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क्या है एक सौ बारह विधियो का महत्व और ब्रह्ममंत्र विधि?

07 FACTS;-

1 -तंत्र संस्‍कृत धातु ‘’तन’’ से बना है जिसका अर्थ है विस्‍तार करना।अंत: तंत्र ज्ञान के विस्‍तार की और इंगित करता है। मनुष्‍य के शरीर में जो चक्र है; उनकी खोज के लिए मानवीय अनुभव को तंत्र का अनुगृहीत होना पड़ेगा। तंत्र कहता है, प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति उस ऊर्जा का प्रकट रूप है।और हमारे आसपास जो वस्‍तुएं है वह उसी चेतना का परिणाम है जो भिन्‍न-भिन्‍न रूपों में अपने आपको प्रकट करती रहती है।मनुष्‍य जब भी किसी वस्‍तु के अंतर्निहित सार तत्‍व को

खोजता है तब वह ब्रह्मांड के जीवन व्‍यापी सत्‍य को ही खोज रहा होता है।चेतना के इस तल पर विश्‍व को जो रूप गोचर होता है उसे तंत्र शास्‍त्र में सूक्ष्‍म जगत कहते है।इस तरह

आंतरिक ध्यान से मनुष्‍य स्‍वयं के संबंध और विश्‍व के संबंध में अपनी दृष्‍टि को बदल सकता है।योग के द्वारा ही अवचेतन में प्रस्‍तुत तत्‍वों को विकसित किया जा सकता है।

2-तांत्रिक उपासना के अंग है... यंत्र और मंत्र ।सारे मंत्र सारे संस्‍कृत के अक्षरों से बने है।

प्रत्‍येक अक्षर मूलत: ध्‍वनि है, और प्रत्‍येक ध्‍वनि एक तरंग है।भौतिक विज्ञानं मानता है कि

आस्‍तित्‍व तरंगों से बना हुआ है। तंत्र कहता है, प्रत्‍येक वस्‍तु गहरे में ध्‍वनि तरंग है।इसलिए पूरी साकार सृष्‍टि ध्‍वनियों के विभिन्‍न मिश्रणों का परिणाम है।ध्‍वनि के इस सिद्धांत से ही मंत्र शास्‍त्र पैदा हुआ है।मंत्र की शक्‍ति उसके शब्‍दों के अर्थ में नहीं है। उसकी तरंगों की सघनता में है।ध्‍वनि सूक्ष्‍म तल पर प्रकाश बन जाती है। और उसके रंग भी होते है।जो सामान्‍य चक्षु को

नहीं दिखाई देते।तांत्रिक यंत्र ऊपर से देखने