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क्या अष्टांग योग इनर डिसिप्लिन है?क्या श्वास की गति मनोदशा से बंधी है?

क्या अष्टांग योग इनर डिसिप्लिन है?

16 FACTS;-

1-योग की अपनी साधना प्रक्रिया है।पतंजलि ने अष्टांग योग,योग के आठ अंग कहे हैं, आठ चरण, आठ हिस्से, जिनसे मिलकर योग बनता है, जिनसे योग पूरा होता है। यदि योग एक शरीर है, तो आठ उसके अंग हैं।

योग का अर्थ है, व्यक्ति जैसा है, वह बहुत ढीला-ढाला है सब कुछ भरा है;

उल्टा-सीधा सब भरा है।साधारण व्यक्ति जैसा है, वह एक कास्मास नहीं है; उसके भीतर कोई संगीत नहीं है; उसके भीतर कोई हार्मनी, कोई लयबद्धता .कोई क्रिस्टलाइजेशन नहीं है।उसके भीतर बहुत-सी शक्तियां हैं–आपस में विरोधी, एक-दूसरे से लड़ती, ढीली, अस्तव्यस्त।

2-उदाहरण के लिए हजार आदमी हैं बाजार में, लेकिन बाजार के पास कोई क्रिस्टलाइज्ड इंडिविजुअलिटी नहीं है; बाजार के पास कोई व्यक्तित्व नहीं है, जिसमें एकस्वरता हो। फिर हजार आदमी मिलिट्री के जवान हैं। वे भी हजार हैं, लेकिन उनके पास एक व्यक्तित्व है। हजार आदमी के साथ पंक्तिबद्ध व्यक्तित्व है। एक से चलते हुए कदम हैं। एक आवाज, एक आज्ञा पर सारे प्राण आंदोलित होते हैं। एकस्वरता है।

3-तो बाजार में तो क्रिस्टलाइजेशन नहीं है, मिलिट्री के हजार लोगों में एक क्रिस्टलाइजेशन है। वे इकट्ठे हैं, एक आर्गेनिक यूनिटी है। एक शरीर की भांति हैं वे। बाजार भीड़ है, एक शरीर नहीं।हमारा व्यक्तित्व बाजार की

भांति है। हजार चीजें हैं उसमें, हजार हित हैं। एक हिस्सा बाएं जाता है, दूसरा दाएं जाता है। एक ऊपर जाता है, तीसरा नीचे जाता है। एक कहता है, मत करो; एक कहता है, करो। तीसरा हिस्सा सोया रहता है; इस फिक्र में ही नहीं पड़ता कि करना है, कि नहीं करना है। ऐसे हजार हिस्से हैं हमारे भीतर।

4-हम एक ऐसे मकान हैं, जिसका मालिक सोया हुआ है और जिसमें हजार नौकर हैं। और हर नौकर अपने को मालिक समझने लगा है, क्योंकि

मालिक सोया ही रहता है। तो आम आदमी की हालत एक मकान की तरह है। असली मालिक सोया हुआ है।इंद्रियों में .वृत्तियों में जो ऊपर होता है, जो ऊपर होता है, वह कहता है, आई एम दि मास्टर।जब आप क्रोध में होते हैं, तो आपको पता है, क्रोध कहता है, मैं हूं मालिक। जब आप प्रेम में होते हैं, तो प्रेम कहता है, मैं हूं मालिक।

5-नौकर–इंद्रियां, वृत्तियां, वासनाएं मालिक हो जाती हैं। जो जब मौका पा जाता है, हमारी छाती पर बैठ जाता है। जब लोभ हमारे ऊपर बैठता है, तो ऐसा लगता है, लोभ ही हमारी आत्मा है। जब क्रोध हम पर सवार होता है, तो ऐसा लगता है कि क्रोध ही मैं हूं। जब प्रेम हम पर सवार होता है, तो लगता है, बस प्रेम ही सब कुछ है। जो हमें पकड़ लेता है भूत-प्रेत की भांति, जो वृत्ति हम पर हावी हो जाती है, बस हम उसके हाथ के खिलौने हो जाते हैं। असली मालिक का कोई भी पता नहीं है।

6-योग का अर्थ है, असली मालिक का जग आना; नौकरों के बीच मालिक को सिंहासन-आरूढ़ करना।योग शब्द का अर्थ है, इंटीग्रेशन/जोड़। व्यक्ति जुड़ा हुआ हो; खंड-खंड नहीं, अखंड; एक हो। और जब कभी व्यक्ति एक होता है, तो सब नौकर तत्काल सिर झुकाकर मालिक के सामने खड़े हो जाते हैं। फिर कोई नौकर नहीं कहता कि मैं मालिक हूं।योगस्थ चेतना

तत्काल समस्त इंद्रियों की मालिक हो जाती है। फिर इंद्रियां नौकर की तरह पीछे चलती हैं। छाया की तरह। मालकियत उनकी खो जाती है।

तो श्रीकृष्ण कहते हैं कि योग यज्ञ भी है अर्जुन! यह चेतना कैसे जगे! यह सोया हुआ मालिक कैसे उठे! यह आदमी क्रिस्टलाइज्ड कैसे हो, एक कैसे

हो, इकट्ठा कैसे हो!तो योग की हजारों प्रक्रियाएं हैं, जिनके द्वारा सोए हुए मालिक को उठाया जाता है।

7-योग का अर्थ है, भीतर जो सोया है, उस पर चोट करनी है, उसे उठाने के लिए चोट करनी है। हजार रास्ते हैं उस पर चोट करने के। हठयोग के अपने रास्ते हैं, राजयोग के अपने रास्ते हैं, मंत्रयोग के अपने रास्ते हैं, तंत्र के अपने रास्ते हैं। हजार-हजार विधियां हैं, जिन विधियों से उस सोई हुई चेतना में जो भीतर केंद्र पर प्रसुप्त है, उसे जगाने की कोशिश की जाती है।

जैसे कोई आदमी सोया हो, उसे जगाने के बहुत रास्ते हो सकते हैं। कोई उसका नाम लेकर जोर से पुकार सकता है; तो उठ आए।

8-कोई उसका नाम लेकर न पुकारे, सिर्फ चिल्लाए कि मकान में आग लग गई है, और वह आदमी उठ आए। कोई मकान में आग लगने की बात भी न करे, सिर्फ संगीत बजाए, और वह आदमी उठ आए। कोई संगीत भी न बजाए, सिर्फ तेज रोशनी उसकी बंद आंखों पर डाले, और वह आदमी उठ आए। ऐसे योग के हजार रास्ते हैं, जिनसे भीतर सोई हुई कांशसनेस को, चेतना को चोट की जाती है। और उस चोट से वह जग आता है।

9-उदाहरण के लिए जैसे ओम शब्द से हम परिचित हैं। वह भीतर सोए हुए आदमी को जगाने के लिए मंत्रयोग की विधि है। अगर कोई व्यक्ति जोर से ओम का नाद करे भीतर, तो उसकी नाभि के पास जोर से चोट होने लगती है। नाभि जीवन-ऊर्जा का केंद्र है। नाभि से ही बच्चा मां से जुड़ा होता है। नाभि के द्वारा ही मां से जीवन पाता है। फिर नाभि कटती है अलग, तो बच्चा अलग होता है। नया जीवन शुरू होता है।कभी

आपने खयाल किया हो, अगर एकदम से एक्सिडेंट होने की हालत हो जाए, तो सबसे पहले चोट नाभि पर पड़ती है।

10-साइकिल पर चले जा रहे हैं; एकदम से कोई सामने आ गया, ब्रेक मारा। तो आपके शरीर में जो चोट पड़ेगी, वह नाभि पर पड़ेगी। एकदम से नाभि पर चोट पड़ जाएगी।खतरे की हालत में जीवन-ऊर्जा को जगने का

मौका आ जाता है।ओम ऐसी ध्वनि है, जिसके माध्यम से भीतर से नाभि पर चोट की जाती है। आप ओम की गूंज करें भीतर, तो नाभि पर चोट पड़ने लगती है। हलकी-हलकी पड़ती है पहले, फिर तेज होती जाती है। फिर और तेज होती जाती है। फिर ओंकार का शब्द जाकर नाभि पर हथौड़े की तरह पड़ने लगता है, और वह सोई हुई जो चेतना है, उसे जगाता है।

11-अब यह बड़े आश्चर्य की बात है। ओम में अ, उ और म हैं। म आप जोर से कहें, तो नाभि पर फौरन कंपन होगा। इस्लाम के पास शब्द है, अल्लाह। सूफी फकीर ओम की तरह अल्लाह शब्द का प्रयोग करते हैं। अल्लाह, तो ह की चोट वहीं पड़ती है, जहां म की पड़ती है। अल्लाहू, तो हू की चोट ठीक वहीं पड़ती है नाभि पर, जहां ओम की पड़ती है। अब अल्लाह और ओम बिलकुल अलग-अलग शब्द हैं। लेकिन प्रयोजन एक है, और परिणाम एक है। अर्थ भी एक है। सूफी फकीर अल्लाह से शुरू करता है। अल्लाह, फिर लाह, फिर लाहू। और फिर हू ही रह जाता है। और हू की चोट नाभि पर पड़ती है। और नाभि पर सोया हुआ मालिक जगना शुरू होता है।

12-हजार विधियों से योग सोए हुए मालिक को जगाता है। और उस सोए हुए मालिक के जगते ही व्यक्तित्व में इंटीग्रेशन, योग पैदा हो जाता है। खंड इकट्ठे हो जाते हैं। बाजार समाप्त हो जाता है। पंक्तिबद्ध सैनिक खड़े हो जाते हैं। फिर व्यक्तित्व आज्ञा मानता है। बाजार की भीड़ में कोई आज्ञा नहीं मानता। मानने का कोई सवाल भी नहीं है। न कोई आज्ञा देने वाला

होता है, न कोई मानने वाला होता है।योगस्थ व्यक्ति अंतर-अनुशासन /इनर डिसिप्लिन से भर जाता है। एक भीतरी अनुशासन पैदा हो जाता है। फिर वह जो करना चाहता है, वही करता है। जो नहीं करना चाहता है, नहीं करता है। और जैसे ही भीतर का व्यक्ति जागा तो उनसे भी वही परिणाम होता है।

13-इस परिणाम को योग के मार्ग से लाने की बहुत अनंत विधियां हैं। और एक-एक व्यक्ति को देखकर कि उसके लिए कौन-सी विधि सार्थक होगी,

प्रयोग किया जाता है। सब व्यक्तियों का नाद-बोध अलग है। आप रास्ते से गुजरें, जिसका नाद-बोध तीव्र है, उसे छोटे-से पक्षी की चहचहाहट भी सुनाई पड़ती है। आपका नाद-बोध तीव्र नहीं है, तो आपको कभी नहीं सुनाई पड़ती कि पक्षी भी चहचहा रहे हैं।

14-जिसका नाद-बोध तीव्र है, उसे मंत्रयोग से जगाने की कोशिश की जाती है। जिसका दृष्टि-बोध तीव्र है, उसके लिए त्राटक, एकाग्रता के अनंत-अनंत प्रयोग हैं, उनसे जगाने की कोशिश की जाती है। यह व्यक्ति पर निर्भर करेगा कि उसका बोध कौन-सा सर्वाधिक तीव्र है। उसके तीव्र बोध के ही मार्ग से उसे गहरे ले जाया जा सकता है। जिनका रंग-बोध तीव्र है, उन्हें रंग के द्वारा भी मार्ग मिल सकता है। लेकिन यह व्यक्ति पर निर्भर करेगा।

श्रीकृष्ण कहते हैं, अर्जुन, योग-यज्ञ के द्वारा भी व्यक्ति परमसत्ता को उपलब्ध हो जाता है।

15-और दूसरे योगीजन अपान वायु में प्राण वायु को हवन करते हैं, वैसे ही अन्य योगीजन प्राणवायु में अपान वायु को हवन करते हैं तथा अन्य योगीजन प्राण और अपान की गति को रोककर प्राणायाम के परायण होते

हैं।मनुष्य के पास अस्तित्व से जुड़े होने के बहुत द्वार हैं; एक द्वार नहीं, अनंत द्वार हैं। हम परमात्मा से बहुत-बहुत भांति से जुड़े हुए हैं। जैसे एक वृक्ष एक ही जड़ से नहीं जुड़ा होता पृथ्वी से, बहुत जड़ों से जुड़ा होता है। ऐसे हम भी अस्तित्व से बहुत जड़ों से जुड़े हुए हैं, एक ही जड़ से नहीं। और इसलिए अस्तित्व तक पहुंचने के लिए किसी भी एक जड़ के सहारे हम प्रवेश कर सकते हैं।

16-जीवन-ऊर्जा नाभि पर इकट्ठी है; यह एक द्वार है।जीवन-ऊर्जा प्राण पर भी संचालित है; श्वास पर भी। श्वास चलती है, तो हम कहते हैं, व्यक्ति जीवित है। श्वास गई, तो हम कहते हैं, व्यक्ति भी गया।श्वास पर सब खेल है। श्वास से ही शरीर और आत्मा जुड़ी है;श्वास सेतु है।इसलिए श्वास पर भी प्रयोग करके योगीजन उस परम अनुभूति को उपलब्ध हो पाते हैं।श्वास

या प्राण, उसका अपना प्राणयोग है।इसके भी बहुत-बहुत रूप हैं।संक्षिप्त में, दो त्तीन बातें खयाल में ले लेनी चाहिए।

क्या श्वास की गति मनोदशा से बंधी है?-

13 FACTS;-

1-एक तो, श्वास की गति मनोदशा से बंधी है।जैसा मन होता, वैसी हो जाती श्वास की गति। जैसी होती अंतर-स्थिति, श्वास के आंदोलन और तरंगें, वाइब्रेशंस, फ्रीक्वेंसीज बदल जाती हैं। श्वास की फ्रीक्वेंसी, श्वास की तरंगों का आघात खबर देता है,कि मन की दशा कैसी है।अभी तो मेडिकल साइंस

उसकी फिक्र नहीं कर पाई, क्योंकि अभी मेडिकल साइंस शरीर के पार नहीं हो पाई है! इसलिए अभी प्राण पर उसकी पहचान नहीं हो पाई। लेकिन जैसे मेडिकल साइंस ब्लडप्रेशर को, खून के दबाव को नापती है।जब तक पता नहीं था, तब तक कोई खून के दबाव का सवाल नहीं था।रक्तचाप, रक्त का परिभ्रमण भी नई खोज है।

2-तीन सौ साल पहले किसी को पता नहीं था कि शरीर में खून चलता है।

खून के चलने का पता तीन सौ साल पहले ही लग पाया। और जब खून के चलने का पता लगा, तो यह भी पता लगा धीरे-धीरे कि खून का जो प्रेशर है, वह व्यक्ति के स्वास्थ्य के गहरे अंगों से जुड़ा हुआ है। इसलिए ब्लडप्रेशर चिकित्सक के लिए नापने की खास चीज हो गई।लेकिन अभी तक भी

हम यह नहीं जान पाए कि जैसे ब्लडप्रेशर है, वैसा ब्रेथप्रेशर भी है। वैसे वायु का अधिक दबाव और कम दबाव, वायु की गति और तरंगों का आघात-भेद, व्यक्ति की अंतर मनोदशा को परिवर्तित करता है। वह उसकी जीवन-ऊर्जा से संबंधित है।

3-उदाहरण के लिए जब आप क्रोध में होते हैं, तो आपकी श्वास की गति बदल जाती है। वैसी ही नहीं रह जाती, जैसी साधारण होती है। इसका मतलब यह भी कि अगर आप श्वास की गति पर काबू पा लें, तो आप फिर क्रोध पर काबू पा सकते हैं। अगर श्वास की गति न बदलने दें, तो क्रोध

आना मुश्किल हो जाएगा।इसलिए जापान में बच्चों को घरों में प्राणयोग का ही एक सूत्र सिखाते हैं।

4-माता- पिता बच्चों को परंपरा से यह सिखाते हैं कि जब क्रोध आए, तब तुम श्वास को आहिस्ता लो, धीमे-धीमे लो। गहरी लो और धीमे लो। स्लोली एंड डीप, धीमे और गहरी। बच्चों को वे यह नहीं कहते कि क्रोध मत करो, जैसा कि सारी दुनिया कहती है।क्रोध न करना, हाथ की बात नहीं है।

और मजा तो यह है कि जो पिता बच्चे को कह रहा है, क्रोध मत करो, अगर बच्चा न माने तो स्वयं ही क्रोध करके बता देता है कि ''नहीं मानता! इतना कहा कि क्रोध मत कर!'' वह भूल ही जाता है कि अब हम खुद ही वही कर रहे हैं, जो हम उसको मना किए थे।

5-क्रोध इतना हाथ में नहीं है, जितना लोग समझते हैं कि क्रोध मत करो। क्रोध इतना वालंटरी नहीं है, नान वालंटरी है। इतना स्वेच्छा में नहीं है, जितना लोग समझते हैं। इसलिए शिक्षा चलती रहती है; कुछ अंतर नहीं

पड़ता है! योग का पुराना सूत्र, बुद्ध के द्वारा जापान में पहुंचा। बुद्ध ने श्वास पर बहुत जोर दिया।अगर कोई आती-जाती श्वास के राज को पूरा समझ ले, तो फिर उसको दुनिया में और कुछ करने को नहीं रह जाता। इसलिए बुद्ध तो कहते हैं, अनापानसती योग सध गया कि सब सध गया।

6-क्रोध आता है, तब आप देखें कि श्वास बदल जाती है। जब आप शांत होते हैं, तब श्वास बदल जाती है, रिदमिक हो जाती है। आप आरामकुर्सी पर भी लेटे हैं, शांत हैं, मौज में हैं, चित्त प्रसन्न है, पक्षियों जैसा हलका है, हवाओं जैसा ताजा है, आलोकित है। तब देखें, श्वास ऐसी हो जाती है, जैसे हो ही नहीं। पता ही नहीं चलता। बहुत हलकी हो जाती है; न के बराबर हो

जाती है। जब कामवासना मन को पकड़ती है, श्वास एकदम अस्तव्यस्त हो जाती है ,रक्तचाप बढ़ जाता है, शरीर पसीना छोड़ने लगता है, श्वास तेज हो जाती है और टूट-फूट जाती है।प्रत्येक समय भीतर की स्थिति के साथ

श्वास जुड़ी है। अगर कोई श्वास में बदलाहट करे, तो भीतर की स्थिति में बदलाहट की सुविधा पैदा करता है, और भीतर की स्थिति पर नियंत्रण लाने का पहला पत्थर रखता है।

7-प्राणयोग का इतना ही अर्थ है कि श्वास बहुत गहरे तक प्रवेश किए हुए है, वह एक तरफ शरीर को स्पर्श करती है, दूसरी तरफ आत्मा को स्पर्श करती है। एक तरफ बाहर जगत को छूती है, और दूसरी तरफ भीतर ब्रह्म को भी छूती है। श्वास दोनों के बीच आदान-प्रदान है–पूरे समय, सोते-जागते, उठते-बैठते। इस आदान-प्रदान में श्वास का रूपांतरण प्राणयोग है, ट्रांसफार्मेशन आफ दि ब्रीदिंग प्रोसेस। वह जो प्रक्रिया है हमारे श्वास की, उसको बदलना। और उसको बदलने के द्वारा भी व्यक्ति परमसत्ता को उपलब्ध हो सकता है।

8-जो लोग भी ध्यान का कभी थोड़ा अनुभव किए हैं, उनको पता है।जो गहरा प्रयोग करते हैं, वे कहते हैं कि कभी-कभी ऐसा लगता है कि श्वास बंद हो गई, चलती ही नहीं! तो हम बहुत घबड़ा जाते हैं कि इससे कुछ

खतरा तो न हो जाएगा।घबड़ाने की जरा भी जरूरत नहीं है। घबड़ाएं तब, जब श्वास बहुत जोर से चले, अस्तव्यस्त, तब घबड़ाएं। जब बिलकुल लगे कि ठहर गई, जब लगे कि श्वास का कंपन ही नहीं है, तब आप उस बैलेंस को, उस संतुलन को उपलब्ध होते हैं। तब ऊपर की श्वास ऊपर और नीचे की नीचे रह जाती है। बाहर की बाहर और भीतर की भीतर रह जाती है। और एक क्षण के लिए ठहराव आ जाता है। सब ठहर जाता है।

9-न तो बाहर की श्वास भीतर जाती, न भीतर की श्वास बाहर आती। न ऊपर की श्वास ऊपर जाती, न नीचे की श्वास नीचे जाती। सब ठहर जाता

है।श्वास के इस ठहराव के क्षण में परम अनुभव की किरण उत्पन्न होती है। श्वास के इस पूरे ठहर जाने में अस्तित्व पूरा संतुलित हो जाता है, संयम को उपलब्ध हो जाता है। फिर कोई मूवमेंट नहीं, आंदोलन नहीं। फिर कोई परिवर्तन नहीं। फिर कोई हेर-फेर नहीं, बदलाहट नहीं, कोई गति नहीं। उस क्षण में आदमी परमगति में उतर जाता है या शाश्वत में डूब जाता है या इटरनल, सनातन से संपर्क साध लेता है।

10-श्वास का आंदोलन हमारा परिवर्तनशील जगत से संबंध है। श्वास का आंदोलनरहित हो जाना, हमारा अपरिवर्तनशील नित्य जगत से संबंधित हो

जाना है।इसलिए श्वास का यह ठहर जाना बड़ी अदभुत अनुभूति है। कोशिश करके ठहराने की जरूरत भी नहीं है। क्योंकि कोशिश करके कभी नहीं ठहरा सकते। अगर आप कोशिश करके ठहराएंगे, तो भीतर की श्वास बाहर जाना चाहेगी, बाहर की श्वास भीतर जाना चाहेगी।

कोशिश करके कोई व्यक्ति श्वास को रोक नहीं सकता। हां, श्वास को आहिस्ता-आहिस्ता प्रशिक्षित किया जा सकता है, रिदमिक किया जा सकता है, तैयार किया जा सकता है लयबद्धता के लिए।

11-और अगर कोई प्राणायाम के साथ-साथ ध्यान में गहरा उतरता चला जाए, तो एक क्षण ऐसा आ जाता है कि प्रशिक्षित श्वास और ध्यान की शांत स्थिति का कभी मेल, टयूनिंग हो जाती, तो श्वास ठहर जाती है।

और भी एक आश्चर्य की बात कि जब श्वास ठहरती है, तब तत्काल विचार ठहर जाते हैं। बिना श्वास के विचार नहीं चल सकते। इसे जरा देखें, कभी ऐसे ही एक सेकेंड को श्वास को ठहराकर। इधर श्वास ठहरी, भीतर विचार ठहरे, एकदम ब्रेक! श्वास बिलकुल ब्रेक का काम करती है विचार पर।

लेकिन जब आप ठहराते हैं, तब ज्यादा देर नहीं ठहर सकती। श्वास भी निकलना चाहेगी और विचार भी हमला करना चाहेंगे। क्षणभर को ही गैप आएगा। लेकिन जब श्वास, प्रशिक्षित श्वास ध्यान के संयोग से अपने आप ठहर जाती है, तो कभी-कभी घंटों ठहरी रहती है।

12-रामकृष्ण परमहंस के जीवन में ऐसे बहुत मौके हैं। कभी-कभी तो ऐसा हुआ है कि वह छः-छः दिन तक ऐसे पड़े रहते कि जैसे मर गए! प्रियजन घबड़ा जाते, मित्र घबड़ा जाते, कि अब क्या होगा, क्या नहीं होगा! सब ठहर जाता। उस ठहरे हुए क्षण में, इन दैट स्टिल मोमेंट.. चेतना समय के बाहर चली जाती, कालातीत हो जाती।विचार के बाहर हुए, निर्विचार में गए,

ब्रह्म के द्वार पर खड़े हैं। विचार में आए, विचार में पड़े, कि संसार के बीच आ गए हैं। संसार और मोक्ष के बीच पतली-सी विचार की पर्त के अतिरिक्त और कोई फासला नहीं है। पदार्थ और परमात्मा के बीच पतले, झीने विचार के पर्दे के अतिरिक्त और कोई पर्दा नहीं है। लेकिन यह विचार का पर्दा कैसे जाए?

13-दो तरह से जा सकता है। या तो कोई सीधा विचार पर प्रयोग करे ध्यान का, साक्षी-भाव का, तो विचार चला जाता है। जिस दिन विचार शून्य होता है, उसी दिन श्वास भी शांत होकर खड़ी रह जाती है। या फिर कोई प्राणयोग का प्रयोग करे, श्वास का। श्वास को गति दे, व्यवस्था दे, प्रशिक्षण दे; और ऐसी जगह ले आए, जहां श्वास अपने आप ठहर जाती है–बाहर की बाहर, भीतर की भीतर, ऊपर की ऊपर, नीचे की नीचे। और बीच में गैप, अंतराल आ जाता है; खाली, वैक्यूम हो जाता है, जहां श्वास नहीं होती। वहीं से छलांग, दि जंप। उसी अंतराल में छलांग लग जाती है परमसत्ता की ओर।

क्या है नास्तिकता?

10 FACTS;-

1-हम सब अपनी बिल्ट-इन योजना लेकर पैदा होते हैं। हम क्या हो सकते हैं, इसका ब्लू प्रिंट हमारे सेल-सेल में छिपा रहता है। हम क्या हो सकते हैं, इसकी तजवीज हम अपने जन्म के साथ लेकर पैदा होते हैं।यदि व्यक्ति अपनी स्वधर्मरूपी यज्ञ ,निजता को, अपनी इंडिविजुअलिटी को, उसके भीतर जो बीजरूप से छिपा है उसे, फूल की तरह खिला सके, तो भी वह खिला हुआ व्यक्तित्व का फूल परमात्मा के चरणों में समर्पित हो जाता है और स्वीकृत भी।व्यक्ति की भी एक फ्लावरिंग है;फूल की भांति खिलना होता है। और जब भी कोई व्यक्ति पूरा खिल जाता है, तभी वह नैवेद्य बन जाता है। वह भी प्रभु के चरणों में समर्पित और स्वीकृत हो जाता है।

2- व्यक्ति के साथ भी फूल की तरह दुर्घटनाएं घट सकती हैं। यदि कोई गुलाब का फूल कमल का फूल होना चाहे, तो दुर्घटना सुनिश्चित है। दुर्घटना के दो पहलू होंगे। एक तो गुलाब का फूल कुछ भी चाहे, कमल का फूल नहीं हो सकता है। वह उसकी नियति, उसकी डेस्टिनी नहीं है। वह उसके भीतर छिपा हुआ बीज नहीं है। वह उसकी संभावना नहीं है।इसलिए गुलाब

का फूल विक्षिप्त हो सकता है ;पीड़ित, दुखी, परेशान हो सकता है; चिंतित, संतापग्रस्त हो सकता है; नींद खो सकता, चैन खो सकता; कमल का फूल हो नहीं सकता है। होने की दौड़ में मिटेगा, बर्बाद होगा। यात्रा कितनी ही करे, लौट-लौटकर गुलाब का फूल ही रहेगा। न पहुंचने से फ्रस्ट्रेशन, न पहुंचने से विषाद मन को पकड़ता है। और जिसके चित्त को विषाद पकड़ लेता, उसके चित्त में नास्तिकता का जन्म हो जाता है।

3-इसे ठीक से खयाल में ले लें।विषाद से भरा हुआ, पीड़ा /दुख से भरा हुआ चित्त,

फ्रस्ट्रेटेड चित्त आस्तिक नहीं हो क्योंकि आस्तिकता आती है अनुग्रह के भाव से, ग्रेटिटयूड से। और विषाद में अनुग्रह का भाव कैसे पैदा होगा? अनुग्रह का भाव तो आनंद में पैदा होता है। जब कोई आनंद से भरता है, तो अनुगृहीत होता है, तो ग्रेटिटयूड पैदा होता है।जमीन चीजों

को अपनी तरफ खींचती है।उसकी एक छिपी हुई ऊर्जा, शक्ति का नाम ग्रेविटेशन, गुरुत्वाकर्षण है। दिखाई कहीं नहीं पड़ता, लेकिन पत्थर को फेंको ऊपर, वह नीचे आ जाता है। वृक्ष से फल गिरा, नीचे आ जाता है। दिखाई कहीं भी नहीं पड़ता।

4-हम सब कहानी जानते है कि न्यूटन एक बगीचे में बैठा है और सेव का फल गिरा है। और उसके मन में सवाल उठा कि फल गिरता है, तो नीचे ही क्यों आता है, ऊपर क्यों नहीं चला जाता? दाएं-बाएं क्यों नहीं चला जाता? ठीक नीचे ही क्यों चला आता है? चीजें गिरती हैं, तो नीचे क्यों आ जाती हैं? और तब उसे पहली दफा खयाल आया कि जमीन से कोई ऊर्जा, कोई शक्ति चीजों को अपनी तरफ खींचती है; कोई मैग्नेटिक, कोई चुंबकीय शक्ति चीजों को अपनी तरफ खींचती है। फिर ग्रेविटेशन सिद्ध हुआ। अभी भी दिखाई नहीं पड़ता, लेकिन परिणाम

दिखाई पड़ते हैं।ठीक ऐसे ही परमात्मा भी चीजों को अपनी तरफ खींचता है। उसके खींचने का जो ग्रेविटेशन है, उसका नाम है ग्रेस/अनुकंपा।

5-यह बड़े आश्चर्य की बात है कि जब फूल खिलता है, तो आकाश की तरफ उठता है। और जब मुरझाता है, सूखता है, तो जमीन की तरफ गिर जाता है। आदमी जीवित होता है, तो आकाश की तरफ उठा हुआ होता है। मर जाता है, तो जमीन में दफना दिया जाता है, मिट्टी में गिर जाता है। वृक्ष उठते हैं, जीवित होते हैं, तो आकाश की तरफ उठते हैं। फिर जराजीर्ण होते हैं, गिरते और मिट्टी में सो जाते हैं। ऊपर और नीचे। कुछ ऊपर की तरफ खींच रहा है, कुछ नीचे की तरफ खींच रहा है।

6-विषाद जब चित्त में होता है, तो आदमी का हृदय पत्थर की तरह हो जाता है, नीचे की तरफ गिरने लगता है। जब भी आप दुख में रहे हैं, तब आपने अनुभव किया होगा कि हृदय पर हजारों मनों का बोझ हो जाता है। फिर जमीन तो नीचे की तरफ खींचती है, लेकिन परमात्मा फिर ऊपर की तरफ खींचता हुआ मालूम नहीं पड़ता। इसलिए दुख में आदमी मरना चाहता है। मरना चाहता है मतलब, जमीन के ग्रेविटेशन में दफन हो जाना चाहता है। दुख में आत्महत्या कर लेना चाहता है; मतलब, डस्ट अनटु डस्ट, मिट्टी मिट्टी में लौट जाए, इसके लिए आतुर हो जाता है।

7-ठीक इससे उलटी घटना भी घटती है। जब कोई आनंद से भरता है, तो कांशसनेस अनटु कांशसनेस–मिट्टी में मिट्टी नहीं–परमात्मा में परमात्मा मिलने को आतुर हो जाता है। जब कोई फूल खिलता है आनंद का, तो ऊपर से अनुग्रह की वर्षा होने लगती है। वह खिली हुई फूल की पंखुड़ियों पर प्रभु के प्रसाद का अमृत बरसने लगता है।आनंद में मन खिल जाता है फूल की

तरह।इसलिए तो जिन्होंने भी अनुभव किया है परम आनंद का, वे कहेंगे कि मस्तिष्क में सहस्रदल कमल खिल जाता है। वह प्रतीक है, सिंबालिक है। वह केवल काव्य में प्रकट किया गया अनुभव है। मस्तिष्क के ऊपर खिल जाता है फूल हजारों पंखुड़ियों वाला; उस खिले हुए फूल में बरसा होने लगती है अनुग्रह की।

8-और जब कोई उतने आनंद से भरता है, तो परमात्मा को धन्यवाद दे पाता है।जब भीतर आनंद की वर्षा होने लगे और हृदय का कोना-कोना नाच उठे और अंधकार विदा हो जाए और पंखुड़ी-पंखुड़ी खिल जाए, फिर धन्यवाद किसके प्रति प्रकट करे? उस धन्यवाद को प्रकट

करने के लिए परमात्मा को खोजना पड़ता है।आनंद से भरा चित्त आस्तिक हो जाता है; दुख से भरा चित्त नास्तिक हो जाता है। नास्तिकता ग्रेविटेशन है। जमीन की ताकत नीचे की तरफ खींचती है।आस्तिकता ग्रेस/अनुग्रह है; ऊपर की तरफ ले जाता है।व्यक्ति जब भी

अपने निज धर्म को भूलता है, तब ऐसी हालत हो जाती है, जैसे गुलाब का फूल कमल होना चाहे।निज धर्म का मतलब है, वह कोई और होना चाहता है, जो नहीं है।

9-अगर दुर्घटना घट जाए, तो यह हो सकता है कि हम वह न हो पाएं, जो हम हो सकते थे। लेकिन ऐसी घटना कभी नहीं घट सकती कि हम वह हो जाएं, जो कि हम नहीं हो सकते थे।

हम अपनी नियति से चूक सकते हैं। लेकिन इससे उलटा कभी नहीं होता;यह कभी नहीं हो सकता कि हम वह हो जाएं, जो कि हम नहीं हो सकते थे।यह हो सकता है, गुलाब का फूल

गुलाब का फूल भी न हो पाए। लेकिन यह नहीं हो सकता कि गुलाब का फूल... कमल का फूल हो जाए। गुलाब का फूल अगर कमल होने की कोशिश में लगे, तो इसके दो पहलू हैं। एक पहलू कि वह कमल कभी न हो पाएगा। कमल होने की चेष्टा में विषाद को उपलब्ध होगा–दुख, पीड़ा, एंग्विश।

10-जब आदमी विषाद में होता है, तो सारा हृदय एक कंपन हो जाता है, एक ट्रेंबलिंग।जब आदमी विषाद में हो जाता है, तो जैसे मौत सामने खड़ी हो और हमारे भीतर भी सब मृत्यु के भय में, अंधकार में डूब जाता है।यह जो स्थिति है विषाद की /संताप की, जहां फिर कुछ भी