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ग्रन्थियां क्या है ?क्या श्वास परिवर्तन से व्यक्तित्व में रूपांतरण हो जाता है?PART-01


ग्रन्थियां क्या है ? 20 FACTS;- 1-''ग्रन्थि'' मनोविज्ञान का बड़ा बहुमूल्य शब्द है।अंग्रेजी में समानांतर शब्द गढ़ा है,कांपलेक्स;उसका अर्थ भी ग्रंथि है।जो लोग मुक्त हो गए हैं, उनको निर्ग्रंथ कहा जाता है....जिनकी ग्रंथि छट गई, जिनके कांपलेक्स समाप्त हो गए।ग्रंथि का सीधा अर्थ होता है...गांठ।गांठ का मतलब होता है.... गहरी आदत। इतनी गहरी आदत कि तुम खोलो भी तो गांठ अपने से बंध जाती है। तुम इधर खोलकर छोड़ भी नहीं पाते..कि वापस बंध जाती है। जैसे कि कहावत है कि कुत्ते की पूंछ को कोई बारह वर्ष भी बांस की पोंगरी में रखे तो भी वह तिरछी की तिरछी ही रहेगी।उस पूंछ की आदत बड़ी गहन है। 2-क्या तुमने कभी इसका अपने जीवन में विचार किया कि तुम कितनी बार जाग गए हो, कितनी बार समझ गए हो कि क्रोध कहर है!परन्तु यह कुत्ते की पूंछ हो गई है। हजार बार समझ लेते हो, लेकिन जब फिर मौका आता है,फिर तिरछी की तिरछी; फिर क्रोध हो जाता है।इस ग्रंथि को खोलने से ही काम न चलेगा, क्योंकि तुम फिर -फिर बांध लेते हो। तुम भूल ही गए हो कि तुमने कहां -कहां अपने भीतर ग्रंथियां बांधी। दोष तुम दूसरे को देते हो; तुम कहते हो, इस आदमी ने कुछ ऐसी बात कही कि क्रोध आ गया। क्रोध किसी आदमी से नहीं आता, अपनी गांठ से आता है।वास्तव में, गाली गांठ से टकराए तो ही क्रोध आता है। अगर भीतर गांठ न हो, तो गाली आर -पार निकल जाती है;कहीं टकराती ही नहीं। 3-जिसे हम अभी जीवन कहते हैं, वह ग्रंथियों का जीवन है।उसमें सब गांठ से ही काम चल रहा है। तुम्हारे संबंध में करीब -करीब भविष्यवाणी भी की जा सकती है कि तुम कल क्या करोगे। क्योंकि तुमने जो आज किया है,वही तुम कल करोगे।तुम्हारी जीवन की व्यवस्था ही ऐसी है ..कोल्हू के बैल जैसी, गोल चक्कर में घूमती है। अब यह भी कोई बड़ी कठिनाई की बात है कि कोल्हू के बैल को कोई कह दे कि अब फिर तेरा कदम फलां जगह पड़ेगा? पड़ने ही वाला है, वहीं पड़ता रहा है। 4-ज्योतिषी तुम्हारे संबंध में सच हो जाता है,क्योंकि जानता है तुम कोल्‍हू के बैल हो। तुम जो अब तक करते रहे हो, वही तुम करते रहोगे;वही तुम दोहराए चले जाओगे। कुछ बातें ज्योतिषी तुमसे नियमित रूप से कह देता है,जिसमें कोई भूल -चूक नहीं होती। जैसे वह हर आदमी से कह देता है, रुपया हाथ में आता है लेकिन टिकता नहीं। किसके टिकता है? और जिनके टिक भी जाता है, वे भी मानते नहीं कि टिकता है। कृपण से कृपण आदमी भी यही मानता है कि उससे ज्यादा फिजूलखर्च और कोई भी नहीं।वह भी यही कहेगा कि ठीक कहा; रुपया हाथ में आता है,मगर टिकता नहीं। ज्योतिषी तुम्हारी लोभ की दशा को जान रहा है;क्योकि वह सार्वजनिक है। 5-ज्योतिषी किसी बुद्ध का हाथ देखेगा तो गलती में पड़ जाएगा।मगर यह कभी -कभी होता है।बुद्ध के हाथ सदा उपलब्ध नहीं हैं।जिनके हाथ उपलब्ध हैं, वे सोए हुए लोग हैं।वह तुमसे कहता है कि जिनको तुम अपना मानते हो, वही तुम्हें धोखा दे जाते हैं।उसने बात पते की कह दी...जंचती है।क्योकि जिनको तुम अपना मानते हो,वही धोखा दे जाता है।सभी आदमी के संबंध में यह सच है—और यह गांठ है।बात कुछ ऐसी है कि तुम किसी को अपना मानते हीं कहां हो।यह है पहली बात और जिनको तुम अपना मानते हो तुम खुद ही उनको धोखा दे रहे हो,तो वे तुम्हें कैसे न देंगे?तुम्हारी इच्छा यह है कि तुम तो उन्हें’ धोखा दो और वे तुम्हारे बने रहें, यह नहीं होता। तुम भी उन्हें धोखा दे रहे हो, वे भी तुम्हें धोखा दे रहे हैं। धोखे की ही सब दोस्ती है यहां। ज्योतिषी जिसको भी मिले, उससे ही कह देता है कि जिनको तुम अपना मानते हो, वे धोखा दे जाते हैं। 6-ज्योतिषी कहता है, तुम जिनके साथ नेकी करते हो, वे तुम्हारे साथ बदी करते है। यह बात सबको जंचती है। तुमको भी खयाल है कि तुमने बड़ी नेकिया की हैं।वास्तव में, की नहीं हैं, खयाल है; अहंकार की आदत है,गांठ है कि... मुझ जैसा नेक आदमी...!मैं तो वही उसूल मानता हूं :नेकी कर कुएं में डाल। करता जाता हूं और डालता जाता हूं कभी धन्यवाद की भी आकांक्षा नहीं रखी।हर आदमी को यही खयाल है कि मैं संसार का कितना कल्याण कर रहा हूं !और—लोग कैसे हैं कि इनको समझ में नहीं आ रहा। कोई पूजा के थाल नहीं सजाता, कोई आरती नहीं उतारता। मैं कल्याण किए जा रहा हूं और लोग बदी किए जा रहे हैं। उनसे पूछो तो वे भी यही सोच रहे हैं कि वे कल्याण कर रहे हैं और लोग उनके साथ बदी कर रहे हैं। 7-तुम्हारी गांठों का अर्थ होता है : यांत्रिक जीवन। होश हो तो तुम्हारे संबंध में भविष्यवाणी नहीं हो सकती।क्योंकि फिर तुम्हारा हर कल; हर पल ...नया होगा, आज की पुनरुक्ति नहीं..।नया होना तुम्हारा ढंग होगा। दूसरों की तो छोड़ दो, तुम भी अपने संबंध में भविष्यवाणी न कर सकोगे। तुम भी कंधे बिचकाकर रह जाओगे कि कल का तो कुछ पता नहीं।कल जब आएगा तभी देख सकेंगे।गांठ पीड़ा दे रही है; खोलनी ही पड़ेगी। लेकिन गांठ भी तभी खुलेगी,जब तुम जागकर जीवन की पीड़ा को अनुभव करोगे। 8- लोग कहते हैं,बड़ा दुख है।वे इस ढंग से कहते हैं, जैसे उन्हें कोई और दुख दे रहा है। मानते भी वे यही हैं कि सारा संसार उन्हें दुख दे रहा है। पति कहता है, पत्नी दुख दे रही है। पत्नी कहती है, पति दुख दे रहा है। बच्चे कहते हैं, माता-पिता मारे डाल रहे हैं।माता- पिता कहते हैं कि बच्चे गले की फांसी हो गए हैं। दूसरे दुख दे रहे हैं।इसका अर्थ हुआ कि तुमने अभी जीवन की परिपक्वता का कोई भी अनुभव नहीं पाया। जैसे ही तुम जरा सा भी अनुभव पाओगे, तुम पाओगे, मैं अपने को दुख दे रहा हूं। और अगर दूसरे भी मुझे दुख देते हैं तो इसीलिए दुख देते हैं कि मैं चाहता हूं कि वे मुझे दुख दें। मैं रास्ते निकालता हूं; मैं उपाय करता हूं; मैं पूरी व्यवस्था जमा देता हूं। अगर वे न दें तो भी मुसीबत।जो भी तुम करोगे, इससे बहुत फर्क न पड़ेगा, क्योंकि तुम वही हो।तुम जो भी करोगे,वह तुम्हारी गांठों से ही निकलेगा। वह रस तुम्हारी गांठों से ही रिस रहा है। वह मवाद तुम्हारी गांठों में भरी है। परिणाम वही होंगे। 9-लेकिन फिर भी तुम यह नहीं देखते कि कहीं दुख मैं ही तो पैदा नहीं कर रहा हूं! सभी तुम्हें दुख देने को तत्पर हैं ! आखिर सभी को ऐसी क्या पड़ी है। सभी इतने दीवाने क्यों हैं कि तुम्हें दुख दें? लेकिन अहंकार यह मानने को राजी नहीं होना चाहता कि मैं अपने दुख का कारण हो सकता हूं। जिस दिन तुम यह समझ जाओगे, उसी दिन से जिंदगी में क्रांति शुरू होती है। उस दिन से फिर हम दूसरों को बदलने नहीं जाते। तुम अपनी ग्रंथियों को बदलना शुरू करते हो। तुमने जो पत्नी चुनी है, तुमने चुनी है। तुम्हारे भीतर कोई गलती होगी। पत्नी ने पति को चुना है, उसने चुना है; उसके भीतर कोई गलती होगी। 10-दूसरे के दोष देखते-देखते तो तुमने कितने जन्म गुजारे; कहीं न पहुंचे। अब तो जागो और अपना दोष देखना शुरू करो। वहीं से परिवर्तन शुरू होता है।तुम फिर एक दूसरी ही दुनिया में रहने लगते हो, क्योंकि तुम दूसरे हो गए होते हो। तुम बदले कि दुनिया बदली।‘जिसकी सभी ग्रंथियां क्षीण हो गयीं, उसे कोई दुख नहीं होता।’भीतर से अहंकार हटाओ,तुम पाओगे, अब तुम्हारा कोई अपमान नहीं कर सकता—असंभव! सारी दुनिया भी मिलकर तुम्हें अपमानित करना चाहे तो नहीं कर सकती। 11-उदाहरण के लिए एक सूफी फकीर एक गांव में गया। लोगों ने उसका अपमान करने के लिए जूतों की माला बनाकर पहना दी। वह बड़ा प्रसन्न हुआ,उसने माला को बड़े आनंद से सम्हाल लिया। लोग बड़े हैरान हुए। क्योंकि वे आशा कर रहे थे कि वह नाराज होगा, गाली देगा, झगड़ा खड़ा करेगा। इच्छा ही यह थी कि झगड़ा खड़ा हो जाए। बड़े झुक-झुककर उसने नमस्कार किया; और जैसे कि फूलों की माला हो, गुलाब पहनाए हों। आखिर एक आदमी से न रहा गया। उसने पूछा, मामला क्या है? तुम्हें होश है?यह जूतों की माला है।

12-उसने कहा, माला है,यही क्या कम है? जूतों की फिक्र तुम करो, हम माला की फिक्र कर रहे हैं। और यह कोई मालियों की बस्ती तो है नहीं;फूल तुम लाओगे कहां से?मगर धन्यभाग कि तुम माला तो लाए! इसे सम्हालकर रखूंगा। फूलों की तो बहुत मालाएं देखीं, यह अनूठी है। तुमने अपने संबंध में सब कुछ कह दिया।तुम अगर भीतर अहंकार से भरे नहीं हो, तो तुम्हारा कोई अपमान नहीं किया जा सकता। जूतों की माला में भी माला दिखाई पड़ने लगेगी। अभी तो लोगो को फूलों की माला में भी फूल दिखाई नहीं पड़ते।अहंकार पर चढ़े फूल भी कांटे हो जाते हैं।फूल भी तब फूल नहीं रह जाता।केवल अपने भीतर अहंकार की ग्रंथि बदलने की बात है।

13-और एक बार झुक जाओ तो तुम्हारे भीतर का मंदिर, शून्य मंदिर तुम्हें मिल जाए। शून्य आकाश तुम्हारे भीतर भी है, वैसा ही जैसे बाहर है। और बाहर का आकाश और बाहर के तारे और बाहर का चांद और बाहर के सूरज उस भीतर के आकाश और भीतर के चांदत्तारों और सूरजों के सामने फीके हैं। बाहर तुमने जो देखा है वह प्रतिफलन है ...जैसे दर्पण में देखा हो। भीतर तुम जो देखोगे वह असली है। बाहर उसी की छाप है, छाया है। बाहर भीतर की छाया है। और जो भीतर को देख लेता है , उससे गीत फूटते हैं।इसलिए हमने कहा है कि वेद अपौरुषेय है।अपौरुषेय का अर्थ है जिन्होंने गाए उन्होंने नहीं गाए; उनके भीतर परमात्मा गुनगुनाया है। पुरुष की छाप /हस्ताक्षर नहीं है उन पर ; पर वह वाणी परमात्मा की है। क्योंकि जो गानेवाले थे वे तो इतने झुक गए थे कि मिट गए थे; थे ही नहीं।

14-वे बांस की पोंगरी हो गए थे। फिर जिन अदृश्य ओंठों से वे स्वर उठे बांस की पोंगरी से,जिसने उस बांस की पोंगरी को बांसुरी बना दिया, वे परमात्मा के हैं।एक तो गीत है, जिसे तुम गाते हो। तुम्हारा गीत तुमसे बड़ा नहीं होता, तुम्हारा गीत तुमसे छोटा होता है; बहुत छोटा होता है। और तुम्हारा गीत अक्सर झूठ होता है। तुम ही झूठ हो। तुम्हारे भीतर आंसू भरे रहते हैं और बाहर तुम गीत गाते रहते हो। तुम्हारे भीतर रोना चलता रहता है और ओंठों पर मुस्कुराहट चलती रहती है।मजबूरी है; जीवन से ऐसा समझौता करना पड़ता है।

15-अगर रोते हुए रास्तों से गुजरोगे, नाहक ही दया के पात्र हो जाओगे। तो सज -संवर कर अपने, रोने को भीतर छिपाकर, मुंह पर झूठी मुस्कुराहटें फैलाकर निकल पड़ते हो।जिनके जीवन में प्रेम बिल्कुल नहीं है वे प्रेम का गीत गाकर अपने को समझा लेते हैं, सांत्वना कर लेते हैं। जिनके जीवन में संगीत बिल्कुल नहीं है, वे बाहर की वीणाओं के तार छेड़ -छेड़कर सोचते हैं कि संगीत मिल गया।मनुष्य तो जो भी करेगा, मनुष्य से छोटा होगा। और चूंकि मनुष्य झूठ हो गया है, मनुष्य के होने का ढंग ही झूठ है, पाखंड है। बाहर कुछ, भीतर कुछ।

16-और बचपन से ही यह कथा शुरू हो जाती है। हम बच्चों को भी समझाने लगते हैं कि बाहर से कुछ, भीतर से कुछ। हम बच्चों से कहते हैं, घर में मेहमान आते हैं, अभी शोरगुल मत करना। अब अगर उनके भीतर शोरगुल हो रहा हो तो अब झूठ होना शुरू हुआ। मेहमान हैं ...तो वे दबाकर बैठे रहेंगे। ऊपर से कुछ दिखाते रहेंगे, भीतर कुछ।द्वंद्व शुरू हुआ ;पाखंड

शुरू हुआ।हम लोगों से कहते हैं, ईमानदारी से परमात्मा पर विश्वास करो।अब यह झूठ की बात है। अगर ईमानदारी शब्द का प्रयोग करते हो तो विश्वास नहीं किया जा सकता। क्योंकि जिसका पता नहीं उस पर कैसे विश्वास करें?

17-इस्लाम तो ईमान शब्द का अर्थ ही धर्म करता है।"ईमानदारी से विश्वास करो, ईमान लाओ'।अब झूठ की बात हो रही है। परमात्मा का पता नहीं है, और ईमान ले आए तो यह बेईमानी हो गई।जब परमात्मा का पता होगा तब ईमान आएगा और वह ईमानदारी होगी। जब अनुभव होगा तब भरोसा होगा। उस भरोसे का नाम श्रद्धा है।तो जिसे हम श्रद्धा कहते हैं,

वह तो झूठी है; मूल से ही झूठ है। और जहां मूल में झूठ हो जाए वहां सारे पत्ते झूठ न हो जाएं तो और क्या हो? हमारी जड़ें झूठ पर खड़ी हैं।हम लोगों को कुछ सिखा रहे हैं जिससे वे अपने आसपास एक तरह का रूप बना रखते हैं, एक मुखौटा।फिर हमें भीतर की पहचान ही नहीं हो पाती ।

18-हम बाहर ही बाहर जीने लगते हैं। फिर हम रोते भी हैं तो छिछला। आंसू शायद आंख से ही आते हैं, हृदय से नहीं आते। हंसते हैं तो भी छिछला। ओंठ पर ही फैली होती है हंसी ...। एक ऐसा भी गीत है जो आदमी नहीं गाता, आदमी से गाया जाता है; उसी गीत का नाम धर्म है।एक ऐसा भी नृत्य है जो आदमी नहीं नाचता, आदमी के द्वारा नाचा जाता है; उसी नृत्य को अपौरुषेय कहते है।जैसे वेद के वचन अपौरुषेय है, मीरा का नृत्य भी अपौरुषेय है।अपौरुषेय का अर्थ इतना ही होता है कि अब अहंकार नहीं है, अब मैं नहीं हूं। अब गाए तो वही गाए, नाचे तो वही नाचे। बैठे तो वही बैठे, उठे तो वही उठे। सब उसका है। मैं सब तरफ से झुक गया हूं, उसका हो गया हूं।

19-यह एक नशा है, जो फिर कभी उतरता नहीं;जो अंगूरों का नहीं है, आत्मा का है। एक नशा, जो बाहर से भीतर नहीं ले जाना पड़ता, भीतर से बाहर की तरफ आता है।बाहर से शराब मत पियो। लेकिन यह एक ऐसी शराब है जो भीतर से बाहर की तरफ बहती है; उसे जरूर पियो। उसके संबंध में तो शराबी हो ही जाना चाहिए। सच तो यह है कि बाहर की शराब भी आदमी इसीलिए पीता है कि उसे भीतर की शराब की तलाश है। हम सब मस्त होकर जीना चाहते हैं। यह हमारी अंतरतम अभीप्सा है कि हम मस्त होकर जिएं। कि हमारे जीवन में मस्ती का स्वर हो, नाद हो। मस्ती दो ही तरह मिल सकती है : या तो बाहर के नशे जो थोड़ी देर के लिए मस्त कर देंगे और फिर कल सुबह सिरदर्द भी छोड़ जाएंगे, शरीर को भी तोड़ जाएंगे, रुग्ण भी कर जाएंगे। बड़ी कीमत! और मस्ती भी कुछ बहुत गहरी मस्ती नहीं, सिर्फ बेहोशी है; मस्ती नहीं है, मस्ती का धोखा है।

20-एक भीतर की मस्ती है, जिसमें बेहोशी नहीं होती, होश होता है। जब भीतर की शराब तुम्हारे जीवन में बहनी शुरू हो जाती है तो तुम मस्त होते हो। और जैसे -जैसे मस्ती बढ़ती है, वैसे -वैसे होश बढ़ता है। अगर बेहोशी बढ़े तो कहीं कुछ भूल हो गई। होश बढ़ना चाहिए। क्योंकि बुद्धत्व तो होश से ही उपलब्ध होगा। मस्ती भी बढ़ेगी, नृत्य भी बढ़ेगा, गीत भी उठेंगे, शांति भी बढ़ेगी, जागरूकता भी बढ़ेगी, प्रेम भी बढ़ेगा, ध्यान भी बढ़ेगा।प्रेम और ध्यान जब साथ -साथ बढ़ते हैं, अर्थात मस्ती और होश साथ -साथ बढ़ते हैं, तब समझना कि ठीक दिशा में चल पड़े हो। तब तुम्हारा दिशा सूचक यंत्र ठीक तरफ इशारा कर रहा है। अब आगे बढ़े चलो ;यही द्वार है।

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क्या श्वास परिवर्तन से व्यक्तित्व में रूपांतरण हो जाता है?-

04 FACTS;-

1- वास्तव में , ऐसा कोई असत्य नहीं होता जिसमें कि कुछ सत्य न हो; वह जो उसमें सत्य होता है वही प्रभाव लाता है; और उसके साथ वह जो असत्य है वह भी सरक जाता है, हमें

कभी पता नहीं चलता कि क्या हो गया। जहां तक बने, साधारणत: जीवन का जो सहज क्रम है, उसमें बाधा नहीं डालनी चाहिए। उपद्रव होने का डर है। तो जो व्यवस्था चल रही है सहज ...आपकी श्वास की, उठने की, बैठने की, चलने की-जहा तक बने उसमें बाधा नहीं डालना उचित है। क्योंकि बाधा डालने से ही परिवर्तन शुरू होंगे।

2-यह ध्यान रहे कि हानि और लाभ ; दोनों ही परिवर्तन हैं। तो आप जैसे हैं, अगर ऐसे ही रहना है, तब तो कुछ भी छेड़छाड़ करनी उचित नहीं है; लेकिन अगर कोई भी परिवर्तन करना है, कोई भी ट्रांसफामेंशन, तो हानि का खतरा लेना पड़ेगा। वह जो.. .हानि का खतरा तो है ही, कि आपकी जो श्वास चल रही है अभी, अगर इसको और व्यवस्था दी जाए तो आपके पूरे व्यक्तित्व में अंतर पड़ेंगे। लेकिन अगर आप अपने व्यक्तित्व से राजी हैं, और सोचते हैं कि जैसा है ठीक है, तब तो उचित है। लेकिन अगर आप सोचते हैं कि यह व्यक्तित्व पर्याप्त नहीं मालूम होता, तो अंतर करने पड़ेंगे।

3-और तब श्वास पर अंतर सबसे कीमती बात है। और जैसे ही आप श्वास पर अंतर करेंगे वैसे ही आपके भीतर बहुत सी चीजें टूटनी और बहुत सी नई चीजें बननी शुरू हो जाएंगी।अब हजारों प्रयोग के बाद यह तय किया गया है कि श्वास के किस प्रयोग से कौन सी चीजें बनेंगी, और कौन सी टूटेंगी। और अब करीब-करीब सुनिश्चित बात हो गई है।उदाहरण के लिए जब

आप क्रोध में होते हैं तो श्वास बदल जाती है; वह वैसी नहीं रहती जैसी थी। अगर कभी बहुत ही साइलेंस अनुभव होगी तो भी श्वास बदल जाएगी; वह वैसी नहीं रहेगी जैसी थी। अगर आपको पता चल गया है कि साइलेंस में श्वास कैसी हो जाती है, तो आप अगर वैसी श्वास कर सकें तो साइलेंस पैदा हो जाएगी।

4-ये जो दोनों हैं, ये दोनों इंटरकनेक्टेड हैं। जब मन कामातुर होगा तो श्वास बदल जाएगी। अगर आप श्वास को न बदलने दें, तो आप फौरन पाएंगे कि कामातुरता विदा हो गई। वह काम विलीन हो जाएगा, वह टिक नहीं सकता; क्योंकि बॉडी के मेकेनिज्य में सारी चीजों में तारतम्य होना चाहिए तभी कुछ हो सकता है। अगर क्रोध जोर से आ रहा है और उस वक्त आप श्वास धीमी लेने लगें, तो क्रोध टिक नहीं सकता; क्योंकि श्वास में उसको टिकने की जगह नहीं मिलेगी।

क्या है श्वास और मन के वैज्ञानिक नियम?-

15 FACTS;-

1-तो श्वास के जो अंतर हैं, वे बड़े कीमती हैं।और श्वास के अंतर से आपके मन का अंतर पड़ना शुरू होगा। और जब वैज्ञानिक रूप से यह स्पष्ट हो चुका है कि श्वास की कौन सी गति पर मन की क्या गति होगी, तब खतरे नहीं हैं।जिन्होंने प्रारंभिक प्रयोग किए हैं; उनको खतरे थे। जो जीवन की किसी भी दिशा में प्रारंभिक प्रयोग करता है ;उसको आज भी खतरा है। लेकिन जब प्रयोग स्पष्ट हो जाते हैं तो वे बहुत साइंटिफिक हैं। यानी यह असंभव है कि एक आदमी श्वास को शांत रखे और क्रोध कर ले। ये दोनों बातें एक साथ नहीं घट सकतीं। इससे उलटा भी संभव है कि अगर आप उसी तरह की श्वास लेने लगें जैसी आप क्रोध में लेते हैं, तो आप थोड़ी देर में पाएं कि आपके भीतर क्रोध जग गया। तो प्राणायाम ने आपके चित्त के परिवर्तन के लिए बहुत से उपाय खोजे हैं।

2-प्राकृतिक और अप्राकृतिक श्वास...जिसको हम आर्टिफीशियल ब्रीदिंग कह रहे हैं और जिसको हम नेचरल ब्रीदिंग कह रहे हैं, ...यह फासला भी समझने जैसा है। जिसको आप नेचरल कह रहे हैं, वह भी नेचरल नहीं है; । बल्कि बहुत ठीक से समझा जाए तो वह ऐसी आर्टिफीशियल ब्रीदिंग है जिसके आप आदी हो गए हैं, जिसको आप बहुत दिन से ;बचपन से कर रहे हैं इसलिए आदी हो गए हैं। आपको पता नहीं है कि नेचरल ब्रीदिंग क्या है। इसलिए दिन भर आप एक तरह से श्वास लेते हैं , रात में आप दूसरी तरह से लेते हैं। क्योंकि दिन में जो ली थी वह आर्टिफीशियल थी, और इसलिए रात में नेचरल शुरू होती है जो कि आपकी हैबिट के बाहर है।

3-तो रात की ही श्वास की प्रक्रिया ज्यादा स्वाभाविक है बजाय दिन के। दिन में तो हमने आदत डाली है ब्रीदिंग की, और आदत के हमारे कई कारण हैं। जब आप भीड़ में चलते हैं तब आप एहसास करें, जब आप अकेले में बैठते हैं तब एहसास करें, तो आप पाएंगे आपकी ब्रीदिंग बदल गई। भीड़ में आप और तरह से श्वास लेते हैं, अकेले में और तरह से। क्योंकि भीड में आप टेंस होते हैं। चारों तरफ लोग हैं, तो आपकी ब्रीदिंग छोटी हो जाएगी; ऊपर से ही जल्दी लौट जाएगी; पूरी गहरी नहीं होगी। जब आप आराम से बैठे हैं, अकेले हैं, तो वह पूरी गहरी होगी। इसलिए जब रात आप सो गए हैं तो वह पूरी गहरी होगी। वह आपने दिन में कभी नहीं ली है, क्योंकि वह इतनी कभी गहरी नहीं गई कि आवाज भी कर सके।

4-पेट से श्वास लेना निर्दोषता का लक्षण...तो जिसको हम कह रहे हैं नेचरल वह नेचरल नहीं है, सिर्फ कंडीशंड आर्टिफीशियल है; निश्चित हो गई है, आदत हो गई है। इसलिए बच्चे एक तरह से ब्रीदिंग ले रहे हैं। अगर बच्चे को सुलाएं, तो आप पाएंगे उसका पेट हिल रहा है, और

आप ब्रीदिंग ले रहे हैं तो छाती हिल रही है।बच्चा नेचरल ब्रीदिंग ले रहा है। अगर बच्चा जिस ढंग से श्वास ले रहा है, आप लें, तो आपके मन में वही स्थितियां पैदा होनी शुरू हो जाएंगी जो बच्चे की हैं। उतनी इनोसेंस आनी शुरू हो जाएगी जितनी बच्चे की है। या अगर आप इनोसेंट हो जाएंगे तो आपकी ब्रीदिंग पेट से शुरू हो जाएगी।

5-इसलिए जापान में और चीन में बुद्ध की जो मूर्तियां हैं, वे उन्होंने भिन्न बनाई हैं । हिंदुस्तान में बुद्ध का पेट छोटा है; जापानी और चीनी मुल्कों में बुद्ध का पेट बड़ा है, छाती छोटी है। हमें बेहूदी लगती है कि यह बेडौल कर दिया। लेकिन वही ठीक है। क्योंकि बुद्ध जैसा शांत आदमी जब श्वास लेगा तो वह पेट से ही लेगा। उतना इनोसेंट आदमी छाती से श्वास नहीं ले सकता,

इसलिए पेट बड़ा हो जाएगा। वह पेट जो बड़ा है, वह प्रतीक है।सब झेन मास्टर्स का पेट बड़ा है। वह प्रतीक है। उतना बड़ा न भी रहा हो, लेकिन वह बड़ा ही डिपिक्ट किया जाएगा। उसका कारण है कि वह श्वास जो है, वह पेट से ले रहा है; वह छोटे बच्चे की तरह हो गया है।

6-तो जब हमें यह खयाल में साफ हो गया हो, तो नेचरल ब्रीदिंग की तरफ हमें कदम उठाने चाहिए। हमारी ब्रीदिंग आर्टिफीशियल है।हम आर्टिफीशियल ब्रीदिंग कर रहे हैं। तो जैसे ही हमें समझ बढ़ेगी, हम नेचरल ब्रीदिंग की तरफ कदम उठाएंगे। और जितनी नेचरल ब्रीदिंग हो जाएगी, उतने ही जीवन की अधिकतम संभावना हमारे भीतर से प्रकट होनी शुरू होगी।

और यह भी समझने जैसा है कि कभी-कभी एकदम आकस्मिक रूप से अप्राकृतिक ब्रीदिंग करने के भी बहुत फायदे हैं। और एक बात तो साफ ही है कि जहां बहुत फायदे हैं वहीं बहुत हानियां हैं।

7-एक आदमी दुकानदारी कर रहा है, तो जितनी हानियां हैं ;उतने फायदे हैं। एक आदमी जुआ खेल रहा है, तो जितने फायदे हैं उतनी हानियां हैं। क्योंकि फायदा और हानि का अनुपात तो वही होनेवाला है। तो बहुत खतरे हैं, वह आधी बात है।वहां बहुत संभावनाएं भी हैं।

वह जुआरी का दांव है।तो अगर हम कभी किसी क्षण में थोड़ी देर के लिए बिलकुल ही अस्वाभाविक -अस्वाभाविक इस अर्थों में कि जिसको हमने अभी तक नहीं की है ..इस तरह की ब्रीदिंग करें, तो हमें अपने ही भीतर नई स्थितियों का पता चलना शुरू होता है। उन स्थितियों में हम पागल/विक्षिप्त भी हो सकते हैं और उन स्थितियों में हम मुक्त भी हो सकते

हैं।

8-और चूंकि उस स्थिति को हम ही पैदा कर रहे हैं, इसलिए किसी भी क्षण उसे रोका जा सकता है। इसलिए खतरा नहीं है। जब आपने ही पैदा किया है तो आप तत्काल रोक सकते हैं।खतरे का डर तब है, जबकि आप रोक न सकें। और आपको प्रतिपल अनुभव होता है कि आप किस तरफ जा रहे हैं। आप आनंद की तरफ जा रहे हैं, कि दुख की तरफ जा रहे हैं, कि खतरे में जा रहे हैं, कि शांति में जा रहे हैं, वह आपको बहुत साफ एक -एक कदम पर मालूम होने लगता है।

9-अजनबी स्थिति के कारण मूर्च्छा पर चोट..और जब बिलकुल ही आकस्मिक रूप से, तेजी से ब्रीदिंग बदली जाए, तो आपके भीतर की पूरी की पूरी स्थिति एकदम से बदलती है । जो हमारी सुनिश्चित आदत हो गई है श्वास लेने की, उसमें हमें कभी पता नहीं चल सकता कि मैं शरीर से अलग हूं। उसमें सेतु / ब्रिज बन गया है। शरीर और आत्मा के बीच श्वास की एक

निश्चित आदत ने एक ब्रिज बना दिया है। उसके हम आदी हो गए हैं।यानी वह मामला ऐसा ही है कि जैसे आप रोज अपने घर जाते हैं और कार का आप व्हील घुमा लेते हैं और आपको कभी न सोचना पड़ता है, न विचार करना पड़ता है, आप अपने घर पर जाकर खड़े हो जाते हैं।

10-लेकिन अचानक ऐसा हो कि व्हील आप दाएं मुडाएं और व्हील बाएं मुड़ जाए, कि जो रास्ता रोज आपका था, अचानक आप पाएं कि वह रास्ता आज पूरा का पूरा घूम गया है और दूसरा रास्ता उसकी जगह आ गया है, तब एक स्ट्रेजनेस की हालत में आप पहुंचेंगे, और पहली दफा आप होश से भर जाएंगे। वह जो आप होश से भर जाएंगे… किसी भी चीज का अजनबीपन/स्ट्रेजनेस, वह आपकी मूर्च्छा को तत्काल तोड़ देता है।व्यवस्थित दुनिया, जहां सब रोज वही हुआ है, वहां आपकी मूर्च्छा कभी नहीं टूटती; आपकी मूर्च्छा वहां टूटती है , जहां अचानक कुछ हो जाता है।

11-जैसे कि कोई टेबल एक शब्द भी बोल दे तो आप सब इतनी अवेयरनेस में पहुंच जाएंगे जिसमें आप कभी नहीं गए; क्योंकि वह स्ट्रेज है, और स्ट्रेंज आपके भीतर की सब स्थिति तोड़

देता है।तो श्वास के अनूठे अनुभव जब स्ट्रेजनेस में ले जाते हैं, तो आपके भीतर बड़ी नई संभावनाएं होती हैं और आप होश उपलब्ध कर पाते हैं और कुछ देख पाते हैं। और अगर कोई आदमी होशपूर्वक पागल हो सके, तो इससे बड़ा कीमती अनुभव नहीं है।तो यह एक

प्रयोग सा है कि भीतर आपका पूरा होश है और बाहर आप बिलकुल पागल हो गए हैं।भीतर तो आपको पूरा होश है और आप देख रहे हैं कि मैं नाच रहा हूं। और आप जानते हैं कि अगर यह कोई भी दूसरा आदमी कर रहा होता तो मैं कहता कि यह पागल है।

12-अब आप अपने को पागल कह सकते हैं। लेकिन दोनों बातें एक साथ हो रही हैं ...आप यह जान भी रहे हैं कि यह हो रहा है। इसलिए आप पागल भी नहीं हैं; क्योंकि आप होश में पूरे

हैं और फिर भी वही हो रहा है जो पागल को होता है।इस हालत में आपके भीतर एक ऐसा स्ट्रेज मोमेंट आता है कि आप अपने को अपने शरीर से अलग कर पाते हैं। कर नहीं पाते, हो ही जाता है। अचानक आप पाते हैं कि सब तालमेल टूट गया। जहां कल रास्ता जुड़ता था वहां नहीं जुड़ता और जहां कल आपका ब्रिज जोड़ता था वहां नहीं जुड़ता; जहां व्हील घूमता था वहां नहीं घूमता। सब विसंगत हो गया है।

13-वह जो रोज -रोज की रेलेवेंसी थी , वह टूट गई है; कहीं कुछ और हो रहा है। आप हाथ को नहीं घुमाना चाह रहे हैं, और वह घूम रहा है; आप नहीं रोना चाह रहे हैं, और आंसू बहे जा रहे हैं; आप चाहते हैं कि यह हंसी रुक जाए, लेकिन यह नहीं रुक रही है।तो ऐसे स्ट्रेंज

मोमेंट्स पैदा करना अवेयरनेस के लिए बड़े अदभुत हैं। और श्वास से जितने जल्दी ये हो जाते हैं, और किसी प्रयोग से नहीं होते।प्रयोग में वर्षों लगाने पड़ते हैं, श्वास में दस मिनट में भी हो सकता है। क्योंकि श्वास का हमारे व्यक्तित्व में इतना गहरा संबंध है कि उस पर जरा सी लगी चोट... सब तरफ प्रतिध्वनित हो जाती है।

14-तो श्वास के जो प्रयोग थे, वे बड़े कीमती थे। लेकिन प्राणायाम के व्यवस्थित प्रयोग में उनकी स्ट्रेजनेस चली जाती है। जैसे एक आदमी एक -दो श्वास इस नाक से लेता है, फिर दो इससे लेता है। फिर इतनी देर रोकता है, फिर इतनी देर निकालता है। इसका अभ्यास कर लेता है। तो यह भी उसका अभ्यास का हिस्सा हो जाने के कारण सेतु बन जाता है। एमेथॉडिकल हो जाता है।लेकिन यहाँ जिस श्वास को कहा जा रहा है ;वह बिलकुल नॉन

-मेथॉडिकल है, एब्सर्ड है। उसमें न कोई रोकने का सवाल है, न छोड़ने का सवाल है। वह एकदम से स्ट्रेंज फीलिंग पैदा करने की बात है कि आप एकदम से ऐसी झंझट में पड़ जाएं कि इस झंझट को आप व्यवस्था न दे पाएं।

15-अगर व्यवस्था दे दी, तो आपका मन बहुत होशियार है, वह उसमें भी राजी हो जाएगा कि ठीक है। वह इस नाक को दबा रहा है, इसको खोल रहा है; इतनी निकाल रहा है, उतनी बंद कर रहा है; तो उसका कोई मतलब नहीं है, वह एक नया सिस्टम हो जाएगा, लेकिन

स्ट्रेजनेस/ अजनबीपन उसमें नहीं आएगा।आपकी जो भी रूट्स हैं, जितनी भी जड़ें हैं और जितना भी आपका अपना परिचय है, वह सब का सब किसी क्षण में एकदम उखड़ जाए। एक दिन आप अचानक पाएं कि न कोई जड़ है मेरी, न मेरी कोई पहचान है, न मेरी कोई मां है, न मेरा कोई पिता है, न कोई भाई है, न यह शरीर मेरा है। आप एकदम ऐसी एब्सर्ड हालत में पहुंच जाएं जहां कि आदमी पागल होता है। लेकिन अगर आप इस हालत में अचानक पहुंच जाएं आपकी बिना किसी कोशिश के, तो आप पागल हो जाएंगे। और अगर आप अपनी ही कोशिश से इसमें पहुंचें तो आप कभी पागल नहीं हो सकते, क्योंकि यह आपके हाथ में है, अभी आप इसी सेकेंड वापस लौट सकते हैं।

....SHIVOHAM....