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क्यों हम श्रीकृष्ण को पूर्णावतार कहते है?क्या त्रिगुण की परिक्रमा ही सभी धर्मों का ध्येय है?PART 02


''क्यों हम श्रीकृष्ण को पूर्णावतार कहते है?

12 FACTS;-

1-सत्य को हमेशा अलग-अलग तरह से प्रकट किया गया हैं।इसीलिए श्रीकृष्ण के ,क्राइस्ट ,गौतम बुद्ध, मोहम्मद ,वेद के ऋषि और उपनिषद के द्रष्टा आदि सभी के वचन हैं।श्रीकृष्ण के वचनों को हम कहते है-श्रीमदभगवदगीता -अथार्त भगवान के वचन।इसमें श्रीकृष्ण से कुछ संबंध नहीं है।श्री कृष्ण तो शून्य हो गए ;फिर उस शून्य में से जो बहा, वह तो परम सत्ता का है, वह तो पूर्ण का है।और श्रीकृष्ण ऐसे शून्य हुए कि पूर्ण के बहने में जरा भी बाधा नहीं पड़ी। इसलिए श्रीकृष्ण को हमने पूर्णावतार कहा। जबकि श्रीराम को,परशुराम को पूर्णावतार नहीं कहा।

2-श्रीराम को हम मर्यादा पुरुषोत्तम कहते हैं। उनकी एक जीवन-दृष्टि है। उनका आग्रहपूर्ण आचरण है। पूर्ण की कुछ झलकें उनसे आई हैं, लेकिन वे पूरे शून्य नहीं हैं।पूर्ण पर भी उनकी शर्तें हैं..पूर्ण उनसे उतना ही बह सकता है, जितना उनकी शर्तों के अनुकूल हो। उनकी शर्तें तोड़कर पूर्ण को भी बहने नहीं दिया जाएगा! इसलिए श्रीराम को इस देश के रहस्यवादियों ने अंशावतार कहा। अंशावतार का अर्थ यह होता है कि श्रीराम ने परमात्मा को प्रकट होने की

पूरी-पूरी स्वतंत्रता नहीं दी।कोई मर्यादित व्यक्ति नहीं दे सकता ;क्योकि मर्यादित व्यक्ति का अर्थ ही यह होता है कि उसका जीवन सशर्त है।उसने एक परिपाटी बना ली है; एक शैली है उसकी। जैसे रेलगाड़ियां चलती हैं ,गतिमान होती हैं; मगर केवल पटरियों पर दौड़ती हैं--पटरियों से अन्यथा नहीं।

3-नदियां भी चलती हैं, बहती हैं, वे भी गतिमान होती हैं, लेकिन उनकी कोई पटरियां ,कोई नक्शे भी नहीं हैं। कोई अज्ञात उन्हें सागर की ओर बहाए ले जाता है।और कैसी अदभुत बात है कि छोटी सी छोटी नदी भी ;बिना मार्ग-दर्शक,किसी समय-सारणी , किसी नक्शे के सागर को खोज हीं लेती है। नदी की चाल कोई नियम में आबद्ध नहीं हैऔर जहां भी ...चाहे

बाएं मार्ग मिले या दाएं।कई बार लगता है कि अभी नदी इस तरफ बहती थी, अब उस तरफ बहने लगी है।ऐसे हीं कहीं पहुंचना होगा! लेकिन फिर भी हर नदी पहुंच ही जाती है।इसी प्रकार जो चल पड़ा, वह पहुंच ही गया।

4-मगर चलने में भी भेद होंगे।एक मर्यादा में बंधी हुई गति है और एक श्रीकृष्ण का

व्यक्तित्व है।इसलिए श्रीकृष्ण को समझना मुश्किल है;क्योंकि न कुछ नीति है , न अनीति ;न कुछ शुभ है, न अशुभ है। जैसा ले चले परमात्मा; बाएं तो बाएं; दाएं तो दाएं। किसी

पंथ का कोई आग्रह नहीं है।श्रीकृष्ण पंथमुक्त अपंथी हैं।वामपंथी नहीं हैं--कि बाएं ही

चलेंगे।दक्षिण-पंथी नहीं हैं--कि दाएं ही चलेंगे।मध्य-मार्गी नहीं हैं--कि मध्य में ही चलेंगे।गौतम बुद्ध को भी इस देश में पूर्णावतार नहीं कहा गया क्योंकि बुद्ध का भी आग्रह है--मध्य-मार्ग का। प्रत्येक पैर सम्यक होना चाहिए। देखो तो सम्यक, उठो तो सम्यक, बैठो तो सम्यक। जीवन की एक सुनिश्चित व्यवस्था होनी चाहिए; अनुशासन होना चाहिए।

5-गौतम बुद्ध ने अनुशासन दिया इसलिए बौद्धों में उनका जो नाम है, वह है 'अनुशास्ता'।

महावीर को भी पूर्ण अवतार नहीं कहा जा सकता क्योंकि उनकी जीवन-शैली तो और भी बंधी हुई है।श्रीराम और गौतम बुद्ध से भी ज्यादा। वे तो पैर भी फूंक-फूंक कर रखते हैं , रात करवट भी नहीं बदलते, कि कहीं करवट बदलें अंधेरे में, कोई चींटी-चींटा दब जाए! तो एक ही करवट सोए रहते हैं! वे तो भोजन भी आग्रह से लेते हैं। आग्रह से लेने का अर्थ: वे सुबह-सुबह निर्णय करके निकलते हैं कि यह मेरी शर्त पूरी होगी, तो भोजन लूंगा। नहीं तो भोजन नहीं लूंगा।

6-वे भोजन भूख से नहीं लेते; भोजन के ऊपर एक शर्तबंदी है। जैसे सुबह ही ध्यान में उतरेंगे, उठते समय निर्णय करेंगे कि आज ऐसी घटना घटे: तो इस द्वार से भोजन लूंगा। अब अगर यह संयोग मिल जाए, तो भोजन लेंगे।वर्ना मिले--न मिले क्योंकि एक तो ऐसा द्वार खोजना कठिन हैं।दूसरा जरूरी नहीं कि शर्त पूरे करने वाले व्यक्ति ने ; महावीर को भोजन देने के लिए तैयारी रखी हो! यह भी हो सकता है: कि अभी भोजन हीं न बना हो और हर घर

से तो भिक्षा नहीं मिलती हैं।और महावीर उसी घर से भोजन लेंगे, जिस घर का निर्णय करके निकले हैं। एक बार तो यों हुआ कि छह महीने तक भोजन नहीं लिया! अस्थि-पंजर मात्र रह गए। क्योंकि शर्त ऐसी थी कि पता नहीं--पूरी होती कि न होती।

7-वो शर्त किसी को बताते भी नहीं थे;क्योकि बताने तो शर्त ही न रही। फिर तो कोई न कोई शिष्य पूरा करवा ही देगा। और जो शर्त आज पूरी न हो , कल भी वही रहेगी। जब तक पूरी न

हो, तब तक वही रहेगी और शर्त भी नहीं बदलेंगे।क्योकि उसमें भी आदमी चालबाजी कर सकता है कि अब बदल लो, यह शर्त तो पूरी होती ही नहीं।इसलिए चालबाजी का सवाल ही नहीं है। महावीर कोई किसी और के आदेश से अपने ऊपर ऐसा आरोपण नहीं कर रहे हैं।उनका अपना ही आग्रह है ;निज से निकला है।

8-उदाहरण के लिए एक बार उन्होंने शर्त ले ली थी कि उस द्वार से भिक्षा लूंगा, जिस द्वार के सामने एक बैलगाड़ी खड़ी हो ;उसमें गुड़ भरा हो।बैलगाड़ी के पीछे एक गाय खड़ी हो और गाय ने गुड़ में सींग मार कर अपने दोनों सींगों में गुड़ लगा लिया हो। बैलगाड़ी अभी भी खड़ी हो; गई न हो।उस द्वार से अगर भिक्षा मिलेगी, तो लूंगा। छह महीने में यह शर्त पूरी हुई तो ही महावीर ने भोजन लिया।महावीर का जीवन सशर्त है।अतिनैतिक ,अतिमर्यादाबद्ध है। इसलिए जैनों ने भी महावीर की चिंतना को, देशना को शासन कहा है। एक-एक सूत्र है उस शासन का।

9-भारत के मनीषी सिर्फ श्रीकृष्ण को छोड़कर किसी को पूर्णावतार नहीं कह सके। क्योंकि श्रीकृष्ण की कोई शर्त , कोई आग्रह ,कोई मर्यादा नहीं है।श्रीकृष्ण की शून्यता समग्र है, पूर्ण है। वे हैं ही नहीं।उनसे परमात्मा को जो करवाना हो, करवा ले।न करवाना हो--न करवाए।इसलिए हम उनके वचनों को श्रीमदभगवदगीता कह सके। श्रीकृष्ण के वचन उनके

नहीं हैं।उनसे हीं आए हैं- मगर उनके नहीं हैं। जैसे वृक्षों पर फूल खिलते हैं, मगर वृक्षों के ही नहीं होते। उन फूलों में जमीन का दान ,सूरज की किरणों का मिलन और हवाओं की भेंट होती है।वे फूल इस समस्त सृष्टि के अनुदान से निर्मित होते हैं।ऐसे ही जब कोई बिलकुल शून्य

होता है, तो फिर जो बोले, वह हरिकथा हो जाएगी।

10-इसलिए नहीं कि वह हरि के संबंध में बोल रहा है। हरि के संबंध में बोलने वाले तो बहुत

लोग मिलेंगे ;घर-घर कथाएं होती रहती हैं।मगर इस सूत्र को समझना होगा।'' जो सोवैं तो सुन्न में''। जो यूं सो गए कि शून्य ही जिनका विश्राम हो गया है। जिन्होंने शून्य में अपने अहंकार को विसर्जित कर दिया है। शून्य ही जिनकी सुषुप्ति है।महृषि पतंजलि ने कहा है: समाधि में और सुषुप्ति में थोड़ा-सा ही भेद है .. और बहुत भी।समाधि और सुषुप्ति में बड़ी समानता है, कि

दोनों ही हालत में तुम खो जाते हो। गहरी सुषुप्ति में जब स्वप्न भी नहीं होते, तो तुम विराट में लीन हो गए होते हो। इसलिए तो सुषुप्ति के बाद--तुम फिर पुनरुज्जीवित हो जाते हो। सब थकान मिटी , सब पराजय खो गई ,सब चिंताएं विदा हो गईं। तुम अमृतपान करके लौट आते हो।मगर तुम्हें कुछ पता नहीं कि यह कैसे घटा ,तुम कहां गए।

11-वास्तव में, तुम मिटे ,खो गए थे, लीन हो गए; तब विराम आया था। कोई बचा ही न था ..न

स्वप्न , न विचार , तो मैं कहां बचता! मैं भी तो एक स्वप्न है, एक विचार ,एक धारणा मात्र है।मन तो बिलकुल ही मिट गया था, तब सुषुप्ति में तुम परमात्मा में लीन हो गए, जैसे लहर सागर में लीन हो जाए। फिर उठे, तो सागर का सारा रस लेकर उठे। सब चिंताएं, सब धूल-- मन की जो-जो गंदगी थी,सागर सब बहा ले गया। तुम अमृत में एक डुबकी लगा आए हो।

महृषि पतंजलि कहते हैं कि सुषुप्ति में व्यक्ति परमात्मा में लीन होता है।मगर होश का एक भेद है समाधि और सुषुप्ति का। सुषुप्ति में उसे होश नहीं होता और समाधि में उसे होश होता है।घटना एक ही घटती है।सुषुप्ति में भी शून्य हो जाते हो, मगर तुम्हें होश नहीं होता। इसलिए पाते हो, और फिर खो देते हो क्योकि होश ही नहीं है।

12-समाधि अथार्त सुषुप्ति+होश; सुषुप्ति+ध्यान। समाधि में होश का दीया जलता रहता है। ''मैं'' विचार मिट जाते हैं, मगर एक परिपूर्ण जागरूकता छाई रहती है। इसलिए सुबह जब तुम उठते हो, तो तुम जानते हो कि, तुम कहां गए थे, कैसा अमृत का घूंट पिया; कैसे लौटे। तुम्हें राह का, आने-जाने का पता है, इसलिए तुम जब जाना चाहो, तब जा सकते हो।जब आंख

बंद करो, तब चले जाओ।इस समाधि की अवस्था को कहेंगे, शून्य में सो जाना। मगर होशपूर्वक, बोधपूर्वक। ऐसे शून्य से फिर उस जागरण में उठो तो हरिनाम है, बैठो तो हरिनाम

है ,बोलो तो, न बोलो तो; चुप रहो तो, गुनगुनाओ तो; कुछ भी करो।ऐसे व्यक्ति की निद्रा

समाधि होती है, और ऐसे व्यक्ति का जागरण प्रभु-स्मरण होता है। जरूरी नहीं है कि समाधि से लौटा हुआ व्यक्ति राम-राम ही जपता रहता है।शब्द भी होते है और निःशब्द भी।तो ऐसे समाधिस्थ व्यक्ति के पास उठने-बैठने में भी हरिकथा हो जाएगी।और ऐसे व्यक्ति के जीवन में जो भी है, सब भक्ति है।

क्या त्रिगुण की परिक्रमा ही सभी धर्मों का ध्येय है?-

15 FACTS;-

1-गौतम बुद्ध ने शून्य से ही परमात्मा को जाना। जिस मार्ग से वे चले, उस पर ही वे हमें भी ले जा सकते हैं। वह कहते है कि व्यक्ति शून्य से भी पहुंचता है और पूर्ण से भी पहुंचता है; तुम्हारी उलझन यही है कि तुम कोई निष्कर्ष नहीं ले पाते।बुद्ध ने कहा था, शून्य से पहुंच जाओगे।आदि शंकराचार्य ने देखा, बहुत थोड़े से लोग है जिन्होंने सुना तो समझा नहीं,शून्य का जीवन तो नहीं बनाया, शून्य का वाद खड़ा कर लिया है।तो आदि शंकरा ने कहा कोई पूर्ण से ही पहुंच सकता है ;शून्य में भटक जाता है। और आदि शंकरा ने उतना ही विरोध किया शून्य का जितना बुद्ध ने पूर्ण का किया था।

2-और आदि शंकरा ने कहा पूर्ण ब्रह्म ही मार्ग है। लेकिन जो जानते हैं वे कहते हैं,आदि शंकरा वही कह रहे हैं जो बुद्ध ने कहा था, सिर्फ शब्द भर बदल दिए हैं।आदि शंकरा की पूर्ण की परिभाषा वही है जो बुद्ध की शून्य की परिभाषा है। निराकार, निर्गुण,अनादि-अनंत--ये बुद्ध की शून्य की परिभाषा है।निराकार, निर्गुण, अनादि-अनंत--ये आदि शंकरा की पूर्ण की परिभाषा है ..सिर्फ शब्द बदलता है। जब भी कोई शब्द शास्त्रीय हो जाता है तो साधना के मार्ग पर पत्थर की तरह पड़ जाता है, सीढ़ी नहीं रह जाता। तब पंडित उसका विचार करने लगते हैं और प्रज्ञावान उसे छोड़ देते हैं।

3-उपनिषदों का सारा सार बुद्ध में है। लेकिन उन्होंने पूर्ण, ब्रह्म शब्द को छोड़ दिया ,और शून्य को पकड़ा। परमात्मा की व्याख्या दिन की तरह,प्रकाश की तरह,जीवन की तरह बहुत हो चुकी थी ।इसीलिए बुद्ध ने रात की तरह, मृत्यु की तरह, निर्वाण की तरह उसकी व्याख्या की।मृत्यु भी उतनी ही परमात्मा है जितना जीवन। रात भी उतनी ही परमात्मा है जितना दिन।बुद्ध और महावीर एक साथ ही पैदा हुए। लेकिन बुद्ध का प्रभाव सारे जगत पर फैलता चला गया। महावीर का विचार बड़ी सीमित दुनिया में रहा, जबकि दोनों ही प्रज्ञावान हैं ,दोनों का एक अनुभव है।

4-महावीर ने मौन कहा। इसलिए महावीर के संन्यासी को मुनि कहा जाता

है।मौन का अर्थ है: भीतर विचार का शून्य हो जाना।यही सहजोबाई कह रही है-''जो सोवैं तो सुन्न में''।''जो शून्य हो जाए ,भीतर--निर्विचार हो जाए; विचार के बीज दग्ध हो जाएं; चित्त का जाल कट जाए; भीतर सन्नाटा छा जाए--तो मुनि। फिर जीवन का अर्थ, गरिमा मिलेगी।महृषि

पतंजलि ने उसे ध्यान कहा। ध्यान का भी वही अर्थ होता है।

5-साधारणतः तुम सोए-सोए चल रहे हो जैसे कोई नशे में चलता है।लेकिन तुम्हें स्पष्ट नहीं है कि क्या हो रहा है!तुम्हें निर्विचार होना है क्योंकि जो निर्विचार होता है, वह प्रेम से भर ही जाता है। अगर निर्विचार की धारणा है , तो ध्यान या मौन कहोगे। और अगर प्रेम की धारणा है , तो प्रार्थना कहोगे।उदाहरण के लिए गिलास आधा खाली, कि आधा भरा ..जो चाहो कहो।खालीपन पर ध्यान रखो--तो आधा खाली।भरेपन पर ध्यान रखो--तो आधा भरा। व्यक्ति जब विचार से शून्य हो जाता है, तो उसे ध्यान या मौन कह सकते हो।

6-लेकिन व्यक्ति जैसे ही शून्य हुआ कि उसके ऊपर प्रेम की आकाश गंगा उतर आती है।वह भगीरथ हो जाता है और प्रार्थना में डूब जाता है।ध्यान और प्रार्थना दोनों एक ही सत्य के दो पहलू है।और फिर ऐसे ध्यान या प्रार्थना में डूबे हुए व्यक्ति का जीवन ही हरिकथा है।यूं तो सभी पात्र और अधिकारी हैं,अपात्र तो कोई भी नहीं है।परमात्मा अन्यायी नहीं है कि किसी को अपात्र ही बनाया हो। लेकिन पात्र को भी तो साफ करना होता है और स्वच्छ करने की कला संन्यास है।सभी पात्र हैं, लेकिन सभी अधिकारी नहीं हैं। जब पात्र स्वच्छ हो जाता है, तो अधिकार पैदा होता है।और जब तक कामना लिपटी रहेगी, तब तक पात्र स्वच्छ नहीं होता। इसलिए निष्काम हो जाओ। मांगो मत- तो अनंत तक मिलता रहेगा।मगर मांगे कि भिखारी हो गए ,और अधिकार खो दिया।

7-दो शैलियां हैं जीवन की .. या तो संसारी की गार्बेज इकट्ठा करने की शैली है या संन्यासी की मणि इकट्ठा करने की शैली है। मगर तुम कूड़ा-कर्कट/गार्बेज से इतना मोह करते हो, कि तुम संन्यासी को त्यागी कहते हो!वास्तव में,तुम किसको त्यागी कहोगे--एक तरफ कंकड़-पत्थर है और दूसरी तरफ मणि है।लेकिन चूंकि भाषा तुम बनाते हो; इसलिए तुम अपने ढंग से देखते हो। तुम महावीर बुद्ध को त्यागी कहते हो और अपने को भोगी कहते हो।तो सोचो तुम सिवाय दुख के और क्या भोग रहे हो? दुख भोगने को भोग कहते हो? तो फिर जो नर्क में हैं, क्या वे हैं असली भोगी..।

8-वास्तव में, जो स्वर्ग में हैं, वे हैं असली भोगी;त्यागी तो नर्क में पड़े हैं।त्याग का अर्थ होता है: कौड़ियों को बीन लेना--और मणियों को छोड़ देना। और योग का अर्थ होता है:मणियों को बीन लेना--और कौड़ियों को छोड़ देना।तो पहले स्वर्ग को चुनो।और फिर स्वर्ग के पार भी है एक जगत--मोक्ष का। वह तो परम भोग है।कैवल्य, निर्वाण--उससे बड़ा महासुख नहीं। बुद्ध ने उसे महासुख , परम आनंद कहा है। उपनिषद के ऋषियों ने उसे सच्चिदानंद कहा है। सत--चित--आनंद अथार्त आनंद अंतिम शिखर है। और जो आनंद को पा ले, वही योगी है। वही जानता है जीवन के रस को और वही परमात्मा की परिभाषा जान पाता है--कि वह रस-रूप है।

9-महावीर का विचार दूर तक नहीं गया क्योकि उन्होंने परमात्मा को पुराने शब्दों से ही पुकारा--आत्मा..आत्मा ही ज्ञान है।बुद्ध ने कहा--अनात्मा ..आत्मा अज्ञान है। अनात्मा अथार्त न होना, मिट जाना--ज्ञान है।दोनों एक साथ थे लेकिन बुद्ध ने परमात्मा को नयी व्याख्या दी, लेकिन पंद्रह सौ साल बाद आदि शंकरा ने कहा ''ब्रह्म शून्य नहीं है , पूर्ण है''।पंद्रह सौ साल के अंतराल के बाद ये 'पूर्ण' शब्द फिर से नया होकर आया। उपनिषद को फिर से नया प्राण मिला। वेद फिर से जागे। न तो आदि शंकरा बुद्ध के विपरीत हैं,और न बुद्ध आदि शंकरा के विपरीत हैं।वे दोनों एक ही बात कह रहे हैं, लेकिन उनके कहने के ढंग अलग हैं।

10- आदि शंकरा का घाट भी उसी का है, बुद्ध का घाट भी उसी का है। बुद्ध के घाट से भी नाव में बैठोगे तो उस पार लगोगे, और आदि शंकरा के घाट से भी नाव में बैठोगे तो उस पार लगोगे।वास्तव में, सारी गंगा उसी की है। चाहे मोहम्मद हो या जीसस..सब उसी के घाट है, और कितने भी घाट बना सकते हो, गंगा बहुत बड़ी है। पटे घाट तो थोड़े ही होंगे, गैर-पटे घाट भी उसी के हैं। सहजोबाई, कबीर, दादू--ये गैर-पटे घाट हैं, इन पर कोई संगमरमर नहीं लगा है।पर इनसे भी नाव छोड़ दोगे तो भी उस पर पार लगोगे।

11-घाट जहां बने हैं वहां से भी तुम उसी पार जाओगे, जहां नहीं बने हैं वहां से भी उसी पार जाओगे। अगर तुम बहुत सुसंस्कृत,सुन्दर घाट खोजते हो तो बुद्ध का, आदि शंकरा का घाट है।वहां फिसलने का डर कम होगा--पत्थर लगे हैं। सहजोबाई ,संत कबीर का घाट भी है, पर वहां पत्थर नहीं लगे हैं, वहां कीचड़ भी हैं...फिसल सकते हो। लेकिन कच्चे घाटों से नाव छोड़ने का मजा भी और है।पक्के घाट पर पंडे-पुजारी , मार्गदर्शक ,गाइड होते हैं, उनका शोरगुल- होता है।कच्चे घाटों पर कोई भी नहीं होता ;तुम अकेले होते हो।भटकने की संभावना भी होती है ;लेकिन, तब पहुंचने की ललक भी बढ़ जाती है।न तो आदि शंकरा बुद्ध का खंडन करते हैं और न बुद्ध आदि शंकरा का।बुद्ध कैसे उपनिषदों का, वेदों का खंडन करेंगे? यद्यपि, मूढ़ यही कहते हैं।

12-वास्तव में ,सभी धर्मों की मंजिल एक ही है। सभी धर्म इसीलिए बनाए गए हैं ताकि हमारी त्रिगुण की परिक्रमा पूरी हो जाए। हिंदू धर्म वाटर एलिमेंट का धर्म है।मुस्लिम फायर एलिमेंट का ,और क्रिश्चियनिटी एयर एलिमेंट का धर्म है। इसी प्रकार बुद्धिज्म भी एयर एलिमेंट का ही धर्म है। हमें सभी धर्मों की आवश्यकता है।त्रिगुण का सर्किल 3 धर्मों से ही पूरा होता है।वाटर एलिमेंट की आत्मा है फायर एलिमेंट। यही कारण है हिंदू धर्म में मृतक व्यक्ति को अग्नि दी जाती है।फायर एलिमेंट की आत्मा है एयर एलिमेंट।इसी वजह से मुस्लिम में मृतक व्यक्ति को जमीन के अंदर दफनाया जाता है।एयर एलिमेंट की आत्मा है वाटर एलिमेंट।इसीलिए क्रिश्चियनिटी में मृतक व्यक्ति को कॉफिन बनाकर लैविश्ली दफनाया जाता है।

13-हमें अपने जीवन में तीनों सर्किल पूरे करने होते हैं।और यदि हम नहीं कर पाते हैं तो सर्किल पूरा कराने के लिए हमें दूसरे धर्मों में जन्म दिया जाता है। यही कारण है अमेरिका में जन्म लेने वाला व्यक्ति भारत आ जाता है और भारत में जन्म लेना है व्यक्ति पाकिस्तान पहुंच जाता है। बहुत से पुनर्जन्म की घटनाओं में हम ऐसा देख चुके हैं। सभी धर्म अपनी अपनी आत्मा के अनुसार मृतकों की मृतक क्रिया करते हैं। यदि हम वाटर एलिमेंट है और हमने अपनी आत्मा को नहीं जाना ,अथार्त असाइनमेंट पूरा नहीं किया।तो हमें अगला जन्म मुस्लिम धर्म में मिल सकता है।

14-इसी प्रकार से अगर मुस्लिम ने सिर्फ फायर एलिमेंट को ही जाना तो उन्हें अगला जन्म क्रिश्चियनिटी में भी दिया जा सकता है।उसी प्रकार क्रिश्चियनिटी में भी अगर अपने एलिमेंट ही पूरा किया तो उनका जन्म भारत के हिंदू धर्म में दिया जा सकता है।ईश्वर के लिए धर्म का कोई भेद नहीं है। उसे सभी को त्रिगुण की परिक्रमा करानी है।और हम सब एक दूसरे से प्रतियोगिता कर रहे हैं।अपने को अच्छा कह रहे हैं, और दूसरे को बुरा कह रहे हैं। जिस तरह से हम अच्छे हैं, उसी तरह से दूसरे भी अच्छे हैं।कोई भी एलिमेंट अच्छा हीं है और हर व्यक्ति को तीन एलिमेंट का सर्किल पूरा करना है।

15-यदि आज हम दूसरे धर्म के लिए कांटे बो रहे हैं तो वह कांटे हम अपने लिए ही बो रहे हैं। अभी इस जन्म में हम हिंदू हैं और हमने सिर्फ अपने एलिमेंट ही पूरा किया तो अगला जन्म मुस्लिम का होने वाला है। तो अगर हमने मुस्लिम धर्म के लिए कांटे बोए हैं तो कांटे चुभेंगे तो हमें ही...।यदि क्रिश्चियनिटी में जन्म लेने वाला व्यक्ति सिर्फ एयर एलिमेंट को ही पूरा करता है तो उसका अगला जन्म हिंदू का होने वाला है। जो कांटे उसने हिंदुओं के लिए बोए हैं, वह उसे ही चुभेंगे।यदि हमें यह बात समझ में आ जाए तो हम दूसरों के लिए ,दूसरे धर्मों के लिए कांटे बोना बंद कर दें। इस संसार में ना कुछ अच्छा है... ना कुछ बुरा। सिर्फ दृष्टिकोण का महत्व है।क्या हम तीनों एलिमेंट के धर्मों में सम नहीं हो सकते? निर्णय हमारा है क्योंकि जो जैसा बोता है, वैसा ही काटता है।आज हम जो कर रहे हैं ;वह हमें ही भुगतना होगा।

...SHIVOHAM...