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क्या है एक सौ बारह विधियो का महत्व और ब्रह्ममंत्र विधि?

07 FACTS;-

1 -तंत्र संस्‍कृत धातु ‘’तन’’ से बना है जिसका अर्थ है विस्‍तार करना।अंत: तंत्र ज्ञान के विस्‍तार की और इंगित करता है। मनुष्‍य के शरीर में जो चक्र है; उनकी खोज के लिए मानवीय अनुभव को तंत्र का अनुगृहीत होना पड़ेगा। तंत्र कहता है, प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति उस ऊर्जा का प्रकट रूप है।और हमारे आसपास जो वस्‍तुएं है वह उसी चेतना का परिणाम है जो भिन्‍न-भिन्‍न रूपों में अपने आपको प्रकट करती रहती है।मनुष्‍य जब भी किसी वस्‍तु के अंतर्निहित सार तत्‍व को

खोजता है तब वह ब्रह्मांड के जीवन व्‍यापी सत्‍य को ही खोज रहा होता है।चेतना के इस तल पर विश्‍व को जो रूप गोचर होता है उसे तंत्र शास्‍त्र में सूक्ष्‍म जगत कहते है।इस तरह

आंतरिक ध्यान से मनुष्‍य स्‍वयं के संबंध और विश्‍व के संबंध में अपनी दृष्‍टि को बदल सकता है।योग के द्वारा ही अवचेतन में प्रस्‍तुत तत्‍वों को विकसित किया जा सकता है।

2-तांत्रिक उपासना के अंग है... यंत्र और मंत्र ।सारे मंत्र सारे संस्‍कृत के अक्षरों से बने है।

प्रत्‍येक अक्षर मूलत: ध्‍वनि है, और प्रत्‍येक ध्‍वनि एक तरंग है।भौतिक विज्ञानं मानता है कि

आस्‍तित्‍व तरंगों से बना हुआ है। तंत्र कहता है, प्रत्‍येक वस्‍तु गहरे में ध्‍वनि तरंग है।इसलिए पूरी साकार सृष्‍टि ध्‍वनियों के विभिन्‍न मिश्रणों का परिणाम है।ध्‍वनि के इस सिद्धांत से ही मंत्र शास्‍त्र पैदा हुआ है।मंत्र की शक्‍ति उसके शब्‍दों के अर्थ में नहीं है। उसकी तरंगों की सघनता में है।ध्‍वनि सूक्ष्‍म तल पर प्रकाश बन जाती है। और उसके रंग भी होते है।जो सामान्‍य चक्षु को

नहीं दिखाई देते।तांत्रिक यंत्र ऊपर से देखने पर ज्‍यामिति की भिन्‍न-भिन्‍न आकृतियां दिखाई देती है। लेकिन यंत्र का रहस्‍य समझने के लिए ज्‍यामिति की रेखाओं के पार जाना पड़ेगा।यंत्र एक शक्‍ति का रेखांकन है। वह विशिष्‍ट वैश्विक शक्‍ति का एक प्रकटीकरण है।

3-तंत्र में विज्ञान, कला और धर्म का समन्‍वय है। उसके आधार दर्शन और भौतिकी में है। तंत्र मुक्‍ति का मार्ग प्रशस्‍त करता है।देखने की साधना है आँख, लेकिन तीन आयामों के अलावा आँख कुछ भी नहीं देख पाती है। और तीन आयामों/त्रिमिति को भी यह आंशिक रूप से देखती है।उसका एक हिस्‍सा हमेशा आँख से ओझल ही रहता है।यदि हम चार आयाम को देख सकें तो विश्‍व अलग ही नजर आयेगा। फिर पत्‍थर के सीने में थिरकते हुए अणुओं को हम देख सकेंगे, सुन सकेंगे। तंत्र संपूर्ण दृष्‍टि की और ले जाता है।तंत्र ने इस तरह का विचार और

विधि विकसित की है जिससे हम ब्रह्मांड को इस भांति देख सकते है मानो वह हमारे भीतर है और हम ब्रह्मांड के भीतर है।''साSहम’’ या ‘’सोSहम’’ एक ही है क्‍योंकि मुझमें और तुम में कोई फर्क नहीं है।हमारी कल्‍पना जिस आकार को निर्मित करती है वह हमारे निराकार तत्‍व को अभिव्‍यक्‍त करती है।तंत्र जीवन का अनुभव है और वैज्ञानिक प्रणाली भी, जिससे मनुष्‍य अपने भीतर निहित आध्‍यात्‍मिक शक्‍ति को प्रकट कर सके।

4-भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं कि तंत्र में सूर्य को भी निस्तेज करने की क्षमता होती है।परंतु इसका इस्तेमाल ईश्वर की प्राप्ति में किया जाना चाहिए अन्यथा विनाशकारी सिद्द होता है।सभी महान ऋषि ,मुनि और महान गुरुओं ने तंत्र साधना से कुंडलिनी जागृत करके ही ईश्वर की प्राप्ति की है। ईश्वर तक पहुंचने के लिए इसके अतिरिक्त दूसरा उपाय नहीं है। चाहे वह आदि शंकराचार्य हो,रामकृष्ण परमहंस हो, विवेकानंद हो या चाहे कोई अन्य संत।चूंकि लोगों ने ऐसे तांत्रिकों के बारे में सुन रखा है, जिन्होंने लोगों की जिंदगी बरबाद करने की कोशिश की या जिन्होंने लोगों को बीमार बनाया और मार डाला, इसलिए वे समझते हैं कि तंत्र-मंत्र हमेशा बुरा होता है। संभव है कि सामाजिक दृष्टि से आपने ऐसे ही लोगों को देखा हो। मगर तंत्र-मंत्र बहुत ऊंची श्रेणी का भी होता है।भगवान शिव एक तांत्रिक हैं।सारा तंत्र-मंत्र अच्छा है या बुरा, यह इस बात के भरोसे होता है कि इसका उपयोग कौन कर रहा है और किस मकसद से।

5-तंत्र विद्या योग का ही एक रूप है, लेकिन लोग सबसे पहले यही करना चाहते हैं। वे कुछ ऐसा देखना या करना चाहते हैं, जो दूसरे नहीं कर सकते।काफी साधना करने के बाद संत गोरखनाथ को परमानंद की अनुभूति हुई। ये परंपराएं साधना की तीव्रता पर जोर देती हैं।

वैष्णव पद्धति और तंत्र पद्धति में साधना विधि, पूजा का प्रकार, न्यास सभी कुछ लगभग एक जैसा ही होता हैं, बस अंतर होता हैं, तो दोनों के मंत्र विन्यास में, तांत्रोक्त मंत्र अधिक तीक्ष्ण होता हैं! जीवन की किसी भी विपरीत स्थिति में तंत्र अचूक और अनिवार्य विधा हैं। महानिर्वाण तंत्र में भगवान भोलेनाथ माता पार्वती से कहते हैं कि कलयुग में तंत्र ही एकमात्र मोक्ष प्राप्त का रास्ता होगा।अशुद्धता के कारण वैष्णव मंत्र विषहीन सर्प की भांति फलित नहीं होंगे।इसलिए आज के युग में तंत्र ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।

6-चाहे ज्योतिष हो या वास्तु ..दोनों ही 360-डिग्री के भचक्र पर आधारित है ।एक 180 डिग्री पर है वैष्णव पद्धति और दूसरी 180 डिग्री पर है ..तंत्र पद्धति।जिसने मिर्च नहीं खाई उसे मिठाई का स्वाद भी पता नहीं चलेगा। कड़वा खाने के बाद ही मीठा अच्छा लगता है। तो दोनों साइड्स की 180 डिग्री को जानना जरूरी है।अन्यथा ना तो तुम पूरे 360-डिग्री को जान पाओगे और ना ही सेंटर में आ पाओगे। सेंटर का अर्थ है मध्य में होना ;साम्यावस्था प्राप्त करना ।दोनों ही पद्धतियों को जानकर /समझ कर, हम साम्यावस्था प्राप्त कर सकते हैं।

दोनों ही पद्धतियां नाम जप सुमिरन ,ध्यान आदि पर विश्वास करती हैं।वैष्णव पद्धति

में ईश्वर को भावपूर्ण ढंग से नहलाना ,खिलाना,भोग लगानाआदि विधियां हैं।शैव पद्धति

में यही मानसिक ध्यान के द्वारा किया जाता है।दोनों ही पद्धतियों में हवन होते हैं।दोनों

ही पद्धतियों में ईश्वर से प्रेमाभक्ति की विधियां है।वैष्णव पद्धति में गोपी प्रेम है अथार्त गोपी बनकर प्रेम करने का ढंग है जैसे मीरा।

7-परंतु शैव पद्धति में भैरव- भैरवी साधना का इस्तेमाल भी किया गया ।केवल यहीं पर एक अंतर आता है और यही सबसे बड़ी समस्या का कारण है।मीरा की पद्धति में समाज को कोई परेशानी नहीं है।परंतु इस पद्धति (भैरवी साधना)से समाज में समस्याएं उत्पन्न होती है और यही कारण है कि राजा भोज ने एक लाख तांत्रिक जोड़ियों की हत्या करवा दी थी ;तो हमें इस पद्धति की समस्या को समझना पड़ेगा।

क्या समस्या है इस पद्धति में ?क्यों बड़े बड़े गुरु लोग भी इस पद्धति में फँस कर अपना जीवन बर्बाद कर देते हैं?-

05 FACTS;-

1-हमारे शास्त्रों (शिव पुराण) में दिया गया है कि देवी सती ने शिव को पाने के लिए नृत्य ,संगीत का सहारा लिया और उन्हें भैरव रूप में पा लिया।हमने इस बात को अच्छी तरह

समझ लिया और सब इसी का पालन करने लगे। परंतु हम यह भूल गए कि जब देवी पार्वती ने संगीत का , रुद्राक्ष का सहारा लिया तो शिव ने नेत्र भी नहीं खोला ।और जब उन्होंने भैरवी रूप धारण किया और कामदेव की सहायता ली ...तो परिणाम सभी को मालूम है।शिव का

तीसरा नेत्र खुल गया ;कामदेव को भस्म होना पड़ा और देवी पार्वती को हजारों साल तपस्या करनी पड़ी।शिव भी चाहते थे कि देवी पार्वती 'शिव तत्व' का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करें। तब कहीं जाकर देवी पार्वती, शिव तक पहुंच पाई।

2-हमने देवी पार्वती को नहीं समझा और देवी सती को फॉलो करने लगे और यही हमारे लिए सबसे बड़ी भूल बन गई।हम ना संगीत से और ना ही रुद्राक्ष आदि से शिव तक पहुंच सकते है।देवी सती को शिव का ज्ञान नहीं था।वह बहुत ही इनोसेंट थी।परंतु देवी पार्वती को शिवज्ञान था, इसलिए शिव उन्हें उस विधि से नहीं मिले। हमें देवी पार्वती की ज्ञानविधि को

समझना पड़ेगा। तांत्रिक जोड़ों ने भैरव- भैरवी साधना विधि के द्वारा शिव तक पहुंचने की कोशिश की।बहुत से गुरुओं ने भी यह कोशिश की। परिणाम यह हुआ कि वे अपमानित हुए ;जेल गए आदि-आदि।भैरव- भैरवी साधना विधि का सिर्फ इतना ही अर्थ है कि गृहस्थ जीवन

में भी हम पति-पत्नी कामवासना को प्रेम में ट्रांसफार्म कर दें और ईश्वर तक पहुंच जाएं। तंत्र साधना में शक्तियों के लालच में यह क्रिया की गई और शिव का तीसरा नेत्र खुला।

3-बड़े-बड़े ज्ञानी गुरुओं ने भी यह गलती की।तो हम यह समझ ले कि हम शिव को भैरव- भैरवी साधना विधि के द्वारा नहीं पा सकते और यदि हमने ऐसा करने का प्रयास किया तो शिव

का तीसरा नेत्र खुलेगा।इसमें कोई दो राय नहीं है।अब हमें यह जानना है कि शिव तक पहुंचने का रास्ता क्या है। वास्तव में 'एलिमेंट्स आर नेक्स्ट टू गॉड' और इसलिए हमें एलिमेंट को समझना पड़ेगा।सभी त्रिदोष- त्रिगुण (6) में हमें शिव को देखना पड़ेगा और साम्यावस्था बनानी पड़ेगी तो ही हम शिव तक पहुंच पाएंगे।हमें यह भी समझना पड़ेगा कि शिव तक पहुंचने के लिए कोई भी डायरेक्ट सीधा/ मार्ग नहीं है।देवी शक्ति ही हमें उन तक पहुंचा सकती है परंतु देवी शक्ति भी हमें तभी पहुंचाती है जब हमारा कारण पर्सनल ना होकर जनकल्याण का होता है।

4-वैष्णव पद्धति में षोडशोपचार पूजन होता है, लेकिन तंत्र में पंचोपचार पूजन होता है।फिर हम पांच तत्वों से त्रिगुण में ,द्वैत में और अंत में हम अद्वैत तक पहुंच जाते हैं।वैष्णव पद्धति हमें स्थूल का ज्ञान करा देती है और तंत्र हमें सूक्ष्म से सूक्ष्मतर अथार्त 16 से 5; 5 से 3; 3 से 2 और अंत में अद्वैत की ओर ले जाता हैं।यह विद्या उनके लिए है।जिनके दिमाग में 'संसार 'है।जब सारे संसार के 6 प्रकार के लोगों में शिव दिखने लगता है तो सभी पूरा संसार शिवमय हो जाता है।फिर हम या तो 'संसार के लिए' कुछ करना चाहते हैं या 'संसार में' कुछ करना चाहते हैं ।'संसार के लिए' या 'संसार में' यह दोनों ही शब्द बड़े महत्वपूर्ण है। 'में'और 'के' में जमीन आसमान का अंतर है।जब हम संसार 'में' कुछ करना चाहते हैं तो हम 'ग्रेट अलेक्जेंडर' जैसे बन जाते हैं।परंतु जब हम संसार 'के लिए' कुछ करना चाहते हैं तो हम गॉड बन जाते हैं।उदाहरण के लिए श्री राम,श्रीकृष्ण,गौतम बुद्ध आदि।तो कुंडलिनी साधना के बाद या तो आप संसार में कुछ करेंगे या संसार के लिए कुछ करेंगे और दोनों ही चीजें आवश्यक है।ईश्वर तो दोनों के लिए मार्ग प्रशस्त करता है क्योंकि आपके मन में 'संसार' तो है।

5-मानव शरीर में 114 चक्र हैं।इन एक सौ चौदह चक्रों में से दो भौतिक क्षेत्र के बाहर हैं। ज्यादातर इंसानों के लिए ये दोनों चक्र बहुत अस्पष्ट होते हैं,और तभी जाग्रत होते हैं जब आपके भीतर भौतिकता से परे कोई आयाम सक्रिय होता है।तब आपके सिर पर एक एंटीना बन जाता है जो आपको जीवन का एक खास नजरिया प्रदान करता है!हमारी ऊर्जा प्रणाली में

112 चक्र हैं। इनमें से कुछ चक्र शरीर में एक ही जगह होते हैं, जबकि कुछ अन्य चक्र गतिशील होते हैं।इन चक्र का हमारे विचारों, भावनाओं पर असर पड़ता है;हमें ये चक्र प्रभावित करते हैं।इन एक सौ बारह चक्रों का इस्तेमाल आपकी परम प्रकृति तक पहुंचने के

एक सौ बारह मार्गों के रूप में किया जा सकता है।इसी वजह से आदियोगी शिव ने परमतत्व की प्राप्ति के लिए विज्ञान भैरव तंत्र में एक सौ बारह विधियां/तरीके बताए हैं।

6-तंत्र प्रैक्टिकल है...इसमें सबसे पहले यह स्वीकार करना होता है कि मेरे अंदर अष्टधा प्रकृति के अष्ट विकार हैं-काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, मोह, आलस्य और भय।

महानिर्वाण तंत्र में भगवान् शिव कहते हैं कि ...

6-1-''कलयुग में आगम शास्त्र को छोड़कर जो व्यक्ति दूसरा मार्ग अपनाएगा ,उसका उद्धार नहीं होगा।जैसे पेड़ के तने की सिंचाई करने से उसकी डालियां,सभी पत्ते आदि संतुष्ट होते हैं।उसी प्रकार से इस परमब्रह्म की आराधना से सभी देवता आदि संतुष्ट होते हैं। परमब्रह्म की

उपासना में परिश्रम नहीं है, उपवास नहीं है ,शरीर संबंधी कोई कष्ट नहीं है।आचार आदि कोई नियम नहीं है।बहुत से उपचार की आवश्यकता नहीं है।दिशा, काल का विचार नहीं है। मुद्रा और न्यास अपेक्षित नहीं है।यह विश्व उसी से उत्पन्न है और उत्पन्न विश्व उसी में स्थित है।प्रलय काल में यह चराचर जगत उसी में लय हो जाता है।वह सर्वरूपमय है।

6-2-'''वह ब्रह्म उपासक सब धर्म ,अर्थ, काम, मोक्ष ...चार पुरुषार्थ को

पाकर इस लोक और परलोक में आनंद का भोग करता है।परमब्रह्म की

पूजा में ना आव्हान होता है और ना ही विसर्जन।सभी समय,सभी स्थान

में ब्रह्म की साधना हो सकती है।नहाकर या बिना नहाये , खाकर या बिना खाए, किसी भी अवस्था में, किसी समय शुद्ध मन /शुद्ध चित्त होकर परमात्मा की पूजा करें। इसमें समय-असमय ,पवित्र अपवित्र की व्यवस्था

नहीं है।जिस समय ,जिस स्थान में, जिसके द्वारा ब्रह्म अर्पित प्रसाद प्राप्त

हो;उसका भोजन बिना विचारे करना चाहिए।इस महामंत्र के साधन के बारे में मानसिक संकल्प का वर्णन किया जाता है।हे देवी; ब्रह्म साधक सभी के ब्रह्ममय होने की भावना करें''।

6-3-''गुरु बिना विचार किए शिष्य को अपना मंत्र से सकता है।पिता-पुत्र को, भाई -भाई को ,पति -पत्नी को ,मामा- भांजे को, और नाना- नानी, को दीक्षित कर सकता है।अपना मंत्र देने में जो दोष कहा गया है और पिता आदि से दीक्षा प्राप्ति में जो दोष हैं ;वे सभी दोष इस महासिद्ध मंत्र में लागू नहीं होते।इस महामंत्र के साधन के अतिरिक्त सुख और मोक्ष के लिए अन्य कोई उपाय नहीं है।ब्रह्म साधन में शास्त्रीय विधियां दासी स्वरूपा हो जाती हैं।ऐसे ब्रह्म साधन का परित्याग करके अन्य किसका सहारा लिया जा सकताहै? फिर जो ब्रह्म स्वरूप हो जाता है उन्हें अन्य बहुत से साधनों की क्याआवश्यकता है? शाक्त हो ,शैव हो ,गणपत हो, या वैष्णव का भी उपासक हो, ब्राह्मण हो या अन्य किसी धर्म, वर्ण, जाति का हो सभी ब्रह्म मंत्र के अधिकारी हैं।ब्रह्म मंत्र में स्थित होकर मनुष्य सब पापों से मुक्त होकर ब्रह्मसायुज्य प्राप्त करते हैं। ''

7-वह ब्रह्म मंत्र है ;ll ॐ सत्- चित् -एकमब्रह्म: ll यह परम ब्रह्म का मंत्र ही तंत्र का ,112 विधियों का आधार है।विज्ञानं भैरव तंत्र की यह 112 विधियां संपूर्ण मानवता के लिए हैं।यह किसी विशेष धर्म, जाति, आदि से संबंधित

नही है और पूर्ण वैज्ञानिक है।युगो से ये विधियां मानवता का मार्गदर्शन करती आ रही है ;चाहे वह श्रीकृष्ण हो ,या गौतम बुद्ध हो और आगे युगो में भी करती रहेंगी ।

8-ये विधियां साधकों, कुंडलिनी साधकों, मेडिटेटर्स और साधारण ग्रहस्थ

के लिए भी महत्वपूर्ण है।साधारण ग्रहस्थ के माध्यम से ही दिव्य आत्माये संसार में आती है इसलिए यह विधियां उनके लिए तो अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।आवश्यकता है कि हम इन 112 विधियों का आत्मदर्शन के लिए उपयोग करें।ये सभी विधियां वेदांत दर्शन पर आधारित है।परन्तु इन विधियों का प्रयोग अगर भैरव-भैरवी के रूप में किया जाएगा ...तो विनाशकारी होगा...शिव का तीसरा नेत्र खुल जायेगा।इस चेतावनी के साथ मैं परम ब्रह्म परमेश्वर से प्रार्थना करती हूं कि हम सब मनुष्यों को मार्गदर्शन दें हम सबका कल्याण करें,और हमारी अज्ञानता कानाश करें ...आपकी जय हो...आपकी जय हो...आपकी जय हो।...

ll ॐ सत्- चित् -एकमब्रह्म: llब्रह्ममंत्र उद्धार/कीलन तोड़ना ;-

03 FACTS;-

महानिर्वाण तंत्र में भगवान शिव कहते हैं..

1-''सर्वप्रथम परममंत्र के मंत्र का उद्धार बतलाता हूं। इसके प्रणव 'ओम'

का उच्चारण करके सच्चिद पद कहना चाहिए। इसके बाद 'एकम' पद ;तब 'ब्रह्म' पद कहने से मंत्र का उद्धार होता है। संधि क्रम से इन पदों को मिलाने से ''ॐ सत्- चित् -एकम ब्रह्म:''...यह सात अक्षरो का मंत्र बनता है।

हे देवी! जो साधक मंत्र का अर्थ और मंत्र चैतन्य नहीं जानता उसे 100 लाख मंत्र जप करने पर भी मंत्रसिद्धि नहीं होती। इसलिए मैं इस मंत्र का अर्थ और चैतन्य का वर्णन करता हूं। सुनो...

''अ ,ऊ, म'' इन तीन अक्षरो के सहयोग से पूर्ण मंत्र बनता है। अकार का अर्थ संसार का रक्षक होता है। ऊकार का अर्थ संहार करने वाला होता है। और मकार का अर्थ जगत की सृष्टि करने वाला होता है।'ओम 'का अर्थ यही कहा गया है।सत का अर्थ सदा विद्यमान रहने वाला है। चित 'का अर्थ चैतन्य है एवं एक शब्द का अर्थ अद्वैत है।''

2-''यह मंत्र सभी मंत्रों में श्रेष्ठ है। इससे चतुर वर्ग धर्म ,अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति होती है।इस मंत्र को ग्रहण करने के लिए तिथि, नक्षत्र राशि, कुलाकुल, दिन आदि चक्रों की गणना आवश्यक नहीं है।यह मंत्र सिद्ध है। अत इसके संबंध में किसी प्रकार की विचार की अपेक्षा नहीं है।

यह ब्रह्म मंत्र रूपी महामणि जिनके कान में पहुंचता है, वही धन्य है। सभी वस्तुएं उसके लिए सुलभ हो जाती हैं ।ग्रह, बेताल ,ग्रह चेटक, भूत ,पिशाच,

डाकिनी, और मातृका आदि रुष्ट होकर भी उसका क्या कर सकते हैं? ब्रह्म के उपासक को देखकर ही मुड़कर पीछे भाग जाते हैं।

वह ब्रह्म मंत्र से रक्षित रहता है ;ब्रह्म तेज से आच्छादित रहता है।

अतः ग्रह आदि से उसे क्या भय होगा?वह कभी भी भयभीत नहीं होता।

हे देवि परब्रह्म का उपासक सबका हितैषी साधु होता है।सबो का प्रिय

करने वाला होता है। ऐसे महात्मा का अनिष्ट करके कौन मनुष्य शांति से रह सकता है?''

3-''हे देवी !स्त्रोत मंत्र से प्रणव को हटाकर उसके स्थान पर ''ऐं'' वाग्बीज ''ह्रीं'' माया , ''श्रीं'' लक्ष्मी को प्रारंभ में लगाने से क्रमशः विविध विद्याएं, विविध मायाएं और विविध प्रकार के लक्ष्मी मंत्र बनते हैं। मंत्र देने की विधि है कि ''ऐं सच्चिद एकम ब्रह्म: मंत्र से विद्या प्रदान करें।''ह्रीं सच्चिद एकम ब्रह्म:'' मंत्र से माया प्रदान करें तथा ''श्री सच्चिद एकम ब्रह्म:'' मंत्र से लक्ष्मी प्रदान करें।

अनेक जन्मों के पुण्य से अगर सदगुरु मिल जाए तो उसी गुरु के मुख से मंत्र को प्राप्त करके ग्रहण कर लेना चाहिए। इस मंत्र को प्राप्त करते ही

तत्काल जन्म सफल हो जाता है।मंत्र का मानसिक जप करके ;जप का समर्पण ब्रह्म को करने के उपरांत ब्रह्म का मानस पूजन करें।मानस पूजन में ब्रह्म को महाभूतत्वों को अर्पण करें। पृथ्वी तत्व को गंध ,आकाश तत्व को पुष्प, हवा तत्व को धूप ,अग्नि तत्व को दीप और जल तत्व को नैवेद्य के रूप में परमात्मा को समर्पित करें। इसके बाद ब्रह्म स्त्रोत का पाठ करें''।

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ब्रह्मस्त्रोत;-

ब्रह्मस्त्रोत का पाठ करने से पहले मंत्र का विनियोग ,कर न्यास तथा अंगन्यासकरें।

1-मंत्र का विनियोग ;-- ॐ अस्य ब्रह्म मंत्रस्य सदाशिवाय ऋषये नमः शिरसि ॥(सिर में ), अनुष्टुप छंदये नमः मुखे (मुख में ) ॥

सर्वान्तयामी निर्गुण परब्रह्मण्ये देवताये नमःह्रदि (ह्रदय में )

मम सर्वाभीष्टसिध्यर्थे जपे विनयोग: //धर्म,अर्थे, काम,मोक्ष प्राप्तयर्थे विनियोग सर्वांगे |

NOTE;-

जब इन शब्द का उच्चारण करते हैं तब इनका अर्थ या भावभूमि होती हैं ।उदाहरण के लिए.... 1-ऋषि --इसका उच्चारण करते समय सिर के उपरी के भाग में इनकी अवस्था मानी

जाती हैं। 2-छंद ------- गर्दन में 3-देवता ----- ह्रदय में 4-कीलक ---- नाभि स्थान पर 5-बीजं ------ कामिन्द्रिय स्थान पर 6-शक्ति --- पैरों में (निचले हिस्से पर) 7-उत्कीलन--- हांथो में

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कर न्यास करने का सही तरीका;-

04 POINTS;- 1-करन्यास की प्रक्रिया को समझने से पहले हमें यह समझना होगा की हम भारतीय किस तरीके से नमस्कार करते हैं । इसमें हमारे दोनों हाँथ की हथेली आपस में जुडी रहती हैं।साथ -साथ दोनों हांथो की हर अंगुली ,ठीक अपने कमांक की दूसरे हाँथ की अंगुली से जुडी होती हैं। ठीक इसी तरह से यह न्यास की प्रक्रिया भी.... 2-यहाँ पर हमें जो प्रक्रिया करना हैं वह कम से धीरे धीरे एक पूर्ण नमस्कार तक जाना हैं। तात्पर्य ये हैं कि जव् आप पहली लाइन के मन्त्र का उच्चारण करेंगे तब केवल दोनों हांथो के अंगूठे को आपस में जोड़ देंगे और जब तर्जनीभ्याम वाली लाइन का उच्चारण होगा तब दोनों हांथो की तर्जनी अंगुली को आपस में जोड़ ले।

3-यहाँ पर ध्यान रखे कि अभी भी दोनों अंगूठे के अंतिम सिरे आपस में जुड़े ही रहेंगे , इसके बाद मध्यमाभ्यां वाली लाइन के दौरान हम दोनों हांथो की मध्यमा अंगुली को जोड़ दे। पर यहाँ भी पहले जुडी हुए अंगुली ..अभी भी जुडी ही रहेंगी. .. इसी तरह से आगे की लाइन के बारे में क्रमशः करते जाये ।और अंत में करतल कर वाली लाइन के समय एक हाँथ की हथेली की पृष्ठ भाग को दूसरे हाँथ से स्पर्श करे।और फिर दूसरे हाँथ के लिए भी यही प्रक्रिया करे।

4-कर न्यास;-

4-1-ॐ - अंगुष्ठाभ्यां नम:।---- दोनों अंगूठो के अंतिम सिरे को आपस में स्पर्श कराये ।

4-2- सत् - तर्जनीभ्यां नम:।---- दोनों तर्जनी अंगुली के अंतिम सिरे को आपस में मिलाये। (यहाँ पर अंगूठे मिले ही रहेंगे ),

4-3- चित् - मध्यामाभ्यां नम:।--- दोनों मध्यमा अंगुली के अंतिम सिरे को आपस में मिलाये ।(यहाँ पर अंगूठे, तर्जनी मिले ही रहेंगे ),

4-4- एकम - अनामिकाभ्यां नम:।----दोनों अनामिका अंगुली के अंतिम सिरे को आपस में मिलाये ।(यहाँ पर अंगूठे, तर्जनी, मध्यमा मिले हीरहेंगे ),

4-5- ब्रह्म: - कनिष्ठिकाभ्यां नम:।---दोनों कनिष्ठिका अंगुली के अंतिम सिरे को आपस में मिलाये ।(यहाँ पर अंगूठे, तर्जनी, मध्यमा, अनामिकामिले ही रहेंगे ),

4-6-ॐ सत्- चित् -एकमब्रह्म: -करतलकरपृष्ठाभ्यां फट् ।-- - दोनों हांथो की हथेली के पिछले भाग को दूसरी हथेली से स्पर्श करे।

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3-अंगन्यास करने का सही तरीका;-

अंग न्यास ... सीधे हाँथ के अंगूठे ओर अनामिका अंगुली को आपस में जोड़ ले। सम्बंधित मंत्र का उच्चारण करते जाये , शरीर के जिन-जिन भागों का नाम लिया जा रहा हैं उन्हें स्पर्श करते हुए यह भावना रखे की... वे भाग अधिक शक्तिशाली और पवित्र होते जा रहे हैं। .

3-1-ॐ - हृदयाय नम:।--बतलाई गयी उन्ही दो अंगुली से अपने ह्रदय स्थल को स्पर्श करे(नम:Successful completion of actions(sampannakaran)...)

3-2- सत्- शिरसे स्वाहा। -- अपने सिर को(स्वाहा ..Destruction of harmful energy)

3-3- चित् - शिखायै वषट्। -- अपनी शिखा को (जोकि सिर के उपरी पिछले भाग में स्थित होती हैं )(वषट्..Controlling someone else’s mind)

3-4 -एकम - कवचाय हुम्।--- अपने बाहों को (हुम्...Anger and courage, to frighten one’s enemy: This evokes the breakdown of negative feelings and spreads.)

3-5- ब्रह्म: - नेत्रत्रयाय वौषट्। --अपने आँखों को(वौषट् ..to acquire power and wealth....)

3-6-ॐ सत्- चित् -एकमब्रह्म: - अस्त्राय फट्। --- तीन बार ताली बजाये(फट्.. to drive the enemy away.) NOTE;-

हम तीन बार ताली क्यों बजाते है?वास्तव में , हम हमेशा से बहुत शक्तियों से घिरे रहते हैं और जो हमेशा से हमारे द्वारा किये जाने वाले मंत्र जप को हमसे छीनते जाते हैं , तो तीन बार सीधे हाँथ की हथेली को सिर के चारो ओर चक्कर लगाये / सिर के चारो तरफ वृत्ताकार में घुमाये ,इसके पहले यह देख ले की किस नासिका द्वारा हमारा स्वर चल रहा हैं , यदि सीधे हाँथ की ओर वाला स्वर चल रहा हैं तब ताली बजाते समय उलटे हाँथ को नीचे रख कर सीधे हाँथ से ताली बजाये . औरओर यदि नासिका स्वर उलटे हाथ (LEFT)की ओर का चल रहा हैं तो सीधे(RIGHT) हाँथ की हथेली को नीचे रख कर उलटे (Left) हाँथ से ताली उस पर बजाये ) इस तरीके से करने पर हमारा मन्त्र जप सुरक्षित रहा हैं ,सभी साधको को इस तथ्य पर ध्यान देना ही चाहिए...

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ब्रह्मस्त्रोत(पंचरत्न स्त्रोत तथा जगन्मंगल कवच);-

महानिर्वाण तंत्र में भगवान शिव कहते हैं..

हे देवी! परमात्मा ब्रह्म के स्त्रोत को सुनो.. जिसके श्रवण करने से साधक को ब्रह्मसायुज्य मुक्ति की प्राप्ति होती है। ''तुम सब लोगों के आश्रय स्वरूप हो; तुम सत्य हो; तुम्हें नमस्कार है। तुम चैतन्यमय विश्व के आत्मा स्वरूप हो ;तुम्हें नमस्कार है। तुम अद्वैत तत्व और मुक्ति को देने वाले हो, तुम्हें नमस्कार है। तुम सर्वव्यापी निर्गुण ब्रह्म हो, तुमको नमस्कार है। केवल एक तुम ही शरण देने वाले हो। तुम ही एक वरणीय हो। केवल एक तुम ही जगत के कारण हो, पालनकर्ता और संहारकर्ता हो।तुम निश्चय ,निर्विकल्प पुरुष हो।

तुम भय के भी भय हो ;भीषण के भी भीषण हो। तुम ही प्राणियों की गति हो।तुम पवित्र को भी पवित्र करने वाले हो। उत्तम स्थानों के प्रधान नियंता आप ही हो और रक्षकों के भी रक्षक हो। हे परेश !हे प्रभु! तुम सर्वरुप हो, परन्तु कोई भी तुमको नहीं देख सकता।अनिर्देशय हो ;इंद्रियों से अगम्य हो ;अचिंत्य हो ,अक्षय , व्यापक अव्यक्त तत्व हो और सत्त्य रूप हो।तुम जगत के भासको के स्वामी हो।तुम हमारी विपत्ति से रक्षा करो।मैं उस अद्वितीय ब्रह्म का स्मरण करता हूं ;उसी का नाम जपता हूं तथा जगत में एकमात्र साक्षीस्वरूप को नमस्कार करता हूं।सत्य स्वरूप निरालंब और संसार सागर का केवल एक ही कारण होने से मैं उसी की शरण में जाता हूं।

परमात्मा ब्रह्म का पंचरत्न नामक यह स्त्रोत जो भक्ति के सहित पाठ करेंगे;उनको ब्रह्मसायुज्य प्राप्त हो जाएगा।प्रदोष के समय यह स्त्रोत प्रतिदिन पाठ करना चाहिए।विशेष करके ज्ञानी पुरुष को उचित है कि

अपने ब्रह्मनिष्ठ बंधुओं को सोमवार के दिन यह श्रवण करा दें और भली

भांति से समझा दे।

हे देवी! मैंने तुमसे महेश्वर का पंचरत्न स्त्रोत कहा ,अब जगन्मंगल नामक कवच को कहता हूं।

तुम श्रवण करो! इसके श्रवण करने से और धारण

करने से निश्चय ही ब्रह्मज्ञ हो सकता है।कवच यह है.. परमात्मा मेरे सिर की रक्षा करें। परमेश्वर मेरे ह्रदय की रक्षा करें।सर्वदृष्टा विभु मेरे मुख की रक्षा करें।विश्वात्मा मेरे हाथों की रक्षा करें। जगतपाताकंठ की रक्षा करें।चिन्मय मेरे दोनो चरणों की रक्षा करें। सनातन परंब्रह्म मेरे सब शरीर की रक्षा करें।सदाशिव इस जगन्मंगलकवच के ऋषि हैं।छंद अनुष्टप ,परंब्रह्म देवता,चतुर्वर्ग प्राप्ति के लिए विनियोग कीर्तन करना होता है।

जो ऋषि न्यास को करके इस ब्रह्मकवच का पाठ करता है ;वह ब्रह्म ज्ञान पाकर ब्रह्ममय हो जाता है।यदि कोई भोजपत्र पर लिखकर इस कवच को सोने के ताबीज में रखकर ;गले में या दाहिने हाथ में धारण करता है तो उसके समस्त कार्य कार्य सिद्ध हो जाते हैं अथवा सब आठों सिद्धियां प्राप्त होती हैं। मैंने तुमसे यह परम ब्रह्म कवच प्रकाशित किया। इसको गुरु भक्त, प्रिय शिष्य को देना चाहिए।साधकों में अग्रगण इस स्त्रोत कवच को पढ़कर प्रणाम करें। ''तुम परमात्मा परम ब्रह्म हो, तुमको नमस्कार है; तुम गुणातीत और सत्य स्वरूप हो। ऐसे तुम को नमस्कार है।''

ॐ नमस्ते परमब्रह्म नमस्ते परमात्माने।

निर्गुणाय नमस्तुभ्यं सद्रूपाय नमो नमः।।

...SHIVOHAM....