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क्या शिव शक्ति की उपासना तत्वों का ज्ञान अथार्त पंचअग्नि साधना के बिना संभव नहीं है? साधक से क्या गल


क्या है पंचअग्नि साधना के महत्वपूर्ण एयर, फायर, वॉटर एलिमेंट?-

जल तत्व

09 FACTS;- 1-जल से ही जड़ जगत की उत्पत्ति हुई है।यही वो तत्व है जो की स्रष्टि के निर्माण के बाद जीवन की उत्पत्ति का कारण है। पांच तत्वों में सबसे बड़ा मामला जल का है क्योंकि वह शरीर में 72% है।जल जिस भी चीज़ के संपर्क में आता है उसके गुणों को अपने भीतर याद रखता है। हमारे शरीर के भार का 60 प्रतिशत हिस्सा इसी से बना है। शरीर का प्रत्येक सिस्टम इससे जुड़ा है। कोशिकाओं तक पोषक तत्वों को पहुंचाना, कान, नाक और गले के ऊतकों को नमी वाला वातावरण उपलब्ध कराने का काम जल तत्व का ही है। शारीरिक तापमान और क्रियाओं को संतुलित रखने के साथ-साथ शरीर से टॉक्सिन को बाहर निकालने, शरीर को ऑक्सीजन प्रदान करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

2-जल में दो तत्व और निहित हैं- देव तत्व और जीवन तत्व। इनके कारण जल का महत्व और बढ़ जाता है। पृथ्वी , जल , वायु , आकाश और अग्नि इन पांच तत्वों से हम जीवन धारण करते हैं। इन तत्वों में जल सबसे विलक्षण तत्व है , जिसके बिना जीवन संभव ही नहीं है। विश्व की समस्त संस्कृतियों और धार्मिक पुराकथाओं में सृष्टि का आरंभ जल से ही माना जाता है। ऋग्वेद में सृष्टिपूर्व की अवस्था के विषय में उल्लेख है कि तब चारों ओर गहन गम्भीर जल ही व्याप्त था। मनु ने जगत का मूल कारण जल को माना है। इसके अतिरिक्त जल प्लावन का वर्णन भी अनेक ग्रंथों में प्राप्त होता है। इसका अभिप्राय यह है कि इस पृथ्वी पर जीवन-मृत्यु , सृष्टि और प्रलय सब का आधार जल ही है।

3-जिस तरह हमारे शरीर में लगभग 70 प्रतिशत जल विद्यमान है उसी तरह धरती पर जल विद्यमान है। जितने भी तरल तत्व जो शरीर और इस धरती में बह रहे हैं वो सब जल तत्व ही है। चाहे वो पानी हो, खून हो, वसा हो, शरीर में बनने वाले सभी तरह के रस और एंजाइम।जल तत्व की उत्पत्ति अग्नि तत्व के बाद मानी गयी है।वायु और अग्नि तत्व मिल कर इस का निर्माण करते है।वायु के घर्षण से अग्नि उत्पन्न हुई और अग्नि ने वायु से जल का निर्माण किया। जल हमारे जीवन में सबसे महत्वपूर्ण है ; जहाँ हम भोजन के बिना महीनो जीवित रह सकते है तो पानी के बिना सिर्फ कुछ दिन.. । चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति से जल आवेशित हो कर सैकड़ो फुट ऊपर उठ जाता है।

4-एक विचार या भावना के साथ आप पानी की रासायनिक संरचना को बदले बिना, उसकी आण्विक संरचना को बदल सकते हैं। बिना किसी रासायनिक परिवर्तन के, वही पानी विष भी बन सकता है और जीवन का अमृत भी। यह बस इस बात पर निर्भर करता है कि उसमें किस प्रकार की स्मृति है।ये पानी ही है जो दिव्यता की स्मृतियाँ रखता है ..यही तीर्थ है। लोग इसे पीना चाहते हैं जिससे ये उनको, उनके अंदर की दिव्यता याद दिलाये।अगर आप सीधे नल से पानी पीते हैं, तो आप एक खास मात्रा में जहर पी रहे हैं। अगर आप इस जल को तांबे के एक बरतन में दस से बारह घंटे तक रखें, तो उस नुकसान की भरपाई हो सकती है। जल हमारे शरीर का प्रमुख रासायनिक तत्व है। अगर आप एक बर्तन में रखे पानी को सुखमय, आनंदमय बना सकते हैं तो अपने शरीर के अंदर के पानी को भी सुखमय, आनंदमय बना सकते है ;यही योग का विज्ञान है।

5-वैज्ञानिकों ने यह शोध किया है कि जब पानी जबरदस्त रूप से पम्पिंग कर के ऊपर चढ़ाया जाता है तथा लेड और प्लास्टिक के पाईपों में से, कई बार मुड़ते हुए,ऊपर नीचे होते हुए गुज़रता है और आप के घरों तक आता है तो उसकी आण्विक संरचना बदल जाती है। इन सब मोड़ों और झुकावों के कारण पानी पर बहुत नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।जल को

शुद्ध करने के लिए आप उसमें नीम या तुलसी की कुछ पत्तियां डाल दें। इससे रासायनिक अशुद्धियां तो नहीं हटेंगी, लेकिन इससे जल बहुत जीवंत और ऊर्जावान हो जाएगा।

6-ध्यान यह भी रखें कि पानी कोई हेल्थ टॉनिक नहीं है, ना ही हर समस्या का उपचार। बहुत अधिक मात्रा में लेने से भी कई समस्याएं हो सकती हैं। किडनी से जुड़ी कई समस्याओं में धीरे-धीरे और कम पानी पीने की सलाह दी जाती है। पानी बहुत पीने से पोषक तत्व शरीर से जल्दी बाहर निकल जाते हैं। इसी तरह सुबह उठकर एक साथ ढेर सारा पानी पीने से आंखों पर भी दाब पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि महिलाओं को प्रतिदिन करीब ढाई लीटर और पुरुषों को तीन लीटर पानी पीना चाहिए।पानी अलग-अलग तापमान पर अलग-अलग विशेषताएं प्रदर्शित करता है। अलग-अलग तापमान का पानी पीने से भी शरीर पर अलग असर पड़ता है। हाइड्रोपेथी में वो सभी पद्धतियां सम्मिलित हैं, जिनमें जल का उपयोग चिकित्सकीय उपचार के लिए किया जाता है।

7-जल की व्याख्या इस प्रकार करते हैं कि ' ज ' से जन्म तथा ' ल ' से लय। यानी जन्म से लेकर लय तक प्राणी का जीवन अथवा यह सम्पूर्ण सृष्टि , सब जल पर ही निर्भर है। जल के लिए सलिल , पय: , रस , कीलाल , जीवन , भुवन वन आदि पर्याय प्रयुक्त हैं , परंतु सर्वाधिक प्रयुक्त एवं उपयुक्त नाम आप: है। जल का पर्याय अमृत भी है। आप: जल की सर्वत्र व्यापनशीलता का संकेत करता है। जो सबमें व्याप्त है तथा अपने में सबको सन्निहित कर लेता है। जल की धारा में मातृत्व का प्रतीकात्मक रूप है। माता , स्त्री , बहिन , वरप्रदात्री स्त्रियों के रूप में इनका मानवीकरण कर दिया गया है। इसीलिए यहाँ नदियों को माता कह कर बुलाने की प्रथा विकसित हुई है।मातृत्व से परिपूर्ण जलधाराएं मानव मन को आह्लादित कर देती हैं।

8-यज्ञ में उपस्थित रहने वाला जल सब प्रकार से लोक कल्याण और हित में संनद्ध रहता है। पांचों तत्वों में जल ही शांति , आह्लाद और आनंद का परिचायक है। जल के निकट ही पुष्कल बुद्धि का आविर्भाव होता है। नदियों के समीप विशालता एवं व्यापकता में विराट् की अनुभूति संभव है। वहाँ संकीर्णता , संकोच और मतिभ्रम दूर हो जाता है , तृप्ति की अनुभूति होती है और सभी ओर शीतल भावना का उदेक होता है। सृष्टि का आदि तत्व होने के साथ-साथ जल सर्वाधिक प्रवाहमान तत्व है। इसी प्रवाह के गुण तथा गति से जल में देवत्व है। यह गति ही सृष्टि को गति देती है। जल और जल से उत्पन्न हुई औषधियों से कल्याण की कामना हमारे ऋषि मुनियों ने अनेक बार की है। जल के भीतर वर्तमान अमृतत्व इसके लोकोपकारी देवत्व भाव को पुष्ट करते हैं।

9-सृष्टि के अन्य तत्व एवं प्राकृतिक क्रियाएं स्वभावत: दूसरे तत्वों का शोधन करती हैं। जल में भी शोधन एवं पवित्र करने का गुण विद्यमान है। इसीलिए जल को पवित्र माना गया है। पवित्र जल हमें भी शुद्ध एवं पवित्र बनता है। ऋग्वेद की एक ऋचा के अनुसार जल में जो शुद्धि का गुण है , शोधन करने की जो क्षमता है , और जो जीवन शक्ति है वही इसे देवत्व प्रदान करती है। अग्नि आदि समस्त देवता जल में समाहित हैं। मरूत , इन्द्र , वरुण आदि सभी जलीय देवता हैं।जल प्राय: सभी देवताओं का निवास माना गया है।अत: जल को देवालय कहा जाता है। जल की दैवी शक्ति से अभिभूत होकर ही यजुर्वेद में कामना की गई है: ''पृथ्वी , अन्तरिक्ष , औषधि आदि सभी क्षेत्र और दिशाएं जल से ही आवृत्त हैं और कोई स्थल या पदार्थ जल से रिक्त न हों''। आज जल में सन्निहित इस देवत्व को हम पहचान नहीं पा रहे हैं।

THE KEY NOTE;-

1-करुणा , प्रेम , स्नेह और वात्सल्य का आधार जल ही है।पानी में याददाश्त है, स्मृतियाँ हैं।इस तत्व को जानने वाला अपनी भूख और प्यास पर नियंत्रण पा लेता है ।यही कारण था कि हमारे ऋषियो को लम्बे समय तक ध्यान में रहने पर भी ;भूख और प्यास नही लगती थी ।ये स्वयं पर विजय का प्रतीक है।जल तत्व माया का प्रतीक है और माया का स्वभाव ही है नीचे की ओर जाने का। अग्नि का स्वभाव ऊपर की ओर जाने का है तो जल तत्व का स्वभाव नीचे की ओर जाने का है।संपूर्ण माया जगत जल तत्व पर ही आधारित है। महाविष्णु(वाटर एलिमेंट) पालनहार हैं ;जो क्षीर सागर में लेटे हुए हैं।और अपनी पत्नीयो माँ लक्ष्मी(फायर एलिमेंट) और महालक्ष्मी (एयर एलिमेंट) की सहायता से संसार का पालन करते हैं।

2-जल तत्व के लोग मांसल शरीर होते हैं। जिस प्रकार से सभी तत्वों के पॉजिटिव- नेगेटिव हैं। उसी प्रकार जल तत्व का भी पॉजिटिव- नेगेटिव है। गंगा भी जल तत्व है तो गंदा नाला भी। जल तत्व जीवनदाई भी है और अशुद्ध होने पर विनाशकारी भी। अगर परिवार में वाटर एलिमेंट के लोग प्रसन्न रहते हैं और खूब खाते पीते हैं तो परिवार में समृद्धि बढ़ती है। यदि व्रत- उपवास ज्यादा करते हैं या दुखी रहते हैं ;तो घर में विपन्नता आती है। क्योंकि वाटर एलिमेंट आधार है।यदि आधार ही गड़बड़ होगा तो अन्य तत्व भी खराब हो जाएंगे। इसलिए साधना के लिए भी तृप्त होना आवश्यक है।माया ही शिव तक पहुंचाती है। शायद यही कारण है कि ज्यादातर राजाओं ने समाधि की अवस्था प्राप्त की।चाहे वो गौतम बुद्ध हो या भ्रतहरि ; श्रीराम हो या श्रीकृष्ण हो ...सभी माया से तृप्त थे।

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वायु तत्व;-

04 FACTS;-

1-यही वो तत्व है जो की स्रष्टि के निर्माण के बाद जीवन को चलाता है।वायु तत्व स्रष्टि में 28% और शरीर में 6% है।हमारे शरीर में वायु प्राणवायु के रूप में विद्यमान है। शरीर से वायु के बाहर निकल जाने से प्राण भी निकल जाते हैं। जितना भी प्राण है वो सब वायु तत्व है। धरती भी श्वांस ले रही है। वायु ही हमारी आयु भी है। जो हम सांस के रूप में हवा (ऑक्सीजन) लेते हैं, जिससे हमारा होना निश्चित है, जिससे हमारा जीवन है। वही वायु तत्व है। हमारे शरीर में लगभग छह प्रतिशत वायु है। इसमें से केवल एक प्रतिशत या कुछ कम आप अपनी सांस के रूप में लेते हैं । बाकी दूसरे तरीकों से आपके अंदर बहुत से रूपों में घटित हो रही है।इस की महत्ता इस बात से ही समझ में आती है की हमारा सूक्ष्म शरीर 5 प्रकार की वायु आपान , उदान, व्यान, समान और प्राण में और 10 प्रकार की उपवायु में वर्णित है।वायु के कारण ही अग्नि की उत्पत्ति मानी गई है।

2-स्रष्टि निर्माण क्रम में space अर्थात आकाश तत्व के बाद वायु तत्व आया ..इसे आप ऐसे समझ सकते है कि ब्रह्माण्ड में जितने भी तारे है वो गैस के गोले है और उस के बाद ग्रह , उपग्रह आदि उन के टूटे हुए भाग है। वायु के घर्षण से अग्नि उत्त्पन्न होती और जल भी वायु के एक निश्चीत अनुपात में बना मिश्रण मात्र है।हमारा शरीर कोशिकाओं से बना होता है और

हवा (ऑक्सीजन) के बिना कोशिकाएं जीवित नहीं रह पातीं। शरीर के सुचारू ढंग से काम करने के लिए जरूरी है कि हमारा श्वसन तंत्र ठीक से काम करे।

3-अगर पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलेगी तो भोजन का ऑक्सीडेशन नहीं होगा और न ही

ऊर्जा रिलीज होगी।ब्रीदिंग एक्सरसाइज में गहरी सांस ली जाती है। फेफड़ों को फुलाने के लिए डायफ्राम की मांसपेशियों का उपयोग किया जाता है। इसका उद्देश्य होता है कि आप धीमी सांस लें और अधिक से अधिक ऑक्सीजन शरीर के अंदर ले जाएं। कंधे, गर्दन और छाती के ऊपरी भाग की मांसपेशियों का उपयोग कम से कम करें, ताकि अधिक प्रभावकारी तरीके से सांस ले सकें। इसके अलावा अनुलोम-विलोम, प्राणायाम, डीप ब्रीदिंग और दूसरी योग मुद्राएं फेफड़ों की सेहत के लिए अच्छी रहती है।

4-आप जिस हवा में सांस लेते हैं, सिर्फ वही आपको प्रभावित नहीं करती, आप उसे अपने भीतर कैसे रखते हैं, यह भी महत्वपूर्ण है। आपको उस 1% का ध्यान रखना चाहिए। लेकिन अगर आप किसी शहर में रह रहे हैं, तो सांस के रूप में शुद्ध हवा लेना आपके बस में नहीं है।

पार्क में या झील किनारे टहलने जाएं। खास तौर पर अगर आपके बच्चे हैं, तो यह बहुत जरूरी है कि आप कम से कम महीने में एक बार उन्हें बाहर घुमाने ले जाएं। उन्हें सिनेमा ले जाने की बजाय, नदी के पास ले जाएं, उन्हें तैरना या पहाड़ पर चढ़ना सिखाएं। इसके लिए आपको हिमालय तक जाने की जरूरत नहीं है।एक छोटा सा टिला भी किसी बच्चे के लिए एक पहाड़ है। यहां तक कि एक चट्टान से भी काम चल सकता है। किसी चट्टान पर चढ़कर बैठें। बच्चों को खूब मजा आएगा और आपका तथा उनका स्वास्थ्य भीअच्छा होगा। आपका शरीर और मन अलग तरीके से काम करेगा।

THE KEY NOTE;-

1-ज्ञान का आधार एयर एलिमेंट ही है।कुंडलनी जागरण में जो लाभ है उस की सम्पूर्ण लौकिक सिद्धियाँ इस तत्व में प्राप्त हो जाती है और इन का त्याग कर आकाश तत्व सिद्ध कर साधक परालौकिक शक्तिया प्राप्त कर लेता है ।स्पष्ट है की बाकि के तीन तत्व तत्व भी इसी से बनते है अतः वे स्वयं ही सिद्द हो जाते है।

2-ईशान रूद्र (एयर एलिमेंट) अपनी पत्नी माता पार्वती (फायर एलिमेंट)और गणेश (वाटर एलिमेंट) की सहायता से संसार का ट्रांसफॉरमेशन करते हैं।ज्यादातरआर्टिस्ट इस एलिमेंट के होते है।हवा जीवन भी देती है और बवंडर प्राण भी ले लेता है। यह एलिमेंट फायर और वाटर के बीच संतुलन बनाता है।छोटी छोटी चीजों का ध्यान देना ;छोटी छोटी चीजों में खुश होना इनका स्वभाव है।अन्य एलिमेंट की तरह इनके भी पॉजिटिव और नेगेटिव हैं ।उदाहरण के लिए पॉजिटिव एग्जांपल हैं सत्यवादी युधिष्ठिर और नेगेटिव एग्जांपल हैं शकुनी।

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अग्नि का महत्व ;-

10 FACTS;-

1-वायु तत्व के बाद अग्नि की उत्त्पत्ति वायु के घर्षण से मानी जाती है। जितने भी भी तारे है वो सब वायु के गोले है और उनके घर्षण ( नाभिकीय संलयन या विखंडन ) से ही अग्नि की उत्पत्ति हुई।हमारे शरीर की बनावट में , 4% अग्नि है और अग्नि ऊर्जा के रूप में विद्यमान है। इस अग्नि के कारण ही हमारा शरीर चलायमान है। अग्नि तत्व ऊर्जा, ऊष्मा, शक्ति और ताप का प्रतीक है। हमारे शरीर में जितनी भी गर्माहट है वो सब अग्नि तत्व ही है। यही अग्नि तत्व भोजन को पचाकर शरीर को निरोगी रखता है। ये तत्व ही शरीर को बल और शक्ति वरदान करता है।

2-भारतीय संस्कृति में आग का मानवीकरण कर अग्नि देवता के रूप में देखा जाता है, जो दो मुंह वाले देवता हैं और क्रुद्ध भेड़ पर सवार रहते हैं। अग्नि देवता का दो मुंह इस बात का प्रतीक है कि अग्नि जीवन-दाता और जीवन भक्षक दोनों है। जब तक भीतर अग्नि है, तब तक हम जीवित हैं। लेकिन अगर आपने इस अग्नि की ठीक ढंग से नहीं संभाला तो यह जल्दी ही आपके नियंत्रण से बाहर होकर हर चीज को भस्म कर देगी। जब यह हमारे शरीर को जलाती है तो इसे दाह-संस्कार कहते हैं। आग के एक रूप का इस्तेमाल हम खाना पकाने के लिए करते हैं, ताकि हम भोजन को खा सकें।

3-भारतीय संस्कृति में लोगों के जीवन में जितनी भी महत्वपूर्ण चीजें हैं, वे सब अग्नि के इर्द-गिर्द होती हैं। बिना अग्नि के न तो पूजा होती है, न शादी और न ही कोई अन्य महत्वपूर्ण आयोजन। इस संस्कृति में अग्नि का इस्तेमाल कई अलग-अलग रूपों में होता रहा है, जिनमें यज्ञ की अग्नि जैसे होम व हवन भी शामिल हैं।विज्ञान कहता है, पदार्थ की तीन स्थितियां हैं, सालिड, लिक्विड और गैसीय।प्रत्येक अस्तित्ववान चीज तीन रूपों में प्रकट हो सकती है।अग्नि

महाभूत है ,आधारभूत है।पृथ्वी अग्नि का ,एक सालिड रूप है।अग्नि का दूसरा रूप है, जल, लिक्विड, प्रवाह। अग्नि का तीसरा रूप है, वायु।

4-भारत में जो पंच महाभूत की धारणा है, वह प्रयोगशालाओं में नहीं, अंतस अनुभूति में की गई है। जो लोग भी अंतस जीवन की गहराइयों में उतरेंगे, उन्हें एक तत्व का साक्षात्कार जरूर ही होगा; वह है फायर, वह है अग्नि। जो लोग भी अपने भीतर गहरे में जाएंगे, अंततः उन्हें अग्नि का अनुभव होगा, विराट अग्नि का अनुभव होगा।इसीलिए जैसे-जैसे व्यक्ति ध्यान में भीतर

प्रवेश करता है, प्रकाश ...और ऐसे जैसे हजारों सूरज उतर आए हों, दिखाई पड़ने लगते हैं। ध्यान में प्रकाश का अनुभव अंतर्गमन की सूचना है। यह प्रकाश उस अंतर-अग्नि की बहुत दूर की किरण है। जब हम बहुत गहरे में पहुंचेंगे, तभी हमें पूरी अग्नि का आभास होगा।

हां, अग्नि शब्द से सिर्फ आपके घर में जो आग जलती है, उससे ही श्रीकृष्ण का प्रयोजन नहीं है। अग्नि से अर्थ है, जीवन का समस्त रूप अग्नि का ही रूप है।

5-अब तो वैज्ञानिक कहते हैं कि आपके भीतर भी जो जीवन चल रहा है, वह भी आक्सीडाइजेशन से ज्यादा नहीं है। पूरे समय हवाओं में से जाकर आक्सीजन आपके भीतर की जीवन-ज्योति को जला रही है।उदाहरण के लिए कभी ऐसा हो जाता है कि तूफान जोर का होता है, तो घर में कोई कांच के गिलास को दीए पर ढांक दे। एक क्षण को तो लगेगा कि दीए को आपने तूफान से बचा लिया । लेकिन ध्यान रखना, तूफान में तो दीया बच भी सकता था, गिलास के भीतर दीया नहीं बचेगा। क्योंकि थोड़ी ही देर में आक्सीजन चुक जाएगीऔर फिर तो कार्बन डाइ आक्साइड रह जाएगा, जो दीए को बुझा देगा। तूफान तो झेल सकता है दीया, लेकिन आक्सीजन की कमी नहीं झेल सकता।क्योंकि आक्सीजन ही फायर है, अग्नि है।

6-अगर आपकी भी श्वास बंद कर दी जाए; नाक तो छोड़िए,नाक आपकी चलने भी दी जाए, और पूरे शरीर पर ठीक से डामर पोत दिया जाए; रोएं-रोएं सब बंद कर दिए जाएं, तो भी आप पंद्रह मिनट से ज्यादा जिंदा नहीं रह पाएंगे। क्योंकि आपका रोआं-रोआं श्वास ले रहा है। वह श्वास जाकर आपके भीतर की जीवन अग्नि को जला रही है। और अगर श्वास बंद कर दी जाए, तब तो आप अभी ही समाप्त हो जाएंगे। क्योंकि भीतर भी जीवन एक दीए की भांति है, जिसको पूरे समय आक्सीजन चाहिए। तो आप भी नहीं झेल सकते ..अग्नि मूल तत्व है।विद्युत भी अग्नि का ही रूप है।जो अग्नि के जलने का नियम है, वही जीवन के जलने का नियम भी है। जीवन की गहराई में, समस्त तत्वों की गहराई में अग्नि है।

7-अग्नि जब प्रकट होती है, तो तीन रूपों में प्रकट होती है। पदार्थ का एक रूप ठोस, दूसरा

रूप जलीय, तीसरा रूप गैसीय।और यह अग्नि के प्रकट होने के लिए जो जगह चाहिए, वह जगह है आकाश। आकाश से अर्थ है, स्पेस ;आपके ऊपर जो चंदोवा तना हुआ है, उससे प्रयोजन नहीं है।आकाश का कुल अर्थ होता है, जिसमें अवकाश मिले, जिसमें जगह मिले, जिसके बिना कोई चीज न हो सके।आधारभूत तो एक ही है, अग्नि, तेज।इसलिए सारे जगत

में अग्नि की पूजा हुई।एक पारसी का मंदिर तो अग्नि का ही मंदिर है।अभी भी अपने मंदिर में चौबीस घंटे अग्नि को जलाए हुए है। शायद उसे ठीक पता भी नहीं कि किसलिए जलाए हुए है। रीति है, प्रचलित है, जलाए हुए है।

8-अग्नि जीवन का आधारभूत तत्व है; वही देवता है। उससे ही जीवन का सब रूप विकसित होता है। मंदिर में अग्नि जलाकर बैठने से कुछ हल न होगा। इस जीवन में सब तरफ अग्नि को ही जलते हुए देखने से अग्नि के देवता का दर्शन होता है।जहां भी जो कुछ है, वह अग्नि का

ही रूप है। और उस अग्नि के तीन प्रकट रूप हैं –ठोस, फिर जलीय, फिर वायवीय। और जिसमें जगह मिली है, उसका नाम आकाश है।

9-अग्नि आकाश को और सुगम बनाती है। हम जितने भी तत्वों से बने हैं, उनमें आकाश ही एक ऐसा तत्व है, जो सबसे ज्यादा पारदर्शी व तरल है। हमारे और आपके शरीर में जो भूमि तत्व है वह बुनियादी रूप से समान है, लेकिन हमारे और आपके भीतर मौजूद जल तत्व अलग-अलग हैं, आप कह सकते हैं कि यह दो अलग-अलग पात्रों में रखा हुआ है। लेकिन हम जिस हवा में सांस लेते हैं, उसे अलग नहीं किया जा सकता। इसका लगातार आदान-प्रदान चलता रहता है। हमारा अग्नि तत्व कहीं ज्यादा बड़े पैमाने पर साझा होता है।

10-जहां भी अग्नि होती है वहां आकाश तत्व प्रबल हो जाता है।आकाश तत्व पूरी तरह साझा होता है। हम सभी एक ही आकाश में हैं। अगर आप किसी भी माहौल में आकाशिक तत्व को बढ़ा देते हैं तो वहां लोगों में एक खास तरह की नजदीकी या जुड़ाव होने लगता है।उसी तरह अग्नि के आस-पास घनिष्ठता और संवाद की संभावना कहीं ज्यादा बढ़ जाती है।

11-ईश्वरत्व तक पहुँचने में मदद करता है अग्नि तत्व;-

हम कह सकते हैं, मात्रा के लिहाज से भले ही अग्नि आपके अस्तित्व का एक छोटा सा हिस्सा हो, लेकिन अपनी मौलिक प्रकृति के चलते यह काफी महत्वपूर्ण है। अग्नि को स्पर्श करने की आपकी क्षमता बेहद कम है। लेकिन साथ ही आग वो तत्व है, जिसके प्रति आप सबसे ज्यादा संवेदनशील होते हैं। आग संवाद स्थापति करने या संप्रेषण का एक जरिया भी है। इसके अलावा, अग्नि ग्रहणशीलता लाने, सीमाओं से परे जाने और उस आयाम को छूने का एक जरिया है, जिसे आप दैवीय, ईश्वर या इस सृष्टि का स्रोत... जो चाहे कह सकते हैं।

तीन प्रकार की अग्नि;-

07 FACTS;-

1-हमारे भीतर और बाहर आग के कई आयाम और रूप हैं।हमारे भीतर तीन प्रकार की अग्नि मौजूद हैं।

1-1-जठराग्नि

1-2-चित्ताग्नि

1-3-भूताग्नि

1-4-सर्वाग्नि

2-जठराग्नि (भूख और प्रजनन की अग्नि);-

पहली अग्नि होती है - जठराग्नि। जठर का मतलब हुआ पेट या पाचन प्रक्रिया। आपके पेट में अगर थोड़ी भी अग्नि नहीं होगी तो आप जो खाना खाते हैं, उसे पचा नहीं पाएंगे। भोजन उस ईंधन के तौर पर काम करता है, जिसके जलने या कहें पाचन से आपको ऊर्जा मिलती है, जिसकी आपको जरूरत होती है। अगर आपकी जठराग्नि को अच्छे से ईंधन मिल रहा है, यह अच्छी तरह से पोषित है तो यह प्रजनन अग्नि भी बन जाती है।पाचन और प्रजनन दोनों ही जठराग्नि पर निर्भर करते हैं।

3-चित्ताग्नि (बुद्धि की अग्नि);-

02 POINTS;-

1-हमारे भीतर मौजूद दूसरी आग चित्ताग्नि कहलाती है। यह मन और उससे परे का आयाम है। चित्त आपके भीतर मौजूद प्रज्ञा यानी बुद्धि का वो आयाम है, जो आपके भौतिक रूप से परे होता है। आपका शारीरिक स्वरूप आपके अनुवांशिक और कार्मिक याद्याश्त की देन है। इससे विपरीत चित्त प्रज्ञा का वह आयाम है, जो याद्याश्त से प्रभावित नहीं होता। प्रज्ञा की अग्नि कई स्तरों पर सामने आती है, इसका पहला स्तर बुद्धिमान होना है।

2-अगर आपकी चित्ताग्नि प्रखरता से काम कर रही है तो आपकी रुचि भोजन, कामवासना, व शरीर की दूसरी चीजों में से हटने लगेगी। इस संदर्भ में सबसे ज्यादा दुर्भाग्य की बात है यह है, कि जिसे त्याग या संन्यास की तरह प्रचारित किया गया है, वह वास्तव में ज्ञान की तरफ बढ़ने के रूप में देखा जाना चाहिए।आमतौर पर जो योगी जीवन की प्रक्रिया तक पहुंचना चाहता है, उसकी दिलचस्पी जठराग्नि, चित्ताग्नि या भूताग्नि में नहीं होगी। उसका पूरा ध्यान सिर्फ सर्वाग्नि पर होगा, क्योंकि यह एक परम अग्नि है, लेकिन यह एक शीतल अग्नि है।

NOTE;-

आपके भीतर मौजूद अग्नि के कई रूपों पर गौर करें तो अगर आपकी जठराग्नि अच्छा काम कर रही है तो आपकी प्रजनन अग्नि भी अच्छा काम करेगी। अगर आप अच्छी तरह से खाएंगे-पिएंगे नहीं, तो आपकी प्रजनन प्रवृत्ति भी काम नहीं करेगी। इसी तरह से अगर आपकी चित्ताग्नि अच्छी तरह से प्रज्ज्वलित नहीं होगी तो आपकी बुद्धि भी कमजोर व प्रभावहीन होगी। आपकी चित्ताग्नि अच्छी तरह से काम कर रही होगी तो यह आपकी बुद्धिमानी के तौर पर सामने आएगी, भले ही आप बुद्धि के दूसरे आयामों तक सचेतन रूप से पहुँच पाने की स्थिति में न हों।

4 -भूताग्नि (तत्वों की अग्नि);-

02 POINTS;-

1-शरीर की सीमा बहुत ही स्पष्ट और सीमित है। जबकि मन की सीमा काफी बड़ी है।अगर आप भूताग्नि के आयामों के प्रति चेतन हो जाएंगे तो आप एक अनंत या सीमाविहीन अस्तित्व हो उठेंगे, क्योंकि तत्वों का खेल पूरी सृष्टि में हर तरफ हो रहा है।इंसान में मौजूद भूताग्नि.. तत्वगत अग्नि है। अगर आपके भीतर भूताग्नि अच्छी तरह से काम कर रही है तो फिर आपके शरीर और मन का नाटक आपके लिए खास मायने नहीं रखेगा। आपकी दिलचस्पी शरीर व मन की हरकतों से हटकर सृष्टि के बुनियादी पहलू यानी जीवन के स्रोत की तरफ जाने लगेगी।

2-अगर आप जठराग्नि पर नियंत्रण कर लेते हैं तो आप एक स्वस्थ और मजबूत शरीर के मालिक होंगे। अगर आप अपनी चित्ताग्नि पर नियंत्रण सीख लेते हैं तो आप अपने मन को कई तरीके से इस्तेमाल करना सीख लेंगे। अगर आपने भूताग्नि पर नियंत्रण सीख लिया तो आप जीवन प्रक्रिया पर महारत हासिल कर लेंगे।

5 -सर्वाग्नि (तीनों से परे की अग्नि) ;-

03 POINTS;-

1-इससे भी परे एक चीज होती है, जिसे सर्वाग्नि कहते हैं। आधुनिक विज्ञान के अनुसार इस सृष्टि का पांच फीसदी से भी कम हिस्सा भौतिक अस्तित्व है। इसका मतलब यह है कि अगर आप पूरी भौतिक रचना को जान भी गए तो आप सृष्टि का सिर्फ पांच प्रतिशत ही जान पाएंगे। सर्वाग्नि उस आयाम को स्पर्श करती है, जहां कोई तत्व नहीं होता, जहां कोई ऐसी सृष्टि नहीं होती जिसे हम जानते हैं या दूसरे शब्दों में कहें तो जहां कोई भौतिक प्रकृति नहीं होती।

आमतौर पर जो योगी जीवन की प्रक्रिया तक पहुंचना चाहता है, उसकी दिलचस्पी जठराग्नि, चित्ताग्नि या भूताग्नि में नहीं होगी। उसका पूरा ध्यान सिर्फ सर्वाग्नि पर होगा, क्योंकि यह एक परम अग्नि है, लेकिन यह एक शीतल अग्नि है।

जठराग्नि अग्नि का एक प्रत्यक्ष और स्पष्ट रूप है। चित्ताग्नि अपेक्षाकृत कम स्पष्ट है, लेकिन फिर भी वह मौजूद है। भूताग्नि उस तरह दिखाई या महसूस नहीं होती, फिर भी वह मौजूद होती है। जबकि सर्वाग्नि बड़ी मुश्किल से ही महसूस होती है, लेकिन इसके बिना कुछ नही होता। यह बुनियादी और परम अग्नि होती है, जिसमें सभी अग्नियां शामिल होती हैं।

क्या है घी या तेल का दिया जलाने का महत्व?-

03 POINTS;-