क्या नवरात्रि -पूजन के 9 दिवस नवचक्रों के जागरण का समय है ?


नवरात्रि अथार्त नवचक्रों का जागरण ;-

08 FACTS;-

1-नवरात्रि हिंदुओं का एक महत्वपूर्ण प्रमुख पर्व है ;जिसे पूरे भारत में महान उत्साह के साथ मनाया जाता है।नवरात्रि एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है 'नौ रातें'। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, शक्ति / देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। दसवाँ दिन दशहरा के नाम से प्रसिद्ध है। नवरात्रि वर्ष में चार बार आता है। पौष, चैत्र, आषाढ,अश्विन मास में प्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाता है।नवरात्रि के नौ रातों में तीन देवियों - महालक्ष्मी, महासरस्वती या सरस्वती और महाकाली के नौ स्वरुपों की पूजा होती है।

2-नौ देवियाँ है :-

1-शैलपुत्री - अथार्त पहाड़ों की पुत्री होता है।

2-ब्रह्मचारिणी - अथार्त ब्रह्मचारीणी।

3-चंद्रघंटा - अथार्त चाँद की तरह चमकने वाली।

4-कूष्माण्डा - अथार्त पूरा जगत उनके पैर में है।

5-स्कंदमाता - अथार्त कार्तिक स्वामी की माता।

6-कात्यायनी - अथार्त कात्यायन आश्रम में जन्मि।

7-कालरात्रि - अथार्त काल का नाश करने वली।

8-महागौरी - अथार्त सफेद रंग वाली मां।

9-सिद्धिदात्री - इसका अर्थ- सर्व सिद्धि देने वाली।

3-नवरात्रि उत्सव देवी अंबा (विद्युत) का प्रतिनिधित्व है। वसंत की शुरुआत और शरद ऋतु की शुरुआत, जलवायु और सूरज के प्रभावों का महत्वपूर्ण संगम माना जाता है। इन दो समय मां दुर्गा की पूजा के लिए पवित्र अवसर माने जाते है। त्योहार की तिथियाँ चंद्र कैलेंडर के अनुसार निर्धारित होती हैं। नवरात्रि पर्व, माँ-दुर्गा की अवधारणा भक्ति और परमात्मा की शक्ति (उदात्त, परम रचनात्मक ऊर्जा) की पूजा का सबसे शुभ और अनोखा अवधि माना जाता है।

4-नवरात्रि के पहले तीन दिन देवी दुर्गा की पूजा करने के लिए समर्पित किए गए हैं। यह पूजा उसकी ऊर्जा और शक्ति की की जाती है। प्रत्येक दिन दुर्गा के एक अलग रूप को समर्पित

है।व्यक्ति जब अहंकार, क्रोध, वासना और अन्य पशु प्रवृत्ति की बुराई प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त कर लेता है, वह एक शून्य का अनुभव करता है। यह शून्य आध्यात्मिक धन से भर जाता है।नवरात्रि के चौथे, पांचवें और छठे दिन लक्ष्मी- समृद्धि और शांति की देवी, की पूजा करने के लिए समर्पित है। व्यक्ति बुरी प्रवृत्तियों और धन पर विजय प्राप्त कर लेता है, पर वह अभी शुद्ध ज्ञान से वंचित है।

5- इसलिए, नवरात्रि के सातवें दिन कला और ज्ञान की देवी, सरस्वती की पूजा की जाती है।

प्रार्थनायें, आध्यात्मिक ज्ञान की तलाश के उद्देश्य के साथ की जाती हैं। आठवे दिन पर एक 'यज्ञ' किया जाता है। यह एक बलिदान है जो देवी दुर्गा को सम्मान देता है तथा उनको विदा

करता है।नौवा दिन नवरात्रि का अंतिम दिन है। यह महानवमी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन कन्या पूजन होता है। जिसमें नौ कन्याओं की पूजा होती है। इन नौ कन्याओं को देवी दुर्गा के नौ रूपों का प्रतीक माना जाता है। कन्याओं का सम्मान तथा स्वागत करने के लिए उनके पैर धोए जाते हैं। पूजा के अंत में कन्याओं को उपहार के रूप में नए कपड़े प्रदान किए जाते हैं।

6-नवरात्रि के दौरान की भक्ति प्रथाओं में से मुख्य रूप गायत्री साधना का हैं। नवरात्रि में देवी के शक्तिपीठ और सिद्धपीठों पर भारी मेले लगते हैं।माता के सभी शक्तिपीठों का महत्व अलग-अलग हैं। लेकिन माता का स्वरूप एक ही है।लोक मान्यताओ के अनुसार लोगो का मानना है कि नवरात्री के दिन व्रत करने से माता प्रसन्न होती है,लेकिन व्रत करने से माता खुश नहीं होती क्योंकि व्रत करना शाश्वत विधि को त्याग कर मनमाना आचरण है।भगवत गीता अध्याय 6 के श्लोक 16 में भी व्रत करने की मनाही है...''हे अर्जुन यह योग न तो अधिक खाने वाले का और न बिलकुल न खाने वाले का तथा न अधिक सोने वाले का और न बिलकुल न सोने वाले का ही सिद्ध होता है''।

7-वास्तव में नवरात्रि अपने चक्रों के जागरण का समय हैं। इस समय पृथ्वी लोक पर देवी की उर्जा विस्तार करती है इसलिए यह समय कुंडलिनी जागरण /चक्र जागरण का उचित समय होता है।व्रत रहने के कारण हमारी

शक्तियां शरीर को मेंटेन करने में लग जाती हैं और जागरण में सहायता नहीं कर पाती। इसलिए कुंडलिनी जागरण का महत्व है ;शक्तियों को जगाने का महत्व है..व्रत रहने का नहीं। 9 दिन नव चक्र, जागरण और अष्टांग योग सिद्ध करने के दिन होते हैं।

8- हमारे शरीर में कुल 114 चक्र उपस्थित हैं मगर मुख्य रूप से 7 चक्रों को ही प्रमुखता दी गई है, जिनके नाम हैं मूलाधार चक्र,स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपुर चक्र,अनाहत चक्र,विशुद्ध चक्र,अजना चक्र, तथा सहस्रार चक्र। किसी भी चक्र को जागृत करने से पहले जरूरी है ध्यान लगाना जिसके लिए आपको एक शांत वातावरण चाहिए होता है। इसमें शांत स्थान पर ध्यान की मुद्रा में बैठकर अपनी सांस पर ध्यान देना होता है।नवरात्रि में ऐसा करने से चक्रों को जागृत करने में विशेष सहायता मिलती है।

क्या है 7 चक्र ?-

07 FACTS;-

1-मूलाधार चक्र:-

यह चक्र गुदा और जननेंद्रिय के बीच स्थित होता है।इस चक्र का संबंध हमारे शरीर में स्थित पृथिवी तत्व से होता है।यदि हम इस स्थान पर ध्यान लगायें तो इससे वीरता और आनंद भाव की प्राप्ति होती है। यह भी बताया गया है कि यदि मूलाधार चक्र सक्रिय न हो तो इसकी वजह से व्यक्ति अक्सर ही कब्ज, दस्त, बवासीर, कोलाइटिस, उच्च रक्तचाप जैसे गंभीर समस्याओं से पीड़ित रहता है।यह शारीरिक स्वास्थ्य का चक्र है और भय से ब्लॉक हो जाता है।

2-स्वाधिष्ठान चक्र:-

स्वाधिष्ठान चक्र जननेंद्रिय के ठीक ऊपर होता है। इस चक्र का संबंध हमारे शरीर में स्थित जल तत्व से होता है।इस चक्र के जागृत हो जाने पर शारीरिक समस्या और विकार, क्रूरता, आलस्य, अविश्वास जैसे तमाम तरह के दुर्गुणों का नाश होता है। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि शरीर में किसी भी प्रकार का विकार जल तत्व के ठीक न होने से होता है।यह आनंद का चक्र है और आत्मग्लानि से ब्लॉक हो जाता है।

3-मणिपुर चक्र: -

नाभि के ठीक ऊपर मौजूद मणिपुर चक्र की वजह से हमारे शरीर में ज्यादा ईर्ष्या, भय आदि जितनी भी चीजें हैं वह जागृत नहीं हो पाती है।इस चक्र का संबंध हमारे शरीर में स्थित अग्नि तत्व से होता है। यदि योगिक क्रियाओं के जरिये उत्पन्न समस्त ऊर्जा को इस चक्र में इकट्ठा कर लिया जाए तो ऐसा करके आप कर्मयोगी बन सकते हैं।यह बुद्धि, विचार का चक्र है और लज्जा जनक कार्य से ब्लॉक हो जाता है।

4-अनाहत चक्र:-

अनाहत चक्र मनुष्य के हृदय में स्थित होता है और जो व्यक्ति इसे जागृत कर लेने में सफल हो जाता है उसके जीवन से कपट, चिंता, मोह तथा अहंकार जैसी चीजों का नाश होता है।इस चक्र का संबंध हमारे शरीर में स्थित वायु तत्व से होता है।यह प्रेम का चक्र है और दुख से ब्लॉक हो जाता है।

5-विशुद्धि चक्र: -

विशुद्धि चक्र हमारे कंठ में मौजूद होता है और इसके जागृत होने का संबंध संचार, आत्म-अभिव्यक्ति आदि से है।साथ ही साथ इससे हमारी वाणी शुद्ध होती है तथा संगीत विद्या भी सिद्ध होती है।इस चक्र का संबंध हमारे शरीर में स्थित आकाश तत्व से होता है।यह सत्य का चक्र है और असत्य से ब्लॉक हो जाता है।

6-आज्ञा चक्र:-

यह चक्र हमारे शरीर के दोनों भौंहों के बीच स्थित होती है।इस चक्र को जागृत करने से अंतर्ज्ञान, कल्पना और स्थितियों से निपटने की क्षमता मिलती है ...आत्म ज्ञान प्राप्त होता है।यह प्रकाश का चक्र है और भ्रम से ब्लॉक हो जाता है।

7-सहस्रार चक्र: -

यह चक्र मस्तिष्क के मध्य भाग में स्थित होता है।इस चक्र का संबंध आंतरिक और बाहरी सौंदर्य तथा आध्यात्मिकता के साथ संबंध से है। हालांकि, इस चक्र को जागृत करने में तमाम तरह की परेशानियां आती हैं मगर इसके जागृत होने के पश्चात परम आनंद की प्राप्ति होती है।यह ब्रह्मांडीय ऊर्जा का चक्र है और सांसारिक मोह से ब्लॉक हो जाता है।

क्या है अष्टांग योग ?-

08 FACTS;-

1)यम:-

कायिक, वाचिक तथा मानसिक इस संयम के लिए अहिंसा, सत्य, अस्तेय चोरी न करना, ब्रह्मचर्य जैसे अपरिग्रह आदि पाँच आचार विहित हैं।

(2)नियम:-

मनुष्य को कर्तव्य परायण बनाने तथा जीवन को सुव्यवस्थित करते हेतु नियमों का विधान किया गया है। इनके अंतर्गत शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वर प्रणिधान का समावेश है। शौच में बाह्य तथा आन्तरिक दोनों ही प्रकार की शुद्धि समाविष्ट है।

(3)आसन:-

पतंजलि ने स्थिर तथा सुखपूर्वक बैठने की क्रिया को आसन कहा है।

(4)प्राणायाम:-

योग की यथेष्ट भूमिका के लिए नाड़ी साधन और उनके जागरण के लिए किया जाने वाला श्वास और प्रश्वास का नियमन प्राणायाम है। प्राणायाम मन की चंचलता और विक्षुब्धता पर विजय प्राप्त करने के लिए बहुत सहायक है।

(5)प्रत्याहार:-

इंद्रियों को विषयों से हटाने का नाम ही प्रत्याहार है। इंद्रियाँ मनुष्य को बाह्यभिमुख किया करती हैं। प्रत्याहार के इस अभ्यास से साधक योग के लिए परम आवश्यक अंतर्मुखिता की स्थिति प्राप्त करता है।

(6)धारणा:-

चित्त को एक स्थान विशेष पर केंद्रित करना ही धारणा है।

(7)ध्यान:-

जब ध्येय वस्तु का चिंतन करते हुए चित्त तद्रूप/उस जैसा हो जाता है तो उसे ध्यान कहते हैं। पूर्ण ध्यान की स्थिति में किसी अन्य वस्तु का ज्ञान अथवा उसकी स्मृति चित्त में प्रविष्ट नहीं होती।

(8)समाधि:-

यह चित्त की अवस्था है जिसमें चित्त ध्येय वस्तु के चिंतन में पूरी तरह लीन हो जाता है। योग दर्शन समाधि के द्वारा ही मोक्ष प्राप्ति को संभव मानता है।

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देवी दुर्गा के नौ रूप>>>>नव चक्र जागरण >>>> अष्टांग योग

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1-मां शैलपुत्री >>>>मूलाधार चक्र>>>>यम

2-मां ब्रह्मचारिणी>>>>स्वाधिष्ठान चक्र>>>>नियम

3-मां चंद्रघंटा>>>>मणिपुर चक्र>>>>आसन

4-मां कूष्माण्डा>>>>अनाहत चक्र>>>>प्राणायाम

5-मां स्कंदमाता>>>>विशुद्धि चक्र>>>>प्रत्याहार

6-मां कात्यायनी >>>>आज्ञा चक्र>>>>धारणा/ध्यान

7-मां कालरात्रि>>>>सहस्रार चक्र>>>>समाधि

8-मां महागौरी>>>>सहस्रार चक्र>>>>समाधि

9-मां सिद्धिदात्री>>>>सहस्रार चक्र>>>>समाधि

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नवरात्र का पहला दिन माता शैलपुत्री;-

03 FACTS;-

1-देवी दुर्गाके नौ रूप में पहले स्वरूप में शैलपुत्री जानी जाती हैं। ये ही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम ‘शैलपुत्री’ पड़ा। नवरात्र-पूजन में प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है। इनका वाहन वृषभ है, इसलिए यह देवी वृषारूढ़ा के नाम से भी जानी जाती हैं।ये ही सती के नाम से भी जानी जाती हैं। मां के इस स्वरूप को सौभाग्य और शांति का प्रतीक माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि मां शैलपुत्री की विधि पूर्वक पूजा करने से घर में सौभाग्य का आगमन होता है। 2-शैलपुत्री देवी ने दाएं हाथ में त्रिशूल धारण कर रखा है और बाएं हाथ में कमल सुशोभित है।इस दिन साधक का मन ‘मूलाधार चक्र ’ में शिथिल होता है।इस चक्र में अवस्थित मनवाला योगी उनकी कृपा और भक्ति प्राप्त करता है।.

3-माता शैलपुत्री के मंत्र

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं शैलपुत्र्यै नम:

बीज मंत्र— ह्रीं शिवायै नम:.

नवरात्र का दूसरा दिन मां ब्रह्मचारिणी;-

04 FACTS;-

1-नवरात्र के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा होती है। यह भी मां दुर्गा का अवतार हैं, जिन्हें ब्रह्मचारिणी के नाम से पूजा जाता है। पूर्वजन्म में देवी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था और भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इसलिए इनका नाम शास्त्रों में ब्रह्मचारिणी कहा गया है।ब्रह्मचारिणी का अर्थ है तप का आचरण करने वाली देवी । देवी मां के दायं हाथ में जप की माला है और बाएं हाथ में कमण्डल धारण किए रहतीं हैं।

2-माँ दुर्गाजी का यह दूसरा स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनन्तफल देने वाला है। इनकी उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। जीवन के कठिन संघर्षों में भी उसका मन कर्तव्य-पथ से विचलित नहीं होता।माँ ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से उसे सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन इन्हीं के स्वरूप की उपासना की जाती है।इस दिन साधक का मन ‘स्वाधिष्ठान ’चक्र में शिथिल होता है। इस चक्र में अवस्थित मनवाला योगी उनकी कृपा और भक्ति प्राप्त करता है।

3-मां ब्रह्मचारिणी के मंत्र

3-1-ब्रह्मचारयितुम शीलम यस्या सा ब्रह्मचारिणी.

सच्चीदानन्द सुशीला च विश्वरूपा नमोस्तुते..

3-2-ओम देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः॥

3-3-हवन में मां ब्रह्मचारिणी के इस मंत्र का उच्‍चारण करें - ऊँ ब्रां ब्रीं ब्रूं ब्रह्मचारिण्‍यै नम:।।

4- योग शास्त्र के अनुसार, यह शक्ति स्वाधिष्ठान चक्र में स्थित होती है। अत: स्वाधिष्ठान चक्र में ध्‍यान लगाने से यह शक्ति बलवान होती है एवं सर्वत्र सिद्धि व विजय प्राप्त होती है।मां का

स्वरूप दिव्य है। वे श्वेत वस्त्र पहन कर कन्या के रूप में हैं, जिनके एक हाथ में अष्टदल की माला और दूसरे हाथ में कमंडल है। वे अक्षय माला और कमंडलधारिणी,शास्त्रों के ज्ञान और निगमागम तंत्र-मंत्र आदि से संयुक्त है। अपने भक्तों को वे अपनी सर्वज्ञ सम्पन्न विद्या देकर विजयी बनाती हैं।

नवरात्र का तीसरा दिन मां चंद्रघंटा;- 03 FACTS;- 1-यह शक्ति माता का शिवदूती स्वरूप है। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्द्धचंद्र है, इसी कारण इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है।

देवी के इस रूप की उत्पत्ति नवरात्रि के तीसरे दिन होती हैं। यह रूप सभी प्रकार की अनूठी वस्तुओं को देने वाला तथा कई प्रकार की विचित्र दिव्य ध्वनियों को प्रसारित व नियंत्रित करने वाला होता है। इनकी कृपा से व्यक्ति की घ्राण शक्ति/The power Of Smelling और दिव्य होती है। वह कई तरह की खुशबुओं का एक साथ आनन्द लेने में सक्षम हो जाता है।

2-माँ के शरीर की कांति सुवर्ण रंग की है। इनका वाहन सिंह है।इनकी मुद्रा युद्ध के लिए तैयार रहने जैसी है।यह दैत्यों का संहार भयानक घण्टे की नाद से करती है।यह माता दस भुजा धारी है। जिनके दाहिने हाथ में ऊपर से पद्म, वाण, धनुष, माला आदि शोभित हो रहे है। जिनके बायं हाथ में त्रिशूल, गदा, तलवार, कमण्डल तथा युद्ध की मुद्रा शोभित हो रही है। माता सिंह में सवार होकर जगत के कल्याण हेतु दुष्ट दैत्यों को मारती हैं।

3-माँ चन्द्रघण्टा की पूजा विधान में शारीरिक शुद्धता के साथ ही मन की पवित्रता का भी ध्यान रखना चाहिए। इस दिन माता की पूजा विविध प्रकार के सुगन्धित पुष्पों तथा विविध प्रकार के नैवेद्यों व इत्रों से करने का विधान होता है। जिससे साधक को वांछित फलों की प्राप्ति होती है। शरीर में उत्पन्न पीड़ाओं का अंत होता है।इनके पूजन से साधक को मणिपुर चक्र के जाग्रत होने वाली सिद्धियां स्वत: प्राप्त हो जाती हैं तथा सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिलती है।

नवरात्र का चौथा दिन- मां कुष्माण्डा 04 FACTS;- 1-नवरात्र के चौथे दिन दुर्गा जी के चतुर्थ रूप मां कुष्मांडा की पूजा की जाती है।माना जाता है कि जब सृष्टि में चारों ओर अंधकार था और कोई भी जीव-जंतु नही था ;तब मां ने सृष्टि की रचना की।ये ही सृष्टि की आदि-स्वरूपा, आदिशक्ति हैं।इनका निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में है। वहाँ निवास कर सकने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है।इनके शरीर की कांति और प्रभा भी सूर्य के समान ही दैदीप्यमान हैं।इसी कारण इन्हें कुष्मांडा देवी के नाम से जाना जाता है।मां की उपासना भवसागर से पार उतारने के लिए सर्वाधिक सुगम और श्रेयष्कर मार्ग है।

2-कूष्मांडा का मतलब है कि जिन्होंने अपनी मंद (फूलों) सी मुस्कान से सम्पूर्ण ब्रहमाण्ड को अपने गर्भ में उत्पन्न किया।माना जाता है कि मां कुष्मांडा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक मिट जाते हैं।इनकी भक्ति से आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है।मां कुष्मांडा अत्यल्प सेवा और भक्ति से प्रसन्न होने वाली हैं।इनकी आराधना करने से भक्तों को तेज, ज्ञान, प्रेम, उर्जा, वर्चस्व, आयु, यश, बल, आरोग्य और संतान का सुख प्राप्त होता है।

3-मां कुष्मांडा की उपासना करने से सारे कष्ट और बीमारियां दूर हो जाती है।उनकी पूजा से हमारे शरीर का अनाहत चक्र जागृत होता है। इनकी उपासना से जीवन के सारे शोक खत्म हो जाते हैं।इससे भक्तों को आयु, यश, बल और आरोग्य की प्राप्ति होती है।देवी मां के आशीर्वाद से सभी भौतिक और आध्यात्मिक सुख भी हासिल होते हैं।

4-इनके तेज और प्रकाश से दसों दिशाएं प्रकाशित हो रही हैं।ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में अवस्थित तेज इन्हीं की छाया है।मां की आठ भुजाएं हैं।अतः ये अष्टभुजा देवी के नाम से भी विख्यात हैं।इनके सात हाथों में क्रमशः कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा है।आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है।इनका वाहन सिंह है।

नवरात्र का पांचवां दिन-माता स्कंदमाता;-

04 FACTS;-

1-नवरात्रि का पांचवे दिन मां दुर्गा के पांचवे अवतार मां स्कंदमाता की पूजा की जाती है। इनकी पूजा करने से व्यक्ति के लिए मोक्ष के द्वार खुल जाते हैं।साथ ही परम सुख की प्राप्ति मिलती है।इनकी 4 भुजाएं हैं।मां का आसन कमल है ;इसी कारण इन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है। इनका वाहन सिंह है।व्यक्ति का मन समस्त लौकिक, सांसारिक, मायिक बंधनों से विमुक्त होकर मां के इस स्वरूप में पूर्णतः तल्लीन हो जाता है।स्कंदमाता की उपासना से बालरूप स्कंद भगवान की उपासना भी स्वमेव हो जाती है।यह विशेषता केवल इन्हीं को प्राप्त है,अतः साधक को स्कंदमाता की उपासना की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए।

2-सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इनका उपासक अलौकिक तेज एवं कांति से संपन्न हो जाता है।एक अलौकिक प्रभामंडल अदृश्य भाव से सदैव उसके चतुर्दिक्‌ परिव्याप्त रहता है।यह प्रभामंडल प्रतिक्षण उसके योगक्षेम का निर्वहन करता रहता है।इस समय

साधक को पूर्ण सावधानी के साथ उपासना की ओर अग्रसर होना चाहिए।उसे अपनी समस्त ध्यान-वृत्तियों को एकाग्र रखते हुए साधना के पथ पर आगे बढ़ना चाहिए।मां स्कंदमाता की उपासना से भक्त की समस्त इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं। इस मृत्युलोक में ही उसे परम शांति और सुख का अनुभव होने लगता है। उसके लिए मोक्ष का द्वार स्वमेव सुलभ हो जाता है।

3-माता स्कंदमाता के मंत्र

3-1. या देवी सर्वभू‍तेषु मां स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता.

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

3-2. या देवी सर्वभू‍तेषु मां स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता.

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

3-3. महाबले महोत्साहे. महाभय विनाशिनी.

त्राहिमाम स्कन्दमाते. शत्रुनाम भयवर्धिनि..

3-4.ओम देवी स्कन्दमातायै नमः

4-स्कंदमाता की चार भुजाएं हैं। इनके दाहिनी तरफ की नीचे वाली भुजा, जो ऊपर की ओर उठी हुई है, उसमें कमल पुष्प है।सिंह इनका वाहन है बाईं तरफ की ऊपर वाली भुजा में वरमुद्रा में तथा नीचे वाली भुजा जो ऊपर की ओर उठी है उसमें भी कमल पुष्प ली हुई हैं।इनका वर्ण पूर्णतः शुभ्र है। नवरात्रि-पूजन के पांचवें दिन साधक विशुद्ध चक्र में अवस्थित हो जाता है।इस चक्र में अवस्थित मन वाले साधक की समस्त बाह्य क्रियाओं एवं चित्तवृत्तियों का लोप हो जाता है।वह विशुद्ध चैतन्य स्वरूप की ओर अग्रसर हो रहा होता है।साधक का मन समस्त लौकिक, सांसारिक, मायिक बंधनों से विमुक्त होकर पद्मासना मां स्कंदमाता के स्वरूप में पूर्णतः तल्लीन होता है।

नवरात्र का छठे दिन-माता स्कंदमाता;-

03 FACTS;-

1-नवरात्र के छठे दिन कात्यायनी देवी की पूजा की जाती है जो देवी दुर्गा जी का छठा अवतार हैं। शास्त्रों के अनुसार देवी ने कात्यायन ऋषि के घर उनकी पुत्री के रूप में जन्म लिया, इस कारण इनका नाम कात्यायनी पड़ गया।मां कात्यायनी अमोघ फलदायिनी मानी गई हैं।शिक्षा

प्राप्ति के क्षेत्र में प्रयासरत भक्तों को माता की अवश्य उपासना करनी चाहिए।पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार है कि मां कात्‍यायनी की पूजा करने से शादी में आ रही बाधा दूर होती है और भगवान बृहस्‍पति प्रसन्‍न होकर विवाह का योग बनाते हैं।माता कात्यायनी की उपासना से भक्‍त को अपने आप आज्ञा चक्र जाग्रति की सिद्धियां मिल जाती हैं।साथ ही वह इस लोक में स्थित रहकर भी अलौकिक तेज और प्रभाव से युक्त हो जाता है।मां कात्‍यायनी की उपासना से रोग, शोक, संताप और भय नष्‍ट हो जाते हैं।

2-नवरात्रि के छठे दिन पूजा करते वक्‍त मां कात्‍यायनी को शहद का भोग लगाना शुभ माना जाता है।इसके प्रभाव से साधक सुंदर रूप प्राप्त करता है। मां कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत चमकीला और भव्य है।इनकी चार भुजाएं हैं।मां कात्यायनी के दाहिनी तरफ का ऊपर वाला हाथ अभय मुद्रा में और नीचे वाला वरमुद्रा में है।बाईं तरफ के ऊपरवाले हाथ में तलवार और नीचे वाले हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है।मां कात्‍यायनी सिंह की सवारी करती हैं ।

3-मां कात्यायनी का उपासना मंत्र ;-

चंद्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥

नवरात्रि का सातवां दिन... कालरात्रि स्वरूप;-

06 FACTS;-

1-नवरात्रि का सातवां दिन मां दुर्गा के कालरात्रि स्वरूप की पूजा-अर्चना के लिए समर्पित होता है। मां कालरात्रि की पूजा करने से आकस्मिक संकटों से रक्षा होती है। शक्ति का यह रूप शत्रु और दुष्‍टों का संहार करने वाला है।मान्‍यता है कि मां कालरात्रि ही वह देवी हैं जिन्होंने मधु -कैटभ जैसे असुर का वध किया था।मां कालरात्रि का प्रिय पुष्प रातरानी है, यह फूल उनको जरूर अर्पित करें। इसके बाद मां कालरात्रि के मंत्रों का जाप करें तथा अंत में मां कालरात्रि की आरती करें। मां कालरात्रि को लाल रंग तथा गुड़ बहुत पसंद है इसलिए महासप्‍तमी के दिन उन्‍हें गुड़ का भोग लगाना शुभ माना जाता है।

2-मां कालरात्रिके शरीर का रंग घने अंधकार की भाँति काला है, बाल बिखरे हुए, गले में विद्युत की भाँति चमकने वाली माला है। इनके तीन नेत्र हैं जो ब्रह्माण्ड की तरह गोल हैं, जिनमें से बिजली की तरह चमकीली किरणें निकलती रहती हैं। इनकी नासिका से श्वास, निःश्वास से अग्नि की भयंकर ज्वालायें निकलती रहती हैं। इनका वाहन ‘गर्दभ’ (गधा) है। दाहिने ऊपर का हाथ वरद मुद्रा में सबको वरदान देती हैं, दाहिना नीचे वाला हाथ

अभयमुद्रा में है।बायीं ओर के ऊपर वाले हाथ में लोहे का कांटा और निचले हाथ में खड्ग है। माँ का यह स्वरूप देखने में अत्यन्त भयानक है किन्तु सदैव शुभ फलदायक है।अतः भक्तों को इनसे भयभीत नहीं होना चाहिए । 3-देवी काल-रात्रि का वर्ण काजल के समान काले रंग का है जो अमावस की रात्रि से भी अधिक काला है। मां कालरात्रि के तीन बड़े बड़े उभरे हुए नेत्र हैं जिनसे मां अपने भक्तों पर अनुकम्पा की दृष्टि रखती हैं। देवी की चार भुजाएं हैं दायीं ओर की उपरी भुजा से महामाया भक्तों को वरदान दे रही हैं और नीचे की भुजा से अभय का आशीर्वाद प्रदान कर रही हैं। बायीं भुजा में क्रमश: तलवार और खड्ग धारण किया है। देवी कालरात्रि के बाल खुले हुए हैं और हवाओं में लहरा रहे हैं। देवी काल रात्रि गर्दभ पर सवार हैं। मां का वर्ण काला होने पर भी कांतिमय और अद्भुत दिखाई देता है। देवी कालरात्रि का यह विचित्र रूप भक्तों के लिए अत्यंत शुभ है अत: देवी को शुभंकरी भी कहा गया है।

4-दुर्गा सप्तशती के प्रधानिक रहस्य में बताया गया है कि जब देवी ने इस सृष्टि का निर्माण शुरू किया और ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश का प्रकटीकरण हुआ उससे पहले देवी ने अपने स्वरूप से तीन महादेवीयों को उत्पन्न किया। सर्वेश्वरी महालक्ष्मी ने ब्रह्माण्ड को अंधकारमय और तामसी गुणों से भरा हुआ देखकर सबसे पहले तमसी रूप में जिस देवी को उत्पन्न किया वह देवी ही कालरात्रि हैं। देवी कालरात्रि ही अपने गुण और कर्मों द्वारा महामाया, महाकाली, क्षुधा, तृषा, निद्रा, तृष्णा, एकवीरा, एवं दुरत्यया कहलाती हैं।

5-दुर्गा पूजा का सातवां दिन तांत्र‍िक क्रिया की साधना करने वाले लोगों के लिए बेहद महत्‍वपूर्ण है। इस दिन साधक का मन सहस्त्रारचक्र में अवस्थित होता है। साधक के लिए सभी सिध्दैयों का द्वार खुलने लगता है। इस चक्र में स्थित साधक का मन पूर्णत: मां कालरात्रि के स्वरूप में अवस्थित रहता है, उनके साक्षात्कार से मिलने वाले पुण्य का वह अधिकारी होता है, उसकी समस्त विघ्न बाधाओं और पापों का नाश हो जाता है और उसे अक्षय पुण्य लोक की प्राप्ति होती है।मां कालरात्रि की पूजा करने वाले भक्तों को किसी भूत, प्रेत या बुरी शक्ति का भय नहीं सताता। इस दिन तंत्र साधना करने वाले साधक आधी रात में देवी की तांत्रिक विधि से पूजा करते हैं। इस दिन मां की आंखें खुलती हैं। कुंडलिनी जागरण के लिए जो साधक साधना में लगे होते हैं वे महा सप्‍तमी के दिन सहस्त्रसार चक्र का भेदन करते हैं। देवी की पूजा के बाद शिव और ब्रह्मा जी की पूजा भी जरूर करनी चाहिए।

6-माता कालरात्रि का मंत्र;-

‘ऊं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै ऊं कालरात्रि दैव्ये नम: .

नवरात्रि का आठवां दिन...महागौरी ;-

04 FACTS;-

1-मां महागौरी ने भगवान शंकर को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी तथा शिव को पति के रूप में प्राप्त किया था। शिव जी की प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या करते हुए मां महागौरी का शरीर धूल, मिट्टी से ढंककर काला हो गया था। जब भगवान शंकर ने गंगाजल से इनके शरीर को धोया तब गौरी जी का शरीर गौर व दैदीप्यमान हो गया और तभी से देवी महागौरी के नाम से विख्यात हुयीं। इनकी गौरता की उपमा शंख, चंद्र और कुंद के फूल से की गयी है। इनके सभी वस्त्र और आभूषण भी सफेद हैं।नवरात्रि के आठवें दिन मां के आठवें रूप महागौरी की पूजा-उपासना की जाती है। इनके एक हाथ में त्रिशूल, दूसरे हाथ से अभय मुद्रा में हैं, तीसरे हाथ में डमरू सुशोभित है तथा चौथा हाथ वर मुद्रा में है।मां का वाहन वृषभ( बैल) है।इस दिन साधक का मन सहस्त्रार चक्र में अवस्थित होता है।

2-महागौरी मंत्र ;-

1-'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महागौर्ये नमः।।

2-या देवी सर्वभू‍तेषु माँ गौरी रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

3-नवरात्रे के आठवें दिन माँ महागौरी की पूजा का विशेष महत्व हैं। कहा जाता है माँ महागौरी अपने भक्तों को अनेक कष्टो से मुक्त करने वाली माता हैं। इनकी आराधना से मनुष्य के अनेक पाप समाप्त हो जाते हैं।महागौरी का पूजन-अर्चन, उपासना-आराधना कल्याणकारी है।

माता महागौरी की कृपा से अलौकिक सिद्धियां भी प्राप्त होती हैं।विवाहित स्त्रियाँ आस्था के साथ माँ गौरी की पूजा करती हैं तथा सदा सुहागिन रहने का आशिर्वाद मांगती हैं और माता को चुनरी चढ़ाती है।माँ महागौरी अपने भक्तों के सभी दुखों को हरकर उनकों सुखमय जीवन प्रदान करती हैं।

4-नवरात्र के आठवें दिन प्रातः काल के समय अन्नकूट पूजा यानी कन्या पूजन का भी विधान है। कुछ लोग नवमी के दिन भी कन्या पूजन करते हैं लेकिन कहा जाता है कि अष्टमी के दिन कन्या पूजन करना श्रेष्ठ रहता है।कन्याओं की संख्या 9 हो तो अति उत्तम है। कन्याओं की आयु 2 वर्ष से ऊपर और 10 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए। दो वर्ष की कन्या कुमारी, तीन वर्ष की कन्या त्रिमूर्ति, चार वर्ष की कन्या कल्याणी, पांच वर्ष की कन्या रोहिणी, छह वर्ष की कन्या कालिका, सात वर्ष की चंडिका, आठ वर्ष की कन्या शाम्भवी, नौ वर्ष की कन्या दुर्गा और दस वर्ष की कन्या सुभद्रा मानी जाती है।

नवरात्रि का नौवां दिन...मां सिद्धिदात्री ;-

06 FACTS;-

1- महानवमी के दिन मां दुर्गा के नौवें स्वरूप मां सिद्धिदात्री की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना होती है।मां दुर्गाजी की नौवीं शक्ति सिद्धिदात्री हैं सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं।आज के दिन मां सिद्धिदात्री की आराधना से भक्तों के सभी शोक, भय और रोग का नाश हो जाता है।सृष्टि में कुछ भी उसके लिए अगम्य नहीं रह जाता है। ब्रह्मांड पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य उसमें आ जाती है। श्रद्धापूर्वक माता की पूजा करने से समस्त सिद्धियां प्राप्त होती हैं।मां सिद्धिदात्री जीवन में होने वाली अनहोनी से भी रक्षा करती हैं, वह मोक्ष दायिनी भी हैं।

2-मां सिद्धिदात्री के मंत्र;-

1-ओम देवी सिद्धिदात्र्यै नमः।

2-मां सिद्धिदात्री बीज मंत्र...ओम ह्रीं क्लीं ऐं सिद्धये नम:।

3- मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व- ये आठ सिद्धियां होती हैं। ब्रह्मवैवर्तपुराण के श्रीकृष्ण जन्म खंड में यह संख्या अठारह बताई गई है।इनकी आराधना से समस्त सिद्धियों और नव निधियों की प्राप्ति होती है। इनके नाम इस प्रकार हैं - 1. अणिमा 2. लघिमा 3. प्राप्ति 4. प्राकाम्य 5. महिमा 6. ईशित्व,वाशित्व 7. सर्वकामावसायिता 8. सर्वज्ञत्व 9. दूरश्रवण 10. परकायप्रवेशन 11. वाक्‌सिद्धि 12. कल्पवृक्षत्व 13. सृष्टि 14. संहारकरण सामर्थ्य 15. अमरत्व 16. सर्वन्यायकत्व 17. भावना 18. सिद्धि

4-मां सिद्धिदात्री भक्तों और साधकों को ये सभी सिद्धियां प्रदान करने में समर्थ हैं।देवीपुराण के अनुसार भगवान शिव ने इनकी कृपा से ही इन सिद्धियों को प्राप्त किया था। इनकी अनुकम्पा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण वे लोक में 'अर्द्धनारीश्वर' नाम से प्रसिद्ध हुए।इन सिद्धिदात्री मां की उपासना पूर्ण कर लेने के बाद भक्तों और साधकों की लौकिक, पारलौकिक सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है। 5-मां सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली हैं। इनका वाहन सिंह है। ये कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं। इनकी दाहिनी तरफ के नीचे वाले हाथ में कमलपुष्प है।इनकी कृपा से अनंत दुख रूप संसार से निर्लिप्त रहकर सारे सुखों का भोग करता हुआ वह मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।सिद्धिदात्री मां के कृपापात्र भक्त के भीतर कोई ऐसी कामना शेष बचती ही नहीं है, जिसे वह पूर्ण करना चाहे।वह सभी सांसारिक इच्छाओं, आवश्यकताओं और स्पृहाओं से ऊपर उठकर मानसिक रूप से मां भगवती के दिव्य लोकों में विचरण करता हुआ उनके कृपा-रस-पीयूष का निरंतर पान करता हुआ, विषय-भोग-शून्य हो जाता है। 6- मां भगवती का परम सान्निध्य ही उसका सर्वस्व हो जाता है। इस परम पद को पाने के बाद उसे अन्य किसी भी वस्तु की आवश्यकता नहीं रह जाती।मां भगवती का स्मरण, ध्यान, पूजन, हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हुए वास्तविक परम शांतिदायक अमृत पद की ओर ले जाने वाला है।मां जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इस श्लोक को कंठस्थ कर नवरात्रि में नवमी के दिन इसका जाप करना चाहिए। या देवी सर्वभू‍तेषु मां सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

...SHIVOHAM...