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कैवल्य उपनिषद के अनुसार तीन की संख्या का क्या महत्व है?

तीन की संख्या का महत्व;-

23 FACTS;-

1-वैदिक चिंतन में तीन की संख्या बड़ी महत्वपूर्ण है। और पहले तो ऐसा सोचा जाता था कि यह सिर्फ सांकेतिक है, लेकिन विज्ञान जब गहराई में गया तो विज्ञान को भी लगा कि तीन की इकाई महत्वपूर्ण मालूम पड़ती है। क्योंकि जब अणु का विस्फोट किया तो पता चला कि अणु के जो घटक अंग हैं, वे तीन हैं ...‘इलेक्ट्रॉन’, ‘न्यूट्रॉन ‘, ‘पॉजीट्रॉन’।तीन से मिलकर ही इस जगत की मौलिक इकाई निर्मित हुई....तीन एलिमेंट फायर, एयर ,वॉटर । और फिर उसी मौलिक इकाई पर सारा जगत निर्मित है। अगर इस जगत को हम नीचे तोड़ते जाएं , तो तीन की संख्या उपलब्ध होती है.. फायर- एयर, फायर-वॉटर,एयर-फायर, एयर-वॉटर और वॉटर-एयर, वॉटर-फायर।अथार्त प्रत्येक एलिमेंट के तीन और तीन के बाद तोड़े तो कुछ भी उपलब्ध नहीं होता, शून्य हो जाता है। उस शून्य को हमने परम सत्य कहा है।उस अनाम शून्य से जो पहली इकाई निर्मित होती है तीन की, उसको हमने ब्रह्मा, विष्णु, महेश कहा है।और ब्रह्मा, विष्णु महेश कहना और भी अर्थों में गहरा है। यह तीन की संख्या ही की बात नहीं है बल्कि ‘इलेक्ट्रॉन’, ‘पॉजीट्रॉन ‘ और ‘न्यूट्रॉन ‘ जिन चीजों की सूचना देते हैं, ये तीन शब्द भी उन्हीं की सूचना देते हैं।

2-इन तीन विद्युतकण में जिनसे जगत का मौलिक आधार बना हुआ है; विज्ञान की दृष्टि में एक तत्व पॉजिटिव है, एक नेगेटिव है और एक न्यूट्रल । और इन तीन ..ब्रह्मा विष्णु महेश में भी एक ‘पाजिटिव’ है, एक ‘निगेटिव ‘ है और एक ‘ न्यूट्रल ‘ है। इसमें ब्रह्मा ‘पॉजिटिव है,क्योंकि ब्रह्मा को हिंदू चिंतन मानता है कि वह सृष्टि का आधार है। उनसे ही सृष्टि निर्मित होती है ..वह निर्माता है।शिव विध्वंसक है ,निषेधक है। वह तत्व इस सृष्टि को लीन करता है, विलीन करता है, समाप्त करता है... ’निगेटिव ‘ है। विष्णु इन दोनों के मध्य में तटस्थ है, वह सम्हालता है। न वह निर्माण करता है, न वह विध्वंस करता है। वह केवल बीच का सहारा है। जितनी देर सृष्टि होती है, वह तटस्थ भाव से उसे सम्हालता है।वास्तव में, न तो ‘न्यूट्रॉन’, ‘पॉजीट्रॉन ‘ शब्दों का कोई मूल्य है क्योंकि वे भी दिये गये नाम हैं।और न ब्रह्मा, विष्णु महेश का कोई मूल्य है ..वे भी दिये गये नाम हैं। लेकिन धर्म जब नाम देता है और विज्ञान जब नाम देता है, तो एक फर्क होता है।

3-विज्ञान के शब्द ‘इमपर्सनल’ /अवैयक्तिक होंगे और धर्म के शब्द ‘पर्सनल’ /वैयक्तिक होंगे। शब्द से एक व्यक्ति निर्मित होना चाहिए।लेकिन कहीं यह भ्रांति न हो जाए कि यह तीन हैं, इसलिए हमने त्रिमूर्ति निर्मित की। ब्रह्मा, विष्णु महेश के तीन चेहरे एक ही मूर्ति में बनाए। लेकिन यह जिससे काम कर रहे हैं, वह इन तीनों के भीतर एक है ..उसका कोई चेहरा नहीं है। यह तीन चेहरे ..तीन प्रक्रियाओं के हैं। स्वयं अस्तित्व का कोई चेहरा नहीं है ..वह ‘फेसलेस’ है।जैसे ‘न्यूट्रॉन ‘से कोई संबध निर्मित नहीं हो सकता। आप केवल प्रयोगशाला में उसका उपयोग कर सकते हैं, गतिमान कर सकते हैं क्योंकि ‘न्यूट्रॉन’ कोई व्यक्ति नहीं है। लेकिन शिव से आपका संबंध निर्मित हो सकता है, क्योंकि वह व्यक्ति है। धर्म और विज्ञान जो शब्दावली का प्रयोग करते हैं, उसमें यह बुनियादी फर्क है।इसलिए अगर ब्रह्मा, विष्णु महेश की त्रिमूर्ति मे , तीनों चेहरे अलग कर दें, फिर जो बच जाए.. वह अस्तित्व का सूचक है।

4-वास्तव में, ये तीनों चेहरे अस्तित्व की तीन अभिव्यक्तियां हैं और विज्ञान स्वीकार करता है कि इन तीन शक्तियों के बिना अस्तित्व निर्मित नहीं हो सकता।पॉजिटिव न हो तो अस्तित्व का जन्म नहीं होता।निगेटिव न हो तो जो चीज जन्म हो जाए वह फिर कभी रूपांतरित नहीं हो सकती। और अगर स्थापक न हो, तो जन्म भी हो जाए तो कोई चीज स्थिति को उपलब्ध नहीं हो सकती। किसी भी वस्तु के होने के लिए ये तीन तो अनिवार्य हैं। तो धर्म के विज्ञान के ये तीन मौलिक अणु हैं ...ब्रह्मा, विष्णु महेश। ये तीन उसके नाम हैं। फिर जगत में जितने भी देवी ,देवता निर्मित हुए हैं, नाम निर्मित हुए हैं, उन तीन में से किसी एक से संबंधित होंगे। इसलिए हिंदू कहते हैं कि फलां अवतार विष्णु का अवतार है। उसका मतलब यह है, वह विष्णु की कोटि में आता है। फलां शिव का अवतार है; तो वह शिव की कोटि में आता है। फलां अवतार ब्रह्मा का अवतार है, तो वह ब्रह्मा की कोटि में आता है। लेकिन सभी अवतार विष्णु के हैं क्योंकि ब्रह्मा का काम निर्माण के साथ समाप्त हो जाता है ...अवतरण की कोई जरूरत ही नहीं है।शिव का काम विध्वंस में पड़ेगा ..अवतरण की कोई जरूरत ही नहीं है।जब तक सृष्टि है; विष्णु ही अवतरित होते चले जाते है।

5-तो चाहे श्रीराम हों या श्रीकृष्ण ...कोई भी हो, विष्णु ही अवतरित होते है।निर्माता एक बार इशारा करेगा, निर्माण हो जाएगा। विध्वंसक एक बार विध्वंस करेगा, समाप्त हो जाएगा। लेकिन जो पूरे समय सम्हालेगा, उसे ही बार -बार आना पड़ेगा..विष्णु के अवतार की शृंखला यही कहती है ।इसलिए अवतरण सिर्फ विष्णु का है।हिंदू दृष्टि से ये तीन विचार ऋषि ने ले लिये हैं। लेकिन औरों की भी गणना की है।इंद्र परम शक्ति का अथार्त ब्रह्मा, विष्णु महेश की कोटि का नाम नहीं है। इसलिए सारे जगत के धर्मों ने ईश्वर की भी धारणा की और देवताओं की भी धारणा की। देवता की धारणा उनके लिए है जो ईश्वर की धारणा तक न जा सकें। तो तीन बातें महत्वपूर्ण है।एक तो परम अस्तित्व निराकार है।ब्रह्मा, विष्णु महेश को हमने केवल एक संसार का निर्माता, सम्हालनेवाला, मिटानेवाला माना है। वे इस संसार के ही हिस्से हैं। जिस दिन संसार विलीन हो जाता है, वे भी विलीन हो जाते हैं क्योंकि वे भी अस्तित्व के बाहरी चेहरे हैं ।तब जो शेष रह जाता है, उसमें प्रवेश ही समाधि है। लेकिन उस परम तक जाना तो बहुत ही मुश्किल है और ब्रह्मा, विष्णु महेश तक जाना भी बहुत मुश्किल है।

6-वास्तव में, मनुष्य को और भी नीचे की हैसियत के देवता चाहिए, जिनसे उसका संबंध निर्मित हो सके। तो मनुष्य ने ऐसे देवता निर्मित किये और इंद्र उनका प्रतीक है।वास्तव में, परमात्मा का कोई नाम नहीं है। परमात्मा की तो बात दूर, इस जगत में किसी चीज का भी कोई नाम नहीं है। जैसे व्यक्ति के लिए नाम की जरूरत पड़ जाती है, उसके बिना जीवन को चलाना कठिन है, वह एक अनिवार्य उपयोगिता है, वैसे ही जब भी उस परम सत्य की खोज में कोई लगता है तो उसे लगता है कि कोई नाम हो। इन नामों के भी फायदे हैं, और खतरे भी हैं।कैवल्य उपनिषद के अनुसार उसी को ब्रह्मा, शिव, इंद्र, अक्षर ब्रह्म, परम विराट, विष्णु, प्राण, काल ,अग्रि व चंद्रमा कहते हैं।।8।।वह व्यक्ति जन्म मृत्यु के चक्कर से छूट जाता है, जो इस तत्व को समझ लेता है कि जो पहले हो चुका है, अथवा आगे होगा, वह सब वही है। इसको छोड्कर मोक्ष का अन्य कोई रास्ता नहीं है।। 9।।वह मनुष्य परमात्मा को पा लेता है, जो आत्मा को समस्त भूतों में और समस्त भूतों को आत्मा में व्याप्त देखता है। इसके अतिरिक्त और कोई दूसरा उपाय नहीं है।।10।।

7-इस सूत्र में कैवल्य उपनिषद के ऋषि ने शिव की चर्चा की है। लेकिन तत्काल दूसरे सूत्र में वह कहते है कि सब नाम भी उसी के हैं ताकि यह भ्रांति न हो जाए कि वही एक नाम महत्वपूर्ण है। पहले सूत्र में ब्रह्मा भी कहा है, शिव भी , इंद्र भी , अक्षर ब्रह्म भी , परम विराट भी , विष्णु भी , प्राण भी , काल अग्रि भी और चंद्रमा भी कहा है। यह सभी नाम उसके हैं और भी हजार नाम हैं।लेकिन इन नामों में जो मौलिक कोटियां हो सकती हैं, वह सब सम्मिलित कर ली गयी हैं। जैसे ब्रह्मा, विष्णु महेश, यह तीन मूल हिंदू चिंतना की कोटियां हैं। फिर हिंदू जितने भी नाम हैं वह उन तीन में से किसी एक से संबंधित होंगे।और इन तीन मूल कोटियों का कारण है कि तीन तरह के मनुष्य हैं। और अगर हम मनुष्यों को बांटें, तो उसमें भी तीन तरह के मनुष्य हमें मिलेंगे।इस सूत्र में इंद्र उन सब देवताओं के प्रतीक है, जो मनुष्य की कामनाओं से निर्मित हुए हैं।इसलिए अगर हम वेद को पढ़ें, तो वेद में सौ में से निन्नानिबे सूत्र इंद्र आदि देवताओं के लिए प्रयुक्त हुए हैं। और जितने सूत्रों में इंद्र आदि देवताओं की प्रार्थना की गयी है, वे सब प्रार्थनाएं मनुष्य के मन की अत्यंत साधारण वासनाएं हैं। किसी की गाय ने दूध देना बंद कर दिया है तो वह प्रार्थना करता है ..''हें इंद्र, मेरी गाय का दूध वापिस लौट आए। किसी के खेत में वर्षा नहीं हुई है, वह प्रार्थना करता.. हे इंद्र, मेरे खेत में वर्षा हो जाए''।

8-इस संबंध में दो तीन बातें ध्यान देनी जरूरी है कि हिंदू चिंतन सब तरह के मनुष्यों को मार्ग मिल सके, इसकी चेष्टा है। अब जिसकी गाय का दूध खो गया है, जिसके खेत में वर्षा नहीं हुई है, जिसका बच्चा अपंग हो गया है, वह परम विराट से क्या प्रार्थना करे? उस परम विराट के समक्ष तो वाणी चुप हो जाएगी, और प्रार्थना नहीं की जा सकती। वह ब्रह्मा, विष्णु महेश से भी क्या कहे। क्योंकि इतने छोटे काम उनके काम नहीं हैं। यह पूरे जगत को बनाना, मिटाना, यह उनकी व्यवस्था है। यह कमजोर व्यक्ति कहां जाए? इसके मन को कहां संतोष होगा? वह कहां अपने बोझ को रख सकेगा? वह विराट इतना बड़ा है कि उस पर बोझ रखने का कोई उपाय नहीं। ब्रह्मा, विष्णु महेश इतने दूर की क्रियाओं में संलग्र हैं जिससे इन व्यक्ति का कोई लेना देना नहीं कि जगत बने, कि जगत मिटे, कि जगत संभले। यह इसकी कल्पना के भी बाहर है। उसका अपना एक छोटा सा जगत है, जहां इसका बच्चा बीमार है, जहां गाय को दूध नहीं आया है। इस छोटे से जगत में ब्रह्मा, विष्णु का उपयोग करना ऐसे ही है ..जहां सुई की जरूरत हो वहां तलवार का उपयोग करना। उससे तो कपड़ा भी और ज्यादा फट जाएगा।

9-तो इसके लिए और एक कोटि हिदू चिंतन ने निर्मित की, जो इंद्रादि देवताओं की है। इसलिए उपनिषदों का भी वेद के प्रति बहुत अच्छा भाव नहीं है। वह कारण यह नहीं है कि वेद के प्रति बुरा भाव है, वह कारण कुल इतना है कि वेद निव्यानबे मौकों पर अति साधारण व्यक्ति के जगत की चिंता में सलग्र हैं।एक दृष्टि से देखा जाए तो वेद परम पथ नहीं रह जाते हैं। पर एक दृष्टि से देखा जाए तो परम मानवीय पंथ हो जाते हैं और मनुष्य के निकट परमात्मा को लाना पड़ेगा, तो ही मनुष्य परमात्मा के निकट जा सकता है। एक तो उपाय है कि मनुष्य उठे, और स्वयं परमात्मा के निकट जाए। लेकिन ऐसे बहुत कम मनुष्य हैं जो इतना उठें, और परमात्मा के निकट जाएं।तो एक उपाय यह है कि हम परमात्मा को उतारें, और मनुष्य के निकट लाएं। तो इंद्र उस उतारने की प्रक्रिया की आखिरी कड़ी है। इसलिए इस सूत्र में इंद्र आदि देवताओं की भी गणना की है।

10-फिर कुछ और शब्दों का भी प्रयोग किया है ...‘अक्षरब्रह्म ‘।कुछ लोग हैं, विशेषकर दार्शनिक चिंतन के ..तो उनके लिए व्यक्तिवाची सभी शब्द अर्थहीन हैं।सामान्यतया अगर परमात्मा व्यक्ति न हो तो हमारा संबंध नहीं बन पाता। ऐसे ही जो दार्शनिक चिंतन वाले हैं, उनके लिए अगर परमात्मा व्यक्ति हो तो उनका संबंध नहीं बन पाता। व्यक्ति होते ही उन्हें बेचैनी शुरू हो जाती है ..उन्हें निराकार, निर्व्यक्ति चाहिए।तो ऐसे व्यक्तित्व के लिए अक्षर ब्रह्म एक प्रतीक है। इसके भीतर सब नाम आ जाते हैं और वे सब नाम अक्षरब्रह्म में समा जाते हैं।अक्षरब्रह्म का अर्थ है, वह आत्यंतिक ऊर्जा जो कभी क्षय को उपलब्ध नहीं होती। विनाश, सृजन, सब परिवर्तनों के बीच जो ऊर्जा बनी ही रहती है ..वह अक्षरब्रह्म है ...परम विराट है।अक्षरब्रह्म में उस ऊर्जा का तो संकेत है जो सदा बनी रहती है, लेकिन विस्तार का ,उसकी विराटता का कोई संकेत नहीं है।कुछ लोग हैं, जिनके लिए परमात्मा विराट की तरह अवतरित होता है।जहां भी विराट होता है उन्हें परमात्मा की झलक मिलती है। विराट सागर को देखकर, विराट आकाश को देखकर...जहां भी फैलाव है अंतहीन।

11-शाश्वत ऊर्जा में एक तरह का फैलाव है।विराट आकाश में दूसरे तरह का फैलाव है।दोनों का अंतर समझना है।शाश्वत ऊर्जा में जो फैलाव है वह समय की धारा का है। जो पहले भी थी, अभी भी है, आगे भी होगी।‘टाइम डायमेन्सन, ‘काल में फैला हुआ है।आकाश अभी इसी वक्त , सब दिशाओं में फैला हुआ है तो आकाश का फैलाव ‘स्पेस डायमेन्सन’ है।तो कुछ लोग हैं जो ‘टाइम डायमेन्सन 'को अनुभव कर पाते हैं और कुछ लोग ‘स्पेस डायमेन्सन’ को।यह व्यक्तियों पर निर्भर करेगा ..जैसे विचारक है अथार्त एयर एलिमेंट तो ‘टाइम डायमेन्सन' को अनुभव कर सकेगा। ध्यानी अथार्त फायर एलिमेंट होगा तो ‘स्पेस डायमेन्सन’ को अथार्त इसी क्षण आकाश के फैलाव को अनुभव कर सकेगा।और योगी अथार्त वॉटर एलिमेंट का जो मार्ग है, वह अपने शरीर के भीतर छिपे हुए प्राण को अनुभव कर सकेगा । तो अक्षरब्रह्म विचारकों की कोटि के लिए कहा गया है ।फिर जितने विचारकों ने नाम दिये हों, वह उस कोटि के भीतर आते हैं।और ध्यान में परम विराट का अनुभव होता है इसीलिए ध्यानियों के लिए परम विराट कहा गया है क्योंकि ध्यानी के लिए समय मिट जाता है .. बचता ही नहीं और ‘टाइमलेसनेस'/ कालातीत में प्रवेश हो जाता है।एक नदी चाहे कितनी ही लंबी हो, आगे और पीछे की तरफ फैली हुई है।आकाश का विराट अभी सब तरफ फैला हुआ है। ध्यान में विराट, परम विराट का अनुभव होता है। तो ध्यानियों ने जो शब्द चुने हैं, वह परम विराट जैसे हैं। विचारकों ने जो शब्द चुने हैं, वह अक्षरब्रह्म जैसे हैं।

12-लेकिन कुछ और धाराएं भी मनुष्य की चेतना में उतरती हैं जैसे, प्राण। योग की जो परमात्मा के लिए शब्दावली है, उसमें महाप्राण, विराट प्राण, प्राण, इस शब्द का प्रयोग है। क्योंकि योगी अथार्त वॉटर एलिमेंट का अनुभव जब गहन होने लगता है, तो वही प्राण अपने बाहर भी सब तरफ अनुभव होने लगता है। एक समय आता है कि सारा जगत प्राण ऊर्जा से भर जाता है।

योगी प्राण पर ही सारा काम कर रहा है। इसलिए योग की मौलिक प्रक्रिया प्राणायाम है। प्राणायाम का अर्थ है, प्राण का विस्तार और प्राण का अंतहीन फैलाव। ऐसी अवस्था ले आनी है जब मेरा प्राण सारे जगत के प्राण में फैल जाए। तब जिसका अनुभव हो , उसे महाप्राण , प्राण कहो, कोई भी नाम दो। योग को ईश्वर के दूसरे नाम कभी प्रीतिकर नहीं रहे हैं, क्योंकि योग तो प्राण के संशोधन की एक बड़ी वैज्ञानिक प्रक्रिया है।योग ने शरीर के भीतर छिपी हुई विद्युत की खोज शुरू की जिसका नाम प्राण है। और खोजते खोजते जितनी गहराई बढ़ी, उतना ही योग को अनुभव हुआ कि सभी कुछ प्राण का ही रूपांतरण है। यह वृक्ष भी प्राण का एक रूप है, पत्थर भी प्राण का एक रूप है, मनुष्य भी प्राण का एक रूप है। इस जगत में जो भी घटित हो रहा है, उसकी मौलिक इकाई प्राण है।

13-अब दो शब्द और रह जाते हैं ..‘काल अग्रि’/‘टाइम -फायर’ और ‘चंद्रमा’। जैनों की परंपरा ने विराट को , जीवन के आत्यंतिक को जो नाम दिया है, वह है ..समय। इसलिए महावीर ध्यान को सामायिक कहते हैं। सिर्फ समय में प्रवेश कर जाना ही ध्यान है। स्वयं में प्रवेश कर जाना ही ध्यान है और स्वयं का नाम समय है।समय को जिन्होंने आत्मा का नाम माना,उनके मानने के बड़े कारण हैं। उदाहरण के लिए एक पत्थर पड़ा है। पत्थर का जो विस्तार है वह स्थान में है, समय में नहीं है। इसलिए पत्थर के सबसे पास आत्मा है क्योकि उसे समय का कोई पता नहीं है। पौधे का भी विस्तार, फैलाव स्थान में है, लेकिन कहीं न कहीं प्राथमिक रूप में उसे समय का भी बोध है क्योकि पौधा समय में बढ़ता है ।अब विज्ञान ने भी सिद्ध किया है कि पौधे को समय का अनुभव है लेकिन केवल अतीत का ही, भविष्य का उसे कोई अनुभव नहीं है। फिर पशु के पास और भी विकसित समय है। उनको समय का और भी बोध होता है। वह थोड़ा सा भविष्य का भी स्मरण रख लेते हैं।

14-थोड़ा सा अथार्त जैसे पशु कल का भोजन भी इकट्ठा कर लेता है .. पौधा नहीं कर सकता। कल का उसे कोई पता नहीं है। पक्षी हैं, वर्षा का इंतजाम कर लेते हैं। उसका मतलब है कि उन्हें आनेवाले समय का कहीं न कहीं कोई स्थूल बोध है कि कल मुसीबत हो सकती है। चीटियां बड़ी मेहनत करती हैं ...वर्षा के लिए भोजन इकट्ठा करती हैं क्योंकि वर्षा में जाना बाहर मुश्किल होगा। उसका मतलब है कि भविष्य का थोड़ा सा खयाल है।तो पशुओं में यह समय ही उनके भीतर आत्मा के विकास की खबर दे रहा है। लेकिन आत्माओं में मनुष्य श्रेष्ठतम है क्योंकि उसे मौत का बोध है और पशु के मन में कोई मौत का चिंतन नहीं चलता। लेकिन मनुष्यों में भी वे श्रेष्ठतम हैं जिन्हें मौत के बाद के भी जन्मों का बोध है। क्योंकि उनका समय और भी विस्तीर्ण हो गया। और उनमें भी वे और श्रेष्ठतम हैं जिन्हें समस्त जन्मों और मौतों के पार परम अस्तित्व का बोध है। क्योंकि उनका समय आत्यंतिक रूप से विकसित हो गया है। जिन्हें आवागमन के पार जाने का भी बोध है, वह भी उनकी चिंता है, वह फिर श्रेष्ठतम आत्माएं हो गयीं।तो समय के आधार पर ही सारी आत्माओं का विभाजन किया गया है।आत्मा अर्थात समय -बोध/‘टाइम कांशसनेस’।तो ऋषि ने काल अग्रि की भी गणना कर ली है..वह जो समय की जीवंत अग्रि है।और अंतिम है , ‘चंद्रमा' जो और भी हैरान करता है क्योंकि जिस चंद्रमा को हम जानते हैं, उस चंद्रमा से इस चंद्रमा का कोई भी संबंध नहीं है।वास्तव में, चंद्रमा एक अन्य साधकों की कोटि का प्रतीक है।

15-तंत्र ने मनुष्य की नाड़ियों का गहन शोधन किया है। जैसे योग ने मनुष्य के प्राण ऊर्जा का शोधन किया है, वैसे तांत्रिकों ने मनुष्य की अंतर्नाडियों का गहन शोधन किया है। और उन नाड़ियों को उन्होंने दो हिस्सों में बांटा है। एक को सूर्य कहते हैं और दूसरे को चंद्र। सूर्य उन नाड़ियों को कहते हैं जो उत्तेजक हैं, गर्म हैं ;इसलिए सूर्य कहते हैं। चंद्र उन नाड़ियों को कहते हैं जो शांत हैं, शीतल हैं, मौन हैं। और तंत्र की दृष्टि है कि चंद्र और सूर्य नाड़ियों के ही मेल से व्यक्तित्व निर्मित है और इन दोनों का संतुलन ही साधना है।वास्तव में, सूर्य जीवन का आधार है...ऊर्जा, दौड़, वासना, सब सूर्य हैं। इसलिए सूर्य के उगते ही सारे जगत में जीवन की लहर दौड़ जाती है,जगत वासनाग्रस्त हो जाता है ,पक्षी जाग जाते हैं, पौधे सजग हो जाते हैं, मनुष्य उठ आता है, जीवन की खोज शुरू हो जाती है। सूर्य के ढलते ही जीवन ढल जाता है ,अंधेरा हो जाता है, रात हो जाती है और लोग वापिस तंद्रा में गिर जाते हैं।लेकिन रातें दो तरह की होती हैं ..एक अंधेरी रातें हैं,और दूसरी उजली रातें हैं। अंधेरी रात का नाम है मूर्छा, उजली रात का नाम समाधि।

16-रात में तो सभी गिरते हैं। वे भी जो दिन भर में थक गये, जीवन भर में थक गये और थक कर गिर गये, तो वे एक गहरी निद्रा में गिर जाते हैं। फिर सुबह होगी, फिर सूरज निकलेगा। लेकिन एक वे भी हैं जो सूरज की इस दौड़ से सिर्फ थक ही नहीं गये और मूर्छा में ही नहीं गिर गये, बल्कि सूरज की दौड़ की व्यर्थता को भी जान गये और शांत होने की, शीतल होने की, चंद्र के साथ एक होने की दिशा में संलग्र हो गये।तो स्वयं के भीतर जो नाड़ियों चंद्र की तरफ ले जाती हैं, शांति की तरफ ले जाती हैं, उन सब अनुभव समूह का नाम चंद्रमा है। तो इस चंद्रमा को जो उपलब्ध हो जाता है, तंत्र की भाषा में वह परम विराट को उपलब्ध हो जाता है। ऐसी अवस्था पानी है जहां जीवन तो हो, लेकिन इतना शांत जैसे मृत्यु।जिस दिन जीवन और मृत्यु का यह मेल हो जाता है, उस घड़ी का नाम चंद्रमा है। यह सब प्रतीक शब्द हैं।‘उसी को ब्रह्मा, शिव, इंद्र, अक्षर ब्रह्म, परम विराट, विष्णु प्राण, काल -अग्रि और चंद्रमा कहते हैं।’‘वह व्यक्ति जन्म-मृत्यु के चक्कर से छूट जाता है, जो इस तत्त्व को समझ लेता है’।

17-इस तत्त्व को अथार्त अनेक नामों वाले तत्त्व को समझ लेता है। यह विराट अनाम है,सभी उसके नाम हैं ...ऐसा समझ लेता है। जो नामों से भी नहीं बंधता है , वही छूट पाता है। अगर नामों से भी बंध जाता है, तो नया संसार निर्मित हो जाता है।‘जो ऐसा समझ लेता है कि जो पहले हो चुका है, अथवा आगे होगा, वह सब वही है’।जो पहले हुआ है, जो हो रहा है, जो होगा, सब नाम उसके हैं। सब रूप जो हुए, हो रहे हैं, होंगे, वे भी उसके हैं। सब घटनाएं जो घटी हैं, घट रही हैं, घटेंगी, वे भी उसकी हैं। जो समस्त अनुभवों से उसी को ही स्मरण करने लगता है, जो समस्त दिशाओं से उसी को देखने लगता है, जो सब इशारों को उसी की तरफ झुका देता है, कोई इशारा कहीं और नहीं जाता। ‘इसको छोड़कर मोक्ष का और कोई रास्ता नहीं है’अथार्त ऐसा अनुभव होने लगे कि सभी रास्ते उसकी तरफ जाते हैं, सभी दिशाएं उसकी हैं, सभी नाम उसके हैं, सभी स्वर उसके हैं, सभी कुछ उसका..। ऐसी प्रतीति की सघनता के अतिरिक्त मोक्ष का और कोई उपाय नही है।

18-इसका मतलब यह हुआ कि आपका मोक्ष नहीं हो सकता अथार्त जब तक आप हैं तब तक मोक्ष नही हो सकता। जब आप बिलकुल शून्य हो जाते है, तब मोक्ष होता है। जब सभी कुछ उसका हो जाता है और आपका कुछ भी नही रह जाता, तभी मोक्ष होता है। इसलिए आमतौर से जब हम भाषा मे कहते है तो हमारे मन मे होता है . ..मेरा मोक्ष कैसे हो जाए, मेरी मुक्ति कैसे हो जाए? मेरा निर्वाण कैसे हो जाए?ये बिलकुल गलत है क्योंकि मेरे से ही तो मुक्त होना है। यह मुझको ही तो निर्वाण होना है, मिटना है ,खोना है।मोक्ष वहाँ होता है, जहाँ 'मै' नहीं होता है और जहाँ 'मैं' होता है ;वहाँ मोक्ष नहीं होता है। मोक्ष का मतलब है, परम स्वतंत्रता। सब चीजों से स्वतत्रंता हो जाए, लेकिन मेरा भी बना रहे, तो यह भी बंधन है। तो ऋषि कहते है, इसको छोड्कर मोक्ष का और कोई उपाय नहीं है कि सभी कुछ उसका हो जाए। सभी कुछ अथार्त सुख भी उसका, दुख भी उसका।जैसे किसी व्यक्ति को बीमारी हो और वह कहे कि मेरी बीमारी स्वस्थ कैसे हो जाए तो बीमारी को कभी स्वस्थ नहीं होना है बल्कि बीमारी को नहीं होना है, ताकि स्वास्थ्य आ जाए।

19-सफलता उसकी, असफलता उसकी ,हार उसकी, जीत उसकी ,जन्म उसका, मृत्यु उसकी। जब तक मैं कुछ भी मेरा कह सकता हूं , तब तक मैं बधन में जियूंगा क्योंकि आत्यंतिक अर्थों में ‘मेरा’ ही मेरा बंधन है।जब सभी कुछ उसका हो जाए ,मेरे पास कुछ भी शेष न बचे .. जो आत्मा को समस्त भूतों में और समस्त भूतों को आत्मा में व्याप्त पाता है ,देखता है ;‘वह मनुष्य परमात्मा को पा लेता है।इसका अर्थ हुआ कि उसके लिए इस जगत में ‘मैं’’तू की कोई सीमा रेखा नही रह जाती। ‘मैं’’तू की सीमा रेखा का अर्थ है कि मैं अपने को पृथक माने चला जा रहां हूं।जीवन का जो भी श्रेष्ठतम अनुभव है, वह मैं और तू की आत्यंतिक संबंध स्थिति में निर्मित होता है। कोई व्यक्ति अकेला विकसित नहीं हो सकता और जो होगा तो बहुत दीन- दरिद्र होगा। यह थोड़ा समझने जैसा है क्योंकि पूरब में हम सबने इससे विपरीत सोचा है कि मनुष्य जितना एकांत में चला जाए, अकेले में चला जाए, बिलकुल अकेला हो जाए, उतना विकसित होगा।

20-यहूंदी चिंतन दूसरी तरफ से सोचता है। वह कहता कि जितना अकेले में चला जाएगा उतना दीन -हीन हो जाएगा क्योंकि संबंधों के बिना ‘ग्रोथ'/विकास नहीं हो सकता।तो जितने गहन संबंध होंगे, व्यक्तिं उतना विकसित होगा। और संबंधों की जो आत्यंतिक गहनता है, वह मैं और तू की निकटता है। किसी को जब हम तू कह पाते हैं, तो उसके माध्यम से हम भी एक ऊंचाई पर पहुंच जाते हैं। किसी को जब हम प्यार से पुकार पाते हैं, तो उस पुकार में ही हम बदल भी जाते हैं। तो इस जगत में खासकर दो तरह के लोग हैं। और इसीलिए पूरब और पश्रिम दो तरह के लोगों के प्रतीक बन गये।दो तरह के व्यक्तित्व माने गये हैं ...एक है ‘इंट्रोवर्ट’/अंतर्मुखी और दूसरा एक है ‘ एक्सट्रोवर्ट ’/बहिर्मुखी। जो ‘इंट्रोवर्ट’ है, अंतर्मुखी है, वह एकांत में ही विकसित होता है। उसको जितना अकेलापन मिल जाए, उतना ही वह विकसित होता है। दूसरे की मौजूदगी उसे नुकसान पहुँचाती है। जब भी वह भीड़ से वापिस लौटता है, तो उसे लगता है कुछ खोकर लौटा। जब भी किसी से मिलता है तो उसे लगता है, कुछ नीचे उतरना पड़ा। जब भी किसी से बात करता है तो उसे लगता है, कि कुछ विघ्र हुआ। जब वह मौन में होता है, एकांत में होता है, कोई नहीं होता, अकेला होता है, तब उसे लगता है कि उसकी आत्मा आकाश की तरफ उड़ रही है ...यह अंतर्मुखी है और पूरब इस अंतर्मुखता का प्रतीक है।

21-इसलिए पूरब में जो भी धर्म पैदा हुए, उन सबने जोर दिया है ...एकांत, अकेलापन, संन्यास, संबंध से छुटकारा, मुक्ति। पश्रिम में जितने धर्मों ने फैलाव किया ;वह सभी धर्म यहूंदी धर्म से पैदा हुए हैं । भारत के भीतर जितने धर्म पैदा हुए हैं, उनका मूल आधार हिंदू है; भारत के बाहर जितने धर्म पैदा हुए उनका मूल आधार यहूंदी है।हिंदू अंतर्मुखी है और यहूंदी बहिर्मुखी है।

इसलिए हिंदू यहूंदी को बिलकुल नहीं समझ सकता। यहूंदी हिंदू को बिलकुल नहीं समझ सकता। इन दोनों के बीच मेल बड़ा मुश्किल है क्योकि ‘टाइप ‘ अलग है। यहूंदी कहता है कि अकेले में तो आदमी मर जाएगा ,क्षीण हो जाएगा ..सब विकास संबंध का है। इसलिए यहूंदी फकीर बिना पत्नी ,बच्चों के नहीं होगा। यहूंदी फकीर समाज का हिस्सा और अंग है । वह भागने के लिए सोच ही नहीं सकता। बल्कि यहूंदी फकीर के संबंध दूसरों के संबंधों से ज्यादा होंगे। क्योंकि वह संबंधों में ज्यादा विकसित होगा। ‘इंटर रिलेशनशिप ‘, ‘रिलेटेडनेस’/जुड़ना दूसरे से बढ़ने का उपाय है।इसको आत्यंतिक रूप से यहूंदी चिंतन कहता है कि आखिर में व्यक्ति ‘मैं ‘ रह जाएगा और विराट ‘तू हो जाएगा। सारा जगत ‘तू, हो जाएगा और व्यक्ति ‘मैं ‘ रह जाएगा। तब जो मिलन होगा उसमें व्यक्ति की आत्मा पूर्ण विकास को उपलब्ध होगी। लेकिन यहूंदी चिंतन इसके पार नहीं जाता।

22-यह सूत्र इसके पार जाता है।यह सूत्र कहता है कि जब तक तू- तू जैसा स्पष्ट है और मैं- मैं जैसा स्पष्ट है .. तब तक कितना ही गहन संबंध हो जाए, दूरी बनी ही है।तो मैं किसी को कितना ही प्रेम करूं और जब तक वह मुझे ‘तू मालूम पड़ रहा है, और मैं ‘मैं’ मालूम पड़ रहा है हम कितने ही निकट आ जाएं ..दूरी कायम रहेगी। यह ‘तू और ‘मैं’ के बीच जरा सी दूरी है, पर दूरी है। और दूरी की विशेषता है कि जितनी कम हो उतनी ज्यादा अखरती है; जितनी ज्यादा हो, पता ही नहीं चलता है।दूरी का तब पता चलता है , जब बहुत कम बचती है और तब बहुत पीड़ा देती है।इसलिए प्रेमी जिस पीड़ा में पड़ते हैं उसका आत्यंतिक कारण है...दूरी का कम हो जाना ।आशा भी बंधती है कि मिट जाएगी लेक़िन मिटती नहीं है। और हर बार करीब होने से टकराहट शुरू हो जाती है और दूरी का बोध भी साफ होने लगता है। जितनी दूरी कम होती है, एक अर्थ में उतनी ज्यादा हो जाती है। क्योंकि मन होता है कि अब तो बिलकुल किनारा करीब था, अब तो हम हाथ बढ़ाते और मिल जाते । लेक़िन हाथ मिल नहीं पाते हैं ;दूरी कायम ही रह जाती है। तो अगर हम परमात्मा के इतने भी निकट पहुंच जाएं ..ठीक एक प्रेमी की तरह लेक़िन ‘मैं ‘ और ‘तू, की भाषा हो सके, तो भी दूरी रह जाती है।

23- उपनिषद के ऋषि कहते है, जब तक आत्मा सर्वभूतों में, सबमें न दिखायी पड़ने लगे और जब तक सर्वभूत स्वयं में न दिखायी पड़ने लगें; और जब तक ‘तू, ‘मैं' जैसा ‘ न हो जाए ;तब तक दूरी कायम रहेगी। यह आखिरी छलांग है जिसमें प्रेमी प्रेयसी हो जाता है, प्रेयसी प्रेमी हो जाती है। यह आखिरी छलांग है, जिसमें भक्त भगवान हो जाता है, भगवान भक्त हो जाता है। ऋषि कहते है, वह मनुष्य परमात्मा को पा लेता है जो आत्मा को समस्त भूतों में और समस्त भूतों को आत्मा में व्याप्त देखता है। इसके अतिरिक्त दूसरा और कोई उपाय नहीं है। यह आखिरी बात है जहां तक समझ ..सोच, विचार कर सकती है। जहां तक हम अपनी चेतना को थोड़ा दौड़ा सकते हैं, खयाल में ले सकते हैं। इसके बाद खयाल का और विचार का जगत समाप्त हो जाता है, और कोई उपाय नहीं रह जाता।उसी को ब्रह्मा, शिव, इंद्र, अक्षर ब्रह्म, परम विराट, विष्णु प्राण, काल-अग्रि व चंद्रमा कहते हैं।।8।।वह व्यक्ति जन्म मृत्यु के चक्कर से छूट जाता है, जो इस तत्व को समझ लेता है कि जो पहले हो चुका है, अथवा आगे होगा, वह सब वही है। इसको छोड्कर मोक्ष का अन्य कोई रास्ता नहीं है।। 9।।

...SHIVOHAM....