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श्री यन्त्र का मानव शरीर में चक्रों से क्या संबंध हैं ?क्या श्रीयंत्र ध्यान ही चक्रो का जागरण


क्या श्री यन्त्र का संबंध मानव शरीर में स्थित चक्रों से हैं?-

12 FACTS;-

1-श्री यंत्र रहस्यमय आरेख का एक रूप है, जो एक तांत्रिक अनुष्ठान चित्र है जिसका उपयोग ध्यान और एकाग्रता के लिए किया जाता है।श्री यंत्र पर ध्यान केंद्रित करके, आप तुरंत खुद को तनावमुक्त पा सकते हैं। यह ध्यान के लिए एक बहुत शक्तिशाली केंद्र बिंदु है। श्री यंत्र ध्यान का नियमित अभ्यास व्यक्ति के दिमाग को शांत करता है और मानसिक स्थिरता लाता है। यदि हम श्री यंत्र के प्रत्येक तत्व पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो हमें ब्रह्मांड और मानव शरीर का गहरा ज्ञान प्राप्त होता है।

2-श्री यंत्र को ब्रह्मांड और मानव शरीर के सूक्ष्म स्तर का प्रतिनिधित्व करने के लिए भी माना जाता है।यन्त्र में सात बिंदु होते हैं जहाँ एक त्रिकोण का शीर्ष दूसरे त्रिकोण के आधार को छूता है।श्रीयंत्र 2816 शक्तियों अथवा देवियों का सूचक है। इसको ,त्रैलोक्य मोहन, अर्थात तीनों लोकों का मोहन यन्त्र, भी कहते है।श्री यंत्र में 9 त्रिकोण या त्रिभुज होते हैं जो निराकार शिव की 9 मूल प्रकृतियों के प्रतीक होते हैं। श्रीयंत्र ध्यान मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष सब कुछ प्रदान करता है ;मनुष्य को अष्ट सिद्धि व नौ निधियों की प्राप्ति होती है। श्री यंत्र ध्यान शरीर के सभी रोगों का नष्ट करके शरीर की कांति को देवताओं और गंधर्वों के समान उज्जवल कर देता है। इसकी ध्यान उपासना से शक्ति स्तंभन होता है व पंचतत्वों का ज्ञान मिलता है।इस ध्यान से दस महाविद्याओं की कृपा भी स्वयं ही प्राप्त हो जाती है। जिनकी अलग अलग उपासना अत्यंत कठिन और दुर्लभ है। श्री यंत्र ध्यान उपासना से साधक की शारीरिक और मानसिक शक्ति पुष्ट होती है।

3-संस्कृत वर्णमाला में 14 स्वर, 33 व्यंजन और 4 आयोगवाह ..ऐसे कुल मिलाकर के 50 वर्ण हैं ।प्रत्येक चक्र में बीजाक्षर के रूप में सभी 50 वर्ण हैं ।उदाहरण के लिए मूलाधार में 4,स्वाधिष्ठान में 6,मणिपुर में 10,अनहत में 12,विशुद्ध में 16,आज्ञा में 2=50 वर्ण।14 ‘माहेश्वर सूत्र’ है,जिसका ज्ञान महर्षि पाणिनि को भगवान् महेश्वर (शिव) से प्राप्त हुआ था । महर्षि के सम्मुख महादेव ने नृत्य किया जिसके समापन के समय उनके डमरू से उपरिलिखित सूत्रों की ध्वनि निकली और वे ही उनके द्वारा प्रस्तुत सूत्रबद्ध संस्कृत व्याकरण का आधार बने।50 वर्ण और 14 ‘माहेश्वर सूत्र’ =64।विशुद्ध चक्र में श्री यंत्र पूर्ण हो जाता है अथार्त आज्ञा चक्र तक 64 योगनियाँ विराजमान हो जाती है।

4-मंत्रमुग्ध आरेख में नौ त्रिकोण होते हैं जो विभिन्न बिंदुओं पर 43 छोटे त्रिकोण बनाते हैं। नौ में से पांच त्रिकोण नीचे की ओर इंगित करते हैं और शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो कि स्त्री शक्ति है। शेष चार ऊपर की ओर इंगित होते है और पुल्लिंग अर्थात शिव का प्रतिनिधित्व करते हैं।श्री यंत्र, जिसे श्री चक्र भी कहा जाता है ;तीन आयामी रूप में, ब्रह्मांड के केंद्र में मेरु का प्रतिनिधित्व करता है। यह गणितीय रूप से एक जटिल संरचना है जिसका आधार स्वर्ण अनुपात है।

5-''सौन्दर्यलहरी आदि शंकराचार्य द्वारा संस्कृत में रचित महान साहित्यिक कृति है। इसमें माँ पार्वती के सौन्दर्य, कृपा का 103 श्लोकों में वर्णन है।सौन्दर्यलहरी केवल काव्य ही नहीं है, यह तंत्रग्रन्थ है। जिसमें पूजा, श्रीयन्त्र तथा भक्ति की तांत्रिक विधि का वर्णन है। इसके दो भाग हैं''-आनन्दलहरी - श्लोक 1 से 41 सौन्दर्यलहरी - श्लोक 42 से 103 ।श्री यन्त्र का स्वरुप ज्योमितीय, मनोहर व् विचित्र है ।इसकी संरचना में बिंदु, त्रिकोण या त्रिभुज, वृत्त, अष्टकमल का प्रयोग होता है। इसके बीचो बीच बिंदु और सबसे बाहर भूपुर है भूपुर के चारो और चार द्वार है ।बिंदु से भूपुर तक कुल दस अवयव है -बिंदु, त्रिकोण, अष्टकोण, अंतर्दशार, बहिदारशर, चतुर्दर्शार, अष्टदल, षोडशदल, तीन वृत, तीन भूपुर।तंत्र के अनुसार श्री यंत्र का

निर्माण दो प्रकार से किया जाता है- एक अंदर के बिंदु से शुरू कर बाहर की ओर जो सृष्टि-क्रिया निर्माण कहलाता है और दूसरा बाहर के वृत्त से शुरू कर अंदर की ओर जो संहार-क्रिया निर्माण कहलाता है।

6-सौंदर्य लहरी में श्री आदि शंकराचार्य कहते है ''गुदाद्वार को रोककर ,आधार चक्र से वायु को उठाकर, स्वाधिष्ठान की तीन परिक्रमा करके मणिपुर में आकर अनाहत चक्र का अतिक्रमण करके उसमें प्राणों का विरोध करें और आज्ञा चक्र में ध्यान करता हुआ;पुनः ब्रह्मरन्ध्र का ध्यान करता हुआ ''मैं तीन मात्रा(अ,उ,म )से युक्त ओम हूं''।ऐसा सदा ध्यान करें। अथार्त मैं जागृत अवस्था में वैश्वानर'अकार'(ब्रह्मा ), सपनावस्था में तेजस उकार (विष्णु ),सुषुप्ति अवस्था में प्राज्ञ मकार ( महेश) हूं। इस प्रकार सदा ध्यान करता हुआ शुद्ध स्फटिक नाद का आधार चक्र से ब्रह्मरंध्र पर्यंत ध्यान करना चाहिए''।

7-वास्तव में पृथ्वी तत्व का रंग हल्का पीला है।जल तत्व का रंग नीला और रात्रि में काला। अग्नि तत्व का रंग लाल, नारंगी, गुलाबी है।वायु तत्व का रंग पेड़ों के रंग के अनुसार भूरा और हरा है।आकाश तत्व का रंग सफेद ,ग्रे है।नीचे के 3 चक्रों में इन तीनों तत्वों का रंग एक दूसरे से मिलाजुला है।पृथ्वी तत्व का रंग मणिपुर चक्र में है और मूलाधार चक्र में अग्नि तत्व का रंग

है।स्वाधिष्ठान चक्र में भी अग्नि तत्व का ही रंग है।आदि शंकरा कहते हैं कि मूलाधार में वायु

को जगा कर अर्थात 'ज्ञान से'। वायु ज्ञान का प्रतीक है। ज्ञान से स्वाधिष्ठान की तीन परिक्रमा करके। मणिपुर में आकर अनाहत चक्र का अतिक्रमण

करें अर्थात श्वास- प्रश्वास (Inhale- Exale) प्राणायाम के द्वारा आज्ञा चक्र में ध्यान करें।और आज्ञा चक्र से ही ब्रह्मरन्ध्र का ध्यान करता हुआ स्वयं को ओंकार रूप में देखें अर्थात शिवोहम सिद्ध करें।

8-सौंदर्य लहरी में श्री आदि शंकराचार्य कहते है'' हे देवी!आप मूलाधार में पृथ्वी तत्व और जल तत्व को, मणिपुर में अग्नि तत्व को ,जिसकी स्थिति

स्वाधिष्ठान में है; हृदय अनाहत में वायु तत्व को तथा ऊपर विशुद्धि

चक्र में आकाश तत्व को और भ्रूमध्य आज्ञा चक्र में मन तत्व को;इस

प्रकार समस्त षटचक्र रूप कुल मार्ग का भेदन करके सहस्त्रदल कमल में

अपने पति के साथ एकांत में बिहार करती हैं''।अथार्त मूलाधार में पृथ्वी

चक्र को भेदकर उसके ऊपर मणिपूर चक्र में काम शक्ति के स्वाधिष्ठान

(अग्नि )को भेदकर ;उसके ऊपर अनाहत चक्र में वायु को भेदकर;

उसके ऊपर विशुद्धि चक्र में आकाश तत्व को भेदकर; उसके ऊपर ज्ञान चक्र में मन को भेदकर शरीर में स्थित समस्त कुल पथ मार्ग को भेदकर;

सहस्त्रदल कमल में भगवान शिव के साथ बिहार करती हैं।

9-श्री यंत्र में 9 त्रिकोण या त्रिभुज होते हैं जो निराकार शिव की 9 मूल प्रकृतियों के द्योतक हैं। श्रीयंत्र में 4 ऊध्वर्मुखी त्रिकोण होते हैं जिन्हें शिव त्रिकोण कहते हैं।5 अधोमुखी त्रिकोण होते हैं जिन्हें शक्ति त्रिकोण कहा जाता है। ये पांच तत्व,5 ज्ञानेंद्रियों 5 कर्मेंद्रियों के प्रतीक हैं। ये त्रिकोण जीवन, आत्मा, मेरूमज्जा व वंशानुगतता का प्रतिनिधत्व करते है;प्राण, मज्जा, शुक्र व जीवन के द्योतक हैं। यह एक मूल संचित कमल है।

9-श्री यंत्र में 4 त्रिभुजों का निर्माण इस प्रकार से किया जाता है कि उनसे मिलकर 43 छोटे त्रिभुज बन जाते हैं जो 43 शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं।मध्य के सबसे छोटे त्रिभुज के बीच एक बिंदु होता है जो समाधि का सूचक है अर्थात यह शिव व शक्ति का संयुक्त रूप है। इसके चारों ओर जो 43 त्रिकोण बनते हैं वे योग मार्ग के अनुसार यम , नियम , आसन , प्रत्याहार , धारणा , प्राणायाम , ध्यान के स्वरूप हैं।'बिंदु' ईश्वरानुभव, आत्मसाक्षात्कार है। यही सम्पूर्ण जीवन का द्योतक है।

10-श्रीयंत्र अपने आप में रहस्यपूर्ण है। श्रीयंत्र के चतुर्दिक् तीन परिधियां खींची जाती हैं। ये अपने आप में तीन एलिमेंट शक्तियों की प्रतीक हैं। इसके नीचे षोडश पद्मदल होते हैं तथा इन षोडश पद्मदल के भीतर अष्टदल का निर्माण होता है, जो कि अष्ट लक्ष्मी का परिचायक है। अष्टदल के भीतर चतुर्दश त्रिकोण निर्मित होते हैं, जो चतुर्दश लोक-शक्तियों के परिचायक हैं

तथा इसके भीतर दस त्रिकोण स्पष्ट देखे जा सकते हैं, जो दस सम्पदा के प्रतीक हैं।दस त्रिकोण के भीतर अष्ट त्रिकोण निर्मित होते हैं, जो अष्ट देवियों के सूचक कहे गए हैं। इसके भीतर त्रिकोण होता है, जो आदिशक्ति का त्रिकोण माना जाता है जिसके भीतर एक बिन्दु निर्मित होता है, जो शिव का सूचक है।इन बिंदुओं को मानव शरीर में चक्रों से संबंधित माना जाता है।इस प्रकार से श्रीयंत्र 2816 शक्तियों का सूचक है।

11-पंचचक्र के पांच स्वरूप ,पांच वाहन,पांच प्रतीक,पांच तत्व,पांच

आकार और पांच तन्मात्राएं हैं। छठवां चक्र मन का है।पंच तत्वों का चार्ट दिया गया है जिसमें उनके रंग ,आकार आदि का विवरण दिया गया।तीन वृत्त त्रिगुण (वॉटर ,एयर, फायर एलिमेंट)का प्रतीक है। पृथ्वी तत्व के आकार का प्रतीक है स्क्वायर , जल तत्व का आकार-वेवी ,अग्नि तत्व का आकार ट्रायंगल , वायु तत्व का आकार रैक्टेंगल तथा आकाश तत्व का आकार सर्किल है।जब हम पांच चक्र का भेदन कर देते हैं तब हमारी

ऊर्जा मन चक्र संस्थान में पहुंच जाती है।अर्थात मन को मिलाकर इस दुनिया में छह प्रकार के लोग है।जन्म के समय कार्तिकेय के छह स्वरूप थे।परंतु शिव का स्पर्श पाते ही वह एक बालक हो गए।

12-इसी प्रकार इस संसार में चाहे जितनी भी आबादी हो। परंतु केवल छह प्रकार के ही लोग हैं।जब हम पांच एलिमेंट और स्वयंअथार्त छह को समझ

लेते हैं तो शिव से एकाकार हो जाते हैं।इसका अर्थ यह भी हो सकता है

कि हमारी यात्रा यह हो ,कि हम शिवतत्व को जानकर पांच एलिमेंट और स्वयं अथार्त छह को समझने लगे।या पांच एलिमेंट और स्वयं अथार्त

छह एलिमेंट को जानकर शिवतत्व तक पहुंच जाएं।यात्रा का मार्ग दोनों में से कोई भी हो सकता है। परंतु यात्रा यही है।

THE KEY POINTS;-

1- श्री यंत्र के केन्द्र में एक बिंदु है। इस बिंदु के चारों ओर 9 अंतर्ग्रथित त्रिभुज हैं जो नवशक्ति के प्रतीक हैं। इन नौ त्रिभुजों के अन्तःग्रथित होने से कुल 43 लघु त्रिभुज बनते हैं।

2-श्री यन्त्र को सर्वप्रथम आदि शंङ्कराचार्य जी ने बनाया था।नवचक्रों से बने इस यंत्र में चार शिव चक्र, पांच शक्ति चक्र होते हैं। इस प्रकार इस यंत्र में 43 त्रिकोण, 28 मर्म स्थान, 24 संधियां बनती हैं। तीन रेखा के मिलन स्थल को मर्म और दो रेखाओं के मिलन स्थल को संधि कहा जाता है।श्री यंत्र के 28 मर्म स्थान का अर्थ है मानव शरीर के..28 Sensitive Points।

3-इस यन्त्र में अद्दृश्य रूप से 2816 देवी देवता विद्धमान है।श्रीयंत्र संपूर्ण वास्तु का प्रतीक है।33 कोटि के देवता होते हैं यानी 33 प्रकार के और 12 प्रकार के असुर होते हैं=45 शक्तियां।

4-श्री यन्त्र तीनो लोको का प्रतीक है इसलिए इसे त्रिपुर चक्र भी कहा जाता है।इसकेअंदर 14 लोक विद्धमान है।

5-The nine avaranas are again recognized as chakras said to be situated along the central channel or the Shushumna nadi.Looking at the center shapes of the Sri Yantra pay attention to the triangles:-

5-1-TRIANGLES, when pointed up, contain the DIVINE MASCULINE, as well as the FIRE nature.

5-2-TRIANGLES that are pointed downward, they contain WATER element and the DIVINE FEMININE.

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श्री यन्त्र की नवशक्ति रचना>>>>>>>चक्र>>>>>>>मानव शरीर

THE NINE ENCLOSURES CORRESPONDING TO NINE CHAKRAS

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1-बिंदु>>>>>>> सहस्त्रार चक्र>>>>>>>ब्रह्म रन्ध्र (Opening on the crown of the head leading to Sahasra Dala padma Brahma randra)

2-त्रिकोण>>>>>>>सोमचक्र>>>>>>>मस्तक(Top of the head)

3-अष्टकोण>>>>>>>मानस चक्र >>>>>>>ललाट(Forehead)

4-अंतर्दशार>>>>>>> आज्ञा चक्र>>>>>>>भ्रूमध्य(Region between eye brows- bhru-madhya)

5-बहिर्दर्शार >>>>>>>विशुद्ध चक्र>>>>>>>गर्दन (Neck)

6-चतुर्दर्शार>>>>>>>अनाहत चक्र>>>>>>>उदर प्रदेश(Abdominal region)

7-अष्टदल>>>>>>>मणिपुर चक्र>>>>>>>नाभिप्रदेश(Navel region )

8-षोडशदल>>>>>>>स्वाधिष्ठान चक्र>>>>>>>कटिप्रदेश(Region below navel and up to penis region)

9-भूपुर(भौतिक जगत)>>>>>>>मूलाधार चक्र

9-1- भूपुर First line:पैर ( Feet) 9-2-Second line:घुटना (Knees) 9-3-Third line : जांघ (Thighs)

10-तीन वृत (Triple girdle)>>>>>>>तीन एलिमेंट का प्रतीक;शरीर का मध्य भाग ( Mid portion of the body)

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श्री यन्त्र की रचना का महत्व;-

महाचक्र का बहुत विचित्र विन्यास है।श्रीयंत्र की आकृति दो प्रकार की होती है- उर्ध्वमुखी और अधोमुखी. - उर्ध्वमुखी का अर्थ है ऊपर की ओर और अधोमुखी का अर्थ है नीचे की ओर। आदि शंकराचार्य ने सौंदर्य लहरी में उर्ध्वमुखी प्रतीक को सबसे ज्यादा मान्यता दी है। यंत्र के मध्य में बिंदु है, बाहर भूपुऱ, भुपुर के चारों तरफ चार द्वार और कुल दस प्रकार के अवयय हैं, जो इस प्रकार हैं- बिंदु, त्रिकोण, अष्टकोण, अंतर्दशार, वहिर्दशार, चतुर्दशार, अष्टदल कमल, षोडषदल कमल, तीन वृत्त, तीन भूपुर।

2-इसमें चार उर्ध्व मुख त्रिकोण हैं, जिसे श्री कंठ या शिव त्रिकोण कहते हैं।नवचक्रों से बने इस यंत्र में चार शिव चक्र, पांच शक्ति चक्र होते हैं। इस प्रकार इस यंत्र में 43 त्रिकोण, 28 मर्म स्थान, 24 संधियां बनती हैं। तीन रेखा के मिलन स्थल को मर्म और दो रेखाओं के मिलन स्थल को संधि कहा जाता है। पांच अधोमुख त्रिकोण होते हैं, जिन्हें शिव युवती या शक्ति त्रिकोण कहते हैं।

3-इन त्रिभुजों के बाहर की तरफ 8 कमल दल का समूह होता है जिसके चारों ओर 16 दल वाला कमल समूह होता है। इन सबके बाहर भूपुर हैं।मनुष्य शरीर की भांति ही श्री यंत्र की संरचना में भी 9 चक्र होते हैं जिनका क्रम अंदर से बाहर की ओर इस प्रकार है- केंद्रस्थ बिंदु

फिर त्रिकोण जो सर्वसिद्धिप्रद कहलाता है।फिर 8 त्रिकोण सर्वरक्षाकारी हैं। उसके बाहर के 10 त्रिकोण सर्व रोगनाशक हैं। फिर 10 त्रिकोण सर्वार्थ सिद्धि के प्रतीक हैं। उसके बाहर 14 त्रिकोण सौभाग्यदायक हैं। फिर 8 कमलदल का समूह दुःख, क्षोभ आदि के निवारण का प्रतीक है। उसके बाहर 16 कमलदल का समूह इच्छापूर्ति कारक है।अंत में सबसे बाहर

वाला भाग त्रैलोक्य मोहन के नाम से जाना जाता है।इन 9 चक्रों की अधिष्ठात्री 9 देवियों के नाम इस प्रकार हैं – 1. त्रिपुरा 2. त्रिपुरेशी 3. त्रिपुरसुंदरी 4. त्रिपुरवासिनी, 5. त्रिपुरात्रि, 6. त्रिपुरामालिनी, 7. त्रिपुरसिद्धा, 8. त्रिपुरांबा और 9. महात्रिपुरसुंदरी।योग के छह पारंपरिक प्रकार हैं ।1. हठयोग 2. राजयोग 3. कर्मयोग4. भक्तियोग5. ज्ञानयोग6. तंत्रयोग

श्रीयंत्र के द्वार SIX GATEWAYS OF MAHA MERU;- 07 FACTS;- 1-There are actually six gateways to the fort Sri Yantra, if we take a three-dimensional view of it; the four obvious dwaras and those ‘above’ and ‘below’. 2-The Eastern gate is the way of the mantras./तंत्रयोग 3-The Southern gate is the way of devotion or bhakti./भक्तियोग 4- The Western gate is for the performance of rites and rituals, or karma-kanda./कर्मकांड

5-The Northern gate is the way of wisdom, or Jnana./ज्ञानयोग 6-The gate ‘below’ is the ‘path of worlds/maya’ while the gate ‘above’ is the way or ‘road of liberation’. These are located at the Southern and Northern gate, respectively, i.e. ‘above’ is north, ‘below’ is south. 7-Each of these gates also stands for one of the six primary chakras in the body and six Darshan.

श्री यंत्र में वास्तु;-

03 FACTS;-

1-श्रीयंत्र आदिकालीन वास्तुकला विद्या का द्योतक हैं।वास्तव में प्राचीनकाल में भी वास्तुकला अत्यन्त समृद्व थी।श्री यंत्र वास्तु का प्रतीक है।16 कमल दल अथार्त वास्तु के 16 Zone।अंदर के अष्ट कमल भी वास्तु के आठ जोन हैं । बिंदु ब्रह्मस्थान है। वास्तु चक्र में 45 देवता होते हैं।इसी प्रकार श्रीयंत्र में 43 त्रिकोण और दो शिव-शक्ति त्रिकोण होते हैं। एक बिंदु है। श्री यंत्र के द्वारा ही सभी देवताओं का स्थान निश्चित होता है। इसमें 12 असुर भी होते हैं। उनका भी स्थान निश्चित होता है। 33 कोटि के देवता होते हैं यानी 33 प्रकार के और 12 प्रकार के असुर होते हैं। श्रीयंत्र संपूर्ण वास्तु का प्रतीक है।

2-भगवान श्री कृष्ण की द्वारका नगरी भी श्री यंत्र के आकार में बनी हुई थी। आचार्य शंकर ने सौंदर्य लहरी में देवी के सौंदर्य वर्णन के द्वारा संपूर्ण कुंडलिनी जागरण ,संपूर्ण वास्तु ,संपूर्ण ज्योतिष का ज्ञान दे दिया है। परंतु यह सब वही देख सकता है ; जो डी-कोड करना जानता है।डी-कोड वही कर सकता है जिसको आत्मा की अनुभूति है, शिव तत्व का ज्ञान है।अन्यथा केवल एक पवित्र ग्रंथ की तरह 'सौंदर्य लहरी' की पूजा करता रहेगा ;लेकिन समझ में कुछ भी नहीं आएगा।

3-श्री यंत्र संपूर्ण ब्रह्मांड की संरचना का वर्णन कर रहा है। हमारे मनुष्य शरीर के सभी चक्र, मर्म स्थानों आदि का वर्णन कर रहा है।लेकिन श्री यंत्र की केवल पूजा की जा रही है समझ में कुछ नहीं आ रहा है।''यत्र पिंडे,तत्र ब्रह्मांडे ''--' जो कुछ मानव शरीर में है;वही सब कुछ ब्रह्मांड में है' और जो वर्णन श्री यंत्र में किया गया है वही सब कुछ मानव शरीर में है। जरूरत है केवल शोध करने की और यह तभी संभव है जब हमें आत्मा की अनुभूति हो ,स्व की अनुभूति हो।

श्री यन्त्र ध्यान/‘त्राटक साधना’;-

08 FACTS;-

1-श्रीयंत्र ध्यान हमें हमारी चेतना की सामग्री को साफ करने में मदद करता है, इसलिए बिना व्याख्या किए यह एक शुद्ध दर्पण बन सकता है। यह शून्यता में असीम रूप से मौजूद है। जब हमारी चेतना का दर्पण बिना किसी सामग्री के छोड़ दिया जाता है, तो यह आत्मज्ञान है।श्री यंत्र ज्यामितीय पैटर्न के साथ एक प्रकार का मंडल है, जो ब्रह्मांड के तत्वमीमांसा का प्रतिनिधित्व करता है।जिसका उपयोग ध्यान और एकाग्रता के लिए किया जाता है।श्री यंत्र को ब्रह्मांड और मानव शरीर के सूक्ष्म स्तर का प्रतिनिधित्व करने के लिए माना जाता है। यन्त्र में सात बिंदु होते हैं जहाँ एक त्रिकोण का शीर्ष दूसरे त्रिकोण के आधार को छूता है।इन बिंदुओं को मानव शरीर में चक्रों से संबंधित माना जाता है। मंत्रमुग्ध आरेख में नौ त्रिकोण होते हैं जो विभिन्न बिंदुओं पर 43 छोटे त्रिकोण बनाते हैं। नौ में से पांच त्रिकोण नीचे की ओर इंगित करते हैं और शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो कि स्त्री शक्ति है। शेष चार ऊपर की ओर इंगित होते है और पुल्लिंग अर्थात शिव का प्रतिनिधित्व करते हैं।

2-अत्यंत जटिल ज्यामितीय गुणों के अलावा, श्री यंत्र की व्याख्या बहुत गहरी, विस्तृत ब्रह्माण्ड संबंधी व्याख्या है। यह भी देखा गया है कि इसमें साइकोफिजियोलॉजिकल प्रभावों के लिए जिम्मेदार कई गुण हैं जो आधुनिक चिकित्सीय विचारोत्तेजक विधियों में व्यापक रूप से उपयोग किए जाते हैं। श्री यंत्र स्वर्ण अनुपात के आधार पर एक बहुत ही सटीक रूप से निर्मित अल्पना है, जो एक समीकरण है और सभी सृजन में मान्य है।श्री यंत्र पर ध्यान केंद्रित करके, आप तुरंत खुद को तनावमुक्त पा सकते हैं। यह ध्यान के लिए एक बहुत शक्तिशाली केंद्र बिंदु है।यदि हम श्री यंत्र के प्रत्येक तत्व पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो यह हमें गहरा ज्ञान प्रदान करता है।हम अपने सूक्ष्म शरीर में श्री यंत्र ध्यान तभी कर सकते हैं जब हमें बाहर भी श्री यंत्र ध्यान करने का अभ्यास हो। श्री यंत्र ध्यान का नियमित अभ्यास व्यक्ति के दिमाग को शांत करता है और मानसिक स्थिरता लाता है।

3- मन की एकाग्रता को प्राप्त करने की अनेकानेक पद्धतियाँ योग शास्त्र में निहित हैं। इनमें 'त्राटक' उपासना सर्वोपरि है। हठयोग में इसे दिव्य साधना कहते हैं। त्राटक के द्वारा मन की एकाग्रता,वाणी का प्रभाव व दृष्टि मात्र से संकल्प को पूर्ण कर लेता है।त्राटक साधन के लिए खुद को नियमों से बंधना होगा। इसके लिए आंखों की स्वस्थता का होना अति आवश्यक है। इससे आंखों और मस्तिष्क के भीतर गर्मी बढ़ जाती है और अधिक देर तक करने से आंखों से आंसू तक निकल आते हैं। इस स्थिति में अभ्यास थोड़े समय के लिए रोक देना चाहिए।अगर आपको अपनी आंखों में जलन का एहसास हो तो फिर कुछ देर के लिए अपनी आखें बंद कर लें और फिर से इस exercise को जारी रखें| इस exericse के लिए उस वस्तु को आंखों के स्तर पर लगभग 20 inch की दूरी पर रखें ताकि आपकी गर्दन पर किसी भी तरह का जोर या तनाव न पड़े|

4-कोई भी व्यक्ति अपनी प्रबल इच्छा शक्ति के जरिए त्राटक साधन की अद्भुत सिद्धियां हासिल कर सकता है।इसके लिए व्यक्ति में असीम श्रद्धा, धैर्य और मन की शुद्धता का होना जरूरी है।अगर आपकी आंख़ें Central Point से जरा भी इधर-उधर होती हैं तो इसका पता आपको तुरंत लग जाता है और आप अपने ध्यान को फिर से इस पर टिका सकते हैं| इसके साथ-साथ आपको अपने concentration के वर्तमान स्तर का भी पता चल जाता है|त्राटक, मन को भी शांत करता है और निर्णय लेने की क्षमता को भी बेहतर बनाता है| यह तनाव से मुक्ति और थकान से गहरी राहत भी पहुंचाता है|त्राटक सम्मोहन को सौम्य सम्मोहन भी कहा जा सकता है और इससे साकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है |त्राटक का साधक सामने वाले को सम्मोहित करने की ताकत रखता है |इस अभ्यास को प्रतिदिन पंद्रह मिनट तक करते हुए लगातार 51 दिनों तक करने के बाद त्राटक साधना की सिद्धि प्राप्त हो जाती है। इस दौरान मन में बाहरी विचारों को नहीं आने देना चाहिए।

5-सबसे पहले एक एकांत कमरे को जहां किसी भी तरह की कोई आवाज न हो |कमरे को बंद करके एक आसन बिछाकर बैठ जाए | बगल में एक नरम रुमाल रखे | कमरे में कम रौशनी सम्भव हो तो अच्छा है |बिन्‍दु त्राटक दिन में करे।आप रात्रि के समय भी इस क्रिया को कर सकते हैं |अब आप अपने सामने श्री यंत्र रखें| लेकिन ध्यान रहे ,श्री यंत्र एकदम आपके नेत्रों के सामने और कम से कम दो फुट की दूरी पर हो | श्री यंत्र को निहारने की कोशिश करें... और गहरे उतरें और गहरे... निहारते रहें... आत्म चिंतन की अवस्था में शून्य की तरफ बढ़ने की कोशिश जारी रखे.... धीरे-धीरे आप स्वयं के आज्ञाचक्र में झांकने की शक्ति अर्जित कर लेंगे हालांकि आरम्भिक दौर में ये शक्ति अल्पकाल के लिए अर्जित होगी।

7-श्री यंत्र ‘त्राटक क्रिया’ में हम अपनी पलकों को झपकाए बिना अपना पूरा ध्यान एक- एक करके प्रत्येक बिंदु पर लगाते हैं|इसका क्रम निम्नलिखित हैं...

1-भूपुर(भौतिक जगत)

2-तीन वृत (तीन एलिमेंट का प्रतीक)

3-षोडशदल

4-अष्टदल

5-चार उर्ध्व मुख त्रिकोण

6-पांच अधोमुख त्रिकोण

7-स्वर्ण अनुपात का दिव्य संतुलन

8-केंद्रस्थ 'बिंदु '

8-जब कोई इंसान चरम बिंदु पर एकाग्रचित्त होकर ध्यानस्थ होता है तो वह बोध अवस्था में होकर भी आसपास के वातावरण से निरपेक्ष हो जाता है। ऐसे में उसकी समस्त चेतना का केन्द्र बिंदु अंतः की ओर रूपायित होने लगता है।यही वह उच्चतर अवस्था होती है जब साधनारत इंसान की संपूर्ण शक्तियां एकाकार होने लगती हैं।त्राटक की मोटी विधि यह है कि आंखें खोलकर किसी वस्तु को देखा जाए। उसके बाद नेत्र बंद करके उसे मस्तिष्क में अंकित किया जाए।जब तक वह चित्र धुंधला न पड़े, तब तक आंखें बंद रखी जाएं और फिर आंख खोलकर पुन: उसी वस्तु को एकाग्रतापूर्वक देखने के बाद पहले की तरह फिर आंखें बंदकर पुन: उपरोक्त क्रिया की जाए। बिंदु तक पहुंचने के बाद हमें पुनः भूपुर में आना चाहिए और अंत में बिंदु में पहुंच जाना चाहिए।

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07 STEPS OF SRIYANTRA MEDITATION;-

1-As you look at the yantra, focus on its center. This dot in the center is called the bindu, which represents the unity that underlies all the diversity of the physical world. Now allow your eyes to see the triangle that encloses the bindu. The downward-pointing triangle represents the feminine creative power, the womb of all creation, while the upward-facing triangle represents male energy, movement, and transformation.

2-Allow your vision to expand to include the circles outside of the triangles. They represent the cycles of cosmic rhythms.