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क्या प्राणमय कोश भी आपकी अंतर्यात्रा में सहायक या बाधा बन सकते हैं?PART-02


प्राणमय कोश का क्या महत्व हैं?-

10 FACTS;-

1-स्थूल शरीर पदार्थ-निर्मित ,अन्न से निर्मित है;परन्तु प्राण-शरीर , ऊर्जा से, शक्ति से निर्मित है।इस शरीर के पीछे ही छिपा हुआ है प्राण-शरीर।दूसरे शरीर को महृषि पतंजलि ‘प्राणमय कोष’, ऊर्जा शरीर, विद्युत काया ,वाइटल बॉडी कहते हैं।प्राण-शरीर से अर्थ है ... एनर्जी बॉडी ,विद्युत से बनी। इसी शरीर पर एक्युपॅक्चर कार्य करता है।दूसरा शरीर पहले से अधिक सूक्ष्म है।और जो लोग पहले शरीर से दूसरे की ओर बढ़ने लगते हैं; वे अत्यधिक आकर्षक, चुंबकीय, सम्मोहक और ऊर्जा-पुंज बन जाते हैं। उनके पास स्फूर्ति और जीवंतता महसूस होती है।

2-यदि तुम ऐसे व्यक्ति के पास जाते हो जो सिर्फ अपने अन्न शरीर में जी रहा है, तो तुम रिक्तता अनुभव करोगे, वह तुम्हें सोख लेगा। अनेक बार तुम ऐसे लोगों के संपर्क में आते हो और यह महसूस करते हो कि वे तुम्हें सोखते हैं। जब वे हट जाते हैं तो तुम्हें खालीपन का, रिक्तता का अहसास होता है, जैसे कि किसी ने ऊर्जा को शोषित कर लिया हो। पहला शरीर शोषक है, और यह बहुत स्थूल भी है। यदि तुम अन्न/स्थूल शरीर उन्मुख लोगों के साथ बहुत अधिक रहते हो, तो तुम सदा बोझिलता, तनाव, ऊब, नींद और ऊर्जा विहीनता का अनुभव करोगे, सदा अपनी ऊर्जा के निचले पायदान पर रहोगे और उच्चतर विकास में लगाने के लिए तुम्हारे पास कोई ऊर्जा नहीं बचेगी।

3-इस प्रकार, पहले प्रकार का अन्नमय कोष उन्मुख व्यक्ति खाने के लिए जीता है ..वह खाता है ..और खाता है और खाए चला जाता है।और यही उसका संपूर्ण जीवन है।एक अर्थ में वह अज्ञानता में ही रहता है।प्रत्येक बच्चे को संसार में आकर पहला कार्य भोजन काया की सहायता करना ही होता है, और यदि कोई भोजन से ही आसक्त रहता है, तो वह बचकाना ही

बना रहता है। उसके विकास में बाधा आती है।यह दूसरा शरीर, प्राणमय कोष, तुम्हें नई स्वतंत्रता देता है, तुम्हें ज्यादा आकाश देता है। दूसरा शरीर पहले से बड़ा है, यह तुम्हारे भौतिक शरीर तक ही सीमित नहीं है।यह भौतिक शरीर के अंदर है और यही भौतिक शरीर के बाहर है। यह सूक्ष्म वायु की, ऊर्जा-मंडल की भांति तुम्हें घेरे हुए है।

4-अब तो वैज्ञानिको ने यह खोजा है कि इस ऊर्जा शरीर के चित्र लिए जा सकते हैं। इसे बायोप्लाज्मा कहते हैं, लेकिन इसका सही अर्थ है, प्राण। रक्त/ ब्लड के 3 कंपोनेंट होते हैं, पहला आरबीसी, दूसरा प्लेटलेट्स, तीसरा ब्लड प्लाजमा।तीनों कंपोनेंट की अलग अलग अहमियत होती है।किर्लियन फोटोग्राफी से संबंधित रिचर्स पैरासाइकोलॉजी के अंतर्गत की जाती हैं।हालांकि विज्ञानों के विशेषज्ञ इसे स्यूडो साइंस, यानी छद्‌म विज्ञान कहते हैं और इसके निष्कर्षों को मान्यता नहीं देते हैं।फिर भी बहुत-से अध्यात्मवादी, रहस्यवादी और मानव की सुपर नेचुरल शक्तियों में यकीन रखने वाले लोगों के लिए यह आकर्षण का विषय है।

5-यह ऐसी फोटोग्राफी है, जिसके लिए लेंस और कैमरे की जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन इससे आपके शरीर का ऑरा/ प्रभामंडल नजर आता है। माना जाता है कि हर चीज से विशेष ऊर्जा निकलती रहती है। इंसानों, जानवरों, पेड़-पौधों जैसे सजीवों से लेकर सिक्का, पेन जैसी निर्जीव चीजों से भी ये एनर्जी निकलती रहती है। इस एनर्जी को कैप्चर करना किर्लियन फोटोग्राफी कहलाता है।विशेषज्ञ मानते हैं कि यह ऑरा प्राणकोषों से निकलता है। शरीर में कोई भी रोग प्राण कोष से ही शुरू होता है।और शरीर में रोग के लक्षण नजर आने के बहुत पहले ही प्राण कोषों में उसकी शुरुआत हो चुकी होती है।

6-इसलिए विशेषज्ञों का दावा है कि किर्लियन फोटोग्राफ के एनालिसिस से रोगों के उभरने से पहले ही जाना जा सकता है और बचाव के उपाय किए जा सकते हैं।किरलियान विधि द्वारा लिए गए तुम्हारे फोटो बता देंगे कि तुम्हा