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क्या शक्ति न ही शुभ है और न ही अशुभ?

क्या शक्ति का शुभ उपयोग हो सकता है और अशुभ उपयोग भी ?-

19 FACTS;-

1-शक्ति जब जागती है तो चाहे उसे कुंडलिनी कहें या त्रिनेत्र ...उसकी अग्नि में मनष्य के सभी मैल, सभी कलुष जल जाते हैं, और वह शुद्ध और पवित्र हो जाता है!इस संबंध में कुछ बातें महत्वपूर्ण हैं।एक, शक्ति स्वयं में निष्पक्ष और निरपेक्ष है। शक्ति न तो शुभ है और न अशुभ। उसका शुभ उपयोग हो सकता है; अशुभ उपयोग हो सकता है।दीए से अंधेरे में रोशनी भी हो सकती है, और किसी के घर में आग भी लगाई जा सकती है। जहर से हम किसी के प्राण भी ले सकते हैं, और किसी मरणासन्न व्यक्ति के लिए जहर औषधि भी बन सकता है।शक्ति सभी भौतिक या अभौतिक ..निष्पक्ष और निरपेक्ष है। हम क्या उपयोग करते हैं, इस पर परिणाम निर्भर होंगे।शुद्ध अंतःकरण न हुआ हो, तो भी शक्ति उपलब्ध हो सकती है। क्योंकि शक्ति की कोई शर्त भी नहीं कि शुद्ध अंतःकरण हो, तो ही उपलब्ध होगी। अशुद्ध अंतःकरण को भी उपलब्ध हो सकती है और अक्सर तो ऐसा होता है कि अशुद्ध अंतःकरण शक्ति को पहले उपलब्ध कर लेता है। क्योंकि शक्ति की आकांक्षा भी अशुद्धि की ही आकांक्षा है।

2-शुद्ध अंतःकरण शक्ति की आकांक्षा नहीं , शांति की आकांक्षा करता है। अशुद्ध अंतःकरण शक्ति की आकांक्षा करता है, शांति की नहीं। शुद्ध अंतःकरण को शक्ति मिलती है ..वह परमात्मा की कृपा है।वह उसने न मांगा है , न चाहा है और न ही खोजा है। वह उसे सहज मिला है।अशुद्ध अंतःकरण को शक्ति मिलती है, वह उसकी वासना की मांग है। वह परमात्मा की कृपा नहीं है। वह उसने चाहा है, यत्न किया है, और उसे पा लिया है। शक्ति की चाह ही हमारे भीतर इसलिए पैदा होती है कि हम कुछ करना चाहते हैं और शक्ति के बिना न कर सकेंगे।शुद्ध अंतःकरण कुछ करना नहीं चाहता। शक्ति की कोई जरूरत भी नहीं है। अशुद्ध अंतःकरण बहुत कुछ करना चाहता है। वासनाओं की पूर्ति करनी है; महत्वाकांक्षाएं भरनी हैं; मन की पागल दौड़ है, उस दौड़ के लिए सहारा चाहिए ,ईंधन चाहिए ..तो शक्ति की मांग होती है।और शक्ति न तो शुद्धि से मिलती है,और न ही अशुद्धि से। शक्ति मिलती है यत्न, प्रयत्न और साधना से।

3-अगर कोई व्यक्ति अपने चित्त को एकाग्र करे, तो शुभ विचार पर भी एकाग्र कर सकता है, अशुभ विचार पर भी।इस संबंध में महावीर स्वामी की गहरी अंतर्दृष्टि ने ध्यान के दो रूप कर दिए हैं। एक को वे धर्म ध्यान कहते हैं और दूसरे को अधर्म ध्यान।यह भेद बड़ा कीमती है। हमें तो लगेगा कि सभी ध्यान धार्मिक होते हैं ।तो ध्यान अपने आप में धार्मिक नहीं है। शुद्ध अंतःकरण के साथ जुड़े तो ही धार्मिक है, अशुद्ध अंतःकरण के साथ जुड़े तो अधार्मिक है।धार्मिक ध्यान का तो अनुभव शायद न हुआ हो, लेकिन अधार्मिक ध्यान का आपको भी अनुभव हुआ है।जब आप क्रोध में होते हैं, तो चित्त एकाग्र हो जाता है परन्तु परमात्मा की मूर्ति पर ध्यान को लगाएं, तो बडी मेहनत करनी पड़ती है।ध्यान का तो मतलब है, मन का ठहर जाना। वह कहां ठहरता है, यह सवाल नहीं है।जब आप क्रोध में होते हैं, तब मन ठहर जाता है..यह भी ध्यान तो है ही।इसे महावीर अधर्म ध्यान कहते हैं।

4-क्रोध में मन एकाग्र हो जाता है, शक्ति उपलब्ध होती है।आपको अनुभव होगा कि क्रोध में आपकी शक्ति बढ़ जाती है। साधारणत: हो सकता है आपमें इतनी शक्ति न हो, लेकिन जब क्रोध में आप होते हैं, तो अनंत गुना शक्ति हो जाती है। क्रोध की अवस्था में लोगों ने ऐसे पत्थरों को हटा दिया है, जिनको सामान्य अवस्था में वे हिला भी नहीं सकते।उन्होंने अपने से दुगुने ताकतवर व्यक्तियों को लोगों ने पछाड़ दिया है, जिनको साधारण अवस्था में वे देखकर ही भाग खड़े होते।एकाग्रता शक्ति है। कहां एकाग्र कर रहे हैं, यह बात एकाग्रता के लिए आवश्यक नहीं है कि वह शुभ हो या अशुभ हो।लेकिन हृदय अशुद्ध है, तो उस एकाग्रता का अंतिम परिणाम अशुभ होता है ;तो वही शक्ति शोषण भी बन सकती है।हमें यह समझने में कठिनाई होती है कि अशुद्ध हृदय एकाग्र कैसे हो सकता है।वास्तव में, एकाग्रता तो मन को एक जगह रोकने की कला है। इसलिए अगर दुनिया में बुरे लोगों के पास भी शक्ति होती है, तो उसका कारण यही है कि उनके पास भी एकाग्रता होती है।

5-उदाहरण के लिए हिटलर के पास बड़ी एकाग्रता है।हिटलर ने जो भी कहा, वह जर्मन जैसी बुद्धिमान जाति ने स्वीकार कर लिया। उसकी आंखों में जादू था। उस