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क्या है चेतना /कांशसनेस ?क्या समाधि मूर्च्छा की अवस्था है?


चेतना /कांशसनेस क्या है?-

07 FACTS;-

1-चेतना दो तरह की हो सकती है। एक चेतना जो किसी वस्तु के प्रति हो और किसी वस्तु के द्वारा पैदा हुई होअथार्त बाहर से पैदा हुई चेतना ।बाहर से कोई भी संवेदना नहीं मिलती, कोई घटना नहीं घटती, और फिर भी आपका होश बना रहता है तो इस चेतना को हम आत्मा कहते हैं।जो चेतना बाहर से पैदा हुई है, वह धारणा है, ध्यान है। चेतना, जो कि किसी वस्तु का प्रत्युत्तर हो। आप बैठे हैं, कोई जोर से आवाज करता है; आपकी चेतना उस तरफ खिंच जाती है, ध्यान आकर्षित होता है। आप बैठे हैं, मकान में आग लग जाए, तो सारा जगत भूल जाता है, अगर नींद भी आ रही हो, तो खो जाएगी। आपको ऐसी एकाग्रता कभी न मिली होगी, जैसी मकान में आग लग जाए, तो तब मिलेगी।

2-आपने लाखों बार कोशिश की होगी कि सारी दुनिया को भूलकर कभी क्षणभर को परमात्मा का ध्यान कर लें। लेकिन जब भी ध्यान के लिए बैठे होंगे, हजार बातें उठ आई होंगी, हजार विचार आए होंगे। एक परमात्मा के विचार को छोड्कर सभी चीजों ने मन को घेर लिया होगा। लेकिन मकान में आग लग गई हो, तो सब भूल जाएगा। सारा संसार जैसे मिट गया, चित्त एकाग्र हो जाएगा।यह भी चेतना है। लेकिन यह चेतना बाहर की चोट से पैदा हुई है; बाहर पर निर्भर है।ऐसी चेतना भी शरीर का ही हिस्सा है।

3-जब कोई आवाज करता है और आपका ध्यान उस तरफ जाता है, तो यह ध्यान का जाना आपके होने में निहित नहीं है। यह आवाज के द्वारा प्रतिपादित हुआ है, यह बाई प्रोडक्ट है; यह आपका स्वभाव नहीं है।लेकिन ऐसी भी चेतना है, जो किसी चीज पर निर्भर नहीं है , जो किसी के द्वारा पैदा नहीं होती ... जो हमारा स्वभाव हैं ।स्वभाव का अर्थ है कि किसी कारण से पैदा नहीं होगी; हम हैं, इसलिए है, हमारे होने में ही निहित है।अथार्त बाहर से कोई भी संवेदना नहीं मिलती, कोई घटना नहीं घटती, और फिर भी आपका होश बना रहता है। इस चेतना को हम आत्मा कहते हैं।

और बाहर से पैदा हुई जो चेतना है, वह धारणा है, ध्यान है... वह भी शरीर का हिस्सा है।

4- रामकृष्ण परमहंस कई दिनों तक मृतप्राय अवस्था में लेटे रहते थे!रामकृष्ण परमहंस जब बेहोश हो जाते थे, तो उनकी धृति खो गई, उनका ध्यान खो गया, उनकी धारणा खो गई। अब बाहर कोई कितनी भी आवाज करे, तो उनकी चेतना बाहर न आएगी। लेकिन अपने स्वरूप में वे लीन हो गए हैं; अपने स्वरूप में वे परिपूर्ण चैतन्य हैं। जब उनकी समाधि टूटती थी, तो वे रोते थे और वे चिल्ला -चिल्ला कर कहते थे कि मां मुझे वापस वहीं ले चल। यहां कहां तूने मुझे दुख में वापस भेज दिया! उसी आनंद में मुझे वापस लौटा ले।जिसको हम मूर्च्छा समझेंगे, वह उनके लिए परम आनंद

था।बाहर जो ध्यान जाता था, वह सब वापस लौट गया;सब इंद्रियां भीतर लौट गई हैं। जैसे गंगा गंगोत्री में वापस लौट गई। वह जो चेतना दरवाजे तक बाहर आती थी , अब नहीं आती; अपने में लीन और स्थिर हो गई। 5-पदार्थ का अस्तित्व थ्री डायमेंशनल/तीन आयाम में है...लंबाई, चौड़ाई , ऊंचाई।यानी पदार्थ का अस्तित्व इन तीन दिशाओं में फैला हुआ है।अगर आदमी में हम पदार्थ को नापने जाएं तो लंबाई मिलेगी, चौड़ाई मिलेगी और ऊंचाई मिलेगी।लेकिन आदमी की आत्मा लंबाई,चौड़ाई और ऊंचाई की पकड़ में नहीं आती।पदार्थ के तीन आयाम हैं,आत्मा का चौथा/ फोर्थ

डायमेंशन है।

6-लंबाई, चौड़ाई ,ऊंचाई तो तीन दिशाएं हैं जिनमें सभी वस्तुएं आ जाती हैं।लेकिन आत्मा की एक और दिशा है जो वस्तुओं में नहीं है,वह चेतना की दिशा है,और वह है टाइम।अस्तित्व का चौथा आयाम है 'समय'।तो वस्तु तो तीन आयाम में हो सकती है, लेकिन चेतना कभी भी तीन आयाम में नहीं होती...चौथे आयाम में होती है।अगर हम चेतना को अलग कर लें तो दुनिया में सब कुछ होगा, सिर्फ टाइम नहीं होगा।

7-उदाहरण के लिए एक पहाड़ पर कोई चेतना नहीं हैं तो पत्थर होंगे, पहाड़ होगा, चांद निकलेगा, सूरज निकलेगा, दिन डूबेगा, उगेगा, लेकिन समय जैसी कोई चीज नहीं होगी। क्योंकि समय का बोध ही चेतना है।कांशसनेस/चेतना के बिना समय जैसी कोई चीज नहीं है। जो है, उसके बिना समय नहीं है।और अगर समय न हो तो चेतना भी नहीं हो सकती। इसलिए वस्तु का अस्तित्व तो है लंबाई, चैड़ाई, ऊंचाई में और चेतना का अस्तित्व है काल में, समय की धारा में।ये चारों आयाम जोड़ कर अस्तित्व की परिभाषा की जा सकती है।

चेतना के खो जाने पर प्राप्त समाधि क्या मूर्च्छा की अवस्था है?-

33 FACTS;-

1-चेतना के खो जाने पर बहुत बार बाहर से मूर्च्छा जैसी प्रतीति होती है। हमारे लिए बाहर से देखने पर, अनेक बार रामकृष्ण परमहंस, अनेक दिनों के लिए मूर्च्छित हो जाते थे। शरीर ऐसे पड़ा रहता था, जैसे बेहोश आदमी का हो। पानी और दूध भी प्रयासपूर्वक, जबरदस्ती ही देना पड़ता था।जहां

तक बाहर का संबंध है, वे मूर्च्छित थे; और जहां तक भीतर का संबंध है, वे जरा भी मूर्च्छित नहीं थे। भीतर तो होश पूरा था। लेकिन यह होश, यह चेतना हमारी चेतना नहीं है।

2-हमारे लिए तो रामकृष्ण परमहंस मूर्च्छित ही हो गए। और अगर मनोवैज्ञानिकों से पूछें, तो वे कहेंगे, यह घटना हिस्टीरिया की है। क्योंकि मनोविज्ञान को अभी भी उस दूसरी चेतना का कोई पता नहीं है। तो

उन्हें जबरदस्ती होश में लाने के प्रयास किए जाते। एक्टीवायजर दिए जाते, जिनसे कि वे ज्यादा सक्रिय हो जाएं। इंजेक्शन लगाए जाते, शरीर में हजार तरह की कोशिश की जाती, ताकि चेतना वापस लौट आए।क्योंकि मनोविज्ञान बाहर की चेतना को ही चेतना समझता है।बाहर की चेतना खो गई, तो आदमी मूर्च्‍छित है, मरने के करीब है।

3-पश्चिम के एक बहुत बड़े विचारक और मनोवैज्ञानिक आर .डी लैग का कहना है कि पश्चिम में जितने लोग आज पागल हैं, वे सभी पागल नहीं हैं; उनमें कुछ तो ऐसे हैं, जो किसी पुराने जमाने में संत हो सकते थे।लेकिन वे पागलखानों में पड़े हैं।क्योंकि पश्चिम की समझ भीतर की चेतना को स्वीकार नहीं करती।तो बाहर की चेतना खो गई, कि आदमी विक्षिप्त मान लिया जाता है।वह जो परम अनुभूति थी, उसको पश्चिम में कोई भी पहचान नहीं पाता है।

4-हम रामकृष्ण परमहंस को विमुक्त मानते हैं।तो हिस्टीरिया और रामकृष्ण परमहंस की मूर्च्छा में क्या फर्क है? जहां तक बाहरी लक्षणों का संबंध है, एक से हैं। रामकृष्ण के हाथ-पैर लकड़ी की तरह जकड़ जाते थे,मुर्दे की भाति वे पड़ जाते थे।हाथ-पैर में पहले कंपन आता था, जैसे हिस्टीरिया के मरीज को आता है। और इसके बाद वे जड़वत हो जाते थे। सारा होश खो जाता था। अगर उस समय हम उनके पैर को भी काट दें, तो उनको पता नहीं चलेगा। यही तो हिस्टीरिया के मरीज को भी घटित होता है। कोमा में पड़ जाता है, बेहोशी में पड़ जाता है।

5-इस घटना में ऊपर से देखने में तो कोई फर्क नहीं है।और अगर हम चिकित्सक के पास जाएंगे, तो वह भी कहेगा, यह भी हिस्टीरिया का एक प्रकार है। लेकिन भीतर से बड़ा फर्क है। क्योंकि हिस्टीरिया का मरीज जब वापस लौटता है अपनी मूर्च्छा से, तो वही का वही होता है जो मूर्च्छा के पहले था। रामकृष्ण जब अपनी मूर्च्छा से वापस लौटते हैं, तो वही नहीं होते जो मूर्च्छा के पहले थे। वह आदमी खो गया।अगर वह आदमी क्रोधी था,

तो अब यह आदमी क्रोधी नहीं है। अगर वह आदमी अशांत था, तो अब यह आदमी अशांत नहीं है। अगर वह आदमी दुखी था, तो अब यह आदमी दुखी नहीं है।अब यह परम आनंदित है।

6-हिस्टीरिया का मरीज तो हिस्टीरिया की बेहोशी के बाद वैसा का वैसा ही होता है, जैसा पहले था। शायद और भी विकृत हो जाता है क्योंकि बीमारी उसे और भी तोड़ देती है। लेकिन समाधि में गया व्यक्ति नया होकर वापस लौटता है; पुनरुज्जीवित हो जाता है।उसके जीवन में नई हवा , नई सुगंध और नया आनंद फैल जाता है।पश्चिम में लक्षण से सोचते हैं;हम परिणाम

से सोचते हैं। हम कहते हैं कि समाधि के बाद जो घटित होता है, वही तय करने वाली बात है कि समाधि समाधि थी या मूर्च्छा थी।

7-और जिस मूर्च्छा से कचरा जल जाता हो और सोना निखर आता हो, उसको मूर्च्छा कहना उचित नहीं है। वह जो रामकृष्ण का व्यक्तित्व था, वह समाप्त हो जाता है; और एक अभूतपूर्व, एक परम ज्योतिर्मय व्यक्तित्व का जन्म होता है। तो जिस मूर्च्छा से ज्योतिर्मय व्यक्तित्व का जन्म होता हो, उसको हम बीमारी न कहेंगे; उसको हम परम सौभाग्य कहेंगे।

रामकृष्ण की बेहोशी बेहोशी नहीं थी। क्योंकि अगर वह बेहोशी होती, तो रामकृष्ण का वह जो दिव्य रूप प्रकट हुआ, वह प्रकट नहीं हो सकता था। बेहोशी से दिव्यता नहीं पैदा होती हैं।दिव्यता तो परम चैतन्य , परम होश से ही पैदा होती है।हमारे लिए देखने पर तो रामकृष्ण बेहोश हैं। लेकिन भीतर वे परम होश में हैं।

8-जैसे कि होश के द्वार दरवाजे सब बंद हो गए.. जहां से किरणें बाहर आती थीं।इंद्रियां सब शांत हो गईं और भीतर का दीया भीतर ही जल रहा है; उसकी कोई किरण बाहर नहीं आती। इसलिए हम पहचान नहीं पाते। अगर फिर भी कोई जिद्द करना चाहे कि यह बेहोशी ही है, तो यह बडी आध्यात्मिक बेहोशी है। और यह शब्द उचित नहीं है। हम तो इसे परम होश कहते हैं। और मनोविज्ञान को आज नहीं कल यह भेद स्वीकार करना पड़ेगा।

9-अभी तक तो मनोविज्ञान ने फ्रायड के प्रभाव में संतों को और पागलों को एक ही साथ रख दिया था। पश्चिम के मनोवैज्ञानिकों ने,जीसस के संबंध में ऐसी किताबें लिखी हैं जिनमें उनको न्यूरोटिक सिद्ध करने की कोशिश की

है ।स्वभावत:, कोई आदमी जो कहता है, 'मैं ईश्वर का पुत्र हूं' हमें पागल ही मालूम पड़ेगा। या तो हम समझेंगे कि धूर्त है , पाखंडी है या हम समझेंगे पागल है। कौन आदमी अपने होश में दावा करेगा कि मैं ईश्वर का पुत्र हूं!

लेकिन जो व्यक्ति भी भीतर की चेतना को अनुभव करता है, 'ईश्वर का पुत्र' तो छोटा वक्तव्य है, वह ईश्वर ही है। उपनिषद के ऋषि जब कहते हैं, 'अहं ब्रह्मास्मि, हम ब्रह्म हैं, तो पश्चिम का मनोवैज्ञानिक समझेगा कि बात कुछ गड़बड़ हो गई; दिमाग कुछ खराब हो गया।

10-उनका सोचना भी ठीक है, क्योंकि अगर पागलखानों में खोजने जाएं, तो बहुत-से पागल हैं जो कहते है, मैं अडोल्फ हिटलर हूं कि मैं स्टैलिन हूं। कोई पागल कहता है, मैं नेपोलियन हूं।उपनिषद के ऋषि कहते हैं, हम स्वयं परमात्मा हैं।स्वामी रामतीर्थ ने कहा है कि यह सृष्टि मैंने ही बनाई है; ये चांद-तारे मैंने ही चलाए हैं।जब स्वामी रामतीर्थ से कोई पूछने आया कि सृष्टि किसने बनाई? तो रामतीर्थ ने कहा, क्या पूछते हो! मैंने ही

बनाई है।निश्चित ही, यह स्वर भी पागलपन का मालूम पड़ता है।

11-और आप भला नहीं कहते कि महात्मा गांधी हैं या जवाहरलाल नेहरू हैं, तो भी आप ठीक होश में नहीं हैं, आप भी विक्षिप्त हैं। और रामतीर्थ यह दावा करके भी विक्षिप्त नहीं हैं कि जगत मैंने ही बनाया है।स्वामी रामतीर्थ का यह वक्तव्य किसी बड़ी गहरी अनुभुति की बात है।स्वामी रामतीर्थ यह

कह रहे हैं कि इस जगत की जो परम चेतना है, वह मेरे भीतर है। जिस दिन उसने इस जगत को बनाया, मैं भी उसमें सम्मिलित था।मेरे बिना यह जगत भी नहीं बन सकता, क्योंकि मैं इस जगत का हिस्सा हूं।और परमात्मा ने जब यह जगत बनाया, तो मैं उसके भीतर मौजूद था।मेरी मौजूदगी अनिवार्य है; क्योंकि मैं मौजूद हूं।

12-इस जगत में कुछ भी मिटता नहीं। विनाश असंभव है। एक रेत के कण को भी नष्ट नहीं किया जा सकता। आप कुछ भी करो, मिटाओ, तोड़ो, फोड़ो, कुछ भी करो, वह रहेगा; उसके अस्तित्व को मिटाया नहीं जा सकता। जो चीज अस्तित्व में है, वह शून्य में नहीं जा

सकती।तो चेतना कैसे शून्य में जा सकती है! मैं हूं इसका अर्थ है कि मैं था और इसका अर्थ है कि मैं रहूंगा। कोई भी रूप या आकार हो, लेकिन मेरा विनाश असंभव है। विनाश घटता ही नहीं।जगत में केवल परिवर्तन होता है, विनाश होता ही नहीं। न तो कोई चीज निर्मित होती है और न कोई चीज विनष्ट होती है। केवल चीजें बदलती हैं, रूपांतरित होती हैं, नए आकार लेती हैं, पुराने आकार छोड़ देती हैं। लेकिन विनाश असंभव है।

13-विज्ञान भी स्वीकार करता है कि विनाश संभव नहीं है।धर्म और विज्ञान एक बात में राजी हैं, विनाश असंभव है।तो स्वामी रामतीर्थ अगर यह कहते

हैं कि मैंने ही बनाया था, तो यह वक्तव्य बड़ा अर्थपूर्ण है।यह किसी पागल का वक्तव्य नहीं है। सच तो यह है कि उस आदमी का वक्तव्य है, जो पागलपन के पार चला गया है और जो जीवन की अनंत श्रृंखला देख सकता है।और जो अब अपने को अलग नहीं मानता ;बल्कि उस अनंत श्रृंखला का एक हिस्सा मानता है।

14-बाहर से देखने पर बहुत बार पागलों के वक्तव्य और संतों के वक्तव्य एक से मालूम पड़ते हैं; भीतर से खोजने पर उनसे ज्यादा भिन्न वक्तव्य नहीं हो सकते। इसलिए मनोविज्ञान जो बातें कहता है, वे आधी हैं और आधी होने से खतरनाक हैं।साधारण आदमी बीच में है।साधारण आदमी से जो

नीचे गिर जाता है, पागल हो जाता है।वह भी एबनार्मल है, और जो साधारण आदमी से ऊपर चला जाता है, वह भी एबनार्मल है।और विज्ञान दोनों को एक ही मान नेता है;साधारण से जो भी हट जाता है, वह अस्वस्थ है।

15-साधारण आदमी से कोई नीचे गिर जाए, तो पागल हो जाता है; ऊपर कोई उठ जाए तो महर्षि हो जाता है।दोनों असाधारण हैं; दोनों साधारण नहीं हैं।और विज्ञान की यह मूलभूत धारणा है कि साधारण स्वस्थ है ;

तो स्वामी रामकृष्ण अस्वस्थ हैं।हमने जिनकी पूजा की है, विज्ञान उनका

इलाज करना चाहेगा।परन्तु आज नए मनोवैज्ञानिकों की एक कतार खड़ी होती जा रही है, जो कह रही है कि हमारी समझ में भ्रान्ति है।और हम बहुत से लोगों को इसलिए पागल करार देते हैं कि हमें पता ही नहीं कि हम क्या कर रहे हैं। उनमें बहुत से लोग असाधारण प्रतिभा के हैं।

16-एक बहुत आश्चर्य की बात है कि असाधारण प्रतिभा के लोग अक्सर पागल हो जाते हैं।इसलिए पागलपन में और असाधारण प्रतिभा में कोई संबंध मालूम पड़ता है।अगर पिछले पचास वर्षों के सभी असाधारण व्यक्तियों की आप खोजबीन करें, तो उनमें से पचास प्रतिशत कभी न कभी पागल हो गए।और जो उनमें श्रेष्ठतम है, वह जरूर एक बार पागलखाने हो आता है।नोबल प्राइज पाने वाले बहुत से लोग जिंदगी में कभी न कभी पागल होने के करीब पहुंच जाते हैं या पागल हो जाते हैं।कहीं ये कारण तो नहीं है कि हमारे पागलपन की व्याख्या में कुछ भूल है।

17-असाधारण प्रतिभा का आदमी ऐसी चीजें देखने लगता है,जो साधारण आदमी को दिखाई नहीं पड़ती।इसलिए साधारण आदमियों से उसका संबंध टूट जाता है।असाधारण प्रतिभा का आदमी ऐसे अनुभव से गुजरने लगता है, जो सबका अनुभव नहीं है।वह अकेला पड़ जाता है।अगर वह आपसे कहे, तो आप भरोसा नहीं करेंगे।जीसस कहते हैं कि'' शैतान मेरे

पास खड़ा हो गया और मेरे कान में कहने लगा कि तू ऐसा काम कर।मैंने कहा, 'हट शैतान''!

18-अगर कोई आदमी आपसे आकर कहे कि आज रास्ते पर अकेला था, शैतान मेरे पास में आ गया और कान में कहने लगा, ऐसा कर।तो आप फौरन संदिग्ध हो जाएंगे।फोन उठाकर डाक्टर को खबर करेंगे कि कुछ

गड़बड़ हो गई है।ऋषि कहते हैं, देवताओं से उनकी बात हो रही है। अगर आपके पति/ पत्नी आपसे कहे कि आज सुबह इंद्र देवता से चर्चा हो गई, तो आप क्या करिएगा? आप चिंता में पड़ जाएंगे कि अब बाल बच्चों का क्या होगा! यह तो पागल हो गया/गइ।आप कितनी ही श्रद्धा दिखाते हों,

वह झूठी होगी।आप उपनिषद और वेद पढ़कर ये नहीं मान सकते कि ये बातें ज्ञानियों की हैं।क्योंकि भीतर तो आप समझेंगे कि कहां देवता/देविया! यह सब क्या हो रहा है?कहीं इनका दिमाग तो कुछ .... ।

19-रामकृष्ण परमहंस बातें कर रहे हैं माँ काली से।घंटों उनकी चर्चा हो रही है।अगर आप देख लेते, तो आप क्या समझते? आपको तो माँ काली दिखाई नहीं पड़ती।आपको तो सिर्फ रामकृष्ण बातें करते दिखाई पड़ते।

तो आप पागलखाने में भी देख सकते हैं कि, लोग बैठे हैं..अकेले बिना किसी के,और बातें कर रहे हैं।दोनों तरफ से जवाब दे रहे हैं। तो स्वभावत: यह खयाल उठेगा कि कुछ विक्षिप्तता है।हमें विक्षिप्तता में और असाधारणता में कुछ संबंध मालूम पड़ता है या फिर हमारी व्याख्या की भूल है।

20-असाधारण व्यक्ति ऐसी चीजों को देख लेते हैं, जो साधारण व्यक्तियों को कभी दिखाई नहीं पड़ सकतीं; और ऐसे अनुभव को उपलब्ध हो जाते हैं, जिसका साधारण व्यक्ति को कभी स्वाद नहीं मिलता। फिर वे ऐसी बातें कहने लगते हैं, जो साधारण व्यक्ति के समझ के पार पड़ती हैं। फिर उनके जीवन में ऐसी घटनाएं होने लगती हैं, जो हमारे तर्क, हमारे नियम, हमारी

व्यवस्था को तोड़ती हैं।वास्तव में,हमारी जिंदगी एक राजपथ/बंधा हुआ रास्ता है।असाधारण लोग रास्ते से नीचे उतर जाते हैं; पगडंडियों पर चलने लगते हैं।और ऐसी खबरें लाने लगते हैं, जिनका हमें कोई भी पता नहीं है, जो हमारे नक्शों में ,किताबों में नहीं हैं... जो हमारे अनुभव में नहीं हैं।हमें तो पहली बात यही खयाल में आती है कि क्या इस आदमी का दिमाग ....।

21-लेकिन एक फर्क खयाल रख लेंगे, तो भेद साफ हो जाएगा। अगर कोई पागलपन आपको शुद्ध कर जाता हो, मौन ,शांत और आनंदित कर जाता हो, आपको जीवन के उत्सव से भर जाता हो, आपके जीवन को चिंता और वासना से छुटकारा दिला देता हो;जीवन में संसार का जो बंधन है, जो कष्ट है, जो पीड़ा है, जो जंजीरें हैं, उन सब को तोड़ देता हो, तो ऐसा पागलपन सौभाग्य है और परमात्मा से ऐसे पागलपन की प्रार्थना करनी चाहिए।

22-और अगर कोई समझदारी आपकी जिंदगी को तकलीफों से भर देती हो, पीड़ा और तनाव से घेर देती हो, जिंदगी को कारागृह बना देती हो, और आपको सिवाय दुख और नर्क के कहीं न ले जाती हो, तो परमात्मा से प्रार्थना करनी चाहिए कि ऐसी समझदारी से मेरा छुटकारा हो।

अगर कोई मूर्च्छा आपके जीवन में आनंद की झलक ले आती हो, तो वह मूर्च्छा चैतन्य से ज्यादा कीमती है। और कोई होश जो आपको निरंतर तोड़ता जाता हो, तनाव और चिंता से और संताप से भरता हो, तो वह होश मूर्च्छा से बदतर है।

23-कसौटी है आपका अंतिम फल,कि आप क्या हो जाते हैं। ऊपर के

लक्षण बिलकुल मत देखें।तो स्वामी रामकृष्ण के जीवन में जो फूल लगते हैं, वे किसी पागल के जीवन में नहीं लगते।स्वामी रामकृष्ण के जीवन से जो सुगंध आती है, वह किसी मूर्च्छित, कोमा में, हिस्टीरिया में पड़ गए व्यक्ति के जीवन से नहीं आती। उसी सुगंध के सहारे हम उन्हें परमहंस कहते हैं। और अगर आप उस सुगंध की फिक्र छोड़ दें, और सिर्फ लक्षण देखें और डाक्टर से जांच करवा लें, तो वे भी मूर्च्छित हैं, और बीमार हैं, और उनके इलाज की जरूरत है।

24-दो तरह की चेतना है।पहली चेतना जो बाहर के दबाव से पैदा होती है -प्रतिक्रिया, रिएक्‍शन। उस चेतना को श्रीकृष्ण कहते हैं कि, वह क्षेत्र का ही हिस्सा है, वह छोड़ने योग्य है।दूसरी चेतना वो है, जो किसी कारण से पैदा नहीं होती; जो स्वभाव है, स्वरूप है, जो भीतर छिपी है, जिसका झरना लेकर ही हम पैदा हुए है ।वास्तव में,हम और उसका झरना एक ही चीज के दो नाम हैं।लेकिन इस झरने का पता तभी चलेगा, जब हम बाहर के

आघात से पैदा हुई चेतना से अपने को मुक्त कर लें।नहीं तो हमारा ध्यान निरंतर बाहर चला जाता है और भीतर तो पहुंच ही नहीं पाता।

25-हमारी जिंदगी में दो काम हैं...सोना- जागना। जिसको हम जागना कहते हैं, वह जागना नहीं है। जिसको हम जागना कहते हैं, वह बाहर की चोट में हमारी चेतना का उत्तेजित रहना है।और जिसको हम नींद कहते हैं, वह भी केवल थकान है। और जिसको हम जागरण कहते हैं, वह चोटों के बीच चुनाव, चुनौती के बीच हमारे भीतर होती प्रतिक्रिया है।श्रीकृष्ण

,बुद्ध और क्राइस्ट दूसरे ढंग से जागते हैं और दूसरे ढंग से सोते हैं। उनकी नींद थकान नहीं , विश्राम है। उनका जागरण बाहर का आघात नहीं है, उनका जागरण भीतर की स्फुरणा है। और जो व्यक्ति थककर नहीं सोया है, वह नींद में भी जागता रहता है।

26-इसलिए श्रीकृष्ण ने कहा है कि योगी, ..जब सब सोते हैं, तब भी

जागता है।इसका यह मतलब नहीं है कि वह रातभर आंखें खोले बैठा रहता है। कुछ लोग यह कोशिश भी करते हैं कि रातभर आंखें खोले बैठे रहो ;क्योंकि योगी रात में सोता नहीं है।इसलिए नासमझी में यह सोचने लगते हैं कि अगर रात न सोए, तो योगी बन जाएंगे।या नींद कम करो-चार घंटा, तीन घंटा, दो घंटा-जितना कम सोओ, कम से कम उतने योगी हो गए।

श्रीकृष्ण का वैसा मतलब नहीं है। योगी भरपूर सोता है; आपसे ज्यादा सोता है, आपसे गहरा सोता है। लेकिन उसकी नींद शरीर में घटती है, क्षेत्र में घटती है; क्षेत्रज्ञ जागा रहता है।

27-शरीर विश्राम में होता है, भीतर वह जागा होता है। वह रात करवट भी बदलता है, तो उसे करवट बदलने का होश होता है। और ध्यान रहे, उसकी रात बेहोश नहीं है ।आपका तो दिन भी बेहोश है। योगी रात में भी जागता है, भोगी तो दिन में भी सोता है। इसका यह मतलब नहीं है कि दिन में अगर आप घंटे, दो घंटे सो जाते हों तो...। भोगी दिन में भी सोता है,अथार्त उसके भीतर की चेतना तो जागती ही नहीं। केवल आघात, चोट उसको जगाए रखती है।

28-बड़े शहरों में,जितना शोरगुल दुनिया में चल रहा है, उसकी वजह से लोग बहरे होते जा रहे हैं। और सौ साल अगर इसी रफ्तार से काम आगे जारी रहा, तो शहरों में कान वाला आदमी मिलना मुश्किल हो जाएगा। इतना आघात पड़ रहा है कि कान धीरे -धीरे जड़ हो जाएंगे।

और इसलिए आज धीमी आवाज से चेतना में कोई चोट ही नहीं पड़ती, काफी शोरगुल चाहिए।जो नए संगीत हैं, नृत्य हैं, वे भयंकर शोरगुल से भरे हैं। क्योंकि छोटे -मोटे शोरगुल से तो कोई चोट ही नहीं पैदा होगी। तेज चुनौती चाहिए, तेज आघात चाहिए, तो थोड़ा सा रस मालूम होता है।

केवल चोट से भी काम नहीं चलता, तो बहुत तरह के प्रकाश लगा लेते हैं। प्रकाश बदलते रहते हैं.. तेजी से।एक बिलकुल विक्षिप्त अवस्था हो जाती है। तब घंटेभर उस विक्षिप्त अवस्था में रहकर किसी आदमी को लगता है, कुछ जिंदगी है; कुछ जीवन का अनुभव होता है!

29-वास्तव में,हम इतने मर गए हैं कि जब तक बहुत चोट न हो, तो जीवन का भी कोई अनुभव नहीं होता। धीमे स्वर तो हमें सुनाई ही न पड़ेंगे। और जीवन के सभी नैसर्गिक स्वर धीमे हैं।रात का सन्नाटा हमें सुनाई नहीं पड़ेगा।हृदय की अपनी धड़कन हमें सुनाई नहीं पड़ेगी। अपने खून की

चाल की आवाज भी बहुत धीमी है, वह सुनाई नहीं पड़ेगी।लेकिन आवाज तो हो रही है।अब एब्सोल्युट साउंड प्रूफ हो.. तो दो तरह की आवाजें आती हैं! आपका हृदय धड़क रहा है, जो आपने कभी ठीक से सुना

नहीं। तो आपके हृदय की धड़कन जोर से आती है। और आपका खून जो शरीर के भीतर चल रहा है ;उसमें जो घर्षण हो रहा है, उसकी आवाज आती है। ये दो आवाजें आपके भीतर हैं।

30-आपने तो कभी अपने खून की आवाज भी नहीं सुनी है और बहुत से लोग बैठकर भीतर ओंकार का नाद सुनने की कोशिश करते हैं! वह अति सूक्ष्म है; वह आपको कभी सुनाई नहीं पड़ सकती।अब यह खून की

आवाज तो स्थूल आवाज है; जैसे झरने की आवाज होती है। लेकिन वही आपको सुनाई नहीं पड़ी; और आप सोच रहे हैं कि ओंकार का नाद सुनाई पड़ जाए! वह तो परम गूढ़, परम सूक्ष्म, आखिरी आवाज है। जब सब तरह से व्यक्ति पूर्ण शांत हो जाता है, तभी वह सुनाई पड़ती है।जो 'ओम' भीतर गूंजता है, वह पैदा हुआ 'ओम' नहीं है। इसलिए हमने उसको अनाहत नाद कहा है। आहत नाद का अर्थ है, जो चोट से पैदा हो। अनाहत नाद का अर्थ है, जो बिना चोट के अपने आप पैदा होता रहे। वह सुनाई पड़ेगा। लेकिन तब हमें अपनी चेतना को बाहर के आघात से छुटकारा कर लेना जरूरी है।

31-जब रामकृष्ण परमहंस मूर्च्छित हैं, तब उन्होंने बाहर की तरफ से अपने द्वार -दरवाजे बंद कर लिए हैं। अब उन्हें भीतर का अनाहत नाद /ओंकार सुनाई पड़ रहा है।लेकिन मूर्च्छित होना जरूरी नहीं है। और भी विधियां

हैं, जिनमें बाहर भी होश रखा जा सकता है और भीतर भी। लेकिन वे थोड़ी

कठिन हैं, क्योंकि दोहरी प्रक्रिया हो जाती है।जैसा रामकृष्ण परमहंस बेहोश होकर गिरे, ऐसा न बुद्ध के जीवन में न श्रीकृष्ण के जीवन में , न जीसस के जीवन और न मोहम्मद के जीवन में सुना है कि बेहोश हो गए।

32-रामकृष्ण परमहंस और कुछ संतों के जीवन में वैसी घटना है।

तो गौतम बुद्ध कभी बाहर से बेहोश नहीं हुए।लेकिन गौतम बुद्ध की प्रक्रिया रामकृष्ण परमहंस की प्रक्रिया से ज्यादा कठिन है। गौतम बुद्ध कहते हैं, दोनों तरफ होश रखा जा सकता है...भीतर भी और बाहर भी। हम बीच में खड़े हो सकते हैं। वह जो परम चेतना है, बाहर और भीतर के बीच की देहली पर खड़ी हो सकती है।और दोनों तरफ होश रख सकते हैं।लेकिन अति जटिल बात है।

33-इसलिए उचित है कि रामकृष्ण परमहंस की तरह से ही चलें;दूसरी

घटना भी बाद में घट जाएगी। रामकृष्ण ने आधा काम बांट लिया है। बाहर की तरफ से होश छोड़ दिया है, सारा होश भीतर ले गए हैं। एक दफा भीतर का होश सध जाए, तो फिर बाहर भी होश साधा जा सकता है।

रामकृष्ण का प्रयोग गौतम बुद्ध के प्रयोग से सरल है क्योंकि बुद्ध के प्रयोग में दो काम एक साथ साधने पड़ेंगे; ज्यादा समय लगेगा, और ज्यादा कठिनाई होगी; और अत्यंत अड़चनों से गुजरना पड़ेगा।एक बार बाहर को छोड़ ही दें और भीतर ही डूब जाएं। एक दफा भीतर का रस अनुभव में आ जाए तो फिर बाहर भी उसे जगाए रखा जा सकता है।

...SHIVOHAM...