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क्या है पंच तत्व की तन्मात्रा साधना ?PART-01

क्या है पंच तत्वों का महत्त्वपूर्ण सूक्ष्म विज्ञान?-

08 FACTS;-

1-पंच तत्वों के द्वारा इस समस्त सृष्टि का निर्माण हुआ है। मनुष्य का शरीर भी पाँच तत्वों से ही बना हुआ है।पंचतत्व को ब्रह्मांड में व्याप्त लौकिक एवं अलौकिक वस्तुओं का प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष कारण और परिणति माना गया है। ब्रह्मांड में प्रकृति से उत्पन्न सभी वस्तुओं में पंचतत्व की अलग-अलग मात्रा मौजूद है। अपने उद्भव के बाद सभी वस्तुएँ नश्वरता को प्राप्त होकर इनमें ही विलीन हो जाती है।तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के किष्किंधाकांड में लिखा है ''क्षिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित यह अधम सरीरा।''।यह पाँच तत्व है..क्रमश:, क्षिति यानी कि पृथ्वी, जल यानी कि पानी, पावक यानी कि आग, गगन यानी आकाश और समीर यानी कि हवा।

2-योगविद्या में तत्व साधना का अपना महत्त्व एवं स्थान है। पृथ्वी आदि पाँच तत्वों से ही समस्त संसार बना हैं।विद्युत आदि जितनी भी शक्तियाँ इस विश्व में मौजूद हैं।वे सभी इन पञ्च तत्वों की ही अन्तर्हित क्षमता है।आकृति-प्रकृति की भिन्नता युक्त जितने भी पदार्थ इस संसार में

दृष्टिगोचर होते हैं वे सब इन्हीं तत्वों के योग-संयोग से बने हैं।न केवल शरीर की, वरन् मन की भी बनावट- तथा स्थिति में इन्हीं पंचतत्वों की भिन्न मात्रा का कारण है। शारीरिक, मानसिक दुर्बलता एवं रुग्णता में भी प्राय: इन तत्वों की ही न्यूनाधिकता पर्दे के पीछे काम करती रहती है।

3-हमारे मनीषियों ने इन पंच तत्त्वों को सदा याद रखने के लिए एक आसान तरीका निकाला और कहा कि यदि मनुष्य 'भगवान' को सदा याद रखे तो इन पांच तत्वों का ध्यान भी बना रहेगा। उन्होंने पंच तत्वों को किसी को भगवान के रूप में तो किसी को अलइलअह

अर्थात अल्लाह के रूप में याद रखने की शिक्षा दी।भगवान में आए इन अक्षरों का विश्लेषण इस प्रकार किया गया है- भगवान- भ- भूमि यानि पृथ्वी, ग- गगन यानि आकाश, व- वायु यानि हवा, अ- अग्नि अर्थात आग और न- नीर यानि जल।इसी प्रकार अलइलअइ (अल्लाह) अक्षरों का विश्लेषण इस प्रकार किया गया है- अ- आब यानि पानी, ल- लाब- यानि भूमि, इ- इला-दिव्य पदार्थ अर्थात वायु, अ- आसमान यानि गगन और ह- हरंक यानि अग्नि। इस पांच तत्वों के संचालन व समन्वय से हमारे शरीर में स्थित चेतना (प्राणशक्ति) बिजली-सी होती है। 4-इससे उत्पन्न विद्युत मस्तिक में प्रवाहित होकर मस्तिष्क के 2.4 से 3.3 अरब कोषों को सक्रिय और नियमित करती है। ये कोष अति सूक्ष्म रोम के सदृश्य एवं कंघे के दांतों की तरह पंक्ति में जमे हुए होते हैं। मस्तिष्क के कोष ...पांच प्रकाश के होते हैं और पंच महाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश) का प्रतिनिधित्व करते हैं। मूलरूप से ये सब मूल तत्व हमारे शरीर में बराबर मात्रा में रहने चाहिए।इन तत्वों का जब तक शरीर में उचित भाग रहता है तब तक स्वस्थता रहती है। जब कमी आने लगती है तो शरीर निर्बल, निस्तेज, आलसी, अशक्त तथा रोगी रहने लगता है। स्वास्थ्य को कायम रखने के लिए यह आवश्यक है कि तत्वों को उचित मात्रा में शरीर में रखने का हम निरंतर प्रयत्न करते रहें और जो कमी आवे उसे पूरा करते रहें। 5-पृथ्वी तत्व असीम सहनशीलता का द्योतक है और इससे मनुष्य धन-धान्य से परिपूर्ण होता है। इसके त्रुटिपूर्ण होने से लोग स्वार्थी हो जाते हैं। जल तत्व शीतलता प्रदान करता है। इसमें विकार आने से सौम्यता कम हो जाती है। अग्नि तत्व विचार शक्ति में सहायक बनता है और मस्तिष्क के भेद अंतर को परखने वाली शक्ति को सरल बनाता है। यदि इसमें त्रुटि आ जाए तो हमारी सोचने की शक्ति का ह्रास होने लगता है। वायु तत्व मानसिक शक्ति तथा स्मरण शक्ति की क्षमता को पोषण प्रदान करता है। अगर इसमें विकार आने लगे तो स्मरण शक्ति कम होने लगती है। आकाश तत्व आवश्यक संतुलन बनाए रखता है। इसमें विकार आने से हमारा शारीरिक संतुलन खोने लगता है।

6-पृथ्वी तत्व का केन्द्र मल द्वार और जननेन्द्रिय के बीच है इसे मूलाधार चक्र कहते हैं। जल तत्व का केन्द्र मूत्राशय की सीध में पेडू पर है इसे स्वाधिष्ठान चक्र कहते हैं। अग्नि तत्व का निवास नाभि और मेरुदण्ड के बीच में है इसे मणिपुर चक्र कहते हैं। वायु केन्द्र हृदय प्रदेश के अनाहत चक्र में है। आकाश तत्व का विशेष स्थान कण्ठ में है, इसे विशुद्ध चक्र कहा जाता है।

कब किस तत्व की प्रबलता है इसकी परख थोड़ा सा साधना अभ्यास होने पर सरलतापूर्वक की जा सकती है।

7-पृथ्वी तत्व का रंग पीला, जल का नीला/काला, अग्नि का लाल, वायु का हरा/ भूरा और आकाश का श्वेत /ग्रे है। आँखें बन्द करने पर दिखाई पड़े तब उसके अनुसार तत्व की प्रबलता आँकी जा सकती है। जिह्वा इन्द्रिय को सधा लेने पर मुँह में स्वाद बदलते रहने की प्रक्रिया को समझकर भी तत्वों की प्रबलता जानी जा सकती है। पृथ्वी तत्व का स्वाद मीठा, जल का कसैला, अग्नि का तीखा, वायु का खट्टा और आकाश का खारी होता है। गुण एवं स्वभाव की दृष्टि से यह वर्गीकरण किया जाय तो अग्नि और आकाश सतोगुण वायु और जल रजोगुण तथा पृथ्वी को तमोगुण कहा जा सकता है।

8-शरीर विश्लेषणकर्त्ताओं रासायनिक पदार्थों की न्यूनाधिकता अथवा अमुक जीवाणुओं की उपस्थिति- अनुपस्थिति को शारीरिक असन्तुलन का कारण मानते हैं, पर सूक्ष्मदर्शियों, की दृष्टि में तत्वों का-असन्तुलन ही इन समस्त संभ्रातियों का प्रधान कारण होता है। किस तत्व को शरीर में अथवा मन क्षेत्र में कमी है उसकी पूर्ति के लिए क्या किया जाय, इसका पता लगाने के लिए तत्व विज्ञानी किसी व्यक्ति में क्या रंग कम पड़ रहा है, क्या घट रहा है यह ध्यानस्थ होकर देखते हैं और औषधि उपचारकर्ताओं की तरह जो कमी पड़ी थी, जो विकृति बड़ी थी उसे उस तत्व प्रधान आहार- विहार में अथवा अपने में उस तत्व को उभार कर उसे अनुदान रूप रोगी या अभावग्रस्त को देते हैं। इस तत्व उपचार का लाभ सामान्य औषधि चिकित्सा की तुलना में कहीं अधिक होता है।

पंच तन्मात्राओं का पंच ज्ञानेन्द्रियों से क्या सम्बन्ध है? ;-

06 FACTS;-

1- पाँच तत्वों में से प्रत्येक की एक ‘तन्मात्रा’ है। अग्नि का रूप, जल का रस, वायु का स्पर्श, आकाश का शब्द और पृथ्वी की गन्ध है। अग्नि के बाद आकाश तत्व ही अधिक व्यापक और अधिक सशक्त है इसलिए उसकी तन्मात्रा ‘शब्द’ को साधना क्षेत्र में रूप के पश्चात् अधिकतर प्रयुक्त किया जाता है।पाँच इन्द्रियों के खूँटे से, पाँच तन्मात्राओं के रस्सों से जीव बँधा हुआ है। यह रस्से बड़े ही आकर्षक हैं ।परमात्मा ने पंच तत्वों में तन्मात्रायें उत्पन्न कर और उनके अनुभव के लिये शरीर में ज्ञानेन्द्रियाँ बनाकर, शरीर और संसार को आपस में घनिष्ठ आकर्षण के साथ सम्बद्ध कर दिया है। यदि पंचतत्व केवल स्कूल ही होते, उनमें तन्मात्रायें न होतीं तो इन्द्रियों को संसार के किसी पदार्थ में कुछ आनन्द न आता।कल्पना कीजिये कि हम संसार के किसी पदार्थ के रूप में को न देख सकें तो सर्वत्र मौन एवं नीरवता ही रहेगी। स्वाद न चख सकें तो खाने में कोई अन्तर न रहेगा। गंध का अनुभव न हो तो हानिकारक सड़ाँध और उपयोगी उपवन में क्या फर्क किया जा सकेगा। त्वचा की शक्ति न हो तो सर्दी, गर्मी, स्नान, वायु- सेवन, कोमल शैय्या के सेवन आदि से कोई प्रयोजन न रह जायेगा।

पाँचतत्व पाँच ज्ञानेन्द्रिय पाँचतन्मात्रा

1-1-आकाश कान' 'शब्द'

1-2-वायु त्वचा 'स्पर्श'

1-3-अग्नि नेत्र 'रूप'

1-4-जल जीभ 'रस'

1-5-पृथ्वी नासिका 'गन्ध'

2-आकाश की तन्मात्रा 'शब्द' है। वह कान द्वारा हमें अनुभव होता है। कान भी आकाश तत्व की प्रधानता वाली इन्द्रिय हैं।

3-वायु की तन्मात्रा 'स्पर्श' का ज्ञान त्वचा को होता है। त्वचा में फैले हुए ज्ञान तन्तु दूसरी वस्तुओं का ताप, भार, घनत्व एवं उसके स्पर्श की प्रतिक्रिया का अनुभव कराते हैं। 4-अग्नि तत्व की तन्मात्रा 'रूप' है। यह अग्नि- प्रधान इन्द्रिय नेत्र द्वारा अनुभव किया जाता है। रूप को आँखें ही देखती हैं।

5-जल तत्व की तन्मात्रा 'रस' है। रस का जल-प्रधान इन्द्रिय जिह्वा द्वारा अनुभव होता है, षटरसों का खट्टे, मीठे, खारी, तीखे, कड़ुवे, कसैले का स्वाद जीभ पहचानती है।

6-पृथ्वी तत्व की तन्मात्रा 'गन्ध' को पृथ्वी गुण प्रधान नासिका इन्द्रिय मालूम करती है।

क्या है तन्मात्रा साधना?-

10 FACTS;-

1-‘रूप’ तन्मात्रा से आकृति परक और ‘शब्द’ तन्मात्रा में ध्वनि परक अनुभूतियाँ होती हैं। उन आधारों में एकाग्रता की तथा सूक्ष्म जगत में प्रवेश करके अतीन्द्रिय विभूतियों की उपलब्धि होती है। ऐसा ही उपयोग अन्य तन्मात्राओं का भी हो सकता है।गन्ध तन्मात्रा के सहारे

ध्यान करने की विधि यह है कि कोई पुष्प, इत्र या तीव्र गन्ध का कोई अन्य पदार्थ लिया जाय, कुछ क्षण उसे सूँघ कर हटा दिया जाय कि उस वस्तु की गन्ध अभी भी आ रही है। इसे गन्ध त्राटक कह सकते हैं।

2-रस तन्मात्रा के सहारे ध्यान की विधि यह है कि जिह्वा पर कोई तीक्ष्ण स्वाद की वस्तु रखी जाय, उसे चखा जाए। पीछे उसे जीभ पर से हटा दिया जाय और बिना उस वस्तु के ही वह स्वाद जिह्वा को मिल सके, ऐसा भावनापरक ध्यान किया जाय। मिश्री की डली, काली मिर्च, नीबू, सेंधा नमक, नीम की पत्ती जैसे तीव्र स्वाद वाले पदार्थ इस प्रयोजन में अधिक उपयोगी होते हैं। मन्द स्वाद की वस्तुएँ तो विस्मृत हो जाती हैं, पर तीव्र स्वाद देर तक बने भी रहते हैं और स्मरण करने में सरल पड़ते हैं। वह ‘रस त्राटक’ कहा जायगा।

3-स्पर्शेन्द्रिय के माध्यम से किये जाने वाले ध्यान में सामान्य स्तर से अधिक ठण्डी या अधिक गर्म वस्तुओं का उपयोग किया जाता है।शरीर के किसी भाग से सहउष्णता का कोई धातु खण्ड स्पर्श कराया जाय और फिर हटा दिया जाय। तदुपरान्त उस वस्तु की तथा उसके स्पर्श की अनुभूति उस स्थान पर होती रहे, ऐसा प्रयास किया जाना चाहिए।बर्फ के स्पर्श से ठण्डक अनुभव हो सकती है। कोई मुलाकात या कठोर वस्तु भी त्वचा को प्रभावित कर सकती है। संसर्ग का अनुभव लेकर उस पदार्थ को हटा दिया जाय और कल्पना क्षेत्र में भी यह अनुभव होने दिया जाय कि वह पदार्थ अभी भी त्वचा का स्पर्श करके उसे पहले की ही तरह प्रभावित कर रहा है यह स्पर्श घातक हुआ।

4-स्पर्श, रस और गन्ध की चेतन सम्वेदनाएँ अब शिथिल पड़ गई हैं। यद्यपि अन्य प्राणियों में उन्हीं की प्रधानता है। गन्ध के सहारे से कीट और वन्य पशु अपने जीवन क्रम की अधिकाँश आवश्यकताएँ पूरी करते हैं, पर मनुष्यों द्वारा उसका उतना उपयोग न होने से निष्क्रिय होती चली गई है। रस और स्पर्श के सम्बन्ध में भी यही बात है। स्वादिष्ट वस्तुओं के स्वाद ले सकने की और स्पर्श के आधार पर मिलने वाली गुदगुदी का भी अब बहुत ही कम अनुभव होता है, पर यदि इन अनुभूति केन्द्रों को जागृत-जीवित किया जा सके तो इन माध्यमों से स्थूल और सूक्ष्म जगत की अनन्त विभूतियों का उच्चस्तरीय आनन्द ले सकते है। 5-नेत्रों के बाद दूसरी विशिष्ट संवेदनशील इन्द्रिय ‘कान’ है।ज्ञान सम्पादन नेत्रों के पश्चात कान से ही सम्भव होता है।कर्णेंद्रिय की सूक्ष्म परतें दिव्य-लोकों के सन्देशों को उसी प्रकार सुन सकती हैं जिस प्रकार नेत्र गोलकों के मध्य में स्थित उसके केन्द्रीय उद्गम स्रोत-आज्ञा चक्र के माध्यम से ‘दिव्य-दर्शन’ सम्भव होता है।स्वरयोग, नादयोग, शब्दयोग इसी तन्मात्रा के अन्तर्गत आते हैं। पाठ, स्तवन, जप, कथा, प्रवचन, कीर्तन जैसे साधना उपक्रम ‘शब्द’ साधना कहे जा सकते हैं। नादयोग इन सब में अधिक गूढ और अधिक रहस्यमय है। नाद योग के माध्यम से ‘दिव्य ध्वनियाँ’ सुनी जाती हैं और उस क्षमता के विकसित होने पर शरीर और मन की हलचलों का विवरण बताने वाले संकेत सुने जा सकते हैं।इतना ही नहीं दिव्य लोकों में जो अति महत्वपूर्ण शब्द संवादों का प्रवाह चल रहा है उसे सुनने की कला विदित हो जाने पर वह सब समझा जा सकता है जो सर्वसाधारण के लिए सर्वथा अविज्ञात है।

6-कूटनीतियों की-गुप्तचर की साँकेतिक भाषा होती है और वे एक दूसरे तक अपनी बाते इस प्रकार पहुँचाते हैं कि किसी को गोपनीयता का पता न चलने पाये। दिव्य लोकों के भी ऐसे ही संकेत हैं। वे शब्द तरंगों के आधार पर सूक्ष्म जगत में हमारे इर्द-गिर्द ही भ्रमण करते हैं, पर रहस्यों की जानकारी न होने से हम उससे सर्वथा अपरिचित ही बने रहते हैं। नादयोग के अभ्यास से उस रहस्य पर से पर्दा उठता है और साधक का उतना सुनना समझना संभव होता है जो सामान्य मनुष्यों के लिए शक्य नहीं है।

7-समान्यतया ‘ध्वनि’ का तात्पर्य उस मोटे शब्द प्रवाह से लिया जाता है जो कानों से सुना जा सके।कर्णातीत-अश्रव्य ध्वनियाँ- जानकारी देने की दृष्टि से भले ही महत्वहीन हों, पर उनका वैज्ञानिक महत्व अत्यधिक है। क्योंकि सामर्थ्य की दृष्टि से वे कानों से सुनी जा सकने वाली ध्वनियों की अपेक्षा कहीं अधिक शक्तिशाली होती है। उनका प्रयोग कितने ही ऐसे कामों में किया जा सकता है जो सामान्य उपायों से पूरे नहीं हो पाते। ब्रह्माण्डीय ऊर्जा को समझने में अब उसका प्रकाश स्वरूप अपर्याप्त समझा जाने लगा है और प्रकाश की आत्मा को ध्वनि संज्ञा दी गयी है।संसार की मूल-सत्ता कोअब ‘ध्वनि’ प्रवाह की संज्ञा दी जाने लगी है।

8-‘लेसर’ किरणें कुछ समय पूर्व तक प्रकाश किरणों में गिनी जाती थीं, पर अब उन्हें ‘शब्द’ वर्ग की स्वीकार किया गया है और ताप से भी अधिक शब्द की सामर्थ्य को आँका गया है।यह बात भली प्रकार समझ ली गई है कि मनुष्य के कान बहुत ही थोड़ी ध्वनियाँ सुन सकते हैं। उनसे अधिक तो कहीं कीड़े मकोड़ों और पशु-पक्षियों की श्रवण शक्ति अधिक तीव्र होती है। और वे अन्तरिक्ष में बहने वाली अधिक सूक्ष्म ध्वनियों को सुन सकते हैं।नादयोग इसी विज्ञान

का नाम है। उसके आधार पर श्रवणजीत ध्वनियों के अधिग्रहण का अभ्यास किया जाता है। सृष्टि के अन्तराल में असंख्य हलचलें ध्वनि के रूप में प्रवाहित हो रही हैं। ऊर्जा तरंगें ईथर से टकराती हुई आगे बढ़ती हैं और अपनी प्रतिक्रिया ध्वनि रूप में छोड़ती हैं। हवाई जहाज उड़ता है और अपनी गति दिशा तथा सत्ता का परिचय ध्वनि में बखेरता चलता है। ठीक इसी प्रकार प्रत्येक ऊर्जा कम्पन अपनी प्रतिक्रिया ध्वनि रूप में बखेरता है।

9-शरीर को शिथिल करके शांतचित्त से एकान्त स्थान में बैठक कर कानों के छेद तर्जनी अथवा अनामिका उँगलियों से बन्द कर लिये जाते हैं। इससे वायुमण्डल में सामान्य शब्दों का सुनाई देना बन्द हो जाता है। इस स्थिति में श्रवणातीत ध्वनियों में से कुछ का कुछ सुनाई

पड़ना आरम्भ हो जाता है।प्रायः कई प्रकार के बाजों से मिलती-जुलती ध्वनियाँ नादयोग के साधकों को सुनाई पड़ती हैं। शंख, घड़ियाल, मृदंग, नफीरी, तुरही, ढोल, मजीरा बजने जैसी मिश्रित अथवा पृथक-पृथक प्रकार की आवाजें कान में पहुँचने का आभास होता है। बादल गरजने, झरने गिरने, आंधी तूफान आदि जैसी तीव्र और कर्कश, घुंघरू बजने पैरों के थिरकने की नृत्य जैसे मन्द और मधुर ध्वनि प्रवाह भी सुने जाते हैं।इन शब्दों पर अधिक ध्यान देने से चित्त एकाग्र होता है।इसके अतिरिक्त नाड़ियों में बहने वाला रक्त प्रवाह फेफड़ों से साँस का आवागमन, हृदय की धड़कन, माँस पेशियों का आकुंचन-प्रकुंचन आदि से उत्पन्न होने वाले घर्षण से जो आवाजें अन्तरंग क्षेत्र में उत्पन्न होती रहती हैं वे भी साधकों को सुनाई पड़ती हैं।10- आकाश में बहने वाली हवा, पेड़-पत्तों तथा विभिन्न पदार्थों से टकरा कर तरह-तरह की आवाजें उत्पन्न करती है। तेज हवा चलने पर छेद वाली बाँसों के झुरमुट से वंशी या सीटी बजने जैसे ध्वनियाँ पड़ती हैं। नदियों की लहरें कल−कल ध्वनि उत्पन्न करती हैं। इन्हीं सब का दूरवर्ती मन्द प्रवाह नादयोग की साधना में अधिक स्पष्ट रूप से सुनाई पड़ने लगता है।मस्तिष्क अपने आप में अगणित हलचलों का केन्द्र है। उसमें वायु का आवागमन भी रहता है। हलचलें किसी भी स्तर की हों। वायुमण्डल के सम्पर्क से ध्वनि तरंगें उत्पन्न करती हैं। मस्तिष्क संस्थान भी अपनी गतिविधियों के कारण जो शब्द उत्पन्न करता है उन्हें नादयोग केउपक्रम से सुना

जाना सम्भव है।इसके ऊपर सूक्ष्म जगत में तथा लोकान्तरों में होने वाली हलचलों का नम्बर आता है। यदि कर्णेन्द्रिय की क्षमता विकसित कर ली जाय, तो उन्हें भी पकड़ा जा सकता है।

क्या हैं पंचकोश जागरण में महत्वपूर्ण पांच प्रमुख योग मुद्रा ?-

02 FACTS;-

1-योग स्थितियों के साक्षात्कार और प्राप्ति के लिये की गयी क्रिया अवस्था को मुद्रा कहते हैं ।मुख, नाक, आंख, कान और मस्तिष्क को पूर्णत: स्वस्थ्य तथा ताकतवर बनाने के लिए हठ योग में पांच प्रमुख मुद्राओं का वर्णण मिलता है। सामान्यजनों को निम्नलिखित मुद्राओं का अभ्यास किसी योग शिक्षक से सीखकर ही करना चाहिए। वैसे यह मुद्राएं सिर्फ साधकों के लिए हैं जो कुंडलिनी जागरण कर सिद्धि प्राप्त करना चाहते हैं।

2-ये पांच प्रमुख मुद्राएं हैं- 1.खेचरी (मुख के लिए), 2.भूचरी (नाक के लिए), 3.चांचरी (आंख के लिए), 4.अगोचरी (कान के लिए), 5.उन्मनी (मस्तिष्क के लिए)। खेचरी से स्वाद् अमृततुल्य होता है। भूचरी से प्राण-अपान वायु में एकता कायम होती है। चांचरी से आंखों की ज्योति बढ़ती है और ज्योतिदर्शन होते हैं। अगोचरी से आंतरिक नाद का अनुभव होता है और उन्मनी से परमात्मा के साथ ऐक्य बढ़ता है। उक्त सभी से पांचों इंद्रियों पर संयम कायम हो जाता है।

2-1.खेचरी : इसके लिए जीभ और तालु को जोड़ने वाले मांस-तंतु को धीरे-धीरे काटा जाता है, अर्थात एक दिन जौ भर काट कर छोड़ दिया जाता है। फिर तीन-चार दिन बाद थोड़ा-सा और काट दिया जाता है। इस प्रकार थोड़ा-थोड़ा काटने से उस स्थान की रक्त शिराएं अपना स्थान भीतर की तरफ बनाती जाती हैं। जीभ को काटने के साथ ही प्रतिदिन धीरे-धीरे बाहर की

तरफ खींचने का अभ्यास किया जाता है।इसका अभ्यास करने से कुछ महिनों में जीभ इतनी लम्बी हो जाती है कि यदि उसे ऊपर की तरफ उल्टा करें तो वह श्वास जाने वाले छेदों को भीतर से बन्द कर देती है। इससे समाधि के समय श्वास का आना-जाना पूर्णतः रोक दिया जाता है।

2-2.भूचरी : भूचरी मुद्रा कई प्रकार के शारीरिक मानसिक कलेशों का शमन करती है। कुम्भक के अभ्यास द्वारा अपान वायु उठाकर हृदय स्थान में लाकर प्राण के साथ मिलाने का अभ्यास करने से प्राणजय होता है, चित स्थिर होता है तथा सुषुम्ना मार्ग से प्राण संस्पर्श के ऊपर उठने की संभावना बनती है।

2-3.चांचरी : सर्वप्रथम दृष्टि को नाक से चार अंगुल आगे स्थिर करने का अभ्यास करना चाहिए। इसके बाद नासाग्र पर दृष्टि को स्थिर करें, फिर भूमध्य में दृष्टि स्थिर करने का अभ्यास करें। इससे मन एवं प्राण स्थिर होकर ज्योति का दर्शन होता है।

2-4.अगोचरी : शरीर के भीतर नाद में सभी इंद्रियों के साथ मन को पूर्णता के साथ ध्यान लगाकर कान से भीतर स्थित नाद को सुनने का अभ्यास करना चाहिए। इससे ज्ञान एवं स्मृति बढ़ती है तथा चित्त एवं इंद्रियां स्थिर होती हैं।

2-5.उन्मनी : सहस्त्रार (जो सर की चोटी वाला स्थान है) में पूर्ण एकाग्रता के साथ मन को लगाने का अभ्यास करने से आत्मा परमात्मा की ओर गमन करने लगती है और व्यक्ति ब्रह्मांड की चेतना से जुड़ने लगता है।

WARNING :-

कोई भी व्यक्ति इसे पढ़कर करने का प्रयास ना करें, क्योंकि यह सिर्फ साधकों के लिए है आम लोगों के लिए नहीं।

क्या हैं पंचकोश जागरण में महत्वपूर्ण मुद्राये ?-

मुद्राओं से ध्यान में तथा चित्त को एकाग्र करने में बहुत सहायता मिलती है। इनका प्रभाव शरीर की आंतरिक ग्रन्थियों पर पड़ता है। इन मुद्राओं के माध्यम से शरीर के अवयवों तथा उनकी क्रियाओं को प्रभावित, नियन्त्रित किया जा सकता है। विभिन्न प्रकार के साधना के उपचार क्रमों में इन्हें विशिष्ट आसन, बंध तथा प्राणायामों के साथ किया जाता है अनेक प्रयोजनों के लिए मुद्रायों का अलग-अलग महत्व है। उनमें कुछ ध्यान के लिए उपयुक्त हैं, कुछ आसनों की पूरक हैं, कुछ तान्त्रिक प्रयोगों एवं हठयोग के अंगों के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

पंचकोश जागरण जिन मुद्राओं को महत्वपूर्ण पाया गया है उनका विवरण निम्न हैं...

04 FACTS;- (1) खेचरी मुद्रा- जीभ को उलटी करके उसे उलटना और तालू के गड़्ढे में जिह्वा का अग्र भाग लगा देने को खेचरी मुद्रा कहते हैं। तालू के गट्टे भाग में एक पोला स्थान है जिसमें आगे चलकर माँस की एक सूँड सी लटकती है, उसे कपिल कुहर भी कहते हैं। यही स्थान जिह्वा के अग्रभाग को लगाने का होता है।यह क्रिया देश, काल, ज्ञान की वर्तमान स्थिति के अनुरूप नहीं है। जैसे अब प्राचीनकाल की भाँति हजारों वर्ष तक निराहार तप कोई नहीं कर सकता, वैसे ही खेचरी मुद्रा के लिए जिह्वा बढ़ाने के लिए कष्टसाध्य उपाय भी अब असामयिक हैं।

(2) षड्मुखीयोनि मुद्रा;-

इसे षड्मुखी भी कहते हैं। पद्मासन पर बैठकर दोनों हाथों के अँगूठों से दोनों कान, दोनों हाथ की तर्जानियों से दोनों आँखें, दोनों मध्यमाओं से दोनों कानों के छिद्र और दोनों अनामिकाओं से मुँह बन्द कर देना चाहिये। होठों को कौए की चोंच की तरह बाहर निकाल कर धीरे-धीरे साँस खींचते हुए उसे गुदा तक ले जाना चाहिये। फिर उल्टे क्रम से धीरे-धीरे निकाल देना चाहिये। योनि मुद्रा की यह साधना योग सिद्धि में बड़ी सहायक सिद्ध होती है।

(3) शाम्भवी मुद्रा;-

आसन लगाकर दोनों भौहों के बीच में दृष्टि को जमाकर भ्रकुटी में ध्यान करने को शाम्भवी मुद्रा कहते हैं। कहीं-कहीं अधखुले नेत्र और ऊपर चढ़ी हुई पुतलियों से जो शान्त चित्त ध्यान किया जाता है उसे भी शाम्भवी मुद्रा कहा है। भगवान शम्भू के द्वारा साधित होने के कारण इन साधनाओं का नाम शाम्भवी मुद्रा पड़ा है।

(4) अगोचरी मुद्रा;-

नासिका से चार उँगली आगे के शून्य स्थान पर दोनों नेत्रों की दृष्टि को एक बिन्दु पर केन्द्रित करना।

क्या है रंगों की सूक्ष्म शक्ति तथा तत्व साधना?-

12 FACTS;-

1-तत्व साधना उच्चस्तरीय साधना विज्ञान का एक महत्त्वपूर्ण विधान है। पंच तत्वों की यह साधना मनुष्य की शारीरिक और मानसिक कठिनाइयों के समाधान का एक नया मार्ग

खोलती है।रंगों की शोभा सर्वविदित है, पर उनकी सूक्ष्म शक्ति की जानकारी बिरलों को ही होती है।सामान्य रंग शक्ति भी अपना प्रभाव रखती है, फिर सूक्ष्म रूप से काम करने वाली तत्वों से सम्बन्धित रंग शक्ति का तो कहना ही क्या।

2-फिल्टरों से युक्त.. नियोनआर्क लेम्प- लेसर किरणों के उपकरण- एक्सरेज की विशिष्ट धाराएँ- क्वान्टा किरणें इनर्जेटिक्स- क्वान्टम इलेक्ट्रोनिक्स आदि का प्रस्तुतीकरण सूर्य किरणों की विशेष रंग धाराओं का विश्लेषण करके ही सम्भव हो सका है। अब यह विज्ञान दिन-दिन अधिक महत्त्वपूर्ण स्तर पर उभरता चला आ रहा है।

3-तत्वों के रंगों के सम्बन्ध में पाश्चात्य विज्ञानियों की मान्यता यह है कि आकाश तत्व का रंग नीला, अग्नि का लाल, जल का हरा, वायु का पीला और पृथ्वी का भूरा-मटमैला सफेद है। शरीर में जिस तत्व की कमी पड़ती है या बढ़ोत्तरी होती है उसका अनुमान अंगों के अथवा मलों के स्वाभाविक रंगों में परिवर्तन देखकर लगाया जा सकता है।

4-लाल रोशनी का उत्तेजनात्मक प्रभाव असंदिग्ध है। प्रातःकाल और सायंकाल जब सूर्योदय और सूर्यास्त की लालिमा आकाश में छाई रहती है तब पेड़-पौधा, जलचर और पक्षी आदि अधिक क्रियाशील और बढ़ते विकसित होते पाये जाते हैं। वनस्पतियों की वृद्धि किस समय किस क्रम से होती है इसका लेखा-जोखा रखने वालों का निष्कर्ष यही है कि प्रात: सायंकाल के थोड़े से समय में वे जितनी तीव्र गति से बढ़ते हैं उतने अन्य किसी समय नहीं। मछलियों की उछल-कूद इसी समय सबसे अधिक होती है। पक्षियों का चहचाहाना जितना दोनों संध्या काल में होता है उतना चौबीस घण्टों में अन्य किसी समय नहीं होता है।

5-इसी प्रकार पीला, हरा, बेंगनी, गुलाबी आदि अन्य रंगों का अपना-अपना प्रभाव होता है।

त्वचा तो नस्ल के हिसाब से काली, पीली, सफेद या लाल रहती है, पर उसके पीछे भी रंगों के उतार-चढ़ाव झाँकते रहते हैं। साधारण स्थिति में त्वचा का जो रंग था उसमें तत्वों के परिवर्तन के अनुपात से परिवर्तन आ जाता है। यह हेर-फेर हाथ-पैरों के नाखूनों में, जीभ में, आँख की पुतलियों में अधिक स्पष्टता के साथ देखा जा सकता है। इसलिए शरीर में होने वाले तत्वों की न्यूनाधिकता को इन्हें देखकर आसानी से समझा जा सकता है मल-मूत्र में भी यह अन्तर दिखाई पड़ता है। सन्तुलित स्थिति में पेशाब साधारण स्वच्छ जल की तरह होगा, पर यदि कोई बीमारी होगी तो उसका रंग बदलेगा।

6-डाक्टर मल-मूत्र रक्त आदि का रासायनिक विश्लेषण करके अथवा उनमें पाये जाने वाले विषाणुओं को देखकर रोग का निर्णय करता है तत्ववेत्ता अपने ढंग से जब तत्व चिकित्सा करते हैं तो यह पता लगाते हैं कि शरीर के आधार पंच तत्वों में से किसकी कितनी मात्रा घटी-बड़ी है। यह जानने के लिए उन्हें रंगों का शरीर में जो हेर-फेर हुआ है उसे देखना पड़ता है। तत्ववेत्ता मन: शास्त्रियों को अपनी दिव्यदृष्टि इतनी विकसित करनी पड़ती है कि मनुष्य के चेहरे के इर्द-गिर्द विद्यमान तेजोबलय की आभा को देख सकें और उसमें रंगों की दृष्टि से क्या परिवर्तन हुआ है इसे समझ सकें।

7-मानवीय विद्युत की ऊर्जा शरीर के हर अंग में रहती है और वह बाह्य जगत से सम्बन्ध मिलाने के लिए त्वचा के परतों में अधिक सक्रिय रहती है। शरीर का कोई भी अंग स्पर्श किया जाय उसमें तापमान की ही तरह विद्युत ऊर्जा का अनुभव किया जायेगा। यह ऊर्जा सामान्य बिजली की तरह उतना स्पष्ट झटका नहीं मारती या मशीनें चलाने के काम नहीं आती फिर भी अपने कार्यों को सामान्य बिजली की अपेक्षा अधिक अच्छी तरह सम्पन्न करती है।

मस्तिष्क स्पष्टत: एक जीता जागता बिजलीघर है।

8-समस्त काया में बिखरे पड़े अगणित तन्तुओं में संवेदना सम्बन्ध बनाये रहने, उन्हें काम करने की प्रेरणा देने में मस्तिष्क को भारी मात्रा में बिजली खर्च करनी पड़ती है। उसका उत्पादन भी खोपड़ी के भीतर ही होता है ! अधिक समीपता के कारण अधिक मात्रा में बिजली उपलब्ध हो सके, इसीलिए प्रकृति ने महत्त्वपूर्ण ज्ञानेन्द्रियाँ सिर के साथ जोड़कर रखी हैं। आँख, कान, नाक, जीभ जैसी महत्त्वपूर्ण ज्ञानेन्द्रियाँ गरदन से ऊपर ही हैं। इस शिरो भाग में सबसे अधिक विद्युत मात्रा रहती है इसलिए तत्त्वदर्शी आँखें हर मनुष्य के सिर के इर्द-गिर्द प्राय डेढ़ फुट के घेरे में एक तेजोवलय का प्रकाश ..'लाल गोल घेरा' चमकता देख सकती हैं।

9-देवताओं के चित्रों में उनके चेहरे के इर्द-गिर्द एक सूर्य जैसा प्रकाश गोलक बिखरा दिखाया जाता है। इस अलकांर चित्रण में तेजोबलय (Halo)की अधिक मात्रा का आभास मिलता है। अधिक तेजस्वी और मनस्वी व्यक्तियों में स्पष्टत: यह मात्रा अधिक होती है उसी के सहारे वे

दूसरों को प्रभावित करने में समर्थ होते हैं।तेजोबलय(Halo) में इन्द्र धनुष जैसे अलग-अलग रेखाओं वाले तो नहीं पर मिश्रित रंग घुले रहते हैं। उनका मिश्रण मन: क्षेत्र में काम करने वाले तत्वों की न्यूनाधिकता के हिसाब से ही होता है। तत्वों की सघनता के हिसाब से रंगों का आभास इस तेजोबलय (Halo)की परिधि में पाया जाता है।

10-पृथ्वी सबसे स्थूल और भारी है, इसके बाद क्रमश: जल, अग्नि, वायु और आकाश का नम्बर आता है। तेजोबलय की स्वाभाविक स्थिति में रंगों की आभा भी इसी क्रम से चलती

है।स्थूल शरीर- स्थूल पंच तत्वों से बना है। आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी यह पाँच तत्व सर्वाविदित हैं। काय-कलेवर में विद्यमान रक्त, माँस, अस्थि, त्वचा तथा विभिन्न अंग-प्रत्यंग इन्हीं के द्वारा बने हैं। सूक्ष्म शरीर में तन्मात्राओं के रूप में यह तत्व भी सूक्ष्म हो जाते हैं। आकाश की तन्मात्रा-शब्द, वायु, का स्पर्श अग्नि का रूप, जल का रस और पृथ्वी, की गन्ध है। सूक्ष्म शरीर की संरचना अग्नि, जल आदि से नहीं वरन् सूक्ष्म तन्मात्राओं से हुई है, फिर भी उन्हें तत्व तो कह ही सकते हैं।

11-सूक्ष्म शरीर की नाड़ियों में बहने वाले प्राण प्रवाह में ज्वार भाटे की तरह तत्व तन्मात्राओं उभार आते रहते हैं लहरों की तरह उनमें से एक आगे बढ़ता है तो दूसरा उसका स्थान ग्रहण कर लेता है। अन्त:क्षेत्र में कब कौन सा तत्व बढ़ा हुआ है यह पता साधना द्वारा मन: स्थिति लगा सकती है। हर तत्व की अपनी विशेषता है उसी के अनुरूप व्यक्तित्व में भी उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। प्रकृति और सामर्थ्य में हेर-फेर होता रहता है। सूक्ष्म शरीर में कब कौन सा तत्व बढ़ा हुआ है और किस तत्व की प्रबलता के समय क्या करना अधिक फलप्रद होता है ?

12-यदि इस रहस्य को जाना जा सके तो किसी महत्त्वपूर्ण कार्य का आरम्भ उपयुक्त समय पर किया जा सकता है और सफलता का पक्ष अधिक सरल एवं प्रशस्त बनाया जा सकता है।

व्यक्ति की त्वचा का रंग चेहरे पर उड़ता हुआ तेजोबलय(Halo), उसकी स्वाद सम्बन्धी अनुभूतियाँ रंग विशेष की पसन्दगी को कुछ परख कर यह जाना जा सकता है कि उसके

शरीर में किस तत्व की न्यूनता एवं किस की अधिकता है।जिस की न्यूनता हो उसे पूरा करने के लिए उस रंग के वस्त्रों का उपयोग, कमरे की पुताई, खिड़कियों के पर्दे, उसी रंग के काँच में कुछ समय पानी रखकर पीने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। आहार में अभीष्ट रंग के फल आदि का प्रयोग कराया जाता है। रंगीन बल्व की रोशनी पीड़ित भाग या समस्त अंग पर डाली जाती है ।

स्वर विज्ञान की प्राण-विधियाँ तथा छायोपासना ;-

05 FACTS;-

1-माण्डुक्योपनिषद, प्रश्नोपनिषद तथा शिव स्वरोदय मानते हैं कि पंचतत्वों का विकास मन से, मन का प्राण से और प्राण का समाधि ( पराचेतना) से हुआ है।साधक योगी तत्व का पता लगाकर अपने भविष्य का पता लगा लेते हैं। इससे वे अपनी मनोदशा और क्रियाकलापों को नियंत्रित कर जीवन को बेहतर बना सकते हैं।योगी आपके छोड़े हुए सांस (प्रश्वास) की लंबाई के देख कर तत्व की प्रधानता पता लगाने की बात कहते हैं। इस तत्व से आप अपने मनोकायिक (मन और तन) अवस्था का पता लगा सकते हैं। इसके पता लगाने से आप, योग द्वारा, अपने कार्य, मनोदशा आदि पर नियंत्रण रख सकते हैं। लेकिन ये यौगिक विधि,

ज्योतिष विद्या से भिन्न है। इसकी कई विधियाँ योगी बताते हैं, कुछ चरण इस प्रकार हैं...

2-शिव स्वरोदय ग्रंथ मानता है कि श्वास का ग्रहों, सूर्य और चंद्र की गतियों से संबंध होता है।भगवान शिव कहते हैं कि हे देवि, स्वरज्ञान से बड़ा क