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संक्षेप में योग दर्शन ...PART-05

//////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////////षड्दर्शन उन भारतीय दार्शनिक एवं धार्मिक विचारों के मंथन का परिपक्व परिणाम है जो हजारों वर्षो के चिन्तन से उतरा और हिन्दू (वैदिक) दर्शन के नाम से प्रचलित हुआ। इन्हें आस्तिक दर्शन भी कहा जाता है। दर्शन और उनके प्रणेता निम्नलिखित है। 1-पूर्व मीमांसा: महिर्ष जैमिनी 2-वेदान्त (उत्तर मीमांसा): महिर्ष बादरायण 3-सांख्य: महिर्ष कपिल 4-वैशेषिक: महिर्ष कणाद 5-न्याय: महिर्ष गौतम 6-योग: महिर्ष पतंजलि

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योग दर्शन;-

07 FACTS;-

1-षड् आस्तिक दर्शनों में योगदर्शन का महत्वपूर्ण स्थान है।योग की प्रक्रिया विश्व के बहुत से देशों में प्रचलित है। अधिकांशत: यह आसनों के रूप में जानी जाती है। कहीं-कहीं प्राणायाम भी प्रचलित है। यह आसन इत्यादि योग दर्शन का बहुतही छोटा भाग है।इस दर्शन की व्यवहारिक और आध्यात्मिक उपयोगिता सर्वमान्य है क्योकि योग के आसन एवं प्राणायाम का मनुष्य के शरीर एवं उसके प्राणों को बलवान एवं स्वस्थ्य बनाने में सक्षम योगदान रहा है।

2-इस दर्शन के प्रवर्तक महर्ष पतंजलि है।योग दर्शनकार पतंजलि ने आत्मा और जगत् के संबंध में सांख्य दर्शन के सिद्धांतों का ही प्रतिपादन और समर्थन किया है। उन्होंने भी वही पचीस तत्व माने हैं, जो सांख्यकार ने माने हैं। प्रत्यक्ष रूप में हठयोग, राजयोग और ज्ञानयोग तीनों का मौलिक

''योग'' में मिल जाता है।इनमें विशेषता यह है कि इन्होंने कपिल की अपेक्षा एक और छब्बीसवाँ तत्व 'पुरुषविशेष' या ईश्वर भी माना है, जिससे सांख्य के 'अनीश्वरवाद' से ये बच गए हैं। 3-यह दर्शन चार पदों में विभक्त है जिनके सम्पूर्ण सूत्र संख्या 194 है। ये चार पद है: समाधिपाद, साधनपाद, विभूतिपाद और कैवल्यपाद।योग दर्शन के प्रथम दो सूत्र है ... अथ योगानुशासनम् ।। १ ।।अर्थात योग की शिक्षा देना इस समस्त शास्त्र का प्रतिपाद्य विषय समझना चाहिए।योगश्चित्तवृत्ति निरोध: ।। २ ।।अर्थात् चित्त या मन की स्मरणात्मक शक्ति की वृत्तियों को सब बुराई से दूर कर, शुभ गुणो में स्थिर करके, परमेश्वर के समीप अनुभव करते हुए मोक्ष प्राप्त करने के प्रयास को योग कहा जाता है।योग है जीवात्मा का सत्य के साथ संयोग अर्थात् सत्य-प्राप्ति का उपाय। यह माना जाता है कि ज्ञानप्राप्ति मनुष्य-जीवन का लक्ष्य है और ज्ञान बुध्दि की श्रेष्ठता से प्राप्त होता है।

4-भगवद्गीता में कहा गया है..

''बुध्दि से परे आत्मा को जानकर , आत्मा के द्वारा आत्मा को वश में करके (अपने पर नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है) यही योग है''।इसे प्राप्त करने का उपाय योगदर्शन में बताया है। आत्मा पर नियंत्रण बुध्दि द्वारा, यह योग दर्शन का विषय है।मुख्यत: योग-क्रियाओं का लक्ष्य है बुध्दि को विकास देना और बुध्दि के विकास का अन्तिम रूप है- ऋतंभरा ,प्रज्ञा।योग से प्राप्त बुध्दि को ऋतंभरा कहते है।जो ज्ञान सामान्य बुध्दि से प्राप्त होता है वह भिन्न है और ऋतंभरा (योग से सिद्ध हुई बुध्दि) से प्राप्त ज्ञान भिन्न अर्थ वाला हो जाता है।इससे ही अध्यात्म-ज्ञान की प्राप्ति होती है; जिससे मोक्ष का मार्ग प्रशस्त हो जाता है।।

5-सृष्टि ,तत्व आदि के संबंध में योग का भी प्रायः वही मत है जो सांख्य का है, इससे सांख्य को 'ज्ञानयोग' और योग को 'कर्मयोग' भी कहते हैं।

पतंजलि के सूत्रों पर सबसे प्राचीन भाष्य वेदव्यास जी का है।हठयोग की एक अलग शाखा निकली; जिसमें नेति, धौति, वस्ति आदि षट्कर्म तथा नाड़ीशोधन आदि का वर्णन किया गया।शिवसंहिता, हठयोगप्रदीपिका, घेरण्डसंहिता आदि हठयोग के ग्रंथ है। हठयोग के बड़े भारी आचार्य मत्स्येंद्रनाथ (मछंदरनाथ) और उनके शिष्य गोरखनाथ हुए हैं।

6-संक्षेप में योग दर्शन का मत यह है कि मनुष्य को अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश ये पाँच प्रकार के क्लेश होते हैं, और उसे कर्म के फलों के अनुसार जन्म लेकर आयु व्यतीत करनी पड़ती है तथा भोग भोगना पड़ता है। पतंजलि ने इन सबसे बचने और मोक्ष प्राप्त करने का उपाय योग बतलाया है और कहा है कि क्रमशः योग के अंगों का साधन करते हुए मनुष्य सिद्ध हो जाता है और अंत में मोक्ष प्राप्त कर लेता है।

ईश्वर के संबंध में पतंजलि का मत है कि वह नित्यमुक्त, एक, अद्वितीय और तीनों कालों से अतीत है और देवताओं तथा ऋषियों आदि को उसी से ज्ञान प्राप्त होता है। योगदर्शन में संसार को दुःखमय और हेय माना गया है। पुरुष या जीवात्मा के मोक्ष के लिये वे योग को ही एकमात्र उपाय मानते हैं।

7-पतंजलि ने चित्त की पाँच प्रकार की वृत्तियाँ मानी है, जिनका नाम उन्होंने 'चित्तभूमि' रखा है। उन्होंने कहा है कि आरंभ की तीन चित्तभूमियों में योग नहीं हो सकता, केवल अंतिम दो... निरुद्ध और एकाग्र में हो सकता है।इन दो भूमियों में संप्रज्ञात और असंप्रज्ञात ये दो प्रकार के योग हो सकते हैं।चित्त की पाँच अवस्थाएँ हैं... 7-1-क्षिप्त(Agitated)

7-2- मूढ़ (Listless,foolish)

7-3-विक्षिप्त (Distracted)

7-4-एकाग्र (Focused/One pointed)

7-5-निरुद्ध(Absorbed/Mastered))

7-1-क्षिप्त(Agitated) ;-

जीवात्मा जिस अवस्था में चित्त को विविध विषयों में तीव्रता से चलाता है उस अवस्था को चित्त की क्षिप्त अवस्था कहते हैं !उस अवस्था में, जो कार्य हानिकारक होते हैं, उन कार्यों को भी वह कर बैठता है !इस अवस्था में रजोगुण कि प्रधानता होती है !

7-2-मूढ़(Listless); -

निद्रा , तन्द्रा ,आलस्य , मूर्छा आदि अवस्थाओं में जीवात्मा को जब विशेष ज्ञान नहीं होता अथवा विशेष ज्ञान नहीं कर पाता उसको मूढ़ अवस्था कहते हैं !इस अवस्था में सत्त्व एवं रजोगुण अप्रधान रहते हैं ,तमोगुण प्रधान रहता है !

7-3-विक्षिप्त(Distracted); -

जिस अवस्था में मनुष्य किसी विशेष विषय पर अपने चित्त को एकाग्र करने का प्रयास करता है तो चित्त में कुछ एकाग्रता आती है !परन्तु वह स्थिति किसी बाधक कारण से भंग हो जाती है, उसको विक्षिप्त अवस्था कहते हैं !

7-4-एकाग्र(Focused/One pointed); -

जिस अवस्था में योगाभ्यासी विवेक, वैराग्य, और अभ्यास से अपने चित्त को योग के लिए अपेक्षित किसी एक विषय में अधिकारपूर्वक बहुत काल तक स्थिर कर लेता है, उसको एकाग्र कहते हैं !

7-5-निरुद्ध(Absorbed/Mastered)); -

जिस अवस्था में योगाभ्यासी सम्प्रज्ञात समाधि कि ऊँची अवस्था को प्राप्त कर लेता है तो उसको उसमे भी दोष दिखाई देने लग जाते हैं ;उन दोषों के कारण परवैराग्य उत्पन्न होता है! उस अवस्था में चित्त की समस्त वृतियों का निरोध हो जाता है!इसको निरुद्ध अवस्था

कहते हैं !

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योग दर्शन IN NUTSHELL;-

योगदर्शन के चार पाद है और 195 सूत्र है।समाधिपाद में यह बतलाया गया है कि योग के उद्देश्य और लक्षण क्या हैं और उसका साधन किस प्रकार होता है। साधनपाद में क्लेश, कर्मविपाक और कर्मफल आदि का विवेचन है। विभूतिपाद में यह बतलाया गया है कि योग के अंग क्या हैं, उसका परिणाम क्या होता है और उसके द्वारा अणिमा, महिमा आदि सिद्धियों की किस प्रकार प्राप्ति होती है।कैवल्यपाद में कैवल्य या मोक्ष का विवेचन किया गया है।

1-समाधिपाद

2-साधनपाद

3-विभूतिपाद

4-केवल्यपाद

1-समाधिपाद; –

03 FACTS;-

`1-इसमें समाहितचित्त वाले सबसे उत्तम अधिकारियों के लिए योग का वर्णन किया गया है।समाधिपाद में 51सूत्र है।

सारा समाधिपाद एक प्रकार से निम्न तीन सूत्रों की विस्तृत व्याख्या है।

1-1- योग चित्त की वृत्तियों का रोकना है।"चित्तवृत्ति निरोध" को योग मानकर यम, नियम, आसन आदि योग का मूलसिद्धांत उपस्थित किये गये हैं।

1-2- वृत्तियों का निरोध होने पर द्रष्टा के स्वरुप में अवस्थिति होती है।

1-3- स्वरूपावस्थिति से अतिरिक्त अवस्था में द्रष्टा वृत्ति के समान रूप वाला प्रतीत होता है।

2-चित्त, बुद्धि, मन, अन्तःकरण लगभग पर्यायवाचक समानार्थक शब्द है। जिनका भिन्न – भिन्न दर्शनकारों ने अपनी अपनी परिभाषा में प्रयोग किया

है।मन की चञ्चलता प्रसिद्ध है। सृष्टि के सारे कार्यों में मन की स्थिरता ही सफलता का कारण होती है। सृष्टि के महान पुरुषों की अद्भुत शक्तियों में उनके मन की एकाग्रता का रहस्य छिपा हुआ होता है।योग के अन्तर्गत

मन को दो प्रकार से रोकना होता है – एक तो केवल एक विषय में लगातार इस प्रकार लगाए रखना कि दूसरा विचार न आने पावे, इसको एकाग्रता अथवा सम्प्रज्ञात समाधि कहते है जिसके चार भेद है।

2- 1- वितर्क – किसी स्थूल विषय में चित्तवृत्ति की एकाग्रता।

2- 2- विचार – किसी सुक्ष्म विषय में चित्तवृत्ति की एकाग्रता।

2- 3- आनन्द – अहंकार विषय में चित्तवृत्ति की एकाग्रता।

2- 4- अस्मिता – अहंकार रहित अस्मिता विषय में चित्तवृत्ति की एकाग्रता।

3 -इसकी सबसे ऊँची अवस्था विवेक ख्याति है, जिसमे चित्त का आत्माध्यास छूट जाता है और उसके द्वारा आत्मस्वरूप का उससे पृथक रूप में साक्षात्कार होता है, किन्तु योग दर्शन में इसको वास्तविक आत्मा स्थिति नहीं बतलाया गया है। यह भी चित्त की एक वृत्ति अथवा मन का ही एक विषय है (एक उच्चत्तम सात्त्विक वृत्ति), किन्तु इसका निरन्तर अभ्यास वास्तविक स्वरूपस्थिति में सहायक होता है। निरोध अपने स्वरुप का सर्वथा नाश हो जाना नहीं है, किन्तु जड़ तत्त्व के अविकेकपूर्ण संयोग का चेतन तत्त्व से सर्वथा नाश हो जाना है। इस संयोग के न रहने पर द्रष्टा की शुद्ध परमात्मा स्वरुप में अवस्थिति होती है।

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2-साधनपाद ;–

इसमें विक्षिप्त चित्तवाले मध्यम अधिकारियों के लिए योग का साधन बतलाया गया है।साधनपाद में 55 सूत्र है।

05 FACTS;-

1-सर्वबन्धनों और दुःखों के मूल कारण पांच क्लेश है –अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश।

2-क्लेशों से कर्म की वासनाएँ उत्पन्न होती है।

3-कर्म वासनाओं से जन्म रूप वृक्ष उत्पन्न होता है।

4-उस वृक्ष में तात्विक तीन एलिमेंट , आयु और भोग रुपी तीन प्रकार के फल लगते है।

5-इन तीन फलों से सुख – दुःख रुपी दो प्रकार का स्वाद होता है।

जो पुण्य कर्म (हिंसा रहित कूसरे के कल्याणार्थ) किये जाते है उनसे आयु

और भोग में सुख मिलता है।जो पाप कर्म (हिंसात्मक दूसरों को दुःख पहुंचाने की लिए) किये जाते हैं उनसे आयु और भोग में दुःख पहुँचता है।

किन्तु यह सुख भी तत्त्ववेत्ता की दृष्टि में दुःखस्वरूप ही है ; क्योंकि विषयों में परिणाम दुःख, ताप दुःख और संस्कार दुःख मिला हुआ होता है ;और तीनों गुणों के सदा अस्थिर रहने के कारण उनकी सुख – दुःख और मोह रुपी वृत्तियाँ भी बदलती रहती है।इसलिए सुख के पीछे दुःख का होना आवश्यक है।दुःख के नितांत अभाव का उपाय निर्मल,सबसे ऊँची अवस्थावाली प्रज्ञा.. विवेक ख्याति है।

विवेकख्याति के सात प्रकार;-

07 POINTS;-

(1) जो कुछ जानना था जान लिया (दुःख का कारण) – अब कुछ जानने योग्य नहीं रहा। अर्थात जितना गुणमय दृश्य है वह सब परिणाम, ताप और संस्कार दुःखों से दुःख स्वरुप ही है। इसलिए ‘हेय’ है।

(2) जो कुछ करना था दूर कर दिया (– अब कुछ दूर करने योग्य नहीं रहा। अर्थात द्रष्टा और दृश्य का संयोग जो ‘ हेय हेतु ‘ है वह दूर कर दिया।

(3) जो कुछ साक्षात करना था कर लिया, अब कुछ साक्षात करने योग्य नहीं रहा। अर्थात निरोध समाधि द्वारा ‘ हान ‘ को साक्षात कर लिया।

(4) जो कुछ करना था कर लिया। अब कुछ करने योग्य नहीं रहा। अर्थात अविप्लव विवेक – ख्याति सम्पादन कर लिया।

(5) चित्त ने अपने भोग अपवर्ग दिलाने का अधिकार पूरा कर दिया, अब कोई अधिकार शेष नहीं रहा।

(6) चित्त के गुण अपने भोग अपवर्ग का प्रयोजन सिद्ध करके अपने कारण में लीं हो रहे है।

(7) गुणों से पर हो कर शुद्ध परमात्मा अवस्थिति हो रही है।

योग के आठ अंग(अष्टांग योग);-

02 FACTS;-

1-महर्षि पतञ्जलि ने योग को 'चित्त की वृत्तियों के निरोध' के रूप में परिभाषित किया है। योगसूत्र में उन्होंने पूर्ण कल्याण तथा शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शुद्धि के लिए आठ अंगों वाले योग का एक मार्ग विस्तार से बताया है।अष्टांग, आठ अंगों वाले, योग को आठ अलग-अलग चरणों वाला मार्ग नहीं समझना चाहिए; यह आठ आयामों वाला मार्ग है जिसमें आठों आयामों का अभ्यास एक साथ किया जाता है।

2-निर्मल विवेक ख्याति जिसे ‘हान’ का उपाय बतलाया है उसकी उत्पत्ति का साधन अष्टांग योग है। योग के आठ अंग –यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि है।साधनपाद में योग के पाँच बहिरंग साधन बतलाये गएहै...यम, नियम, आसान, प्राणायाम, प्रत्याहार।विभूतिपाद में उसके अन्तरंग

साधन बतलाये गए है...धारणा, ध्यान, समाधि।

संक्षेप में अष्टांग योग;-

08 POINTS;-

1-यम : पांच सामाजिक नैतिकता

1-1- अहिंसा - शब्दों से, विचारों से और कर्मों से किसी को हानि नहीं पहुँचाना

1-2-सत्य - विचारों में सत्यता, परम-सत्य में स्थित रहना

1-3-अस्तेय - चोर-प्रवृति का न होना

1-4- ब्रह्मचर्य - दो अर्थ हैं:

(क) चेतना को ब्रह्म के ज्ञान में स्थिर करना

ख) सभी इन्द्रिय-जनित सुखों में संयम बरतना

1-5- अपरिग्रह - आवश्यकता से अधिक संचय नहीं करना और दूसरों की वस्तुओं की इच्छा नहीं करना

2-नियम: पाँच व्यक्तिगत नैतिकता

2-1-शौच - शरीर और मन की शुद्धि

2- 2-(संतोष - संतुष्ट और प्रसन्न रहना

2- 3- तप - स्वयं से अनुशासित रहना

2- 4- स्वाध्याय - आत्मचिंतन करना

2- 5- ईश्वर-प्रणिधान - ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण, पूर्ण श्रद्धा

3-आसन: योगासनों द्वारा शारीरिक नियंत्रण

4-प्राणायाम: श्वास-लेने सम्बन्धी खास तकनीकों द्वारा प्राण पर नियंत्रण

5-प्रत्याहार: इन्द्रियों को अंतर्मुखी करना

6-धारणा: एकाग्रचित्त होना

7-ध्यान: निरंतर ध्यान

8-समाधि: आत्मा से जुड़ना, शब्दों से परे परम-चैतन्य की अवस्था

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3-विभूतिपाद ;–

02 FACTS;-

1-धारणा, ध्यान और समाधि – तीनो मिलकर संयम कहाते है।विभूतिपाद में 55 सूत्र है। इस संयम के विनियोग से नाना प्रकार की सिद्धियां प्राप्त हो सकती है। ये सिद्धियां – श्रद्धालुओं के योग में श्रद्धा बढ़ाने में और विक्षिप्त (असमाहित) चित्त वालों के चित्त को एकाग्र करने में सहायक होती है, किन्तु इन्समे आसक्ति नहीं होनी चाहिए।

2-योगमार्ग पर चलने वाले के लिए नाना प्रकार के प्रलोभन आते है। अभ्यासी को उनसे सावधान रहना चाहिए, उसमे फँसने से और घमंड से बचे रहना चाहिए। स्थान वालों के आदर भाव करने पर लगाव और अभिमान नहीं करना चाहिए। चित्त और पुरुष के भेद जानने वाला सारे भावों के अधिष्ठातृत्त्व और सर्वज्ञातृत्त्व को प्राप्त होता है।किन्तु योगी को उनमे भी अनासक्त रह कर अपने असली ध्येय की ओर बढ़ना चाहिए।उसमे भी वैराग्य होने पर, दोषों का बीज क्षय होने पर, कैवल्य होता है।

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4-कैवल्यपाद ;–

इसमें चित्त और चित्त के सम्बन्ध में जो जो शंकाएँ हो सकती है,उनका युक्ति पूर्वक निवारण किया है।केवल्यपाद में 34 सूत्र है

चित्त की नौ अवस्थाएँ है...

09 POINTS;-

(1) जाग्रत अवस्था; –

एयर एलिमेंट/सत्त्व गुण गौणरूप से दबा रहता है। वॉटर एलिमेंट/तम, सत्त्व को वृत्ति के यथार्त रूप के दिखलाने से रोकता है।फायर एलिमेंट/रज प्रधान हो कर चित्त को इन्द्रियों द्वारा बाह्य विषयों में विषयासक्त(Sensual) करने में समर्थ होता है।

(2) स्वप्नावस्था ;–

एयर एलिमेंट/सत्त्व गुण, गौणतर रूप से दबा रहता है। वॉटर एलिमेंट/तम, फायर एलिमेंट/रज को इतना दबा लेता है कि वह चित्त को इन्द्रियों द्वारा बाह्य विषयों में विषयासक्त नहीं कर सकता है। किन्तु फायर एलिमेंट/रज की क्रिया सूक्ष्म रूप से होती रहती है, जिससे वह चित्त को मन द्वारा स्मृति के संस्कारों में विषयासक्त करने में समर्थ रहता है।

(3) सुषुप्ति अवस्था; –

एयर एलिमेंट/सत्त्व गुण, गौणतम रूप से दब जाता है।वॉटर एलिमेंट/ तमोगुण, फायर एलिमेंट/रजोगुण की स्वप्नावस्था वाली क्रियाओं को भी रोक कर प्रधान रूप से चित्त पर फ़ैल जाता है। इसलिए किसी विषय का किसी प्रकार भी ज्ञान नहीं रहता परन्तु किसी विषय के ज्ञान न होने की प्रतीति होती रहती है, अर्थात फायर एलिमेंट/रज का नितांत आभाव नहीं होता, वह कुछ अंश में बना ही रहता है।

(4) प्रलयावस्था ;–

प्रलय में चित्त के अवस्था सुषुप्ति जैसी होती है, केवल भेद इतना है कि प्रलय में समष्टि चित्त की सुषुप्ति है ; जबकि चित्त की सुषुप्ति ..व्यष्टि में जीव गहरी निद्रा जैसी अवस्था में रहता है।

(5) समाधि प्रारम्भ अवस्था; –

वॉटर एलिमेंट/ तमोगुण गौणरूप से रहता है। फायर एलिमेंट/रजो गुण को चित्त को चलायमान करने की क्रिया निर्बल होती है।एयर एलिमेंट/ सत्त्व गुण प्रधान हो कर चित्त को एकाग्र करने और वास्तु को यथार्त रूप को दिखलाने में समर्थ होता है।

(6) सम्प्रज्ञात समाधि (एकाग्रता) ;–

जिस अवस्था में ध्येय का रूप प्रत्यक्ष रहता हो, उसे संप्रज्ञात कहते हैं।वॉटर एलिमेंट/ तमोगुण गौणतर रूप में दबा रहता है।एयर एलिमेंट/ सत्त्व गुण ..फायर एलिमेंट/रजोगुण को दबा कर प्रधानरूप से अपना प्रकाश करता है, जिससे चित्त वास्तु के तदाकार हो कर उसका यथार्त रूप दिखलाने में समर्थ होता है। स्थूल शरीर में कार्य बंद हो कर सूक्ष्म शरीर में एकाग्र वृत्ति रहती है।

(7) विवेकख्याति ;–

विवेकख्याति सम्प्रज्ञात समाधि और असम्प्रज्ञात समाधि के बीच की अवस्था है।वॉटर एलिमेंट/ तमो गुण गौणतम रूप में नाम मात्र रहता है।एयर एलिमेंट/ सतत गुण का प्रकाश पूर्णतया फ़ैल जाता है।फायर एलिमेंट/ रजोगुण केवल इतना रहता है कि जिससे, पुरुष को चित्त से भिन्न दिखलाने की क्रिया हो सके और वॉटर एलिमेंट/ तम इस वृत्ति को रोकने मात्र रह जाता है।

(8) असम्प्रज्ञात समाधि (स्वरूपवास्थि) ;–

असंप्रज्ञात उस अवस्था को कहते हैं, जिसमें किसी प्रकार की वृत्ति का उदय नहीं होता अर्थात् ज्ञाता और ज्ञेय का भेद नहीं रह जाता, संस्कारमात्र बच रहता है। यही योग की चरम भूमि मानी जाती है और इसकी सिद्धि हो जाने पर मोक्ष प्राप्त होता है।एयर एलिमेंट/ सत्त्व चित्त में बाहर से तीनों गुणों का वृत्ति रूप परिणाम होना बंद हो जाता है।चित्त में केवल निरोध परिणाम अर्थात संस्कार शेष रहते है, जिनके दुर्बल होने पर उसे फिर व्युत्थान दशा(Inverse/reverse condition) में आना पड़ता है।

(9) प्रतिप्रसव; –

चित्त को बनाने वाले गुणों की अपने कारणों में लीन होने की अवस्था। चित्त में निरोध परिणाम अर्थात संस्कार भी निवृत्त हो जाते है और पुरुष शुद्ध कैवल्य परमात्मा स्वरुप में अवस्थित हो जाता है।इनको चित्त की

क्षिप्त-विक्षिप्त आदि पाँच भूमियों के विषय से पृथक समझना चाहिए।

....SHIVOHAM...