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वैष्णव और शैव पद्धतियाँ का क्या महत्व है?साधक से क्या गलती होती है तंत्र साधना में?PART-03


पद्धतियों का क्या महत्व है?-

11 FACTS;-

1-भारत में वैदिक, वैष्णव, शैव, शाक्त, स्मार्त संप्रदाय हैं… लेकिन हिंदू संत समाज मुख्यत दो भागों में विभाजित है वैष्णव और शैव… और इस विभाजन का कारण आस्था और साधना पद्धतियाँ हैं, लेकिन दोनों ही सम्प्रदाय वेद और वेदांत पर एकमत है। वैरागी परम्परा वैष्णव और शैव दोनों में मिलती है, स्मृति संप्रदाय सिर्फ एक निराकार परमेश्वर को मानता है।

वैरागी बनना बहुत कठिन है संत संप्रदाय में दीक्षित होने के लिए कई तरह के ध्यान, तप और

योग की क्रियाओं से व्यक्ति को गुजरना होता है तब ही उसे शैव या वैष्णव साधु-संत मत में प्रवेश मिलता है।

2-आज व्यक्ति जीवन भर मन्दिर जाते हैं, सत्य नारायण की कथा तो कराते हैं, यज्ञ भी कराते हैं, परन्तु उन्हें न तो किसी प्रकार की कोई साधनात्मक अनुभूति होती है और न ही किसी देवी या देवता के दर्शन ही होते हैं फिर भी वे स्वयं साधना के क्षेत्र में पदार्पण नहीं करते|वह पूजा, कर्मकांड मात्र 'एबीसीडी ' है जिसमें समाज आज पूरी तरह फंसा है|साधना केवल वही बता सकता है जो सूक्ष्म को जानता है| आज कई पुजारी , पंडित मिल जायेंगे पर वे सूक्ष्म को नहीं जानते , उनमें कोई साधनात्मक बल नहीं होता है| यही कारण है कि यदि व्यक्ति सूक्ष्म को जीवन में स्थान दें, तो वह सब कुछ स्वयं ही प्राप्त कर सकता है|

3-हम छोटी क्लास में 'एबीसीडी' पढ़ते हैं परंतु क्या हम डिग्री कॉलेज में भी 'एबीसीडी' पढ़ते हैं?वास्तव में,हमारे शास्त्र कोड लैंग्वेज में हैं।शास्त्रों

के द्वारा हमें हिंट दिया गया था !और हमारे गुरुओ को यह उम्मीद थी कि इस हिंट /Clue से हम धीरे-धीरे डिग्री कॉलेज तक पहुंच जाएंगे, परंतु क्या हुआ? हम तो केवल 'एबीसीडी' ही पढ़ते रहे। वहीं पर रुक रुक गए।

हमारे तीन शरीर है-स्थूल,सूक्ष्म और कारण ।हमारा स्थूल शरीर ब्रह्मा है। कारण श्री विष्णु है और सूक्ष्म शरीर शिव।वैष्णव पद्धति हमें स्थूल शरीर का ज्ञान देती है और शैव पद्धति सूक्ष्म का।

4-तो कोई स्थूल शरीर के ज्ञान में फँस गया तो कोई सूक्ष्म शरीर के ज्ञान में में फँस गया। दोनों ही अधूरे हो गये।वास्तव में, कोई भी पद्धति

इनफीरियर या सुपीरियर नहीं है।बात केवल साम्यावस्था की है।

विष्णु केवल शिव के कारण अथार्त जनकल्याण से प्रसन्न होते हैं तो हम स्थूल शरीर को वैष्णव पद्धति का ज्ञान दें।परंतु सूक्ष्म का ज्ञान जाने बिना

विष्णु प्रसन्न नहीं होंगे।जब तक हम अपने सूक्ष्म शरीर को नहीं जानेंगे ;हम

हरिहर को नहीं मिला पाएंगे।हरिहर को मिलाने के बाद ही हमें आत्मा का ज्ञान होता है।

5-इसलिए कोई हरि में फंसा है तो कोई हर में फंसा है और दोनों ही रो रहे हैं।दोनों ही अधूरे हैं और जब तक दोनों को नहीं मिलाया जाएगा, अधूरे ही

रहेंगे।ना वैष्णव पद्धति अच्छी है ना तंत्र पद्धति ;और दोनों ही अच्छे हैं क्योंकि एक हमें शरीर को सही ढंग से रखना बताती है।तो दूसरी हमें

सूक्ष्म का ज्ञान कराती है।हमें दोनों ही पद्धतियां चाहिए।वैष्णव पद्धति

स्वच्छता पर आधारित है और स्वच्छता का ज्ञान भी आवश्यक है। परंतु जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है। हम यह नियम पालन नहीं कर पाते। हमारा पूरा जीवन सूक्ष्म को जाने बिना अधूरा हो जाता है।

6-वास्तव में हम एक अंधकार से ही आए हैं और एक अंधकार में ही जाना है।केवल बीच में ही हम प्रकट हैं।तो फिर हमें उस अंधकार का ज्ञान क्यों नहीं करना चाहिए? वरना जैसे ही शरीर छूटेगा। हमारा रोना प्रारंभ हो जाएगा। ऊपर से अपने घर वालों को भी परेशान करेंगे। तो सूक्ष्म का ज्ञान हमें केवल तंत्र से ही हो सकता है।इसलिए दोनों ही पद्धतियां अनिवार्य है। अब यह हमारा निर्णय है कि हम एबीसीडी ही पढ़ते रहें या डिग्री कॉलेज में भी जाएं।

7-बहुत मामलों में देखा गया है कि मरने के बाद आत्माएं सपने देकर कांटेक्ट करती रहती हैं।सपने भी वे उन्हीं लोगों को दे

सकती हैं ;जिनका सूक्ष्म जागृत है। जिन्हें सूक्ष्म का बोध ही नहीं है;उन्हें तो वे सपने भी नहीं दे सकती।वैष्णव पद्धति हमें स्थूल शरीर का ज्ञान तो करा देती है।लेकिन सूक्ष्म शरीर को जाने बिना हमें भटकना ही पड़ेगा।

भटकती आत्माएं तो स्वयं भी परेशान होती है और दूसरों को भी परेशान ही करती है।तो हम ऐसा करें कि 'एबीसीडी' का भी सम्मान करें और डिग्री कॉलेज का भी।

8-वैष्णव पद्धति और तंत्र पद्धति में साधना विधि, पूजा का प्रकार, न्यास सभी कुछ लगभग एक जैसा ही होता हैं, बस अंतर होता हैं, तो दोनों के मंत्र विन्यास में, तांत्रोक्त मंत्र अधिक तीक्ष्ण होता हैं! जीवन की किसी भी विपरीत स्थिति में तंत्र अचूक और अनिवार्य विधा हैं। महानिर्वाण तंत्र में भगवान भोलेनाथ माता पार्वती से कहते हैं कि कलयुग में तंत्र ही एकमात्र मोक्ष प्राप्त का रास्ता होगा।अशुद्धता के कारण वैष्णव मंत्र विषहीन सर्प की भांति फलित नहीं होंगे।इसलिए आज के युग में तंत्र ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।

9-चाहे ज्योतिष हो या वास्तु ..दोनों ही 360-डिग्री के भचक्र पर आधारित है ।एक 180 डिग्री पर है वैष्णव पद्धति और दूसरी 180 डिग्री पर है तंत्र पद्धति।जिसने मिर्च नहीं खाई उसे मिठाई का स्वाद भी पता नहीं चलेगा। कड़वा खाने के बाद ही मीठा अच्छा लगता है। तो दोनों साइड्स की 180 डिग्री को जानना जरूरी है।अन्यथा ना तो तुम पूरे 360-डिग्री को जान पाओगे और ना ही सेंटर में आ पाओगे। सेंटर का अर्थ है मध्य में होना ;साम्यावस्था प्राप्त करना ।दोनों ही पद्धतियों को जानकर /समझ कर, हम साम्यावस्था प्राप्त कर सकते हैं।

10-दोनों ही पद्धतियां नाम जप सुमिरन ,ध्यान आदि पर विश्वास करती हैं।

वैष्णव पद्धति में ईश्वर को भावपूर्ण ढंग से नहलाना ,खिलाना,भोग लगाना

आदि विधियां हैं।शैव पद्धति में यही मानसिक ध्यान के द्वारा किया जाता है।

दोनों ही पद्धतियों में हवन होते हैं।दोनों ही पद्धतियों में ईश्वर से प्रेमाभक्ति की विधियां है।वैष्णव पद्धति में गोपी प्रेम है अथार्त गोपी बनकर प्रेम करने का ढंग है जैसे मीरा।

11-परंतु शैव पद्धति में भैरव- भैरवी साधना का इस्तेमाल किया जाता है।केवल यहीं पर एक अंतर आता है और यही सबसे बड़ी समस्या का कारण है।मीरा की पद्धति में समाज को कोई परेशानी नहीं है।परंतु इस पद्धति (भैरवी साधना)से समाज में समस्याएं उत्पन्न होती है और यही कारण है कि राजा भोज ने एक लाख तांत्रिक जोड़ियों की हत्या करवा दी थी ;तो हमें इस पद्धति की समस्या को समझना पड़ेगा।

क्या समस्या है इस पद्धति में ?क्यों बड़े बड़े गुरु लोग भी इस पद्धति में फँस कर अपना जीवन बर्बाद कर देते हैं?-

05 FACTS;-

1-हमारे शास्त्रों (शिव पुराण) में दिया गया है कि देवी सती ने शिव को पाने के लिए नृत्य ,संगीत का सहारा लिया और उन्हें भैरव रूप में पा लिया।

हमने इस बात को अच्छी तरह समझ लिया और सब इसी का पालन करने लगे। परंतु हम यह भूल गए कि जब देवी पार्वती ने संगीत का , रुद्राक्ष का सहारा लिया तो शिव ने नेत्र भी नहीं खोला ।और जब उन्होंने भैरवी रूप धारण किया और कामदेव की सहायता ली ...तो परिणाम सभी को मालूम

है।

2-शिव का तीसरा नेत्र खुल गया ;कामदेव को भस्म होना पड़ा और देवी पार्वती को हजारों साल तपस्या करनी पड़ी।शिव भी चाहते थे कि देवी शिव तत्व का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करें। तब कहीं जाकर देवी , शिव तक पहुंच पाई। हमने देवी पार्वती को नहीं समझा देवी और देवी सती को फॉलो करने लगे और यही हमारे लिए सबसे बड़ी भूल बन गई।शिव तक ना तो हम संगीत से और ना ही रुद्राक्ष आदि से पहुंच सकते है।देवी सती को शिव का ज्ञान नहीं था।वह बहुत ही इनोसेंट थी।परंतु देवी पार्वती को शिवज्ञान था, इसलिए शिव उन्हें उस विधि से नहीं मिले। हमें देवी पार्वती की ज्ञानविधि को समझना पड़ेगा।

3-तांत्रिक जोड़ों ने भैरव- भैरवी साधना विधि के द्वारा शिव तक पहुंचने की कोशिश की।बहुत से गुरुओं ने भी यह कोशिश की। परिणाम यह हुआ कि वे अपमानित हुए ;जेल गए आदि-आदि।भैरव- भैरवी साधना विधि का

सिर्फ इतना ही अर्थ है कि गृहस्थ जीवन में भी हम पति-पत्नी कामवासना को प्रेम में ट्रांसफार्म कर दें और ईश्वर तक पहुंच जाएं। तंत्र साधना में शक्तियों के लालच में यह क्रिया की गई और शिव का तीसरा नेत्र खुला।

4-बड़े-बड़े ज्ञानी गुरुओं ने भी यह गलती की।तो हम यह समझ ले कि हम शिव को भैरव- भैरवी साधना विधि के द्वारा नहीं पा सकते और यदि हमने ऐसा करने का प्रयास किया तो शिव का तीसरा नेत्र खुलेगा।इसमें कोई दो

राय नहीं है।अब हमें यह जानना है कि शिव तक पहुंचने का रास्ता क्या है। वास्तव में 'एलिमेंट्स आर नेक्स्ट टू गॉड' और इसलिए हमें एलिमेंट को समझना पड़ेगा।सभी त्रिदोष- त्रिगुण (6) में हमें शिव को देखना पड़ेगा और साम्यावस्था बनानी पड़ेगी तो शिव तक पहुंच जाएंगे।

5-हमें यह भी समझना पड़ेगा कि शिव तक पहुंचने के लिए कोई भी डायरेक्ट सीधा/ मार्ग नहीं है।देवी शक्ति ही हमें उन तक पहुंचा सकती है परंतु देवी शक्ति भी हमें तभी पहुंचाती है जब हमारा कारण पर्सनल ना होकर जनकल्याण का होता है।वैष्णव पद्धति में षोडशोपचार पूजन होता है, लेकिन तंत्र में पंचोपचार पूजन होता है।फिर हम पांच तत्वों से त्रिगुण में ,द्वैत में और अंत में हम अद्वैत तक पहुंच जाते हैं।वैष्णव पद्धति हमें स्थूल का ज्ञान करा देती है और तंत्र हमें सूक्ष्म से सूक्ष्मतर अथार्त 16 से 5; 5 से 3; 3 से 2 और अंत में अद्वैत की ओर ले जाता हैं।

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तंत्र IN NUTSHELL;-

21 FACTS;-

1-कामिका तंत्र के अनुसार, तंत्र शब्द दो शब्दों के मेल से बना हैं पहला ‘तन’ तथा दूसरा ‘त्र’। ‘तन’ शब्द का अर्थ प्रचुर मात्रा में गहरे ज्ञान से हैं तथा ‘त्र’ शब्द का अर्थ सत्य से हैं। अर्थात प्रचुर मात्र में वह ज्ञान जिसका सम्बन्ध सत्य से है .. वही तंत्र हैं। तंत्र संप्रदाय अनुसार वर्गीकृत हैं, भगवान विष्णु के अनुयायी! जो वैष्णव कहलाते हैं, इनका सम्बन्ध ‘संहिताओं’ से हैं तथा शैव तथा शक्ति के अनुयायी! जिन्हें शैव या शक्ति संप्रदाय के नाम से जाना जाता हैं, इनका सम्बन्ध क्रमशः आगम तथा तंत्र से हैं। आगम तथा तंत्र शास्त्र, भगवान शिव तथा पार्वती के परस्पर वार्तालाप से अस्तित्व में आये हैं तथा इनके गणो द्वारा लिपि-बद्ध किये गए हैं। ब्रह्मा जी से सम्बंधित तंत्रों को ‘वैखानख’ कहा जाता हैं।

2-तंत्र, का संधि- विच्छेद करें तो दो शब्द मिलते हैं – तं- अर्थात फैलाव और त्र अर्थात बिना रुकावट के। ऐसा फैलाव या नेटवर्क जिसमें कोई रुकावट या विच्छेद न हो। जो एकाकी हो, जो अनंत में फैला हुआ हो ;सतत हो । इसलिए तंत्र अनंत के साथ जुड़ने का एक साधन है।

कभी किसी दूसरी संस्कृति ने इईश्वर तक पहुँचने के लिए इतनी गहन विचारणीय शब्द का प्रयोग शायद ही किया होगा। तंत्र द्वैत को नहीं मानता है। तंत्र में मूलभूत सिद्धांत है कि ' ऐसा

कुछ भी नहीं है, जो की दिव्य न हो'।तंत्र अहंकार को पूरी तरह समाप्त करने की बात करता है, जिससे द्वैत का भाव पूर्णतया विलुप्त हो जाता है। तंत्र पूर्ण रूपांतरण की बात करता है। ऐसा रूपांतरण जिससे जीव और ईश्वर एक हो जाएँ। ऐसा करने के लिए तंत्र के विशेष सिद्दांत तथा पद्धतियां हैं, जो की जाननेऔर समझने में जटिल मालूम होती हैं।

3-तंत्र का जुडाव प्रायः मंत्र, योग तथा साधना के साथ देखने को मिलता है।तंत्र- शास्त्र से

तात्पर्य उन गूढ़ साधनाओं से है जिनके द्वारा इस संसार को संचालित करने वाली विभिन्न दैवीय शक्तियों का आव्हान किया जाता है। तंत्र साधना के समय उच्चारित मंत्र, विभिन्न मुद्रायें एवं क्रियाएं अत्यंत व्यवस्थित , नियमित एवं नियंत्रित तरीके से होती हैं।वास्तव में, तंत्र की

परिभाषा बहुत सीधी और सरल है। सामान्य शब्दों में कहें तो तंत्र शब्द का अर्थ तन यानी शरीर से जुड़ा है। ऐसी सिद्धियां जिन्हें पाने के लिए पहले तन को साधना पड़े या ऐसी सिद्धियां जिन्हें शरीर की साधना से पाया जाए, उसे तंत्र कहते हैं।

4-तंत्र एक तरह से शरीर की साधना है। एक ऐसी साधना प्रणाली, जिसमें केंद्र शरीर होता है। तंत्र शास्त्र का प्रारंभ भगवान शिव को माना गया है। शिव और शक्ति ही तंत्र शास्त्र के अधिष्ठाता देवता हैं। शिव और शक्ति की साधना के बिना तंत्र सिद्धि को हासिल नहीं किया जा

सकता है।एक बार “माता पार्वतीजी” ने “परमपिता महादेव शिव” से प्रश्न किया की - '' हे महादेव, कलयुग मे धर्म या मोक्ष प्राप्ति का क्या मार्ग होगा ”?उनके इस प्रश्न के उत्तर मे

महादेव शिव ने उन्हे समझाते हुए जो भी व्यक्त किया तंत्र उसी को कहते हैं।उन्होंने कहा कि

''कलयुग में लोग वेद में बताये गए नियमो का पालन नही करेंगे। इसलिए नियम और शुद्धि रहित वैदिक मंत्र का उच्चारण करने से कोई लाभ नही होगा।और गृहस्थ लोग जो वैसे ही बहुत कम नियमो को जानते हैं उनकी पूजा का फल उन्हे पूर्णतः नही मिल पायेगा'' ।

5-महानिर्वाण तंत्र में महादेव शिव कहते है कि ''इस कलियुग में, सारे वैदिक मंत्र विषहीन सर्प की भांति फलित नहीं होंगे।सत्य युग, त्रेता और द्वापर युग में यह समस्त मंत्र सफल होते थे लेकिन इस समय ये सारे मन्त्र, मृत तुल्य हो गये हैं इस प्रकार से इस कलिकाल में मंत्र के द्वारा

कार्य करने से फल सिद्धि नहीं होती केवल श्रम ही होता है ।कलि-काल (यानी कलियुग में) में अन्य शास्त्रोक्त विधि द्वारा जो मनुष्य सिद्धि प्राप्त करने की इच्छा करता है वह निर्बोध प्यासा हो कर भी गंगा जी के किनारे कुआ खोदता हैऔर अपना समय तथा उर्जा को व्यर्थ करता है।तंत्र शास्त्र में कहे हुए मंत्र कलियुग में शीघ्र फल देने वाले होते हैं | जप ,यज्ञादि समस्त कर्मों में तंत्रोक्त मंत्र ही श्रेष्ठ हैं ''|

6-योग में तंत्र का विशेष महत्व है। योग तथा तंत्र दोनों, अध्यात्मिक चक्रों की शक्ति को विकसित करने की विभिन्न पद्धतियों के बारे में बताते हैं। हठयोग और ध्यान उनमें से एक है।

विज्ञानं भैरब तंत्र में ध्यान की 112 वैज्ञानिक पद्धति है जो भगवान शिव ने देवी पारवती को बताई है। जिसमें सामान्‍य जीवन की विभिन अवस्थाओं में ध्यान करने की विशेष पद्धति वर्णित है। तंत्र मंत्र का लिखित प्रमाण लगभाग मध्य कालीन इतिहास से मिलना शुरू हो जाता है। इसीलिए लगभग सभी धर्मों में जीवन की समस्याओं का हल तंत्र मंत्र के माध्यम से बताया गया है। तांत्रिक पद्धति में योनी तंत्र का विशेष महत्व है। इस ग्रन्थ में, दस महाविद्या (देवी के दस तांत्रिक विधिओं से उपासना) वर्णित है ।

7-तंत्र के अनुसार ब्रह्मांड की रचना माँ काली ने की। हमारे शरीर के अंदर लघु ब्रह्मांड है, जिसमे काली के दस रूप विराजमान हैं। तांत्रिक मंत्र मूलतः नाद -स्वर हैं, जो ब्रह्मांड में भी मौज़ूद हैं। जब हम किसी महाविद्या का मंत्र जाप करते हैं तो ब्रह्मांड में मौज़ूद उस नाद से जुड़ जाते हैं। इसलिये कोई भी दूसरा व्यक्ति आपके लिए मंत्र पाठ कर ही नहीं सकता। उसका फल आपको कदापि नहीं मिल सकता ।दस महाविद्या में से 5 हरी (भुवनेश्वरी,षोडशी, बगलामुखी ,मातंगी और कमला)से संबंधित हैं तो 5 हर (काली, तारा, छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी और धूमावती) से संबंधित हैं।हरी से संबंधित महाविद्या भोग ,मोक्ष तथा हर से संबंधित महाविद्या मोक्ष देती हैं।

8-तंत्र की मुख्य 10 देवियां और 10 भैरव;-

02 POINTS;-

1-तंत्र की मुख्य 10 देवियां हैं जिन्हें 10 महाविद्या कहा जाता है-

दस हैं- 1. काली, 2. तारा, 3. षोडशी, (त्रिपुरसुंदरी), 4. भुवनेश्वरी, 5. छिन्नमस्ता, 6. त्रिपुर भैरवी, 7. धूमावती, 8. बगलामुखी, 9. मातंगी और 10. कमला।

2-10 रुद्रावतार,महाविद्या भैरव हैं-

1. महाकाल, 2. तार, 3. बाल भुवनेश, 4. षोडश श्रीविद्येश, 5. भैरव, 6. छिन्नमस्तक, 7. धूमवान, 8. बगलामुख, 9. मातंग और 10. कमल।

9-तंत्र के प्रमुख पूजनीय अष्टभैरव;-

भगवान शिव मुख्यतः तीन अवतारों में अपने आपको प्रकट करते हैं 1. शिव 2. रुद्र तथा 3. भैरव, इन्हीं के अनुसार वे 3 श्रेणिओ के आगमों को प्रस्तुत करते हैं 1. शैवागम 2. रुद्रागम 3. भैरवागम। प्रत्येक आगम श्रेणी, स्वरूप तथा गुण के अनुसार हैं।भगवान भैरव को शिव का अंश अवतार माना जाता है और ये तांत्रिकों के प्रमुख पूजनीय भगवान हैं। इन्हें शिव के 10 रुद्रावतारों में से एक माना गया है। भैरव के 8 रूप हैं-

असितांग भैरव, 2. चंड भैरव, 3. रूरू भैरव, 4. क्रोध भैरव, 5. उन्मत्त भैरव, 6. कपाल भैरव, 7. भीषण भैरव, 8. संहार भैरव।

10-तंत्र के प्रमुख प्रणेता;-

तंत्र अहंकार को समाप्त कर द्वैत के भाव को समाप्त करता है, जिससे मनुष्य, सरल हो जाता है और चेतना के स्तर पर विकसित होता है। सरल होने पर ईश्वर के संबंध सहजता से बन जाता है। तंत्र का उपयोग ईश प्राप्ति की लिए सद्भावना के साथ करना चाहिए।

तंत्र के प्रणेताओं में प्रमुख हैं : दत्तात्रेय,परशुराम , नारद, पिप्पलादि , वसिष्ठ, सनक, शुक, सनन्दन तथा सनतकुमार। इसी से समझा जा सकता है कि इसे प्राचीन काल के वरेण्य बुद्धिजीवियों ने कितने शोध के बाद आम आदमी के लिये प्रतिपादित किया होगा।

11-तंत्र साधना और पंच मकार;-

02 POINTS;-

1-शाक्त मत के दो संप्रदाय हैं-समयाचार या दक्षिणाचार, और वामाचार..हृदय में चक्र भावना के साथ पाँच प्रकार के साम्य धारण करने वाले शिव ही समय कहलाते हैं। शिव और शक्ति का सामरस्य है। समयाचार साधना में मूलाधार से सुप्त कुण्डलिनी को जगा कर अंत में सहस्रार में सदा शिव के साथ ऐक्य कराना ही साधक का मुख्य लक्ष्य होता है। कुल का अर्थ है कुण्डलिनी तथा अकुल का अर्थ है शिव। दोनों का सामरस्य कराने वाला कौल है।

2-कौल मार्ग के साधक मद्य, माँस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन नामक पंच मकारों का सेवन करते हैं. ब्रह्मरंध्र से स्रवित मधु मदिरा है, वासना रूपी पशु का वध माँस है, इडा-पिगला के बीच प्रवाहित श्वास-प्रश्वास मत्स्य है। प्राणायाम की प्रक्रिया से इनका प्रवाह मुद्रा है तथा सहस्रार में मौज़ूद शिव से शक्ति रूप कुण्डलिनी का मिलन मैथुन है।

12-तंत्र साधना और बलि;-

02 POINTS;-

1-तंत्र साधना से न तो भयभीत होने की आवश्यकता है और न ही घृणा करने की। आवश्यकता है इसके वास्तविक अर्थ को समझ कर तीव्रता से इस क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने की| अधिकांशतः लोग तंत्र को वामाचार अथवा बलि परम्परा से जोड़ते हैं परन्तु तंत्र में बलि का वास्तविक अर्थ क्या है इस और ध्यान दिया ही नहीं गया| ग्राम देवता, कुल देवता या इष्ट देवता को प्रसन्न करने के लिये बलि परम्परा आदि गाँवों में प्रचलित है, और कई ओझा, तांत्रिक बलि देते भी हैं, परन्तु शायद उन ढोंगियों को यह ज्ञात नहीं है कि बलि का तात्पर्य होता है अपने अहंकार की बलि, अपनी पाशविक प्रवृत्तियों की बलि न कि किसी पशु या भैस की बलि| इस अहम् की बलि के बाद इष्ट देवता के प्रति समर्पण का भाव उत्पन्न होता है और ईश्वरीय कृपा प्राप्त होती है|

2-जहाँ तक बलि का सवाल है, जिस जीव की आप बलि ले रहे हैं उसका सृजन भी तो माँ काली ने ही किया है, तो आपको लाभ और उसे मृत्यु को वह कैसे और क्यों पसंद करेंगी ? स्पष्ट है कि यह सब कृत्रिम रूप से आरोपित प्रक्रियाएँ हैं जो कुछ शताब्दियों से तंत्र के नाम पर जोड़ दी गयी हैं।तंत्र या साधना क्षेत्र तो पूर्ण सात्विक प्रक्रिया है, जिसे मात्र आत्म शुद्धि द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है| इसमें मांस, मदिरा, मैथुन आदि का तो नाम ही नहीं है, अपितु इसके विपरीत साधनाओं में सफलता तभी मिल सकती है, जब साधक अपने विकारों, काम, क्रोध, लोभ, अहम् की बलि दे सके| केवल यही बलि साधक को देनी होती हैं|

14-तंत्र में श्मशान;-

तंत्र में श्मशान, उजाड़ स्थान आदि को भी इसलिए चुना जाता है जिससे कि साधक का जीवन के अंतिम सत्य से साक्षात्कार हो सके तथा उसे ईश्वर की सार्वभौमिकता एवं जीवन की निरर्थकता का आभास हो। यह एक तरह की ऐसी विद्या है जो व्यक्ति के शरीर को अनुशासित बनाती है, शरीर पर खुद का नियंत्रण बढ़ाती है।तंत्र वास्तव में अंधविश्वास को तोड़ता है। तंत्र निराकार, सर्वव्यापी परब्रह्म को जानने का क्रांतिकारी और वैज्ञानिक तरीक़ा है।

15-तंत्र साधना और षट्कर्म

02 POINTS;-

1-तंत्र मंत्र की सभी तांत्रिक कियाएं जिनमें - सम्मोहन, वशीकरण, उचाटन षट्कर्म साधन मुख्य हैं, मंत्र महार्णव तथा मंत्र महोदधि नामक ग्रंथों में वर्णित हैं।तंत्र साधना में षट्कर्म एक साधक को ध्यान की स्टेजस बताने के लिए निर्धारित किया गया हैं।षट्कर्म हैं...

1. शांति कर्म 2. मोहन, आकर्षण, वशीकरण 3. स्तंभन कर्म 4. उच्चाटन कर्म 5. विद्वेषण कर्म 6. मारण कर्म

1-1. शांति कर्म ;-

सर्वप्रथम है शांति कर्म ..जब हमें ईश्वर की कृपा दिखती है तो हमारा मन अंदर से शांत होता है। तब हम संसार के माया जाल को किनारे करके अपने सूक्ष्म की ओर बढ़ते हैं।

1-2. मोहन/आकर्षण/वशीकरण;-

मोहन का अर्थ है अपने इष्ट देव के प्रति मोहित होना। वशीकरण का अर्थ है अपने मन का वशीकरण करना।जब हमारा मन अंदर से शांत हो जाता है तो हमारा सूक्ष्म के प्रति आकर्षण बढ़ता है। हम अपनी सोच में सूक्ष्म के प्रति वशीभूत हो जाते हैं।एक दूसरी ही दुनिया में प्रवेश कर जाते हैं ..जो स्थूल दुनिया से बिल्कुल अलग है।

1-3. स्तंभन कर्म ;-

इसके बाद है स्तंभन..इसका अर्थ है गति को रोकना।जब हम दूसरी दुनिया में प्रवेश करते हैं तो समय रुक जाता है। हमें पता ही नहीं चलता कि हम कितने घंटे से ध्यान कर रहे थे कितनी घंटे से हम बातें कर रहे थे या कितने घंटे से हम डूबे हुए थे।

1-4. उच्चाटन कर्म ;-

उच्चाटन का अर्थ है मोक्ष प्राप्ति के लिए छटपटाहट। जब हम सूक्ष्म दुनिया का आनंद लेते हैं तो हमारा मन इस स्थूल दुनिया से हट जाता है, उचट जाता है। शायद यही कारण है कि श्री राम ने 14 वर्षों का वनवास लिया।श्रीकृष्ण भी 16 वर्ष तक अपने माता-पिता से दूर रहे ..संदीपन आश्रम भी गए। या इधर हम 500 वर्षों की बात करें तो लिओनार्दो दा विंची (इटलीवासी, महान चित्रकार ... 'द लास्ट सपर'. मोना लिसा) भी बहुत वर्षों के लिए जंगल में गायब हो गया था। इसके बाद ही उसने महत्वपूर्ण काम किए।

1-5. विद्वेषण कर्म;-

इसके बाद जब हम सूक्ष्म दुनिया की अनुभूति कर लेते हैं तो हमें दोनों तरफ ...साउथ पोल -नॉर्थ पोल ;दोनों का ज्ञान हो जाता है। हम दोनों को मिला देते हैं। इसे हम यह भी कह सकते हैं कि दोनों में विद्वेष पैदा कर देते हैं।विद्वेष का अर्थ है अर्धनारीश्वर सिद्ध करना।क्योकि दोनों में विद्वेष पैदा होने/ द्वैत सिद्धि के बाद ही हम अद्वैत की ओर बढ़ते हैं।तभी हम सेंटर में पहुंच पाते हैं ;जिसे साम्यावस्था कहते हैं।

1-6. मारण कर्म;-

और अंत में आता है मारण! मारण का अर्थ है अपने काम ,क्रोध आदि षट्दोषो का नाश करना।साम्यावस्था में पहुंचने के बाद हमारे नाम, रूप अस्तित्व का अंत हो जाता है। बूंद सागर में समा जाती है। हम द्वैत सेअद्वैत में पहुंच पाते हैं ;और सागर का एक ही नाम होता है- ''शिव शिव शिव''।

2-यह सभी ध्यान की छह स्टेजस हैं।इन षट्कर्म का उपयोग तारकासुर जैसे लोग स्थूल रूप से करते हैं।वे जबरदस्ती शिव से सरंक्षण चाहते हैं।परंतु उन्हें यह नहीं मालूम कि शिव किसी को भी अमृतव का वरदान नहीं

देते। यह वही कारण है कि हम न्यूक्लियर बम को किसी के ऊपर ईटा

फेकने के लिए इस्तेमाल करें।जो ऊर्जा हमें शिव बना सकती हैं उसे हम

व्यर्थ के कामों में बर्बाद करते हैं।तो जो भी स्थूल रूप से इन षट्कर्म का इस्तेमाल करता है उसका परिणाम भी वही होगा, जो तारकासुर का होता है।देवी काली न राक्षसों को छोड़ती है ना देवताओं को। इसलिए तंत्र का उपयोग केवल ईश्वर प्राप्ति के लिए ही करना चाहिए।

16-तंत्र के शास्त्र;-

05 POINTS ;-

1-'यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे' की उक्ति के अनुसार हमारे शरीर की रचना भी उसी आधार पर

हुई है जिस पर पूर्ण ब्रह्माण्ड की। तंत्र-विद्या का सम्बन्ध उत्पत्ति, विनाश, साधना, अलौकिक शक्तियों से होते हुए भी इसका मुख्य उद्देश्य मोक्ष प्राप्त करना हैं।इसके लिए अन्तर्मुखी होकर साधनाएँ की जाती हैं।तांत्रिक साधना को साधारणतया तीन मार्ग : वाम मार्ग, दक्षिण मार्ग व मधयम मार्ग कहा गया है। हिन्दू धर्म के अनुसार मोक्ष ही सर्वोत्तम तथा सर्वोच्च प्राप्य पद हैं। 2-मोक्ष यानी जन्म तथा मृत्यु के बंधन से मुक्त होकर अपने आत्म-तत्व को ब्रह्म में विलीन करना मोक्ष कहलाता हैं; जीव 84 लाख योनि प्राप्त करने के पश्चात मानव देह धारण करता

हैं।तंत्रों के अनुसार मानव शरीर 3 करोड़ नाड़ियों से बना हैं तथा इनमें प्रमुख इड़ा, पिंगला तथा सुषुम्ना हैं तथा यह मानव देह के अंदर रीढ़ की हड्डी में विद्यमान हैं। तंत्र-विद्या द्वारा कुंडलिनी शक्ति को जागृत कर, इन्हीं तीन नाड़ियों द्वारा ब्रह्म-रंध तक लाया जाता हैं, यह प्रक्रिया पूर्ण योग-मग्न कहलाता हैं तथा अपने अंदर ऐसी शक्तियों को स्थापित करता हैं जिससे व्यक्ति अपने चारो पुरुषार्थ सिद्द कर सकता हैं।

3-तंत्र शास्त्र भारत की एक प्राचीन विद्या है। तंत्र ग्रंथ भगवान शिव के मुख से आविर्भूत हुए हैं। उनको पवित्र और प्रामाणिक माना गया है। भारतीय साहित्य में 'तंत्र' की एक विशिष्ट स्थिति है, पर कुछ साधक इस शक्ति का दुरुपयोग करने लग गए, जिसके कारण यह विद्या बदनाम हो गई।तंत्र शास्त्र वेदों के समय से हमारे धर्म का अभिन्न अंग रहा है। वैसे तो सभी साधनाओं में मंत्र, तंत्र एक-दूसरे से इतने मिले हुए हैं कि उनको अलग-अलग नहीं किया जा सकता, पर जिन साधनों में तंत्र की प्रधानता होती है, उन्हें हम 'तंत्र साधना' मान लेते हैं।

4-दार्शनिक दृष्टि से तंत्र तीन भागों में विभाजित हैं 1. द्वैत 2. अद्वैत तथा 3. द्वैता-द्वैत।इनके अतिरिक्त वैचारिक मत से तंत्र शास्त्र चार भागों में विभक्त है; 1. आगम 2. यामल 3. डामर 4. तंत्र। प्रथम तथा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आगम ग्रन्थ माने जाते हैं! आगम वे ग्रन्थ हैं जो भगवान शिव तथा पार्वती के परस्पर वार्तालाप के कारण अस्तित्व में आये हैं तथा भगवान विष्णु द्वारा मान्यता प्राप्त हैं। भगवान शिव द्वारा कहा गया तथा पार्वती द्वारा सुना गया! आगम नाम से जाना जाता हैं; इसके विपरीत पार्वती द्वारा बोला गया तथा शिव जी के द्वारा सुना गया निगम के नाम से जाना जाता हैं। इन्हें सर्वप्रथम भगवान विष्णु द्वारा सुना गया हैं तथा उन्होंने ही आगम-निगमो को मान्यता प्रदान की हैं। भगवान विष्णु के द्वारा गणेश, गणेश द्वारा नंदी तथा नंदी द्वारा अन्य गणो को इन ग्रंथों का उपदेश दिया गया हैं। 5-आगम ग्रंथों के अनुसार शिव जी पंच-वक्त्र हैं, अर्थात इनके पाँच मस्तक हैं; जो पाँच तत्व एवं चित्त के प्रतीक हैं। 1. ईशान (आकाश तत्व)2. तत्पुरुष(वायु तत्व) 3. सद्योजात (पृथ्वी तत्व)4. वामदेव(जल तत्व )5. अघोर(अग्नि तत्व)। शिव जी के प्रत्येक मस्तक भिन्न-भिन्न प्रकार की शक्तिओं के प्रतीक हैं; क्रमशः सिद्धि, आनंद, इच्छा, ज्ञान तथा क्रिया हैं।

17-तंत्र साधना की शंकाये;-

03 POINTS ;-

1-गुरु गोरखनाथ के समय में तंत्र अपने आप में एक सर्वोत्कृष्ट विद्या थी और समाज का प्रत्येक वर्ग उसे अपना रहा था! जीवन की जटिल समस्याओं को सुलझाने में केवल तंत्र ही सहायक हो सकता हैं! परन्तु गोरखनाथ के बाद में भयानन्द आदि जो लोग हुए उन्होंने तंत्र को एक विकृत रूप दे दिया! उन्होंने तंत्र का तात्पर्य भोग, विलास, मद्य, मांस, पंचमकार को ही मान लिया ! ये ऐसी गलत धारणा समाज में फैली मूल तंत्र से अलग हट गए, धूर्तता और छल मात्र रह गया! और समाज ऐसे लोगों से भय खाने लगे कि तंत्र समाज के लिए उपयोगी नहीं हैं!

परन्तु दोष तंत्र का नहीं, उन पथभ्रष्ट लोगों का रहा, जिनकी वजह से तंत्र भी बदनाम हो गया! सही अर्थों में देखा जायें तो तंत्र का तात्पर्य तो जीवन को सभी दृष्टियों से पूर्णता देना हैं!

2-तंत्र द्वैत को नहीं मानता है।तन्त्र योग के नाम पर आज जो सर्व प्रचलित साधना है- वह शाक्त साधना है।इस शक्ति साधना को भी दो भागों में विभाजित किया गया है- दक्षिण मार्ग एवं वाम मार्ग।शक्ति पद्धति की तन्त्र साधना में प्रयुक्त होने वाले पंच मकार मद्य, मीन, मुद्रा एवं मैथुन का सूक्ष्म प्रतीक के रूप में मानकर सात्विक वृत्ति से जो साधनाएँ की जाती है- वह दक्षिण मार्ग है।विशुद्ध तन्त्र के अनुसार मैथुन का अर्थ भी स्त्री-पुरुष समागम नहीं है बल्कि मस्तिष्क के केन्द्र में होने वाला शिव एवं शक्ति का संयोग है।

3-इसके विपरीत इन पंच मकारों के शाब्दिक अर्थ के अनुरूप भौतिक पदार्थों को ही स्थूल रूप में मानकर पंच महाभूत भी माने गये हैं यथा मद्य को अग्नि, मांस को वायु, मीन को जल, मुद्रा को पृथ्वी और मैथुन को आकाश के प्रतीक मानते हैं।परन्तु वामाचार में पंच मकारों और षट्कर्म की स्थूल साधना से इसे प्रायः लोग शंकालु दृष्टि से देखते हैं।जनसाधारण में इसका व्यापक प्रचार न होने का एक कारण यह भी था कि तंत्रों के कुछ अंश समझने में इतने कठिन हैं कि गुरु के बिना समझे नहीं जा सकते । अतः ज्ञान का अभाव ही शंकाओं का कारण बना।

18-तंत्र साधना में गृहस्थ;-

02 POINTS ;-

1-तंत्र साधना में गृहस्थ भी अपनी काम शक्ति का रूपांतरण करके मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं ।तंत्र अहंकार को समाप्त कर द्वैत के भाव को समाप्त करता है, जिससे मनुष्य, सरल हो जाता है और चेतना के स्तर पर विकसित होता है;दिव्य अवस्था प्राप्त करता हैं। सरल होने पर ईश्वर के संबंध सहजता से बन जाता है। तंत्र का उपयोग ईश प्राप्ति की लिए सद्भावना के साथ करना चाहिए।

2-'तंत्र'..बड़े ही व्यवस्थित तरीके से मंत्र और साधना करने की क्रिया हैं ! किस ढंग से मंत्र का प्रयोग किया जायें, साधना को पूर्णता दी जायें, उस क्रिया का नाम तंत्र हैं! और तंत्र साधना में यदि कोई न्यूनता रह जायें, तो यह तो हो सकता हैं, कि सफलता नहीं मिले परन्तु कोई विपरीत परिणाम नहीं मिलता! तंत्र के माध्यम से कोई भी गृहस्थ वह सब कुछ हस्तगत कर सकता हैं, जो उसके जीवन का लक्ष्य हैं! तंत्र तो अपने आप में अत्यंत सौम्य साधना का प्रकार हैं ।जो पूर्ण पवित्रमय सात्विक तरीके, हर प्रकार के व्यसनों से दूर रहता हुआ साधना करता हैं तो वह तंत्र साधना हैं!

19-तंत्र के अंतर्गत चार प्रकार के विचार;-

04 POINTS ;- तंत्रो के अंतर्गत चार प्रकार के विचारों या उपयोगों को सम्मिलित किया गया हैं। 1. ज्ञान, तंत्र ज्ञान के अपार भंडार हैं। 2. योग, अपने स्थूल शारीरिक संरचना को स्वस्थ रखने हेतु। 3. क्रिया, भिन्न-भिन्न स्वरूप तथा गुणों वाले देवी-देवताओं से सम्बंधित पूजा विधान। 4. चर्या, व्रत तथा उत्सवों में किये जाने वाले कृत्यों का वर्णन।

20-तंत्र साधना और जीवन के तीन तल;-

02 POINTS ;-

1-तुम्हारे जीवन के तीन तल हैं ..यंत्र का तल, मंत्र का तल, तंत्र का तल। इन तीनों को ठीक से पहचानना पड़ेगा । फिर बहुत विरले लोग हैं – श्रीकृष्ण , गौतमबुद्ध और संतअष्टावक्र जैसे ;जो तांत्रिक रूप से जीते हैं। जिनका प्रतिपल दो आकाशों का मिलन है – सोते, जागते, उठते, बैठते जो भी उसके जीवन में हो रहा है, उसमें अंतर और बाहर मिल रहे हैं, परमात्मा और प्रकृति मिल रही है, संसार और निर्वाण मिल रहा है। परम मिलन घट रहा है।तो तुम अपनी प्रत्येक क्रिया को यांत्रिक से तांत्रिक तक पहुँचा सकते हो ।और तुम्हारे हर काम तीन में बंटे हैं।अक्षर से क्षर की यात्रा यंत्र है, क्षर से अक्षर की यात्रा मन्त्र है, अक्षर से अक्षर की यात्रा तंत्र है।और आत्मा है.. तंत्र ;दो आकाशों का मिलन।तंत्र ऊंचे से ऊंची , परम घटना है।

2-तो इस प्रकार..

देह – यंत्र, शारीरिक। मन – मंत्र, सायकॉलॉजिकल/मानसिक।

आत्मा – तंत्र, कॉस्मिक/आध्यात्मिक।

21-तंत्रयोग का मुख्य उद्देश्य;-

05 POINTS ;-

1-तंत्र योग एक व्यापक विषय है और इसमें सृष्टि, प्रलय, मन्त्र, आश्रम धर्म, कल्प, ज्योतिष तथा अध्यात्म के अनेक विषयों का समावेश माना जाता है।इस तन्त्र योग की मान्यता के अनुसार कलियुग में जब वैदिक धर्म-समाज के लोगों द्वारा उनकी अल्प बुद्धि से परे हो जायेगा,उस समय तन्त्र मार्ग ही उपयुक्त रहेगा- ऐसा भगवान ‘शिव’ के द्वारा ‘महानिर्वाण तन्त्र’ में कहा गया है।तंत्र योग से अर्थ उस तान्त्रिक साधना पद्धति से है,जिसके द्वारा इहलौकिक एवं पारलौकिक सुखों की उपलब्धि सुखों की उपलब्धि बतलायी जाती है।तन्त्र योग के अनुसार सृष्टि के महाकारण शिव हैं और उन्हीं के द्वारा ज्ञान का नादात्मक प्रसार हुआ है।

2-''शिवोहम शिवोहम शिवोहम'' ...की अनुभूती ही इस साधना का मुख्य उद्देश्य हैं।शिव शब्द के दो अर्थ -योगी शिव और शून्यता -जो एक तरह के पर्यायवाची हैं, पर फिर भी वे दो अलग-अलग पहलू हैं।शिव शब्द “वो जो नहीं है” और आदियोगी दोनों की ही ओर संकेत करता है, क्योंकि बहुत से तरीकों से ये दोनों पर्यायवाची हैं।ये जीव, जो एक योगी हैं और वो शून्यता, जो सृष्टि का मूल है, दोनों एक ही है। क्योंकि किसी को योगी कहने का मतलब है कि उसने ये अनुभव कर लिया है कि सृष्टि वो खुद ही है।

3-अगर आपको इस सृष्टि को अपने भीतर एक क्षण के लिए भी बसाना है, तो आपको वो शून्यता बनना होगा। सिर्फ शून्यता ही सब कुछ अपने भीतर समा सकती है। जो शून्य नहीं, वो

सब कुछ अपने भीतर नहीं समा सकता।एक बर्तन में समुद्र नहीं समा सकता। ये ग्रह समुद्र को समा सकता है, पर सौर्य मंडल को नहीं समा सकता। सौर्य मंडल ग्रहों और सूर्य को समा सकता है, पर बाकी की आकाश गंगा को नहीं समा सकता। अगर आप इस तरह कदम दर कदम आगे बढ़ें, तो आखिरकार आप देखेंगे, कि सिर्फ शून्यता ही हर चीज़ को अपने भीतर समा सकती है।योग शब्द का अर्थ है मिलन। योगी वो है जिसने इस मिलन का अनुभव कर लिया है। इसका मतलब है, कम से कम एक क्षण के लिए, वो पूर्ण शून्यता बन चुका है।

4-तंत्र योग में षट् चक्र भेदन की साधना भी मोक्ष प्राप्ति का एक सााधन है। ये षट् चक्र शरीर में स्थित ब्रह्माण्ड के पाँच तत्व एवं चित्त के प्रतीक हैं।मूलाधार चक्र पृथ्वी का,स्वाधिष्ठान चक्र

जल का, मणिपूरक चक्र अग्नि का, अनाहत चक्र वायु का, विशुद्ध चक्र आकाश का तथा आज्ञा चक्र चित्त के निवास का प्रतीक हैं ।इन षट् चक्रों के भेदन का साधन मन्त्र है।चक्रों के भेदन

करने से साधक के सामने शक्ति के विविध ऐश्वर्य प्रकट होते हैं।आठ सिद्धियाँ एवं नव

निधियों की प्राप्ति भी इस षट् चक्र भेदन से सम्भव मानी गयी है।चैतन्य किये हुए शब्द की

साधना कुण्डलिनी जाग्रित होती है और उस कुण्डलिनी को भावना शक्ति से अनुप्राणित

करके साधक षट् चक्र भेदन करते हैं।तन्त्र योग में वर्णित प्रत्येक चक्रों का रंग, दल,देवता, वाहन एवं बीज मन्त्र आदि भी बतलाये जाते हैं।

5-तंत्र में मूलभूत सिद्धांत है कि ऐसा कुछ भी नहीं है, जो की दिव्य न हो। तंत्र अहंकार को पूरी तरह समाप्त करने की बात करता है, जिससे द्वैत का भाव पूर्णतया विलुप्त हो जाता है। तंत्र पूर्ण रूपांतरण की बात करता है। ऐसा रूपांतरण जिससे जीव और ईश्वर एक हो जाएँ। ऐसा करने के लिए तंत्र के विशेष सिद्दांत तथा पद्धतियां हैं। तंत्र का जुडाव प्रायः मंत्र, योग तथा साधना के साथ देखने को मिलता है।इस तरह तन्त्र योग एकविचित्र मार्ग के रूप में शताब्दियों से चला आ रहा है और आज भी विद्यमान है।तन्त्र-साधना का प्रयोग उच्च-चेतना की प्राप्ति के लिए किया जाता हैं ।

..SHIVOHAM...