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क्या है रुद्राक्ष का वैज्ञानिक और वैदिक महत्व?मुखी का क्या अर्थ हैं? क्या एक व चौदह मुखी रुद्राक्ष द

क्या है रुद्राक्ष का महत्व?-

09 FACTS;-

1-प्राचीन ग्रंथों के अनुसार ''रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के आंसुओं से हुई है तथा यह चमत्कारिक तथा दिव्यशक्ति स्वरूप है।''रुद्राक्ष जिसके शरीर पर हो और ललाट पर त्रिपुण्ड हो, वह चाण्डाल भी हो तो सब वर्णों में उत्तम एवं पूजनीय है।अभक्त हो या भक्त हो, नीच हो या नीच से भी नीच हो, जो रुद्राक्ष को धारण करता है, वह सब पातकों से छूट जाता है''। रुद्राक्ष को विश्व भर में अलग-अलग विभिन्न नामों से जाना जाता है। इनमें से कुछ खास नाम हैं पावन शिवाक्ष, रुद्राक्ष, भूतनाशक, नीलकठाक्षा, हराक्ष, शिवप्रिय, तृणमेरु, अमर, पुष्पचामर, रुद्राक, रुद्राक्य, अक्कम, रुद्रचलू आदि। रुद्राक्ष अब सारे विश्व के वैज्ञानिकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र हो गया है।

2-रुद्राक्ष में विद्युत चुंबकीय गुण होते हैं जो शरीर क्रिया विज्ञान पर प्रभाव डालते हैं। रद्राक्ष कवच सबसे शक्तिशाली प्रतिकारक यंत्र होता है क्योंकि यह व्यक्ति के सकारात्मक गुणों में वृद्धि करता है और हर नकारात्मक पक्ष को मिटाता है। रुद्राक्ष को नीला संगमरमर भी कहा जाता है। इसके वृक्ष भारत (पूर्वी हिमालय व नीलगिरी) के साथ-साथ नेपाल,थाईलैंड, इंडोनेशिया, जकार्ता एवं जावा में भी पाए जाते हैं।रुद्राक्ष ‘इलाओकार्पस गैनिट्रस’ पेड़ का बीज है और यह एक आध्यात्मिक साधक के जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।गोल, खुरदुरा, कठोर एवं लंबे समय तक खराब न होने वाला रुद्राक्ष एक बीज है।बीज पर धारियां पाई जाती हैं जिन्हें मुख कहा जाता है।पंचमुखी रुद्राक्ष बहुतायात पाए जाते हैं, जबकि एक व चौदह मुखी रुद्राक्ष दुर्लभ हैं।

3-अगर आपको अपने जीवन को शुद्ध करना है,आध्यात्मिक मार्ग पर चलना है, तो उसके

लिए रुद्राक्ष एक अच्छा साधन और सहायक है।एक गुरु आम तौर पर एक रुद्राक्ष को विभिन्न तरीकों से अलग-अलग तरह के लोगों के लिए ऊर्जान्वित करते हैं। पारिवारिक स्थितियों वाले लोगों के लिए, इसे एक तरह से ऊर्जान्वित किया जाता है। अगर आप एक ब्रह्मचारी या संन्यासी होना चाहते हैं, तो इसे एक बिलकुल अलग तरह से ऊर्जान्वित किया जाता है। एक खास तरह से ऊर्जान्वित किए गए रुद्राक्ष को पारिवारिक स्थितियों के लोगों को नहीं पहनना चाहिए।

4-सद्गुरु कहते है कि नकारात्मक ऊर्जाओं को किसी दूसरे को हानि पहुंचाने के लिए इस्तेमाल करना कुछ लोगों के लिए संभव है।यह अपने आप में एक पूरा विज्ञान है।‘अथर्व वेद,’ पूरा इसी बारे में है कि ऊर्जाओं को अपने लाभ के लिए और किसी दूसरे की हानि के लिए कैसे इस्तेमाल करें।अगर कोई इंसान इस विद्या में महारत हासिल कर ले, तो वह अपनी

शक्ति के प्रयोग से दूसरों को किसी भी हद तक नुकसान पहुंचा सकता है।रुद्राक्ष नकारात्मक ऊर्जाओं के खिलाफ एक किस्म का कवच है। आप सोच सकते है कि कोई आपके खिलाफ नकारात्मक चीजें नहीं करेगा, लेकिन जरूरी नहीं कि इसका लक्ष्य आप हों।हो सकता है कि आप गलत समय पर, गलत जगह पर हों। ऐसी चीजों को लेकर डरने की जरूरत नहीं है, लेकिन इन सभी स्थितियों में रुद्राक्ष कवच की तरह कारगर हो सकता है।

5-रुद्राक्ष ऊर्जा से भरा हुआ एक शक्तिशाली आभूषण है, कमजोर दिल वाले उसे नहीं पहन सकते हैं। हालांकि, यह व्यापक रूप से स्वास्थ्य मन और आत्मा के लिए जाना जाता है।

रुद्राक्ष की खासियत यह है कि इसमें एक अनोखे तरह का स्पदंन होता है। जो आपके लिए आप की ऊर्जा का एक सुरक्षा कवच बना देता है, जिससे बाहरी ऊर्जाएं आपको परेशान नहीं कर पातीं। इसीलिए रुद्राक्ष ऐसे लोगों के लिए बेहद अच्छा है जिन्हें लगातार यात्रा में होने की वजह से अलग-अलग जगहों पर रहना पड़ता है।आपने गौर किया होगा कि जब आप कहीं बाहर जाते हैं, तो कुछ जगहों पर तो आपको फौरन नींद आ जाती है, लेकिन कुछ जगहों पर बेहद थके होने के बावजूद आप सो नहीं पाते। इसकी वजह यह है कि अगर आपके आसपास का माहौल आपकी ऊर्जा के अनुकूल नहीं हुआ तो आपका उस जगह ठहरना मुश्किल हो जाएगा।

6-चूंकि साधु-संन्यासी लगातार अपनी जगह बदलते रहते हैं, इसलिए बदली हुई जगह और स्थितियों में उनको तकलीफ हो सकती है। उनका मानना था कि एक ही स्थान पर कभी दोबारा नहीं ठहरना चाहिए। इसीलिए वे हमेशा रुद्राक्ष पहने रहते थे। आज के दौर में भी लोग अपने काम के सिलसिले में यात्रा करते और कई अलग-अलग जगहों पर खाते और सोते हैं। जब कोई इंसान लगातार यात्रा में रहता है या अपनी जगह बदलता रहता है, तो उसके लिए

रुद्राक्ष बहुत सहायक होता है।रुद्राक्ष के संबंध में एक और बात महत्वपूर्ण है। खुले में या जंगलों में रहने वाले साधु-संन्यासी अनजाने पोखरे का पानी नहीं पीते, क्योंकि अक्सर किसी जहरीली गैस या और किसी वजह से वह पानी जहरीला भी हो सकता है।

7-रुद्राक्ष की मदद से यह जाना जा सकता है कि वह पानी पीने लायक है या नहीं।अगर पानी के ऊपर एक रुद्राक्ष को लटकाया जाता है तो अगर पानी अच्छा है और पीने योग्य है, तो यह घड़ी की सुई की दिशा में घूमेगा। अगर यह जहरीला है तो यह विपरीत दिशा में घूमेगा। भोजन की गुणवत्ता को जांचने का भी यही तरीका है।अगर आप इसे किसी पॉज़िटिव प्राणिक खाद्य पदार्थ पर लटकाते हैं, तो यह घड़ी की सुई की दिशा में घूमेगा। अगर आप इसे निगेटिव प्राणिक खाद्य पदार्थ पर लटकाते हैं, तो यह उल्टी दिशा में घूमेगा।

8-रुद्राक्ष के वृक्ष सामान्य रूप से आम के वृक्षों की तरह होते हैं। आम के पत्तों की तरह इसके

पत्ते भी होते हैं।इसका फूल सफेद रंग का होता है इसके फल हरी आभा युक्त नीले रंग के गोल आकार में आधा इंच से एक इन्च व्यास तक के होते हैं। फल की गुठली पर प्राकृतिक रूप से कुछ धारियां होती हैं और धारियों के बीच का भाग रवेदार होता है। गुठलियों पर आड़ी धारियों से ही रुद्राक्ष के मुखों की गणना की जाती है। रुद्राक्ष के रंग तथा मुख एवं उसमें बने छिद्र प्राकृतिक रूप से होते हैं। ये मुख्यतः चार रंगों में पाये जाते हैं...

1. श्वेत वर्ण || 2. रक्त वर्ण || 3. पीत वर्ण || 4. श्याम वर्ण रुद्राक्ष

9-रुद्राक्ष के छोटे एवं काले दानों के वृक्ष अधिकांशतः इण्डोनेशिया में पाये जाते हैं तथा नेपाल में भी इसके कुछ वृक्ष हैं। इण्डोनेशिया में विशेषतौर पर 1 मुखी, 2 और 3 मुखी पाया जाता है। ये रूद्राक्ष नेपाल में बहुत कम पाया जाता है। इसलिए 1 मुखी, 2 मुखी और 3 मुखी नेपाली

दाना का मूल्य अधिक होता है।किसी भी रंग या किसी भी क्षेत्र का रुद्राक्ष अनेक सिद्धियों एवं रोगों के उपचार के लिए उपयोग में लाया जा सकता है। रुद्राक्ष-पाप वृत्ति से दूर रखता है, हिंसक कार्यो से बचाता है भूत प्रेत एवं ऊपरी बाधाओं से रक्षा भी करता है तथा पाप कर्मों को नष्ट करके पुण्य का उदय करता है। रुद्राक्ष को धारण करने से बुद्धि का विकास होता है। रुद्राक्ष धारी व्यक्ति की अल्पमृत्यु नहीं होती एवं रुद्राक्ष दीर्घायु प्रदान करता है। रुद्राक्ष से भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त होते हैं।चंद्रमा शिवजी के भाल पर सदा विराजमान रहता है अतः चंद्र ग्रह जनित कोई भी कष्ट हो तो रुद्राक्ष धारण से बिल्कुल दूर हो जाता है। किसी भी प्रकार की मानसिक उद्विग्नता, रोग एवं शनि के द्वारा पीड़ित चंद्र अर्थात साढ़े साती से मुक्ति में रुद्राक्ष अत्यंत उपयोगी है।

आपको कौन सा रुद्राक्ष पहनना चाहिए?-

08 FACTS;-

1-अलग-अलग ग्रहों की शक्तियों की अभिवृद्धि के लिए अलग-अलग प्रतिनिधि रुद्राक्ष धारण करने का विधान है। रुद्राक्ष धारण करने से मन स्थिर होता है तथा विभिन्न रोगों का शमन होता है। रुद्राक्ष सामान्यतया पांच मुखी पाए जाते हैं, लेकिन एक से चौदह मुखी रुद्राक्ष का उल्लेख शिव पुराण, पद्म पुराण आदि में मिलता है।किसी मनके में एक मुख से लेकर 21 मुख तक हो सकते हैं। वे अलग-अलग उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।गलत तरह का रुद्राक्ष व्यक्ति के जीवन में खलल पैदा कर सकता है।

2-रुद्राक्षों में एक मुखी अति दुर्लभ है। शुद्ध एक मुखी रुद्राक्ष तो देखने में मिलता ही नहीं है। नेपाल का गोल एक मुखी रुद्राक्ष अत्यंत ही दुर्लभ है। इसके स्थान पर दक्षिण भारत में पाया जाने वाला एक मुखी काजूदाना अत्यंत ही प्रचलित है। असम में पाया जाने वाला गोल दाने का एक मुखी रुद्राक्ष भी बहुत प्रचलित है।बहुत से लोग एकमुखी को, जिसमें सिर्फ एक मुख होता है, पहनते हैं क्योंकि वह बहुत शक्तिशाली होता है।जब आपके कई चेहरे हों, और आप एकमुखी पहनते हैं तो आप मुसीबत को बुला रहे हैं।कहा जाता है कि अगर आप एकमुखी पहनते हैं तो आप बारह दिन में अपना परिवार छोड़ देंगे।वास्तव में,यह आपकी ऊर्जाओं को ऐसा बना देगा कि आप अकेले होना चाहेंगे। यह आपको दूसरे लोगों के साथ मिलनसार नहीं बनाता।

3-रुद्राक्ष सामान्यतया पांच मुखी पाए जाते हैं, लेकिन एक से चौदह मुखी रुद्राक्ष का उल्लेख शिव पुराण, पद्म पुराण आदि में मिलता है।पंचमुखी रुद्राक्ष सुरक्षित होता है और यह पुरुषों, महिलाओं और बच्चों, हर किसी के लिए अच्छा है। यह समान्य खुशहाली, स्वास्थ्य और स्वतंत्रता के लिए है। यह आपके ब्लड प्रेशर को कम करता है, आपकी तंत्रिकाओं को शांत

करता है और स्नायु तंत्र में एक तरह की शांति और सतर्कता लाता है।14 साल से छोटे बच्चे छह मुखों वाला रुद्राक्ष पहन सकते हैं।यह उनको शांत और एकाग्र बनने में सहायता करेगा। सबसे बढ़कर उन्हें बड़ों से सही किस्म की परवाह मिलेगी।

4-गौरी-शंकर एक खास किस्म का रुद्राक्ष होता है जो आपकी ईडा और पिंगला के बीच संतुलन लाता है।गौरी शंकर रुद्राक्ष में दो रुद्राक्ष प्राकृतिक रूप से जुड़े होते हैं। ये दोनों रुद्राक्ष गौरी एवं शंकर के प्रतीक हैं। इसे धारण करने से दाम्पत्य जीवन में मधुरता बनी रहती है।आम तौर पर, लोग मानते हैं कि यह उनके लिए संपन्नता लाएगा।हो सकता है कि आपके पास कुछ न हो, लेकिन फिर भी आप अपने जीवन में संपन्न हो सकते हैं। अगर आप एक संतुलित व्यक्ति हैं और आप अपने जीवन में समझदारी से काम करते हैं, तो संपन्नता आ सकती है। यह तब होता है जब ऊर्जाएं अच्छे से काम करती हैं। एक गौरी-शंकर आपकी ईडा और पिंगला को संतुलित और सक्रिय बनाता है।

5-रुद्राक्ष के मुख की पहचान उसे बीच से दो टुकड़ों में बांटकर की जा सकती है। जितने मुख होते हैं उतनी ही फांकें नजर आती हैं। हर रुद्राक्ष किसी न किसी ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है।इनका विभिन्न रोगों के उपचार में भी विशेष उपयोग होता है। इक्कीस मुखी से

ऊपर के रुद्राक्ष अति दुर्लभ हैं।रुद्राक्ष के दाने जैसे-जैसे छोटे होते हैं वैसे उनकी कीमत बढ़ती जाती है। जो दाना बड़ा होता है उसकी कीमत कम होती है परन्तु एक मुखी एवं गौरीशंकर रुद्राक्ष का बड़े आकार में अधिक महत्व है तथा कलयुग में काला रुद्राक्ष अत्यधिक उपयोगी एवं लाभकारी माना गया है। इसकी पैदावार मुख्यतः इण्डोनेशिया में होती है।इसके अतिरिक्त अट्ठाइस मुखी तक के रुद्राक्ष भी पाए जाते हैं। मालाएं अधिकांशतः इंडोनेशिया से उपलब्ध रुद्राक्षों की बनाई जाती हैं। बड़े दानों की मालाएं छोटे दानों की मालाओं की अपेक्षा सस्ती होती हैं। साफ, स्वच्छ, सख्त, चिकने व साफ मुख दिखाई देने वाले दानों की माला काफी महंगी होती है।

6-रुद्राक्ष के अन्य रूपों में गौरी गणेश, गणेश एवं त्रिजुटी आदि हैं। इसी प्रकार गौरी गणेश में भी दो रुद्राक्ष जुड़े होते हैं एक बड़ा एक छोटा, मानो पार्वती की गोद में गणेश विराजमान हों।इस रुद्राक्ष को धारण करने से पुत्र संतान की प्राप्ति होती है एवं संतान के सभी प्रकार के कष्टों का निवारण होता है। गणेश रुद्राक्ष में प्राकृतिक रूप से हाथी की सूंड जैसी आकृति बनी होती है। इसे धारण करने से सभी प्रकार के अवरोध दूर होते हैं एवं दुर्घटना से बचाव होता है। त्रिजुटी रुद्राक्ष में तीन रुद्राक्ष प्राकृतिक रूप से जुड़े होते हैं। यह अति दुर्लभ रुद्राक्ष है और इसे धारण करने से सभी प्रकार के कष्टों का निवारण होता है।

7-गौरी शंकर, गौरी गणेश या त्रिजुटी रुद्राक्ष अक्सर इस प्रकार बना लिए जाते हैं। इसकी जांच के लिए यदि रुद्राक्ष को पानी में उबाल दिया जाए तो नकली रुद्राक्ष के टुकड़े हो जाएंगे जबकि असली रुद्राक्ष ज्यों का त्यों रह जाएगा। कई बार नकली रुद्राक्ष को भारी करने के लिए छिद्रों में पारा या सीसा भर दिया जाता है। उबालने से यह पारा या सीसा बाहर आ जाता है और

रुद्राक्ष तैरने लगता है।कई बार देखने में आता है कि रुद्राक्ष पर सर्प, गणेश, त्रिशूल आदि बने होते हैं। ये सभी आकृतियां प्राकृतिक नहीं होती हैं, इस प्रकार के रुद्राक्ष केवल नकली ही होते हैं।अधिक मुख वाले रुद्राक्ष एवं एक मुखी रुद्राक्ष महंगे होने के कारण नकली भी बना लिए जाते हैं।

8-प्रायः कम मुखी रुद्राक्ष में अतिरिक्त मुख की धारियां बना दी जाती हैं जिससे कम मूल्य का रुद्राक्ष अधिक मूल्य का हो जाता है। इस तथ्य की जांच करने के लिए अनुभव द्वारा इन कृत्रिम धारियों और प्राकृतिक धारियों में अंतर किया जा सकता है। कभी-कभी दो रुद्राक्षों को

जोड़कर भी एक महंगा रुद्राक्ष बना लिया जाता है।आज भारत में एक और मनका उपलब्ध है जिसे भद्राक्ष करते हैं और यह जहरीला बीज है, जो उत्तर प्रदेश, बिहार और उन इलाकों में काफी उगता है। देखने में ये दोनों बीज एक से दिखते हैं। आप अंतर पता नहीं कर सकते। अगर आप इसे हाथ में लेते हैं, और अगर आप संवेदनशील हैं, सिर्फ तभी आपको अंतर पता चलेगा।इसे शरीर पर नहीं पहनना चाहिए, लेकिन इन्हें कई जगहों पर असली मनकों की तरह बेचा जा रहा है।

रुद्राक्ष की माला के नियम ;-

03 FACTS;-

1-आम तौर पर मनकों को एक माला के रूप में पिरोया जाता है। पारंपरिक रूप से, यह माना जाता है कि मनकों की संख्या 108 ‘प्लस एक’ होनी चाहिए। अतिरिक्त मनका बिंदु की तरह है।माला में हमेशा एक बिंदु होना चाहिए, वरना ऊर्जा चक्रीय हो जाएगी और जो लोग संवेदनशील हैं, उन्हें चक्कर आ सकते हैं। एक वयस्क को 84 ‘प्लस एक बिंदु’ से कम मनकों की माला नहीं पहननी चाहिए। उससे ज्यादा कोई भी संख्या ठीक रहेगी

2-जब आप उन्हें पिरोएं, तो सबसे अच्छा होगा कि उन्हें एक रेशमी धागे में या सूती धागे में पिरोया जाए। अगर आप इसे धागे में पहनते हैं, तब हर छह महीने पर धागे को बदलना अच्छा रहता है, वरना एक दिन धागा टूट सकता है, और आपके 108 मनके हर जगह बिखर जाएंगे। अगर आप चाहें तो तांबे या सोने के तार में पिरो सकते है। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि आप यह सुनिश्चित करें कि माला में मनके ढीले हैं। इन्हें बहुत करीब रखकर नहीं बांधना चाहिए, क्योंकि अगर दबाव के कारण यह अंदर से टूट जाता है, तो यह किसी काम का नहीं है।

3-माला को हर समय पहना जा सकता है।आप नहाते समय भी पहने रह सकते हैं। अगर आप ठंडे पानी से नहाते हैं और किसी केमिकल साबुन का इस्तेमाल नहीं करते हैं, तो इसके ऊपर से बहकर निकले पानी का आपके शरीर पर से बहना विशेष रूप से अच्छा है। लेकिन अगर आप किसी केमिकल साबुन और गरम पानी का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो यह भंगुर बन जाता है और कुछ समय बाद चटक जाएगा। तो ऐसे मौकों पर इसे पहनने से बचना बेहतर होगा।

क्या है रुद्राक्ष थैरेपी ?-

05 FACTS;-

1-आयुर्वेद के अनुसार रुद्राक्ष एक प्रकार का फल है। इसमें अनेक औषधीय गुण भी विद्यमान है। रुद्राक्ष को धारण करने से या इसे जल में कुछ घंटे रखकर उस पानी को ग्रहण करने से दिल से संबंधित बीमारियां दूर होती है व मानसिक रोगों के साथ ही नसों से जुड़े रोग भी समाप्त हो जाते हैं। साथ ही, स्मरणशक्ति में भी अपेक्षित अभिवृद्धि होती है।रुद्राक्ष धारण करने से दिल की बीमारी, रक्तचाप एवं घबराहट आदि से मुक्ति मिलती है।इसे एकाग्रता के लिए भी पहना जाता है।

2-कीमोफार्माकोलॉजिकल विशेषताओं के कारण यह हृदयरोग, रक्तचाप एवं कोलेस्ट्रॉल स्तर नियंत्रण करने में प्रभावशाली माना जाता है। स्नायुतंत्र (नर्वस सिस्टम) पर भी यह अपेक्षित प्रभाव डालता है एवं संभवत: न्यूरोट्रांसमीटर्स के प्रवाह को संतुलित करता है।इसकी औषधीय क्षमता विद्युत चुंबकीय प्रभाव से पैदा होती है।

3-आयुर्वेद और पुराणों ने रुद्राक्ष को बहुत गुणकारी माना है। इसमें लोहा, जस्ता, निकल, मैंगनीज, एल्यूमिनियम,तांबा , फास्फोरस, कैल्शियम, कोबाल्ट(एक रासायनिक तत्व), पोटैशियम, सोडियम, सिलिका, गंधक आदि तत्व विद्यमान होते हैं।इन तत्वों की उपस्थिति से घनत्व बढ़ जाता है एवं इसी के फलस्वरूप ये लकड़ी का होने के बावजूद अपने भीतरी घनत्व के कारण पानी में डूब जाता है। रुद्राक्ष के दानों में गैसीय तत्व भी है। इसकी चुम्बकीय और विद्युत ऊर्जा से शरीर को रुद्राक्ष का अलग-अलग लाभ होता है।

4-रुद्राक्ष को शुद्ध जल में तीन घंटे रखकर उसका पानी किसी अन्य पात्र में निकालकर, पहले निकाले गए पानी को पीने से बेचैनी, घबराहट, मिचली व आंखों का जलन शांत हो जाता है। दो बूंद रुद्राक्ष का जल दोनों कानों में डालने से सिरदर्द में आराम मिलता है। रुद्राक्ष का जल हृदय रोग के लिए भी लाभकारी है।चरणामृत की तरह प्रतिदिन दो घूंट इस जल को पीने से शरीर स्वस्थ रहता है। इस प्रकार के अन्य बहुत से रोगों का उपचार आयुर्वेद में बताया गया है।

5- वैज्ञानिकों ने अध्ययन कर इसके विद्युत चुंबकीय, अर्धचुंबकीय तथा औषधीय गुणों को सही पाया।रुद्राक्ष विद्युत ऊर्जा के आवेश को संचित करता है जिससे इसमें चुंबकीय गुण विकसित होता है। इसे डाय इलेक्ट्रिक प्रापर्टी कहा गया। इसकी प्रकृति इलेक्ट्रोमैग्नेटिक व पैरामैग्नेटिक है एवं इसकी डायनामिक पोलेरिटी विशेषता अद्भुत है।पानी में डूबने वाले

रुद्राक्ष को असली माना जाता है। यह भी मानते हैं कि दो तांबों के सिक्कों के मध्य रखने पर यदि इसमें कंपन होता है, तो यह असली है। यथार्थ में इस कंपन का कारण विद्युत चुंबकीय

गुण तथा डायनामिक पोलेरिटी हो सकता है।जैव वैज्ञानिकों ने रुद्राक्ष में जीवाणु (बैक्टीरिया),

विषाणु (वायरस), फफूंद(फंगाई) प्रतिरोधी गुणों को पाया है।इसमें कैंसर प्रतिरोधी क्षमता का आकलन भी किया गया है।चीन में हुए खोज कार्य दर्शाते हैं कि रुद्राक्ष यिन-यांग एनर्जी का संतुलन बनाए रखने में कारगर है। दुनियाभर के वैज्ञानिक रुद्राक्ष के इतने सारे गुणों को एक साथ देखकर आश्चर्यचकित हैं।

क्या है एक मुखी से इक्कीस मुखी रुद्राक्ष का महत्व?-

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