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अष्टांग योग - AT A GLANCE


योग के आठ अंग :

24 FACTS;-

1-योग के आठ चरण हैं...यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि ;जिनका एक जीवंत अंतर्संबंध है।वास्तव में, यह योग

का संपूर्ण विज्ञान है।उदाहरण के लिए हमारे हाथ, पैर, हृदय.. एक दूसरे से अलग नहीं हैं, वे जुड़े हुए हैं। यदि हृदय रुक जाए तो फिर हाथ नहीं चलेगा। वे सीढ़ी के सोपानों की भांति नहीं हैं, क्योंकि सीढ़ी का तो हर डंडा अलग होता है। यदि एक डंडा टूट जाए तो पूरी सीढ़ी नहीं टूटती। इसलिए महृषि पतंजलि कहते हैं कि वे चरण हैं, क्योंकि उनका एक सुनिश्चित विकास है ;लेकिन वे शरीर के जीवंत अंग हैं।तुम उन में से किसी एक को नहीं छोड़ सकते हो;वे समग्र के साथ संबंधित हैं।

2-सीढ़ी के सोपान में तुम एक ही छलांग में दो चरण कूद सकते हो, लेकिन अंग नहीं छोड़े जा सकते हैं, वे कोई यांत्रिक हिस्से नहीं हैं।

तो योग के ये आठ अंग, चरण भी हैं और जीवंत इकाई भी हैं।चरण का अर्थ हैं कि प्रत्येक अंग दूसरे का अनुगामी/Follower है, और वे एक गहन संबद्धता में जुड़े हुए हैं। पहले को पहला होना है और दूसरे को दूसरा होना है।और आठवां चरण आठवां ही होगा, वह चौथा या पहला नहीं हो सकता है।

3-पहला अंग 'यम' का अर्थ सेल्फ रेस्ट्रेंट/ निषेध / दमन जैसा मालूम

पड़ता है।लेकिन महृषि पतंजलि के लिए आत्म संयम का अर्थ स्वयं का, ऊर्जाओं का दमन नहीं,बल्कि स्वयं के जीवन को सम्यक दिशा देना है। क्योंकि तुम ऐसा जीवन जी सकते हो, जो बहुत सी दिशाओं में जाता हो।

तब तुम बहुत से रास्तों पर चल सकते हो, लेकिन जब तक तुम्हारे पास दिशा नहीं है, तुम व्यर्थ ही चल रहे हो ।तुम कभी भी कहीं नहीं पहुंचोगे। और केवल निराशा अनुभव करोगे।

4-आत्म संयम का अर्थ है, जीवन ऊर्जा को सम्यक दिशा देना। जीवन ऊर्जा सीमित है ;जो तुम्हें प्रकृति से, अस्तित्व से, परमात्मा से मिली हैं। यदि तुम उसका उपयोग नासमझी और दिशा हीन ढंग से करते हो, तो तुम कहीं भी नहीं पहुंचोगे।तुम्हारी ऊर्जा चुक जाएगी और वह बिलकुल नकारात्मक खालीपन होगा ..भीतर खोखला..कुछ भी नहीं। तुम मरने के पहले ही मर जाओगे।

5-ये सीमित ऊर्जाएं इस ढंग से प्रयोग की जा सकती हैं कि वे असीम के लिए द्वार बन सकती हैं। यदि तुम अपनी सारी ऊर्जाओं को इकट्ठा कर एक ही दिशा में होशपूर्वक /बोधपूर्वक बढ़ते हो, तो तुम भीड़ नहीं रहते बल्कि

एक व्यक्ति हो जाते हो।साधारणतया तुम एक भीड़ हो; तुम्हारे भीतर बहुत सी आवाजें हैं। एक कहती है, 'इस दिशा में जाओ।’ दूसरी कहती है, 'यह तो बेकार है। उधर जाओ।और तुम्हें कभी कहीं चैन नहीं मिलता, क्योंकि तुम कहीं भी जाओ, तुम केवल पछताओगे।

6-यदि तुम आत्मवान ,अखंड नहीं हो, तो तुम जहां कहीं भी जाओगे; कभी कहीं चैन से नहीं रहने पाओगे। तुम सदा ही कहीं न कहीं जा रहे होओगे

और कभी कहीं नहीं पहुंचोगे।वह जीवन जो 'यम' के विपरीत है, पागल/विक्षिप्त हो जाएगा।जब तक तुम आत्मवान न हो जाओ, तुम मुक्त नहीं हो सकते हो।तुम्हारी स्वतंत्रता एक आडम्बर के सिवाय और कुछ न होगी।तुम स्वयं को,अपनी संभावनाओं, अपनी ऊर्जाओं को नष्ट कर दोगे और एक दिन तुम अनुभव करोगे कि जीवन भर तुमने इतनी कोशिश की, लेकिन

पाया कुछ भी नहीं...उससे कोई विकास नहीं हुआ। जब तक तुम आत्म संयमी नहीं होते, दूसरा चरण 'नियम' की संभावना नहीं है।'नियम' का अर्थ हैं एक सुनिश्चित नियमन : वह जीवन जो अव्यवस्थित नहीं अनुशासित है।

7-जब तक तुम में और तुम्हारे जीवन में नियमितता , अनुशासन नहीं आता, तब तक तुम अपनी वृत्तियों के गुलाम ही रहोगे और तुम सोच सकते हो कि यही स्वतंत्रता है। भले ही तुम्हारा कोई प्रकट मालिक न हो, लेकिन तुम्हारे भीतर बहुत से अप्रकट मालिक होंगे ; और वे तुम पर शासन करते रहेंगे।जिसके पास नियमितता होती है,केवल वही किसी दिन मालिक हो

सकता है। वास्तव में असली मालिक तभी प्रगट होता है जब आठवां चरण पा लिया जाता है ..जो कि लक्ष्य है। तब व्यक्ति मुक्तिदाता हो जाता है क्योंकि यदि तुम मुक्ति पा