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क्या प्राणमय कोश भी आपकी अंतर्यात्रा में सहायक या बाधा बन सकते हैं?PART-02


प्राणमय कोश का क्या महत्व हैं?-

10 FACTS;-

1-स्थूल शरीर पदार्थ-निर्मित ,अन्न से निर्मित है;परन्तु प्राण-शरीर , ऊर्जा से, शक्ति से निर्मित है।इस शरीर के पीछे ही छिपा हुआ है प्राण-शरीर।दूसरे शरीर को महृषि पतंजलि ‘प्राणमय कोष’, ऊर्जा शरीर, विद्युत काया ,वाइटल बॉडी कहते हैं।प्राण-शरीर से अर्थ है ... एनर्जी बॉडी ,विद्युत से बनी। इसी शरीर पर एक्युपॅक्चर कार्य करता है।दूसरा शरीर पहले से अधिक सूक्ष्म है।और जो लोग पहले शरीर से दूसरे की ओर बढ़ने लगते हैं; वे अत्यधिक आकर्षक, चुंबकीय, सम्मोहक और ऊर्जा-पुंज बन जाते हैं। उनके पास स्फूर्ति और जीवंतता महसूस होती है।

2-यदि तुम ऐसे व्यक्ति के पास जाते हो जो सिर्फ अपने अन्न शरीर में जी रहा है, तो तुम रिक्तता अनुभव करोगे, वह तुम्हें सोख लेगा। अनेक बार तुम ऐसे लोगों के संपर्क में आते हो और यह महसूस करते हो कि वे तुम्हें सोखते हैं। जब वे हट जाते हैं तो तुम्हें खालीपन का, रिक्तता का अहसास होता है, जैसे कि किसी ने ऊर्जा को शोषित कर लिया हो। पहला शरीर शोषक है, और यह बहुत स्थूल भी है। यदि तुम अन्न/स्थूल शरीर उन्मुख लोगों के साथ बहुत अधिक रहते हो, तो तुम सदा बोझिलता, तनाव, ऊब, नींद और ऊर्जा विहीनता का अनुभव करोगे, सदा अपनी ऊर्जा के निचले पायदान पर रहोगे और उच्चतर विकास में लगाने के लिए तुम्हारे पास कोई ऊर्जा नहीं बचेगी।

3-इस प्रकार, पहले प्रकार का अन्नमय कोष उन्मुख व्यक्ति खाने के लिए जीता है ..वह खाता है ..और खाता है और खाए चला जाता है।और यही उसका संपूर्ण जीवन है।एक अर्थ में वह अज्ञानता में ही रहता है।प्रत्येक बच्चे को संसार में आकर पहला कार्य भोजन काया की सहायता करना ही होता है, और यदि कोई भोजन से ही आसक्त रहता है, तो वह बचकाना ही

बना रहता है। उसके विकास में बाधा आती है।यह दूसरा शरीर, प्राणमय कोष, तुम्हें नई स्वतंत्रता देता है, तुम्हें ज्यादा आकाश देता है। दूसरा शरीर पहले से बड़ा है, यह तुम्हारे भौतिक शरीर तक ही सीमित नहीं है।यह भौतिक शरीर के अंदर है और यही भौतिक शरीर के बाहर है। यह सूक्ष्म वायु की, ऊर्जा-मंडल की भांति तुम्हें घेरे हुए है।

4-अब तो वैज्ञानिको ने यह खोजा है कि इस ऊर्जा शरीर के चित्र लिए जा सकते हैं। इसे बायोप्लाज्मा कहते हैं, लेकिन इसका सही अर्थ है, प्राण। रक्त/ ब्लड के 3 कंपोनेंट होते हैं, पहला आरबीसी, दूसरा प्लेटलेट्स, तीसरा ब्लड प्लाजमा।तीनों कंपोनेंट की अलग अलग अहमियत होती है।किर्लियन फोटोग्राफी से संबंधित रिचर्स पैरासाइकोलॉजी के अंतर्गत की जाती हैं।हालांकि विज्ञानों के विशेषज्ञ इसे स्यूडो साइंस, यानी छद्‌म विज्ञान कहते हैं और इसके निष्कर्षों को मान्यता नहीं देते हैं।फिर भी बहुत-से अध्यात्मवादी, रहस्यवादी और मानव की सुपर नेचुरल शक्तियों में यकीन रखने वाले लोगों के लिए यह आकर्षण का विषय है।

5-यह ऐसी फोटोग्राफी है, जिसके लिए लेंस और कैमरे की जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन इससे आपके शरीर का ऑरा/ प्रभामंडल नजर आता है। माना जाता है कि हर चीज से विशेष ऊर्जा निकलती रहती है। इंसानों, जानवरों, पेड़-पौधों जैसे सजीवों से लेकर सिक्का, पेन जैसी निर्जीव चीजों से भी ये एनर्जी निकलती रहती है। इस एनर्जी को कैप्चर करना किर्लियन फोटोग्राफी कहलाता है।विशेषज्ञ मानते हैं कि यह ऑरा प्राणकोषों से निकलता है। शरीर में कोई भी रोग प्राण कोष से ही शुरू होता है।और शरीर में रोग के लक्षण नजर आने के बहुत पहले ही प्राण कोषों में उसकी शुरुआत हो चुकी होती है।

6-इसलिए विशेषज्ञों का दावा है कि किर्लियन फोटोग्राफ के एनालिसिस से रोगों के उभरने से पहले ही जाना जा सकता है और बचाव के उपाय किए जा सकते हैं।किरलियान विधि द्वारा लिए गए तुम्हारे फोटो बता देंगे कि तुम्हारे भौतिक शरीर को कोई बीमारी होने वाली है। इसे

प्राणमय कोष में ही रोका जा सकता है।भौतिक शरीर का कोई परीक्षण, कोई जांच कुछ नहीं दर्शाता है, लेकिन विद्युत शरीर इसे दिखाने लगता है। पहले यह प्राणमय कोष में प्रकट होता है, तभी यह अन्नमय कोष में प्रविष्ट होता है।यदि तुम्हें टीबी. या कैंसर या कोई और बीमारी होने वाली हो तो तुम्हारे ऊर्जा शरीर में छह माह पूर्व से इसके लक्षण दिखने लगते हैं।

7-भारतीय योग तो हजारों साल से कहता आया है कि मनुष्‍य के स्थूल शरीर में कोई भी बिमारी आने से पहले आपके सूक्ष्‍म शरीर में छ: माह पहले आ जाती है। यानि छ: माह पहले अगर सूक्ष्म शरीर पर ही उसका इलाज कर दिया जाये तो बहुत सी बिमारियों पर विजय पाई

जा सकती है।इसी प्रकार भारतीय योग कहता है कि मृत्‍यु की घटना भी अचानक नहीं घटती वह भी शरीर पर छ: माह पहले से तैयारी शुरू कर देती है।पर इस

बात का एहसास.. हमें नहीं होता।वास्तव में पशु पक्षी भी अतीन्द्रिय ज्ञान में

हमसे कहीं आगे है।साइबेरिया में आज भी कुछ ऐसे पक्षी हैं जो बर्फ गिरने के ठीक 14 दिन पहले वहां से उड़ जाते हैं ... न एक दिन पहले न एक

दिन बाद।जापान में आज भी ऐसी चिड़िया पाई जाती है जो भुकम्‍प के12

घन्‍टे पहले वहाँ से गायब हो जाती है।और भी न जाने कितने पशु-पक्षी हैं जो अपनी अतीन्द्रिय शक्‍ति के कारण ही आज जीवित हैं।

8-भारत में हजारों योगी मरने की तिथि पहले ही घोषित कर देते हैं।

कुछ तो हमारे स्थूल शरीर के उपर ऐसा घटता है, जिससे योगी जान जाते

हैं कि अब हमारी मृत्‍यु का दिन करीब आ गया है।आम आदमी उस बदलाव को नहीं कर पाता क्‍योंकि वह अपने दैनिक कार्यो के प्रति सोया हुआ है।योगी थोड़ा सजग हुआ है।वह जागने का प्रयोग कर रहा है।इसी से

उस परिर्वतन को वह देख पाता है, महसूस कर पाता है।उदाहरण के लिए जब आप रात को सोने के लिए जाते है तो सोने ओर निंद्रा के बीच में एक संध्या काल आता है, एक न्यूटल गीयर, पर वह पल के हज़ारवें हिस्‍से के समान होता है। उसे देखने के लिए बहुत होश चाहिए। आपको पता ही नहीं चल पाता कि कब तक जागे और कब नींद में चले गये।

8-पर योगी सालों तक उस पर मेहनत करता है।जब वह उस संध्‍या काल की अवस्था से परिचित हो जाता है।मरने के ठीक छ: महीने पहले मनुष्‍य के चित्त की वही अवस्‍था सारे दिन के लिए हो जाती है।तब योगी समझ जाता है अब मेरी बड़ी संध्‍या का समय आ गया। पर पहले उस छोटी संध्‍या के प्रति सजग होना पड़ेगा। तब महासंध्या के प्रति आप जान पायेंगे।

और हमारे पूरे शरीर का स्नायु तंत्र प्राण ऊर्जा का वर्तुल उल्‍टा कर देता है। यानि आप साँसे तो लेंगे पर उसमें प्राण तत्‍व नहीं ले रहे होगें। शरीर प्राण तत्‍व छोड़ना शुरू कर देता है।

9-इस फोटोग्राफी द्वारा जीवित व मृत व्यक्तियों के चित्र लिए गयें| जीवित व्यक्तियों के चित्रों में आसपास ऊर्जा का वर्तुल आता है, लेकिन मृत व्यक्ति के चित्र में वर्तुल नहीं आता | ऊर्जा के गुच्छे दूर भागते प्रतीत होते हैं | तीन दिन तक मरे हुए आदमी में से ऊर्जा के गुच्छे बाहर निकलते रहते हैं | पहले दिन कुछ अधिक, दूसरे दिन उससे कम और तीसरे दिन और कम | वैज्ञानिक कहते हैं कि जब तक ऊर्जा निकल रही है, तब तक पुनर्जीवित करने की विधि आज नहीं तो कल खोजी जा सकेगी |

10-मृत्यु में ऊर्जा बाहर जा रही है, किन्तु बजन कम नहीं होता |निश्चय ही उस ऊर्जा पर ग्रेविटेशन का कोई असर नहीं होता | योग कहता है कि जब अनाहत चक्र सक्रिय होता है तो जमीन का गुरुत्वाकर्षण कम हो जाता है | यही कारण है कि योगी का शरीर जमीन से ऊपर उठना संभव हो जाता है | उस ऊर्जा को जगाने की क्रिया को ही वैदिक संस्कृति ने यज्ञ कहा है | उस ऊर्जा के जागने पर जीवन में एक नई ऊष्मा भर जाती है | तपस्वी जितना शीतल होता है, उतना कोई नहीं होता | तपस्वी का अर्थ है ताप से भरा हुआ किन्तु यह अग्नि जितनी जग जाती है, उतना केंद्र शीतल हो जाता है |

11-पहले वैज्ञानिको के अनुसार सूर्य जलती हुई अग्नि माना जाता था| लेकिन अब कहते हैं कि सूर्य अपने केंद्र पर अत्यंत शीतल है |''दा कोल्डेस्ट स्पॉट इन द यूनिवर्स'' | जहां जितनी अग्नि हो उसे शीतल करने को उतनी ही शीतलता चाहिए अन्यथा संतुलन टूट जाएगा | तो तपस्वी की कोशिश यह है कि वह अपने चारों ओर इतनी अग्नि पैदा कर ले ताकि उस अग्नि के

अनुपात में भीतर शीतलता का बिन्दु पैदा हो|किरालियान फोटोग्राफी में जब कोई व्यक्ति संकल्प करता है तो ऊर्जा का वर्तुल बड़ा हो जाता है| जब आप घृणा से, क्रोध से भरे होते हैं, तब आपके शरीर से उसी तरह की ऊर्जा के गुच्छे निकलते है, जैसे मृत्यु पर निकलते हैं |

12-जब आप प्रेम से भरे होते हैं, जब आप करुणा से भरे होते हैं, तब विराट ब्रह्म से आपकी तरफ ऊर्जा के गुच्छे प्रवेश करने लगते हैं | इसलिए क्रोध के बाद आप थक जाते हैं, करुणा के बाद आप और सशक्त हो जाते हैं |

किरालियान फोटोग्राफी के हिसाब से मृत्यु में जो घटना घटती है, वही छोटे

अंश में क्रोध में घटती है |योग में श्वसन की शुद्धता पर ज्यादा जोर दिया जाता है क्योंकि प्राणमय कोष एक सूक्ष्म ऊर्जा से निर्मित है जो श्वास के साथ तुम्हारे शरीर के भीतर संचारित होती है। यदि तुम ठीक से श्वास लेते हो तो तुम्हारा प्राणमय, कोष स्वस्थ, समग्र और जीवंत रहता है। ऐसा व्यक्ति कभी थकान अनुभव नहीं करता, वह सदा कुछ भी करने को तत्पर रहता है उसके पास ऊर्जा का अतिरेक होता है।

13-ताई ची ,प्राणायाम आदि प्राणमय कोष पर कार्य करता है।ताई ''ची'' चीनी मार्शल आर्ट्स का एक हिस्सा है जिसका मतलब होता है सुप्रीम अल्टीमेट बॉक्सिंग।ताई ची शरीर की हरकत के साथ-साथ सांस पर नियंत्रण करके किया जाता है।प्राण/जीवन ऊर्जा जिसे चीनी भाषा में ''क्यूई (ची)'' के नाम से जाना जाता है ; शरीर व दिमाग में सामंजस्य बिठाने का काम करता है।इसकी कुछ खास मुद्राएं हैं, इसमें ध्यान केंद्रित करके लंबी सांस लेना और छोड़ना होता है।ची (Chi) को कॉस्मिक ब्रेथ (cosmic breath) यिन और यांग ऊर्जा के साथ जोड़कर देखते हैं।यिन है 'स्त्री ऊर्जा' और यांग है 'पुरुष ऊर्जा' और यिन और यांग का वर्तुल हैं।यिन को काला और यांग को सफेद दिखाया गया है।एक वर्तुल के अंदर ये दो ऊर्जाएं बल खाती हुई एक-दूसरे में मिलती हैं। दरअसल, ये दोनों एक-दूसरे की परिपूरक दिखाई गई हैं। यह वर्तुल जीवन के हर तल पर दिखाई देता है, क्योंकि जीवन दो ऊर्जाओं के मेल से बनता है, अकेली ऊर्जा कुछ नहीं कर सकती।

14-यदि तुम जानते हो कि प्राकृतिक रूप से श्वास कैसे ली जाए, तो तुम अपने दूसरे शरीर तक विकसित हो जाओगे। और दूसरा शरीर पहले शरीर से अधिक ताकतवर है और पहले

शरीर की तुलना में ज्यादा दिन जीवित रहता है।जब कोई मरता है तो लगभग तीन दिन तक तुम उसका बायो -प्लाज्मा देख सकते हो।कभी कभी इसे गलती से उसका भूत समझ लिया जाता है।भौतिक शरीर मर जाता है, लेकिन ऊर्जा शरीर सतत गतिशील रहता है।और जिन लोगों ने मृत्यु के बारे में गहरे प्रयोग किए हैं, वे कहते हैं कि जो व्यक्ति मर गया है उसे यह विश्वास करने में कि वह मर गया है, तीन दिन तक बहुत कठिनाई होती है, क्योंकि वही रूप, पहले से ज्यादा जीवंत,सुंदर होता है। यह इस पर निर्भर है कि तुम्हारे पास कितना बड़ा बायो -प्लाज्मा है, यह तेरह दिन या और ज्यादा भी अस्तित्व में रह सकता है।

15-भारत में जिन्होंने समाधि उपलब्ध कर ली है; उनके शरीर को छोड़ कर हम सभी के शरीर जला देते हैं। हम एक निश्चित कारण से उन योगियों का शरीर नहीं जलाते। जब शरीर को जला दिया जाता है तो बायो-प्लाज्मा पृथ्वी से दूर जाने लगता है। तुम इसे कुछ दिन अनुभव कर सकते हो, लेकिन फिर यह ब्रह्मांड में विलीन हो जाता है। लेकिन यदि भौतिक शरीर बचा हुआ हो तो बायो-प्लाज्मा इससे जुड़ा रह सकता है। और ऐसे व्यक्ति का जो समाधि को उपलब्ध कर चुका है, जो सबुद्ध हो चुका है, यदि उसका बायो-प्लाज्मा उसकी समाधि के आस-पास रह सके, तो इससे बहुत से व्यक्ति लाभान्वित होंगे। इसी भांति कई लोगों

ने अपने गुरु को देहत्याग के बाद साकार देखा है।यदि कोई व्यक्ति अपने प्राणमय कोष के साथ सच में ही लयबद्ध था, तो बायो-प्लाज्मा, प्राणमय कोष, यह सदियों तक बना रह सकता है।यह अपना निजी अस्तित्व बनाए रख सकता है।

16-हमें स्वाभाविक श्वसन क्रिया समझ लेनी चाहिए। छोटे बच्चे स्वाभाविक ढंग से श्वास लेते हैं। यही कारण है कि वे ऊर्जा से इतने भरपूर होते हैं।पेरेंट्स थक जाते है, परंतु वे नहीं थकते।हम

एक बच्चे से मुकाबला नहीं कर सकते।यह ऊर्जा प्राणमय कोष से आती है क्योकि बच्चा स्वाभाविक ढंग से श्वास लेता है, तो निसंदेह अधिक प्राण /ज्यादा ची भीतर लेता हैऔर यह उसके उदर में एकत्रित हो जाती है। उदर संचय का स्थान है...एक कुंड है। बच्चे का निरीक्षण करो तो जब एक बच्चा श्वास लेता है, उसका वक्ष पूर्णत: अप्रभावित रहता है।उसका उदर ऊपर और नीचे होता है। वह तो जैसे पेट से ही श्वास लेता है।सारे बच्चों का एक अलग सा पेट होता है; ऐसा पेट उनके श्वास लेने के ढंग और ऊर्जा के कुंड के कारण होता है।

17-श्वास लेने का उचित ढंग यही है।हमें अपना वक्ष बहुत ज्यादा उपयोग में नहीं लाना है। कभी कभार आपातकाल में यह इस्तेमाल किया जा सकता है।सामान्यत: तो छाती का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।आपात स्थिति में स्वाभाविक श्वास चलना कठिन है, क्योंकि यदि तुम स्वाभाविक श्वास लेते रहे तो तुममें इतनी स्थिरता और शांति रहेगी कि न तुम दौड़ सकोगे, न

लड़ सकोगे।तुम अपने को बचाने लायक भी न रहोगे।छाती का प्रयोग प्रकृति द्वारा दी गयी एक आपात विधि है।जब कोई वाइल्ड एनिमल तुम पर हमला करे तो तुम्हें स्वाभाविक श्वसन क्रिया छोड़नी पड़ेगी, और तुम्हें छाती से श्वास लेनी पड़ेगी। तब तुम्हारे पास दौड़ने, संघर्ष करने या ऊर्जा के उपयोग की एक्सट्रीम क्षमता हो जाती है।और आपातकालीन परिस्थितियों में केवल दो विकल्प होते हैं, भागो या लड़ो। दोनों के लिए बड़ी सतही लेकिन सघन ऊर्जा की जरूरत होती है।

18-यदि तुम लगातार छाती से ही श्वास लेते हो तो तुम सदा भयभीत रहोगे। क्योंकि छाती से श्वास लेना सिर्फ भयंकारी परिस्थितियों के लिए है। और अगर तुमने इसे आदत बना लिया है तो तुम लगातार, भयभीत, तनावग्रस्त, सदा भागने को आतुर रहोगे। कहीं शत्रु नहीं है, लेकिन तुम शत्रु के वहां होने की कल्पना कर लोगे। इसी से भ्रामकता उत्पन्न होती है।यह ऊर्जा ही

प्राण है। जो लोग भयभीत है, उनकी छाती तनावग्रस्त है और वे बहुत उथली श्वास लिया करते हैं। यदि उनकी श्वास को गहरा किया जा सके, कि वह उदर को, हारा केंद्र को छूने लगे, तब उनका भय तिरोहित हो जाता है।अगर तुम कई वर्षों से गलत ढंग से श्वास लेते आ रहे हो तो तुमने मांस पेशियों का एक ढंग विकसित कर लिया है, यह ढंग तुम्हें उचित ढंग से या गहरी श्वास नहीं लेने देगा और बीच में अवरोध बन जाएगा।

19- तुम कुछ सेकंड याद रख सकोगे कि गहरी श्वास लोगे;लेकिन पुन: तुम उथली छाती से श्वास लेना शुरू कर दोगे।इसीलिए मांस पेशियों के ढंग को बदलना पडेगा।एक बार यह ढंग

बदल जाए,तो भय मिट जाता है, तनाव खो जाता है।एक पत्थर में और एक प्राणी में यही एक फर्क है।पत्थर के पास एक ही शरीर है--अन्नमय कोष जबकि पौधे के भीतर- एक और शरीर है -प्राणमय कोष।इसीलिए पौधे के पास दो और पत्थर के पास सिर्फ एक शरीर है।पौधा सिर्फ पत्थर नहीं है; उसमें भीतर एक जीवन-धार बहती है।पौधा भी कभी प्रफुल्लित होता है, तो कभी उदास होता है।पत्थर जैसा है वैसा है,रात भी पत्थर है, सुबह भी वैसा है।पत्थर पर सूरज का कोई प्रभाव नहीं होता।सूरज से जो ऊर्जा मिलती है, वह प्राण-शरीर को मिलती है। इसलिए पौधा रात कुछ और होता है, सुबह कुछ और होता है।उसके भीतर एक जीवन-धारा, एक प्राण-शरीर है, जो सूरज के उगने के साथ आनंद से भर जाता है।

20-यह जो प्राणमय शरीर है, यह ऊर्जा-निर्मित/एनर्जी बॉडी है। यह शक्ति सूरज से,वायु से,अनंत सूक्ष्म तरंगों से मिलती है।एक व्यक्ति अगर प्राण के आहार की कला को सीख जाए, तो अन्न से मुक्त हो सकता है; कम कर सकता है।अगर सीधे ऊर्जा उपलब्ध होने लगे, और वह उस ऊर्जा को ही रूपांतरित करने की कला जान जाए... और वैसी कला है।

आइंस्टीन का फार्मूला है कि शक्ति/ एनर्जी और पदार्थ/मैटर दो चीजें नहीं, एक ही चीज हैं; और शक्ति और पदार्थ एक ही चीज की दो अवस्थाएं हैं।तो पदार्थ शक्ति बन सकता है, शक्ति पदार्थ बन सकती है। इसी सूत्र पर अणुबम का विकास हुआ।अणुबम का विस्फोट

केवल इस बात को सिद्द करता है कि हम पदार्थ को शक्ति बना रहे हैं।और इससे उलटा भी संभव है।जब एक आदमी बिना भोजन के जी लेता है, और शरीर को कोई जरूरत नहीं होती, तब उलटा घट रहा है; प्राण-शरीर का अणु पदार्थ बन रहा है।

क्या श्वास का रिदम होता है?-

09 FACTS;-

1-श्वास का जो रिदम है वह पूरे समय परिवर्तित होता रहता है। इसलिए जो लोग श्वास की रिदम को,लयबद्धता को ठीक से समझ लेते हैं, वे मन और शरीर के गहरे रहस्य को उपलब्ध हो जाते हैं।जब आप क्रोध में होते हैं तब तत्काल श्वास की लय बदल जाती है और जब आप शांत होते हैं तो तत्काल श्वास की लय बदल जाती है।अगर मन अशांत है तो भी श्वास की लय बदल जाती है, अगर शरीर बेचैन है तो भी श्वास की लय बदल जाती है।प्राणायाम में अथार्त प्राण के विज्ञान में श्वास की बहुत सी गतियां खोजी गईथीं। उन श्वास की गतियों के साथ शरीर और मन दोनों में परिवर्तन होता है। श्वास, प्राण-शरीर के सेतु है।एक तरफ भौतिक देह है तो दूसरे तरफ विचार की देह है।

2-यह जो ऊर्जा-शरीर है, यह हमारे भीतर की पर्त है; इसका हमें पता नहीं चलता। कभी-कभी किन्हीं क्षणों में इसका हमें अहसास होता है।लहर/तरंग /वेव जो है, वह ऊर्जा की घटना है।लहर आपके पदार्थ-शरीर में दौड़ ही नहीं सकती।पत्थर में कभी कोई लहर नहीं उठती है। कभी जब आप किसी के प्रेम में होते हैं, तो अचानक आपके भीतर तरंगें दौड़ जाती हैं। वे तरंगें आपके शरीर में नहीं दौड़ती--यद्यपि शरीर भी उनका अनुभव करता है।कभी किसी क्षण में कोई गीत सुन कर, वीणा का स्वर सुन कर, सागर की लहर के साथ, उगते सूरज को देख कर,और हवा के एक झोंके में, अचानक आपके भीतर तरंगें दौड़ जाती हैं। वह आपके अन्नमय कोष का हिस्सा नहीं है, वह तरंग आपकी प्राण-ऊर्जा का हिस्सा है।प्राण-ऊर्जा भीतर

है, वह शरीर की विद्युत है।उसे वैज्ञानिक बायो- एनर्जी /जीव-ऊर्जा कहते हैं।

3-अगर किसी के पास एक विकसित प्राण-शरीर है, तो आपके प्राण-शरीर में तत्काल तरंगें पैदा हो जाती हैं।एक प्राण-शरीर दूसरे प्राण-शरीर को स्पर्श कर लेता है।अन्नमय शरीर के लिए ही दूरी का सवाल है, प्राणमय शरीर के लिए दूरी का कोई संबंध नहीं है।और तब आपके

भीतर तरंगें दौड़ जाती हैं।इस प्राणमय शरीर का जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण हिस्सा है...वो है आंख । इसलिए आंख से ज्यादा जीवित शरीर में कुछ नहीं मालूम पड़ता है।वास्तव में आंख दोहरा तल है।आंख वह जगह है जहां से आपके अन्नमय शरीर से आपका प्राणमय शरीर बाहर झांकता है। इसलिए आंख इतनी जीवंत और तरंगित है। इसलिए आंख में लहरें तत्क्षण दौड़ जाती हैं। आपके हाथ में क्रोध आने में बहुत देर लगेगी--जब वह मुट्ठी बांधेगा, खून दौड़ेगा, और हमले के लिए दौड़ेगा;परन्तु आंख एक क्षण में क्रोधित हो जाती है।

4-आपके शरीर तक प्राण की, प्रेम की लहर दौड़ने में बहुत वक्त लग जाएगा,परन्तु आंख

तत्काल प्रेम में पड़ जाती है।आपकी आंख आपके प्राण-शरीर की भाषा है,बहुत तरंगित है। आपकी आंख को ठीक से जांचकर आपके प्राण-शरीर के संबंध में सब-कुछ कहा जा सकता

है।आंख पूरे वक्त खबर दे देती है कि भीतर क्या हो रहा है। इस दूसरे प्राण-शरीर की भी शुद्धि की, पारदर्शी बनाने की जरूरत है। प्राणायाम के सारे प्रयोग इस प्राण-शरीर को पारदर्शी बनाने के प्रयोग हैं। शरीर में जितनी ज्यादा मात्रा में प्राणवायु जाती है, ऑक्सीजन जाती है, उतना यह प्राण-शरीर स्वच्छ और शुद्ध होता है, जितनी ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड जाती है, उतना यह प्राण-शरीर अशुद्ध, दूषित और स्थूल हो जाता है।

5-इसलिए दिन में नींद आनी मुश्किल होती है, रात में नींद आनी आसान होती है, क्योंकि रात पृथ्वी पर ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है, और कार्बन डाइऑक्साइड की बढ़ जाती है। दिन में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ जाती है, कार्बन डाइऑक्साइड की कम हो जाती है। इसलिए ब्रह्ममुहूर्त में उठने का कारण केवल इतना ही था.. ब्रह्ममुहूर्त में उठ जाना सहज ही होना चाहिए; क्योंकि यदि सूर्योदय के साथ आपका प्राण-शरीर प्रभावित नहीं होता तो आपने स्वयं

को बहुत जड़ बना लिया है।यह प्राण-शरीर ऊर्जा है, इसलिए प्राणवायु से प्रभावित होता है। इसलिए जितनी गहरी श्वास ली जा सके उतनी हितकर है। इसे सहज हिस्सा बना लेना चाहिए। उथली श्वास मत लें।

6-जितनी गहरी श्वास होगी उतने आप प्राणवान होंगे; और उतनी ही आपकी मेधा प्रखर होगी।इसलिए कोई रेसलर अगर छाती बड़ी करना चाहता है तो फिर पेट तक श्वास नहीं ले जाता। इसलिए रेसलर अक्सर बुद्धिमान नहीं होते।बुद्धि के विकास के लिए प्राण-ऊर्जा का घना होना जरूरी है।बच्चा जैसी श्वास लेता है, वही सम्यक श्वास है। अभी वह वैसी ही श्वास लेता है, जैसी प्रकृति ने चाहा है कि श्वास ली जाए।यह ऊर्जा-शरीर है, जितनी ज्यादा प्राणवायु मिले,जितनी

गहरी मिले उतना ही ज्यादा शुद्ध होता है।और इस ऊर्जा-शरीर के सूक्ष्म भोजन भी हैं जैसे शुद्ध तरंगें।तरंगें बहुत तरह की हैं--शुद्ध भी और अशुद्ध भी।सत्संग का केवल इतना ही

उपयोग था कि आप एक योगी के पास जाकर बैठ जाते हैं, कोई बात भी नहीं करते हैं और उसके पास जो तरंगें हैं, वह आपके ऊर्जा-शरीर को उपलब्ध हो जाती हैं।

7-सत्संग का केवल इतना मतलब है कि हम उस जगह के पास जा रहे हैं, जहां एक जीवंत प्राण-शरीर है, जिसके चारों तरफ एक प्राण-शरीर का वायुमंडल है,और वहां दो क्षण बैठ

जाना भी आपके प्राण-शरीर को गति, तरंगें देता है।एक योगी सभ्यता से ,भीड़ से दूर पहाड़

पर जाता है... क्योंकि भीड़ थकाने वाली होती है।जो दूषित है तो अपनी दूषित तरंगें छोड़ रहा है, जो शुद्ध है तो अपनी शुद्ध तरंगें छोड़ रहा है।इसलिए जब आप भीड़ से लौटते हैं तो आपकी ऊर्जा एग्जॉस्ट होती है।और भीड़ आपकी बुद्धि को कम करती है,इसलिए दुनिया में जो बड़े पाप हैं ;वह व्यक्तियों ने नहीं ..भीड़ ने किए हैं।व्यक्तियों ने छोटे- छोटे पाप किए हैं।

सभ्यता से ,दूर जाने का उपयोग केवल इतना ही था कि प्राण-ऊर्जा शुद्धतम हो। इसीलिए राम चौदह वर्ष के वनवास पर चले जाते हैं, बुद्ध- महावीर जंगलों में भटक जाते हैं; क्राइस्ट के तीस साल का कोई पता ही नहीं चलता... सात साल की उम्र का उल्लेख है, फिर तीस साल का उल्लेख है ;बाकी के तेईस साल का कोई पता नहीं।वास्तव में,ये चौदह वर्ष ,तेईस साल प्राण-ऊर्जा को बढ़ाने के वर्ष थे।

8-जब भी क्रोध आए तो तुम श्वास को शांत करो, क्योंकि क्रोध को कोई सीधा शांत नहीं कर सकता।आप दबा सकते हैं , शांत नहीं कर सकते। और दबाया हुआ आज नहीं तो कल फिर निकलेगा–शायद और भी जहरीला होकर निकलेगा। तो श्वास को शांत करो, क्योंकि जैसे ही श्वास शांत हो जाए, क्रोध मन में उठता है लेकिन शरीर तक नहीं पहुंच पाता, क्योंकि श्वास के सेतु के बिना शरीर तक पहुंचना असंभव है। और जब तक शरीर तक न पहुंचे, तब तक दबाने की या प्रकट करने की भी कोई जरूरत नहीं है।अगर क्रोध मन तक ही रह जाए तो विलीन हो जाता है, शरीर तक पहुंचे तो फिर आपकी सामर्थ्य के बाहर हो जाता है।

9-मन से सीधे विलीन होने के उपाय हैं, लेकिन जब क्रोध स्थूल शरीर में पहुंचता है ;तो या तो उसे प्रकट करो या दबाओ। प्रकट करो तो भी समस्या होती है, दबाओं तो भी शरीर में

ग्रंथियां निर्मित हो जाती हैं।जब कोई मनुष्य अपने क्रोध को दबा लेता है तो क्रोध शरीर में गाठें

बन कर ठहर जाता है।तो क्रोध दबाने से शरीर में ग्रंथियां /कांप्लेक्सेस निर्मित हो जाते हैं।मनुष्य की नब्बे प्रतिशत बीमारियां उसके शरीरों में छिप गए दमित वेगों का परिणाम हैं।इसलिए चिकित्सक केवल बीमारियों का ट्रांसफर करता रहता है ;उन्हें ठीक नहीं कर पाता।थोड़ी राहत मिल जाती है; क्योकि एक बीमारी से छूटने,और दूसरी के प्रकट होने में थोड़ा

वक्त लगता है।जो ग्रंथियां/जहर भीतर इकट्ठा है,वो सूक्ष्म ग्रंथियां बन जाती है, उसका निकल जाना जरूरी है और श्वास ही सेतु है।CONTD...

....SHIVOHAM....