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कामना और संकल्प के क्षीण होने का क्या अर्थ है?साक्षी-भाव कैसे सधता है?


कामना के क्षीण होने का क्या अर्थ है?-

13 FACTS;-

1-भगवत गीता में श्रीकृष्ण अपने शिष्य अर्जुन से कहते हैं...

''और हे अर्जुन, जिसके संपूर्ण कार्य कामना और संकल्प से रहित हैं, ऐसे उस ज्ञान-अग्नि द्वारा भस्म हुए कर्मों वाले पुरुष को ज्ञानीजन भी पंडित कहते हैं''।

कामना और संकल्प से क्षीण हुए, कामना और संकल्प की मुक्तिरूपी अग्नि से भस्म हुए ;चेतना की ऐसी दशा में जो ज्ञान उपलब्ध होता है, ऐसे व्यक्ति को ज्ञानीजन भी पंडित कहते

हैं।इसमें दो बातें गहरे से समझने की हैं।अज्ञानीजन तो पंडित उसे कहते हैं, जो ज्यादा सूचनाएं संगृहीत किए हुए है, जो शास्त्र का जानकार है , जो तर्कयुक्त विचार करने में कुशल

है।परन्तु ज्ञानीजन उसे पंडित नहीं कहते।

2-ज्ञानीजन तो उसे पंडित कहते हैं, जो कामना और संकल्प को छोड़कर चेतना की उस शुद्ध अवस्था को उपलब्ध होता है, जहां ज्ञान का सीधा साक्षात्कार/इमीजिएट रिअलाइजेशन है। अज्ञानीजन पंडित उसे कहते हैं, जो कि ज्ञानीजनों ने कहा है, उसका संग्रह रखकर बैठा है। ज्ञानीजन उसे पंडित कहते हैं, जो उधार नहीं है; जिसका सत्य से सीधा, बिना मध्यस्थ के, संपर्क है।

3-यह संपर्क उसका ही हो सकता है, जिसकी चेतना से कामना और संकल्प क्षीण हुए हों। इसलिए दूसरी बात खयाल में ले लेनी जरूरी है कि कामना और संकल्प के क्षीण होने का क्या

अर्थ है?कामना का क्षीण होना तो हमारी समझ में आ सकता है–जहां वासनाएं गिर गईं, इच्छाएं गिर गईं; जहां कुछ पाने का खयाल गिर गया।फिर संकल्प भी क्षीण हो जाए! उसे

समझना थोड़ा कठिन पड़ेगा।कामना का अर्थ है, जो नहीं है, उसकी चाह। कामना के क्षीण होने का अर्थ है, जो है, उस पर पूर्णताः....। जो नहीं है, उसकी चाह कामना है। जो है, उसके साथ पूरी तृप्ति, कामना से मुक्ति है।

4-कामना का अर्थ है, दौड़। जहां मैं खड़ा हूं, वहां आनंद नहीं है। जहां कोई और खड़ा है, वहां है ..आनंद; वहां मुझे पहुंचना है। और मजे की बात यह है कि जहां कोई और खड़ा है, और जहां मुझे आनंद मालूम पड़ता है, वह भी कहीं और पहुंचना चाहता है! वह भी वहां होने को राजी नहीं है। उसे भी वहां आनंद नहीं है। उसे भी कहीं और आनंद है।कामना का अर्थ है,

आनंद कहीं और है, समव्हेयर एल्स। जहां आप खड़े हैं, उस जगह को छोड़कर और कहीं भी हो सकता है.. आनंद ; पृथ्वी पर, पृथ्वी के बाहर, चांदत्तारों पर; लेकिन वहां नहीं है, जिस जगह को आप घेरते हैं। जिस होने की स्थिति में आप हैं, वह जगह आनंदरिक्त है–यही कामना का अर्थ है।

5-कामना से मुक्ति का अर्थ है, कहीं हो या न हो आनंद, जहां आप हैं, वहां पूरा है; जो आप हैं, वहां पूरा है। संतृप्ति की पराकाष्ठा कामना से मुक्ति है।इंचभर भी कहीं और जाने का मन नहीं

है, तो कामना से मुक्त हो जाएंगे।कामना के बीज, कामना के अंकुर, कामना के तूफान क्यों उठते हैं? क्या इसलिए कि सच में ही आनंद कहीं और है? या इसलिए कि जहां आप खड़े हैं,

उस जगह से अपरिचित हैं?अज्ञानी से पूछिएगा, तो वह कहेगा, कामना इसलिए उठती है कि सुख कहीं और है। और अगर वहां तक जाना है, तो बिना कामना के मार्ग से जाइएगा कैसे? ज्ञानी से पूछिएगा, तो वह कहेगा, कामना के अंधड़ इसलिए उठते हैं कि जहां आप हैं, जो आप हैं, उसका आपको कोई पता ही नहीं है। काश, आपको पता चल जाए कि आप क्या हैं, तो कामना ऐसे ही तिरोहित हो जाती है, जैसे सुबह सूरज के उगने पर ओस-कण तिरोहित हो जाते हैं।

6-संसार में ऐसा आदमी खोजना मुश्किल है, जो परेशान न हो।गृहस्थ भी परेशान हैं, संन्यस्त भी परेशान हैं। गृहस्थ भी कहीं और पहुंचना चाहते हैं, कहीं और–धन की यात्रा में, यश की यात्रा में। संन्यस्त भी कहीं और पहुंचना चाहते हैं–आत्मा की यात्रा में, परमात्मा की यात्रा में, मोक्ष की यात्रा में। लेकिन कहीं और पहुंचने की दौड़ जारी है।और जो कहीं और पहुंचना

चाहता है, वह तनाव में होगा, परेशान होगा। वह शांत नहीं हो सकता। अगर मोक्ष भी पाना है, तो वासना , कामना काम कर रही है। अगर परमात्मा को भी पाना है, तो फिर वासना ,कामना काम कर रही है।अथार्त कामना दग्ध नहीं हुई।

7-वास्तव में ,परमात्मा तो उसे ही मिलता है, जिसकी कामना दग्ध हो। उसे ही मिलता है कि जिसके द्वार पर परमात्मा भी दस्तक दे, तो वह कहे, विश्राम करो; जल्दी न करो; ऐसी कोई जल्दी नहीं है। हम यहां भी काफी मजे में हैं! मोक्ष भी दरवाजे खोले और वह आदमी कह सके कि हम यहीं मोक्ष में हैं, दरवाजे खोलने की कोई भी जरूरत नहीं है। ऐसे ही व्यक्ति के लिए मोक्ष उपलब्ध होता है। ऐसे ही व्यक्ति की तरफ परमात्मा आता है, जो परमात्मा से भी कह दे कि.. ठहरो।

8-संन्यासी भी परेशान और पीड़ित है।जीवन बीत गया प्रार्थना करते, अब तक स्वर्ग से कोई खबर नहीं मिली! जीवन बीत गया प्रभु के द्वार पर हाथ जोड़े, अब भी हाथ खाली हैं! कामना ने रूप बदला, आब्जेक्ट बदला, विषय बदला, परन्तु कामना नहीं बदली। धन की जगह धर्म हुआ; सुख की जगह स्वर्ग हुआ; पदार्थ की जगह परमात्मा हुआ; मकान की जगह मंदिर हुआ। विषय बदला, आब्जेक्ट बदला, रूप बदला, ढंग बदला; कामना नहीं बदली। कामना

फिर नए रूपों पर, नए विषयों पर दौड़ने लगी। कामना अपनी जगह है।जब तक कोई आदमी कहीं पहुंचना चाहता है, जब तक किसी आदमी का कोई लक्ष्य है, तब तक वह कामना के बाहर नहीं है। जब तक उद्देश्य है, तब तक कामना के बाहर नहीं है।

9-उदाहरण के लिए एक रात सोते समय एक पीड़ित बूढ़े संन्यासी ने परमात्मा से कहा, ''बहुत हो चुका! कितनी प्रार्थना करूं? और कितनी पूजा करूं? और कब तक तुम्हें पुकारूं? अब थक गया। अब तक तुम से सुख मांगे, अब तुमसे सुख नहीं मांगता। अब तुम से इतना ही मांगता हूं कि कम से कम मेरे दुख किसी और को दे दो और किसी दूसरे के दुख मुझे दे दो, तो भी चलेगा। मुझसे ज्यादा दुखी आदमी पृथ्वी पर दूसरा नहीं है।''वास्तव में,सभी को ऐसा

खयाल है कि उससे ज्यादा दुखी आदमी पृथ्वी पर दूसरा नहीं है।खयाल के कारण हैं। क्योंकि हमें अपने भीतर के, हृदय के दुख के कांटे दिखाई पड़ते हैं। दूसरों के हृदय के दुख के कांटे तो दिखाई नहीं पड़ते। दूसरों के हृदय तक पहुंचने का हमारे पास कोई उपाय भीनहीं है। दूसरों के तो केवल चेहरे दिखाई पड़ते हैं।और चेहरे से ज्यादा धोखे की और कोई चीज नहीं है।

10-वह संन्यासी भी धोखे में आ गया।उसने लोगों के चेहरे देखे। देखा, लोग हंसते हैं, मुस्कुराते हैं और मैं अपने भीतर देखता हूं, तो सिवाय दुख के कुछ और नहीं है।अपरिचित का , जिसे नहीं जानते, उसका भी तो आकर्षण होता है। अपने सुख से भी आदमी ऊब जाता है; दूसरे के दुख में भी आकर्षण होता है। साथ रहते-रहते अपने सुख से भी ऊब जाता है। सच तो यह है कि सुख जितना उबाने वाला, बोर्डम पैदा करने वाला होता है, उतना दुख नहीं होता। दुखी आदमी ऊबे हुए नहीं दिखाई पड़ते; सुखी आदमी ऊबे हुए दिखाई पड़ते हैं ।दुख की बदलाहट भी बड़ी राहत देती है। अक्सर हम यही करते रहते हैं, खुद बदलते रहते हैं। एक दुख को छोड़ते हैं, दूसरे को पकड़ लेते हैं।एक दुख उतारने में, दूसरा चढ़ाने में बीच में जो ट्रांजीशन का पीरियड है, वह जो थोड़ी-सी राहत का वक्त है, वह भी काफी सुख देता है।दूसरे की तरफ हम दौड़ते हैं, क्योंकि लगता है, दूसरा सुखी है, हम दुखी हैं।कामना का बीज यही है।

11-चेहरा धोखा है ,बनाया हुआ है। मौलिक चेहरा/ओरिजिनल फेस तो बहुत कम लोगों के पास होते हैं, पेंटेड फेस होते हैं। कभी किसी श्रीकृष्ण, कभी किसी बुद्ध के पास मौलिक चेहरा होता है; वही जो चेहरा उनका है। अन्यथा चेहरे तैयार किए होते हैं। दिखाने के लिए तैयार किए गए मास्क, मुखौटे होते हैं। और एक-एक आदमी बहुत-से चेहरे अपने पास रखता है। जब जैसी जरूरत पड़ी, चेहरा लगा लेता है।दूसरे का चेहरा,मुस्कुराहटें दिखाई पड़ती हैं

दुनिया में। दूसरों के हृदय तो दिखाई नहीं पड़ते, नहीं तो आंसुओं के ढेर लग जाएं। सच तो यह है कि लोग मुस्कुराते ही इसलिए हैं, ताकि भीतर के आंसुओं को छिपा सकें।

12-चेहरे ड्राइंगरूम की तरह हैं, जो बाहर से आते हैं, उनको दिखाने के लिए है; रहने के लिए नहीं ..। घर के लोग उसमें रहते नहीं हैं। सिर्फ दिखाई पड़ते हैं। जब बाहर से कोई आता है, तो बैठकखाने में दिखाई पड़ते हैं। रहते घर के दूसरे हिस्सों में हैं,केवल दिखाई पड़ते हैं

बैठकखानों में!अज्ञानी से पूछें, तो वह कहेगा, नहीं; दूसरी जगह सुख है, इसलिए दौड़ते हैं। ज्ञानी से पूछें, तो वह कहेगा, इसलिए दौड़ते हैं, क्योंकि हमें पता ही नहीं कि हम अपनी जगह

कौन हैं? क्या हैं?तो जो अपने भीतर डूब जाए , जो थोड़ा-सा आत्मा को जान ले, वही कामना से मुक्त हो सकता है। अन्यथा नहीं मुक्त हो सकता है। आत्मा को जाना कि कामना तिरोहित हो जाती है; या कामना तिरोहित हो जाए, तो आत्मा जान ली जाती है। ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

13-लोग कहते हैं कि ''संन्यास तो संसार के विपरीत है। हम तो संसार में हैं, हम कैसे संन्यासी हो जाएं? हम तो तब संन्यासी होंगे जब हम संसार छोड़ेंगे''।वास्तव में,संन्यास संसार के विपरीत विकल्प नहीं है।और जिन लोगों ने संन्यास का अर्थ संसार के विपरीत बना रखा है वे संसार में ही उलझे रहेंगे। संसार और संन्यास उनके लिए दो विरोधी पहलू हैं । वे कहते हैं, अगर हम संसार चुनेंगे तो संन्यास कैसे चुनें? अगर हम संन्यास चुनेंगे तो संसार कैसे चुनें? अगर संन्यास का अर्थ द्वंद्व है, तो संन्यास का अर्थ ही खो गया। संन्यास का अर्थ ही है निर्द्वंद्व हो जाना। हम चुनते ही नहीं ..जो हो जाता है उसे स्वीकार कर लेते हैं, जो नहीं होता उसकी हम मांग नहीं करते; ऐसी भाव-दशा संन्यास है। तब आप कहीं भी संन्यासी हो सकते हैं। तब संन्यास भाव-दशा है; विकल्प नहीं।

संकल्प के क्षीण होने का क्या अर्थ है?-

10 FACTS;-

1-दूसरी बात और भी कठिन है। श्रीकृष्ण कहते हैं, संकल्प भी छोड़ दो।संकल्प का अर्थ है,

विल पावर।साधारणतः संकल्प तो प्राण है।अगर विल चली जाएगी,तो संकल्पहीन/ विललेस हो

जाओगे । कुछ बचेगा ही नहीं तुम्हारे पास।लेकिन श्रीकृष्ण कहते हैं, संकल्प का उपयोग ही क्या है? जब तक कामना है, तब तक उपयोग है। जब कामना नहीं, तो संकल्प का कोई उपयोग नहीं। जब तक इच्छा पूरी करनी है, तब तक इच्छाशक्ति की जरूरत है। और जब इच्छा ही नहीं है, तो इच्छाशक्ति का क्या करिएगा? वह बोझ हो जाएगी। उसे भी छोड़ दो।

2-हमें इच्छाशक्ति की जरूरत है, क्योंकि इच्छाएं पूरी करनी हैं, तो पैरों में ताकत चाहिए दौड़ने की। कामना पूरी करनी है, तो शक्ति चाहिए, मंजिल तक पहुंचने की। वही संकल्प है।

संकल्पहीन की हम निंदा करते हैं, कि तुम कुछ निर्णय/डिसीजन नहीं ले पाते, संकल्पहीन हो;तुम कुछ पक्का नहीं कर पाते।निंदा हम इसीलिए करते हैं कि कामनाएं तो उसके भीतर बहुत हैं और संकल्प नहीं है।

3-अगर कामनाएं बहुत हों और संकल्प न हो, तो आदमी पागल हो जाएगा। क्योंकि पहुंचने की इच्छा बहुत है और चलने की ताकत बिलकुल नहीं है, तो वह आदमी बड़ी कठिनाई में पड़

जाएगा। संकल्प की हम बात करते हैं कि संकल्प बढ़ाओ, विल पावर बढ़ाओ। क्योंकि वासनाएं अगर पूरी करनी हैं, तो बिना संकल्प के पूरी न होंगी। लेकिन अगर वासनाएं छोड़ देनी हैं, तब संकल्प की कोई भी जरूरत नहीं है; तब तो समर्पित हो जाओ। तब नाहक की

शक्ति बोझ बन जाएगी।ध्यान रहे, शक्ति अगर प्रयोग न की जाए, तो आत्मघाती /स्युसाइडल हो जाती है। तो स्वयं का ही विनाश करने लगती है।

4-इसलिए श्रीकृष्ण बहुत मनोवैज्ञानिक सत्य कह रहे हैं। लेकिन क्रम से कह रहे हैं। वे कह रहे

हैं,पहले वासना-कामना से क्षीण,फिर संकल्प से क्षीण।अगर कोई वासनाओं के पहले संकल्प छोड़ दे, तो बहुत कठिनाई में पड़ जाएगा।पहले वासना चली जाए, तो फिर संकल्प का बचना खतरनाक है। क्योंकि फिर शक्ति करेगी क्या? और जब शक्ति बाहर नहीं जा पाती, नहीं दौड़ पाती, सक्रिय नहीं हो पाती, तो फिर भीतर सक्रिय हो जाती है।और फिर भीतर ही दौड़ने लगती है।शक्ति जब भीतर दौड़ती है, तो आदमी पागल हो जाता है।

5-शक्ति जब बाहर दौड़ती है, तब भी पागल होता है। लेकिन तब नार्मल पागल होता है, जैसे सभी पागल हैं। इसलिए बहुत दिक्कत नहीं आती। लेकिन जब शक्ति भीतर दौड़ने लगती है, तब असाधारण रूप से पागल हो जाता है। क्योंकि सब लोग बाहर की तरफ दौड़ते हैं, वह भीतर ही भीतर दौड़ता है। फिर भीतर दौड़ने से कहीं पहुंच तो सकते नहीं; वहीं-वहीं वर्तुल की तरह घूमते रहते हैं। फिर जिंदगी बड़ी कठिनाई में हो जाती है।और यह भी स्मरणीय है कि

शक्ति के दो रूप हैं। अगर वह वासनाओं की तरफ दौड़े, तो क्रिएटिव होती है। वह कुछ सृजन करती है; कामनाओं का, वासनाओं का, सपनों का, आकांक्षाओं का सृजन करती है। अगर आकांक्षाएं, वासनाएं, कामनाएं छूट जाएं, तो शक्ति सृजन नहीं करती। संकल्प की शक्ति फिर स्वयं को ही विनाश करने लगती है, डिस्ट्रक्टिव हो जाती है।

6-इसलिए श्रीकृष्ण का दूसरा सूत्र पहले सूत्र से भी बहुमूल्य और स्मरणीय है, कि जो व्यक्ति

वासनाएं छोड़ देता है, संकल्प छोड़ देता है वो यह भी छोड़ देता है कि मुझे कहीं पहुंचना है; कि मैं कहीं पहुंच सकता हूं। यह भी छोड़ देता है कि कोई मंजिल है; कि मैं कोई यात्री हूं या मुझे कोई दूर के फल तोड़ लाने हैं; और मैं तोड़कर ला सकता हूं।ऐसा कामना-शून्य,

संकल्परिक्त हुआ व्यक्ति ज्ञान को उपलब्ध होता है क्योंकि ऐसा व्यक्ति दर्पण की भांति निर्मल

और ठहरा हुआ हो जाता है।जब झील में लहरें चलती होती हैं, तो झील दर्पण नहीं बन पाती। लेकिन झील पर लहरें न चलें, झील शांत हो जाए ; मौन हो जाए, विश्राम में चली जाए–तो झील दर्पण बन जाती है। फिर झील की सतह दर्पण/ मिरर का काम करती है। फिर चांद ,त्तारे, आकाश का सूरज उसमें प्रतिबिंबित होता है। पूरा आकाश छोटी-सी झील पकड़ लेती है।अनंत आकाश, विराट आकाश, जिसकी कोई सीमा नहीं, एक छोटी-सी झील की छाती में प्रतिबिंबित हो जाता है।

6-ठीक ऐसा ही होता है। जब चित्त पर कोई वासना- कामना की कोई लहर या झंझावात नहीं होता, और जब चित्त अपने ही भीतर घूमती शक्ति से आंदोलित नहीं होता, तब चित्त भी एक झील की भांति मौन, ठहर गया होता है। उस ठहराव में दर्पण बन जाता है। उस दर्पण में विराट परमात्मा इस छोटे-से आदमी के हृदय में भी प्रतिफलित होता है; आमने-सामने हो जाता है।परमात्मा विराट है, लेकिन हम बड़े छोटे हैं।झील छोटी है, लेकिन आकाश बड़ा है !

सच ही बहुत बड़ा है परमात्मा .. जितना हम कंसीव कर सकें, जितना हम सोच सकें, उससे सदा बड़ा है। बड़े का मतलब यह नहीं कि हमने नाप लिया है कि इतना बड़ा है। बड़े का इतना ही मतलब कि हमारे सब नाप बेकार हो गए हैं।लेकिन वह जो इतना बड़ा है ,वह इस

आदमी के छोटे-से हृदय के साथ कैसे साक्षात्कार कर सकेगा?

7-आपने भी देखा होगा कि एक छोटे-से दर्पण में भी बहुत बड़ा साक्षात्कार हो जाता है। छोटे-से दर्पण में विराट सूर्य का प्रतिफलन हो जाता है। दर्पण फिर भी बड़ा है।विराट एवरेस्ट को छोटी-सी आंख पकड़ लेती है।माना कि आंख बड़ी छोटी है, लेकिन प्रतिफलन की क्षमता अनंत है, दि कैपेसिटी टु रिफ्लेक्ट।इसलिए आंख एकदम छोटी नहीं है।एक अर्थ में एवरेस्ट

छोटा पड़ जाता है।अथार्त भक्त के हृदय के सामने भगवान छोटा पड़ जाता है। इस अर्थ में, अनंत विराट है, लेकिन भक्त के छोटे-से हृदय में भी पूरा प्रतिफलित हो जाता है। असीम पूरा

पकड़ लिया जाता है।लेकिन यह हृदय होना चाहिए मौन, शांत, वासना-संकल्प से रिक्त और खाली। और तब ज्ञानी भी अर्थात जो जानते हैं, वे भी–ऐसे व्यक्ति को पंडित कहते हैं। और ध्यान रहे, श्रीकृष्ण की यह शर्त बड़ी कीमती है क्योंकि जो नहीं जानते, वे किसी को भी पंडित कहें, इसका कोई मूल्य नहीं है।वे उसी को पंडित कहते हैं, जो उनसे ज्यादा जानता हुआ मालूम पड़ता है।

8- न जानने वाले और ज्यादा जानने वाले में क्वांटिटी का अंतर है। आपने दो किताबें पढ़ी हैं, उसने दस पढ़ी हैं। आप दो क्लास पढ़े हैं, उसने दस क्लास पढ़ी हैं। आपके पास प्राइमरी का सर्टिफिकेट है, उसके पास यूनिवर्सिटी का। लेकिन अंतर क्वांटिटी का है, क्वालिटी का नहीं। अंतर परिमाण का, मात्रा का है, गुण का नहीं।लेकिन जब कोई व्यक्ति परमात्मा को जान

लेता है, तो यह कोई बड़ा सर्टिफिकेट नहीं है छोटे सर्टिफिकेट के मुकाबले। यह कोई प्राइमरी की डिग्री के मुकाबले पीएच.डी. की डिग्री नहीं है। डिग्री अर्थात उपाधि; यह कोई डिग्री ही

नहीं है।उपाधि का मतलब बीमारी भी होता है।असल में उपाधिग्रस्त आदमी, डिग्रीधारी, बीमार ही होता है। क्योंकि सब उपाधियां, सब डिग्रियां अहंकार को और भारी करती चली जाती हैं। और सब उपाधियां, और सब डिग्रियां कामना और वासना को और गतिमान करती हैं। सब उपाधियां संकल्प को और दौड़ाती हैं।

9-लेकिन जिसे ज्ञानी भी पंडित कहते हैं, वह उपाधिमुक्त /डिग्रीलेस है। इसके पास कोई प्रमाणपत्र नहीं है.. जानने का ;यह स्वयं ही जानने का प्रमाणपत्र है।इसकी स्वयं की आंखें, इसके हृदय से उठते हुए स्वर गवाही हैं।इसका रोआं-रोआं, इसका उठना-बैठना गवाही है।

उदाहरण के लिए एक सम्राट एक संत के पास गया और उसने कहा कि मैं कैसे जानूं कि तुमने जान लिया? तो उस संत ने कहा कि मुझे देखो–मेरे उठने को, मेरे बैठने को, मेरे बोलने को, मेरे चुप होने को, मेरी आंखों को, मेरे जागने को, मेरे सोने को–मुझे देखो। उस सम्राट ने कहा, तुम्हें देखने से क्या होगा? कोई और प्रमाण नहीं है? उस संत ने कहा, और कोई भी प्रमाण नहीं है। मैं ही प्रमाण हूं। मैंने अगर उसे जाना है, तो तुम मेरे उठने में उसका उठना जानोगे। मैंने अगर उसे जाना है, तो तुम मेरे देखने में उसकी आंख को देखता हुआ पाओगे। अगर मैंने जाना है, तो जब मैं तुम्हें हृदय से लगाऊंगा, तो तुम मेरे हृदय में उसकी धड़कन सुन पाओगे। और कोई प्रमाण नहीं है। और अगर यह तुम न पहचान सको, तो और कोई उपाय नहीं है। मैं कोई गवाह खड़े नहीं कर सकता हूं। मैं ही गवाह हूं। और अगर मैं गवाह नहीं बन पाता हूं, तो फिर कोई उपाय नहीं है।

10-अज्ञानीजन तो किसी को भी पंडित कहते हैं। अंधों में काना भी राजा हो जाता है!श्रीकृष्ण

के इस आखिरी वक्तव्य ने पंडितों की दो कोटियां कर दीं।एक वे ..जब कोई व्यक्ति कहता है अपने से जानकर–तब!दूसरेएक वे पंडित, जिनके पास परिमाण में ज्ञान है; एक ज्ञान की मात्रा है।लेकिन वे कंप्यूटर से ज्यादा नहीं हैं। उनके पास बंधे हुए उत्तर हैं, रटे हुए। उनके अपने उत्तर नहीं हैं। उत्तर किसी और के हैं; वे केवल दोहराने का काम कर रहे हैं। वे केवल दलाल हैं, उससे ज्यादा नहीं हैं। उत्तर उपनिषद के होंगे, कि बुद्ध के होंगे, कि श्रीकृष्ण के होंगे, कि महावीर के होंगे। उनके अपने नहीं हैं, इसलिए प्रामाणिक/आथेंटिक नहीं हैं। और यह

दुनिया बहुत सुलझी हुई हो सकती है, अगर ये नंबर दो के पंडित थोड़े कम हों। या न हों, तो बड़ा सुखद हो सकता है। जो नहीं जानता, वह जानने वाले की तरह बोलकर भारी नुकसान पहुंचाता है।

11-जो जानता है, वह चुप भी रह जाए, तो भी लाभ पहुंचाता है। जो नहीं जानता है, वह बोले, तो भी नुकसान पहुंचाता है। सौ में निन्यानबे मौके पर लोग जानते नहीं हैं, सिर्फ जाने हुए की बातों को जानते हैं। सेकेंड हैंड भी नहीं कहना चाहिए; हजारों हाथों से गुजरी हुई बातों को जानते हैं।सब सड़ गया होता है।अज्ञानीजन उनको पंडित कहते हैं।लेकिन ज्ञानीजन उसे

पंडित कहते हैं, जिसने आमना-सामना किया, एनकाउंटर किया; जिसके हृदय और परमात्मा के हृदय के बीच कोई पर्दा न रहा; सब पर्दे गिरे। और जिसके हृदय ने परमात्मा के हृदय का संस्पर्श किया; जिसने आंखों में आंखें डालकर परमात्मा में झांका; और जिसने परमात्मा को आंखें डालकर अपने भीतर झांकने दिया; जो झील की तरह आकाश से मिला, मौन झील की तरह– उसे ही पंडित कहा जा सकता है।

12-वास्तव में, ज्ञान कैलाश की बर्फ की तरह है, जो मुंह में डालते ही हमारी प्यास को तृप्त कर देती है।बर्फ जब पेट के अंदर जाती है, तो ठंडक

महसूस होती है, लेकिन दूसरे दिन यूरिन के माध्यम से बाहर निकल जाती है।जब यूरिन नाली में जाती है तो बदबू में बदल जाती है।इसीलिए

संसारिक ज्ञान हमेशा बर्फ की तरह से यूज किया जाता है;तृप्त करता है और यूरिन की यात्रा में बदबूदार हो जाता है।श्रीराम के ज्ञान रूपी बर्फ को यूरिन बना दिया गया तो श्रीकृष्ण का ज्ञान आया और जब श्रीकृष्ण के ज्ञान को बदबूदार बनाया जा रहा है तो आगे कल्कि का ज्ञान आएगा।इसीलिए ज्ञान अनंत है; जिसने भी यह सोचा कि ज्ञान पूरा हो गया;तो उसका विनाश प्रारंभ हो गया।

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साक्षी-भाव कैसे सधता है?-

14 FACTS;-

भगवत गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं...

1-''जो पुरुष सांसारिक आश्रय से रहित सदा परमानंद परमात्मा में तृप्त है, वह कर्मों के फल और संग अर्थात कर्तृत्व-अभिमान को त्यागकर कर्म में अच्छी प्रकार बर्तता हुआ भी कुछ भी नहीं करता है''।

श्रीकृष्ण इस सूत्र में कह रहे हैं कि जिसके संसार-आश्रित सुख नहीं हैं, आनंद नहीं है; संसार-आश्रित झंझावातों पर जिसके चित्त की लहरें आंदोलित नहीं होतीं; जो संसार की बांसुरी पर नाचता नहीं–उस पुरुष को कर्म करते हुए कर्म का अभिमान नहीं आता है।और

ऐसी चेतना को उपलब्ध पुरुष संसार के आसरे/ कारण आनंदित नहीं होता।ऐसे पुरुष का आनंद परमात्मा से ही स्रोत पाता है। जहां तक संसार का संबंध है;ऐसा व्यक्ति सुखी ही होता है–अकारण।ऐसे पुरुष का आनंद आश्रित आनंद नहीं बल्कि अनाश्रित,बेशर्त/ अनकंडीशनल, अकारण है। ऐसे पुरुष का आनंद कहीं से आता नहीं, इसलिए फिर कहीं जा भी नहीं सकता। ऐसे पुरुष का आनंद परमात्मा, परब्रह्म , ब्रह्म से ही स्रोत पाता है। ब्रह्म से अर्थात स्वयं से ही। अपनी ही गहराइयों, अपने ही अंतस से उठते हैं आनंद के झरने और फिर नहीं खोते , क्योंकि ब्रह्म क्षणभंगुर नहीं है।

2-अगर कोई संत रामकृष्ण से पूछे, क्यों नाच रहे हो? तो वे कोई भी सांसारिक कारण न बता सकेंगे। वे यह न कह सकेंगे कि लाटरी जीत गया हूं , यश हाथ लग गया है या बहुत लोग मुझे

मानने लगे हैं।अगर संत कबीर से हम पूछें कि क्यों मस्त हुए जा रहे हो? यह मस्ती कहां से आती है?तो वे भी कोई संसारिक कारण न बता सकेंगे।हमारी मस्ती हमेशा सकारण होती

है, कंडीशनल होती है।उसमें शर्त होती है कि घर में बेटा हुआ है, तो बैंड-बाजे बज रहे हैं। धन-संपत्ति आ गई है, तो फूलमालाएं सजी हैं।हमारा सुख कहीं हमसे बाहर से आता है। इसलिए देर नहीं लगती और हमारा सुख तत्काल दुख बन जाता है।क्योंकि जिसका भी सुख संसार-आश्रित है, उसका सुख क्षणभर से ज्यादा नहीं हो सकता। क्योंकि संसार ही क्षणभर से ज्यादा नहीं होता है। संसार पर आश्रित जो भी है, वह सभी क्षणभर है।

3-जैसे कि हवाओं के झोंके में वृक्ष का पत्ता हिल रहा है। यह वृक्ष का पत्ता क्षणभर से ज्यादा एक स्थिति में नहीं हो सकता; क्योंकि जिस हवा में हिल रहा है, वही क्षणभर से ज्यादा एक स्थिति में नहीं रहती है। वह हवा ही तब तक और आगे जा चुकी है। नदी में जो लहर उठ रही है, वह जिस पवन के झोंकों से उठ रही है, क्षणभर से ज्यादा नहीं रह सकती; क्योंकि क्षणभर

से ज्यादा वह पवन का झोंका ही नहीं रह जाता है।संसार क्षणभंगुरता है। वहां सब कुछ क्षणभर है। उस पर आश्रित सुख क्षण से ज्यादा नहीं है। आया नहीं, कि गया! आने और जाने में बड़ा कम फासला है।

4-उदाहरण के लिए एक कवि की दो पंक्तियों में जरा-सा फासला किया है और पंक्तियों का अर्थ बदल गया है। पहली पंक्ति है: वसंत आ गया अथार्त आ गया वसंत। और दूसरी पंक्ति है: वसंत आ, गया अथार्त आ, गया वसंत।दूसरी पंक्ति में, वह आ- गया को दो टुकड़ों में तोड़ दिया है ! आ को अलग कर दिया है, गया को अलग कर दिया है।इतना ही फासला है,कि

आ गया सुख; आ, गया सुख।हम पहचान भी नहीं पाते कि आ गया, और दूसरी पंक्ति घटित हो जाती है। सच तो यह है कि जैसे ही हम पहचानते हैं कि सुख आ गया, सुख जा चुका होता है। इतना ही क्षण, क्षणभर की धुन बजती है और चली जाती है।

5-संसार क्षणभंगुर है, इसलिए संसार से आया सुख क्षणभंगुर है। ब्रह्म शाश्वत है, इटरनल है। इसलिए ब्रह्म से जिसके स्रोत जुड़ गए, उसका आनंद शाश्वत है; लेकिन अकारण। ऐसा व्यक्ति कब हंसने लगेगा, पता नहीं। ऐसा व्यक्ति कब नाचने लगेगा, पता नहीं। ऐसा व्यक्ति कब आनंद के आंसुओं को बरसाने लगेगा, पता नहीं। ऐसे व्यक्ति के भीतर स्रोत हैं, जो अकारण फूटते रहते हैं। और ऐसा व्यक्ति जिसे भीतर से पा रहा है, उसे कभी भी खोता नहीं है।

दो तरह के आश्रय हैं अस्तित्व में। पर-आश्रय; दूसरे के आश्रय से मिला सुख। दूसरे के आश्रय से मिला हुआ सुख, दुख का ही दूसरा नाम है, दुख का ही चेहरा है। उघाड़ेंगे और पाएंगे कि दुख आया। एक है, स्व-आश्रित। उसे स्व-आश्रित कहें या आश्रयमुक्त कहें। पराश्रित सुख से स्व-आश्रित दुख भी ठीक है; हालांकि स्व-आश्रित दुख नहीं होता।

6-इस स्व-आश्रित सुख को ही श्रीकृष्ण इस सूत्र में कह रहे हैं। संसार-आश्रित जिसके सुख नहीं हैं, आनंद नहीं है; संसार-आश्रित झंझावातों पर जिसके चित्त की लहरें आंदोलित नहीं होतीं; जो संसार की बांसुरी पर नाचता नहीं–उस पुरुष को क