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विवेक चूडामणि ग्रंथ में आदि शंकराचार्य द्वारा वर्णित चार साधनों के समूह ..साधन चतुष्टय के अंग क्या ह

साधन चतुष्टय के अंग क्या है?-

03 FACTS;-

1-मानव शरीर के दो भाग हैं एक जड़ दूसरा चेतन। जड़ भाग में हाड़, माँस, रस, रक्त आदि से बना हुआ स्थूल शरीर है। इसके भीतर जो चेतना शक्ति काम करती है उसी के कारण जीवन स्थिर रहता है। उस चेतना का अन्त होते ही मृत्यु हो जाती है और शरीर तत्काल सड़ने

लगता है।अन्तःकरण चतुष्टय चेतना की क्रिया पद्धति है। यों चेतन सत्ता एक है, उंगलियों की तरह उसके पृथक-पृथक खंड एवं स्वरूप नहीं हैं और न उसके कार्य विभाजित हैं। वह एक ही शक्ति कई समय पर कई काम करती है।

2- जब वह जो काम करती है तब उसे उस नाम से संबोधित किया जाता है। एक ही व्यक्ति वक्ता विद्यार्थी, अभिनेता, खिलाड़ी, रोगी, मित्र, शत्रु, ग्राहक, विक्रेता आदि की कई भूमिकाएँ समय-समय पर निभाते हुए देखा जा सकता है।चेतना की चार संज्ञाएं मिलने की बात ऐसी ही समझी जानी चाहिए। उन्हें चार स्वतंत्र सत्ताएँ मानने और पृथक्-पृथक् काम करने के लिए नियुक्त नहीं मानना चाहिए।

3-अन्तः करण चतुष्टय क्या है?-

चेतना शक्ति को चार भागों में बाँटा गया है। इस विभाजन का तात्पर्य यह है कि उसकी कार्य प्रणाली चार दिशाओं में काम करती है।1-मन, 2-बुद्धि,3- चित्त और 4- अहंकार इन चारों की सम्मिलित शक्ति को अन्तः करण चतुष्टय कहते हैं।

(1) मन;-

04 FACTS;-

1-मन का कार्य इच्छा करना, चाहना, कल्पना करना है। तरह तरह की वस्तुओं की इच्छाएँ मन के द्वारा होती हैं, कल्पना करना इसका प्रधान गुण है, इसलिए क्षण में पृथ्वी के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुँच जाता है इसकी उड़ान बड़ी तेज है। मन की बराबर तीव्र गति से और कोई नहीं दौड़ सकता। यह एक स्थान पर देर तक स्थिर नहीं रहता।

2-भोग-भोगने का साधन तो इन्द्रियाँ हैं पर कारण, मन है। मन की इच्छा और प्रेरणा से ही इन्द्रियाँ विविध प्रकार के भोगों के लिए संलग्न होती हैं। मन को ग्यारहवीं इन्द्रिय भी कहा जाता है, यद्यपि वह अन्य इन्द्रियों की भाँति दिखाई नहीं देता तो भी रसानुभूति में सबसे आगे है, सब का नेता है।

3-यदि मन उदास हो, खिन्न हो, तो आकर्षक भोग भी नहीं सुहाते और यदि मन की प्रेरणा प्रबल हो तो निर्बल इन्द्रियाँ भी उत्तेजित होकर उधर लग जाती हैं। मन की इच्छाएं और कल्पनाएं यदि सन्मार्ग गामी हों तो मनुष्य को आत्म कल्याण का मार्ग प्राप्त करने में देर नहीं लगती और यदि वह कुमार्ग गामी हों तो पतन का गहरा गर्त सम्मुख ही उपस्थित है।

4-इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए गीताकार ने कहा है, कि-''मन ही मनुष्य के बंधन और मुक्ति का कारण है।'' वश में किया हुआ मन, सबसे बड़ा मित्र है और असंस्कृत मन से बढ़कर मानव प्राणी का दूसरा शत्रु नहीं। यही कारण है कि आत्मकल्याण की इच्छा करने वाले को मन को वश में करने की ओर विशेष ध्यान देना पड़ता है।

(2) बुद्धि;-

04 FACTS;-

1-बुद्धि वह तत्व है जिसे विशालकाय विचार क्षेत्र में से उपयोगी अनुपयोगी का निर्णय करना पड़ता है। उसे न्यायाधीश कह सकते हैं।बुद्धि का कार्य है- निर्माण करना। मन अनेक प्रकार की ऊबड़-खाबड़ कल्पनाएं करता रहता है। बुद्धि उसमें से उपयोगी कल्पनाओं को स्वीकृत करती है और अनुपयोगियों को त्याग देती हैं। तर्क करना बुद्धि का प्रधान हथियार है। कारण, परिस्थिति, अनुभव, उदाहरण, अवसर, प्रमाण, साधन, पात्र, सामर्थ्य आदि का ध्यान रखते हुए, इन कसौटियों पर कसते हुए, बुद्धि यह निर्णय करती है कि क्या करना चाहिए क्या न करना चाहिए। यह है..बुद्धि की सामान्य कार्य पद्धति।

2-विशुद्ध बुद्धि ..ऋतम्भरा बुद्धि प्रायः उच्च कोटि की आत्माओं की ही होती है।

साधारण मनुष्यों की बुद्धि श्रेय या प्रेम में से एक पक्ष की ओर झुकी होती है। श्रेय का अर्थ है ..आत्मा का स्वार्थ, परमार्थ। प्रेम का अर्थ है साँसारिक सुख, भौतिक लाभ। जैसे मुकदमें में वादी और प्रतिवादी के वकील एक ही बात पर परस्पर विरोधी तर्क करते हैं और अपने पक्ष को निर्दोष तथा दूसरे पक्ष को दोषी सिद्ध करने के लिए बड़ी प्रभावपूर्ण बहस करते हैं उसी प्रकार श्रेयानुगामिनी बुद्धि उन तर्कों को प्रधानता और मान्यता देती है जो आत्मा के स्वार्थ को पूरा करते हों, चाहे उनके लिए कुछ साँसारिक लाभों को छोड़ना भी पड़ता हो।

3-इसी प्रकार प्रेयानुगामिनी बुद्धि को वे तर्क, प्रमाण और उदाहरण पसंद आते है जो साँसारिक सुख साधनों को बढ़ावें फिर चाहें धर्म कर्त्तव्य को उसके लिए छोड़ना भी क्यों न

पड़ता हो।विवेकशील मनुष्य वे है जो दोनों का समन्वय करते हैं। वे ऐसी नीति एवं कार्य पद्धति को अपनाते हैं जो दोनों लाभों को साथ ले चले। वे जानते हैं कि ‘अति’ करना ..मध्यम स्थिति में उचित नहीं। सामान्य जीवन में अति लोभ की भाँति अति त्याग भी कष्ट दायक है। अति भोग की भाँति अति तितीक्षा भी स्वास्थ्य के लिए अहितकर है।

4-धर्म पूर्वक जीविका कमाना असंभव नहीं है, संयमपूर्वक ऐश्वर्य का उपयोग न हो सके ऐसी बात नहीं है, गृहस्थ में रहकर राजा जनक की भाँति विरक्त रहना असाध्य नहीं, स्वार्थ और परमार्थ का एकीकरण हो सकता है। यही मध्यम मार्ग बुद्धिमान मनुष्यों को प्रिय होता है। इस साधना के उपरान्त धीरे-धीरे बुद्धि की स्थिति ऊँची हो जाती है तब वह ऋतम्भरा प्रज्ञा कहलाती है। उस दशा में वह स्वार्थ और परमार्थ दोनों पक्षों को छोड़ देती है केवल दैवी प्रेरणा एवं ईश्वरीय आज्ञा ही उसका आधार रह जाता है परमहंस और जीवन मुक्त आत्माएँ उसी दिव्य प्रेरणा के आधार पर काम करती हैं।

(3) चित्त;-

06 FACTS;-

1-चित्त का तात्पर्य-स्वभाव, आदत, टेव, अभ्यास, संस्कार। दीर्घ काल तक जो विचार पद्धति एवं कार्य प्रणाली अभ्यास में, उपयोग में आती रहती है, मनुष्य उसका आदी हो जाता है। उसे छोड़ने में बड़ी हिचकिचाहट होती है। जैसे दो मित्र दीर्घ काल से साथ साथ रहते चले आये तो स्थायी वियोग के अवसर पर उनकी भावना उमड़ आती है और वे अलग नहीं होना चाहते। इसी प्रकार जो स्वभाव, विचार, आचार बहुत दिनों से अभ्यास में आये हैं वे चित्त में संस्कार रूप से जम जाते हैं और जीवन का क्रम उसी आधार पर चलने लगता है।

2-भिखारी, चोर, नशेबाज, दुराचारी, आलसी स्वभाव के मनुष्य जानते हैं कि हमारी गतिविधि हमारे लिए दुखदायी है पर उनके मस्तिष्क और शरीर को ऐसा अभ्यास पड़ा होता है कि अनिच्छा होते हुए भी आदत से लाचार होकर उसी कर्म में बार-बार प्रवृत्त हो जाते हैं। कई व्यक्ति रूढ़ियों, मूढ़ विश्वासों अन्य परम्पराओं और पुरातन पंथी से ऐसे बेतरह चिपके होते हैं कि विवेक बुद्धि, उपयोगिता सामयिक आवश्यकता आदि का कुछ भी प्रभाव उन पर नहीं पड़ता और जो कुछ भला-बुरा अब तक होता चला आया है उसमें तनिक भी परिवर्तन स्वीकार नहीं करते। यह चित्त की स्थिति का ही खेल है।

3-धन को सुरक्षित रखने के लिए तिजोरी का घर में रहना आवश्यक है। पर यदि दुर्गन्धयुक्त गंदगी तिजोरी भर रखी जाय तो तिजोरी का भी दुरुपयोग होता है और गन्दगी की बदबू से होने वाली हानि भी चिरस्थायी हो जाती है। चित्त के संबंध में भी यही बात है। प्रभु ने मनोमय कोष में चित्त का बहुमूल्य भाग इसलिए दिया है कि उसके द्वारा उत्तम स्वभाव को सुरक्षित और चिरस्थायी रखा जा सके। आजकल हमारे चित्त बड़ी दुर्दशा में हैं उनमें बुरी आदतें, नीच विचारधाराएँ, सड़ी-गली परंपराएं, तुच्छ कामनाएँ भरी पड़ी होती हैं।

4-जैसे कच्ची मिट्टी पानी को सोख लेती है और पानी रंग तथा गंध को देर तक अपने में धारण किये रहती है उसी प्रकार मन के द्वारा जो विचार किये जाते हैं और शरीर द्वारा जो कार्य होते हैं उनका औचित्य-अनौचित्य, पाप-पुण्य, चित्त में संस्कार रूप से जम जाता है। यह संस्कार ही समयानुसार परिपाक होकर दुख-सुख के कर्म भोगों का निर्णय करता है। चित्त का संशोधन और परिमार्जन हो जाय तो उसमें जमे हुए जन्म-जन्मान्तरों के कुसंस्कार भी विनष्ट हो जाते हैं और चालू प्रारब्ध भोगों के अतिरिक्त भविष्य में बनने वाले दुखदायी कर्म भोगों की अनायास ही जड़ कट जाती है।

5-चित्त को वैज्ञानिक भाषा में अचेतन कहा जाता है। असंख्य शरीर में रहने के कारण उसे कार्य संचालन की मूलभूत क्रिया-प्रक्रिया का परिचय है। अस्तु वह अपने अनुभवों के आधार पर रक्त संचार, आकुंचन-प्रकुंचन, श्वास-प्रश्वास, ग्रहण-विसर्जन, निद्रा-जागृति आदि के क्रिया-कलापों को अनवरत गति से सम्पन्न करता रहता है। स्वसंचालित एवं अनैच्छित, शरीर संचालन की कार्य सिद्धि इस चित्त संस्थान के माध्यम से ही सम्पन्न होती है।भले-बुरे संस्कार इसी चित्त में जमे रहते हैं। आदतों की जड़ इसी भूमि में घुसी रहती है।

6-तप साधनाओं का उद्देश्य इस चित्त की दिशा धारा मोड़ने, मरोड़ने, भुलाने, सिखाने का अति महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न करके व्यक्तित्व का निर्माण करना ही होता है।चित्त में जमे हुए कुसंस्कारों का मूलोच्छेदन करना और नये सुसंस्कारों को मजबूती से गहराई तक जमाना, आध्यात्मिक साधकों के लिए आवश्यक होता है। इसलिए संस्कार भूमि का, चित्त चेतना का परिमार्जन करना मनोमय क्षेत्र की साधना में एक महत्वपूर्ण कार्य समझा जाता है।

(4)) अहंकार;-

07 FACTS;-

1-अहंकार-चेतना की वह परत है, जिसमें अपने आपे के सम्बन्ध में मान्यताएँ जमी रहती हैं। अहंकार का अर्थ घमण्ड भी होता है, पर तत्व चर्चा में इस शब्द को आत्म अस्तित्व-ईगो- के संदर्भ में ही प्रयुक्त किया जाता है।अहं का तात्पर्य स्व सत्ता की अनुभूति, का स्तर ही

समझा जाना चाहिए।अहंकार का अर्थ है—अपने आपके सम्बन्ध में मान्यता। मैं कौन हूँ-इस प्रश्न का उत्तर विभिन्न व्यक्तियों के मन में विभिन्न प्रकार का होता है। कोई अपने को व्यवसाय के आधार पर, कोई सम्पत्ति के आधार पर, कोई जाति के आधार पर, कोई सम्प्रदाय के आधार पर अपने को प्रधानता देता है। ऐसी ही विविध मान्यताओं से लोग अपने आपके संबन्ध में मान्यता बनाते हैं।

2-जन समुदाय से पूछा जाय कि आप लोग अपने को क्या समझते हैं तो ऐसे उत्तर मिलेंगे जिससे पता चलेगा कि यह लोग अपने को ब्राह्मण, वैश्य, लखपती, गरीब, जमींदार, किसान, भिखारी, हिन्दू, ईसाई, विधुर, विवाहित, शिक्षित, अशिक्षित, अभागा, भाग्यवान, कैदी, शासक, रोगी, रूपवान, चोर, दानी, आदि परिस्थितियों का अपने आपको प्रतीक मानते हैं। यह मान्यता ही वह साँचा है जिसमें ढलकर वस्तुतः वह वैसा ही बन जाता है।

3-अपने सम्बन्ध में स्थिर की गई भावना को, मान्यता को अहंकार कहते हैं। अभिमान और अहंकार को कई व्यक्ति एक बात समझते हैं। यह शब्द समानार्थी भले ही समझे जाते हों पर अध्यात्म शास्त्र में अहंकार का प्रयोग ‘आत्म मान्यता’ के सम्बन्ध में ही होता है। अहंकार मन का वह भाव है जो मोटी दृष्टि से कुछ विशेष उपयोगी नहीं जान पड़ता पर वस्तुतः इसका भारी महत्त्व हैं।

4-ईश्वर और जीव की पृथकता का प्रधान आवरण यह ‘अहम्’ ही है। यह अहंता जब तक रहती है तब तक सायुज्य मुक्ति नहीं हो सकती। ईश्वरीय प्रचण्ड तेज की एक छोटी चिंगारी जब अपने अस्तित्व की प्रथम मान्यता कर लेती है और ‘मैं’ का एक छोटे दायरे में अनुभव करती है तभी वह जीव संज्ञा को प्राप्त कर लेती है। ईश्वर से पृथकता में 'मैं' की मान्यता ही जीवन का मूल कारण है। इस मान्यता को हटाकर, द्वैत को मिटाकर जब मैं और तू को एक कर दिया जाता है तो वह अद्वैत भाव ही ब्रह्म सायुज्य में परिवर्तित हो जाता है। कहा गया है कि—”अपनी खुदी मिटा दे, तुझको खुदा मिलेगा।”

5-अहंकार जिस प्रकार का होगा, उसी के अनुसार हमारे विचार, विश्वास, आदर्श होंगे। इच्छा और आकांक्षाएं उसी क्षेत्र में उन्नति एवं सफलता प्राप्त करना चाहेंगी। जिसके मन में अपने सम्बन्ध में यह निश्चित विश्वास है कि मैं अमुक नाम के भिखारी के अतिरिक्त और कुछ नहीं हूँ उसकी विचारधारा भिक्षा में और कार्य प्रणाली याचना में अधिक सफलता प्राप्त करने के लिए ही अग्रसर हो सकती है।

6-आध्यात्मिक व्यक्तियों का अहंकार सज्जन, सत्पुरुष, महात्मा, आदर्शवादी, लोकसेवी, महापुरुष, ईश्वर भक्त, के रूप में होता है इसलिए वह इसी क्षेत्र में अग्रसर होता है। वह सम्पदाओं की अपेक्षा सद्गुणों में सुख एवं सफलता अनुभव करता है। तदनुसार उसके जीवन की गतिविधि उस ढांचे में ढ़ल जाती है जो आत्मा की महानता, प्रतिष्ठा और सुख शान्ति के अनुरूप होती है।

7-व्यक्ति अपने सम्बन्ध में मान्यता स्वयं निर्धारित करता है। इस आधार पर उसकी आकांक्षा उभरती है और दृष्टिकोण बनता है। आस्था, निष्ठा इसी क्षेत्र का उत्पादन है। इसे व्यक्तित्व का बीज भी कह सकते हैं। बाह्य जीवन इसी की प्रतिक्रिया है। आत्म मान्यता के आधार पर ही व्यक्ति की- आकांक्षा, विचारणा एवं क्रिया को दिशा एवं गति मिलती है। बाह्य जीवन में मनुष्य जैसा भी कुछ है उसे अन्तःस्थिति की प्रतिच्छाया मात्र समझा जा सकता है। योगाभ्यास इसी परत को प्रभावित करने के लिए किये जाते हैं। श्रद्धा और भक्ति के भाव संचार ही अहंता का स्तर बदल सकने में समर्थ होते हैं।

अन्तः करण चतुष्टय के चारों भागों के समन्वय का महत्व;-

04 FACTS;-

1-अन्तः करण चतुष्टय के चारों भागों को, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार को, जब सात्विकता के शान्तिमय पथ पर अग्रसर किया जाता है तो हमारी चेतना शक्ति का दिन-दिन विकास होता है।चिन्तन को इन चारों परतों का समन्वय करने से समग्र ज्ञान साधना का उद्देश्य पूर्ण होता है। इनमें से एकाध का ही उपयोग किया जाय तो बात अधूरी रह जाएगी और विचार शक्ति का जो लाभ मिलना चाहिए वह मिल न सकेगा।

2-यह मानसिक विकास अनेक सफलताओं और सम्पत्तियों का पिता है। मनोबल से बड़ी और कोई सम्पत्ति इस संसार में नहीं है। मानसिक दृष्टि से जो जितना बड़ा है उसी अनुपात से संसार में उसका गौरव होता है अन्यथा शरीर की दृष्टि से तो प्रायः सभी मनुष्य लगभग समान होते हैं। उन्नति के इच्छुकों को अपने अन्तः करण चतुष्टय का विकास करने का पूरा प्रयत्न करना चाहिए। क्योंकि इस विकास में ही साँसारिक और आत्मिक कल्याण सन्निहित है।

3-विचारों का कार्यों के साथ चिरकाल तक समन्वय बना रहने से वैसा स्वभाव बन जाता है और अनायास ही उस प्रकार की इच्छा उठने और क्रिया होने लगती है। इसी को संस्कार या चित्त कहते हैं। इच्छा, ज्ञान, अभ्यास, वातावरण, समर्थन आदि अनेक कारणों से जीवात्मा के ऊपर एक आवरण बनता है। यही अहंकार है। यह है तो आत्मा से पृथक मान्यताओं और गतिविधियों से विनिर्मित पर चेतना के साथ अत्यधिक घनिष्ठ हो जाने से वह उसी का अंश लगने लगता है।

4-साँप की केंचुल या बल्ब के काँच की उसे उपमा दी जा सकती है। इस अहंकार को ही व्यक्तित्व कह सकते हैं। ईश्वर और जीव की पृथकता की प्रमुख दीवार यही है। उपासना द्वारा ईश्वर को आत्म समर्पण करके इसी अहं को मिटाया जाता है। तप साधना द्वारा कुसंस्कारों का उन्मूलन और सुसंस्कारों का संस्थापन किया जाता है। स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन द्वारा विवेक बुद्धि परिष्कृत होती है और इन्द्रियनिग्रह द्वारा मन चले मन को सत्संकल्प करने वाले उपयोगी चित्र गढ़ने वाला बनाया जाता है। यही है आत्म-साधना की पृष्ठभूमि और संक्षिप्त रूप रेखा ।

क्या है साधन चतुष्टय?-

02 FACTS;-

1-ब्रह्मसूत्र शंकरभाष्य में तथा विवेक चूडामणि ग्रंथ में भगवान शंकराचार्य इसकी चर्चा करते हैं......चार साधनों के समूह के रूप मे साधन चतुष्टय बतलाए गये हैं ......'ब्रह्मसूत्र शंकरभाष्य' में तथा 'विवेक चूडामणि' ग्रंथ में आचार्य शंकर इन की चर्चा करते हैं| वेदान्त दर्शन में प्रवेश के लिए इन चारों साधनों की योग्यता होनी अनिवार्य है| किसी भी मार्ग के साधक हों, इनकी योग्यता के बिना मार्ग प्रशस्त नहीं होता|

2-गीता में ज्ञानयोग को भगवान ने देहधारियों के लिए कठिन बताया है |

तुलसीदासजी ने कहा है " कहत कठिन , समझत कठिन , साधन कठिन विवेक " अर्थात ज्ञानमार्ग अन्य मार्गों से बहुत कठिन है | परन्तु ज्ञानयोग का यह साधन साधनचतुष्टय -सम्पन्न अधिकारी के द्वारा ही सुगमता से किया जा सकता है |इसमें विवेक , वैराग्य ,षट-सम्पति और मुमुक्षुत्व - ये चार साधन होते हैं: - (1) नित्यानित्य वस्तु ''विवेक '': ---

03 FACTS;-

1-विवेक - विवेक का अर्थ है तत्व का यथार्थ अनुभव करना ..नित्य एवं अनित्य तत्त्व का विवेक ज्ञान| सब अवस्थाओं में और प्रत्येक वस्तु में प्रतिक्षण आत्मा और अनात्मा का विश्लेषण करते - करते यह विवेक - सिद्धि प्राप्त होती है | ' विवेक ' का यथार्थ उदय हो जाने पर सत और असत एवं नित्य और अनित्य वस्तु का क्षीर - नीर - विवेक की भाँती प्रत्यक्ष अनुभव होने लगता है |

2-सत्य-असत्य और नित्य-अनित्य वस्तु के विवेचन का नाम विवेक हैं| विवेक इसका भलीभांति पृथ्थकरण कर देता हैं| विवेक का अर्थ हैं, तत्व का यथार्थ अनुभव करना| सव अवस्थाओं में और प्रत्येक वस्तु में प्रतिक्षण आत्मा-आनात्मा का विश्लेषण करते करते, यह सिध्दी प्राप्त होती हैं|

3-''बिनु सत्संग विवेक न होई| राम कृपा बिनु सुलभ न सोई||'' अर्थात बिना सत्संग के विवेक नही मिलता, प्रभु कृपा के बिना सत्संग नही मिलता| सज्जन पुरुषों का सत्संग करने से पाप नष्ट होता है, कुसंस्कार नष्ट होता है, उत्तम संस्कार प्राप्त होता है, और नित्य-अनित्य का विवेक मिलता है| सत्संग के द्वारा ही विवेक प्राप्त होता है, यह विवेक मनुष्य की पहली योग्यता है| (2) वैराग्य - भोगविराग :--

03 FACTS;-

1-वैराग्य - विवेक द्वारा सत - असत और नित्य - अनित्य का प्रिथकीकरण हो जाने पर असत और अनित्य से सहज ही राग हट जाता है , इसी का नाम ' वैराग्य ' है | मनमें भोगों की अभिलाषाएँ बनी हुई हैं और ऊपर से संसार से द्वेष और घृणा कर रहे हैं , इसका नाम ' वैराग्य ' नहीं है | वैराग्य यथार्थ में आभ्यंतरिक अनासक्ति का नाम है |

2-जागतिक एवं स्वार्गिक दोनों प्रकार के भोग-ऐश्वर्यों से अनासक्ति| जब मनुष्य की विवेक शक्ति पूर्ण रूप से जागृत हो जाती है तब उसे संसार से वैराग्य हो जाता है, और संसार के विषय भोगों की आसक्ति नष्ट हो जाती है, तब मनुष्य संसार के विषय भोगों में लिप्त नही होता, निष्काम भाव से कर्म करता है और कर्म-फल के बंधन से मुक्त हो जाता है| यह वैराग्य मनुष्य की दूसरी योग्यता है|

3-जिनको सच्चा वैराग्य प्राप्त होता है , उन पुरुषों के चित्त में ब्रह्मलोक तक के समस्त भोगों में तृष्णा और आसक्ति का अत्यंत अभाव हो जाता है | जब तक ऐसा वैराग्य न हो , तब तक समझना चाहिए की विवेक में त्रुटि रह गई है | विवेक की पूर्णता होने पर वैराग्य अवश्यम्भावी है |विवेक के द्वारा असत और अनित्य से सहज ही राग हट जाता हैं, इसी का नाम वैराग्य हैं| मन में भोगो की अभिलाषायें बनी हुई हैं और वाह्य रूप में संसार से द्वेष और घृणा कर रहे हैं, इसका नाम वैराग्य नहीं हैं| वैराग्य में राग का सर्वथा आभाव होता हैं| वैराग्य यथार्थ में आभ्यंतरिक अनासक्ति का नाम हैं| (3) षट-सम्पति;-

02 FACTS;-

1-इस विवेक और वैरग्य के फलस्वरूप साधक को छह विभागों वाली एक परिसंपति मिलती हैं, वह पूरी न मिले तब यह समझना चाहिए कि विवेक और वैराग्य में कसर हैं| Shat Sampatti >>> षट् सम्पत्ति:>>> 6 Virtues: 1-1) Sham >>> शम>>> Balance of mind 1-2) Dam >>> दम>>> Mastery over senses 1-3) Uparati >>> उपरति>>> Observance of Dharma 1-4) Titiksha >>> तितिक्षा>>> Endurance of tough conditions 1-5) Shraddha >>> श्रद्धा>>> Faith in God/Vedas 1-6) Samadhaan >>> समाधान>>> Focus of mind

2-शम, दम, उपरति, तितिक्षा,श्रद्धा, समाधान-- ये छः साधन हैं और इस सम्पति का नाम षट-सम्पति हैं| वैराग्य होने के बाद ... इन छः गुणों का होना बड़ा आवश्यक है|

विवेक और वैराग्य से संपन्न हो जाने पर ही साधक को इस परमसम्पत्ति का प्राप्त होना सहज हैं|

1-शम का क्या अर्थ है?--

मन का पूर्णरूप से निगृहीत , निश्चल और शांत हो जाना ही ' शम ' है | विवेक और वैराग्य की प्राप्ति होने पर मन स्वाभाविक ही निश्चल और शांत हो जाता है | मन का पूर्ण रूप से निगृहीत, निश्चल और शांत हो जाना ही “शम” हैं|

2-दम का क्या अर्थ है?-

इन्द्रियों का पूर्णरूप से निगृहीत और विषयों के रसास्वाद से रहित हो जाना ' दम ' है |

3- उपरति का क्या अर्थ है?-

विषयों से चित्त का उपरत हो जाना ही उपरति है | जब मन इन्द्रियों को विषयों में रसानुभूति नहीं होगी , तब स्वाभाविक ही साधक की उनसे उपरति हो जायेगी | यह उपरति भोगमात्र से - केवल बाहर से ही नहीं , भीतर से - होनी चाहिए | विषयों से चित्त का उपरत हो जाना ही “उपरति” हैं|

4 -तितिक्षा का क्या अर्थ है?-

02 POINTS;-

द्वन्द्वों को सहन करने का नाम तितिक्षा है | यद्यपि सर्दी - गर्मी , सुख - दू:ख , मान - अपमान आदि का सहन करना भी ' तितिक्षा ' है ; परन्तु विवेक , वैराग्य और शम , दम , उपरति के बाद प्राप्त होने वाली तितिक्षा तो इससे कुछ विलक्षण ही होनी चाहिए |

2-द्वन्द्व- जगत से ऊपर उठकर , साक्षी होकर द्वन्द्वों को देखना , यही वास्तविक तितिक्षा है | तितिक्षा का अर्थ होता हैं “सहन-शक्ति”| द्वंदों का सहन करने का नाम तितिक्षा हैं|संसार में न तो द्वंदों का नाश हो सकता हैं और न ही कोई इससे बच सकता हैं| किसी तरह इनको सह लेना ही उत्तम हैं, परन्तु सर्वोत्तम तो हैं-द्वंद जगत से उपर उठकर साक्षी भाव होकर द्वंदों को देखना| यही वास्तविक “तितिक्षा” हैं|

5-श्रद्धा का क्या अर्थ है?-

आत्मसत्ता में प्रत्यक्ष की भांति अखंड विश्वास का नाम ही ''श्रद्धा'' है | पहले शास्त्र , गुरु और साधन आदि में श्रद्धा होती है ; उससे आत्मश्रद्धा बढती है | परन्तु जब तक आत्मस्वरूप में पूर्णश्रद्धा नहीं होती , तब तक एकमात्र निष्कल , निरंजन , निराकार , निर्गुण ब्रह्म को लक्ष्य बनाकर उसमें बुद्धि की स्थिति नहीं हो सकती |

6-समाधान का क्या अर्थ है?-

मन और बुद्धि का परमात्मा में पूर्णतया समाहित हो जाना - जैसे अर्जुन को गुरु द्रोण के सामने परीक्षा देते समय वृक्ष पर रखे हुए नकली पक्षी की केवल आँख ही दिखाई पडती थी , वैसे ही मन और बुद्धि को निरंतर एकमात्र लक्ष्यवस्तु ब्रह्म के ही दर्शन होते रहना - यही समाधान है | (4) -मुमुक्षत्व क्या है?-

02 FACTS;- 1-मोक्षानुभूति की उत्कण्ठ अभिलाषा ही मुमुक्षत्व है| जब साधक शम दमादि षट सम्पत्तियों के द्वारा जितेंद्रिय हो जाता है, तब मुमुक्षुत्व मिलता है|इस प्रकार जब विवेक, वैराग्य और षट-सम्पति की प्राप्ति हो जाती हैं, तब साधक स्वाभाविक ही अविद्या के बंधन से सर्वथा मुक्त होना चाहता है और वह सब ओर से चित्त हटाकर , किसी ओर भी न देखकर , एकमात्र परमात्मा की ओर ही दौड़ता है |

2- उसका यह अत्यंत वेग से दौड़ना अर्थात तीव्र साधन ही उसकी परमात्मा को पाने की तीव्रतम लालसा का परिचय देता हैं, यही “मुमुक्षत्व” हैं| NOTE;-

ज्ञानयोग का वर्णन गीता में विस्तारपूर्वक किया गया है | उपरोक्त कठिनता को देखते हुए ही भगवान ने देहधारियों के लिए निष्काम - कर्मयोग का सुगम साधन बताया है | तथा शरणागति [ अनन्यभक्ति ] को सर्वोत्तम साधन बताया है |उपरोक्त चारों साधन .... "साधन-चतुष्टय" कहलाते हैं| ये चारों साधन ही साधक को वेदान्त दर्शन का अधिकारी बनाते हैं|

....SHIVOHAM....