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क्या है चेतना /कांशसनेस ?क्या समाधि मूर्च्छा की अवस्था है?


चेतना /कांशसनेस क्या है?-

07 FACTS;-

1-चेतना दो तरह की हो सकती है। एक चेतना जो किसी वस्तु के प्रति हो और किसी वस्तु के द्वारा पैदा हुई होअथार्त बाहर से पैदा हुई चेतना ।बाहर से कोई भी संवेदना नहीं मिलती, कोई घटना नहीं घटती, और फिर भी आपका होश बना रहता है तो इस चेतना को हम आत्मा कहते हैं।जो चेतना बाहर से पैदा हुई है, वह धारणा है, ध्यान है। चेतना, जो कि किसी वस्तु का प्रत्युत्तर हो। आप बैठे हैं, कोई जोर से आवाज करता है; आपकी चेतना उस तरफ खिंच जाती है, ध्यान आकर्षित होता है। आप बैठे हैं, मकान में आग लग जाए, तो सारा जगत भूल जाता है, अगर नींद भी आ रही हो, तो खो जाएगी। आपको ऐसी एकाग्रता कभी न मिली होगी, जैसी मकान में आग लग जाए, तो तब मिलेगी।

2-आपने लाखों बार कोशिश की होगी कि सारी दुनिया को भूलकर कभी क्षणभर को परमात्मा का ध्यान कर लें। लेकिन जब भी ध्यान के लिए बैठे होंगे, हजार बातें उठ आई होंगी, हजार विचार आए होंगे। एक परमात्मा के विचार को छोड्कर सभी चीजों ने मन को घेर लिया होगा। लेकिन मकान में आग लग गई हो, तो सब भूल जाएगा। सारा संसार जैसे मिट गया, चित्त एकाग्र हो जाएगा।यह भी चेतना है। लेकिन यह चेतना बाहर की चोट से पैदा हुई है; बाहर पर निर्भर है।ऐसी चेतना भी शरीर का ही हिस्सा है।

3-जब कोई आवाज करता है और आपका ध्यान उस तरफ जाता है, तो यह ध्यान का जाना आपके होने में निहित नहीं है। यह आवाज के द्वारा प्रतिपादित हुआ है, यह बाई प्रोडक्ट है; यह आपका स्वभाव नहीं है।लेकिन ऐसी भी चेतना है, जो किसी चीज पर निर्भर नहीं है , जो किसी के द्वारा पैदा नहीं होती ... जो हमारा स्वभाव हैं ।स्वभाव का अर्थ है कि किसी कारण से पैदा नहीं होगी; हम हैं, इसलिए है, हमारे होने में ही निहित है।अथार्त बाहर से कोई भी संवेदना नहीं मिलती, कोई घटना नहीं घटती, और फिर भी आपका होश बना रहता है। इस चेतना को हम आत्मा कहते हैं।

और बाहर से पैदा हुई जो चेतना है, वह धारणा है, ध्यान है... वह भी शरीर का हिस्सा है।

4- रामकृष्ण परमहंस कई दिनों तक मृतप्राय अवस्था में लेटे रहते थे!रामकृष्ण परमहंस जब बेहोश हो जाते थे, तो उनकी धृति खो गई, उनका ध्यान खो गया, उनकी धारणा खो गई। अब बाहर कोई कितनी भी आवाज करे, तो उनकी चेतना बाहर न आएगी। लेकिन अपने स्वरूप में वे लीन हो गए हैं; अपने स्वरूप में वे परिपूर्ण चैतन्य हैं। जब उनकी समाधि टूटती थी, तो वे रोते थे और वे चिल्ला -चिल्ला कर कहते थे कि मां मुझे वापस वहीं ले चल। यहां कहां तूने मुझे दुख में वापस भेज दिया! उसी आनंद में मुझे वापस लौटा ले।जिसको हम मूर्च्छा समझेंगे, वह उनके लिए परम आनंद

था।बाहर जो ध्यान जाता था, वह सब वापस लौट गया;सब इंद्रियां भीतर लौट गई हैं। जैसे गंगा गंगोत्री में वापस लौट गई। वह जो चेतना दरवाजे तक बाहर आती थी , अब नहीं आती; अपने में लीन और स्थिर हो गई। 5-पदार्थ का अस्तित्व थ्री डायमेंशनल/तीन आयाम में है...लंबाई, चौड़ाई , ऊंचाई।यानी पदार्थ का अस्तित्व इन तीन दिशाओं में फैला हुआ है।अगर आदमी में हम पदार्थ को नापने जाएं तो लंबाई मिलेगी, चौड़ाई मिलेगी और ऊंचाई मिलेगी।लेकिन आदमी की आत्मा लंबाई,चौड़ाई और ऊंचाई की पकड़ में नहीं आती।पदार्थ के तीन आयाम हैं,आत्मा का चौथा/ फोर्थ

डायमेंशन है।

6-लंबाई, चौड़ाई ,ऊंचाई तो तीन दिशाएं हैं जिनमें सभी वस्तुएं आ जाती हैं।लेकिन आत्मा की एक और दिशा है जो वस्तुओं में नहीं है,वह चेतना की दिशा है,और वह है टाइम।अस्तित्व का चौथा आयाम है 'समय'।तो वस्तु तो तीन आयाम में हो सकती है, लेकिन चेतना कभी भी तीन आयाम में नहीं होती...चौथे आयाम में होती है।अगर हम चेतना को अलग कर लें तो दुनिया में सब कुछ होगा, सिर्फ टाइम नहीं होगा।

7-उदाहरण के लिए एक पहाड़ पर कोई चेतना नहीं हैं तो पत्थर होंगे, पहाड़ होगा, चांद निकलेगा, सूरज निकलेगा, दिन डूबेगा, उगेगा, लेकिन समय जैसी कोई चीज नहीं होगी।