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क्या अर्थ है ध्यान से समाधि की यात्रा का ?PART -02


क्या अर्थ है समाधि का?-

09 FACTS;-

1-समाधि सदा दो शरीरों के बीच में अथार्त चौथे और पांचवें शरीर के बीच में घटती

है।वह संध्याकाल है क्योकि संध्या न दिन की घटना है न रात की है; वह रात और दिन के

बीच की घटना है।साधारणत: तीन समाधियां हैं।चौथे और पांचवें शरीर के बीच में जो समाधि घटती है, उसी से आत्मज्ञान उपलब्ध होता है।पांचवें और छठवें शरीर के बीच में जो समाधि घटती है, उससे ब्रह्मज्ञान उपलब्ध होता है। छठवें और सातवें शरीर के बीच में जो समाधि घटती है, उससे निर्वाण उपलब्ध होता है।इस प्रकार ये तीन समाधियां तीन शरीरों के बीच में घटती हैं।

2-हमें एक फाल्स समाधि को भी समझ लेना चाहिए, जो समाधि नहीं है, लेकिन चौथे शरीर में

घटती है और समाधि जैसी प्रतीत होती है।वस्तुत: वह ऐसा ही है जैसे एक चित्रकार ,मूर्तिकार ,संगीतज्ञ के साथ होता है कि कभी- कभी वह आत्मलीन हो जाता है और बड़े आनंद का अनुभव करता है।लेकिन वह क्षणिक घटनाएं हैं।कभी- कभी चौथे शरीर में शुद्ध मन/चित्त किसी भी बात को लेकर लीन हो जाता है। उदाहरण के लिए अगर उगते सूरज को देखकर, एक संगीत की धुन सुनकर, एक फूल को खिलते देखकर चित्त बिलकुल लीन हो जाए, तो एक मिथ्या/फाल्स समाधि घटित होती है।ऐसी मिथ्या समाधि मिथ्या शक्तिपात नशीले ड्रग्स आदि से भी घटित हो सकती है।

3-तो इस प्रकार चार तरह की समाधियां हुईं। तीन समाधियां जो प्रामाणिक/आथेंटिक, समाधियां हैं और उनमें तारतम्यता भी है।और एक चौथी झूठी समाधि, जो बिलकुल समाधि जैसी मालूम पड़ती है और धोखे में डाल सकती है।वह वह किसी संध्या में नहीं केवल चौथे शरीर में घटती है।सामान्यतया अनेक लोग चौथे की फाल्स समाधि पर रुक जाते है क्योंकि वह बहुत सरल है।इसमें मेहनत नहीं होती; और ऐसे ही पैदा हो सकती है।उससे सबसे ज्यादा बचने की जरूरत है, क्योंकि वह जल्दी से उपलब्ध हो सकती है।समाधि एक द्वार/ पैसेज है।बाकी तीनों समाधियां शरीरों के बाहर संक्रमण काल में घटती हैं, जब तुम एक शरीर से दूसरे में जा रहे होते हो।

4-महृषि पतंजलि ने समाधि की दो दशाएं कही हैं। चैतन्य समाधि और जड़ समाधि। जड़ समाधि नाम मात्र को समाधि है। समाधि जैसी प्रतीति होती है, पर समाधि नहीं है। जड़ समाधि में, तुम्हारे पास जो थोड़ी चैतन्य की ऊर्जा है, वह भी खो जाती है। तुम मूर्च्छित होकर गिर जाते हो। एक आध्यात्मिक कोमा ... ।शांति जरूर मिलेगी, जैसी गहरी नींद में मिलती है।इसलिए महृषि पतंजलि ने यह भी कहा कि समाधि और गहरी नींद में एक समानता है। खूब गहरी नींद आ जाए, स्वप्न भी न हों, तो एक शांति मिलेगी, दूसरे दिन सुबह ताजगी रहेगी। लेकिन उस प्रगाढ़ निद्रा में क्या हुआ था, इसका तो कुछ पता न रहेगा। सुबह तुम इतना ही कह सकोगे कि गहरी नींद आई। वह भी सुबह जबनींद से उठ आओगे , तब कह सकोगे।जड़ समाधि ऐसी ही है जो सुगम है, सरल है, आसानी से हो सकती है।

5-इसी जड़ समाधि के कारण ही पश्‍चिम में मादक द्रव्यों का प्रभाव बढ़ा और इसी जड़ समाधि के कारण ही इस देश में साधु संन्यासी ...सदियों से गांजा, भांग, अफीम लेता रहा है। बड़ी सरलता से मन को मूर्च्छित किया जा सकता है। और जब मन मूर्च्‍छित हो जाता है, तो स्वभावत: सारी चिंता समाप्त हो गई, सारे विचार एक सन्नाटे में गए।मगर यह मूर्छा,ताजगी महंगी है तुमने बड़ी कीमत पर ली है। असली समाधि चैतन्य समाधि है।मनुष्य दोनों के

मध्य में है अथार्त पत्थर और परमात्मा के बीच की कड़ी है। पत्थर जड़ है, परमात्‍मा पूर्ण चेतन है मनुष्‍य आधा -आधा अथार्त कुछ जड़ है और कुछ चेतन है।यही मनुष्य की चिंता , संताप ,उसकी दुविधा, द्वंद्व,और यही उसकी पीड़ा, तनाव है।

6-मनुष्य आसानी से पशु हो सकता है।पशुता प्रबल है; इसलिए तो जिन बातों से पशु होने की सुविधा मिलती है, तुम उनमें बड़े उत्सुक हो जाते हो।उदाहरण के लिए जब भीड़ जोर से नारा लगाने लगती है, तो तुम्हारा कंठ भी खुल जाता है।जब भीड़ आग लगाने लगे कहीं, तो तुम भी आग लगाने में संलग्न हो जाते हो।क्रोध में बहुत बल आ जाता है ..तुम क्रोध में बड़ी चट्टान भी सरका देते हो जो सामान्य दशा में हिला भी नही सकते।जो नीचे गिर जाता है, उसे भी एक तरह की गणित मिलती है।पूरा ब्रह्माण्ड एक गणित ही है।अपराध का असली कारण पशुता है ;वह पीछे गिर रहा है कहता है मुझे चुनौती नहीं स्वीकार करनी हैं।मनुष्यता का असली अर्थ तो है... उत्तरदायित्व और चुनौती ।

7-आधा हिस्सा खींचता है कि जड़ हो जाओ और आधा हिस्सा खींचता है कि चैतन्य हो जाओ। आधा हिस्सा कहता है कि डूब जाओ कामनाओ, वासनाओ में और आधा हिस्सा कहता है कि डूब जाओ ध्यान में, प्रार्थना में, पूजा में। और इन दोनों में कहीं तालमेल नहीं होता क्योकि दोनों एक दूसरे के विपरीत जुड़े हैं।तुम्हारा पूरा अतीत जड़ता का इतिहास है। इसलिए जड़ता का बड़ा वजन है।भविष्य तो चैतन्य है लेकिन उसकी तो अभी धीमी सी किरण उतर रही है;अभी उसका बहुत बल नहीं है।अंधेरे का बल बहुत ज्यादा है।इसलिए तो ध्यान की कोशिश करो तो विचारों की तरंगें उठती ही चली जाती हैं क्योकि विचार अतीत से ,जड़ता से आते हैं।ध्यान भविष्य को लाने का प्रयास है जो कठिन है ;उसके लिए सतत श्रम और अथक जागरूकता चाहिए।

8-पहली समाधि अथार्त चौथे से पांचवें की यात्रा बहुत कठिन बात हो जाती

है। पहली समाधि पर आत्मज्ञान उपलब्ध होता है और मनुष्य रुक सकता है। पहली ही बहुत बड़ी बात है, दूसरी समाधि तो और कठिन हो जाती है जिसमे आत्मा से परमात्मा की यात्रा अथार्त ब्रह्मज्ञान होता हैं। और तीसरी तो सर्वाधिक कठिन हो जाती है ...होने से न होने की यात्रा, जीवन से मृत्यु में छलांग, अस्तित्व से अनस्तित्व में डूब जाना।उन तीन समाधियां के कोई नाम नहीं हैं।पहली को आत्म समाधि, दूसरी को ब्रह्म समाधि और तीसरी को कैवल्य/निर्वाण समाधि कह सकते हैं।

9-समाधि के प्रकार;-

महृषि पतंजलि केअनुसार समाधि दो प्रकार की होती है ...

1-सम्प्रज्ञात समाधि

2-असम्प्रज्ञात समाधि

असम्प्रज्ञात समाधि का क्या अर्थ है?-

02 FACTS;-

1- असम्प्रज्ञात समाधि उन योगियों को प्राप्त होती है जिन्होंने देह और इन्द्रियों में आत्म साक्षात्कार से निरंतर अभ्यास एवं उपासना द्वारा उनका साक्षात्कार कर उनकी नश्वरता जड़ता आदि को साक्षात् जान लिया है, और उसके फल स्वरुप नितांत विरक्त हो चुके है | वे लंबेकाल तक देह-इन्द्रिय आदि के संपर्क में न आकर उसी रूप में समाधि जनित फल मोक्ष सुख के समान भोग करते है |

2- जब तक समस्त संस्कार आत्मा में विद्यमान रहते है तब तक कोई भी संस्कार उभरने पर योगी समाधि भ्रष्ट हो जाता है |जब आत्म साक्षात्कार पूर्ण स्थिरता के स्तर पर पहुचता है ; तब ज्ञान अग्नि से समस्त कर्म भस्म हो जाते है |वास्तव में,यह अमनी दशा है।इसमें व्यक्ति को कुछ ज्ञान नहीं रहता। मन जिसका ध्यान कर रहा होता है उसी में लीन रहता है। उसके अतिरिक्त किसी दूसरी ओर उसका मन नहीं जाता।

''सम्प्रज्ञात समाधि’ की पराकाष्ठा में उत्पन्न विवेकख्याति में भी आत्मस्थिति का निषेध करने वाली ‘परवैराग्यवृत्ति’ नेति-नेति यह स्वरूपावस्थिति नहीं है'', के अभ्यास पूर्वक असम्प्रज्ञात समाधि सिद्ध होती है।

3-‘योग-सूत्र’ में ‘असम्प्रज्ञात समाधि’ का लक्षण इस प्रकार विहित है- सभी वृत्तियों के निरोध का कारण सम्प्रज्ञात समाधि से भिन्न असम्प्रज्ञात समाधि है। साधक को जब पर-वैराग्य की प्राप्ति हो जाती है, उस समय स्वभाव से ही चित्त संसार के पदार्थों की ओर नहीं जाता। वह उनसे अपने-आप विरक्त हो जाता है । इस विरक्त अवस्था की प्रतीति का नाम ही या विराम प्रत्यय है।जब इसका अभ्यास-क्रम भी बन्द हो जाता है, त्ब चित्त की वृत्तियों का सर्वथा अभाव हो जाता है ;फिर वह चित्त भी अपने कारण में लीन हो जाता है। अतः प्रकृति के संयोग का अभाव हो जाने पर द्रष्टा की अपने स्वयं में स्थिति हो जाती है। इसे निर्बीज समाधि या कैवल्य-अवस्था के नाम से भी जाना जाता है।

4-वस्तुतः सबीज समाधि ध्यान की वह मौलिक अवस्था है जहां ध्यान में विस्तार तो हो जाता है किन्तु सूक्ष्म रूप में संस्कार विद्यमान रहते हैं। जब तक यह संस्कार मौजूद हैं चाहे सूक्ष्म हों या स्थूल जीव को बंधन में बांधे रहते हैं, यही बंधन जन्म-मरण का कारण बनते हैं।अथार्त साधक किसी न किसी रूप में संस्कारों के आधीन रहता है। निर्बीज समाधि में साधक ध्यान की गहन अवस्था में ध्येय के अंतिम बिंदु पर पहुँच जाता है, यह दशा सभी तरह की वृत्तियों एवं संस्कारों के परे की होती है। इसको ध्यान की सर्वोच्च अवस्था कहा जा सकता है। इस अवस्था में साधक संस्कारों के आधीन नहीं होता, अपितु संस्कार उसके आधीन हो जाते हैं। यही कारण है कि वह जन्म-मरण के भव-बंधन से मुक्त होने में पूरी तरह समर्थ हो पाता है।

5-निर्बीज समाधि में संस्कारों के दग्ध होने का आशय यह है कि इस अवस्था में सारे संस्कार सीमित होकर सतह पर चले जाते हैं, जिससे समस्त वृत्तियों से परे परम शांत अवस्था घटित होती है। यह भौतिक ज्ञान विज्ञान से परे की अवस्था होती है। साधक जब समाधि से बाहर आता है तो वह वाह्य जगत का व्यवहार और अच्छी तरह करता है, क्योंकि परम समाधि की दशा में उसकी सारी विकृतियाँ दूर हो जाती है और उसके सारे संस्कार मर्यादित हो जाते हैं। यही कारण है कि एक सच्चा साधक अपनी आध्यात्मिक एवं भौतिक दोंनों स्थितियों को विस्तार देनें में सफल हो पाता है। इसलिए प्रत्येक साधक को अपने अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहना चाहिए!

सम्प्रज्ञात समाधि का क्या अर्थ है?-

02 FACTS;-

सम्प्रज्ञात समाधि उस अवस्था को कहते है जहां ध्यान में विस्तार तो हो जाता है किन्तु संस्कार सूक्ष्म रूप में विद्यमान रहते हैं।त्रिगुणात्मक अचेतन प्रकृति और चेतन आत्मा तत्व के भेद का साक्षात्कार हो जाता है | इसी का नाम ‘प्रकृति-पुरुष विवेक ख्याति’ है |विवेक ख्याति गुणों की एक अवस्था है |रजस,तमस की प्रचुरता न होने पर सत्व गुण की धारा प्रवाहित होती है | योगी इसका भी निरोध कर पूर्ण शुद्ध आत्म स्वरुप में अवस्थित हो जाता है | साधकों को चाहिए कि सबीज समाधियों को पार करते हुए निर्बीज अवस्था को उपलब्ध हों, जहां स्थिर होने पर धर्ममेध समाधि स्वतः सिद्ध हो जाती है। यही धर्ममेध /असम्प्रज्ञात समाधि साधना का मुख्य धेय है।

2-संप्रज्ञात समाधि को 4 भागों में बांटा गया है-

1-वितर्कानुगत समाधि;-

04 P0INTS;-

1-सूर्य, चन्द्र, ग्रह या राम, कृष्ण आदि मूर्तियों को, किसी स्थूल वस्तु या प्राकृतिक पंचभूतों की

अर्चना करते-करते मन को उसी में लीन कर लेना वितर्क समाधि कहलाता है।मन में सत्य को जानने के लिए और संसार को देखने के लिए एक विशेष तर्क होता है।तीन तरह के तर्क हो

सकते है - तर्क, कुतर्क, वितर्क।कुतर्क का अर्थ है गलत तर्क, जिसमें आशय ही गलत होता है। ऐसी स्थिति में तर्क लगाने का एकमात्र उद्देश्य दूसरे में गलती निकालना होता है, तुम्हें अपने भीतर पता होता है कि यह बात सही नहीं है, फिर भी तर्क के द्वारा तुम उस बात को सही

सिद्ध कर देते हो।वितर्क एक विशेष तरह का तर्क होते हैं, अभी जैसे हम तार्किक रूप से वैराग्य को समझ रहे थे पर ऐसे सुनने समझने की चेतना में प्रभाव हो रहा था, ऐसे विशेष तर्क से चेतना उठी हुई है, तुम एक अलग अवस्था में हो, यही समाधि है।

2-समाधि का अर्थ है समता,'धी' अर्थात बुद्धि, चेतना का वह हिस्सा जिससे तुम समझते हो। जैसे समाधि की अवस्था में हम एक विशेष तर्क से चेतना को समझते हैं।तर्क का कोई भरोसा नहीं होता;यह किसी भी तरह से पलट सकता है । परन्तु वितर्क को पलटा नहीं जा सकता है।

जैसे किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाए तो तुम्हें पता है कि इस व्यक्ति का जीवन अब नहीं है और यह अंतिम सत्य है। ऐसे क्षण में तुम्हारी चेतना एक अलग अवस्था में होती है।जब कोई

फिल्म समाप्त होती है और लोग किसी मॉल से बाहर निकलते हैं, तब कुछ समाप्त हो जाने का भाव रहता है ।वहां सभी एक जैसी चेतना की अवस्था से बाहर आते हैं।

3-ऐसे क्षण में मन में एक विशेष तर्क होता है, एक अकाट्य तर्क, जो तुम्हारी चेतना में स्वतः ही आ जाता है। सब कुछ बदल रहा है, बदलने के लिए ही है। सब समाप्त हो जाना है, ऐसे वितर्क चेतना को उठा देती है। इसके लिए आँखें बंद करके बैठने की भी आवश्यकता नहीं, आँखें खुली हो तब भी 'मैं चेतना हूँ' ऐसा भाव और सब कुछ खाली है । यह पूरा संसार एक

क्वांटम मैकेनिकल फील्ड हैं, जो भी है- यह वितर्क है।सम्पूर्ण विज्ञान तर्क पर आधारित होता है, संसार का एक क्वांटम फील्ड होना अकाट्य वितर्क है,ऐसी अवस्था वितर्कानुगम समाधि है।4-क्वांटम भौतिकी 20वीं शताब्दी का सबसे रोचक व महत्वपूर्ण सिद्धांत था जिसने रेडियोधर्मिता व प्रतिपदार्थ (Antimatter) जैसी प्रक्रियाओं को सफलतापूर्वक ब्याख्यायित किया। साथ ही यह एक ऐसा सिद्धांत है जिसने सूक्ष्म स्तर पर प्रकाश व कणों के व्यवहार की सफलतापूर्वक ब्याख्या की ;लेकिन क्वांटम भौतिकी के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इसे आसानी से समझाया नहीं जा सकता है। क्वांटम ऑब्जेक्ट एक साथ कई अवस्थाओं व स्थानों में अस्तित्व में हो सकते हैं। अनिश्चितता व विरोधाभासों से भरे क्वांटम सिद्धांत की सबसे खास बात यह है कि वह ऑब्जेक्टिव रियेलिटी अर्थात वस्तुनिष्ठ वास्तविकता के अस्तित्व पर ही उंगुली उठाता है, जिसकी वजह से वैज्ञानिक समुदाय में भी इसकी काफी आलोचना होती रही है। यहां तक कि आइजक न्यूटन के बाद के महानतम वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन को भी क्वांटम सिद्धांत को स्वीकार करने में काफी परेशानी का अहसास हुआ था।

2-विचारानुगत समाधि;-

02 P0INTS;-

1-स्थूल पदार्थों पर मन को एकाग्र करने के बाद छोटे पदार्थ, छोटे रूप, रस, गन्ध, शब्द आदि

भावनात्मक विचारों के मध्य से जो समाधि होती है,वह विचारानुगत अथवा सविचार समाधि कहलाती है।विचार में सभी अनुभव आ जाते हैं, सूंघना, देखना, दृश्य, सुनना - जो भी तुम ध्यान के दौरान देखने, सुनने आदि का अनुभव करते हो, वह सभी विचारानुगम समाधि है, विचारों के सभी अनुभव और विचारों के आवागमन को देखना, सभी इसी में आते है।

2-इस समाधि में विचारों की दो अवस्थाएं हो सकती है-पहले तरह के विचार तुम्हें परेशान

करते हैं।दूसरी तरह के विचार तुम्हें परेशान नहीं करते हैं परन्तु तुम्हारी चेतना में घूमते रहते हैं और तुम उनके लिए सजग भी होते हो। तुम समाधि में होते हो, समता में होते हो, पर उसी समय विचार भी आते जाते रहते हैं, यह ध्यान का हिस्सा है। विचार और अनुभव बने रहते हैं, यह विचारानुगम समाधि है।

3-आनन्दानुगत समाधि;-

02 P0INTS;-

1-आनन्दानुगत समाधि में विचार भी शून्य हो जाते हैं और केवल आनन्द

का ही अनुभव रह जाता है।आनन्दानुगम समाधि अर्थात आनंद की अवस्था, जैसे कभी तुम सत्संग में भजन गाते हुए आनंदित हो उठते हो, तब मन एक अलग आनंद की अवस्था में होता है।ऐसे में चेतना उठी हुई होती है, पर आनंद होता है। ध्यान की ऐसी आनंदपूर्ण अवस्था आनन्दानुगम समाधि है।

2-जब तुम एक अकाट्य वितर्क के साथ समाधिस्थ होते हो तब वह वितर्कानुगत समाधि है।ऐसे ही विचारानुगत समाधि में तुम कुछ आते जाते अनुभव, भावों और विचारों के साथ होते हो।आनंद में जो समाधि रहती है वह आनन्दानुगत समाधि है, यह भी एक ध्यानस्थ अवस्था है।

4-अस्मितानुगत समाधि;-

02 P0INTS;-

1-अस्मित अहंकार को कहते हैं। इस प्रकार की समाधि में आनन्द भी नष्ट हो जाता है। इसमें अपनेपन की ही भावनाएं रह जाती है और सब भाव मिट जाते है। इसे अस्मित समाधि कहते हैं। इसमें केवल अहंकार ही रहता है।महृषि पतंजलि इस समाधि को सबसे उच्च समाधि मानते हैं।

2-इनके उपरान्त चौथी समाधि है, अस्मितानुगत समाधि, यह ध्यान की बहुत गहरी अवस्था है। इसमें तुम्हें कुछ पता नहीं रहता है, केवल अपने होने का भान रहता है। तुम्हें बस यह पता होता है कि तुम हो, पर यह नहीं पता होता की तुम क्या हो, कहाँ हो, कौन हो।

केवल स्वयं के होने का भान रहता है, अस्मिता- 'मैं हूँ', इसके अलावा कुछ और नहीं पता होता

है। यह समाधि की चौथी अवस्था है, अस्मितानुगम समाधि। इन चारों समाधि की अवस्थाओं को सम्प्रज्ञाता कहते हैं, अर्थात इन सभी में चेतना का प्रवाह होता है,जागरूकता का प्रवाह होता है।

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अपने भीतर अथार्त समाधि में कैसे प्रवेश करें ?-

15 FACTS;-

1-आप जब भी अपने भीतर प्रवेश करेंगे, तो जिससे आपकी पहली मुलाकात होगी, वह आपकी छाया है,आपकी आत्मा नहीं।वास्तव में, अब तक हम छाया को ही आत्मा मानकर जिये हैं ;इसलिए स्वाभाविक है कि उससे ही हमारा पहले मिलना हो।हर व्यक्ति की एक शैडो है , जो आपको सूरज की धूप में दिखाई पड़ती है, वह छाया नहीं है।हमारे भीतर एक छाया है–जिसको हमने अपनी ही भूल और अज्ञान से अपने भीतर निर्मित कर लिया है। आपकी अस्मिता,अहंकार की वही छाया आपका पीछा करती है।जब सूरज की धूप भी नहीं होती, तब

भी वह छाया आपका पीछा करती है।

2- जिस छाया में आप जीते हैं ; उस छाया को ही मान लेते हैं कि' यह मैं हूं'। और उस छाया के आसपास ही एक संसार निर्मित करते हैं। जैसे ही निर्णय की आंख खुलती है, तो पहली

मुलाकात इसी छाया से/ मनस्-काया से होती है। एक साधक की वास्तविक पहली मुलाकात अंधेरे से ही होती है, झूठे साधक को तो प्रकाश से भी हो सकती है। वह साधक पदार्थ के समुद्र पर अंधकार का आवरण देखता है और उसके भीतर स्वयं को संघर्षरत देखता हैं। उस अंधेरे में ही खोजता हैं और लड़ता हैं। उस अंधेरे में ही उसकी वासनाएं, कामनाएं और संसार है। वह अंधकार और गहन होता जाता है, घना मालूम पड़ता है। सांप के फैलते केंचुल की तरह यह छाया गतिवान होती है , बढ़ती है। लेकिन अंधेरे में खोजते-खोजते एक दिन अंधेरे की पर्त टूट जाती है और हम प्रकाश के लोक में प्रवेश करते हैं।अब ज्ञान के कठिन पथ पर निरंतर संकीर्ण होते जाते द्वार भी दिखते है ।

3-गुरु आपको प्रकाश तो नहीं दे सकता, लेकिन आपके अंधकार को छीन सकता है।वास्तव

में,हम सोचते हैं कि दोनों एक ही बात है लेकिन ऐसा नहीं है। कोई चिकित्सक आपको स्वास्थ्य नहीं दे सकता, लेकिन आपकी बीमारी छीन सकता है। और बीमारी न हो, तो स्वास्थ्य के उपलब्ध होने की संभावना बढ़ जाती है।बीमारी हट जाए, तो स्वास्थ्य प्रगट हो सकता है। समस्त चिकित्साशास्त्र बीमारी को अलग करने का दावा करते हैं, स्वास्थ्य को देने का नहीं। क्योकि स्वास्थ्य दिया भी नहीं जा सकता है ;वह तो आपकी भीतरी क्षमता है। बीमारी न हो, तो स्वास्थ्य प्रगट हो जाता है। जैसे कोई पत्थरों में झरना दबा हो, और हम पत्थर हटा लें,तो झरना प्रगट हो जाए। लेकिन झरना पत्थरों के अलग होने से प्रगट नहीं होता; झरना तो था ही, सिर्फ छिपा था ।

4-तो कोई गुरु ज्ञान नहीं दे सकता है क्योंकि ज्ञान तो छिपा ही है, वह स्वभाव है। लेकिन गुरु आपके अंधेरे को छिन्न-भिन्न कर सकता है। और अंधेरा छिन्न-भिन्न हो जाए, तो आपके भीतर बड़ी घटनाएं घटती हैं ;आपका संसार छिन्न-भिन्न हो जाता है।आपके अंधेरे के छिन्न-भिन्न होते ही आपकी जड़ें गिर जाती हैं। वह जो आपका झूठा लोक है, वह सब तरफ से टूट जाता है, उसकी दीवारें गिर जाती हैं और आप एक खंडहर हो जाते हैं। जैसे कि सुबह से पहले

रात घनी हो जाती है, अंधेरा प्रगाढ़ हो जाता है, वैसे ही जब कोई भीतर एकाग्र होकर देखता है, तो वह जो विराट अंधकार हमने जन्मों-जन्मों में इकट्ठा किया है, वह सघन /कंडेन्स हो जाता है, इकट्ठा होने लगता है। और अगर कोई ठीक से खोज करता रहे, तो ठीक आपकी प्रतिमूर्ति अंधेरे में निर्मित हो जाती है। आपकी ही छाया / निगेटिव, आप अपने को ही खड़ा देख पाते हैं। और अगर इसे गौर से कोई देखता ही चला जाए, तो वह छाया सघन होते-होते छोटी होती चली जाती है। अंत में एक बिंदु मात्र रह जाता है।

5-और जिस दिन वह बिंदु भी विसर्जित हो जाता है, उसी दिन प्रकाश का द्वार खुल जाता है। इस अंधकार की मूर्ति पर जितनी भी एकाग्रता हो, वह उतनी ही छोटी होती चली जाती है, और जितनी हो एकाग्रता कम हो, उतना ही अंधकार बड़ा होता चला जाता है। इसका अर्थ हुआ कि जब ध्यान की क्षमता बढ़ती है, तो अंधकार सीमित होने लगता है। और जब ध्यान की क्षमता नहीं होती, तो अंधकार विराट होने लगता है। ध्यान के अभाव में अंधकार का बड़ा विस्तार है। और ध्यान के साथ ही अंधकार छोटा होने लगता है। एक घड़ी आती है कि अंधकार शून्यवत हो जाता है, नहीं हो जाता है। वह क्षण ही प्रकाश के प्रगट होने काअवसर है।

6-इस प्रकार ध्यान दो काम करता है–अंधकार को छोटा करता है, और प्रकाश के द्वार को

खोलने का उपाय करता है।हमारा अज्ञान का लोक ऐसा है जहां कुछ भी पकड़ में नहीं आता। मुट्ठी बांधते-बांधते पता लगता है कि जिसे पकड़ते थे, वह छूट गया।कोई भी कामना,वासना , इच्छा पकड़ में नहीं आती है,सदा दूर बनी रहती है, और पास पहुंचते-पहुंचते खो जाती है।

कभी किसी क्षण में लगता है कि बस अब पा लिया, और हाथ खोलकर देखते हैं तो वहां सिवाय धुआं के और कुछ भी नहीं होता। जिसे खोजने चले थे, वह फिर दूर कहीं आगे दिखाई पड़ने लगता है। इन्हीं सारी कंडेन्स वासनाओं का नाम है भीतर की छाया। और इस छाया से जो मुक्त नहीं है, वह अपनी आत्मा को कभी नहीं जान सकता।

7-आदि शंकराचार्य ने अस्तित्व को समझने का, देखने का जो ढंग दिया है, उससे इस छाया को समझना आसान होगा।उन्होंने कहा है कि ब्रह्म इस जगत का केंद्र है और यह जो जगत का सारा फैलाव है ;वह माया है... उस ब्रह्म का स्वप्न है।ठीक ऐसे ही अगर हम स्वयं

को आत्मा मानें, तो हमारे आसपास जो एक छोटा-सा संसार वासनाओं का निर्मित हो जाता है, वह हमारी माया है ,छाया है। और प्रत्येक व्यक्ति ब्रह्म है, तो उसके पास भी उसकी माया

का एक विस्तार है। उस छाया की कुछ विशेषता हैं, पहली यह है कि वह होती नहीं है और दिखाई पड़ती है। जब आप रास्ते पर चल रहे होते हैं, और धूप में आपकी छाया पड़ती है, तो वहां कोई सत्व/ सब्सटेन्स / द्रव्य नहीं होता।

8-जितने हिस्से में पीछे प्रकाश की किरणें नहीं पड़ पाती हैं, छाया निर्मित हो जाती है। वह छाया कुछ और नहीं; सिर्फ प्रकाश का अभाव है । इसलिए छुरी से उसे हम काट नहीं सकते, आग से हम उसे जला नहीं सकते और हम उसे मिटाना चाहें, तो मिटाने का भी कोई उपाय नहीं है। क्योंकि जो नहीं है, उसे मिटाया भी नहीं जा सकता। और छाया से कोई लड़ेगा तो हारेगा, जीत भी नहीं सकता है। क्योंकि जो नहीं है, उससे जीतने का भी कोई उपाय नहीं है ।

बहुत लोग छाया से लड़ने में लग जाते हैं और तब उन्हें पराजय के सिवाय कुछ भी हाथ नहीं लगता। जो अपनी वासनाओं से ,संसार से लड़ने में लग जाएगा, वह पराजित होगा। जीतने का रास्ता यहां लड़ना नहीं,बल्कि समझना है। जिसने छाया को समझ लिया, कि वह नहीं है,केवल अभाव है, अनुपस्थिति है तो बात समाप्त हो जाती है। एक बार जान लेने पर कि छाया नहीं है,वह जीतता नहीं, बल्कि उससे मुक्त हो जाता है।

9-आपके भीतर की वासनाएं, आपके भीतर छिपी आत्मा के अनुभव का अभाव है। और जब तक उसका अनुभव न हो जाए, छाया बनेगी। इसका यह अर्थ हुआ कि जैसे सूरज की किरणों का अभाव हो तो छाया बनती है। जब तक अपनी आत्मा की किरणें आप रोक रहे हैं, तब तक आपकी छाया निर्मित हो रही है। जब तक भीतर का प्रकाश कहीं रुक रहा है , तब तक छाया निर्मित हो रही है। छाया से लड़ना व्यर्थ है, इस भीतर के प्रकाश को विस्तीर्ण कर लेना सार्थक है।तब वह जो शैडो पर्सनाल्टी है, खो जाएगी ;अब आप अकेले हैं, केवल आपकी आत्मा ही है।उसके आसपास कोई छाया का आवरण नहीं है।

10-एक मनुष्य की यात्रा कमल के फूल की यात्रा के समान है।उदाहरण के लिए कमल की जड़ें तो दलदल में, मिट्टी में होती हैं परन्तु उसकी पंखुड़ियां खुलती हैं सूर्य-मंडित प्रकाश, के जगत में।एक तरफ जुड़ा होता है पृथ्वी के दलदल से, और दूसरी तरफ जुड़ा होता है प्रकाश के लोक से। इसलिए विष्णु के, महावीर के बुद्ध के,चरणों में कमल का फूल रखा गया है।

कमल का फूल प्रतीक है कि संसार दलदल है, लेकिन उससे दुश्मनी करने का

कोई प्रयोजन नहीं है। क्योंकि कमल भी अगर अपनी मिट्टी से दुश्मनी करे, तो उठ नहीं पाएगा। कमल उठता तो उसी मिट्टी के सहारे है। उसी मिट्टी से बल पाता है और वही है उसका प्राण।उस मिट्टी में जो व्यर्थ है, वह छोड़ देता है और उस मिट्टी में जो सार है, उसे खींच लेता है। और तब उसी मिट्टी में से सब व्यर्थ छूट जाता है और सौंदर्य का पूरा रस प्रगट हो जाता है।

11-आदमी के आसपास भी मिट्टी है और दलदल है।एक साधक का जो मार्ग है इसका प्रारंभ तो दलदल में है, ठीक मिट्टी में है, पृथ्वी में है; परन्तु इसका शिखर निर्वाण है, प्रकाश-मंडित है। यह एक छोर पर जो संसार है, वही दूसरे छोर पर मोक्ष है। और एक छोर पर जो शरीर है, वही दूसरे छोर पर आत्मा है। और एक छोर पर जिसे हम माया की तरह जानते हैं, वही दूसरे छोर पर ब्रह्म की परम अनुभूति हो जाती है।जगत में वस्तुतः विरोध नहीं है। और अगर विरोध दिखता है, तो इन दो विराट छोरों को हम नहीं जोड़ पाते हैं, इसलिए दिखता है। वह हमारी

अक्षमता है।हमारी सीमा है कि हमारी दृष्टि छोटी है।

12-जब हम संसार को देखते हैं, तो हम मोक्ष को नहीं देख पाते हैं। और जब हमारी आंखें मोक्ष की तरफ उठती हैं, तब हम संसार को नहीं देख पाते। और जो पूरे मार्ग को देख पाएगा, वह कह