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क्या है प्राण व अपान की क्रिया तथा द्वादशान्त ?अपान में प्राण का हवन और प्राण में अपान का हवन क्या


प्राण व अपान की क्रिया;-

05 FACTS;-

1-पातंजल योग-दर्शन में प्राणयाम की विधियां बताई गई है किंतु जिसमें कहा गया है कि आसन की सिद्धि होने पर श्वास-प्रश्वास की गति का रुक जाना ही प्राणायाम है।इस प्रकार

प्राणों का निरोध होने पर ही ईश्वरानुभूति होती है।किन्तु तंत्र की विधि सहजयोग विधि है जिससे प्राणों की गति को रोकना नहीं है बल्कि जो श्वास स्वाभाविक रूप से चल रही है उसे

देखते रहना मात्र है।इसी से प्राणों का स्पंदन रुक जाता है व साधक ध्यान में प्रवेश कर जाता है। इस ध्यान की स्थिति में ही साधक को शिवानुभूति हो जाती है।

2-शिव की शक्ति के कारण ही शरीर मे प्राण व अपान की क्रिया निरंतर चलती है किंतु प्राण के लीन होने व अपान के उदय होने के मध्य थोड़े समय के लिए यह प्राण रुकता है जिसे 'मध्य

दशा' कहते है।इसी प्रकार अपान के ह्रदय में लीन होने व प्राणों के उदय होने के मध्य यह अपान थोड़े समय रुकता है जिसे 'आंतर मध्य दशा' कहते हैं। यही वे स्थान है जहाँ शक्ति का

कोई स्पंदन नही होता।इस शांत अवस्था में ही शिव स्वरूप चेतन शक्ति का अनुभव होता है। यह मध्य दशा आरम्भ में थोड़े समय के लिए ही होती है एक क्षण के लिए किन्तु योग अभ्यास द्वारा इसे बढ़ाया जा सकता है।

3-हृदय स्थित कमलकोष से प्राण का उदय होकर नासिका-मार्ग से निकलकर बारह उंगुल चलकर अंत में आकाश में बिलीन हो जाता है।प्राण की बाह्य गति को रेचक' कहा जाता है तथा इस बाह्य आकाश से 'अपान' का उदय होता है तथा नासिका-मार्ग से चलकर यह हृदय स्थित कमल कोष में विलीन हो जाता है।अपान की इस स्वाभाविक आंतर गति को 'पूरक' कहा जाता है।सिर की शिखा के पास ही द्वादशान्त कहा गया है ।

4-जब द्वादशान्त में तथा अपान वायु हृदय में क्षण भर के लिए रुक जाती है उसे योग शास्त्र में 'कुम्भक' कहा जाता है। यह कुम्भक अवस्था दो तरह की होती है--1- बाह्य कुम्भक 2- आंतर कुम्भक ।जब यह श्वास चलते-चलते मध्य में ही किसी कारण से रुक जाती है तो उसे मध्य कुम्भक कहते हैं। यह मध्य दशा इतनी बढ़ जाती है कि वायु रूप यह प्राणात्मक और अपानात्मक शक्ति द्वादशांत से हृदय तक वापस लौटती है।इन सभी रेचक कुम्भक तथा पूरक अवस्थाओं का निरंतर ध्यानपर्वक निरीक्षण करते रहने से योगी जीवन-मृत्यु से मुक्त हो जाता है।

5-इस अवस्था मे पहुँचा योगी बाह्य पदार्थ तथा आंतरिक भावों को ध्यान रूपी अग्नि में भस्म कर देता है। वह अपने समस्त इन्द्रिय समहू को अपने स्वरूप में विस्तीर्ण कर देता है।यह उसकी निर्विकल्प अवस्था है ;जिसमें प्रवेश करने पर साधक स्वयम शिवस्वरूप हो जाता है।

अर्थात अपने वास्तविक स्वरूप आत्मा का उसे ज्ञान हो जाता है। इस समय प्राण और अपान का स्पंदन बहुत कम हो जाता है।यही समाधि है।

क्या है ''द्वादशान्त ”?-

05 FACTS;-

1-तालू के पास जो मूर्धा स्थान है वहाँ से चार अंगुल ऊपर उर्ध्व भाग में प्रकृति तत्व का स्थान है , उसके षोडश अंगुल ऊपर अव्यक्त तत्व का स्थान है । इसके एकदश अंगुल उपर माया तत्व का स्थान होता है , इसी के द्वादश अंगुल की जगह शब्दब्रम्ह का स्थान है । इसी शब्द

ब्रम्ह को” द्वादशान्त ” कहा जाता हैं ।इस वर्णन को देखकर आप अगर तालु से अंगुली लगाने की कोशिश करेंगे तो नही होगा, सिर के ऊपर तक शिखा के पास ही द्वादशान्त कहा

गया है ।

2-प्राण हृदय देश से उद्भूत होकर कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य, ललाट आदि स्थानों में होता हुआ द्वादशान्त(ब्रह्मरन्ध) से ऊपर) शाक्तप्रदेश में जाकर अस्त होता है l हृदय व्योम से द्वादशान्त व्योम पर्यन्त जो प्राणचार है वह प्रत्येक जन्तु का अपने अंगुल से छत्तीस अंगुल का माना है l हृदय से द्वादशान्त पर्यन्त ''प्राण प्रवाह'' की संज्ञा दिन है और द्वादशान्त से अपान रूप में प्राण का अवरोह ही रात्रि है l

3-इस प्रकार 'प्राण 'सूर्य है और 'अपान' चन्द्र l वस्तुतः काल दो प्रकार का है - प्रथम सौर और दूसरा आध्यात्मिक अथवा प्राणीय l यहां भी दिवस में चार और रात्रि में चार प्रहर होते हैं l इस प्रकार आठ प्रहर होते है l हृदय से कण्ठ के निचले भाग पर्यन्त नौ अंगुल का प्रवाहकाल दिन का प्रथम प्रहर है lकण्ठ से तालु के मध्य तक का 9अंगुल तक प्रवाहकाल द्वितीय प्रहर है ;इस स्थान पर किया गया होम जप और ध्यान मोक्षप्रद होता है lतालु के मध्य से ललाट तक 9अंगुल तक तृतीय प्रहर और ललाट से 9 अंगुल ऊपर द्वादशान्त तक चतुर्थ प्रहर होता है।इस प्रकार हृदय से लेकर द्वादशान्त तक 36 अंगुल का प्राणचार चार प्रहर वाला आध्यात्मिक दिन और उसके विपरीत क्रम से द्वादशान्त से लेकर हृदय तक का प्राणीय आभ्यन्तर संचार चार प्रहर की रात्रि होती है।

4- जब प्राण सूर्य अस्त होता है ;तब सूर्यास्त और अपान रूप चन्द्रोदय के बीच आधी सायं सन्ध्या मानी जाती है lशक्ति और शक्तिमान के संघट्ट के कारण ही इसे सन्ध्या कहा जाता है l यहां प्राण विलम्बित होकर अपान होकर हृदय पर्यन्त अवरोह करता है lअपान रूप रात्रि के भी वैसे ही चार प्रहर होते हैं l जिस समय चन्द्र हृदयकमल में आता है तभी प्रभात होता है l

हृदय से लेकर ऊर्ध्व ” द्वादशान्त ” के इस स्थान तक श्वास प्राण का प्रवाह माना जाता है। ''द्वादशान्त ” के पास प्राण प्रवाह समाप्त होता है ।इसमें हृदय से लेकर कण्ठ तक का 9अंगुल का प्रवाहकाल प्रथम प्रहर, द्वादशान्त को गुरु स्थान कहा गया है ।

5-द्वादशान्त , दो प्रकार के होते हैं , शिव द्वादशान्त और शक्ति द्वादशान्त।प्राण -अपान की गति जहाँ शुरू होती है जहाँ रुकती है ,उसे हृदय और द्वादशान्त कहते हैं ।बाह्य श्वास को शिव द्वादशान्त और आंतर श्वास को शक्ति द्वादशान्त भी कहते हैं ।सभी नाड़ियों की अंतिम अग्र भाग की स्थिति को भी द्वादशान्त कहते हैं। शरीर के रोम रोम में द्वादशान्त स्थिती मानी गई है ।प्राण हृदयदेश से उद्भूत होकर कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य, ललाट आदि स्थानों में होता हुआ द्वादशान्त(ब्रह्मरन्ध| से ऊपर) शाक्तप्रदेश में जाकर अस्त होता है ।

क्या है द्वादशान्त में द्वादश आधार?-

04 FACTS;-

1-द्वादशान्त में द्वादश आधार के अन्तर्गर्भ में जाए तो तँत्र शास्त्र में ऋ ऋ ल्र् ल्र् ऐसे चार स्वर आते है , जिन्हें नपुसंक बीज कहते हैं । मुख्य 16 सोलह स्वरों में इन चारों को निकाल दे तो 12 स्वर रह जाते हैं ।इन बारह स्वरों की शरीर के इन 12 स्थानों पर कल्पना करनी चाहिए…

1-1-गुदाधार/जन्मग्र ,

1-2-मूलाधार ,

1-3-कन्द ,

1-4-नाभि ,

1-5-हृदय ,

1-6-कंठ ,

1-7-तालु ,

1-8-भ्रूमध्य ,

1-9-ललाट ,

1-10-ब्रम्हरन्ध,

11-1-शक्ती ,

1-12-व्यापिनी

2-इसमे , जन्मग्र से द्वादशान्त ओर हृदय से द्वादशान्त ऐसे दो प्रकार की प्राणशक्ति का वहन कहा जाता है ।ऊपरी 12 स्थान ही यह 12 चक्र है ।ब्रम्हरन्ध से ऊपर द्वादशान्त की स्थिति कही गई है । ललाट के ऊपर क्रमश: ...

2-1- बिंदु – 2-2-अर्धचंद्र – 2-3-रोधिनी – 2-4-नाद – 2-5-नादन्त – 2-6-शक्ति – 2-7-व्यापिनी – 2-8-समना – 2-9-उन्मना ….. 3-ऐसे क्रम कहा गया है जो चित्र में दिया गया है।द्वादशान्त की स्थिति समझने से पहले उसके 12 स्थान समझने आवश्यक है , क्योंकि इन्ही बारह स्थानों से श्वास चलता है । द्वादशान्त इसमें अंतिम स्थान है ।प्रणव/ ओंकार का बोध कराने के लिए उसका विश्लेषण आवश्यक है। ओंकार के अवयवों का नाम है–अ, उ, म, बिन्दु, अर्धचंद्र रोधिनी, नाद, नादांत, शक्ति, व्यापिनी या महाशून्य, समना तथा उन्मना।बिन्दु अर्धमात्रा है। उसके अनंतर प्रत्येक स्तर में मात्राओं का विभाग है।

4-समना भूमि में जाने के बाद मात्राएँ इतनी सूक्ष्म हो जाती हैं कि किसी योगी अथवा योगीश्वरों के लिए उसके आगे बढ़ना संभव नहीं होता, अर्थात् वहाँ की मात्रा वास्तव में अविभाज्य हो जाती है। इसी स्थान में मात्राओं को समर्पित कर अमात्र भूमि में प्रवेश करना चाहिए।बिन्दु मन का ही रूप है। मात्राविभाग के साथ-साथ मन अधिकाधिक सूक्ष्म होता जाता है।अमात्र भूमि में मन, काल, कलना, देवता और प्रपंच, ये कुछ भी नहीं रहते। इसी को उन्मनी स्थिति कहते हैं। वहाँ स्वयंप्रकाश ब्रह्म निरंतर प्रकाशमान रहता है।-तंत्र शास्त्र में इस प्रकार का मात्राविभाग नौ नादों की सूक्ष्म योगभूमियां के नाम से प्रसिद्ध है।

अपान में प्राण का हवन और प्राण में अपान का हवन क्या है?-

09 FACTS;-

1-बहुत से योगी अपान वायु में प्राणवायु को हवन करते हैं और उसी प्रकार प्राणवायु में अपान वायु को हवन करते हैं इससे सूक्ष्म अवस्था हो जाने पर अन्य योगीजन प्राण और अपान दोनों की गति रोककर प्राणायाम परायण हो जाते हैं।जिसे श्रीकृष्ण प्राण -अपान कहते हैं,उसी को

महात्मा बुद्ध ‘अनापान’ कहते हैं। इसी को उन्होंने श्वास -प्रश्वास भी कहा है। प्राण वह श्वास है जिसे आप भीतर खींचते हैं अपान वह श्वास है जिसे आप बाहर छोड़ते हैं। योगियोँ की अनुभूति है कि आप श्वास के साथ बाह्य वायुमंडल के संकल्प भी ग्रहण करते हैं और प्रश्वास में इसी प्रकार आंतरिक भले – बुरे चिंतन की लहर फेंकते रहते हैं।

2-बाह्य किसी संकल्प का ग्रहण न करना प्राण का हवन है तथा भीतर संकल्पों को न उठने देना अपान का हवन है। न भीतर से किसी संकल्प का स्फुरण हो और न ही बाह्य दुनिया में चलनेवाले चिंतन अंदर क्षोभ उत्पन्न कर पायेँ, इस प्रकार प्राण और अपान दोनों की गति सम हो जाने पर प्राणों का याम अर्थात् निरोध हो जाता है, यही प्राणायाम है। यह मन की विजितावस्था है। प्राणों का रुकना और मन का रुकना एक ही बात है।

3-जो हमारे भीतर है, वह भी बाहर का हिस्सा है। अभी हमारे भीतर एक श्वास है। थोड़ी देर पहले आपके पास थी, आपकी थी। और थोड़ी देर पहले किसी वृक्ष के पास थी, वृक्ष की थी। और थोड़ी देर पहले कहीं और थीऔर अभी हमारे भीतर है। जो हमारे भीतर है, उसको

अगर हम बाहर के प्राण-जगत में समर्पित कर दें, तो भीतर कुछ बच नहीं रह जाता। सब शून्य हो जाता है। यह भी एक समर्पणहै।

4-भीतर की श्वास को, वह जो बाहर वायुमंडल में ;विराट प्राण का जाल फैला है , उसमें समर्पित कर दें, होम दे दें, चढ़ा दें। या इससे उलटा भी कर सकते हैं। वह जो बाहर का सारा प्राण-जगत है, वह भी तो हमारे भीतर का ही हिस्सा है बाहर फैला हुआ। अगर हम उस बाहर के प्राण-जगत को इस भीतर के प्राण-जगत को समर्पित कर दें, तो भी एक ही घटना घट जाती है। बूंद सागर में गिर जाए,या कि सागर बूंद में गिर जाए।

5-लेकिन बूंद का सागर में गिरना तो हमारी समझ में आता है, क्योंकि हमने सागर में बूंद को गिरते देखा है। सागर का बूंद में गिरना हमारी समझ में नहीं आता। लेकिन जब एक बूंद सागर

में गिरती है,तो यह बिलकुल रिलेटिव /सापेक्ष बात है। आप चाहें तो कह सकते हैं कि बूंद सागर में गिरी; और आप चाहें तो कह सकते हैं कि सागर बूंद में गिरा।ऐसा कहना तो

अजीब-सा लगेगा ; लेकिन दोनों बातें कही जा सकती हैं। तो या तो हम भीतर के

प्राण को बहिप्र्राण पर समर्पित कर दें, बूंद को सागर में गिरा दें। या हम सागर को बूंद में गिरा लें, या हम बाहर के समस्त प्राण को भीतर गिरा लें। दोनों ही तरह हवन पूरा हो जाता है। दोनों ही तरह यज्ञ पूरा हो जाता है।

6- गौतम बुद्ध केअनुसार श्वास को देखना ध्यान और चैतन्य की और ले जाने का मार्ग है।हर स्वास्थ्य चिकित्सा का दृष्टिकोण श्वास को केंद्र स्तर पर रखता है। उनके विचार में, यदि शरीर की रसायन प्रक्रिया में गड़बड़ है, तो श्वास प्राकृतिक नहीं हो सकती, और यदि श्वास प्राकृतिक है, तो शारीरिक रसायन ठीक रहेगा।प्राकृतिक श्वास ध्यान का सार है।निश्चित रूप से रासायनिक चिकित्सा के विपरीत, श्वास चिकित्सा सरल है और इसे बहुत ही सस्ते में उपलब्ध कराया जा सकता है।तो इस प्रकार यदि इन हानिकारक श्वास लेने की आदतों से छुटकारा पाया जा सके, तोपरिणाम उपचारात्मक होगें।

7-हमारा शरीर acid-base balance (अम्ल पर आधारित संतुलन) के बारे में बहुत निश्चित होता है, जिसे pH level (पी एच स्तर) कहा जाता है। यह pH में बदलाव के बजाय सेरेब्रल एनोक्सिया (मस्तिष्क में ऑक्सीजन की कमी) को भी सहन कर लेगा। इसका अर्थ है कि शरीर इसके बारे में गंभीर है।शोध ने दर्शाया है कि हम जितना अधिक तनावग्रस्त होते हैं, उतना ही हम श्वास लेते हैं, उतना अधिक एसिड हम खो देते हैं, और उतना अधिक

क्षार हम निकालते हैं।संक्षिप्त में , लंबे समय तक होने वाली क्षार की हानि शरीर के क्षारीय भंडार को घटा देती है, जो हमारे शारीरिक व्यायाम करने पर रीसाइकिल होने के लिए बफर और संग्रहीत होता है।जिससे थोड़े से ही व्यायाम से हमारे पैर दुखने लगते है और श्वास लेने में जोर लगाना पड़ता हैअथार्त हम थका हुआ महसूस करते हैं।

8-जैसा की अक्सर बताया जाता है कि दिल के दौरे के रोगी को “अचानक से” कोई रहस्यमय "दिल का दौरा" नहीं पड़ता है। असल में वह क्रोनिक (काफी समय से) रूप से तनावग्रस्त है, वह क्रोनिकली ज्यादा-सांस लेता है, काफी समय से वह अपने क्षारीय बफर को घटा रहा है,और बहुत जल्दी से थक जाता है। उसकी याददाश्त पीड़ित है, उनकी एकाग्रता कम हो गई है, उसकी ऊर्जा बहुत क्षीण है... लेकिन वह फिर भी वह किसी तरह से चल रहा है, अंत में केवल तब ही रुकता है जब उसका दिल हड़ताल पर चला जाता है या जाने की धमकी दे देता है।यदि विश्राम उपचार में एक

आवश्यक अंश है, तो विश्राम की कमी खराब स्वास्थ्य का एक अनिवार्य अंश होगी। या इसे यूं कहें की, थकान लगभग निश्चित रूप से सभी बीमारियों के पूर्व में आती है।

9-सांस लेने की खराब आदतों के चलते आपके शरीर को उसकी जरुरत के हिसाब से पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन नहीं मिल पाता है, जो आगे चलकर नुकसान की वजह बनता है। आपको अपनी भावनाओं को बेहतर ढंग से नियंत्रित करने के लिए ठीक से सांस लेने का तरीका सीखना होगा।आखिरकार, ठीक से सांस लेने का मतलब अच्छी तरह से जीना है।श्वास के प्रति जागरूकता ध्यान के आवश्यक तत्वों में से एक है, जो उन मार्गों में से एक हो सकता है जो ध्यान को स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद बनाता है। यदि हम ध्यान को "विश्रांत रहना" कहें तो चक्र पूरा हो जाता है है।

...SHIVOHAM....