Recent Posts

Archive

Tags

No tags yet.

''जो सोवैं तो सुन्न में, जो जागैं हरिनाम''। क्यों हम श्रीकृष्ण को पूर्णावतार कहते ह


''जो सोवैं तो सुन्न में, जो जागैं हरिनाम'';-

23 FACTS;-

1- प्रसिद्ध संत कवि चरणदास की शिष्या भक्तिमती सहजो बाई का जन्म 25 जुलाई 1725 ई. को दिल्ली के परीक्षितपुर नामक स्थान में हुआ था।ग्यारह वर्ष की आयु में सहजो बाई के विवाह के समय एक दुर्घटना में वर का देहांत हो गया। उसके बाद उन्होंने संत चरणदास का शिष्यत्व स्वीकार कर लिया और आजीवन ब्रह्मचारिणी रहीं। सहजो बाई चरणदास की प्रथम शिष्या थीं। इन्होंने अपने गुरु से ज्ञान, भक्ति और योग की विद्या प्राप्त की। 24 जनवरी सन् 1805 ई. को भक्तिमती सहजो बाई ने वृंदावन में देहत्याग किया।

2-सहजो बाई का प्रसिद्ध वचन है:''जो सोवैं तो सुन्न में, जो जागैं हरिनाम।जो बोलैं तो हरिकथा, भक्ति करैं निहकाम''।अथार्त शून्य में सोना हरिनाम में जागना ..ऐसा जीवन हो कि सोवें तो शून्य में, उठें तो शून्य में, चले तो शून्य में।बोलना ही हरिकथा हो ; उसमें कोई भेद न रहे।शब्द उसी की याद में हो, कि चुप रहे तो भी उसी की याद है।और भक्ति अब जीवन का ढंग हो, आनंद हो।क्योकि रात भी उसी की है और दिन भी उसी का है।सोते भी उसी में हैं और जागते भी उसी में हैं।

3-रात का अंधकार भी वही है, दिन का प्रकाश भी वही हैं। दोनों ही महिमावान हैं।ये तो केवल तुम्हारा ही भय और पक्षपात है कि तुम कहते हो परमात्मा प्रकाश जैसा है, क्योंकि अंधेरे में तुम डरते हो।अंधेरा भी वही है।और जब तुम शांत होओगे, तब तुम पाओगे अंधेरे की भी अपनी गरिमा है , सौंदर्य है,अपनी शांति है।कोई प्रकाश उसका मुकाबला नहीं कर

सकता।वास्तव में, तुलना की बात नहीं है। प्रकाश को भी जानो , और अंधेरे को भी जानो क्योकि दोनों उसी के हैं।और तभी तुम घाटों से मुक्त बहती गंगा देख सकते हो।

4-सहजोबाई का मार्ग है प्रेम, शक्ति, समर्पण, गुरु-पूजा; फिर भी वह अंतर्मुखता, अंतर्यात्रा और वीतरागता पर जोर देती है क्योंकि कोई विरोध नहीं है।वीतराग का अर्थ है, जो राग के ऊपर उठ गया।और प्रेम का अर्थ है जो काम के ऊपर उठ गया। अगर प्रेम परिपूर्ण होगा तो वीतराग हो ही जाएगा। वीतरागता अगर परिपूर्ण होगी,तो उससे प्रेम की धारा बहने लगेगी।हमें शब्दों के आर-पार देखने में सफल होना हैं।

5-प्रेम का अर्थ है, रोग से मुक्ति और वीतराग का भी वही अर्थ है। वीतराग ध्यानियों का शब्द है; और भक्ति प्रेमियों का शब्द है। महावीर के लिए वीतराग,अंतर्मुखता महत्वपूर्ण है और मीरा , सहजो ,चैतन्य के लिए प्रेम, भक्ति,समर्पण महत्वपूर्ण है।अंतर्मुखता में और समर्पण में भेद नहीं है।जब तुम स्वयं को समर्पण करते हो; तो तुम स्वयं को ,अपनी बहिर्मुखता को ही समर्पण करते हो।अपने अहंकार को समर्पण के बाद जो भीतर बच रहता है, वही तो अंतर्मुखता, तुम्हारा शुद्ध अस्तित्व है।जब तुम्हारे भीतर से परमात्मा की प्रगाढ़ प्यास उठती है तो तुम परमात्मा को बाहर नहीं.. बल्कि उसी प्यास में छिपा हुआ पाओगे क्योकि प्यास ही प्रार्थना बन जाती है।

6-जो बाहर गुरु हैं, वह भीतर के गुरु तक पहुंचाने की सीढ़ी मात्र है। जब तुम बाहर के गुरु के चरणों में अपने को बिलकुल छोड़ देते हो, तो तुम पाते हो बाहर का गुरु तुम्हारे समर्पित होते ही विदा हो गया।अचानक तुम पाते हो यह स्वर तो भीतर बज रहा है , कोई भीतर बोल रहा है।बाहर का गुरु तो भीतर के गुरु को जगाने का उपकरण मात्र है। अगर तुम समर्पित हो जाओ, तो बाहर का गुरु भीतर के गुरु से एक हो जाता है।

7-सहजोबाई गुरु-पूजा की, अंतर्यात्रा की बात करती है। गुरु की अगर पूजा हो गयी, तो अंतर्यात्रा शुरू हो गयी, क्योंकि गुरु भीतर है।गुरु तो निजी अनुभव है ;तुम्हारा गुरु जरूरी नहीं कि सभी का गुरु हो।किसी को गौतम बुद्ध समझ में आएंगे तो किसी को आदि शंकराचार्य। मगर एक बात सच है कि जब भी तुम्हें अपने मन का गुरु मिल जाएगा, उसी वक्त तुम्हारा अस्तित्व मिट जाएगा। क्योंकि गुरु और शिष्य दो व्यक्ति तो नहीं हो सकते । वह दोनों एक ही व्यक्तित्व है।इसीलिए जब अचानक दोनों मिलते है तो शिष्य का व्यक्तित्व खो जाता है और तब शिष्य पाता है कि वह तो उसके भीतर ही है।

8-कुंडलनी उपनिषद में कुंडलनी का वर्णन साढ़े तीन अंगुल के रूप में हुआ है।अथार्त पहला पॉइंट फाइव है 6 चक्र और दूसरा पॉइंट फाइव है ब्रह्म।पूरा संसार त्रिगुण पर आधारित है।इस प्रकार प्रत्येक चक्र 50 नंबर कवर करता है। 6 चक्र =300= पॉइंट 5 माना जाता है।और प्रत्येक गुरु अपने शिष्य को केवल डेढ़ सौ अंक दिला सकता है अथार्त उसके तीन चक्र जागृत कर सकता है।तीसरा चक्र, मणिपुर चक्र है जिसे गुरु चक्र कहते हैं। तो प्रत्येक गुरु अपने शिष्य को मणिपुर चक्र तक पहुंचा देता है।अगर शिष्य अपने गुरु का सम्मान करता है। तो गुरु अपने शिष्य को मणिपुर चक्र के गुरु लोक से जोड़ देता है।

9-इस प्रकार गुरु का रोल केवल तीसरे चक्र तक पहुंचाने का है।इसके बाद शिष्य की अपनी यात्रा शुरू हो जाती है।डेढ़ सौ अंक गुरु दिला देता है और शेष डेढ़ सौ अंक शिष्य को प्राप्त करने होते हैं।आधी यात्रा गुरु कराता है और आधी यात्रा शिष्य को स्वयं करनी होती है।यह दोनों यात्रा मिलकर पॉइंट 5 पूरा हो जाता है।परंतु दूसरा पॉइंट फाइव केवल ईश्वर के हाथ में है।उसके लिए आपको ''लीप आफ फेथ'' लगानी होती। है? इस प्रकार दूसरा पॉइंट फाइव तो केवल ईश्वर पूरा कराता है लेकिन पहला पॉइंट फाइव पूरा कराने में गुरु सहायता देता है।

10-इसलिए तो सहजोबाई कहती है--''हरि को तज डारूं पै गुरु न बिसारूं''। क्योंकि हरि तो एक बंद किताब थी, गुरु ने ही उसे खोला।गुरु ने जगाया और चेताया।गुरु 'तुम्हें' तुम्हीं को दे रहा है। इसलिए वह अंतर्यात्रा

है।भक्ति और ध्यान के शब्दों में फंसना नहीं है। शब्दों से जागना है ,निःशब्द की तरफ चलना है। इसलिए शब्द का उपयोग करिये परन्तु जंजीर मत बनाइये।इस जगत में विपरीत दिखायी पड़ने वाले शब्द भी वस्तुतः विपरीत नहीं हैं।वे एक दूसरे के पूरक हैं।

11-अगर प्रेम, भक्ति का मार्ग सही है तो ध्यान उपलब्ध होगा।और अगर ध्यान का मार्ग सही है तो समाधि लगेगी, भक्ति उपलब्ध होगी।

ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।सहजोबाई कहती है ''साध सुखी सहजो कहै'' अथार्त साधु सुखी होता है;असाधु दुखी होता है।किसी को सुखी ,

पाओ तो समझना साधु है और अगर किसी को दुखी पाओ, तो समझना असाधु है।वास्तव में सुखी वही है जिसे पता भी नहीं चलता कि मैं दुखी हूं या सुखी।जिसे सुख-दुख का पता ही नहीं, वही सुखी है और वही साधु है।

12-तुमसे सदा कहा गया है कि पाप करोगे तो दुख पाओगे;अगर पुण्य करोगे तो सुख मिलेगा।वास्तव में,दुख पाप है, सुख पुण्य है।तुम सुखी हो तो पुण्यवान हो और तुम दुखी हो, तो तुम पापी हो।सच्चाई तो यह है कि,

सुखी आदमी अपनी बात ही नहीं करता। सिर्फ दुखी आदमी ही अपनी बात करते हैं।वह बात ही किए चला जाता है, अपना दुख रोए चला जाता है।

सुख को भी क्या किससे कहना ...सुख को लोग संभालते हैं।संत कबीर ने कहा है: ''हीरा पायौ, गांठ गठियौ''।

13-हीरा मिलते ही, मनुष्य अपनी गांठ में बांधकर नदारद हो जाता है ;भीड़ में नहीं कहता कि हीरा मिल गया। जिसको सुख मिलता है, वह गांठ में बांधकर नदारद हो जाता है। दुखी आदमी चिल्लाता है कि बड़ा दुखी हूं क्योंकि सोचता है ..शायद कहने से दुख कम हो जाए। सुखी संभालता

है, क्योंकि संभालने से सुख बढ़ता है।इसका गहनतम अर्थ तो इतना ही है कि तुम सुखी हो, तो तुम साधु हुए।और, सुखी की परिभाषा है, जहां तुम्हें पता ही न चले; क्योंकि पता दुख का ही चलता है सुख का नहीं।जब सिर में दर्द होता है, तब सिर का पता चलता है।

14-अगर सिर बिलकुल स्वस्थ होता है तो वह बिना सिर का है, पता ही नहीं चलता कि कहां है।जब शरीर का पता चले तो शरीर रुग्ण है।सर्दी जुकाम हो, तो श्वास का पता चलता है। नहीं तो श्वास चलती जाती है जितना ही तुम स्वस्थ हो, उतना ही शरीर का पता नहीं चलता। और यही भीतर का भी सूत्र

है।तुम्हें अगर बहुत पता चलता है कि 'मैं हूं', तो तुम्हारी आत्मा बीमार है। मैं का पता चलना आत्मा की बीमारी है। जब 'मैं हूं', इसका पता ही नहीं

चलता तब आत्मा स्वस्थ है।तब तुम घर लौट आए हो।इसलिए गौतम बुद्ध कहते है कि आत्मा है ही नहीं.. केवल कोरा आकाश ,शून्य है।यह स्वस्थ आत्मा की परिभाषा है-- अनात्मा। आत्मा कहने में ही रोग आ गया।

15-'भक्ति करै निहकाम'--निष्काम भक्ति;-

तो भक्ति दो तरह की हो सकती है।एक सकाम, एक निष्काम। सकाम का अर्थ है, कोई कामना ,मांग है।निष्काम का अर्थ है, कोई कामना,मांग नहीं है। निष्काम भक्ति में ही आनंद है।नर्तन, कीर्तन, भजन अपने-आप में ही लक्ष्य है। इसलिए हम परमात्मा से पुरस्कार मिलने की प्रतीक्षा न करेंगे।

भक्त का नृत्य अस्तित्व का नृत्य है।तो निष्काम भक्ति का अर्थ है, भक्ति ही आनंद है। सकाम भक्ति का अर्थ है, भक्ति साधन है.. पाना कुछ और है; अगर वह मिलेगा तो आनंद मिलेगा। तुम्हारी भक्ति में तो हमेशा कामना होती ही है।तुम भक्ति भी करते हो, तो पीछे वासना होती है कि यह मिल जाए, वह मिल जाए।अगर संसार का न मांगोगे, तो परलोक का मांगोगे, मगर मांगोगेअवश्य ।

16-तुम्हारी परमात्मा की धारणा यह है कि मिल जाए तो उससे यह ,वह सब कुछ मांग लूं।एक दिन बैठकर सोचो, कि अगर परमात्मा मिल जाए तो क्या-क्या मांगोगे । तुम चकित हो जाओगे कि क्या-क्या छोटी-छोटी बातें मांगने का विचार मन में आ रहा है कि धन ,पद ,ऐसा शाश्वत जीवन मांग लूं; कि कभी मिटे ही नहीं।तुम परमात्मा के मंदिर में भी तो कुछ मांगने ही जाते हो।क्योंकि तुम सदा कामना से भरे हो और जिस दिन तुम इस आनंद को अनुभव कर लोगे, उस दिन जो बोलोगे, हरिकथा ही होगी।क्योकि

उसकी अनुभूति इस पृथ्वी पर है, पर इस पृथ्वी की नहीं है।

17-निष्काम भक्ति में भगवान भी नहीं है क्योकि भक्ति ही भगवान है। जब तुम्हारी कोई कामना ही न रही, तो कौन भक्त और कौन भगवान; कौन लेने वाला और कौन देनेवाला? वह तो तुम्हारी कामना के कारण तुम भिखारी थे और कोई भगवान था।भक्त उसी दिन मिट जाता है जिस दिन कामना मिट जाती है।भगवान भी उसी दिन मिट जाता है ;जिस दिन कामना मिट जाती है।तब तो दोनों किनारे खो जाते हैं, बीच की धारा

रह जाती है।उस बीच की धारा का नाम भक्ति है।ध्यानी खो जाता है, ध्यान का विषय खो जाता है, ध्यान रह जाता है। जिसको हम अद्वैत कहते हैं और न भक्त बचता है, न भगवान।क्योकि भक्त और भगवान तो दोनों द्वैत के ही हिस्से है।दोनों के बीच एक नयी घटना घटती है, जो भक्ति है।

19-भक्ति अब निष्काम हो गयी। जब तक 'मैं है', तब तक थोड़ी कामना तो रहेगी।'मैं' मिटने पर ही कामना मिटेगी, और अगर कामना पूरी मिट जाए

तो 'मैं' के बचने का कोई उपाय न रहेगा।इस प्रकार भक्ति के दो रूप हैं--सकाम भक्ति ,निष्काम भक्ति। फिर निष्काम भक्ति के भी दो चरण हैं।पहला चरण हैं-- जब भक्त कुछ भी नहीं मांगता, सिर्फ भगवान को मांगता है। भक्त कहता है, न धन चाहिए, न पद चाहिए, न प्रतिष्ठा चाहिए, बस तुम्हीं को चाहिए। यह कामना बड़ी शुद्ध है, कोई अशुद्धि न रही इस कामना में, लेकिन कामना फिर भी मांग है।

20-दूसरा चरण हैं ...जब भक्त इतना भी नहीं मांगता। क्योंकि भक्त जानता है, मांगना क्या है, भगवान मिला ही हुआ है! मांगते थे इसीलिए नहीं मिलता था, मिला ही हुआ है। जिस दिन इस भाव का जन्म होता है, उस दिन न तो कोई भक्त है, न कोई भगवान है।उस दिन नाचने में भक्त और भगवान दोनों लीन हो जाते हैं।संत कबीर ने कहा है: ''उठूं बैठूं परिक्रमा। मंदिर मैं नहीं जाता''। तब उठना-बैठना सब मंदिर की परिक्रमा बन जाता है... सब अवस्थाओं के पार ऐसी अवस्था है, परमानंद की।

21-उदाहरण के लिए अकबर ने एक दिन तानसेन से पूछा कि ''क्या तुम्हारे गुरु तुमसे भी अदभुत हैं ..अगर गुरु जीवित हों, तो एक बार उन्हें दरबार में ले आओ तो मुझे उनके दर्शन करने हैं। उनका संगीत सुनूं, ताकि

मेरी यह जिज्ञासा मिट जाए''।तानसेन ने कहा, ''मेरे गुरु जीवित हैं। उनका नाम हरिदास है।वे एक संत हैं। लेकिन आप जो मांग कर रहे हैं, वह पूरी करवानी मेरे वश के बाहर है क्योकि उनकी कुछ मांग हीं नहीं है। वह यहां नहीं आएंगे।मैं तो यहां आता हूं, क्योंकि मेरी मांग है।वे फरमाइश से नहीं गाएंगे''।

22-अकबर ने कहा, तो वे कैसे गाएंगे?तानसेन ने कहा, बहुत मुश्किलें हैं। सुनने का एक ही उपाय है-चोरी से सुनना। जब वे बजाएं, तब सुनना। आमतौर से सुबह तीन बजे उठ कर वे बजाते हैं।जब तारे विदा होने के करीब होने लगते हैं; उस रात्रि और दिन के मिलन-संध्या पर--उनसे अलौकिक संगीत जन्मता है। हमें छुप कर बैठना होगा और चोरी-चोरी सुनना होगा। क्योंकि उन्हें पता चल गया कि कोई है, तो शायद न भी गाएं''!अकबर की तो जिज्ञासा ऐसी बढ़ गई थी कि उसने कहा कि चलेंगे।रात जाकर दोनों छुप रहे।तीन बजे--और हरिदास ने अपना इकतारा बजाया।अकबर के आंसू बह निकले और ऐसा आनंदित हुआ, जैसा जीवन में कभी न हुआ था।

23-अकबर ने तानसेन से कहा, ''तानसेन! मैं सोचता था, तेरा कोई मुकाबला नहीं है। अब सोचता हूं कि तू कहां! तेरी कहां गिनती! तेरे गुरु का कोई मुकाबला नहीं है। तेरे गुरु गुदड़ी के लाल हैं। किसी को पता भी नहीं; आधी रात बजा लेते हैं; और यह अदभुत गीत यूं ही बजता रहेगा और लीन हो जाएगा! तेरे गुरु के इस अलौकिक संगीत का क्या रहस्य है''?तानसेन ने

कहा, रहस्य सीधा-सादा है ''मैं बजाता हूं इसलिए, ताकि मुझे कुछ मिले। और वे बजाते हैं इसलिए, क्योंकि उन्हें कुछ मिल गया है। वह जो मिल गया है, वहां से उनका संगीत बहता है।वहां आनंद का अनुभव है.. मांग नहीं । आनंद पहले है, फिर उस आनंद से बहता हुआ संगीत है। मेरा संगीत तो भिखारी का संगीत है। यूं तो वीणा बजाता हूं, लेकिन हृदय तो पूछता रहता है: आज सम्राट से क्या पुरस्कार मिलेगा।आज प्रसन्न हो रहे हैं या नहीं हो रहे हैं? आपके चेहरे को देखता रहता हूं। पूरा-पूरा नहीं होता वीणा में। इसलिए आप ठीक ही कहते हैं: मेरी उनसे क्या तुलना..वे होते हैं, तो पूरे होते हैं''।तो यही हैं निष्काम भक्ति।

...SHIVOHAM...