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आदिशंकर-02

श्री शंकराचार्य तत्वज्ञान सिखाते हैं और साथ ही गोविन्द के भजन भी गाते हैं। क्या ज्ञान और भजन में, ज्ञान और भक्ति में कोई अंतर्संबंध है?

ज्ञान निषेधात्मक है, भक्ति विधायक। ज्ञान ऐसा है जैसे कोई भूमि तैयार करे, घास-पात अलग करे, खाद डाले; और भक्ति ऐसी है जैसे कोई बीज बोए।

ज्ञान अपने में अधूरा है। उससे सफाई तो हो जाती है, लेकिन बीज आरोपित नहीं होते। जरूरी है, काफी नहीं है। क्योंकि ज्ञान तो है बुद्धि का, भक्ति है हृदय की। परमात्मा के मार्ग पर जितनी बाधाएं हैं, वे तो ज्ञान से काटी जा सकती हैं; लेकिन जो सीढ़ियां हैं, वे भक्ति से चढ़ी जाती हैं।

इसलिए ज्ञान निषेधात्मक है; व्यर्थ को तोड़ने में बड़ा कारगर है, सार्थक को जन्माने में नहीं।

शंकर ज्ञान की बात कर रहे हैं, ताकि तुम्हारे भीतर अज्ञान की जो पर्त दर पर्त भीड़ लगी है, कट जाए। और जब एक बार मन की भूमि साफ हो गई, व्यर्थ का कचरा न रहा, कूड़ा-करकट न रहा, तो फिर भक्ति के बीज बोए जा सकते हैं; फिर भज गोविन्दम् की संभावना है। विरोध नहीं है दोनों में; भक्ति ज्ञान की ही पराकाष्ठा है और ज्ञान भक्ति की ही शुरुआत है। क्योंकि मनुष्य के भीतर हृदय भी है, बुद्धि भी है। दोनों को छूना होगा। दोनों का रूपांतरण चाहिए।

अगर तुम सिर्फ ज्ञान में ही उलझ गए, तो कोरे रेगिस्तान की भांति हो जाओगे–साफ-सुथरे, पर कुछ भी ऊगेगा नहीं; स्वच्छ, पर निर्बीज; विस्तीर्ण, पर न तो कोई ऊंचाई, न कोई गहराई। ज्ञान शुष्क है, अकेला। और अगर तुम अकेले भक्त हो गए, तो तुम्हारे जीवन में वृक्ष तो उगेंगे, फूल तो फलेंगे, हरियाली होगी, लेकिन उस हरियाली को बचाने के तुम्हारे पास उपाय न होंगे। तुम उन पौधों की रक्षा न कर पाओगे। अगर कोई संदेह जगाने आ गया, तो तुम्हारी उर्वर भूमि में संदेह के बीज भी पड़ जाएंगे, उनमें भी अंकुर आ जाएंगे।

भक्त अगर ज्ञान की प्रक्रिया से न गुजरा हो, तो उसका भवन सदा डगमगाता रहेगा। कोई भी संदेह डाल सकता है। और भक्त तो विश्वास करना जानता है। वह उन पर भी विश्वास कर लेता है जो उसे ले जा रहे हैं; वह उन पर भी विश्वास कर लेता है जो उसे भटका रहे हैं। वह गलत को भी पकड़ लेता है उसी तरह, जिस तरह ठीक को पकड़ता है। उसके पास सोचने-समझने की क्षमता नहीं; उसके पास विवेक नहीं।

तो भक्त ऐसे है, जैसे अंधा हो; ज्ञान ऐसे है, जैसे लंगड़ा हो; और दोनों मिल जाएं तो परम संयोग घटित होता है।

तुमने कहानी सुनी है कि जंगल में लग गई आग और एक अंधा और एक लंगड़ा बड़ी मुश्किल में पड़े। अंधे को दिखाई नहीं पड़ता, कहां जाए! पैर हैं उसके पास स्वस्थ, भाग सकता है, बच सकता है; लेकिन दिशा नहीं है। लंगड़े को दिखाई पड़ता है–कहां है मार्ग; अभी जंगल का कौन सा हिस्सा अग्नि से नहीं घिरा है; लेकिन लंगड़ा है, दौड़ नहीं सकता; निकलने का उपाय नहीं।

कथा कहती है, दोनों मिल गए; अंधे ने लंगड़े को कंधे पर ले लिया। फिर दोनों की कमियां भर गईं। वे जैसे एक ही व्यक्ति बन गए; अंधे के पैर, लंगड़े की आंखें जुड़ गईं। वे दोनों जंगल से सुरक्षित बाहर आ गए। अग्नि उन्हें नष्ट न कर पाई।

बुद्धि और हृदय जब तक न मिल जाएं, तुम जीवन की अग्नि से बच न पाओगे।

बुद्धि अंधी है। अकेले, हृदय भी पंगु है, बुद्धि भी पंगु है; जुड़ कर दोनों पूर्ण हो जाते हैं। और दोनों तुम्हारे पास हैं; दोनों का उपयोग कर लेना है।

तो ज्ञान को भक्ति का सहारा बनाओ, भक्ति को ज्ञान का सहारा बनाओ; दोनों तुम्हारे पंख बन जाएं, तुम आकाश में उड़ सकोगे। न तो एक पंख से कभी कोई पक्षी उड़ा है, न एक पैर से कोई प्राणी चला है, न एक पतवार से नाव चलती है; दोनों पतवार चाहिए। कोई विरोध नहीं है। और जिन्होंने तुमसे कहा है विरोध है, उन्होंने गलत कहा है। और गलत कहने का कारण यही है कि उन्होंने भी इस महासमन्वय को नहीं जाना। या तो वे बुद्धि से घिरे हुए लोग होंगे, जिनके पास कोरे विचार हैं, शुष्क विचार हैं, तर्क हैं, लेकिन हृदय का कोई नृत्य घटित नहीं हुआ है; और या फिर वे हृदय के लोग होंगे, सीधे-सादे; नाच तो सकते हैं, समझ नहीं है।

उस घड़ी को परम सौभाग्य की घड़ी मानना, जब तुम