व्यंजन बनाकर एक साथ खाये जायेंगे तो उसका हाल उस खिचड़ी जैसा हो जायेगा, जिसमें आध घण्टे से लेकर छै घण्टे तक पकने वाली चीजें इकट्ठी करके पकाई जा रही हैं। इनमें से कुछ चीजें कच्ची रह जावेंगी। जिस थाली में अनेकों कटोरियाँ होगीं, गीं अनेकों व्यंजन परोसे गये होंगेहों गेवह स्वास्थ्य की दृष्टि से खाने वाले के लिए उस बढ़ी संख्या के अनुपात से ही हानिकारक होगी। सन्त महात्मा बहुधा एक ही वस्तु खाते हैं। यदि कई प्रकार की चीजें उन्हें खानी पड़ें तो आपत्ति धर्म की तरह उन सबको इकट्ठी करके उनकी संख्या एक कर लेते हैं और अनेक स्वादों को नष्ट कर एक ही स्वाद बना लेते हैं। इस आदर्श के पीछे शारीरिक और मानसिक स्वा स्थ्य के सुधार का एक बड़ा ही महत्त्वपूर्ण तथ्य सन्निहित है। भोगों को, स्वादों को सीमित करना, मन को वश में करने का, इन्द्रिय निग्रह का एक मात्र उपाय है। भोजन में जितने अधिक प्रकार वस्तुओं का समावेश किया जायेगा उतनी ही पाचन क्रिया खराब होगी, उतना ही खर्च बढ़ेगा और उतना ही मन चंचल होगा। इसलिए संयम का अवलम्बन करते हुए ही साधना पथ के पथिक को अग्रसर होना पड़ता है। चटोरा व्यक्ति मन को कभी संयम में ला सकेगा इसमें सन्देह ही है। जिनकी आर्थिक स्थिति थोड़ी सुधरी हुई है वे आम-तौर से भोजन की शान इस बात में समझते हैं कि उसमें कितनी ही कटोरियाँ सजी हुई हों।हों कितने ही प्रकार के शाक, दाल, भात, रा यते, अचार, चटनी पापड़, मिठाई, पकौड़ी, नमकीन, आदि के कितने ही तरह के स्वाद उन्हें पसन्द लगते हैं। शान और शेखी-खोरी को हमें चटोरेपन और असंयम का, विलासिता और चंचलता का चिन्ह मानना सादगी ही सभ्यता का चिन्ह माना गया है, यह सादगी भोजन में भी रहनी ही चाहिए। अन्नमय कोश का परिशोधन करने की उच्चस्तरीय गायत्री साधना का हमारा प्रथम प्रयास ही लड़खड़ाने लगेगा यदि इतना भी न बन पड़ा तो आगे जो कठिन तपश्चर्याएँ करने का अवसर प्रस्तुत होगा तो उसे किस प्रकार किया जा सकेगा ? भोजन में दो वस्तुएँ रहना पर्याप्त है। एक खाने की वस्तु, दूसरी लगाने की। रोटी-शाक, रोटी-दाल, भा त व दाल जैसी किन्हीं दो वस्तुओं का जोड़ा मिला लेने से एक खाने की प्रधान वस्तु और दूसरी सहायक का जोड़ आसानी से बन जाता है। हर भोजन में वस्तुएँ बदली जा सकती हैं पर उनकी संख्या दो ही हो। जिस प्रकार पति और पत्नी दो तक ही काम सेवन की मर्यादा सीमित रहती है उसी प्रकार स्वाद सेवन के लिए भी दो का जोड़ा पर्याप्त हैं कोई यह न सोचे कि इसका स्वास्थ्य पर कुछ बुरा असर पड़ेगा। इससे पाचन-क्रिया तो सुधरेगी ही, मन भी बहुत संयमी बनेगा। संयमी मन जितना पारलौकिक सद्गति के लिए आवश्यक होता है उतना ही लौकिक समृद्धि और सफलताएँ उपलब्ध करने के लिए भी उपयोगी है। चञ्चलता मिटाकर एकाग्रता उत्पन्न करने के लिए यदि इतना त्याग करना पड़ता है। तो उसे कोई बहुत बड़ी बात नहीं मानना चाहिए। जो लोग अधिक चटोरे हैं, जिन्हें इतना त्याग कर सकना कठिन मालूम पड़ता है वे इतना तो करें ही कि भोजन में जितनी संख्या में वस्तुएँ रहती हैं उसकी संख्या अबकी अपेक्षा घटालें और उनकी सीमा निर्धारित करले कि तीन-चार से अधिक तो यह सख्या किसी भी प्रकार नहीं होनी चाहिए। अन्नमय कोश की साधना को (१) एक सप्ताह में दो दिन नमक, शक्कर छोड़कर अस्वाद व्रत का पालन और (२) भोजन में एक बार में खाद्य वस्तुओं की संख्या दो तक सीमित रखना यह दो जरूरी बातें हैं दुर्बल मनोभूमि वाले एक सप्ताह में एक़ बार अस्वाद व्रत रखते हुए और भोजन में वस्तुओं की संख्या तीन या चार रखते हुए भी धीरे-धीरे आगे बढ़ सकते हैं। अन्न के साथ-साथ जल की शुद्धता का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। ग्रहण करने की शक्ति जल में अन्न से भी अधिक रहती है, यदि तमोगुणी स्थिति का जल प्रयोग किया जाय तो उससे साधना क्रम में बाधा ही पड़ेगी। सामूहिक जल पात्रों में जहाँ हर कोई मन माने ढंग से बिना हाथ धोये पानी भरता पीता है, काँच के गिलास बिना माँजे धोये काम में आते रहते हैं, वहाँ तभी पानी पीना चाहिए जब उसके बिना काम न चलता हो। होटलों की चाय दुहरी हानि पहुँचाती है। चाय का नशा तो हानिकारक है ही। होटलों की गन्दगी उसमें 'गिलोय नीम चढ़ी' की उक्ति चरितार्थ करती है। शराब, भाँग,जैसे नशीले पेय आत्म-कल्याण के इच्छुकों को त्यागने ही पड़ते हैं। धुआँ पीना भी अन्न में माना जायेगा तमाखू खाना-पीना, गाँजा, चरस, मादक आदि भले ही धुएँ या उत्तेजना के रूप में ही क्यों न हों, हों हमारे जीवन कोषों और मस्तिष्कीय कोष्टकों में प्रवेश करके तमोगुण उत्पन्न करते हैं। और यह तमोगुण आत्मिक प्रगति के मार्ग में एक भारी बाधा बनकर खड़ा रहता है। नशेबाजी से हमें बचना ही चाहिए। भले ही वह बीड़ी पीने जैसी छोटी सी ही क्यों न हो। इस वर्ष हमें नशेबाजी और अशुद्ध जल के प्रयोग को बन्द करने का प्रयत्न करना चाहिए, जिन्हें यह बुरी आदतें पड़ गई हों उन्हें उसे छोड़ना चाहिए। एक साथ न छूट सकें तो इनका उपयो ग आधा तो तुरन्त ही कर देना चाहिए। उपवास का क्रम भी सप्ताह में एक दिन रखना चाहिए। प्रारम्भ में पन्द्रह दिन में एक्र दिन या सप्ताह में आधा दिन का उपवास रख सकते हैं। उपवास के दिन जल पर्याप्त मात्रा में ग्रहण करना आवश्यक है। इसके साथ नीबू या शहद मिलाकर ले सकते हैं। जिन्हें दुर्बलता प्रतीत होती है, उन्हें शहद का प्रयोग लाभ पहुँचाएगा। नीबू से पाचन संस्थान की सफाई में सहायता मिलेगी। एनीमा के प्रयोग का भी क्रम बाँधा जा सकता है। किन्तु एनीमा प्रत्येक उपवास में लेने की सरलता नहीं।हीं महीने या दो महीने में एक बार ले लेना पर्याप्त है। विहार सम्बन्धी शुद्धता में निरालस्यता और ब्रह्मचर्य प्रमुख हैं। शरीर के ओज एवं पोषण को कम से कम नष्ट करने पर ही आन्तरिक शक्ति में अभिवृद्धि सम्भव है। समय का एक क्षण भी बर्बाद न करना, निरन्तर काम में लगे रहना, प्रातःकाल दिनचर्या बना कर उसे पूरा करने में मशीन की तरह लगे रहना तथा उपासना का नियमित क्रम सदैव निभाना ये साधक के आवश्यक कर्तव्य हैं। आहार- विहार की शुद्धता तथा उपासना की नियमितता से अन्नमय कोश की साधना आगे बढ़ती है और व्यक्ति स्वस्थ शक्ति सम्पन्न, स्फूर्तिवान बनता है। इस तरह की गायत्री उपासना की उच्चस्तरीय साधना में प्रवेश करने वाले योद्धा को सर्वप्रथम शिक्षण स्वादेन्द्रिय से लड़ने और आहार बुद्धि की सुव्यवस्था बनानी पड़ती है। उसकी उपेक्षा करने से आगे का मार्ग अवरुद्ध ही पड़ा रहेगा यह बात हर उच्चस्तरीय साधक को का न खोलकर सुन लेना चाहिए और सुन समझकर गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि आहार को सात्विक बनाये बिना किसी भी प्रकार काम चलने वाला नहीं है। जो साधक मिष्ठान, पकवान और माल मलाई विपुल परिमाण में चरते रहते हैं उन्हें वासनाएँ ऐसे ही पथ पर भ्रष्ट कर लेती हैं जैसे मुर्गे की गर्दन को बिल्ली मरोड़ कर रख देती है। ऐसे साधकों को पग-पग पर आलस, प्रमाद सताता है और वासना तृष्णा की मृगमरीचिका उन्हें निरन्तर भ्रमाती, भटकाती रहती है। अन्नमय कोश की साधना का प्रारंभिक कदम 'इन्द्रिय निग्रह' है यों ज्ञानेन्द्रियाँ पांच मानी जाती है पर उनमें दो ही प्रधान हैं। (१) स्वादेन्द्रिय (२) कामेन्द्रिय। इनमें से स्वादेन्द्रिय प्रधान है उसके वश में आने से कामेन्द्रिय भी वश में आ जाती है। जीभ का स्वाद जिसने जीता वह विषय वासना पर भी अंकुश रख सकेगा। चटोरा आदमी ब्रह्म्चर्य से नहीं रह सकता, उसे सभी इन्द्रियाँ परेशान करती हैं। विशेष रूप से काम वासना तो काबू में आती ही नहीं।हीं इसलिए इन्द्रिय निग्रह की तपश्चर्या स्वाद को जीभ को वश में करने से आरम्भ की जाती है। आरोग्य ही नहीं, हीं मन को वासनासक्त होने से रोकने की दृष्टि से भी यह आवश्यक है कि स्वादेन्द्रिय पर अंकुश लगाया जाय। इस दृष्टि से नमक और मीठा दोनों को ही छोड़ देना अच्छा रहता है। यह निराधार भय है कि इससे स्वास्थ्य खराब हो जायेगा। सच तो यह कि इस संयम से पाचन क्रिया ठीक होती है, रक्त शुद्ध होता है, इन्द्रियाँ सशक्त रहती हैं, तेज बढ़ता है और जीवन काल बढ़ जाता है। इनसे भी बड़ा लाभ यह है कि मन काबू में आता है। चटोरेपन को रोक देने से वासना पर जो नियन्त्रण होता है वह धीरे-धीरे सभी इन्द्रियों को वश में करने वाला सिद्ध होता है। जिस प्रकार पाँचों ज्ञानेन्द्रियों में स्वादेन्द्रिय और कमेंन द्रिमें य ही प्रबल हैं, उसी प्रकार स्वाद के षट रसों में नमक और मीठा ही प्रधान हैं। चरपरा, खट्टा, कसैला आदि तो उनके सहायक रस मात्र है। इन दो प्रधान रसों पर संयम प्राप्त करना षटरसों की त्यागने के बराबर ही है। जिसने स्वाद और काम-प्रवृत्ति को जीता उसकी सभी इन्द्रियाँ वश में हो गई जिसने नमक, मीठा छोड़ा, उसने छहों रसों को त्याग दिया, ऐसा ही समझना चाहिए। मन को वश में करने के लिए यह संयम साधना हर साधक को किसी न किसी रूप में करनी होती है। संक्षेप में इस सन्दर्भ निम्नलिखित दिशा निर्देशों को ध्यान में रखते हुए साधना मार्ग पर चलने वालों को अपनी परिस्थिति एवं सुविधा का ध्यान रखते हुए कार्य पद्धति निर्धारित करनी चाहिए। (१) सप्ता ह में एक उपवास रखा जाय। यदि मात्र जल पर रह सकना कठिन पड़े तो दूध, छाछ, दही फलों का रस, शाक का रस जैसे प्रवाही पदार्थों से काम चलाया जाय। इतने में भी र्काठेनाई पड़े तो एक समय अन्नहार एक समय रसाहार की व्यवस्था बना ली जाय। (२) समय-समय पर नियत अवधि के लिए अस्वाद व्रत का पालन करते रहा जाय। नमक और शक्कर दोनों को छोड़कर फीका भोजन करना ही अस्वाद व्रत है। आवश्यक नमक और शक्कर की पर्याप्त मात्रा हमारे स्वाभाविक आहार में रहती ही है। बाहर से नमक, शक्कर, मसा ले आदि का प्रयोग स्वाद के लिए किया जाता है। इनमें स्वास्थ्य रक्षक कोई तत्व नहीं है। अस्तु अस्वाद व्रत पालन से स्वादेन्द्रिय को ही असुविधा होती है, स्वास्थ्य की दृष्टि से तो इस अवांछनीय दबाव के हटने पर लाभ ही रहता है। (३) साधक को दो वार से अधिक भोजन तो नहीं ही करना चाहिए। बीच-बीच में खाते रहने की आदत न डाली जाय। प्रातःकाल और तीसरे प्रहर दूध, छाछ क्वाथ, नीबू शहद जैसे द्रव पदार्थ भर लिये जा सकते हैं। (४) एक समय अन्नाहार, एक समय शाकाहार, फलाहार आदि पर रहा जा सके तो भी उत्तम है। (५) अपने हाथ से भोजन बनाया जा सके तो सर्वोत्तम अन्यथा सुसंस्कारी, स्वजनों के हाथ का बना परोसा भोजन ही ग्रहण किया जाय। शारीरिक और मानसिक दृष्टि से रुग्ण, कुसंस्कारी लोगों का पकाया परोसा भोजन न लिया जाय। पात्रों की स्वच्छता का ध्यान भी रखा जाय। बाजार की बनी वस्तुओं से यथा सम्भव बचा जाय। बाहर जाना पड़े तो फल, सत्तु, चना जैसे चवैना पदार्थों पर गुजारा किया जाय जिन में व्यक्ति संस्कार अधिक न पड़े हों। (६) माँस, अण्डा, जीव शरीरों से बनी औषधियाँ, शराब, तम्बाकू आदि नशीली वस्तुएँ ग्रहण न की जायें। मसालों की आदत जितनी घटाई जा सके घटानी चाहिए। (७) पेट ठूँस-ठूँस कर न भरा जाय, उसे जल और वायु के लिए एक तिहाई खाली रहने दिया जाय। कड़ी भूख लगने पर ही कुछ खाया जाय। यदि भूख न लगी हो तो उस समय का भोजन टाल दिया जाय उतावली न की जाय ग्रास को पूरी तरह चबाने के बाद ही गले से नीचे उतरने दिया जाय। (८) थाली में कटोरियों की संख्या न बढ़ने दी जाय। खाद्य पदार्थो की संख्या अधिक न हो। रोटी, शाक, दाल-चावल जैसे दो की संख्या तो खाद्य पदार्थों की संख्या रहे तो ठीक है। उन्हें अदलते बदलते रहा जा सकता है। अधिक जायके, अधिक पदार्थ भोजन में न बढ़ने पायें, यही उचित है। (९) खिचड़ी या दलिया, दा ल, शाक डालकर पकाया जाय और उसमें ही दही आदि मिला लिया जाय तो यह आहार साधक के उपयुक्त सस्ता, सात्विक, सरल और हर दृष्टि से उपयोगी हो सकता है। इस पर भली प्रकार गुजर हो सकती है। (१०) हमारा आहार अनीति उपार्जित न हो। बिना परिश्रम की कमाई भी साधक के लिए अभक्ष्य ही है। न्यायोपार्जित आजीविका में से भी लोक हित का एक महत्त्वपूर्ण अंश निकालने के उपरान्त ही यज्ञावाशिष्ट खाया जाय। पंच महायज्ञों को नित्य कर्म में इसी का स्मरण रखने की दृष्टि से समावेश किया गया है। यह साधना का एक पक्ष ही है वस्तुत: यह मन को स्वस्थ निरालस्य और ब्रह्मचर्य संकल्प से ओत-प्रोत बनाने के लिए हैं। आधार बुद्धि से स्वत: मन उसके लिए स्फूर्त होता है पर पूर्व अभ्यास के कारण कभी विकार उठें भी तो उन्हें हठात रोका जाये और मन को अधिकाधिक आत्म विकास की ओर उन्मुख रखा जाय। (११) अन्नमय कोश के शोधन का दूसरा व्रत कुछ दिन बाद यह लेना चाहिए कि सप्ताह में एक दिन अथवा कम से कम एक़ समय उपवास किया जाय अब तक अस्वाद व्रत ही पर्याप्त माना जाता था, उपवास अनिवार्य नहीं था पर अब इसमें क्रमश: उच्चस्तरीय साधकों को सप्ताह में एक दिन या एक समय उपवास भी करना चाहिए। (१२) ब्रह्मचर्य के सम्बन्ध में अपेक्षाकृत हर वर्ष कुछ कड़ाई बढ़ाते ही चलना चाहिए। गृहस्थ होते हुए भी साधकों को अधिकाधिक ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। इससे आत्म बल बढ़ता है, स्वास्थ्य सुधरता है, मानसिक शक्ति एवं बुद्धि में तीव्रता आती है, दीर्घ जीवन सुलभ होता है और सन्तान की सख्या बढ़ने से परिवार का अर्थ सन्तुलन बिगड़ने से बच जाता है। पत्नी की सबसे बड़ी सेवा यही हो सकती है कि उसे अधि काधिक ब्रह्मचर्य से रहने देकर निरोगिता एवं सन्तान-पालन के असह्य भार से बचने का लाभ प्राप्त करने दिया जाय। इस सुविधा के प्राप्त होने पर ही वह पति तथा परिवार की अधिक सेवा कर सकने में समर्थ हो सकती है। ब्रह्मचर्य की लम्बी मर्यादाएँ पालन करने वाले, असंयम से बचे रहने वाले पति-पत्नी ही सुयोग्य संतान उत्पन्न कर सकते हैं। युग-निर्माण के उपयुक्त नई पीढ़ी को जन्म देने के लिए यह आवश्यक है कि गृहस्थ में भी वासनात्मक संयम को कड़ाई से पालन किया जाय और इन्द्रिय निग्रह की अवधि अधिकाधिक लम्बी बनाई जाती रहे। गायत्री उपासना में संलग्न पति-पत्नी और परस्पर विचार विनियम द्वारा भावनात्मक उत्कर्ष करते रहें। साथ ही परमार्थिक कार्यों में भी आवश्यक अभिरुचि लेते रहें तो उनके शरीरों में वे तत्व उत्पन्न हो सकते हैं जिनके कारण नर रत्नों को जन्म दे सकना सम्भव होता है। हमारी हार्दिक इच्छा है, कि गायत्री परिवार के सद्गृ हस्थों के यहाँ उच्चकोटि की आत्माएँ जन्म लें। युग निर्माण के लिए बड़ी ही विभूतियों की आवश्यकता पड़ेगी। दशरथ-कौशिल्या, वसुदेव-देवकी, दुष्यन्त-शकुन्तला की तरह प्रबुद्ध दम्पत्ति ही यह सौभाग्य लाभ प्राप्त कर सकते हैं। पंचकोशी गायत्री उपासना में अन्नमय कोश को अनावरण करने का प्रयत्न करते हुए साधक यदि ब्रह्मचर्य को अधिकाधिक महत्त्व देते रहें और अपने साथ ही पत्नी का आत्मिक स्तर ऊँचा उठाने का प्रयत्न करते रहें तो गायत्री माता के अन्य वरदानों के साथ यह वरदान भी मिल सकता है कि इतिहास में अपना और अपने पिता-माता का नाम अमर करने वाली सुसन्तति उन्हें प्राप्त हो। 6/7/2021 अन्नमय कोश की सरल साधना पद्धति - गायत्री की पंचकोशी साधना एवं

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अन्नमय कोश का प्रवेश द्वार : नाभिचक्र

गर्भाशय में भ्रूण का पोषण माता के शरीर की सामग्री से होता है। आरंभ में भ्रूण, मात्र एक बुलबुले की तरह होता है। तदुपरान्त वह तेजी से बढ़ना आरंभ करता है। इस अभिवृद्धि के लिए पोषण सामग्री चाहिए। उसे प्राप्त करने का उस कोंटर में और कोई आधार नहीं हैं । मात्र माता का शरीर ही वह भण्डार है जहाँ से गर्भस्थ बालक को अपने निर्वाह एवं अभिवर्धन के लिए आवश्यक आहार मिल सकता है। वह मिलता भी है । यह अनुदान शिशु को अपनी नाभि के मुख से प्राप्त होता है। तब न मुँह खुला होता है और न पाचन यंत्र ही सक्षम होते हैं। पका हुआ, पचा हुआ आहार उस स्थिति में उसे अपनी नाभि द्वारा ही उपलब्ध होता है। प्रसव के समय जब बालक बाहर आता है तो देखा जाता है कि उसकी नाभि में एक नाल रज्जु बँधी है और वह माता को नाभि स्थली के साथ जुड़ी है। उसे काटना पड़ता है तब दोनों अलग होते हैं। यह नाल ही वह द्वार है जिसके द्वारा माता के शरीर से निकल कर आवश्यक रस द्रव्य बालक के शरीर में निरन्तर पहुँचते रहते हैं इस दृष्टि से प्रथम मुख नाभि को ही कहा जा सकता है। दाँत, जीभ, कंठ, तालु वाला मुँह तो जन्म ले चुकने के बाद खुलता है। तब तक नौ मास की अवधि में बालक बहुत कुछ प्राप्त कर चुका होता है। गर्भ काल में बच्चा जितनी तेजी से बढ़ता है वह आश्चर्यजनक है। उसे अपने शरीर के अनुपात से इतनी अधिक खुराक की जरूरत पड़ती है जितनी जन्म लेने के उपरान्त फिर कभी नहीं पड़ती। उन सारी आवश्यकताओं की पूर्ति नाभि मार्ग से ही होती रहती है। भ्रूण के फेफड़े गर्भावस्था के नौ महीने प्रायः निष्क्रिय ही रहते हैं। श्वास प्रश्वास की आवश्यकता माता और भ्रूण के दो जुड़े हुए अवयव पूरी करते हैं। माता के ‘यूटेरस’ गर्भाशय में स्थित जरायु बच्चे के ‘प्लेसेन्टा’ ही फेफड़े का भी काम करते हैं। जन्म के उपरान्त जैसे ही बालक रोता, हाथ पैर चलाता और साँस लेता है वैसे ही रक्त संचार आरंभ हो जाता है। हृदय से बड़ी धमनी में होकर रक्त फेफड़ों में पहुँचता है आध्र वे अपना काम आरंभ कर देते हैं। नाल काटने पर बच्चे का ‘अम्ब कार्ड’ माता के ‘प्लेसेन्टा’ से कट कर अलग हो जाता है। तब फिर दोनों के बीच बने हुए सम्बन्ध सूत्र का विच्छेद हो जाता है और इस कार्य के सम्पन्न करती रहने वाली ‘अम्ब वेन’ निष्क्रिय हो जाती है बच्चे की कार्य वाहिनी सामर्थ्य अपने बल बूते अपना काम करने लगती है। फेफड़े हृदय आदि ठीक तरह अपना काम करने लगते हैं और उस स्व संचालित प्रक्रिया के सहारे नवजात शिशु की जीवन यात्रा स्वावलंबनपूर्वक अपने ढर्रे पर लुढ़कने लगती है। माता का सहयोग समाप्त हो जाता है। तब उस केन्द्र की उपयोगिता भी समाप्त हो जाती है। इसके बाद उस महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया का केन्द्र नाभि बाह्य दृष्टि से एक सामान्य गड्ढे के रूप में रह जाती है। स्थूल विज्ञान के अनुसार अन्दर उस स्थान से कुछ सूत्र जिगर से जुड़े रहते हैं। वर्तमान जीवशास्त्री इसे निरर्थक निष्क्रिय सूत्र मानते हैं और उन्हें ‘लीगामैन्ट टेरीस आफ लीवर’ कहते हैं। किन्तु यह सूत्र एकदम निष्प्राण नहीं होते बल्कि स्थूल दृष्टि से सुप्त जैसी स्थिति में पड़े रहते हैं। जब जिगर रोग ग्रस्त हो जाता है तो उस पर पड़ने वाले रक्त के दबाव को कम करने के लिए यह सूत्र पुनः सक्रिय हो उठते हैं। जिगर पर पड़ने वाले रक्त के दबाव से उसे बचाने के लिए रक्त को नाभि क्षेत्र में फैला देते हैं। उस समय नाभि क्षेत्र फूला हुआ, उसमें रक्त शिरायें उभरी हुई स्पष्ट दिखाई देती हैं स्पृश् है कि स्थूल दृष्टि से सुप्त, यह तन्तु सूक्ष्म दृष्टि से सतत् सक्रिय रहते हैं। शरीर के विकास की दृष्टि से नाभि की भूमिका समाप्त हो जाती है यह एक दृष्टि से उचित भी है। नाभि द्वारा पोषित भ्रूण गर्भ में जिस तीव्र गति से बढ़ता है वह अत्यधिक तीव्र होती है। नाभि की पोषण क्षमता सक्रिय रहे और यदि जन्म लेने के बाद भी उसी क्रम से शरीर की वृद्धि का क्रम चलता रहता तो फिर कदाचित मनुष्य ताल वृक्ष जितना ऊँचा, हाथी जितना विशालकाय बन सकता था और उसकी खुराक जुटाने के लिए दस हाथियों जितने आहार की आवश्यकता पड़ सकती थी। ईश्वर को धन्यवाद है कि भ्रूण की वृद्धि और आवश्यकता की तीव्रता को गर्भ काल तक ही सीमित रखा। वर्तमान शरीर शास्त्र की दृष्टि से जन्म के बाद मनुष्य के लिए नाभिचक्र निरर्थक कहा भी जा सकता है, किन्तु अध्यात्म विज्ञान की मान्यता इससे भिन्न है। उसने नाभि को ‘नाभिकीय’ केन्द्र माना है। जिस प्रकार परमाणु के नाभिक का महत्त्व सर्वोपरि है, जिस प्रकार सौर मण्डल का सूत्र संचालन सूर्य द्वारा होता है उसी प्रकार शरीर का मध्य बिन्दु नाभि है और उसमें नाभिकीय क्षमता विद्यमान् है। मस्तिष्क का सूक्ष्म शरीर का नाभिक आज्ञाचक्र है। स्थूल शरीर की स्थिति उससे भिन्न है। उसका नाभिक-न्यूक्लियस नाभि है। उसकी क्षमता अपने समीपवर्ती अवयवों को प्राणबल देती है और व अपना काम ठीक तरह कर सकने में समर्थ बनते हैं। प्राकृतिक चिकित्सा तथा योग चिकित्सा के अंतर्गत नाभि को इसी लिए बहुत महत्त्व दिया जाता है। शरीर के अनेक गंभीर रोगों के उपचार की एक रहस्यमय पद्धति अपने देश में बहुत समय से चली आ रही है । उसमें शरीर के कुछ विशिष्ट केन्द्रों को दबाने, सहलाने, बाँधने मलने आदि क्रियाओं द्वारा रोगों का सफल उपचार कर दिया जाता है। यह पद्धति आजकल ‘जौन थैरेपी’ के नाम से एक सुनिश्चित चिकित्सा पद्धति के रूप में विकसित की जा रही है। उसमें भी नाभि को बहुत अधिक महत्त्व दिया जाता है। शरीर शास्त्र की दृष्टि से भी नाभि के आसपास नौ महत्त्वपूर्ण अंतःस्रावी ग्रंथियाँ (गैग्लियान ) है। गैग्लियान-स्वायत्त नाड़ी संस्थान (आटोनामस नर्वस सिस्टम) के वह केन्द्र है जो शरीर के प्रमुख संस्थानों की गतिविधियों , उनके रक्त संचरण, हारमोन, एन्जाइम आदि अंतः रसों के निस्सरण आदि का नियमन-संचालन करते हैं। नाभि के आसपास चार लम्बर गैग्लियाँन, उन्हीं से लगे हुए चार सेक्रल गैग्लियान तथा उससे नीचे एक कावसीजियल गैग्लियान कुल नौ गैग्लियान होते हैं। स्थूल शरीर के पोषण एवं विकास से सम्बन्धित लगभग सभी स्थूल संस्थानों से इनका सम्बन्ध होता है। आमाशय तथा पाचन संस्थान, गुर्दे तिल्ली, जिगर आदि के महत्त्व सर्व विदित हैं। इनका सबका नियंत्रण- सुसंचालन इन्हीं गैग्लियान केन्द्रों से होता है। नये शरीर निर्माण की प्रणाली, प्रजनन संस्थान भी अपनी अद्भुत क्षमताओं सहित इन्हीं केन्द्रों के नियंत्रण में कार्य करती है। नाभि क्षेत्र के लम्बर गैग्लियानों का हस्तक्षेप हृदय क्षेत्र में भी है। हृदय क्षेत्र में ग्यारह ‘थोरैसिक’ गैग्लियान होते हैं। कई क्षेत्रों में ‘लम्बर’ और ‘थोरैसिक’ दोनों मिलकर भी कार्य करते हैं। शरीर के महत्त्वपूर्ण संस्थानों का नाभि से सम्बन्ध शरीर शास्त्रियों के लिए रहस्य हो सकता है किन्तु आत्म विज्ञान से विदित है कि नाभिचक्र का वह चुम्बकत्व आजीवन बना रहता है जिसके आधार पर माता के शरीर से आवश्यक अनुदान खींचने में गर्भस्थ शिशु समर्थ रह सका था। ट्राँजेस्टर में छोटा सा ‘क्रिस्टल’ लगा रहता है। उस यंत्र की सारी मशीनरी अपना काम तभी ठीक तरह कर पाती है जब यह ‘क्रिस्टल’ सही स्थिति में हो। नाभि केन्द्र के चुम्बकत्व को भी यही संज्ञा दी जा सकती है। उसमें आदान-प्रदान की उभय पक्षीय क्षमता विद्यमान् है। अनन्त अन्तरिक्ष से आवश्यक शक्ति खींचने और धारण करने और समीपवर्ती अवयवों से लेकर दूरस्थ अंगों तक को वह अदृश्य एवं अविज्ञान सामर्थ्य प्रदान करने का कार्य इस चुम्बकत्व का ही है। शरीर को अनेक प्रकार की ऊर्जा चाहिए; जिन्हें वह अपनी चुम्बक शक्ति के द्वारा खींचता है। वातावरण का कितना प्रभाव शरीर पर पड़ता है इसे हर कोई जानता है। कहाँ का जलवायु शरीर पर क्या प्रभाव डालता है। इसे हम प्रत्यक्षतः देखते हैं। बहुमूल्य आहार प्राप्त होते रहने पर भी घटिया जलवायु के क्षेत्र में रहने वाले रुग्ण दुर्बल रहते हैं और स्वल्पकाल में ही जीवन समाप्त कर देते हैं। इसके विपरीत, जहाँ का वातावरण सशक्त है वहाँ के निवासी घटिया भोजन मिलने पर भी बलिष्ठ बने रहते हैं। मोटा तगड़ा शरीर भी सामान्य सा भार वहन करने और दौड़-धूप में संलग्न रहने के अतिरिक्त और कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य न कर सकेगा। प्रगतिशील मनुष्यों के शरीर में स्फूर्ति पाई जाती है। उनका प्रत्येक अवयव प्रशिक्षित कलाकारों की तरह अपना काम करने में कुशल होता है। इन्द्रियाँ काबू में रहती है और नियत निर्धारित क्रम से अपने सुव्यवस्थित क्रिया कौशल का परिचय देती है। यही कारण है कि वे सामान्य मनुष्यों की तुलना में कई गुने परिमाण में उत्कृष्ट स्तर का काम कर पाते हैं। यह उनकी सफलता का बहुत बड़ा कारण होता है। शरीर के लिए आवश्यक इस प्रकार की सूक्ष्म शक्तियाँ, मात्र अन्न, जल, वायु प्राप्त नहीं हो सकतीं, उसकी पूर्ति ब्रह्माण्ड व्यापी उन शक्ति स्रोतों से भी होती है जो दृश्य रूप में अनुभव में तो नहीं आते पर अपनी महत्ता सिद्ध करते रहते हैं। पृथ्वी का काम अपने भीतरी उत्पादनों से ही नहीं चल जाता, वरन् सूर्य से आने वाली गर्मी और रोशनी से उसे जीन संचार का लाभ मिलता है। न केवल सूर्य से वरन् वह अन्य ग्रहों से भी बहुत कुछ प्राप्त करती है। ग्रहों से ही क्यों उसका अपना उपग्रह चन्द्रमा तक ज्वार-भाटा से लेकर और भी न जाने क्या-क्या सहायता देकर धरती की सजीवता बनाये रहने में सहायता देता है। यदि वे अन्तर्ग्रही अनुदान न मिलें तो पृथ्वी निर्जीव, निस्तब्ध ही नहीं बन जाएगी वरन् अपना अस्तित्व बनाये रहने में भी समर्थ न हो सकेगी। ठीक यही बात मनुष्य शरीर के सम्बन्ध में भी लागू होती है। नाभि स्थल का शारीरिक दृष्टि से कोई विशेष महत्त्व भले ही न हो पर आध्यात्मिक दृष्टि से उसकी उपयोगिता आजीवन वैसी ही बनी रहती है जैसी कि भ्रूण काल में थी। पृथ्वी ध्रुव क्षेत्र में सन्निहित अपनी चुम्बकीय शक्ति से अन्तर्ग्रही ऊर्जा को आकर्षित करती और उससे अपनी महत्त्वपूर्ण आवश्यकताएँ पूरी करती है। ठीक इसी प्रकार नाभि चक्र का ध्रुव प्रदेश शरीर को समर्थ एवं सुव्यवस्थित बनाये रहने वाली विशिष्ट ऊर्जा को आकाश से खींचता है। यदि व चक्र प्रसुप्त स्थिति में है तो उसकी आकर्षण शक्ति न्यून होगी और मात्र आहार पर ही निर्वाह चलाना पड़ेगा किन्तु यदि नाभि चक्र के चुम्बकत्व को साधना योग द्वारा जाग्रत किया जा सके तो उसकी आकर्षण क्षमता सहज हो बढ़ जाएगी और उसकी प्रखरता के आधार पर इतना कुछ अदृश्य अनुदान प्राप्त किया जा सकेगा जो रक्त माँस आदि स्थूल सम्बन्धों की अपेक्षा कम नहीं वरन् कुछ अधिक ही उपयोगी है। अन्नमय कोश का प्रवेश द्वार नाभि चक्र है। इस केन्द्र की समर्थता एवं उपयोगिता सदा बनी रहती है। दिव्य शक्तियों का शरीर में प्रवेश इसी मार्ग से होता है। इस सन्दर्भ में योग ग्रन्थों में कितने ही उल्लेख मिलते हैं। यथा- पातंजलि योग दर्शन में नाभि चक्र की साधना से काया की भीतरी स्थिति की सूक्ष्म जानकारी मिलने का वर्णन हैं। नाभिचक्रे काय व्यूह ज्ञानम्-पातंजलि योग सूत्र नाभि चक्र से संयम करने से काय के चक्र व्यूह का ज्ञान होता है। ऐसा ही उल्लेख योग रसायन ग्रंथ में भी है- अन्नमय-कोश का प्रवेश द्वार: नाभि-चक्रनाभिचक्रे यदा कुर्याद्धारणाँ योगविद्यदि। शरीराभ्यन्तरे सर्वसंस्थानं तु विलोकयेत्-योग रसायन जिस काल में योगी नाभि चक्र में धारण करता है, उस समय वह शरीर के सम्पूर्ण अभ्यन्तर शरीर संस्थान को देख लेता है। केचित्तद्योगतः पिण्डा भूतेभ्यः संभवा क्वचित्। तस्मित्रन्नमय ; पिण्डो नाभिमण्डलस स्थितः॥ त्रिशिख ब्राह्मणोपनिशद् (रस, रक्त, माँस, मेद, अस्थि मज्जा, वीर्य आदि सप्त ) धातुओं के योग से प्राणी के पिण्डों की उत्पत्ति होती है। उनमें से नाभि मण्डल में अन्नमय पिण्ड है। नाभि चक्र में यह भौतिक जगत अवस्थित है। पंचा वृत्त – पाँच तत्त्वों से विनिर्मित विद्युत शक्ति का इससे ध्यान करना चाहिए। ऐसा ध्यान करने में साधक सभी भौतिक सिद्धियाँ प्राप्त कर लेता है। नाभि कन्द के नीचे कुण्डलिनी शक्ति का निवास है। अष्ट प्रकृति की प्रतीक अष्ट सिद्धियाँ उसमें कुण्डली मारकर बैठी हुई है। रावण किसी शस्त्र से मर नहीं सकता था क्योंकि उसकी नाभि में अमृत का कुण्ड था। उसे सुखाये बिना यह असुर वध संभव नहीं है। यह भेद राम को विभीषण ने बताया। राम ने वह कुण्ड सुखाकर रावण मारा। इससे प्रकट है कि शरीर की स्थिति सुदृढ़ बनाने के लिए नाभि चक्र के माध्यम से कितनी बड़ी सफलता प्राप्त की जा सकती है। अध्यात्म रामायण में यह प्रसंग इस प्रकार आता है- नाभि देशेऽमृतं तस्य कुण्डलाकार संस्थितम्। तच्छोशयान अस्त्रेण तस्य मृत्युस्ततो भवेत्॥ विभीशण वचः श्रुत्वा रामः शीघ्र पराक्रमः। पावकास्त्रैण संयोज्य नाभि विव्याव राक्षसः- अध्यात्म रामायण यह विभीषण की उक्ति है-संकेत है कि रावण की नाभि में कुण्डलाकार स्थित अमृत को अग्निबाण से सुखा दें, तभी उसकी मृत्यु होगी तब राम ने बड़ी फुर्ती से अपने पावकास्त्र से रावण की नाभि को बेध डाला। यह अमृतत्व पतनोन्मुख करके फुलझड़ी की तरह जलाकर तनिक सा विनोद भी खरीदा जा सकता है। उसे मधुमक्खी की तरह संचित करके अपना श्रेय और दूसरों का सुख बढ़ाया जा सकता है। प्रजनन संयंत्र के इर्द-गिर्द अनेकानेक क्षमताओं के दिव्य केन्द्र बिखरे हुए हैं। इनमें शरीर शास्त्री कुछ हारमोन ग्रन्थि स्रावों तथा उत्तेजना परक विद्युत प्रवाहों के संबंध में ही थोड़ी सी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इतने से भी वे मानते हैं कि मस्तिष्क के बाद अवयवों की दृष्टि से हृदय और स्फुरण की दृष्टि से काम संस्थान की महत्ता है। आत्म-विद्या के अनुसार नाभिचक्र प्राण सत्ता का – साहसिक पराक्रम शीलता एवं प्रतिभा को केन्द्र माना गया है । इस स्थान की ध्यान साधना करते हुए इस प्राण-शक्ति को निग्रहित और दिशा नियोजित किया जाता है। फलतः उसके सत्परिणाम भी ओजस्विता की वृद्धि के रूप में सामने आते हैं।

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कितने ही शारीरिक विकारों की जड़ अन्नमय कोश मे ही होती है | उनका निवारण दवा -दारू से नहीं , यौगिक साधनों से हो सकता है | जैसे संयम , चिकित्सा , शल्य चिकित्सा , व्यायाम , मालिश , विश्राम , उत्तम आहार विहार , जलवायु आदि से शारीरिक स्वस्थ्य मे बहुत कुछ अंतर् हो सकता है | वैसे ही ऐसी भी प्रक्रिया है जिनके द्वारा अन्न मय कोश को परिमार्जित एवँ परिपुष्ट किया जा सकता है और विविध विधि शारीरिक अपूर्णताओं से छुटकारा पाया जा सकता है |

ऐसी पद्धतियों मे

१. उपवास २. आसन ३. तत्व शुद्धि ४. तपश्चर्या

ये चार मुख्य हैं |

अन्नमय कोश की शुद्धि के चार साधन – १.उपवास

अन्नमय कोश की अनेक सूक्ष्म विकृतियों का परिवर्तन करने मे उपवास वही काम करता है जो चिकित्सक के द्वारा चिकित्सा के पूर्व जुलाब देने से होता है | ( चिकित्सक इसलिए जुलाब आदि देते हैं क्योकि दस्त होने से पेट साफ़ हो और औषधि अपना काम कर सके )

मोटे तौर पर उपवास के लाभ -पेट मे रुका अपच पचता है , विश्राम करने से पाचक अंग नव चेतना के साथ दूना काम करते हैं , आमाशय मे भरे अपक्व अन्न से जो विष बनता है वह ऐसे मे बनना बंद हो जाता है , आहार की बचत से आर्थिक लाभ होता है | डाक्टरों का यह भी निष्कर्ष है की स्वल्पाहारी दीर्घ जीवी होते हैं | ( ठूस- ठूस कर खाने वाले पेट को चैन ना लेने देने वाले लोगों की जीवनी शक्ति को नुक्सान पहुचता है, आयु कम होती है , रोग ग्रस्तता होती है )

गीता मे ‘विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः’ श्लोक मे बताया गया है की उपवास से विषय -विकारों की निवृति होती है | मन का विषय विकारों से रहित होना एक बहुत बड़ा मानसिक लाभ है उसे ध्यान मे रखते हुए प्रत्येक शुभ कार्य के साथ उपवास को भारतीय परमपराओं मे जोड़ दिया गया है | ( कन्यादान के दिन माँ-बाप उपवास करते हैं , अनुष्ठान के दिन आचार्य और यजमान , नौ दुर्गा मे भी आंशिक या पूर्ण उपवास की परंपरा है …आदि )

रोगियों के लिए उपवास को ‘जीवन मूरी’ कहा गया है | संक्रामक , कष्टसाध्य एवँ खतरनाक रोगों मे लंघन भी चिकित्सा का एक अंग है | ( निमोनिया , प्लेग , सन्निपात , टाइफाइड मे उपवास कराया जाता है )

इस तथ्य को हमारे ऋषियों ने अनिवार्य समझा था | इसी कारण हर महीने कई उपवासों का धार्मिक महत्व स्थापित किया था |

अन्नमय कोश की शुद्धि के लिए उपवास का विशेष महत्व है | शरीर मे कई जाति की उपत्यिकाएँ देखी जाती हैं , उन्हें शरीर शास्त्री ‘ नाड़ी -गुच्छक ‘ कहते हैं |वैज्ञानिक इन् नाड़ी गुच्छक के कार्यों का कुछ विशेष परिचय अभी प्राप्त नहीं कर पाए हैं , पर योगी लोग जानते हैं की ये उपत्यिकाएँ शरीर मे अन्नमय कोश की बंधन ग्रंथियां हैं | मृत्यु होते ही सब बंधन खुल जाते हैं और फिर एक भी गुच्छक दृष्टिगोचर नहीं होता | सब उपत्यिकाएँ अन्नमय कोश के गुण दोषों का प्रतीक हैं | ‘इन्धिका’ जाति की उपत्यिकाएँ चंचलता , अस्थिरता , उद्विग्नता की प्रतीक हैं | जिन व्यक्तियों मे इस जाति के नाडी गुच्छक अधिक हों तो उनका शरीर एक स्थान पर बैठकर काम न कर सकेगा | ‘दीपिका’ जाति की उपत्यिकाएँ जोष , क्रोध ,शारीरिक उष्णता, अधिक पाचन ,गर्मी ,खुश्की आदि उत्पन्न करेंगी | ऐसे गुच्छकों की अधिकता वाले रोग चर्म रोग , फोड़ा , फुंसी , नकसीर फूटना , पीला पेशाब , आँखों मे जलन आदि रोगों के शिकार होते हैं | इसी प्रकार अन्य गुच्छक मोचिका , पूषा , चन्द्रिका आदि हैं इनकी अधिकता भिन्न -भिन्न प्रकार के रोगों के कारण बनते हैं | ऐसे उपत्यिकाओं की भिन्न भिन्न ९६ जातियां मानी जाती हैं | ये ग्रंथियां ऐसी हैं जो शारीरिक स्थिति को अच्छानुकूल बनाने मे बाधक होती हैं | मनुष्य चाहता है की मै अपने शरीर को ऐसा बनाऊ , वह उपाय भी करता है पर कई बार वे उपाय सफल नहीं होते | कारण यह है की ये उपत्यिकाएँ शरीर मे भीतर ही भीतर ऐसी क्रिया और प्रेरणा उत्पन्न करती हैं जो बाह्य प्रयत्नों को सफल नहीं होने देती और मनुष्य अपने आपको बार बार असफल एवँ असहाय महसूस करता है | अन्नमय कोश को शरीर से बांधने वाली ये उपत्यिकाएँ शारीरिक एवँ मानसिक अकर्मों मे उलझकर विकृत होती हैं तथा सत्कर्मों से सुव्यवस्थित रहती है | आहार विहार का संयम तथा सात्विक दिनचर्या ठीक रखना , प्रकृति के आदेशों पर चलने वालों की उपत्यिकाएँ सुव्यवस्थित रहती हैं | साथ ही कुछ अन्य यौगिक उपाय भी हैं जो उन आंतरिक विकारों पर काबू पा सकते हैं जिन्हें केवल वाह्य उपचारों से सुधारना कठिन है |

उपवास से उपत्यिकाओं के संशोधन , परिमार्जन और सुसंतुसन से बड़ा सम्बन्ध है | योग साधना मे उपवास का एक सुविस्तृत विज्ञान है | अमुक अवसर पर ; अमुक मास मे ; अमुक मुहूर्त मे ; अमुक प्रकार से उपवास करने का अमुक फल होता है | ऐसे आदेश शास्त्रों मे जगह जगह मिलते हैं | ऋतुओं के अनुसार शरीर की ६ अग्नियाँ न्यूनाधिक होती रहती हैं | ऊष्मा , बहुवृच , ह्वादी, रोहिता , आत्पता , व्याती यह ६ शरीरगत अग्नियाँ ग्रीष्म से लेकर बसंत तक ६ ऋतुओं मे क्रियाशील रहती हैं |

इनमे से प्रत्येक के गुण भिन्न -भिन्न हैं |

१. उत्तरायण , दक्षिणायन की गोलार्ध स्थिति २. चन्द्रमा की बढ़ती घटती कलाएं ३. नक्षत्रों का भूमि पर आने वाला प्रभाव ४. सूर्य की अंश किरणों का मार्ग ,,

इनसे ऋतू अग्नियों का सम्बन्ध है अतः ऋषियों ने ऐसे पुण्य पर्व निश्चित किये हैं जिससे अमुक प्रकार से उपवास करने पर अमुक प्रभाव हो |

उपवासों के पांच भेद हैं —

१. पाचक ( जो पेट की अपच , अजीर्ण , कोष्ठबद्धता को पचाते हैं ) २. शोधक ( जो भूखे रहने पर रोगों को नष्ट करते हैं इन्हें लंघन भी कहते हैं ) ३. शामक ( जो कुविचारों , मानसिक विकारों , दुष्प्रवृतियों एवँ विकृत उपत्यिकाओं को शमन करते हैं ) ४. आनस ( जो किसी विशेष प्रयोजन के लिए , दैवी शक्ति को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए किये जाते हैं ) ५. पावस ( जो पापों के प्रायश्चित के लिए होते हैं ) ।

आत्मिक और मानसिक स्थिति के अनुरूप कौन सा उपवास उपयुक्त होगा और उसके क्या नियमोपनियम होने चाहिए इसका निर्णय करने के लिए गंभीरता की आवश्यकता है |


पाचक उपवास मे भोजन तब तक छोड़ देना चाहिये जब तक भूख ना लगे | एक दो दिन का उपवास करने से कब्ज पच जाता है | पाचक उपवास मे नीम्बू का रस या अन्य पाचक औषधि की सहायता ली जा सकती है | शोधक उपवास के साथ विश्राम आवश्यक है यह लगातार आवश्यक है जबतक रोग खतरनाक स्थिति से अलग हट जाए | शामक उपवास दूध , छाछ फलों का रस आदि पर चलते हैं | इसमें स्वाध्याय , मनन , एकांत सेवन , मौन , जप , ध्यान , पूजा , प्रार्थना आदि आत्म शुद्धि के उपचार भी साथ मे करने चाहिए | अनास उपवास मे सूर्य की किरणों द्वारा अभीष्ट दैवी शक्ति का आह्वान करना चाहिए | पावस उपवास मे केवल जल लेना चाहिए और सच्चे ह्रदय से प्रभु से क्षमा याचना करना चाहिए की भविष्य मे वैसा अपराध नहीं होगा |

साधारणतः सप्ताह मे एक दिन उपवास अवश्य रहना चाहिए | गायत्री साधक के लिए रविवार सर्वाधिक उपयुक्त है |

अन्नमय कोश की शुद्धि के चार साधन — २.आसन

ऋषियों ने आसनों को योग साधना मे इसलिए प्रमुख स्थान दिया है क्योकि ये स्वस्थ्य रक्षा के लिए अतीव उपयोगी होने के अतिरिक्त मर्म स्थानों मे रहने वाली ‘ हव्य- वहा ‘ और ‘कव्य- वहा ‘ तडित शक्ति को क्रियाशील रखते हैं| मर्म स्थल वे हैं जो अतीव कोमल हैं और प्रकृति ने उन्हें इतना सुरक्षित बनाया है की साधारणतः उन तक वाह्य प्रभाव नहीं पहुचता |

आसनों से इनकी रक्षा होती है | इन् मर्मों की सुरक्षा मे यदि किसी प्रकार की बाधा पड जाए तो जीवन संकट मे पड सकता है | ऐसे मर्म स्थान उदर और छाती के भीतर विशेष हैं | कंठ -कूप , स्कन्द , पुच्छ , मेरुदंड और वाह्य रंध्र से सम्बंधित ३३ मर्म हैं | इनमे कोई आघात लग जाए , रोग विशेष के कारण विकृति आ जाए , रक्ताभीषण रुक जाए और विष -बालुका जमा हो जाए तो देह भीतर ही भीतर घुलने लगती है | बाहर से कोई प्रत्यक्ष या विशेष रोग दिखाई नहीं पड़ता , पर भीतर ही भीतर देह खोखली हो जाती है | नाडी मे ज्वर नहीं होता पर मुह का कड़वा पन, शरीर मे रोमांच , भारीपन , उदासी , हडफुटन , सिर मे हल्का स दर्द , प्यास आदि भीतरी ज्वर जैसे लक्षण दिखाए पड़ते हैं | वैद्य डाक्टर कुछ समझ नहीं पाते , दवा -दारु देते हैं पर कुछ विशेष लाभ नहीं होता |

मर्मों मे चोट पहुचने से आकस्मिक मृत्यु हो सकती है | तांत्रिक अभिचारी मारण का प्रयोग करते हैं तो उनका आक्रमण इन् मर्म स्थलों पर ही होता है | हानि , शोक , अपमान आदि की कोई मानसिक चोट लगे तो मर्म स्थल क्षत -विक्षत हो जाती है और उस व्यक्ति के प्राण संकट मे पड जाते हैं | मर्म अशक्त हो जाएँ तो गठिया , गंज , स्वेत्कंठ, पथरी , गुर्दे की शिथिलता , खुश्की , बवासीर जैसे न ठीक होने वाले रोग उपज पड़ते हैं |

सिर और धड मे रहने वाले मर्मों मे ‘हव्य- वहा’ नामक धन विद्युत का निवास और हाथ पैरों मे ‘कव्य- वहा’ ऋण विद्युत की विशेषता है | दोनों का संतुलन बिगाड जाए तो लकवा , अर्धांग , संधिवात जैसे उपद्रव खड़े होते हैं |

कई बार मोटे , तगड़े स्वस्थ दिखाई पड़ने वाले मनुष्य भी ऐसे मंद रोगों से ग्रसित हो जाते हैं , जो उनकी शारीरिक अच्छी स्थिति को देखते हुए न होने चाहिए थे | इन् मार्मिक रोगों का कारण मर्म स्थानों की गडबडी है | कारण यह है की साधारण परिश्रम या कसरतों द्वारा इन मर्म स्थानों का व्यायाम नहीं हो पाता | औषधियों की पहुच वहाँ तक नहीं होती | शल्य क्रिया या सूची -भेद ( इंजेक्सन ) भी उनको प्रभावित करने मे समर्थ नहीं होते | उस विकत गुत्थी को सुलझाने मे केवल ‘योग -आसन ‘ ऐसे तीक्ष्ण अस्त्र हैं जो मर्म शोधन मे अपना चमत्कार दिखाते हैं |

ऋषियों ने देखा की अच्छा आहार -विहार रखते हुए भी, विश्राम -व्यायाम की व्यवस्था रखते हुए भी कई बार अज्ञात सूक्ष्म कारणों से मर्म स्थल विकृत हो जाता है और उसमे रहने वाली हव्य-वहा , कव्य -वहा तडित शक्ति का संतुलन बिगड़ जाने से बीमारी और कमजोरी आ धमकती है , जिससे योग साधना मे बाधा पड़ती है |

इस कठिनाई को दूर करने के लिए उन्होंने अपने दीर्घकालीन अनुसंधान और अनुभव द्वारा ‘आसन -क्रिया’ का आविष्कार किया | आसनों का सीधा प्रभाव हमारे मर्म स्थलों पर पड़ता है | प्रधान नस-नाड़ियों और मांसपेशियों के अतिरिक्त सूक्ष्म कशेरुकाओ का भी आसनों द्वारा ऐसा आकुंचन -प्राकुंचन होता है कि उसमे जमे हुए विकार हट जाते हैं तथा फिर नित्य सफाई होते रहने से नए विकार जमा नहीं होते | मर्म स्थलों की शुद्धि , स्थिरता एवँ परिपुष्टि के लिए आसनों को अपने ढंग का सर्वोत्तम उपचार कहा जा सकता है |

(( आसन अनेक हैं उसमे से ८४ प्रधान हैं इनकी विस्तृत व्याख्या के लिए पूज्य पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा लिखित पुस्तक ‘बलवर्धक व्यायाम’ व् आसन प्राणायाम संबंधी अन्य साहित्य देखें ))

आठ आसन ऐसे हैं जो सभी मर्म स्थानों पर अच्छा प्रभाव डालते हैं …

१. सर्वांगासन २. बद्ध-पद्मासन ३.पाद हस्तासन ४. उत्कटासन ५. पश्चिमोत्तान आसन ६. सर्पासन ७. धनुरासन ८. मयूरासन

इन् सभी से जो लाभ होता है उसका सम्मिलित लाभ सूर्य-नमस्कार से होता है | यह एक ही आसन कई आसनों के मिश्रण से बना है | इसे प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व करना चाहिए |

अन्नमय कोश की शुद्धि के चार साधन –३. तत्व-शुद्धि )

यह श्रृष्टि पंच तत्वों से बनी हुई है | प्राणियों के शरीर भी इन्ही तत्वों से बने हुए हैं | मिटटी , जल , वायु , अग्नि और आकाश इन् पांच तत्वों का यह सबकुछ संप्रसार है | जितनी वस्तुवें दृष्टिगोचर होती हैं या इन्द्रियों द्वारा अनुभाव मे आती हैं उन सब की उत्पत्ति पंच तत्वों द्वारा हुई हैं | वस्तुओं का परिवर्तन , उत्पत्ति , विकास तथा विनास इन् तत्वों की मात्रा मे परिवर्तन आने से ही होता है | यह प्रसिद्द है की जलवायु का स्वस्थ्य पर प्रभाव पड़ता है शीत प्रधान देशों के तथा यूरोपियन देशों का रंग रूप , कद -स्वस्थ्य अफ्रीका के उष्ण प्रदेश वासियों के रंग -रूप , कद , स्वस्थ्य से सर्वथा भिन्न होता है | पंजाबी , काश्मीरी , बंगाली , मद्रासी लोगों के शरीर तथा स्वस्थ्य की भिन्नता प्रत्यक्ष है | जलवायु का ही अंतर् है |

किन्ही प्रदेशों मे मलेरिया , पीला बुखार , पेचिस , चर्म रोग , फील पावं , कुष्ट आदि रोगों की बाढ़ सी रहती है और किन्ही स्थानों की जलवायु ऐसी होती है की वहाँ जाने पर तपेदिक सरीखे कष्ट साध्य रोग भी अच्छे हो जाते हैं | पशु पक्षी , घास -अन्न , फल , औषधि आदि के रंग ,रूप ,स्वस्थ्य , गुण , प्रकृति आदि मे भी जलवायु के अनुसार अंतर पड़ता है इस प्रकार वर्षा, गर्मी -सर्दी का तत्व-परिवर्तन प्राणियों मे अनेक प्रकार के सूक्ष्म परिवर्तन कर देता है |

आयुर्वेद शास्त्र मे वात , पित्त , कफ का असंतुलन रोगों का कारण बताया है | वात का अर्थ है वायु , पित्त का अर्थ है गर्मी और कफ का अर्थ है जल | पंच तत्वों मे पृथ्वी शरीर का स्थिर आधार है | मिटटी से ही शरीर बना है और जला देने या गाड़ देने पर मिटटी रूप मे ही इसका अस्तित्व रह जाता है | इसलिए पृथ्वी तत्व शरीर का स्थिर आधार होने से वह रोग आदि का कारण नहीं बनता |

दूसरे आकाश का सम्बन्ध मन से बुद्धि और इन्द्रियों की सूक्ष्म तन्मात्राओं से है | स्थूल शरीर पर जलवायु और गर्मी का ही प्रभाव पड़ता है और उन्ही प्रभावों के आधार पर रोग एवँ स्वस्थ्य बहुत कुछ निर्भर रहते हैं | वायु की मात्रा मे अंतर् आ जाने से गठिया , लकवा , दर्द , कंप , अकडना , गुल्म , हड्फुतन, नाडीविक्षेप आदि रोग होते हैं | तत्व के विकास से फोड़े -फुंसी , चेचक ज्वर, रक्त पित्त , हैजा , दस्त , क्षय ,स्वास उपदंश , रक्त विकार आदि बढते हैं |

जल तत्व की गडबडी से जलोदर ,पेचिस, संग्रहणी, मलमूत्र, प्रमेह स्वप्न दोष , सोम , प्रदर , जुकाम , खांसी आदि रोग पैदा होते हैं | अग्नि की मात्रा कम हो तो शीत , जिकाम , अकडन , अपच , शिथिलता शरीखे रोग उठ खड़े होते हैं | इस प्रकार अन्य तत्वों का घटना बढ़ना अनेक रोग उत्पन्न करता है |

आयुर्वेद के मत से मत से विशेष प्रभाव शाली , गतिशील सक्रीय एवँ स्थूल शरीर को स्थिर करने वाले कफ वात पित्त अर्थात जल वायु गर्मी ही है और दैनिक जीवन मे जो उतारचढाव होते रहते हैं उनमे इन् तीनों का ही प्रधान कारण होता है | फिर भी शेष दो तत्व पृथ्वी और आकाश शरीर पर स्थिर रूप मे काफी प्रभाव डालते हैं |

मोटा या पतला होना , लंबा या ठिगना होना , रूपवान या कुरूप होना , गोरा या काला होना , कोमल या सुदृढ़ होना शरीर मे पृथ्वी तत्व की स्थिति से सम्बंधित है | इसी प्रकार चतुरता – मूर्खता , सदाचार -दुराचार , नीचता -महानता , तीव्र बुद्धि , दूरदर्शिता व खिन्नता -प्रसन्नता एवँ गुण , कर्म , स्वभाव , इच्छा , आकांछा , भावना , आदर्श , लक्ष्य आदि बातें इस पर निर्भर रहती हैं की आकाश तत्व की स्थिति क्या है ? उन्माद , सनक , दिल की धडकन , अनिद्रा , पागलपन – दु: स्वप्न , मिर्गी , मूर्छा , घबडाहट , निराशा आदि रोग मे भी आकाश ही प्रधान कारण होता है | तत्वों की मात्रा मे गडबडी पड़ जाने से स्वस्थ्य मे निश्चित रूप से खड़ाबी आ जाती है | जल वायु सर्दी गर्मी ( ऋतू प्रभाव ) के कारण रोगी मनुष्य निरोग और निरोग रोगी बन सकता है |

योग साधकों को जान लेना चाहिए की पंच तत्वों से बने शरीर को सुरक्षित रखने का महत्व पूर्ण आधार यह है की देह मे सभी तत्व स्थिर मात्रा मे रहें | गायत्री के पांच मुख शरीर मे पांच तत्व बनकर निवास करते हैं यही पंच ज्ञानेन्द्रियों और पंच कर्मइन्द्रियों को क्रियाशील रखते हैं | लापरवाही , अव्यवस्था और आहार -विहार मे असंयम से तत्वों का संतुलन बिगड़ कर रोग ग्रस्त होना एक प्रकार से पंच मुखी गायत्री माता का देह -परमेश्वरी का तिरष्कार करना है |

तपश्चर्या - अन्नमय कोश की साधना -

तप का अर्थ है- उष्णता, गति, क्रियाशीलता, घर्षण, संघर्ष, तितिक्षा, कष्ट सहना। किसी वस्तु को निर्दोष, पवित्र एवं लाभदायक बनाना होता है तो उसे तपाया जाता है। सोना तपने से खरा हो जाता है। डॉक्टर पहले अपने औजारों को गरम कर लेते हैं, तब उनसे ऑपरेशन करते हैं। चाकू को शान पर न घिसा जाए तो काटने की शक्ति खो बैठेगा। हीरा खराद पर न चढ़ाया जाए तो उसमें चमक और सुन्दरता पैदा न होगी। व्यायाम का कष्टसाध्य श्रम किए बिना कोई मनुष्य पहलवान नहीं हो सकता। अध्ययन का कठोर श्रम किए बिना विद्वान् बनना सम्भव नहीं।हीं माता बच्चे को गर्भ में रखने एवं पालन- पोषण का कष्ट सहे बिना मातृत्त्व का सुख प्राप्त नहीं कर सकती। कपड़ों को धूप में न सुखाया जाए तो उनमें बदबू आने लगेगी। कोठी में बन्द रखा हुआ अन्न धूप में न डाला जाए तो घुन लग जाएगा। ईंट यदि भट्ठे में न पकें तो उनमें मजबूती नहीं आ सकती। बिना पके भोजन प्राण रक्षा नहीं कर सकता। प्राचीनकाल में पार्वती ने तप करके मनचाहा फल पाया था। भगीरथ ने तप करके गंगा को भूलोक में बुलाया था। ध्रुव के तप ने भगवान् को द्रवित कर दिया था। तपस्वी लोग कठोर तपश्चर्या करके सिद्धियाँ प्राप्त करते थे। रावण, कुम्भकरण, मेघनाद, हिरण्यकशिपु, भस्मासुर आदि ने भी तप के प्रभाव से विलक्षण वरदान पाए थे। आज भी जिस किसी को जो कुछ प्राप्त हुआ है, वह तप के ही प्रभाव से प्राप्त हुआ है। ईश्वर तपस्वी पर प्रसन्न होता है और उसे ही अभीष्ट आशीर्वाद देता है। जो धनी, सम्पन्न, सुन्दर, स्वस्थ, विद्वान्, प्रतिभाशाली, नेता, अधिकारी आदि के रूप में चमक रहे हैं, उनकी चमक वर्तमान के या पिछले तप के ऊपर ही अवलम्बित है। यदि वे नया तप नहीं करते और पुरानी तपश्चर्या की पूँजी को खा रहे हैं, तो उनकी चमक पूर्व पूँजी चुकते ही धुँधली हो जाएगी। जो लोग आज गिरे हुए हैं, उनके उठने का एकमात्र मार्ग है- तप। बिना तप के कोई भी सिद्धि, कोई भी सफलता नहीं मिल सकती, न सांसारिक और न आत्मिक। कल्याण की ताली तप की तिजोरी में रखी हुई है। जो उसे खोलेगा, वही अभीष्ट वस्तु पायेगा। दोनों हथेलियों को रगड़ा जाए तो वे गरम हो जाती हैं। दो लकड़ियों को घिसा जाए तो अग्नि पैदा हो जाएगी। गति, उष्णता, क्रिया, यह रगड़ का परिणाम है। मशीन को चलाने के लिए उसके किसी भी भाग में धक्का या दचका लगाना पड़ेगा, अन्यथा कीमती से कीमती मशीन भी बन्द ही पड़ी रहेगी। शरीर को झटका लगाने के लिए व्यायाम या परिश्रम करना आवश्यक है। आत्मा में तेजस्विता, सामर्थ्य एवं चैतन्यता उत्पन्न करने के लिए तप करना होता है। बर्तन को न माँजने, मका न को न झाड़ने से अशुद्धि और मलिनता पैदा हो जाती है। तपश्चर्या छोड़ देने पर आत्मा भी अशक्त, निस्तेज एवं विकारग्रस्त हो जाती है। आलसी और आरामतलब शरीर में अन्नमय कोश की स्वस्थता स्थिर नहीं रह सकती। इसलिए उपवास, आसन, तत्त्वशुद्धि के साथ ही तपश्चर्या को प्रथम कोश की सुव्यवस्था का आवश्यक अंग बताया गया है। प्राचीनकाल में तपश्चर्या को बड़ा महत्त्व दिया जाता था। जो व्यक्ति जितना परिश्रमी, कष्टसहिष्णु, साहसी, पुरुषार्थी एवं क्रियाशील होता था, उसकी उतनी ही प्रतिष्ठा होती थी। धनी, अमीर, राजा- महाराजा सभी के बालक गुरुकुलों में भेजे जाते थे, ताकि वे कठोर जीवन की शिक्षा प्राप्त करके अपने को इतना सुदृढ़ बना लें कि आपत्तियों से लड़ना और सम्पत्ति को प्राप्त करना सुगम हो सके। आज तप के, कष्टसहिष्णुता के महत्त्व को लोग भूल गए हैं और आरामतलबी, आलस्य, नजाकत को अमीरी का चिह्न मानने लगे हैं। फलस्वरूप पुरुषार्थ घटता जा रहा है और योग्यता द्वारा उपार्जन करने की अपेक्षा लोग छल, धूर्तता एवं अन्याय द्वारा बड़े बनने का प्रयत्न कर रहे हैं। गायत्री साधकों को तपस्वी होना चाहिए। अस्वाद व्रत, उपवास, ऋतु- प्रभावों का सहना, तितिक्षा, घर्षण, आत्मकल्प, प्रदातव्य, निष्कासन, सा धन, ब्रह्मचर्य, चान्द्रायण, मौन, अर्जन आदि तपश्चर्या की विधि पहले ही विस्तार से लिख चुके हैं। उनकी पुनरुक्ति करने की आवश्यकता नहीं। यहाँ तो इतना कहना पर्याप्त होगा कि अन्नमय कोश को स्वस्थ रखना है तो शरीर और मनका कार्य व्यस्त रखना चाहिए। श्रम, कर्त्तव्यपरायणता, जागरूकता और पुरुषार्थ को सदा साथ रखना चाहिए। समय को बहुमूल्य सम्पत्ति समझकर एक क्षण को भी निरर्थक न जाने देना चाहिए। परोपकार, लोकसेवा, सत्कार्य के लिए दान, यज्ञ भावना से किए जाने वाला परमार्थी जीवन प्रत्यक्ष तप है। दूसरों के लाभ के लिए अपने स्वार्थों का बलिदान करना तपस्वी जीवन का प्रधान चिह्न है। आज की स्थिति में प्राचीनकाल की भाँति तो तप नहीं किए जा सकते। अब शारीरिक स्थिति भी ऐसी नहीं रह गई कि भगीरथ, पार्वती या रावण के जैसे उग्र तप किए जा सकें। दीर्घकाल तक निराहार रहना या बिना विश्राम किए लम्बे समय तक साधनारत रहना आज सम्भव नहीं है। वैसा करने से शरीर तुरन्त पीड़ाग्रस्त हो जाएगा। सतयुग में लम्बे समय तक दान, तप होते थे, क्योंकिक्योंकि उस समय शरीर में वायु तत्त्व प्रधान था। त्रेता में शरीरों में अग्नि तत्त्व की प्रधानता थी। द्वापर में जल तत्त्व अधिक था। उन युगों में जो साधनाएँ हो सकती थीं, थीं आज नहीं हो सकतीं, तीं क्योंकिक्यों आज कलियुग में मानव देहों में पृथ्वी तत्त्व प्रधान है। पृथ्वी तत्त्व अन्य सभी तत्त्वों से स्थूल है, इसलिए आधुनिक काल के शरीर उन तपस्याओं को नहीं कर सकते जो सतयुग, त्रेता आदि में आसानी से होती थीं।थीं दूसरी बात यह है कि वर्तमान समय में सामाजिक, आर्थिक बौद्धिक व्यवस्थाओं में परिवर्तन हो जाने से मनुष्य के रहन- सहन में बड़ा अन्तर पड़ गया है। बड़े नगरों में निवासियों को यान्त्रिक सभ्यता के बीच में रहने के फलस्वरूप शारीरिक श्रम बहुत कम करना पड़ता है और अधिकांश में कृत्रिम वातावरण के कारण शुद्ध जलवायु से भी वञ्चित रहना पड़ता है। ऐसी अवस्था में शरीर को पूर्वकालीन तप योग्य रहना कहाँ सम्भव हो सकता है? कुछ समय पूर्व तक नेति, धोति, वस्ति, न्योली, वज्रोली, कपालभाति आदि क्रियाएँ आसानी से हो जाती थीं, थीं उनके करने वाले अनेक योगी देखे जाते थे; पर अब युग- प्रभाव से उनकी साधना कठिन हो गई है। कोई बिरले ही हठयोग में सफल हो पाते हैं। जो किसी प्रकार इन क्रियाओं को करने भी लगते हैं, वे उनसे वह लाभ नहीं उठा पाते जो इन क्रियाओं से होना चाहिए। अधिकांश हठयोगी तो इन कठिन साधनाओं के कारण किन्हीं कष्टसाध्य रोगों से ग्रसित हो जाते हैं। रक्त, पित्त, अन्त्रदाह, मूलाधार, कफ, अनिद्रा जैसे रोगों से ग्रसित होते हुए हमने अनेक हठयोगी देखे हैं। इसलिए वर्तमान काल की शारीरिक स्थितियों का ध्यान रखते हुए तपश्चर्या में बहुत सावधानी बरतने की आवश्यकता है। आज तो समाज सेवा, ज्ञान- प्रचार, स्वाध्याय, दान, इन्द्रिय संयम आदि के आधार पर ही हमारी तप साधना होनी चाहिए।

..... SHIVOHAM...