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क्या अर्थ है मनन, एकाग्रता और ध्यान का ? क्या भगवान विष्णु के अवतार  मानव की एवोल्यूशन थ्योरी का रह


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क्या अर्थ है मनन, एकाग्रता और ध्यान का ? ;-

11 FACTS;-

1-मनन का अर्थ है दिशाबद्ध विचारना। हम सब विचार करतें हैं, लेकिन वह मनन नहीं है। वह विचारना दिशा रहित है, अस्पष्ट है ,सिर्फ मन का एसोसिएशन है।इसी कारण एक विचार अपने आप ही दूसरे विचार पर चला जाता है।उदाहरण के लिए जिस क्षण तुम एक कमल

का फूल देखते हो, तुम्हारा मन फूलो के संबंध में सोचने लगता है। और उसके साथ तुम्हारा बचपन चला आता है ;फिर कमल का फूल तो भूल जाते हैं और एसोसिएशन के प्रभाव के कारण तुम अपने बचपन के संबंध में सोचने लगते हो।और फिर बचपन के साथ जुड़ी हुई अनेक चीजें आती हैं, और तुम उनके बीच चक्कर काटने लगते हो।यदि कभी तुम सोचने,

विचारने से पीछे हटकर वहां जाओ जहां से विचार आया था।और जब एक एक-कदम पीछे हटोगे तब तुम पाओगे कि वहां कोई दूसरा ही विचार था जो इस विचार को लाया।और कमल के फूल और तुम्हारे बचपन के बीच कोई Association/संगति नहीं है, सिर्फ मन का एसोसिएशन है।

2-हरेक मनुष्य के मन में एसोसिएशन की श्रृंखला है और कोई भी घटना उस श्रृंखला से जुड़ जाती है। तब मन कंप्यूटर की भांति काम करने लगता है और एक से दूसरी , दूसरी से तीसरी बात निकलती चली जाती है। दिन भर हम यही करते रहते है।जब विचार मनन

बनता है ;तब वह एसोसिएशन के कारण नहीं, निर्देशन से चलता है। अगर तुम किसी खास समस्या पर काम कर रहे हो तो तुम सब एसोसिएशन की श्रृंखला को अलग कर देते हो और उसी एक समस्या के साथ गति करते हो। तब तुम अपने मन को निर्देश देते हो। मन तब भी इधर उधर से, किसी पगडंडी से किसी एसोसिएशन की श्रृंखला पकड़कर भागने की चेष्टा करेगा। लेकिन तुम अन्य सभी रास्तों को रोक देते हो और मन को एक मार्ग से ले चलते हो। तब तुम अपने मन को दिशा देते हो।

3-कोई भी तार्किक विचारक मनन है और विज्ञान मनन पर आधारित है। उसमें विचार निर्देशित है, दिशाबद्ध है। विचार की दिशा निश्चित है। सामान्य विचारना तो व्यर्थ है परन्तु मनन तर्कपूर्ण , बुद्धिपूर्ण है।किसी समस्या में संलग्न एक वैज्ञानिक, एक गणितज्ञ मनन करता है।जब कवि किसी फूल पर मनन करता है तब शेष संसार उसके मन से ओझल हो जाता है। तब केवल दो ही होते हैं...फूल और कवि, और कवि फूल के साथ यात्रा करता है। रास्ते में अनेक चीजें आकर्षित करेंगी, लेकिन वह अपने मन को कहीं नहीं जाने देता है और एक ही दिशा में गति निर्देशित करता है।इसे मनन कहते है।

4-साधारण मन दिशाहीन, अनियंत्रित विचारक से और वैज्ञानिक मन दिशाबद्ध विचारना से संबंधित है ।योगी का चित्त अपने चिंतन को एक बिंदु पर केंद्रित रखता है, वह उसे गति नहीं करने देता।फिर एक बिंदु पर होने को एकाग्रता कहते हैं। एकाग्रता एक बिंदु पर ठहर जाना है। यह विचारना नहीं है, सामान्य विचारणा में मन पागल की तरह गति करता है। मनन में पागल मन निर्देशित हो जाता है, उसे जहां तहां जाने की छूट नहीं है। एकाग्रता में मन को गति की ही छूट नहीं रहती। साधारण विचारणा में मन कहीं भी गति कर सकता है; मनन में किसी दिशा विशेष में ही गति कर सकता है; एकाग्रता में वह कहीं भी नहीं गति कर सकता।योग का संबंध एकाग्रता से है ; जिसमें उसे एक बिंदु पर ही रहने दिया जाता है। सारी ऊर्जा, सारी गति एक बिंदु पर स्थिर हो जाती है।

5-इसके बाद है ध्यान।चार अवस्थाएं हैं ..साधारण विचारना,मनन, एकाग्रता और ध्यान। साधारण विचारणा में मन कहीं भी जा सकता है। मनन में उसे एक दिशा में गति करने की इजाजत है, दूसरी सब दिशाएं वर्जित हैं। एकाग्रता में मन को किसी भी दिशा में गति करने की इजाजत नहीं है, उसे सिर्फ एक बिंदु पर एकाग्र होने की छूट है। और ध्यान में मन है ही नहीं।

ध्यान का अर्थ है, 'अमन' जिसका अर्थ है निर्विचार।। उसमें एकाग्रता के लिए भी गुंजाइश नहीं है; मन के होने की ही गुंजाइश नहीं है। यही कारण है कि ध्यान को मन से नहीं समझा जा सकता। एकाग्रता तक मन की पहुंच है, मन की पकड़ है। मन एकाग्रता को समझ सकता है, लेकिन' मन ध्यान को नहीं समझ सकता क्योकि वहां मन की पहुँच हीं नहीं है। एकाग्रता में मन को एक बिंदु पर रहने दिया जाता है; ध्यान में वह बिंदु भी हटा लिया जाता है। साधारण विचारणा में सभी दिशाएं खुली रहती हैं; एकाग्रता में दिशा नहीं, एक बिंदु भर खुला है; और ध्यान में वह बिंदु भी नहीं खुला है। वहां मन के होने की भी सुविधा नहीं है।

6- विचार करना मन की साधारण दशा है,और ध्यान उसकी उच्चतम संभावना है।सामान्य विचार/एसोसिएशन करना निम्नतम है और उच्चतम शिखर है ध्यान, ''अमन''।अगर तुम अपने विचार करने की प्रक्रिया को घटाते जाओ, तो तुम धीरे -धीरे 'अमन 'की अवस्था को पहुंच

जाओगे। 'मन' विचार करने की प्रक्रिया है और 'अमन' की दशा विचार करने की प्रक्रिया का

अभाव है।अगर विचार करने की प्रक्रिया गहरी होती जाए तो तुम केवल मन की ओर बढ़ रहे हो। और अगर विचार की प्रक्रिया क्षीण होती जाए, तो तुम 'अमन' की ओर बढ़ने में स्वयं की मदद कर रहे हो। यह तुम पर निर्भर है और मन सहयोगी हो सकता है, अगर तुम उसके साथ

बिना कुछ किए अपनी चेतना को स्वयं पर छोड़ दो क्योकि यही ध्यान बन जाता है।

7-इस प्रकार दो संभावनाएं हैं।पहली यह कि क्रमश: तुम अपने मन को ,अपने मानसिक फर्नीचर को घटाओ। अगर वह एक प्रतिशत घटे तो तुम्हारे भीतर 99% मन है और एक प्रतिशत 'अमन'।दूसरी संभावना यह हैं कि सब फर्नीचर तुरंत और इकट्ठा फेंका जा सकता है। उसी क्षण तुम अपने सारे मानसिक फर्नीचर से मुक्त हो सकते हो।लेकिन तब तुम अचानक रिक्त, खाली, शून्य हो जाओगे और तुम्हें पता नहीं रहेगा कि तुम कौन हो। यह हो सकता है कि घटना तीव्र गति से घट जाए और उसके उपाय भी हैं।लेकिन उसका धक्का, उसकी चोट इतनी तीव्र हो सकती है कि तुम पागल भी हो सकते हो।इसलिए तीव्र गति की विधियां प्रयोग में नहीं लायी जाती हैं।

8-यह बात क्रमिक भी हो सकती है और अचानक एक छलाँग में भी।उदाहरण के लिए अगर तुमने अपने कमरे से कुछ फर्नीचर हटा दिया तो थोड़ा खाली स्थान, थोड़ा आकाश वहां पैदा हो जायेगा।और फिर ज्यादा फर्नीचर हटा दिया तो और ज्यादा आकाश पैदा हो जायेगा ।और

जब सब फर्नीचर हटा दिया तो समूचा कमरा आकाश हो जायेगा।वास्तव में, फर्नीचर हटाने से कमरे में आकाश नहीं पैदा हुआ, आकाश तो वहां था ही ... वह कहीं बाहर से नहीं आता है।

केवल आकाश फर्नीचर से भरा था, जो तुमने हटा दिया और आकाश फिर से उपलब्ध हो गया।मन भी एक प्रकार का आकाश है जो विचारों से भरा है। तुम थोड़े से विचारों को हटा दो और आकाश फिर से प्राप्त हो जाएगा। अगर तुम विचारों को हटाते जाओ ;तो तुम धीरे -धीरे आकाश को फिर से हासिल कर लोगे और यही आकाश ध्यान है।

8-यह आवश्यक नहीं है कि जन्मों जन्मों तक धीरे धीरे फर्नीचर हटाया जाए, क्योंकि उस प्रक्रिया की भी अपनी कठिनाई है। जब धीरे धीरे फर्नीचर हटाते हो तो पहले एक प्रतिशत आकाश पैदा होता है और शेष 99% भरा का भरा रहता है जो एक प्रतिशत खाली आकाश के संबंध में अच्छा अनुभव नहीं करेगा, वह उसे फिर से भरने की चेष्टा करेगा।तो मनुष्य

एक तरफ से विचारों को कम करता है और दूसरी तरफ से नए नए विचार उत्पन्न करता है। सुबह तुम थोड़ी देर के लिए ध्यान करते हो, उसमें तुम्हारी विचार की प्रक्रिया धीमी हो जाती है। फिर तुम कहीं बाहर जाते हो जहां विचारों की दौड़ शुरू हो जाती है। स्पेस/आकाश फिर से भर गया। दूसरे दिन तुम फिर वही सिलसिला दोहराते हो, उसे रोज दोहराते हो ..विचारो को बाहर निकालना, फिर उन्हें भीतर लेना।

9-तुम एक साथ भी सब फर्नीचर बाहर फेंक सकते हो ..यह तुम्हारा निर्णय है। यह कठिन जरूर है, क्योंकि तुम फर्नीचर के आदी हो गए हो ;उसके बिना समस्या अनुभव होगी। तुम्हें समझ में नहीं आएगा कि स्पेस /आकाश का क्या करें। तुम उसमें गति करने से भी डरोगे, क्योकि तुमने ऐसी स्वतंत्रता में कोई गति नहीं की है।मन एक संस्कार है।हम विचारों

के आदी हो गए हैं और रोज वही विचार दोहराते रहते है।उसका केवल एक ही उपयोग है कि

वह एक लंबी आदत बन गया है ।तुम प्रतिदिन अपने बिस्तर पर नींद की प्रतीक्षा करते हो और वही बातें रोज मन में दोहराती रहती हैं। यह तुम रोज करते हो और पुरानी आदतें संस्कार के रूप में सहायता करती हैं। एक बच्चे को टैडी बियर चाहिए,उसे वह मिल जाए तो नींद आ जाएगी। और तब तुम उससे टैडी बियर ले सकते हो।लेकिन उसके बिना बच्चे को नींद न आएगी। यह भी एक लंबी आदत है कि टैडी बियर मिलते ही उसके मन में कुछ प्रेरणा होती है, और वह नींद में उतरने के लिए राजी हो जाता है।

10-वही बात तुम्हारे साथ हो रही है।तुम्हें एक नए कमरे में नींद आने में कठिनाई होती है। अगर तुम किसी खास ढंग के पकड़े पहनकर सोने के आदी हो तो तुम्हें प्रतिदिन उन्हीं खास कपड़ों की जरूरत पड़ेगी।किसी- किसी को तब तक नींद नहीं आती है जब तक वह मंत्र जप न करे और तब तक वह नहीं सो सकता है। पुरानी आदतों के साथ व्यक्ति आराम अनुभव करता है, वह सुविधाजनक है।वैसे ही सोचने के ढंग की भी आदतें हैं।प्रतिदिन वही विचार, वही दिनचर्या हो ..तो तुम्हें लगता है कि सब ठीक चल रहा है और वही समस्या है। तुम्हारा फर्नीचर महज कचरा नहीं है जिसे फेंक दिया जाए, क्योकि तुमने उसमें बहुत धन खर्च

किया है।इससे कोई अचानक पागल हो जा सकता है, क्योंकि उसके पुरानी आदतें /बाधा नहीं रहे ;जिससे अतीत तुरंत विदा हो जाता है।तुम या तो अतीत में रहते हो या भविष्य में और भविष्य को तो हम सदा अतीत की भाषा में सोचते हैं इसलिए तुम भविष्य की भी नहीं सोच सकते।सिर्फ वर्तमान बचा रहता है, और तुम कभी वर्तमान में नहीं रहते । 11-इसलिए जब तुम पहली बार मात्र वर्तमान में होओगे तो तुम्हें लगेगा कि तुम पागल हो गए हो।यही कारण है कि Quick Response विधियां उपयोग में नहीं लायी जाती हैं। और वे तभी उपयोग में लायी जाती हैं जब जब तुमने ध्यान के लिए अपना समूचा जीवन अर्पित कर

दिया हो।इसलिए क्रमिक विधियां ही अच्छी हैं। वे लंबा समय लेती हैं, लेकिन तुम धीरे -धीरे

आकाश के आदी हो जाते हो और तुम्हारा फर्नीचर धीरे -धीरे हट जाता है। इसलिए सामान्य विचार, मनन, एकाग्रता और ध्यान, ये चार चरण हैं ।साधारण विचार से मनन पर जाना , मनन से एकाग्रता पर जाना एक क्रमिक विधि है। और एकाग्रता से ध्यान पर छलांग लगाना अच्छा है। तब तुम जमीन को प्रत्येक कदम पर अनुभव करते हुए धीरे -धीरे गति करते हो।और तभी तुम प्रत्येक कदम में जड़ जमाते हुएअ गला कदम शुरू करने/ संतुलित करने की सोचते हो।और तब बात आती है समाधि की ...यह छलांग नहीं , एक क्रमिक विकास है।

क्या विष्णु के अवतार मानव की एवोल्यूशन थ्योरी का रहस्य बताते हैं?

02 FACTS;-

1-सनातन धर्म की मान्‍यताएं और विज्ञान के तर्क कहीं न कहीं किसी मोड़ पर आकर एक-दूसरे के पूरक ही साबित होते हैं। इसका एक योग्‍य उदाहरण है पुराणों में वर्णित भगवान विष्‍णु के 09 अवतार जो मानव जीवन के विकास और सभ्यता के विकास की असाधारण झलक है। श्रीहरि के इन अवतारों का संबंध विज्ञान से भी है।

2-हिंदू धर्म में इसकी व्याख्या आज से हजारों साल पहले हो चुकी है। भगवान विष्णु के अवतार की कहानी माइथोलॉजी से अधिक विकासवादी सिद्धांत से संबंधित है।जिस प्रकार विष्णु के अवतार और डार्विन के सिद्धांत के अनुसार मनुष्यों का विकास हुआ ...यह आश्चर्यजनक है और एक दुसरे से काफी मिलती जुलती है।भगवान के ये अवतार मानव सभ्‍यता के विकास के क्रम को दर्शाते हैं और एक-दूसरे से जुड़े हैं…

1-मत्स्य अवतार:-

03 POINTS;-

1-यह अवतार भगवान विष्णु के अवतारों में से सबसे पहला अवतार है। पुराणों के अनुसार भगवान नें एक मछली के रूप में राजा सत्यव्रत को तत्वज्ञान दिया था और उन्हें भविष्य में आने वाले प्रलय से बचने का उपाय बताया था।

2-डार्विन के सिद्धांत के मुताबिक, जीवन की शुरूआत सागर में रहने वाले जीवों से हुई है , जैसे की मछलियां।और पानी जीवन को बचाये रखने के लिए सबसे ज़रूरी तत्व है अर्थात पानी के बिना जीवन संभव नहीं है।

3-नव चक्र के सिद्धांत के मुताबिक वह साधक जो अभी इस माया जगत में सर्वाइव नहीं कर पा रहा है;जो संसार में हर समय केवल समस्याएं ढूंढा करता है और जो मानता है कि सभी लोगों को उसकी सहायता करनी चाहिए, परंतु लोग ऐसा नहीं कर रहे हैं।वह अभी पहले ही अवतार अर्थात मछली के रूप में है... मूलाधार चक्र में है।मछली तो केवल यही चाहती है कि सभी उसको दाना डालें और इसीलिए पूरे संसार में सबसे ज्यादा मछली का ही शोषण होता है क्योंकि दाने के साथ कांटा भी तो डाला जाता है ;जिसमें फँसकर उसका जीवन चला जाता है।और यही उस व्यक्ति के साथ भी होता है जो मछली की स्टेज में होता है। 2-कूर्म अवतार:-

03 POINTS;-

1-यह भगवान विष्णु का दूसरा अवतार था, जिसमें भगवान कूर्म (कछुए) का रूप धारण कर समुद्र मंथन में सहायता करते हैऔर यह मत्स्य अवतार के बाद वाला अवतार है।

2-विकासवाद के सिद्धांत के मुताबिक, इस चरण में जीवन जल से थल की ओर प्रस्थान करता है।दूसरे चरण में जलीय जीवों नें समुद्र से बाहर निकल ज़मीन पर चलना शुरू किया और इस तरह से उभयचर अस्तित्व में आये।कछुआ भी एक उभयचर ही है जो भूमि और जल दोनों में रहने के लिए अनुकूल होता है।

3-जीवन विकास के क्रम में पानी से बाहर निकल कर साधक उभयचर बनता है जो जीवन के विकास का दूसरा चरण है।नव चक्र के सिद्धांत के मुताबिक वह साधक जो इस माया जगत में सर्वाइव करना सीख लेता है ; जो फूलों के साथ कांटे भी होंगे ,ऐसा मानकर जीवन में आगे बढ़ता है।इसके अतिरिक्त मुलायम होते हुए भी वह कठोर कवच के अंदर प्रवेश करके संसार में कार्य करके अपनी सहायता करता है। यहीं से एक साधक का एवोल्यूशन प्रारंभ हो जाता है। और वह अपने दूसरे मूलाधार चक्र में प्रवेश कर लेता है। 3-वराह अवतार:-

03 POINTS;-

1-धर्म ग्रंथों के अनुसार जब दैत्य हिरण्याक्ष नें पृथ्वी को समुद्र में छिपा दिया था तब भगवान विष्णु नें वराह (सूअर) का रूप धारण कर पृथ्वी को पुनः वापस लाये थे।वराह अवतार विष्णु का तीसरा अवतार था और उन्हें धरती से महासागर की यात्रा करने के लिए पैरों की ज़रूरत पड़ी थी।जीवन के विकास में अगला पड़ाव था पैरों का क्योंकि बिना पैरों के धरती पर लंबी दूरी तय करना आसान नहीं था। इसलिए इस प्रजाति को पूर्ण करने के लिए पैरों का विकास शुरू हुआ।

2-डार्विन के सिद्धांत के अनुसार उभयचर से विकसित होकर जीवों नें पूर्ण रूप से भूमि पर रहना शुरू कर दिया। भगवान का यह रूप भी एक वराह का था जो भूमि पर ही निवास

करता है।जल-थल में रहते-रहते जीवन भूमि के लिए भी अनुकूल हो गया।विकास के क्रम में प्रजनन क्रिया के लिए धरती उनके लिए अनुकूल हो गई।

3-नव चक्र के सिद्धांत के मुताबिक वह साधक जो गंदगी से बैर ना करके, इस माया जगत में आगे बढ़ना सीख लेता है ; इवॉल्व होने को महत्व देता है। वह साधक अपने तीसरे मणिपुर चक्र में पहुंच जाता है। 4-नृसिंह अवतार:-

03 POINTS;-

1-नृसिंह अवतार में ईश्वर नें हिरण्यकशिपु का वध कर अपने परम भक्त प्रहलाद की रक्षा की थी। यह भगवान का वह रूप था जिसमें उन्होंने आधा मनुष्य और आधा पशु का रूप धारण किया था ।

2-डार्विन के सिद्धांत के अनुसार भी जीव अगले चरण में पशु रूप से आगे बढ़ मनुष्य के रूप

में विकसित हो रहे थें।इस चरण में जीवन जानवर से मनुष्य की ओर परिवर्तित होता है।आंशिक रूप से मानव का विकास होता है, जिसमें वह पैरों पर चलना सीखता है।उसका शारीरिक विकास तो होता है किन्तु मानसिक विकास नहीं हो पाता है। अगर आदि मानव को देखा जाए तो नीचे के हिस्सों को मानव की तरह और ऊपर के हिस्से को जानवर की तरह देखा जा सकता है। जानवर मनुष्य के रूप में विकसित होने पर ऐसे ही दिखते हैं।विकास के क्रम में होमो सेपियंस की अवधारणा अगली कड़ी थी, जिसे विकासवाद के सिद्धांत में मील का पत्थर माना जाता है। इस चरण में जानवर मानव के रूप में दो पैरों पर चलना सीखता है।

3- नरसिम्हा अवतार को आधा मानव और आधा जानवर का अवतार माना जाता है और यह जानवर से मनुष्य में परिवर्तन के संकेत के तौर पर है।नव चक्र के सिद्धांत के मुताबिक इस चरण में मानव का आधा विकास हो जाता है।साधक का शरीर भले ही मानव का हो गया है लेकिन दिमाग अथवा मस्तिष्क अभी भी जानवरों वाला ही है। वह इवॉल्व होने को महत्व देता है लेकिन आगे बढ़ने के लिए क्रूरता और करुणा दोनों को धारण करता है। परंतु उसका मानसिक संतुलन ऐसा नहीं होता कि वह अपने पर नियंत्रण कर सके।अभी भी वह इंद्रियों के ही नियंत्रण में रहता है।इस प्रकार वह अपने चौथे अनाहत चक्र में प्रवेश कर देता है। 5-वामन अवतार:-

03 POINTS;-

1-भगवान विष्णु नें यह अवतार असुरों के राजा बलि का वध कर उसके अहंकार को तोड़ने के लिए लिया था। राजा बलि नें अपनी शक्तियों से स्वर्ग लोक पर कब्जा कर लिया था और इस कारण भगवान नें वामन (बौने) का अवतार लेकर उनसे दान के रूप में तीन पग धरती मांगी। जब बलि नें उनका यह दान स्वीकार किया तब भगवान नें एक विशाल रूप धारण किया और एक पग में धरती, दुसरे पग में स्वर्ग और तीसरे पग में राजा बलि को अपने पैर के नीचे लेकर उन्हें पाताल लोक पहुचा दिया।

2-डार्विन के सिद्धांत के मुताबिक,मनुष्यों नें विकसित होना प्रारंभ किया था परन्तु उनका पूर्ण रूप से विकास नहीं हुआ था। मानव का शुरूआती आकार बौना ही था।इस चरण में मानव, जानवर से अधिक मानव की तरह प्रतीत होता है, लेकिन आकार में काफ़ी बौना होता है।

3-हिंदू धर्म- भगवान विष्णु का यह पांचवा अवतार मनुष्य के बेहद करीब है।यह अवतार मनुष्य के रूप में बुद्धि के विकास का भी शुरूआती संकेत है।नव चक्र के सिद्धांत के मुताबिक इस चरण में मानव बुद्धि का विकास हो जाता है।वह अपने पांचवे विशुद्ध चक्र में

प्रवेश कर देता है।इस चक्र से पशुता समाप्त हो जाती है और ज्ञान का उदय होता है।परंतु ज्ञान बढ़ने के साथ शक्ति का अभाव होता है। 6-परशुराम अवतार:-

03 POINTS;-

1-अपने छठे अवतार में भगवान विष्णु नें परशुराम का अवतार लेकर धरती से समस्त अत्याचारी राजा का वध कर उनको समाप्त कर दिया था।

2-डार्विन के सिद्धांत के अनुसार अब तक मनुष्य पूर्ण रूप से विकसित हो चुका था परन्तु उनके रहने का तरीका भिन्न था, वह जंगलों में वास करते थें और गुफाओं में रहते थें और अपनी रक्षा के लिए पत्थर तथा लकड़ियों के हथियारों से युद्ध करते थें, ठीक वैसे ही जैसे

परशुराम किया करते थें।इस चरण में मानव पहले की अपेक्षा काफ़ी लंबा था और अब वह औजार का इस्तेमाल भी करना जान गया था। इस चरण में जैविक विकास पूर्ण हो जाता है और इंसानी दिमाग बिना किसी कारण के भी कार्य करने लगता है।

3- भगवान विष्णु के छठे अवतार को 'परशुरामावतार' अर्थात वनवासी के नाम से जाना जाता है।भगवान परशुराम गुफाओं में रहते थे और पत्थर व लकड़ियों से बने औजारों का इस्तेमाल किया करते थे।उस वक्त इनका हथियार कुल्हाड़ी थी।आमतौर पर परशुराम को शक्तिशाली ,ज्ञानी परंतु एक क्रोधी ऋषि के रूप में जाना जाता है।।नव चक्र के सिद्धांत के मुताबिक इस चरण में आकर साधक ज्ञान और शक्ति में संतुलन बना लेता है और आज्ञा चक्र में प्रवेश कर जाता है ;परंतु शांति प्राप्त नहीं कर पाता। 7-श्रीराम अवतार:-

03 POINTS;-

1- भगवान विष्णु के सातवें अवतार को राम अवतार के रूप में जाना जाता है और देवता के रूप में मंदिरों में उनकी पूजा की जाती है।इस अवतार में वह एक स्वाभिमानी व मर्यादा पुरुषोत्तम राजा का रूप धारण करते है और धरती से रावन जैसे अधर्मी और अहंकारी राक्षस का वध करते है। मनुष्य के तौर पर श्रीराम ने सभ्यता का विकास किया और तीर-धनुष से लेकर कई औजारों को विकसित किया। उन्होंने छोटे-छोटे समुदाय और गांवों का भी विकास किया।

2-डार्विन के सिद्धांत के अनुसार अगले चरण में मनुष्य सभ्य रूप से एक समाज में रहना शुरू करते है और बड़े प्रेम भाव से हर समस्या का समाधान निकालते है, ठीक वैसे ही जैसे राम

राज्य में हुआ करता था। इस चरण में मानव का सही तरह से विकास हुआ और मनुष्य ने एक-दूसरे का सम्मान करना शुरू कर दिया।डार्विन ने 'सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट' (योग्यतम उत्तरजीविता का सिद्धांत) का सिद्धांत दिया।सच में मानव का अस्तित्व यहीं से शुरू होता है।

3- इस संसार में सभ्यता को ,डेमोक्रेसी को इंट्रोड्यूस करने वाले श्रीराम ही है। श्रीराम एक योद्धा (फायर एलिमेंट )है ,ज्ञानी (एयर एलिमेंट)है और संवेदनशील( वॉटर एलिमेंट) हैं। उनमें इन तीनों गुणों का संगम है। वह अपने तीनों एलिमेंटल सर्किल को पूरे कर लेते हैं। इसीलिए राम महान है,भगवान है और उनकी पूजा की जाती है।वास्तव में, तीनों एलिमेंट सर्किल पॉइंट 5 है और ब्रह्म भी पॉइंट 5 है।जब दोनों पॉइंट फाइव मिल जाते हैं तो साधक पूर्ण हो जाता है।नव चक्र के सिद्धांत के मुताबिक इस चरण में आकर साधक अपने तीनों एलिमेंट सर्किल (पॉइंट 5 )पूरे कर अपने ललाट चक्र में पहुंच जाता है।

8-श्रीकृष्ण अवतार:-

03 POINTS;-

1-द्वापरयुग में भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण अवतार लेकर अधर्मियों का नाश किया। उन्हें धर्म-अधर्म, जीवन-मृत्यु, मोक्ष और कर्म.. हर विषय में ज्ञान था। वह राजनीति, कूटनीति, मित्रता व शत्रुता हर रिश्ते निभाने में परिपक्व थें।

2-डार्विन के अनुसार भी मनुष्य अब तक अपने जीवन के वास्तविकता को समाझने में सक्षम

हो गया था।मानव जाति ने औजारों और हथियारों का उपयोग करने के लिए सीखना जारी रखा। सभ्यताओं का गठन किया, युद्ध लड़े गये, साम्राज्य बने और आज यही दुनिया के रूप में अस्तित्व में है, जिसे हम देख रहे हैं। यहां की मुख्य विशेषता जीवन और समाज की बढ़ती जटिलता है। इसी चरण में इंसानों की चेतना का विकास हुआ। मानव ने संगीत और नृत्य आदि से प्यार करना शुरू कर दिया।

3- भगवान विष्णु के 8 वें अवतार को कृष्णावतार के रूप में जाना जाता है और श्रीराम की तरह ही मंदिरों में इनकी भी पूजा की जाती है। यह अवतार स्पष्ट रूप से उन्नत मानव सभ्यता का प्रतिनिधित्व करता है।द्वारका शहर आज के शहरों की प्रतिमूर्ति ही नहीं 10 गुना उन्नत है। जिसकी पुष्टि खुदाई में मिले अवशेषों से भी हुई है कि किस तरह से इस नगर को बसाया गया था।श्रीकृष्ण तीनों एलिमेंट से परे है।उनका हर निर्णय धर्म-अधर्म ,सुख- दुख ,हानि- लाभ, यश- अपयश, जन्म -मरण से परे साम्यावस्था का होता है। जब तक हम अच्छाई -बुराई में फंसे हैं ;हम उस तक नहीं पहुंच सकते। गंगा भी उसकी हैं और गंदा नाला भी उसी का है।वास्तव में,हम ब्रह्म स्वरूप में तभी पहुंच सकते हैं ,जब हम अच्छाई -बुराई से पार उस मैदान में जाएं।तभी हमारी उससे मुलाकात होती है।नव चक्र के सिद्धांत के मुताबिक इस चरण में आकर साधक अपने ब्रह्म स्वरूप में बिन्दु चक्र में पहुंच जाता है। 10-कल्कि अवतार: -

03 POINTS;-

1-यह भगवान विष्णु का नवां अवतार है। कहते है कि कलयुग में बढ़ते अधर्म, भ्रष्टाचार और पापों को नष्ट करने के लिए ईश्वर यह रूप लेंगे। डार्विन नें भी अपने सिद्धांत के अंतिम चरण में यह कहा है कि मनुष्य अपनी सीमाओं को पार कर अधर्म के ओर अग्रसर होगा, इंसान इतना अहंकारी हो जाएगा की वह अज्ञानता के अन्धकार में खो जाएगा।

2-बिग बैंग सिद्धांत और अन्य आधुनिक सिद्धांतों के मुताबिक, ब्रह्मांड स्थिर नहीं है।दुनिया में जीवन का ट्रांसफॉरमेशन ज़रूर होता है, ताकि जीवन की फिर से शुरूआत हो सके और जीवन इवॉल्व कर सके । यही वजह है कि दुनिया हर रूप में अनवरत जारी है।पौराणिक

कथाओं के अनुसार कल्कि अवतार अभी तक नहीं हुआ है; लेकिन यह माना जाता है कि दुनिया में पाप की सीमा पार होने पर विश्व में दुष्टों का संहार करने के लिए भगवान विष्णु कल्कि अवतार में प्रकट होंगे।उसके बाद वे पूरी दुनिया को ट्रांसफॉरम कर इस धरती पर फिर से नए जीवन का सृजन करेंगे।

3-9 का अंक शक्ति का, शक्ति की चरम सीमा का अंक होता है।आज धरती अपनी उन्नति की चरम सीमा पर है, परंतु उसकी उन्नति अब रुक गई है ,स्टैग्नेंट हो गई है। यदि पानी स्टैग्नेंट हो जाए तो बदबू फैलाने लगता है। इसलिए पानी का फ्लो होना बहुत जरूरी है। हमारी पृथ्वी भी बेबी प्लैनेट ही है। हर प्लेनेट अपनी चरम सीमा तक विकास करने के बाद डेवलप्ड हो जाता है।आज हम जिन एलियंस की बात करते हैं ...अगला युग पृथ्वी पर शायद उन्हीं एलियंस का ही होगा।मनुष्य एलियंस के रूप में ही ट्रांसफार्म हो जाएगा। और पृथ्वी भी बेबी प्लैनेट की जगह एलियंस के डेवलप्ड प्लैनेट की तरह हो जाएगी।

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मानव शरीर के नव द्वार का क्या अर्थ है?-