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क्या शिव शक्ति की उपासना तत्वों का ज्ञान / पंचअग्नि साधना के बिना संभव नहीं है? साधक से क्या गलती ह


क्या है पंचअग्नि साधना ?-

11 FACTS;-

1-यह शरीर पांच तत्वों से बना है- मिट्टी, जल, वायु, अग्नि और आकाश। ये हमारे भौतिक शरीर के अवयव है। यह भौतिक शरीर स्थूल और नश्वर है। इसके परे एक और शरीर है। इसे जानना ही आत्मतत्व को जानना है।गुरु ही वह सक्षम व्यक्ति है जो उसे आत्मतत्व का ज्ञान करा सकता है।

इस तरह पाँच तत्वों- पृथ्वी, आकाश, वायु, अग्नि और जल- से ही समस्त जीवों के शरीर हैं।

2-जो व्यक्ति जिस-जिस तत्व से संबंधित है, उनके अनुसार ही कार्यों में प्रवृत्त होते हैं, इसलिए उपासना करने वाले जीवों को अभीष्ट सिद्धि प्राप्त करने के लिए ब्रह्म के उस रूप की ही कल्पना होती है, जिस तत्व से उसका संबंध है।ये पंच महाभूत तीन गुणों से समुद्भूत हैं। ये तीन गुण हैं- (1) सात्विक, (2) तामसिक और (3) राजसिक। सात्विक आकाश तत्व है।रजोगुण अग्नि तत्व है।तमोगुण जल तत्व है।इन पंच तत्व से ऊपर एक तत्व है जो आत्मा (ॐ) है। जिसके होने से ही ये तत्व अपना काम करते हैं।

3-शरीर मूल रूप से पांच तत्वों – जल, पृथ्वी, वायु, अग्नि और आकाश का एक खेल है। भारत में शरीर को पंचतत्वों का एक पुतला कहा गया है। शरीर की बनावट में, 72% पानी, 12% पृथ्वी, 6% वायु, 4% अग्नि है और बाकी का 6% आकाश है।ये पंचतत्व आपके

भीतर किस तरह काम करते हैं, यह आपके बारे में सब कुछ तय कर देता है।पंचअग्नि साधना का मतलब है भौतिकता के ज्ञान द्वारा भौतिकता से मुक्त होना ..तत्वों के स्वरूप को जानना। पंचअग्नि साधना एक बुनियादी

साधना है जो उस आयाम के लिए हमें तैयार करती है जो भौतिक या शरीर की सीमाओं से परे है।

4-चाहे मानवीय शरीर हो या विशाल ब्रह्मांडीय शरीर, सब कुछ मूल रूप से पाँच तत्वों से बना है -और इन पाँच तत्वों की भी अपनी अलग स्मृति है। यही कारण है कि वे एक विशेष ढंग से व्यवहार करते हैं।बस एक विचार या भावना के साथ आप पानी की रासायनिक संरचना को बदले बिना,

उसकी आण्विक संरचना को बदल सकते हैं। बिना किसी रासायनिक परिवर्तन के, वही पानी विष भी बन सकता है और जीवन का अमृत भी। यह बस इस बात पर निर्भर करता है कि वह किस प्रकार की स्मृति अपने साथ ला रहा है।

5-वह जो कल मिट्टी थी, आज हमारा भोजन बन जाती है। कल जो भोजन था, वह मनुष्य बन जाता है। वही भोजन वापस मिट्टी बन जाता है। तो यह क्या और कैसे हो रहा है ? मिट्टी किस तरह से एक फल, फूल या कुछ और चीज़ बन जाती है ? ये सिर्फ बीज में मौजूद स्मृति (याददाश्त) की वजह से होता है। पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार यह प्रकृति के आठ तत्व हैं। उक्त सभी की उत्पत्ति आत्मा या ब्रह्म की उपस्थिति के कारण है।आकाश के पश्चात वायु, वायु के पश्चात अग्न‍ि, अग्नि के पश्चात जल, जल के पश्चात पृथ्वी, पृथ्वी से औषधि, औ‍षधियों से अन्न, अन्न से वीर्य, वीर्य से पुरुष अर्थात शरीर उत्पन्न होता है।

6-प्रकृति के ये पांच तत्व हमारे शरीर के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और इन पांच तत्वों में संतुलन जरूरी है।क्योंकि यह अपने आप में एक लघु ब्रह्मांड है।आकाश सृष्टि और सृष्टि के स्रोत के बीच एक मध्य स्थिति है।अगर हम बाकी चार तत्वों को ठीक ढंग से रखें, तो आकाश खुद अपना ध्यान रख लेगा। अगर आप जानते हैं कि अपने जीवन में आकाश का सहयोग कैसे लेना है, तो आपका जीवन आनंदमय हो जाएगा। आकाश और पृथ्वी तो प्रत्येक प्राणी के आधारभूत तत्व हैं;जिसके असंतुलन से एक सामान्य व्यक्ति होना ही संभव नहीं हैं।इसके बाद मुख्य रूप से तीन गुण प्रत्येक व्यक्ति में हैं।दो गुणों से कोई भी व्यक्ति बन नहीं सकता।एक गुण के साथ किसी व्यक्ति के अस्तित्व की कोई संभावना नहीं है। उन तीनों का जोड़ ही आपको शरीर और मन देता है।जैसे बिना तीन रेखाओं के कोई त्रिकोण न बन सकेगा, वैसे ही बिना तीन गुणों के कोई व्यक्तित्व न बन सकेगा।उसमें एक भी गुण कम होगा, तो व्यक्तित्व बिखर जाएगा।

7-मनुष्य केवल दृश्य और अदृश्य पदार्थो का मेल है । फिर भी प्रत्येक मनुष्य का स्वभाव, बर्ताव और कार्य भिन्न भिन्न होते है। इसका कारण है प्रकृति के तीन एलिमेंट ;जिनके कम और अधिक मात्रा के समन्वय से मनुष्य का स्वभाव बनता है। कोई व्यक्ति जल-तत्व प्रधान है,कोई अग्नि-तत्व प्रधान है,तो कोई वायु-तत्व प्रधान है।हमारे दिमाग रूपी कम्प्यूटर में जो चिप लगायी गयी.. हमारा स्वभाव और बर्ताव वैसा ही होगा जो अपरिवर्तिनीय है।हम इसे केवल विकृत ही कर सकते है...परिवर्तित नही कर सकते।

8-प्रत्येक मनुष्य अपने तत्व के अनुसार ही बर्ताव कर रहा है।परंतु हम परेशान हैं कि वह ऐसा क्यों कर रहा है, उसने ऐसा क्यों किया था?.. वगैरह-वगैरह।प्रत्येक एलिमेंट का एक पॉजिटिव है और एक नेगेटिव! उदाहरण के लिए फायर एलिमेंट का पॉजिटिव एग्जांपल है अर्जुन और नेगेटिव एग्जांपल है दुर्योधन।एयर एलिमेंट का पॉजिटिव एग्जांपल है युधिष्ठिर और नेगेटिव एग्जांपल है शकुनी! वाटर एलिमेंट का पॉजिटिव एग्जांपल है भीम और नेगेटिव एग्जांपल है दुशासन! और माया तो षट चक्रों में ही तक चलती है। माया के 6 चक्रों को जाने बिना अथार्त उसके 6 एलिमेंट को स्वीकार किये बिना हम शिव तक नहीं पहुंच सकते।यह कहना कि हमने किसी को माफ कर दिया है ;हमें अहंकार में फंसा देता है इसलिए हमें किसी भी एलिमेंट को उसी के स्वरूप में स्वीकार करना होगा।

8- त्रिगुण ..जो वर्तमान में हैं, वही भविष्य में है,जो भविष्य में है, वही भूत में भी हैं।ये तीनों ही काल एक दूसरे के विरोधी हैं ,परन्तु आत्मतत्व स्वरुप से एक ही हैं।इसलिए एक उपासक के लिए अनिवार्य है कि वह सभी 3 तत्व के मनुष्यों से अपना संतुलन बनाए।ऐसा करके ही हम भौतिक जगत और आध्यात्मिक जगत दोनों में ही संतुलन स्थापित कर सकते हैं, सफलता प्राप्त कर सकते हैं ; शिवत्व तक पहुंच सकते हैं।शिव पर बेलपत्र और शमी पत्र चढ़ता है।बेलपत्र का अर्थ है..त्रिगुण को सम्मान देना।और शमी पत्र का अर्थ है..सभी छह एलिमेंट में सम हो जाना। सारी साधना का अर्थ ही है साम्यवस्था।ना बैरागी सफल है ना गृहस्थ और ना रागी सफल है ना बैरागी। सारी विधा साम्यावस्था की है।

9-यदि वाटर एलिमेंट पैर है ..आधार देता है तो फायर एलिमेंट चेहरा है। एयर एलिमेंट चेहरे और पैर दोनों को जोड़ता है तो आप हीं बताइए .. क्या बगैर तीनों के आप कुछ कर सकते हैं? बगैर तीनों के मिले किसी भी काम में सफलता नहीं मिल सकती।भारत में परिवारों का विघटन हुआ अथार्त त्रिगुण के सांख्य का विघटन हुआ। और यही कारण है सभी दुखी हैं और दुखी ही रहेंगे जब तक अपना सांख्य पूरा नहीं कर लेंगे।

10-इसलिए हम इस पंचअग्नि साधना को समझें। तभी हम इस संसार में भी सफल हो सकते हैं और शिव शक्ति के उपासक भी बन सकते हैं ...निर्णय हमारा है।प्रत्येक मनुष्य का स्वभाव, बर्ताव और कार्य अपने एलिमेंट के अनुसार ही है;हमें ये स्वीकार करना होगा।और हम किसी का स्वभाव या बर्ताव बदल भी नहीं सकते।यहां तक ..हम अपने एलिमेंट को भी नहीं बदल सकते हैं।वास्तव में, अपने एलिमेंट के अनुसार व्यवहार करने से ही हमारी उन्नति हो सकती है।सत्य तो यह है कि हमारी मृत्यु के पश्चात भी हमारा एलिमेंट हमारी शरीर की राख में विद्यमान रहता हैं।और पुनर्जन्म होने पर भी वही एलिमेंट हमें प्राप्त होता है।

11-सांख्य विकासवादी दर्शन है। प्रत्येक तत्व के दो रूप होते हैं, एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म। सूक्ष्म ही विकसित होकर स्थूल बनता है। सांख्य दर्शन के अनुसार प्रत्येक तत्व का अपना गुण है। आकाश का गुण शब्द है। वायु का विकास आकाश से ही हुआ लेकिन आकाश बना रहा। उसके बाद वाले तत्वों में भी पूर्ववर्ती सभी तत्वों के गुण आये। महाभारत में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यही सांख्य समझाया था।अब हम आधारभूत तत्व पृथ्वी और आकाश के बारे में बात करेंगे जो सभी मनुष्यों को समान रूप से प्राप्त है। इसमें कोई भेदभाव नहीं है।

क्या है ब्रह्मांड में सभी को समान रूप से प्राप्त... ''आधारभूत पृथ्वी-आकाश'' तत्वों का महत्व ?-

1- पृथ्‍वी तत्व;-

09 FACTS;-

1- पृथ्‍वी तत्व हमारे शरीर में 12% होती है।इसे जड़ जगत का हिस्सा कहते हैं। हमारी देह जो दिखाई देती है वह भी जड़ जगत का हिस्सा है और पृथ्‍वी भी। इसी से हमारा भौतिक शरीर बना है, लेकिन उसमें तब तक जान नहीं आ सकती जब तक की अन्य तत्व उसका हिस्सा न बने। जिन तत्वों, धातुओं और अधातुओं से पृथ्वी बनी है उन्हीं से यह हमारा शरीर भी बना है।आकाश एक ऐसा तत्व है जिसमें पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु विद्यमान है। यह आकाश ही हमारे भीतर आत्मा का वाहक है।

2-इस तत्व को महसूस करने के लिए साधना की जरूरत होती है। ये आकाश तत्व अभौतिक रूप में मन है। जैसे आकाश अनन्त है वैसे ही मन की भी कोई सीमा नहीं है। जैसे आकाश में कभी बादल, कभी धूल और कभी बिल्कुल साफ होता है वैसे ही मन में भी कभी सुख, कभी दुख और कभी तो बिल्कुल शांत रहता है। ये मन आकाश तत्व रूप है जो शरीर मे

विद्यमान है।

3-योगी एक ऐसा व्यक्ति होता है जो अपने भीतर और बाहर जीवन का एक नए सिरे से निर्माण कर रहा है। वह हमेशा एक ऐसी जगह चाहता है जो छोटी हो, ठोस हो, जहां वह अपनी तरह की ऊर्जा उत्पन्न कर सके और अपनी तरह की दुनिया बना सके। पहाड़ वो जगह है, जहां धरती किसी वजह से ऊपर उठ गई है। अगर आप जमीन में छेद करें, कुआं खोदें और उसमें रहने की कोशिश करें, तो वह कई वजहों से आरामदेह नहीं होगा। आप धीरे-धीरे

मेंढक बन जाएंगे।अगर आप धरती के संपर्क में आकर सही तरह की साधना करें - कुछ और नहीं तो बस नंगे पांव अपने बगीचे में रोजाना एक घंटे तक चलें, जहां कीड़े-मकोड़े और कांटें न हों, तो एक सप्ताह के भीतर आपका स्वास्थ्य काफी बेहतर हो जाएगा।

4-धरती से जुड़े रहने के दूसरे पहलू भी हैं। जब शरीर धरती के संपर्क में रहता है, तो उसके पांचों तत्व अलग तरीके से व्यवहार करते हैं। आपने योगियों द्वारा खुद को मिट्टी में गरदन तक गाड़े जाने की बात शायद सुनी होगी। उनके आसपास के नासमझ लोगों को लगता होगा कि वे कोई करतब दिखाकर कुछ साबित करने की कोशिश कर रहे हैं।

लेकिन यह कोई करतब दिखाने के लिए नहीं होता, वे बस अपने सिस्टम को फिर से संगठित कर रहे होते हैं।

5-आप ऐसा नहीं करना चाहते, इसलिए आज-कल आप एक महंगे स्पा में जाकर मड-बाथ लेते हैं। एक काम ये हो सकता है कि मिट्टी में गाडऩे का काम दिन में कुछ घंटे के लिए किया जाए। इससे वास्तव में लाभ होता है। अगर आप मिट्टी के अंदर नहीं जाना चाहते, तो कम से कम मिट्टी को अपने शरीर के ऊपर पोत लें। सिर्फ मिट्टी के संपर्क में आने पर, शरीर खुद को फिर से व्यवस्थित करना शुरू कर देगा। शरीर को सबसे बुनियादी तरीके से उसकी अपनी प्रकृति याद दिलाई जाती है, और याद दिलाने का यह सिलसिला हमेशा कायम रहना चाहिए।

6- इतना ही नहीं, अपने ऊंचे बिस्तर के बदले फर्श पर सो कर देखें, आपको बेहतर स्वास्थ्य

का एहसास होगा।इसी वजह से भारतीय परंपरा में, हमें हमेशा जमीन पर बैठ कर खाने और जमीन पर ही सोने को कहा जाता था। क्योंकि जमीन से ऊपर डेढ़ फीट की उंचाई तक प्राण का कंपन काफी अधिक होता है। ऊपर की ओर वह हल्का, और हल्का होता जाता है। इसीलिए जब हम किसी देवता को स्थापित करते हैं, तो उन्हें भी हम ऊंची वेदी पर स्थापित नहीं करते, हम उन्हें धरती के काफी नजदीक स्थापित करते हैं। हमने मंदिर बहुत बड़े-बड़े बनाए, इतनी विशाल और भव्य इमारतें बनाई गईं, हमारे लिए सौ फुट ऊंची वेदिका बनाकर भगवान को वहां स्थापित करना मुश्किल नहीं था, लेकिन उन्हें हमेशा नीचे रखा जाता है। लगभग जमीन पर या थोड़ा सा ऊपर। सिर्फ इसलिए क्योंकि नीचे प्राण का कंपन सबसे अधिक होता है। इसीलिए सभी साधक आम तौर पर पहाड़ों या गुफाओं की ओर जाते हैं, हालांकि वहां रहना बहुत आरामदेह नहीं होता।

7-जितना हम आधुनिक जीवन जी रहे हैं, उतना ही मिट्टी से दूर होते जा रहे हैं। खासतौर पर बड़े शहरों में बच्चों को धूल-मिट्टी से बचाने के लिए उन्हें बाहर नहीं खेलने दिया जाता। माता-पिता रोगों का हवाला देते हुए बच्चों को मिट्टी में खेलने से मना कर देते हैं। जबकि सच यह है कि मिट्टी हमें बीमार नहीं बनाती, बल्कि कई रोगों से दूर रखने में सहायता करती है। प्रदूषण रहित मिट्टी में कुछ बैक्टीरिया जैसे माइक्रोबैक्टीरियम वैक्कई और लैक्टोबेसिलस बुलगारिकस आदि होते हैं, जो हमारे इम्यून तंत्र, मस्तिष्क की कार्यप्रणाली और मूड पर अच्छा

असर डालते हैं।अपने घर में छोटा सा बगीचा या किचन गार्डन, टेरेस गार्डन बनाना या इनडोर प्लांट्स लगाना, प्रकृति के करीब ला सकता है। इससे मिट्टी के संपर्क में रहेंगे और शुद्ध हवा

भी मिलेगी।मिट्टी एक प्राकृतिक तत्व है, इसमें कई धातुएं होती हैं, जिनका मानव शरीर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

8-योगी हमेशा पहाड़ों को चुनते हैं, घाटियों, मैदानों को नहीं, क्योंकि अपने काम के लिए वे पृथ्वीसे घिरे रहना चाहते हैं।एक योगी अपने आप को ऐसी स्थिति में रखना चाहता है, जहां वह भूमि से घिरा हो। पहाड़ी गुफा हमेशा उंचाई पर होती है। वह ऐसी जगह है जहां आप हर तरफ से धरती से घिरे होते हैं।पहाड़ एकमात्र ऐसी प्राकृतिक जगह है जो शरीर को लगातार याद दिलाता है कि धरती और इस शरीर में तत्वों का खेल अलग-अलग नहीं है। हम हमेशा धरती के नजदीक रहना चाहते हैं ताकि शरीर को यह याद दिला सकें कि तुम बस इसका एक अंश हो। अगर आप लगातार याद दिलाते हैं, तो वह अपनी जगह याद रखता है।

योगी हमेशा पहाड़ पर रहना चाहते हैं क्योंकि वहां शरीर को अपनी नश्वरता का एहसास बड़े जोरदार तरीके से होता है, मानसिक या बौद्धिक स्तर पर नहीं, बल्कि भौतिक स्तर पर होता है।

9-जीवन और मृत्यु के बीच एक बहुत बारीक फासला है।यह फासला पहाड़ों में और कम हो जाता है। अगर आपको अपनी नश्वरता का एहसास है, हमेशा इस बात का बोध है कि आपकी मृत्यु होने वाली है, आपका भौतिक शरीर स्थायी नहीं है, वह एक दिन इस मिट्टी में मिल जाने वाला है, और वह दिन आज भी हो सकता है, तो आपकी आध्यात्मिक खोज और दृढ़ हो जाती है। एक योगी अपनी नश्वरता को हमेशा याद रखना चाहता है, ताकि उसकी आध्यात्मिक खोज कभी डगमगाए नहीं।

2-आकाश तत्व'-

04 FACTS;-

1-विकास की गति सूक्ष्म से स्थूल की दिशा में चलती है। प्रथम तत्व आकाश है।आकाश को शून्य तत्व भी कहा जाता है। बहुत अधिक व्यस्तता और 24 घंटे तकनीक से जुड़े रहना, हमारे तन व मन पर भारी पड़ रहा है। हम अपने मन को खाली ही नहीं छोड़ते। यही रोगों के बढ़ने की सबसे प्रमुख वजह है। हमें कुछ समय ऐसा निकालना होगा, जब हम अपने शरीर और मस्तिष्क को बिल्कुल खाली छोड़ दें। स्वस्थ रहने के लिए चिंता और तनाव से मुक्ति जरूरी है। ध्यान से तन और मन दोनों नई ऊर्जा से भर जाते हैं और मस्तिष्क भी शांत हो जाता है। यह शरीर का संतुलन बनाने के लिए बहुत जरूरी है। कई अध्ययनों में यह बात भी सामने आई है कि ध्यान करने से एलर्जी, उत्तेजना, दमा, कैंसर, थकान, हृदय संबंधी रोगों, उच्च रक्तदाब और अनिद्रा में आराम मिलता है।आकाश उन तत्वों के निर्माण के लिए जरूरी है, जो हल्की और सघन प्रकृति के होते हैं। यह दो अंगों को एक दूसरे से अलग करता है और उनके बीच खाली स्थान का निर्माण करता है, जैसे रक्त नलिकाएं, मांसपेशियां और मुलायम ऊतकआदि।

2-वास्तव में ,जब हम अंतरिक्ष या स्पेस की बात करते हैं, तो हम काल या अनस्तित्व के बारे में बात करते हैं, हम शिव की बात कर रहे हैं। शिव का अर्थ है ‘वह जो नहीं है।’ आकाश से हमारा मतलब है ‘वह जो है।’योग के आयाम में बताया गया है कि ब्रह्मांड में – चाहे वह आणविक हो या ब्रह्मांडीय – डिजाइन या बनावट का तत्व मूल रूप से एक ही होता है। हमारे जैसे रूप-आकार वाले इंसानों, झींगुर, केंचुए, पक्षी, रेंगने वाले जीव, सभी में एक ही मूल डिजाइन होता है। अणु से लेकर ब्रह्मांड तक हर चीज की मूलभूत बनावट समान होती है। इस बनावट के अलग-अलग रूपों में विकास की जटिलता भिन्न होती है। आपकी बनावट किसी अमीबा की बनावट से ज्यादा जटिल और बेहतर होती है, मगर मूलभूत बनावट एक ही होती है। केवल जटिलता बढ़ती है।

3-आप ब्रह्मांड को ,अपने आस-पास की दुनिया का अनुभव उसी तरह कर पाते हैं, जिस तरह आपका दिमाग है। अगर आपके दिमाग में स्पष्टता है, तो आप किसी भी चीज को उसके वास्तविक रूप में देख पाएंगे। अगर उसने बहुत से रूप और आकार अपना लिए हैं, तो आप उसे उतने ही अलग-अलग रूपों में देख सकते हैं। अगर आप इस दिमाग को ज्यादा शुद्ध और परिष्कृत धरातल तक विकसित कर सकें जिससे उसमें किसी तरह की कोई अस्थिरता या हलचल न हो, तो वह पूरी तरह समतल दर्पण की तरह काम करता है। उसके बाद वह हर चीज को उसके असली रूप में दर्शाएगा मगर उल्टा। आप जानते हैं कि दर्पण में सब कुछ उल्टा होता है।आपके अंदर उसे विकृत किए बिना सुधारने की समझ होनी चाहिए।

4-एक इंसान के रूप में आपके अंदर स्थूल से सूक्ष्म तक बहुत से स्तर हैं जिन्हे समझने की समझ होनी चाहिए।आकाश का विशेष गुण "शब्द" है और इस शब्द का संबंध हमारे कानों से है। कानों से हम सुनते हैं और शब्द जब हमारे कानों तक पहुंचते है तभी उनका कुछ अर्थ निकलता है। वेद तथा पुराणों में शब्द, अक्षर तथा नाद को ब्रह्म रुप माना गया है। वास्तव में आकाश में होने वाली गतिविधियों से गुरुत्वाकर्षण, प्रकाश, ऊष्मा, चुंबकीय़ क्षेत्र और प्रभाव तरंगों में परिवर्तन होता है। इस परिवर्तन का प्रभाव मानव जीवन पर भी पड़ता है। इसलिए आकाश कहें या अवकाश कहें या रिक्त स्थान कहें, हमें इसके महत्व को कभी नहीं भूलना चाहिए।

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क्या है पंचअग्नि साधना के महत्वपूर्ण एयर, फायर, वॉटर एलिमेंट?-

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..SHIVOHAM...