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गुरु पूर्णिमा का क्या महत्व है ?क्या गुरु का मार्गदर्शन अनिवार्य है ?


आदियोगी शिव और गुरु-पूर्णिमा ;-

12 FACTS;-

1-आज के आधुनिक विज्ञान ने साबित किया है कि इस सृष्टि में सब कुछ शून्यता से आता है और वापस शून्य में ही चला जाता है। इस अस्तित्व का आधार और संपूर्ण ब्रम्हांड का मौलिक गुण ही एक विराट शून्यता है।उसमें मौजूद आकाशगंगाएं केवल छोटी-मोटी गतिविधियां हैं, जो किसी फुहार की तरह हैं।उसके अलावा सब एक खालीपन है, जिसे शिव के नाम से जाना जाता है। शिव ही वो गर्भ हैं जिसमें से सब कुछ जन्म लेता है, और वे ही वो गुमनामी हैं, जिनमें सब कुछ फिर से समा जाता है। सब कुछ शिव से आता है, और फिर से शिव में चला जाता है।

2-शिव के कारण ही सभी धर्मों की उत्पत्ति है।शिव तो जगत के गुरु और परमेश्वर हैं। मान्यता अनुसार सबसे पहले उन्होंने अपना ज्ञान सप्त ऋषियों को दिया था।आदियोगी शिव ने योग विज्ञान का पहला संचारआषाढ़ पूर्णिमा (गुरु-पूर्णिमा)के दिन कांतिसरोवर के किनारे किया जो हिमालय में केदारनाथ से कुछ मील दूर पर स्थित एक बर्फीली झील है।भगवान शिव ही पहले योगी हैं और मानव स्वभाव की सबसे गहरी समझ उन्हीं को है। उन्होंने अपने ज्ञान के विस्तार के लिए 7 ऋषियों को चुना और उनको योग के अलग-अलग पहलुओं का ज्ञान दिया, जो योग के 7 बुनियादी पहलू बन गए।यहां आदियोगी शिव ने, इस आंतरिक तकनीक का व्यवस्थित विवरण अपने पहले सात शिष्यों को देना शुरू किया।ये सात ऋषि, आज सप्तर्षि के नाम से जाने जाते हैं। ये सभी धर्मों के आने से पहले हुआ था।

3- सप्त ऋषियों ने शिव से ज्ञान लेकर अलग-अलग दिशाओं में फैलाया और धरती के कोने-कोने में शैव धर्म, योग और ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया। इन सातों ऋषियों ने ऐसा कोई व्यक्ति नहीं छोड़ा जिसको शिव कर्म, परंपरा आदि का ज्ञान नहीं सिखाया हो। आज सभी धर्मों में इसकी झलक देखने को मिल जाएगी।वक्त के साथ इन 7 रूपों से सैकड़ों शाखाएं निकल आईं। बाद में योग में आई जटिलता को देखकर पतंजलि ने 300 ईसा पूर्व मात्र 200 सूत्रों में पूरे योग शास्त्र को समेट दिया। योग का 8वां अंग मोक्ष है। 7 अंग तो उस मोक्ष तक पहुंचने के लिए है।

4-शिव ने ही गुरु और शिष्य परंपरा की शुरुआत ‍की थी जिसके चलते आज भी नाथ, शैव, शाक्त आदि सभी संतों में उसी परंपरा का निर्वाह होता आ रहा है। आदि गुरु शंकराचार्य और गुरु गोरखनाथ ने इसी परंपरा और आगे बढ़ाया। शिव के शिष्यों के कारण ही दुनिया में अलग अगल धर्मों की स्थापना हुई है।इसी तरह पश्चिमम की संस्कृति और धर्म को भी भगवान शिव ने स्पष्ट रूप से प्रभावित किया। मुशरिक, यजीदी, साबिईन, सुबी, इब्राहीमी धर्मों में शिव के होने की छाप स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। शिव के एक शिष्य ने पश्चिम ‍ में जाकर ही शिव के धर्म की नींव रखी थी जिसका कालांतर में नाम और स्वरूप बदलता गया।

5-किसी जमाने में प्रत्येक व्यक्ति को गुरु से मार्गदर्शन लेना अनिवार्य था और जो बिना गुरु के होता था, उसकी निगुरा कहकर सामाजिक भत्र्सना होती थी। विद्या एवं उच्चस्तरीय ज्ञान के क्षेत्र के अतिरिक्त मानवीय चेतना को जाग्रत एवं झंकृत कर आदर्शमय मानवीय जीवन के लिए गुरु का मार्गदर्शन एवं संरक्षण आवश्यक है।गुरु-तत्व हमारे जीवन में व्याप्त है।

हमारी मां हमारी प्रथम गुरु होती हैं। जीवन के हर विषय के लिए गुरु होते हैं- धर्म के लिए ‘धर्म गुरु’, परिवार के लिए ‘कुल गुरु’, राज्य के लिए ‘राजगुरु’, किसी विषय के अध्ययन के लिए ‘विद्या गुरु’ और अध्यात्म के लिए सद्गुरु। सद्गुरु न केवल आपको ज्ञान से भरते हैं, बल्कि वह आपके भीतर जीवन ऊर्जा की ज्योति भी जलाते हैं।

6-गुरु की उपस्थिति में आप और भी अधिक जीवंत हो जाते हैं। आप बुद्धि की पराकाष्ठा को प्राप्त कर लेते हैं, जो बुद्ध-चेतना है। गुरु न केवल आपको बुद्धिमान, बल्कि ज्ञानी भी बनाते हैं। आचार्य (अध्यापक) व्यक्ति को ज्ञान प्रदान करते हैं, लेकिन गुरु सजगता की उन ऊंचाइयों तक आपको ले जाते हैं, जिससे आप जीवंत हो जाते हैं।उपनिषद के अनुसार,गुरु के पांच

लक्षण हैं - ज्ञान रक्षा, दु:ख क्षय, सुख आविर्भाव, समृद्धि, ऐश्वर्यवद्र्धन। सद्गुरु की उपस्थिति में ज्ञान पल्लवित होता है और दुख क्षीण होने लगता है। बिना कारण आपका मन प्रसन्न रहता है और सभी योग्यताएं बढ़ जाती हैं।

7-जब जीवन में संपूर्णता होती है, तब कृतज्ञता का भाव उदित होता है। गुरु के आदर से आरंभ होकर अंत में हम जीवन की सभी वस्तुओं का आदर-सत्कार करने लगते हैं। गुरु पूर्णिमा भक्ति और कृतज्ञता दोनों के उदित होने का उत्सव मनाने का अवसर प्रदान करता है

हर व्यक्ति के अंदर ऊर्जा का स्रोत है, लेकिन इन शक्तियों से परिचित गुरु कराते हैं। महाभारत में श्रीकृष्ण, अर्जुन के गुरु की भूमिका में थे। उन्होंने अर्जुन को हर उस समय थामा,

जब वे लड़खड़ाते नजर आए। गुरु को ब्रह्मा कहा गया, क्योंकि वह शिष्य को नया जन्म देते हैं। गुरु विष्णु भी हैं, क्योंकि वे शिष्य की रक्षा करते हैं। गुरु महेश्वर भी हैं, क्योंकि वे शिष्य के दोषों का संहार करते हैं।इंसान स्वयं की शक्तियों से परिचित हो, इसके लिए गुरु की जरूरत पड़ती है।

8-हमने परमात्मा को एक व्यक्ति समझ रखा है। इसलिए हम सोचते हैं, जैसे हम व्यक्ति के संबंध में सोचते हैं। हम कहते हैं, वह बड़ा दयालु है, बड़ा कृपालु है; वह सदा कल्याण ही करता है। वास्तव में ये हमारी

आकांक्षाएं हैं जो हम उस पर थोप रहे हैं।व्यक्ति पर तो ये आकांक्षाएं थोपी जा सकती हैं; और अगर वह इनको पूरा न करे तो उसको उत्तरदायी ठहराया जा सकता है। शक्ति पर ये आकांक्षाएं नहीं थोपी जा सकतीं। और शक्ति के साथ जब भी हम व्यक्ति मानकर व्यवहार करते हैं तब हम बड़े नुकसान में पड़ते हैं; क्योंकि हम बड़े सपनों में खो जाते हैं। शक्ति के साथ शक्ति मानकर व्यवहार करेंगे तो बहुत दूसरे परिणाम होंगे।

9-उदाहरण के लिए जमीन में ग्रेविटेशन है, कशिश है, गुरुत्वाकर्षण है। आप जमीन पर चलते हैं तो उसी की वजह से चलते हैं। लेकिन वह इसलिए नहीं है कि आप चल सकें और न चलेंगे तो गुरुत्वाकर्षण नहीं रहेगा, इस भूल में मत पड़ जाना।आप जमीन पर नहीं थे , तो भी गुरुत्वाकर्षण था, एक दिन हम नहीं भी होंगे, तो भी होगा। और अगर आप गलत ढंग से चलेंगे, तो गिर पड़ेंगे, टांग भी टूट जाएगी; वह भी गुरुत्वाकर्षण के कारण ही होगा। लेकिन आप किसी अदालत में मुकदमा न चला सकेंगे, क्योंकि वहां कोई व्यक्ति नहीं है।

10-गुरुत्वाकर्षण एक शक्ति की धारा है। अगर उसके साथ व्यवहार करना है तो आपको सोच समझकर करना होगा। वह आपके साथ सोच समझकर

व्यवहार नहीं कर रही है।परमात्मा की शक्ति आपके साथ सोच -समझकर व्यवहार नहीं कर रही है उसका, उसका अपना शाश्वत नियम है। उस

शाश्वत नियम का नाम ही धर्म है।धर्म का अर्थ है, उस परमात्मा नाम की शक्ति के व्यवहार का नियम। अगर आप उसके अनुकूल करते हैं, समझपूर्वक करते हैं, विवेकपूर्वक करते हैं, तो वह शक्ति आपके लिए कृपा बन जाएगी । अगर आप उलटा करते हैं, नियम के प्रतिकूल करते हैं, तो वह शक्ति आपके लिए अकृपा बन जाएगी। परमात्मा कृपा या अकृपा नहीं है।

11-तो परमात्मा को व्यक्ति मानेंगे तो भूल होगी। परमात्मा व्यक्ति नहीं है, शक्ति है। और इसलिए परमात्मा के साथ न प्रार्थना का कोई अर्थ है, न पूजा का कोई अर्थ है; परमात्मा के साथ अपेक्षाओं का कोई भी अर्थ नहीं है। यदि चाहते हैं कि परमात्मा, वह शक्ति आपके लिए कृपा बन जाए, तो आपको जो भी करना है वह अपने साथ करना है। इसलिए साधना का अर्थ है,परन्तु केवल प्रार्थना का कोई अर्थ नहीं है। ध्यान का अर्थ है, परन्तु केवलपूजा का कोई अर्थ नहीं है।

12-इस फर्क को ठीक से समझ लें।प्रार्थना में आप परमात्मा के साथ कुछ कर रहे हैं -अपेक्षा, आग्रह, निवेदन, मांग। ध्यान में आप अपने साथ कुछ कर रहे हैं। पूजा में आप परमात्मा से कुछ कर रहे हैं; साधना में आप अपने से कुछ कर रहे हैं। साधना का अर्थ है, अपने को ऐसा बना लेना कि आप धर्म के प्रतिकूल न रह जाएं; और जब नदी की धारा बहे तो आप बीच में न पड़ जाएं। आप तट पर हों कि नदी की धारा का पानी आपकी जड़ों को मजबूत कर जाए, उखाड़ न जाए।जैसे ही हम परमात्मा को शक्ति के रूप में समझेंगे, हमारे धर्म की पूरी व्यवस्था बदल जाती है। आषाढ़ पूर्णिमा को गुरू -पूर्णिमा के रूप में मनाने का क्या राज है?-

12 FACTS;- 1-गुरु पूर्णिमा का बहुत महत्व है।गुरु शब्द दो अक्षरों से बना है 'गु' और 'रु'।ये दोनों अक्षर संस्कृत से लिए गये हैं जिसमें 'गु' का अर्थ होता है 'अंधकार' और 'रु' का अर्थ होता है जो आपके जीवन से उस अंधकार को मिटाता है उसे गुरु कहा गया है। 'गुरु है पूर्णिमा का चांद'। 'सारा धर्म एक महाकाव्य है।आषाढ़ की पूर्णमा बड़ी अर्थपूर्ण हैं। एक तो आषाढ़, पूर्णिमा में बादल घिरे होंगे, आकाश खुला न होगा, चांद की रोशनी भी पूरी नहीं पहुंचेगी। और भी प्यारी पूर्णिमाएं हैं, शरद पूर्णिमा है, तो उसको क्यों न चुन लिया गया? लेकिन चुनने वालों का कोई खयाल है, कोई इशारा है। वह यह है कि गुरु तो है पूर्णिमा जैसा और शिष्य है आषाढ़ जैसा। शरद पूर्णिमा का चांद तो सुंदर होता है, क्योंकि आकाश खाली है। वहा शिष्य है ही नहीं, गुरु अकेला है। आषाढ़ में सुंदर हो, तभी कुछ बात है, जहां गुरु बादलों जैसे शिष्यों से घिरा हो ।शिष्‍य सब तरह के जन्‍मों -जन्‍मों के अंधेरे का लेकर आए है।

2- आषाढ़ का मौसम हैं ,और वे शिष्‍य अंधेरे बादल हैं।उस अंधेरे से घिरे वातावरण में भी गुरु चांद की तरह चमक सके;उसमें भी रोशनी पैदा कर सके, तो ही गुरु है। इसलिए आषाढ़ की पूर्णिमा में गुरु की तरफ भी इशारा है और शिष्य की तरफ भी इशारा है।और स्वभावत: जहां दोनों का मिलन हो, वहीं कोई सार्थकता है। अगर तुम्हें यह काव्य -प्रतीक समझ में आ जाए , तो तुम आषाढ़ की तरह हो, अंधेरे बादल हो। न मालूम कितनी कामनाओं और वासनाओं का जल तुममें भरा है, और न मालूम कितने जन्मों-जन्मों के संस्कार लेकर तुम चल रहे हो, तुम बोझिल हो।

3-तुम्हारे अंधेरे से घिरे हृदय में रोशनी पहुंचानी है। इसलिए पूर्णिमा चांद जब पूरा हो जाता है, तब उसकी एक शीतलता है। चांद को ही हमने गुरु के लिए चुना है। सूरज को चुन सकते थे, ज्यादा तथ्यगत होता क्योंकि चांद के पास अपनी रोशनी नहीं है। हमने गुरू को सूरज ही कहा होता, तो बात ज्यादा तथ्यपूर्ण होती।इसे थोडा समझना।चांद की सब रोशनी उधार है। सूरज के पास अपनी रोशनी है। चांद पर तो सूरज की रोशनी का प्रतिफलन होता है। जैसे कि तुम दीए को आईने के पास रख दो, तो आईने में से भी रोशनी आने लगती है। वह दीए की रोशनी का प्रतिफलन है, वापस लौटती रोशनी है। चांद तो केवल दर्पण का काम करता है, रोशनी सूरज की है।

4-वास्तव में चांद शून्य है; उसके पास कोई रोशनी नहीं है और सूरज के पास प्रकाश भी महान है, विराट है। चांद के पास कोई बहुत बड़ा प्रकाश थोड़े ही है, बड़ा सीमित है; इस पृथ्वी तक आता है, और कहीं तो जाता नहीं।पर हमने है बहुत सदियों तक,सोचा और तब हमने चांद को दो कारणों से चुना है। एक,गुरु के पास भी अपनी रोशनी नहीं है, परमात्मा की है।वह केवल प्रतिफलन है।वह जो दे रहा है, अपना नहीं है; वह केवल निमित्तमात्र है, केवल दर्पण है।सूरज की तरफ सीधा देखना बहुत मुश्किल है। देखो, तो अड़चन समझ में आ जाएगी।

प्रकाश की जगह आंखें अंधकार से भर जाएंगी।

5-उसी प्रकार परमात्मा की तरफ सीधा देखना असंभव है। रोशनी बहुत ज्यादा है, तुम सम्हाल न पाओगे, असह्य हो जाएगी। तुम उसमें टूट जाओगे, खंडित हो जाओगे, विकसित न हो पाओगे।इसलिए हमने सूरज की बात छोड़ दी। वह थोड़ा ज्यादा है; शिष्य की सामर्थ्य के बिलकुल बाहर है। इसलिए हमने बीच में गुरु को लिया है।गुरु एक दर्पण है, सूरज की रोशनी पकड़ता है और तुम्हें दे देता है। लेकिन इस देने में रोशनी मधुर हो जाती है ;रोशनी की त्वरा और तीव्रता समाप्त हो जाती है। दर्पण को पार करने में रोशनी का गुणधर्म बदल जाता है।

सूरज इतना प्रखर है,और चांद इतना मधुर है!

6-इसलिए तो संत कबीर ने कहा है, गुरु गोविंद दोई खड़े, काके लागू पाय। किसके छुऊं पैर? वह घड़ी आ गई, जब दोनों सामने खड़े हैं। फिर कबीर ने गुरु के ही पैर छुए, क्योंकि बलिहारी गुरु आपकी, जो गोविंद दियो बताय।सीधे तो देखना संभव न होता। गुरु दर्पण बन गया।

जो असंभवप्राय था, उसे गुरु ने संभव किया है, जो दूर आकाश की रोशनी थी, उसे जमीन पर उतारा है। गुरु माध्यम है। इसलिए हमने चांद को चुना।गुरु के पास अपना कुछ भी नहीं है। संत कबीर कहते हैं, मेरा मुझमें कुछ नहीं। गुरु है ही वही जो शून्यवत हो गया है। अगर उसके पास कुछ है, तो वह परमात्मा का जो प्रतिफलन होगा, वह भी विकृत हो जाएगा, वह शुद्ध न होगा।

7-चांद के पास अपनी रोशनी ही नहीं है जिसको वह मिला दे, है सूरज से, देता है तुम्हें। वह सिर्फ मध्य में है, माधुर्य को जन्मा देता है।सूरज कहना ज्यादा तथ्यगत होता, लेकिन ज्यादा सार्थक न होता। इसलिए हमने चांद कहा है।फिर सूरज सदा सूरज है, घटता-बढ़ता नहीं। गुरु भी कल शिष्य था। सदा ऐसा ही नहीं था।गौतम बुद्ध जैसे बुद्ध पुरुष भी कभी उतने ही तमस,

अंधकार से भरे थे, जितने तुम भरे हो।सूरज तो सदा एक सा है।इसलिए वह प्रतीक जमता नहीं। गुरु भी कभी खोजता था, भटकता था, वैसे ही, उन्हीं रास्तों पर, जहां तुम भटकते हो, जहां तुम खोजते हो। वही भूलें गुरु ने की हैं, जो तुमने की हैं। तभी तो वह तुम्हें सहारा दे पाता है। जिसने भूलें ही न की हों, वह किसी को सहारा नहीं दे सकता। वह भूल को समझ ही नहीं सकता।

8-जो उन्हीं रास्तों से गुजरा हो; उन्हीं अंधकारपूर्ण मार्गों में भटका हो, जहां तुम भटकते हो; जिसने जीवन का सब विकृत और विकराल भी देखा हो, जिसने जीवन में शैतान से भी संबंध जोड़े हों -वही तुम्हारे भीतर की असली अवस्था को समझ सकेगा।सूरज तुम्हें नहीं समझ

सकेगा, चांद समझ सकेगा। चांद अंधेरे से गुजरा है; पंद्रह दिन, आधा जीवन तो अंधेरे में ही डूबा रहता है। चांद ने अमावस भी जानी है , सदा पूर्णिमा ही नहीं रही है। भयंकर अंधकार भी जाना है, शैतान से भी परिचित हुआ है, सदा से ही परमात्मा को नहीं जाना है। यात्री है चांद। सूरज तो यात्री नहीं है, सूरज तो वैसा का वैसा है।गुरु चांद की तरह अपूर्णता से पूर्णता की तरफ आया है; धीरे -धीरे बढ़ा है एक -एक कदम। और वह घड़ी आई, जब वह पूर्ण हो गया है।

9-गुरु तुम्हारे ही मार्ग पर है; तुमसे आगे, पर मार्ग वही है। इसलिए तुम्हारी सहायता कर सकता है। परमात्मा तुम्हारी सहायता नहीं कर सकता।तुम्हें यह सुनना थोड़ा कठिन लगेगा ।परमात्मा तुम्हारी सहायता नहीं कर सकता, क्योंकि वह उस यात्रा में कभी भटका नहीं है, जहां तुम भटक रहे हो।उसका फासला अनंत है। तुम्हारे और उसके बीच कोई भी सेतु नहीं बन सकते।गुरु और तुम्हारे बीच सेतु बन सकते हैं। कितना ही अंतर पड़ गया हो पूर्णिमा के चांद में ..कहां अमावस की रात, कहां पूर्णिमा की रात .. , फिर भी एक सेतु है। अमावस की रात भी चांद की ही रात थी, अंधेरे में डूबे चांद की रात थी। चांद तब भी था, चांद अब भी है। रूपांतरण हुए हैं, क्रांतिया हुई हैं; लेकिन एक सिलसिला है।तो गुरु तुम्हें समझ पाता है।

10-और गुरु वहीं हैं , जो तुम्हारी हर भूल को माफ कर सके। जो माफ न कर सके, समझना, उसने जीवन को ठीक से जीया ही नहीं।जो दूज का चांद ही नहीं बना, वह पूर्णिमा का

चांद कैसे बनेगा? धोखा होगा।इसलिए जो महागुरु हैं, परम गुरु हैं, वे तुम्हारी सारी भूलों को क्षमा करने को सदा तत्पर हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि स्वाभाविक है, मनुष्य मात्र भूल करेगा। उन्होंने स्वयं की हैं, इसलिए दूसरे को क्या दोष देना! क्या निंदा करनी! उनके मन में करुणा होगी।चांद तो सारी यात्रा से गुजरा है, उसके सारे अनुभव हैं ।

11-मनुष्य मात्र के जीवन में जो हो सकता है, वह उसके जीवन में हुआ है। वही गुरु है, जिसने मनुष्यता को उसके अनंत -अनंत रूपों में जी लिया है—शुभ और अशुभ, बुरे और भले, असाधु और साधु के, सुंदर और कुरूप। जिसने नरक भी जाना है, जीवन का स्वर्ग भी जाना है; जिसने दुख भी पहचाने और सुख भी पहचाने, जो सबसे प्रौढ़ हुआ है। और सबकी संचित निधि के बाद जो पूर्ण हुआ है, अथार्त चांद हुआ है।इसलिए हम गुरु को सूरज नहीं कहते, चांद कहते हैं। चांद शीतल है। रोशनी तो उसमें है, लेकिन शीतल है।

12-सूरज में रोशनी है,लेकिन प्रखर रोशनी है, छिदती है, तीर की तरह है। चांद की रोशनी फूल की वर्षा की तरह है, छूती भी नहीं और बरस जाती है।गुरु चांद है, पूर्णिमा का चांद है। और तुम कितनी ही अंधेरी रात होओ और तुम कितने ही दूर होओ, कोई अंतर नहीं पड़ता, तुम उसी यात्रा -पथ पर हो, जहां गुरु कभी रहा है।इसलिए बिना गुरु के परमात्मा को खोजना असंभव है। परमात्मा का सीधा साक्षात्कार तुम्हें जला देगा, राख कर देगा। सूरज की तरफ आंखें मत उठाना। पहले चांद से नाता बना लो। पहले चांद से राजी हो जाओ। फिर चांद ही तुम्हें सूरज की तरफ इशारा कर देगा। बलिहारी गुरु आपकी, जो गोविंद दियो बताय। इसलिए आषाढ़ पूर्णिमा गुरु-पूर्णिमा है।पर ये काव्य के प्रतीक हैं।

क्या गुरु का मार्गदर्शन अनिवार्य है ?

19 FACTS;- 1-गुरु का इतना ही अर्थ है जो स्वयं जागा हुआ है,जो खुद पार हो गया ।मार्गदर्शन अनिवार्य है, ऐसा हमें लगता है।लेकिन मार्गदर्शन सबीज हो सकता है और मार्गदर्शन निर्बीज हो सकता है। मार्गदर्शन ऐसा हो सकता है कि उससे सिर्फ तुम्हारे मन में विचार और कल्पनाएं और धारणाएं पकड़ जाएं। और मार्गदर्शन ऐसा हो सकता है कि तुम्हारे सब विचार और तुम्हारी सब धारणाएं तुमसे छिन जाएं और अलग हो जाएं। तो जो व्यक्ति कहता है, मैं मार्गदर्शन दूंगा, उससे बहुत डर है कि वह तुम्हें विचार पकड़ा दे। जो व्यक्ति कहता है, मैं कोई मार्गदर्शक नहीं हूं, उससे संभावना है कि वह तुम्हारे सब विचार छीन ले। जो कहता है, मैं तुम्हारा गुरु हूं, उसकी बहुत संभावना है कि वह तुम्हारे चित्त में बैठ जाए।

2-जो कहता है, मैं गुरु नहीं हूं;रास्ते पर हम मिल गए हैं। तुमने पूछा है कि यह रास्ता कहां जाता है? मैं जानता हूं, मैं कहता हूं कि यहां जाता है। बस इससे ज्यादा कोई संबंध नहीं है। तुम कभी लौट कर मुझे धन्यवाद भी देना, इसका भी सवाल नहीं है।बस बात यहीं खतम हो

गई है।यह निर्बीज मार्गदर्शन है।मार्गदर्शन अगर निर्बीज हो, तो वहां मार्गदर्शक नहीं होगा। और मार्गदर्शन अगर सबीज हो, तो मार्गदर्शक बड़ा प्रबल होगा। बल्कि मार्गदर्शक कहेगा कि पहले मार्गदर्शक को मानो, फिर मार्गदर्शन है ;पहले गुरु बनाओ, फिर दीक्षा है ;पहले मुझे स्वीकार करो, तब ज्ञान। लेकिन जो दूसरा निर्बीज मार्गदर्शन है ..जो सीडलेस टीचर है, वह कहेगा, पहली तो बात यह रही कि अब मैं गुरु नहीं हूं।

3-निर्बीज मार्गदर्शन कहेगा, पहले तो यह तय कर लो कि गुरु-शिष्य का संबंध न बनाओगे;तुम्हारे मन में मेरे लिए कोई जगह न होगी। तब फिर आगे बात चल सकती है। इन दोनों में फर्क पड़ेगा।तो तुम्हें कठिनाई होती है कि मार्गदर्शन तो चाहिए ही न! पर यह कह कर भी मार्गदर्शन होता है। और तब मार्गदर्शन के सब खतरे कट जाते हैं। और जो कहता है कि गुरु बिन तो ज्ञान नहीं होगा, तब मार्गदर्शन के सब खतरे पाजिटिवली मौजूद हो जाते हैं।

तो जो गुरु अपनी गुरु होने की योग्यता खो देता है ;जो अपने गुरुत्व को सबसे पहले काट डालता है, वह अपने गुरु होने की योग्यता देता है।

4-अब यह बड़ा उलटा है। लेकिन ऐसा ही है।जो आदमी अपनी श्रेष्ठता की बार-बार खबर देता है, जानना कि स्वभावतः उसका चित्त हीन है ;नहीं तो वह खबर नहीं देगा। और जो आदमी एक कोने में चुपचाप बैठ जाता है, कि पता ही नहीं चलता कि वह है भी या नहीं है, जानना कि श्रेष्ठता इतनी सुनिश्चित है कि उसकी घोषणा व्यर्थ है।जीवन की यह जो सारी कठिनाई है ;

वह इसलिए है कि यहां रोज उलटा हो जाता है।इसलिए जो आदमी कहेगा, मैं गुरु हूं, जानना

कि वह गुरु होने के योग्य नहीं। और जो आदमी कहे, गुरु-वुरु सब व्यर्थ है! कौन गुरु, क्या जरूरत! तो जानना कि इस आदमी से कुछ मिल सकता है। क्योंकि गुरुता ही इतनी गहरी है कि वह घोषणा व्यर्थ है।

5-मगर यह नहीं समझ में आता।और तब रोज कठिनाई होती चली जाती है, रोज अड़चन बढ़ती चली जाती है।हम दोहरी भूल में पड़ते हैं। जो आदमी कहता है, मैं गुरु हूं, उसे गुरु मान लेते हैं; और जो आदमी कहता है, मैं गुरु नहीं हूं, उसे हम गुरु नहीं मानते और दोहरी दिक्कतें हो जाती हैं। जो कहता है, 'मैं गुरु हूं,' उससे हम सीखने जाते हैं; जो कहता है, मैं गुरु नहीं, तो हम कहते हैं, ठीक है। वह खुद ही कह रहा है कि मैं गुरु नहीं हूं, तो बात खतम हो गई। अब सीखने को भी क्या है! ये दोहरी भूलें निरंतर होती हैं और दोनों ही भूलें हैं।जिसने

पा लिया है वह मार्गदर्शक हो सकता है।

6-लेकिन जिसने परमात्मा को पा लिया है, वह तुम्हारा मार्गदर्शक होने में भी कुछ रस लेगा, इसकी भ्रांति में मत पड़ना। उसको क्या रस हो सकता है! यानी परमात्मा को पाकर अब चार शिष्य पाने में कोई रस हो सकता है, तो फिर परमात्मा जरा कमजोर ही पाया होगा। लेकिन जिसको चार शिष्य पाने में रस है, और चार के चालीस हों तो रस है, तो जानना कि अभी और कुछ बड़ी बात नहीं मिल गई है। इसलिए यह एक बहुत बड़ा विरोधी वक्तव्य है।

7-गौतम बुद्ध जैसा व्यक्ति, जो गुरु होने के योग्य है, निरंतर कहता रहेगा कि कैसा गुरु! गुरु से बचना! क्यों कह रहा है? क्योंकि चौराहों पर लोग खड़े हैं जो गुरु होने को बहुत उत्सुक हैं। और हम भी शिष्य बनने को बहुत उत्सुक हैं। शिष्य बनने को, चलने को नहीं। मार्गदर्शन लेने को, मार्गदर्शन मानने को नहीं। तो झूठे गुरु भी उपलब्ध हैं, झूठा शिष्य भी उपलब्ध है और

उनके बीच संबंध भी बनते हैं।अगर कोई गुरु बनने को उत्सुक हो, कोई बनाने को उत्सुक हो, तो यह परावलंबन हो जाएगा। इसलिए भूलकर भी शिष्य मत बनना और भूलकर भी गुरु मत बनना, यह परावलंबन हो जाएगा। लेकिन, यदि शिष्य और गुरु बनने का कोई सवाल नहीं है, तब कोई परावलंबन नहीं है; तब जिससे आप सहायता ले रहे हैं, वह अपना ही आगे गया रूप है। जब अपना ही आगे गया रूप है तो कौन बने गुरु,और कौन बने शिष्य?

8-उदाहरण के लिए गौतम बुद्ध ने अपने पिछले जन्मों के स्मरण में एक बात कही कि मैं तब अज्ञानी था और एक बुद्ध पुरुष परमात्मा को उपलब्ध हो गए थे, तो मैं उनके दर्शन करने गया था। झुककर उन्होंने प्रणाम किया था, और वे प्रणाम करके खड़े भी नहीं हो पाए थे कि बहुत मुश्किल में पड़ गए, क्योंकि वह बुद्ध पुरुष उनके चरणों में झुके और उन्हें प्रणाम किया। तो उन्होंने कहा, आप यह क्या कर रहे हैं? मैं आपके पैर छुऊं, यह ठीक। आप मेरे पैर छूते हैं!

9-तो उन्होंने कहा था कि तू मेरे पैर छुए और मैं तेरे पैर न छुऊं तो बड़ी गलती हो जाएगी; गलती इसलिए हो जाएगी कि मैं तेरा ही दो कदम आगे गया एक रूप हूं। और जब मैं तेरे पैर में झुक रहा हूं तो तुझे याद दिला रहा हूं कि तू मेरे पैरों पर झुका, वह ठीक किया, लेकिन इस भूल में मत पड़ जाना कि तू अलग और मैं अलग, और इस भूल में मत पड़ जाना कि तू अज्ञानी और मैं जानी। घड़ी भर की बात है कि तू भी ज्ञानी हो जाएगा। यानी ऐसे ही कि जब मेरा दायां पैर आगे जाता है तो बायां पीछे छूट जाता है।वास्तव में , दायां आगे जाए, इसके लिए भी बाएं को पीछे थोड़ी देर छूटना पड़ता है।

10-गुरु और शिष्य का संबंध घातक है जबकि गुरु और शिष्य का असंबंधित रूप बड़ा सार्थक है। असंबंधित रूप का मतलब ही यह होता है कि जहां अब दो नहीं हैं। जहां दो हैं, वहीं संबंध हो सकता है। तो यह तो समझ में भी आ सकता है कि शिष्य को यह खयाल हो कि गुरु है, क्योंकि शिष्य अज्ञानी है, लेकिन जब गुरु को भी यह खयाल होता है कि गुरु है, तब फिर हद हो जाती है; तब उसका मतलब हुआ कि अंधा अंधे को मार्गदर्शन कर रहा है! और इसमें आगे जानेवाला अंधा ही ज्यादा खतरनाक है। क्योंकि वह एक दूसरे अंधे को यह भरोसा दिलवा रहा है कि बेफिकर रहो।

11-गुरु और शिष्य के संबंध का कोई आध्यात्मिक अर्थ नहीं है। असल में, इस जगत में हमारे सारे संबंध शक्ति के संबंध हैं, पॉवर पालिटिक्स के संबंध हैं। कोई पिता है,तो कोई बेटा है।अगर प्रेम का संबंध हो तो बात और होगी। तब पिता को पिता होने का पता नहीं होगा, बेटे को बेटे होने का पता नहीं होगा। तब बेटा पिता का ही बाद में आया हुआ रूप होगा, और पिता बेटे का पहले आ गया रूप होगा। स्वभावत: बात भी यही है।

एक बीज हमने बोया है और वृक्ष आया, और फिर उस वृक्ष में हजार बीज लग गए। वह पहला बीज और इन बीजों के बीच क्या संबंध है? वे पहले आ गए थे, ये पीछे आए हैं, उसी की यात्रा हैं। उसी बीज की यात्रा है जो वृक्ष के नीचे टूटकर बिखर गया है।पिता पहली कड़ी थी, यह दूसरी कड़ी है ..उसी श्रृंखला में।

12-लेकिन तब श्रृंखला है और दो व्यक्ति नहीं हैं। तब अगर बेटा अपने पिता के पैर दबा रहा है तो स्वभावत सिर्फ बीती हुई कड़ी को वह सम्मान दे रहा है, बीती हुई कड़ी की सेवा कर रहा है, जो जा रहा है उसको वह आदर दे रहा है। क्योंकि उसके बिना वह आ भी नहीं सकता था; वह उससे आया है। और अगर पिता अपने बेटे को बड़ा कर रहा है, पाल रहा है, पोस रहा है, भोजन -कपड़े की चिंता कर रहा है, तो यह किसी दूसरे की चिंता नहीं है, वह अपने ही एक रूप को सम्हाल रहा है। और अपने जाने के पहले उसे.. अगर इसे हम ऐसा कहें कि पिता अपने बेटे में फिर से जवान हो रहा है, तो कठिनाई नहीं है। तब संबंध की बात नहीं है, तब एक और बात है। तब एक प्रेम है जहां संबंध नहीं है।

13-लेकिन आमतौर से जो पिता और बेटे के बीच संबंध है, वह राजनीति का संबंध है। पिता ताकतवर है, बेटा कमजोर है;पिता बेटे को दबा रहा है; पिता बेटे को कह रहा है कि तू अभी कुछ भी नहीं, मैं सब कुछ हूं। तो उसे पता नहीं कि आज नहीं कल बेटा ताकतवर हो जाएगा,पिता कमजोर हो जाएगा; और तब बेटा उसे दबाना शुरू करेगा कि 'मैं सब कुछ हूं और तू कुछ भी नहीं है'।पति पत्नी को दबा रहा है -अपने ढंगों से, पत्नी पति को दबा रही है -अपने ढंगों से, और वे एक -दूसरे के ऊपर पूरी की पूरी ताकत और पॉवर पालिटिक्स का पूरा प्रयोग कर रहे हैं।जो ये सब संबंध हैं, विकृतियां हैं।

14-मील के पत्थरों के पास हम रुकते नहीं हैं। हालांकि मील के पत्थर, जिनको हम गुरु कहते हैं, उनसे बहुत ज्यादा बताते हैं,कि कितने मील चल चुके और कितने मील मंजिल की यात्रा बाकी है।लेकिन फिर भी मील के पत्थर की न हम पूजा करते हैं, न उसके पास बैठ जाते हैं। और अगर मील के पत्थर के पास हम बैठ जाएंगे तो हम पत्थर से बदतर सिद्ध होंगे। क्योंकि वह पत्थर सिर्फ बताने को था।लेकिन अगर पत्थर बोल सकता होता तो वह कहता, कहां जा रहे हो? मैंने तुम्हें इतना बताया और तुम मुझे छोड्कर जा रहे हो! बैठो, तुम मेरे शिष्य हो गए, क्योंकि मैंने ही तुम्हें बताया कि दस मील चल चुके और बीस मील अभी बाकी है। अब तुम्हें कहीं जाने की जरूरत नहीं है, मेरे पीछे रहो। 15-तो पत्थर बोल नहीं सकता, इसलिए गुरु नहीं बनता है; आदमी बोल सकता है, इसलिए गुरु बन जाता है, क्योंकि वह कहता है मेरे प्रति कृतज्ञ रहो, अनुगृहीत रहो, ग्रेटिटयूड प्रकट करो, मैंने तुम्हें इतना बताया। और ध्यान रहे, जो ऐसा आग्रह करता हो, अनुग्रह मांगता हो, समझना कि उसके पास बताने को कुछ भी न था, कोई सूचना थी।जैसे मील के पत्थर के पास सूचना है। उसे कुछ पता थोड़े ही है कि कितनी मंजिल है और कितनी नहीं है, सिर्फ एक सूचना उसके ऊपर खुदी है। वह उस सूचना को दोहराए चला जा रहा है। कोई भी निकलता है,वह उसी को दोहराए चला जा रहा है। 16-ऐसे ही, अनुग्रह जब तुमसे मांगा जाए तो सावधान हो जाना। और व्यक्तियों के पास नहीं रुकना है, जाना तो है उस अव्यक्त के पास, जहां कोई आकार और सीमा नहीं है। लेकिन व्यक्तियों से भी उसकी झलक मिल सकती है, क्योंकि अंततः व्यक्ति हैं तो उसी के।किसी व्यक्ति से भी उस अनंत का पता चल सकता है। लेकिन कहीं निर्भर नहीं होना है, और किसी चीज को परतंत्रता नहीं बना लेना है।लेकिन सभी तरह के संबंध परतंत्रता बनते हैं ...चाहे वह पति -पत्नी का हो, पिता-बेटे का हो या गुरु -शिष्य का हो; जहां संबंध है वहां परतंत्रता शुरू हो जाएगी।