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संक्षेप में पूर्व मीमांसा,उत्तर मीमांसा, और वैशेषिक दर्शन ...PART-02


षड्दर्शन;-

04 FACTS;-

1-षड्दर्शन उन भारतीय दार्शनिक एवं धार्मिक विचारों के मंथन का परिपक्व परिणाम है जो हजारों वर्षो के चिन्तन से उतरा और हिन्दू (वैदिक) दर्शन के नाम से प्रचलित हुआ। इन्हें आस्तिक दर्शन भी कहा जाता है।भारतीय चिन्तन-परम्परा में न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदान्त प्रभृति छ: आस्तिक दर्शनों और चार्वाक, बौद्ध, जैन इन तीन नास्तिक दर्शनों का अपना-अपना स्थान व महत्त्व रहा है।सांख्य में त्रिविध दु:खों की निवृत्ति को, योग में चित्तवृत्ति के निरोध को, मीमांसा में धर्म की जिज्ञासा को और वेदान्त में ब्रह्म की जिज्ञासा को नि:श्रेयस ब्रह्म का साधन बताया गया है। जबकि वैशेषिक में पदार्थों के तत्त्वज्ञानरूपी धर्म अर्थात् उनके सामान्य और विशिष्ट रूपों के विश्लेषण से लोकधर्मिता तथा वैज्ञानिकता को भी साध्य माना गया है।यही कारण है कि न्याय-वैशेषिक को व्याकरण के समान अन्य शास्त्रों के ज्ञान का भी प्रदीप कहा गया है।दर्शन और उनके प्रणेता निम्नलिखित है ... 1-1-पूर्व मीमांसा: महिर्ष जैमिनी 1-2-वेदान्त (उत्तर मीमांसा): महिर्ष बादरायण 1-3-सांख्य: महिर्ष कपिल 1-4-वैशेषिक: महिर्ष कणाद 1-5-न्याय: महिर्ष गौतम 1-6-योग: महिर्ष पतंजलि

2-इस संसार में छह प्रकार के लोग होते हैं; इसीलिए 6 प्रकार के कांसेप्ट बनाए गए हैं।हमें इन सभी कांसेप्ट को स्वीकार करना होगा।इसमें कोई भी दर्शन गलत नहीं है;सभी सही है।लेकिन यह 6 कांसेप्ट वही समझ सकता है;जो शिवत्व जानता है।समान रूप से 6 कांसेप्ट समझने वाला ही शिव को समझ सकता है या छह कांसेप्ट को समझ कर

शिव को समझ सकता है।दोनों एक ही बात है।परंतु संसार के लोग एक ही दर्शन में फंस जाते हैं।कोई दो दर्शन में तो कोई तीन दर्शन में फंस जाते हैं।परंतु हम यह नहीं समझते कोई भी दर्शन गलत नहीं;केवल एक ही बात को समझने के 6 दृष्टिकोण है।जब तक हम इन 6 दर्शन को नहीं समझेंगे। तो हम शिवत्व को भी नहीं समझ सकते।

3-सरल भाषा में हम यह कह सकते हैं; छह प्रकार के दर्शन ही छह प्रकार के लोगो के 6 कांसेप्ट हैं और सभी सही है।उदाहरण के लिए 6 लोगों की आंखों में पट्टी बांधकर एक हाथी के पास खड़ा कर दिया गया और पूछा गया कि बताओ हाथी कैसा है। एक का हाथ हाथी की पूंछ पर पड़ा तो उसने कहा हाथी मुलायम, रोएदार है। दूसरे का हाथ हाथी की पीठ पर पड़ा तो उसने कहा हाथी चिकना लेकिन हड्डीदार है। तीसरे का हाथ हाथी की सूड़ पर पड़ा। तो उसने कहा कि वह सिलवटदार है। चौथे का हाथ हाथी के दांत पर पड़ा तो उसने कहा,हाथी बहुत कठोर है। इसी प्रकार से 6 लोगों ने अपना -अपना वर्णन किया। तो क्या 6 लोगों का वर्णन गलत है?

4-वास्तव में,वर्णन गलत नहीं है लेकिन 6 लोगों का वर्णन मिलकर ही पूर्ण वर्णन है।अगर एक की ही बात मानेंगे या तीन की भी बात मानेंगे तो वर्णन अधूरा ही रहेगा।इसे हम निम्नलिखित प्रकार से भी समझ सकते हैं ...

4-1-पहला दर्शन है...धरती और आकाश दिख रहा है;परन्तु धरती-आकाश कितने दूर हैं, कभी एक नहीं हो सकते।

4-2-दूसरा दर्शन है...धरती-आकाश कितने जुड़े हुए हैं, कभी अलग नहीं हो सकते।

4-3-तीसरा दर्शन है...आकाश-धरती को प्रेरणा देता है।इसी में सारा न्याय दर्शन आ जाता है।आकाश प्रेरणा दे रहा कि तुमको कैसा होना चाहिए, क्या करना चाहिए।परमात्मा आकाश सदृश्य ही है।

4-4-चौथा दर्शन है...धरती का उद्देश्य है आकाश को प्राप्त करना।भक्त धरती सदृश्य ही है।जिसका उद्देश्य है परमात्मा तक पहुंचना।

4-5-पांचवा दर्शन है...केवल आकाश ही आकाश है। पृथ्वी का कोई अस्तित्व नहीं है।केवल ब्रह्य ही ब्रह्य है ;माया का कोई अस्तित्व नहीं है।

4-6-छठवां दर्शन है...जितनी सत्यता है वह सब केवल पृथ्वी में हीं है।पृथ्वी का हीं अस्तित्व है।इसमें आकाश की कोई सत्ता नहीं है।केवल माया ही माया है; ब्रह्य का कोई अस्तित्व नहीं है।

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1-पूर्व मीमांसा;-

05 FACTS;-

1-मीमांसा शब्द का अर्थ है 'जिज्ञासा'। जिज्ञासा अर्थात् जानने की लालसा।अत: पूर्व-मीमांसा शब्द का अर्थ है जानने की प्रथम जिज्ञासा। इसके सोलह अध्याय हैं।मनुष्य जब इस संसार में अवतरित हुआ उसकी प्रथम जिज्ञासा यही रही थी कि वह क्या करे? अतएव इस दर्शनशास्त्र का प्रथम सूत्र मनुष्य की इस इच्छा का प्रतीक है।इस दर्शन के प्रवर्तक महिर्ष जैमिनी है;जिन्हे महर्षि वेद व्यास का शिष्य माना जाता है।मीमांसासूत्र काे 'पूर्वमीमांसा' तथा वेदान्त काे 'उत्तरमीमांसा' भी कहा जाता है। 'पूर्वमीमांसा में धर्म का विचार है और उत्तरमीमांसा में ब्रह्म का।

2-मीमांसा शास्त्र में यज्ञों का विस्तृत विवेचन है, इससे इसे 'यज्ञविद्या' भी कहते हैं । बारह अध्यायों में विभक्त होने के कारण यह मीमांसा 'द्वादशलक्षणी' भी कहलाती है। इस शास्त्र का 'पूर्वमीमांसा' नाम इस अभिप्राय से है कि कर्मकाण्ड मनुष्य का प्रथम धर्म है, ज्ञानकाण्ड का अधिकार उसके उपरान्त आता है । इस ग्रन्थ में 12 अध्याय, 60 पाद और 2,631 सूत्र है। ग्रन्थ का आरम्भ ही महिर्ष जैमिनि ''अथातो धर्मजिज्ञासा”– 'अब धर्म (करने योग्य कर्म) के जानने की लालसा है।'-- से करते है- यह मीमांसा दर्शन का प्रथम सूत्र है। अर्थात् धर्म ही इस का मुख्य प्रतिपाद्य है जिसका निर्देश कर्म,यज्ञ, होम आदि अनेक शब्दों से होता है।

3-इसके दूसरे सूत्र में कहा गया है-

''चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः''---वेद में जिसकी प्रेरणा की गयी है, वह पदार्थ धर्म है। अर्थात् वेद में लिखे अनुसार कर्म करना धर्म है और उसमें निषेध किये हुए कर्म का न करना भी धर्म है।

मीमांसा का तत्वसिद्धान्त विलक्षण है । इसकी गणना अनीश्वरवादी दर्शनों में है।आत्मा, ब्रह्म,जगत् आदि का विवेचन इसमें नहीं है। यह केवल वेद वा उसके शब्द की नित्यता का ही प्रतिपादन करता है। इसके अनुसार मन्त्र ही सब कुछ हैं। वे ही देवता हैं; देवताओं की अलग कोई सत्ता नहीं। फल की प्राप्ति कर्म द्वारा ही होती हैं अतः वे कहते हैं कि कर्म और उसके प्रतिपादक वचनों के अतिरिक्त ऊपर से और किसी देवता या ईश्वर को मानने की क्या आवश्यकता है। मीमांसकों और न्यायिकों में बड़ा भारी भेद यह है कि मीमांसक शब्द को नित्य..नष्ट न होनेवाला मानते हैं और न्यायिक अनित्य ।

4-सांख्य और मीमांसा दोनों अनीश्वरवादी हैं, पर वेद की प्रामाणिकता दोनों मानते हैं ।भेद इतना ही है कि सांख्य प्रत्येक कल्प में वेद का नवीन प्रकाशन मानता है और मीमांसक उसे नित्य अर्थात् कल्पान्त में भी नष्ट न होनेवाला कहते हैं।-यहाँ हम इस ग्रन्थ की मात्र झलक

भी देने में असमर्थ हैं। केवल इतना जानना ही पर्याप्त है कि धर्म की व्याख्या यजुर्वेद में की गयी है। वेद के प्रारम्भ में ही यज्ञ की महिमा का वर्णन है। वैदिक परिपाटी में यज्ञ का अर्थ देव-यज्ञ ही नहीं है, वरन् इसमें मनुष्य के प्रत्येक प्रकार के कार्यो का समावेश हो जाता है।उदाहरण के लिए बढ़ई जब वृक्ष की लकड़ी से कुर्सी अथवामेज बनाता है तो वह यज्ञ ही करता

है।वृक्ष का तना जो मूल रूप में ईधन के अतिरिक्त, किसी भी उपयोगी काम का नहीं होता, उसे बढ़ई ने उपकारी रूप देकर मानव का कल्याण किया है।अत: बढ़ई का कार्य यज्ञरूप ही है। 4-एक अन्य उदाहरण ले सकते हैं। कच्चे लौह को लेकर योग्य वैज्ञानिक और कुशल शिल्पी एक सुन्दर कपड़ा सीने की मशीन बना देते हैं। इस कार्य से मानव का कल्याण हुआ। इस कारण यह भी यज्ञरूप है।सभी प्रकार के कर्मों की व्याख्या इस दर्शन शास्त्र में है।ज्ञान उपलब्धि के जिन छह साधनों की चर्चा इसमें की गई है, वे है-प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति और अनुपलब्धि। मीमांसा दर्शन के अनुसार वेद अपौरूषेय, नित्य एवं सर्वोपरि है और वेद-प्रतिपादित अर्थ को ही धर्म कहा गया है।मीमांसा सिद्धान्त में वक्तव्य के दो विभाग है- पहला है अपरिहार्य विधि जिसमें उत्पत्ति, विनियोग, प्रयोग और अधिकार विधियां शामिल है। दूसरा विभाग है अर्थवाद जिसमें स्तुति और व्याख्या की प्रधानता है।।इस ग्रन्थ में ज्ञान-उपलब्धि के जिन छह साधनों की चर्चा की गई है, वे है- प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान ,शब्द, अर्थापत्ति और अनुपलब्धि।

5-मीमांसा दर्शन 16 अध्यायों का है, जिसमें 12 अध्याय क्रमबद्ध हैं। इन बारह अध्यायों में जो छूट गया है, उसका वर्णन शेष चार अध्यायों में किया गया है जो 'संकर्षकाण्ड' के नाम से प्रसिद्ध है। उसमें देवता के अधिकार का विवेचन किया गया है, अत: उसे 'देवता काण्ड' भी कहते हैं ...

(1) इस दर्शन के प्रथमाध्याय में धर्मप्रमाणों का निरूपण किया गया है और विधि, अर्थवाद मंत्र, स्मृति, शिष्टाचार, नामधेय, संदिग्धार्थ निर्णायक वाक्यशेष और सामर्थ्य का निरूपण किया गया है।

(2) द्वितीयाध्याय में शब्दांतर, अभ्यास, संख्या, संज्ञा, गुण और प्रकरणांतर, ये छह कर्म भेद के प्रमाण हैं।

(3) तृतीयाध्याय में श्रुति, लिंग, वाक्य, प्रकरण, स्थान और समाख्या ये छ: विनियोजक (अंगता बोधक) प्रमाण हैं।

(4) चतुर्थाध्याय में, श्रुति अर्थ, पाठ, स्थान, मुख्य और प्रवृत्ति में छह बोधक प्रमाण हैं।

(5) पंचमाध्याय में अतिदेश, प्रत्यक्षवचनातिदेश, नामातिदेश, कल्पित वचनातिदेश, आश्रयातिदेश और स्थानापत्ति अतिदेश ये सात प्रकार के अतिदेश हैं। अंत के दो भेद सप्तम अध्याय में वर्णित नहीं हैं। ये इंद्रिय कामाधिकरण तथा स्थानापत्ति अतिदेश में निरूपित हैं।

(6) छठे अध्याय में यज्ञों के करने और करानेवालों के अधिकार का निर्णय है।

(7) सातवें और आठवें में एक यज्ञ की विधि को दूसरे यज्ञ में करने का वर्णन है।

(8) आठवें अध्याय में एक यज्ञ की विधि को दूसरे यज्ञ में करने का वर्णन है।

(9) नवम अध्याय में तीन प्रकार के "ऊह" का निरूपण है (मंत्रोह, सामोह, संस्कारोह)।

(10) दशमाध्याय में तीन प्रकार के 'बाध' (अर्थलोप, प्रत्याम्नाय, प्रतिषेध ) का निरूपण है।

( 11) एकादशाध्याय में तंत्र और आवाय का निरूपण है।

( 12) द्वादशाध्याय में "प्रसंग" का निरूपण है।

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2-ब्रह्यसूत्र (उत्तर मीमांसा);-

04 FACTS;-

1-ब्रह्मसूत्र के प्रवर्तक महिर्ष बादरायण है।इसमें विशेष विषय ब्रह्म और उसके स्वरूप की मीमांसा है, जबकि पूर्वमीमांसा का विषय यज्ञ और धार्मिक कृत्य हैं। इस दर्शन में चार अध्याय, प्रत्येक अध्याय में चार-चार पाद (कुल 16 पाद) और सूत्रों की संख्या 555 है।इसमें बताया गया है कि तीन ब्रह्य अर्थात् मूल पदार्थ है-प्रकृति,जीवात्मा और परमात्मा। तीनों अनादि है। इनका आदि-अन्त नहीं। तीनों ब्रह्य कहाते है और जिसमें ये तीनो विद्यमान है अर्थात् जगत् वह परम ब्रह्य है।परमात्मा तत्वों से संयुक्त होकर भासता है, परन्तु उसका अपना शुद्ध रूप नेति-नेति शब्दों से ही व्यक्त होता है।यह दर्शन भी वेद के कहे मन्त्रों की व्याख्या में ही है।

2-जब मनुष्य जीवन-यापन करने लगता है तो उसके मन में दूसरी जिज्ञासा जो उठती है, वह है ब्रह्य -जिज्ञासा। ब्रह्यसूत्र का प्रथम सूत्र ही है-''अथातो ब्रह्यजिज्ञासा''।।--ब्रह्य के जानने की

लालसा।ब्रह्य की जिज्ञासा करने वाला यह जानने चाहते हैं कि `यह सब क्या है, क्यों हैं?जगत क्यों उत्पन्न हुआ ?इस जगत का कारण क्या है ? हम कहाँ से उत्पन्न है? कहाँ स्थित है? यह सुख-दु:ख क्यों होता है? इत्यादि।पहली जिज्ञासा कर्म धर्म की जिज्ञासा थी और दूसरी जिज्ञासा जगत् का मूल कारण जानने अथार्त ज्ञान की थी।इस दूसरी जिज्ञासा का उत्तर ही ब्रह्यसूत्र अर्थात् उत्तर मीमांसा है। चूँकि यह दर्शन वेद के परम ओर अन्तिम तात्पर्य का दिग्दर्शन कराता है, इसलिए इसे वेदान्त दर्शन के नाम से ही जाना जाता हैं ।यह वेद के अन्तिम ध्येय ओर कार्य क्षेत्र की शिक्षा देता है। 3-प्रकृति जो जगत् का उपादान कारण है, परमाणुरूप है जो त्रिट (तीन शक्तियो-सत्व, राजस् और तमस् का गुट) है। इन तीनो अनादि पदार्थों का वर्णन ब्रह्यसूत्र(उत्तर मीमांसा) में है। जीवात्मा का वर्णन करते हुए इसके जन्म-मरण के बन्धन में आने का वर्णन भी ब्रह्यसूत्र में है। साथ ही मरण-जन्म से छुटकारा पाने का भी वर्णन है।उत्तरमीमांसा का सबसे विशेष दार्शनिक सिद्धान्त यह है कि जड़ जगत का उपादान और निमित्त कारण चेतन ब्रह्म है।उदाहरण के लिए सोना गहने का उपादान/मूल कारण है ; सुनार गहना निर्माण प्रक्रिया का निमित्त कारण है क्योकि उसकी क्रिया से ही गहना निर्मित होता है ।जैसे मकड़ी अपने भीतर से ही जाल तानती है, वैसे ही ब्रह्म भी इस जगत्‌ को अपनी ही शक्ति द्वारा उत्पन्न करता है। यही नहीं, वही इसका पालक है और वही इसका संहार भी करता है। जीव और ब्रह्म का तादात्म्य है और अनेक प्रकार के साधनों और उपासनाओं द्वारा वह ब्रह्म के साथ तादात्म्य का अनुभव करके जगत्‌ के कर्म जंजाल से और बारंबार के जीवन और मरण से मुक्त हो जाता है। मुक्तावस्था में परम आनन्द का अनुभव करता है।

4-उत्तरमीमांसा, 'शारीरिक मीमांसा' भी इस कारण कहलाता है कि इसमें शरीरधारी आत्मा के लिए उन साधनों और उपासनाओं का संकेत है जिनके द्वारा वह अपने ब्रह्मत्व का अनुभव कर

सकता है।समस्त ग्रंथ सूक्ष्म और दुरूह सूत्रों के रूप में होने के कारण इतना सरल नहीं है कि सब कोई उसका अर्थ और संगति समझ सकें। गुरु लोग इन सूत्रों के द्वारा अपने शिष्यों को उपनिषदों के विचार समझाया करते थे। कालांतर में उनका पूरा ज्ञान लुप्त हो गया और उनके ऊपर भाष्य लिखने की आवश्यकता पड़ी। सबसे प्राचीन भाष्य, जो इस समय प्रचलित और प्राप्य है, श्री शंकराचार्य का है। शंकर के पश्चात्‌ और आचार्यों ने भी अपने-अपने संप्रदाय के मतों की पुष्टि करने के लिए और अपने मतों के अनुरूप ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखे।श्री रामानुजाचार्य, श्री मध्वाचार्य, श्री निम्बार्काचार्य और श्री वल्लभाचार्य के भाष्य प्रख्यात हैं। इन सब आचार्यों के मत, कुछ अंशों में समान होते हुए भी, बहुत कुछ भिन्न हैं।

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3-वैशेषिक दर्शन;-

08 FACTS;-

1-वैशेषिक दर्शन के मूल प्रवर्तक ऋषि कणाद हैं। यह दर्शन न्याय दर्शन से बहुत साम्य रखता है किन्तु वास्तव में यह एक स्वतंत्र भौतिक विज्ञानवादी दर्शन है।

महर्षि कणाद ने आत्मदर्शन के विचारों को सूत्र रूप में लिखा।वे धान्य के कणों का संग्रह कर उसी को खाकर तपस्या करते थे। इसीलिए इन्हें "कणाद" या "कणभुक्" कहते थे। किसी का कहना है कि कण अर्थात् परमाणु तत्व का सूक्ष्म विचार इन्होंने किया है, इसलिए इन्हें "कणाद" कहते हैं। किसी का मत है कि दिन भर ये समाधि में रहते थे और रात्रि को कणों का संग्रह करते थे। यह वृत्ति "उल्लू" पक्षी की है। किसी का कहना है कि इनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ईश्वर ने उलूक पक्षी के रूप में इन्हें शास्त्र का उपदेश दिया। इन्हीं कारणों से यह दर्शन "औलूक्य", "काणाद", "वैशेषिक" या "पाशुपत" दर्शन के नामों से प्रसिद्ध है।

2-वैशेषिकों के स्वरूप, वेष तथा आचार आदि ' न्यायिकों' की तरह होते हैं; जैसे, ये लोग शैव हैं, इन्हें शैव-दीक्षा दी जाती थी। इनके चार प्रमुख भेद हैं - शैव, पाशुपत, महाव्रतधर, तथा कालमुख एवं भरट आदि गौण भेद भी मिलते हैं।वैशेषिक विशेष रूप से "पाशुपत्" कहे जाते हैं।वैशेषिक तथा न्याय दोनों दर्शन ही "समानतंत्र" हैं।व्यावहारिक जगत् को यह वास्तविक मानते हैं।ये बाह्य जगत् तथा अंतर्जगत् की अवधारणा में परात्पर एवं घनिष्ठ संबंध मानते हैं। बाह्य जगत् (मानसिक) विचार पर निर्भर नहीं है, यह स्वतंत्र है।प्रत्येक नित्य द्रव्य को परस्पर पृथक् करने के लिए तथा प्रत्येक तत्व के वास्तविक स्वरूप को पृथक्-पृथक् जानने के लिए इन्होंने एक "विशेष" नाम का पदार्थ माना है।

3-'आत्मदर्शन' के लिए विश्व की सभी छोटी-बड़ी, तात्विक तथा तुच्छ वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त करना सामान रूप से आवश्यक है। इन तत्वों के ज्ञान के लिए प्रमाणों की अपेक्षा होती है। न्यायशास्त्र में प्रमाण पर विशेष विचार किया गया है, किंतु वैशेषिक दर्शन में मुख्य रूप से 'प्रमेय' के विचार पर बल दिया गया है। न्याय की तरह वैशेषिक भी, लौकिक दृष्टि ही से विश्व के 'वास्तविक' तत्वों पर दार्शनिक विचार करता है। लौकिक जगत् की वास्तविक परिस्थितियों की उपेक्षा वह कभी नहीं करता है। किसी तत्व का विचार बिना सूक्ष्म दृष्टि के नहीं हो सकता; अतः परमाणु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा, मन आदि सत्ताओं का स्वीकार इस दर्शन में बराबर उपस्थित है।

4-अद्वैत वेदान्त में ब्रह्म को ही एकमात्र सत कहा गया है। बौद्धों ने सर्व शून्यं जैसे कथन किये, सांख्यों ने प्रकृति-पुरुष के विवेक की बात की। इस प्रकार इन सबने भौतिक जगत् के सामूहिक या सर्वसामान्य किसी एक तत्त्व को भौतिक जगत् से बाहर ढूँढ़ने का प्रयत्न किया। किन्तु वैशेषिकों ने न केवल समग्र ब्रह्माण्ड का, अपितु प्रत्येक पदार्थ का तत्त्व उसके ही अन्दर ढूँढ़ने का प्रयास किया और यह बताया कि प्रत्येक वस्तु का निजी वैशिष्ट्रय ही उसका तत्त्व या स्वरूप है और प्रत्येक वस्तु अपने आप में एक सत्ता है। इस मूल भावना के साथ ही वैशेषिकों ने दृश्यमान जगत की सभी वस्तुओं को छ: या सात वर्गों में समाहित करके वस्तुवादी दृष्टि से अपने मन्तव्य प्रस्तुत किये।

5-इन छ: या सात पदार्थों में सर्वप्रथम द्रव्य का उल्लेख किया गया है, क्योंकि उसको ही केन्द्रित करके अन्य पदार्थ अपनी सत्ता का भान कराते हैं। पहले तो वैशेषिकों ने छ: ही पदार्थ माने थे, पर बाद में उनको यह आभास हुआ कि वस्तुओं के भाव की तरह उनका अभाव भी वस्तुतत्त्व के निरूपण में सहायक होता है।अत: गुण, कर्म सामान्य विशेष के साथ-साथ अभाव का भी वैशेषिक पदार्थों में समावेश किया गया।वैशेषिक मत में समस्त विश्व "भाव और अभाव" इन दो विभागों में विभाजित है। इनमें "भाव" के छह विभाग किए गए हैं- जिनके नाम हैं - द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, तथा समवाय। अभाव के भी चार उप-भेद हैं - प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अत्यंताभाव तथा अन्योन्याभाव।

6-वैशेषिक सूत्रों की संख्या 370 है जो दस अध्यायों में विभक्त है |

6-1.प्रथम अध्याय के प्रथम आह्लिक में द्रव्य, गुण तथा कर्म के लक्षण तथा विभाग का तथा ‘सामान्य’ का ;

6-2./3. दूसरे तथा तीसरे में नौ द्रव्यों का ;

6-4. चौथे में परमाणुवाद का तथा अनिय्या द्रव्य विभाग का ;

6-5. पाँचवे में कर्म का

6-6. छठे में वेद – प्रामाण्य के विचार के बाद धर्म- अधर्म का ;

6-7./8. सातवे तथा आठवें में कतिपय गुणों का ;

6-9. नवें में अभाव तथा ज्ञान का ;

6-10. दसवें में सुख – दुःख – विभेद तथा विविध कारणों का वर्णन किया गया है |

7-सांख्य दर्शन में कपिल ने आत्मा के भेदों को स्वीकार किया, किन्तु उनको विशेष गुण वाला नहीं माना। वेदान्त तो आत्मा के भेद और गुणों को स्वीकार नहीं करता। अत: आत्मा के विशेष गुण और भेद स्वीकार करने से इस दर्शन को वैशेषिक कहा जाता है।मूल पदार्थ-परमात्मा,

जीवात्मा और प्रकृति का वर्णन तो ब्रह्यसूत्र में है तथा ये तीन ब्रह्य कहाते है। प्रकृति के रूपान्तर दो प्रकार के हैं ..महत् और अहंकार।तन्मात्रा (Senses)तो अव्यक्त है, इनका वर्णन सांख्य दर्शन में है। पंच महाभूत तथा महाभूतों से बने चराचर जगत् के सब पदार्थ व्यक्त पदार्थ कहलाते हैं। इनका वर्णन वैशेषिक दर्शन में है।चूंकि ये दर्शन परिमण्डल, पंच महाभूत और भूतों से बने सब पदार्थों का वर्णन करता है, इसलिए वैशेषिक दर्शन विज्ञान-मूलक है।

8-वैशेषिक दर्शन के प्रथम दो सूत्र है-''अथातो धर्म व्याख्यास्याम:।यतोSभ्युदयनि: श्रेयससिद्धि: स धर्म:।।''अथार्त अब हम धर्म की व्याख्या करेंगे।जिससे इहलौकिक और पारलौकिक (नि:श्रेयस) सुख की सिध्दि होती है वह धर्म है''।वैशेषिक दर्शन बहुत कुछ न्याय दर्शन के समरूप है और इसका लक्ष्य जीवन में सांसारिक वासनाओं को त्याग कर सुख प्राप्त करना और ईश्वर के गंभीर ज्ञान-प्राप्ति के द्वारा अंतत: मोक्ष प्राप्त करना है। न्याय-दर्शन की तरह वैशेषिक भी प्रश्नोत्तर के रूप में ही लिखा गया है।वैशेषिक दर्शन की गौतम के न्याय-दर्शन से भिन्नता इस बात में है कि इसमें छब्बीस के बजाय 7 ही तत्वों को विवेचन है। जिसमें विशेष पर अधिक बल दिया गया है।

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वैशेषिक दर्शन के मुख्य पदार्थ;-

वैशेषिक दर्शन में कणाद ने भौतिक राशियों को छ: वर्गों या 6 मूलभूत अमूर्त राशियों में निबद्ध किया है ...

07 FACTS;- 1.द्रव्य:-

02 POINTS;-

1-द्रव्य जिसमें "द्रव्यत्व जाति" हो वही द्रव्य है।द्रव्य गुणों का आश्रय है।द्रव्य गिनती में 9 है अर्थात् पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिशा, आत्मा और मन।इनमें से प्रथम चार द्रव्यों के नित्य और अनित्य, दो भेद हैं। चारों भूतों के उस हिस्से को "परमाणु" कहते हैं जिसका पुन: भाग न किया जा सके, अतएव यह नित्य है।नित्यरूप को "परमाणु" तथा अनित्य रूप को कार्य कहते हैं। पृथ्वी परमाणु के अतिरिक्त अन्य परमाणुओं के गुण भी नित्य है।जिससे गंध हो वह "पृथ्वी", जिसमें शीत स्पर्श हो वह "जल" जिसमें उष्ण स्पर्श हो वह "तेजस्", जिनमें रूप न हो और अशीत स्पर्श हो, वह "वायु", तथा शब्द जिसका गुण हो ;वह "आकाश" है। ये ही 'पंचभूत' भी कहलाते हैं।

2-आकाश, काल, दिक् तथा आत्मा ये चार "विभु" द्रव्य हैं। मनस् अभौतिक परमाणु है और

नित्य भी है।आज, कल, इस समय, उस समय, मास, वर्ष, आदि समय के व्यवहार का जो साधारण कारण है- वह काल है। काल नित्य और व्यापक है। पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, आदि दिशाओं तथा विदिशाओं का जो असाधारण कारण है, वह "दिक्" है। यह भी नित्य तथा व्यापक है। आत्मा और मनस् का स्वरूप यहाँ न्यायमत के समान ही है। 2. गुण:-

गुण द्रव्य ही में रहते हैं।गुणों की संख्या चौबीस मानी गयी है जिनमें कुछ सामान्य ओर बाकी विशेष कहलाते हैं। जिन गुणो से द्रव्यों में विखराव न हो उन्हें सामान्य(संख्या, वेग, आदि) और जिनसे बिखराव (रूप,बुध्दि, धर्म आदि) उन्हें विशेष गुण कहते है। 3. कर्म:-

किसी प्रयोजन को सिद्ध करने में कर्म की आवश्यकता होती है, इसलिए द्रव्य और गुण के साथ कर्म को भी मुख्य पदार्थ कहते हैं। चेलना,फेंकना, हिलना आदि सभी कर्म । मनुष्य के कर्म पुण्य-पाप रूप होते हैं। 4. सामान्य:-

मनुष्यों में मनुष्यत्व, वृक्षों में वृक्षत्व जाति सामान्य है और ये बहुतों में होती है। दिशा, काल आदि में जाति नहीं होती क्योंकि ये अपने आप में अकेली है। 5. विशेष:-

देश काल की भिन्नता के बाद भी एक दूसरे के बीच जो पदार्थ की विलक्षणता का भेद होता है वह उस द्रव्य में एक विशेष की उपस्थिति से होता है। उस पहचान या विलक्षण प्रतीति का एक निमित्त होता है-जैसे शर्करा में मिठास से। 6. समभाव:-

सम्बन्ध सदा दो में होता है , जैसे कुंडे और दही का संबंध है | इनमे दोनों एक दूसरे से अलग है | ऐसे संबंध को संयोग कहते है | जहाँ गुण व गुणी का संबंध इतना घना है कि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता ; वहाँ सम्बन्ध को समवाय कहते है, जैसे गुण – गुणी का सम्बन्ध | 7. अभाव:-

वैशेषिक आचार्यों ने छः भाव पदार्थों के अतिरिक्त ‘अभाव’ भी एक अलग पदार्ह निरूपण किया हैं |किसी वस्तु का न होना, उस वस्तु का "अभाव" कहा जाता है।किसी भी वस्तु की उत्पत्ति से पूर्व उसका अभाव अथवा किसी एक वस्तु में दूसरी वस्तु के गुणों का अभाव (ये घट नहीं, पट है) आदि इसके उदाहरण है।अभाव चार प्रकार का हैं –

1. किसी वास्तु की उत्पत्ति से पहले उसका अभाव ..."प्राग् अभाव"

2. नाश के पीछे उसका अभाव ..."प्रध्वंस अभाव"

3. किसी वास्तु का नितांत अभाव.. "अत्यंत अभाव"

4. एक वस्तु में दूसरी वस्तु का अभाव ..."अन्योन्य अभाव" हैं |

वैशेषिक दर्शन में छ: वर्गों का निर्देश;-

भौतिकी के अनुसार 'पदार्थ' को भौतिक राशि (physical quantity) के समतुल्य माना जा सकता है, जबकि वैशेषिक मान्यतानुसार पदार्थ में 'भूत' (Basic Matter) और आधिभौतिक (आत्मा और मन) से सम्बन्धित राशियाँ सम्मिलित होती हैं।इस हेतु ठोस, द्रव, ऊर्जा, गैस और प्लाज्मा 'भूत' हैं अथवा भिन्न-भिन्न अवस्थाओं के पदार्थ हैं, क्योंकि ये बहिरिन्द्रियों जैसे नाक, रसना, आँख, त्वचा और कान के द्वारा प्रत्यक्ष ग्राह्य हैं।अथवा यह कह सकते हैं कि इन्द्रियों से ग्राह्य विशेष गुणवान् पदार्थ भौतिक पदार्थ हैं।ये भौतिक पदार्थ दिशा और काल के साथ सांयोगिक सम्बन्ध रखते हैं। 'गुण' कर्म, सामान्य, विशेष, समभाव के साथ अनुभव करने योग्य सम्बन्ध रखते हैं। आत्मा और मन को, जो भूत पदार्थों के साथ सांयोगिक सम्बन्ध रखते हैं, को भौतिक राशि में निविष्ट किया जा सकता है।