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क्या रहस्य है प्राण और अपान का?PART 01

क्या अर्थ है इस वाक्य का?

''जो प्राण को ऊपर की ओर उठाता है और अपान को नीचे ढकेलता है ..शरीर के मध्य हृदय में बैठे हुए उस सर्वश्रेष्ठ भजने योग्य परमात्मा की सभी देवता उपासना करते हैं''।

18 FACTS;-

1-सबके भीतर एक ही आकाश है और एक ही आत्मा है। लेकिन इसे आप सिद्धात की तरह मानकर और जिंदगीभर दोहराते रहें, तो कुछ भी न होगा। इसे आप अनुभव की तरह भीतर जान लें-अपने घड़े से अलग होकर जान लें-तो आपको सारे घड़े मिट गए, सिर्फ घड़ों के भीतर एक ही आकाश रह गया। उस एक आकाश का नाम ही ब्रह्म है। वही है बाहर, वही भीतर, वही नीचे, वही ऊपर, वही सब जगह है। क्षुद्र में और विराट में, निम्न में और उच्च में, पर्वतो में और नदियों में, पृथ्वी में और आकाश में, सभी जगह वही है।

2-जो प्राण को ऊपर की ओर उठाता है और अपान को नीचे ढकेलता है शरीर के मध्य हृदय में बैठे हुए उस सर्वश्रेष्ठ भजने योग्य परमात्मा की सभी देवता उपासना करते हैं।

भारतीय योग की एक गहरी खोज इस सूत्र में छिपी है। पश्चिम का चिकित्साशास्त्र, मेडिकल साइंस अभी भी इस संबंध में करीब—करीब अपरिचित है। यह खोज है प्राण और अपान की।

भारतीय चिकित्साशास्त्र आयुर्वेद, योग, तंत्र, इन सबकी यह प्रतीति है कि शरीर में वायु की दो दिशाएं हैं। एक दिशा ऊपर की ओर है, उसका नाम प्राण। और एक दिशा नीचे की ओर है, उसका नाम अपान। शरीर में वायु का दोहरा रूप है और दो तरह की धाराएं हैं। जो मल -मूत्र विसर्जित होता है, वह अपान के कारण है। वह जो नीचे की तरफ वायु बह रही है, वही मल-मूत्र को नीचे की तरफ अपनी धारा में ले जाती है। और जीवन में जितनी भी ऊपर की तरफ जाने वाली चीजें हैं, वे सब प्राण से जाती हैं।

3-इसलिए जो जितना ज्यादा प्राणायाम को साध लेता है, उतना ऊपर उठने में कुशल हो जाता है। क्योंकि ऊपर जाने वाली धारा को विस्तार कर रहा है, फैला रहा है, बड़ा कर रहा है।

ये दो धाराएं हैं, दो करेंट हैं वायु के, शरीर के भीतर। और इन दोनों के मध्य स्थित है परमात्मा, या आत्मा, या चेतना, या जो भी नाम आप देना चाहें। वह जो अंगुष्ठ आकार का आत्मा है, वह इन दोनों धाराओं के बीच में उपस्थित है। वही वायु को नीचे की तरफ धकाता है, वही वायु को ऊपर की तरफ धकाता है। प्राण-ऊपर की तरफ जाने वाली वायु। अपान -नीचे की तरफ जाने वाली वायु।

4-पश्चिम का चिकित्साशास्त्र अभी भी इस दोहरी धारा को नहीं पहचान पाया है। उनका खयाल है, वायु एक ही तरह की है। इसलिए वायु के आधार पर जो बहुत से काम आयुर्वेद कर सकता है, वह ऐलोपैथी नहीं कर सकती। वायु की इन धाराओं को ठीक से समझ लेने वाला

व्यक्ति जीवन में बड़ी क्रांतिया कर सकता है। आपने देखा है कि जब छोटा बच्चा श्वास लेता है तो उसका पेट ऊपर -नीचे जाता है। छाती पर कोई हलचल भी नहीं होती। उसकी श्वास बड़ी गहरी है। आप जब श्वास लेते हैं तो सीना ऊपर उठता है, नीचे गिरता है। आपकी श्वास उथली है,गहरी नहीं है।

5-मनोवैज्ञानिक बड़े हैरान हैं कि यह घटना क्यों घटती है? उम्र बढ़ने के साथ श्वास उथली क्यों हो जाती है? और बच्चे की श्वास गहरी क्यों होती है? जानवरों की श्वास भी गहरी होती है। जंगली आदमियों की श्वास भी गहरी होती है। जितना सभ्य आदमी हो, उतनी उथली श्वम्म हो जाती है। बड़ी मुश्किल की बात है कि सभ्यता से श्वास का ऐसा क्या संबंध होगा? और वह कौन-सी घड़ी है जब से बच्चा गहरी श्वास लेना बंद कर देता है?योग इस राज को जानता है।

और यह राज अब मनोविज्ञान को भी थोड़ा-थोड़ा साफ होने लगा है। क्योंकि मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि बच्चे को जिस दिन से काम का भय पैदा हो जाता है, Parents जिस दिन से उसे 'काम' के प्रति सचेत कर देते हैं, उसी दिन से उसकी श्वास उथली हो जाती है। क्योंकि श्वास जब गहरी जाती है, तो कामकेंद्र पर चोट करती है। वह अपान बन जाती है और कामवासना को जगाती है।

6-जब गहरी श्वास हो, तो पूरा शरीर आंदोलित होता है।बच्चे भयभीत कर दिए जाते हैं कि काम बुरा है,जितनी गहरी श्वास होगी, उतनी कामवासना तेज होगी। तो वे घबरा जाते हैं।वे अपनी श्वास को ऊपर सम्हालने लगते हैं, उसको गहरा नहीं जाने देते। फिर धीरे-धीरे उनकी श्वास सिर्फ ऊपर-ऊपर चलने लगती है। उनके कामकेंद्र और स्वयं के बीच एक फासला हो जाता है। और जब श्वास इतनी गहरी नहीं जाती तो न मालूम कितनी बीमारियां इसके साथ पैदा होती हैं, क्योंकि आपका अपान कमजोर हो जाता है।

7-जो लोग भी उथली श्वास लेते हैं, उनको कब्जियत हो जाएगी। क्योंकि अपान, जो वायु नीचे जाकर मल को विसर्जित करती है, वह वायु नीचे नहीं जा रही है। लेकिन डर वही है। क्योंकि वीर्य भी मल है उसको भी निष्कासित करने के लिए वायु को नीचे तक जाना चाहिए। अपान बनना चाहिए। तो जो व्यक्ति भी डरेगा, उसको कब्जियत भी पकड़ लेगी। क्योंकि वह एक ही वायु दोनों को धक्का देती है। ब्रह्मचर्य का प्रयोग अपान को रोकने से नहीं होता। ब्रह्मचर्य का प्रयोग प्राण को बढ़ाने से होता है। इस फर्क को ठीक से समझ लें।

8-हम सारे लोगों ने ब्रह्मचर्य के नाम पर गलत कर लिया है और अपान को रोक लिया है। उसकी वजह से हम सिर्फ रुग्ण और बीमार हो गए हैं। हमारे व्यक्तित्व की जो गरिमा और जो स्वास्थ्य हो सकता था, वह नष्ट हो गया है। और शरीर न-मालूम कितने जहर से भर जाता है। क्योंकि जो अपान सारे जहरों को शरीर के बाहर फेंकती है, वह नहीं फेंक पाती। आप डरे हुए हैं।यह ब्रह्मचर्य की एक निगेटिव प्रक्रिया है।एक पॉजिटिव प्रक्रिया है—अपान को मत छेड़े,

प्राण को बढ़ाए। प्राण इतना ज्यादा हो जाए कि अपान उसके मुकाबले बिलकुल छोटा हो जाए। एक बड़ी लकीर खींच दें। तो अपान शुद्ध रहे और प्राण विराट हो जाए, तो आपकी ऊर्जा ऊपर की तरफ बहने लगे।

9-इसलिए योग में, प्राणायाम का इतना उपयोग है क्योंकि प्राणायाम ऊर्जा को ऊपर की तरफ धक्के देता है। जो काम-ऊर्जा अपान के द्वारा 'काम' बनती है, वही काम-ऊर्जा प्राण के द्वारा कुंडलिनी बन जाती है। वह ऊपर की तरफ बहने लगती है। और ऊपर की तरफ बहते-बहते मस्तिष्क में जाकर उसका कमल खिल जाता है।अपान के धक्के से वही कामवासना

किसी बच्चे का जन्म बनती है, प्राण के धक्के से वही कामवासना आपका स्वयं का नया जन्म बन जाती है—लेकिन मस्तिष्क तक आ जाए ...तब। तो प्राण उसे ऊपर की तरफ लाता है।

यह सूत्र कह रहा है कि प्राण और अपान दोनों के बीच में छिपा है वह परमात्मा। वही नीचे की तरफ अपान को ले जाता है, वही प्रकृति का आधार है। और वही प्राण को ऊपर की तरफ ले जाता है, वही परलोक का आधार है।

10-यह तुम्हारे ऊपर निर्भर है कि तुम किस धारा में प्रविष्ट होना चाहते हो।अगर तुम नीचे की धारा में प्रविष्ट होना चाहते हो ,तो तुम्हे अपान को बढ़ाना होगा।सभी पशुओं का अपान बड़ा

प्रबल होता है, उनका प्राण बहुत निर्बल होता है। सिर्फ योगियों का प्राण सबल होता है। अपान स्वस्थ होता है और प्राण इतना सबल होता है कि स्वस्थ अपान भी उस पर कब्जा नहीं कर पाता;कब्जा प्राण का ही होता है। साधारण आदमी का प्राण तो कमजोर होता ही है, वह डर और भय के कारण अपान भी कमजोर कर लेता है। किसी भी कारण से डरा हुआ,भयभीत

आदमी गहरी श्वास नहीं लेता।सिर्फ निर्भय आदमी गहरी श्वास लेता है।जब भी आप भयभीत होंगे, श्वास रुक जाएगी। जहा भी आप घबड़ा जाते हैं, किसी से मिलने गए हैं, किसी बड़े आफिसर से और घबड़ा गए हैं, बस श्वास उथली हो जाती है, ऊपर-ऊपर चलने लगती है। फिर आप बाहर आकर ही ठीक से श्वास ले पाते हैं।

11-हम इतना डरा दिए हैं कि हमारा सब श्वास का पूरा यंत्र-जाल अस्वस्थ हो गया है। दोनों के बीच में छिपा है परमात्मा, दोनों का मालिक वही है।अपान से डरने की कोई भी जरूरत नहीं,

क्योंकि शरीर का सारा स्वास्थ्य उस पर निर्भर है। निष्कासन उसका काम है। और अगर निष्कासन ठीक न हो, तो शरीर में जहर टाक्सिन्स इकट्ठे हो जाएंगे। और वे इकट्ठे हो गए हैं। हर आदमी के खून में जहर चल रहा है। कोई आदमी व्यायाम करे, दौड़े, चले, तो अपान

सबल हो जाता है। इसलिए शरीर में एक ताजगी और स्वास्थ्य आ जाता है। लेकिन प्राणायाम सिर्फ गहरी श्वास नहीं है, प्राणायाम बोधपूर्वक गहरी श्वास है। इस फर्क को ठीक से समझ लें। बहुत से लोग प्राणायाम भी करते हैं, तो बोधपूर्वक नहीं, बस गहरी श्वास लेते रहते हैं।

अगर आप सिर्फ गहरी श्वास ही लेंगे, तो अपान स्वस्थ हो जाएगा। बुरा नहीं है, अच्छा है। लेकिन ऊर्ध्वगति नहीं होगी। ऊर्ध्वगति तो तब होगी जब श्वास की गहराई के साथ आपकी अवेयरनेस, आपकी जागरूकता भीतर जुड़ जाए।

12-विज्ञान भैरव तंत्र में पहले सूत्र में भगवान शिव कहते है-- '' श्वास चले, नाक को छुए, तब तुम जानो कि नाक छू रही है। भीतर चले, नासापुटों में स्पर्श हो, जानो कि नासापुटों में स्पर्श हो रहा है। कंठ में उतरे, जानो कि कंठ में स्पर्श हो रहा है। फेफड़ों में आए, नीचे जाए,पेट तक पहुंचे, तुम देखते चले जाओ, उसके पीछे—पीछे ही तुम्हारी स्मृति लगी रहे।फिर एक क्षण को रुक जाएगी—अथार्त गैप। वह गैप बड़ा कीमती है''।जब आप श्वास गहरी लेंगे, एक क्षण

को जब भीतर पहुंच जाएंगे,तो कोई श्वास नहीं होगी...न बाहर न भीतर। सब ठहर जाएगा। फिर श्वास बाहर लौटेगी। एक सेकेंड विश्राम करके फिर बाहर तरफ चलेगी, तब तुम भी उसके साथ बाहर चलो। उठो, उसी के साथ। आओ कंठ तक, आओ नाक तक। बाहर निकल जाए, उसका पीछा करते रहो। फिर बाहर जाकर एक सेकेंड को सब ठहर जाएगा। फिर नई श्वास शुरू होगी। फिर भीतर, फिर बाहर।भगवान शिव ने कहा है,तुम इसको माला बना

लो और तुम इसी के गुरियों के साथ अपने स्मरण को जगाते रहो। अगर गहरी श्वास के साथ बोध हो, तो प्राण का विस्तार होता है, और जीवन -ऊर्जा की गति ऊपर की तरफ होनी शुरू हो जाती है।

13-बोध ऊपर का सूत्र है, मूर्च्छा नीचे का सूत्र है।अगर कोई व्यक्ति निरंतर, जब भी उसे स्मरण आ जाए, सिर्फ श्वास पर बोध को साधता रहे, तो किसी और साधना की जरूरत नहीं। उतना काफी है। पर वह बड़ा कठिन है। चौबीस घंटे, जब भी खयाल आ जाए, तो श्वास को ....किसी को पता भी नहीं चलेगा, चुपचाप यह हो सकता है।जीसस ने कहा है कि तुम्हारा

बायां हाथ जब कुछ करे, तो दाएं हाथ को पता न चले।यह इस तरह की प्रक्रिया है,

जिसमें किसी को भी पता नहीं चलेगा। तुम चुपचाप अपनी श्वास के साथ धीरे-धीरे स्मृति से भरते चले जाओगे। और जैसे-जैसे स्मृति गहन होगी, श्वास गहरी होगी, वैसे-वैसे उसकी चोट स्मरणपूर्वक तुम्हारी ऊर्जा को रीढ़ के मार्ग से ऊपर की तरफ उठाने लगेगी। और यह कोई कल्पना की बात नहीं है, तुम अपनी रीढ़ में निश्चित रूप से विद्युत की धारा को उठता हुआ पाओगे।

14-तरंगें तुम्हारी रीढ़ में दौड़ने लगेंगी। वे तरंगें उत्तप्त होंगी। और तुम चाहो तो तुम अपने हाथ से छूकर देख भी सकते हो, जहा तरंगें होंगी वहां रीढ़ गरम हो जाएगी। और जैसे-जैसे यह गर्म ऊर्जा ऊपर की तरफ उठेगी, तुम्हारी रीढ़ उत्तप्त होने लगेगी। तुम अनुभव करोगे कि यह ऊर्जा कहा तक जाती है। फिर गिर जाती है, फिर जाती है।निरंतर अभ्यास से एक दिन

यह ऊर्जा तुम्हारे ठीक सहस्रार तक पहुंच जाती है। लेकिन इस बीच यह और चक्रों से गुजरती है और हर चक्र के अपने अनुभव हैं एक नया प्रकाश हैं। और हर चक्र से जब यह ऊर्जा गुजरेगी तो तुम्हारे जीवन में नई सुगंध, नए अर्थ, नए अभिप्राय प्रगट होने लगेंगे। नए फूल

खिलने लगेंगे।हजारों -लाखों प्रयोग करने केबाद योगशास्त्र ने पूरी तरह निश्चित किया है कि हर केंद्र पर क्या घटता है।और उसी हिसाब से इन केंद्रों के, चक्रों के नाम रखे हैं।

15-उदाहरण केलिए जैसे दोनों आंखों के बीच में जो चक्र है, उसको योग ने आज्ञा चक्र कहा है। उसको आज्ञा चक्र इसलिए कहा है कि जिस दिन तुम्हारी ऊर्जा उस चक्र से गुजरेगी, तुम्हारा शरीर, तुम्हारी इंद्रियां तुम्हारी आज्ञा मानने लगेंगी। तुम जो कहोगे, उसी क्षण होगा।तुम्हारा व्यक्तित्व तुम्हारे हाथ में आ जाएगा, तुम मालिक हो जाओगे।इस चक्र के

पहले तुम गुलाम हो। इस चक्र में जिस दिन ऊर्जा प्रवेश करेगी, उस दिन से तुम्हारी मालकियत हो जाएगी। उस दिन से तुम जो चाहोगे, तुम्हारा शरीर तुम्हारी आज्ञा मानेगा। अभी तुम्हें शरीर की आज्ञा माननी पड़ती है,क्योंकि जहां से शरीर को आज्ञा दी जा सकती है, उस जगह पर तुम अभी भी खाली हो। वहा ऊर्जा नहीं है, जहां से आज्ञा दी जा सकती है। इसलिए उस चक्र का नाम आज्ञा चक्र है।

16-ऐसे ही सब चक्रों के नाम हैं। वे नाम सार्थक हैं। और हर चक्र के साथ एक विशिष्ट अनुभव

जुड़ा है। आखिरी चक्र है सहस्रार। सहस्रार का अर्थ होता है —सहस्र पंखुड़ियों वाला कमल। निश्चित ही जिस दिन ऊर्जा सहस्रार पहुंचती है, वहा पूरा मस्तिष्क ऐसा मालूम होता है कि जैसे हजार पंखुडियों वाला कमल हो गया। और वह कमल खिला है, आकाश की तरफ उन्मूख, सारी पंखुड़ियां खिल गयीं। और उससे जो अपूर्व भानंद का अनुभव, और जो अपूर्व सुगंध की वर्षा, और जीवन में जो पहली बार पूर्ण प्रकाश उतरता है।कई कारण हैं कि

उसको हमने सहस्रार कहा है...सहस्रदल कमल।

17-कमल की एक खूबी है कि वह कीचड़ में पैदा होता है और उससे ज्यादा सुंदर और उससे ज्यादा पवित्र कुछ भी नहीं है।लेकिन उससे ज्यादा अपवित्र भी जगत में कोई नहीं पैदा होता। गंदे कीचड़ में पैदा होता है, लेकिन वह कीचड़ से एक डंठल उठता है, और पानी के पार निकल जाता है। वह डंठल आपकी रीढ़ है। वह गंदा कीचड़ आपकी कामवासना है। आपकी रीढ़ के डंठल से फूल खिलता है एक दिन। और जिस दिन वह कमल का फूल खिलता है, उस दिन यह इतना अदभुत है कि कीचड़ से पैदा हुआ कमल का फूल, उसको पानी भी छू नहीं पाता। पानी भी उस पर गिरे तो वह अछूता रहता है। उसे फिर कोई चीज नहीं छू पाती। वह अस्पर्शित रहता है।

18-यह कमल का फूल संन्यास की परम अभिव्यक्ति है। उसको कुछ भी छू नहीं पाता। गिरता रहे उसके ऊपर, तो भी उसे कुछ छू नहीं पाता। वह अछूता ही रहता है। अस्पर्शित। कीचड़ से पैदा होकर कीचड़ के पार, इतनी पवित्रता को उपलब्ध होने की जो संभावना कमल की है, वही प्रत्येक मनुष्य की है। इसलिए हमने आखिरी चक्र को सहस्रदल कमल कहा है।

ये दो, प्राण और अपान वायु हैं। इन दोनों के मध्य में वह परमात्मा बैठा है।इस शरीर में स्थित

एक शरीर से दूसरे शरीर में जाने वाले जीवात्मा के शरीर से निकल जाने पर यहां इस शरीर में शेष ही क्या रहता है?जो निकल जाता है यही है वह परमात्मा।कोई भी मरणधर्मा प्राणी न तो

प्राण से जीता है और न अपान से ही जीता है; किंतु जिसमें प्राण और अपान ये दोनों आश्रय पाए हुए हैं ऐसे किसी दूसरे से ही सब जीते हैं।उसी परमात्मा में, उसी मध्य में छिपे हुए

जीवात्मा में इन दोनों का आश्रय है—प्राण का भी, अपान का भी। उससे ही हम जीते हैं।

''उस सर्वश्रेष्ठ भजने योग्य परमात्मा की सभी देवता उपासना करते हैं'' कौन है वो परमात्मा?-

06 FACTS;-

1-आपके शरीर और आपके बीच जो संबंध है, वही प्रकृति और परमात्मा के बीच संबंध है। कहें कि यह पूरा जगत उसका शरीर है। आप छोटे रूप में एक मिनिएचर अस्तित्व, एक विश्व हैं। शरीर और आप, ऐसे ही पूरी प्रकृति और वह परमात्मा। जब सब सो जाता है, तब भी वह

जागा हुआ है।इसलिए श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि'' योगी उस समय भी जागता है, जब भोगी सो जाता है। रात्रि भी उसके लिए भीतर निद्रा नहीं है। शरीर ही उसका सोता है, भीतर

वह सतत जागता रहता है''।जैसे-जैसे आपका होश बढ़ेगा, वैसे-वैसे नींद में भी आप पाएंगे' कि आप जाग रहे हैं। और जिस दिन आपको लगने लगे, नींद में भी आप जाग रहे हैं, नींद भी आपका प्रत्यक्ष अनुभव है, उस दिन आप समझना कि अब शरीर से,शरीर के किनारे से खूंटियां टूटने लगीं और आत्मा की तरफ नाव का बहना शुरू हुआ है।

2-उदाहरण के लिए यम भी नचिकेता से कहता है—''हे नचिकेता! जिसका जैसा कर्म

होता है और शास्त्रादि के श्रवण द्वारा जिसको जैसा भाव प्राप्त होता है उन्हीं के अनुसार शरीर धारण करने के लिए कितने ही जीवात्मा तो नाना प्रकार की योनियों को प्राप्त हो जाते हैं और दूसरे कितने ही जीवात्मा वृक्ष लता पर्वत आदि स्थावर- भाव का अनुसरण करते हैं।जो यह

जीवों के कर्मानुसार नाना प्रकार के भोगों का निर्माण करने वाला परमपुरुष परमेश्वर है..प्रलयकाल में सबके सो जाने पर भी जागता रहता है वही परम विशुद्ध तत्व है वही ब्रह्म है वही अमृत कहलाता है; तथा उसी में संपूर्ण लोक आश्रय पाए हुए हैं। उसे कोई भी अतिक्रमण नहीं कर सकता। ''

3-इसमें एक बात बहुत ठीक से समझ लेने जैसी है। ''वही है वह परमात्मा'' प्रलयकाल में जब सब नष्ट हो जाता है, या सब सो जाता है,प्रकृति का सारा क्रिया-कलाप सो जाता है, तब भी जो जागता रहता है...जिसके संबंध में नचिकेता ने पूछा है।हमें तो प्रलयकाल का कोई

पता नहीं,तो हम इसे कहां से समझें...हम अपनी ही नींद से इसे समझें तो आसान होगा। नींद में शरीर तो सो जाता है-शरीर यानी प्रकृति-सब सो जाता है। लेकिन क्या आपने कभी खयाल किया कि कोई आपके भीतर जागता रहता है?एक मां है, उसका छोटा बच्चा है।

बाहर तूफान हो, आधी गरजे, आकाश में बादल घुमड़े, बिजली गिरे, उसकी नींद नहीं टूटेगी; उसका बच्चा जरा कुनमुनाए, वह जल्दी से जाग जाएगी। बड़ी हैरानी की बात है। बिजली कड़कती थी बाहर, उसकी नींद न टूटी, और बच्चे की जरा-सी आवाज! कोई उसके भीतर जागता है, जो बच्चे का स्मरण रखता है।

4-हजार लोग गहरी नींद में खोए हों, और कोई कहे ..राम! किसी को सुनाई नहीं पड़ेगा। लेकिन जिसका नाम राम है, वह कहेगा, कौन मेरी नींद खराब कर रहा है? जरूर कोई है, जो जानता है कि मेरा नाम राम है।सुबह आप उठते हैं, कहते हैं, रात बड़ी गहरी

नींद आई। किसने जानी? अगर आप बिलकुल ही सो गए थे, तो कौन है जो कह रहा है कि बड़ी गहरी नींद आई? कौन है जो जानने वाला है नींद का भी? अगर नींद पूरी थी, तो वहा कोई भी नहीं था, सब सो गया था। लेकिन कोई जाग रहा है । कोई देखता रहा है कि नींद गहरी आई कि नहीं, कि सपने थे कि नहीं। रात देखे गए सपने सुबह कोई याद रखता है। अगर आप बिलकुल सो गए थे तो किसने बनाई स्मृति? कौन लाया सपनों को जागने तक? नहीं, आप बिलकुल नहीं सो जाते।

5-यह सूत्र यह कह रहा है कि आपके शरीर की निद्रा में जो जागता है, वही तत्व, जब सारी प्रकृति प्रलय में सो जाती है...।हिंदुओं ने जो गणित का फैलाव किया है, वह अरबों

वर्षों का है। और इन अरबों वर्षों को उन्होंने ब्रह्मा का एक दिन कहा है। प्रकृति की शुरुआत, सृष्टि और प्रलय—इसको उन्होंने ब्रह्मा का दिवस कहा है। एक दिवस परमात्मा का। हमारे लिए अरबों वर्ष, परमात्मा के लिए एक दिन। फिर होती है रात, प्रलय में सब सो जाता

है, पूरी प्रकृति।आखिर प्रकृति भी थक जाएगी। आप ही नहीं थक जाते दिनभर में, ये सब वृक्ष, ये पौधे, ये पहाड़, यह पृथ्वी, ये चांद-तारे, ये सब भी थक जाएंगे। थकान की यह दृष्टि बड़ी साफ है। कि आप जब थक जाते हैं, तो हर चीज एक दिन थक जाएगी, चाहे कितनी ही लंबाई हो।

6-जिस दिन सब चीजें थककर विश्राम में पड़ जाएंगी, उस दिन प्रलय हो जाएगा। सब सो गया, ब्रह्मा की रात शुरू हो गई।उस दिन भी जो जागता रहता है, वही है वह परमात्मा।

प्रलय का अर्थ है, पूरी प्रकृति की रात। वैज्ञानिकों ने ही खोजा है कि इस जमीन को बने तो कोई चार अरब वर्ष हो चुके हैं।इस जमीन में ऐसे अवशेष मौजूद हैं, जो लाखों साल पहले के प्रमाण देते हैं।इसलिए हमने इस देश में जैसा गणित फैलाया था, अब पश्चिम के वैज्ञानिक और गणितज्ञ भी उसको सम्मान से देखने लगे हैं।

प्राण उर्जा के पाँच भिन्‍न-भिन्‍न रूप ;-

15 FACTS;-

1-योगियों ने कहा है, प्राण उर्जा के पाँच भिन्‍न-भिन्‍न रूप, क्रियाएं और उर्जा क्षेत्र होते है। हम तो यहीं कहेंगे कि श्‍वास कहना पर्याप्‍त है। हम तो केवल दो ही बातें जानते है—श्‍वास को बाहर छोड़ना, श्‍वास को भीतर लेना । लेकिन योगी तो प्राण के संसार में जीते है।और वे इसके सूक्ष्‍म भेद को समझते है। इसलिए उन्‍होंने इसको पाँच भागों में विभक्‍त किया है।यह व्‍यक्‍ति के भीतर के पाँच विस्‍तार है।और प्रत्‍येक भीतर अलग-अलग काम करता है। उन पांचों भागों को समझ लेना बहुत महत्‍वपूर्ण है।

पहला है प्राण,

दूसरा है अपान,

तीसरा है समान,

चौथा है उदान,

पाँचवाँ है व्‍यान

2-प्राण है पहला श्‍वसन। दूसरा है अपान, वह मलोत्‍सर्ग में मदद देता है। वह मल आदि शरीर से निकालने में मदद करता है। अंतड़ियों की सफाई अपान से होती है। और अगर तुम जान लो कि कैसे इस पर काम करना है, तो तुम इस ढंग से अंतड़ियों की सफाई कर सकते हो जैसे कि कोई नहीं कर सकता। योगियों की आंतें सर्वाधिक साफ होती है। और वह बहुत ही महत्‍वपूर्ण है, क्‍योंकि एक बार जब आंतें पूरी तरह साफ हो जाती है, जब अंतड़ियां एक दम साफ हो जाती है, तो पूरा शरीर एक दम हल्‍का, भार विहीन हो जाता है, जैसे कि उड़ रहे हो। शरीर का भार समाप्‍त हो जाता है।

3-साधारणतया तो अंतड़ियों में बहुत सा कचरा और मल भरा रहता है ..जीवन भर मल की पर्तों पर पर्तें चढ़ती चली जाती है। अंतड़ियों की भीतरी दीवारों पर मल इकट्ठा होता जाता है। यह सूखता जाता है और अति कठोर होता जाता है। जो भीतर जहर बनता रहता है, उस से हमें भारी पन आता है। अगर अंतड़ियों की सफाई हो तो वह पृथ्‍वी के गुरुत्वाकर्षण के प्रति तुम्‍हें ज्‍यादा खोद देगी। योग ने पेट की सफाई पर बहुत जोर दिया है। ताकि भीतर कोई विषैला पदार्थ न बच पाए वरना वे खून में चक्‍कर काटते रहते है। और वे मस्‍तिष्‍क में घूमते रहते है। और वह व्‍यक्‍ति के आसपास एक विशेष तरह का ऊर्जा क्षेत्र निर्मित कर देते है। जो कि बोझिल, उदास और कालिमा लिए होता है।

4-जब अंतड़ियां पूरी तरह से स्‍वच्‍छ और साफ हो जाती है। तो व्‍यक्‍ति के सिर के चारों और एक प्रकार का आभा मंडल निर्मित हो जाता है। और जिन लोगों के पास भी आंखें है, वे इसे बड़ी आसानी से देख सकते है। और जब अंतड़ियां पूरी तरह से स्‍वच्‍छ और साफ हो जाती है, तो व्‍यक्‍ति को ऐसा लगता है जैसे उसको पंख लग गए हो।

5-तीसरा है समान, वह पाचन शक्‍ति और शरीर को ऊष्‍मा प्रदान करता है। अगर तीसरे की क्रियाशीलता का ज्ञान हो जाए, और इसके प्रति सजगता आ जाए कि वह कहां प्रतिष्‍ठित है, तो पाचन-क्रिया एकदम ठीक

हो जाती है।साधारणतया भोजन तो हम अधिक कर लेते है। लेकिन उसे पचा नहीं पाते। कुछ लोग है कि खाए चले जाते है। और फिर भी संतुष्ट नहीं होते। भोजन पचे या न पचे, लेकिन कुछ लोग है कि ठूस-ठूस कर खाते चले जाते है। अगर व्‍यक्‍ति समान का उपयोग करना जानता हो, तो भोजन की थोड़ी सी मात्रा भी भोजन की अधिक मात्रा की उपेक्षा अधिक ऊर्जा देगी।

6-इसीलिए योगी बिना अपने शरीर को कोई क्षति पहुँचाए कई दिन तक उपवास कर पाते है। कभी-कभी वे थोड़ा सा भोजन ले लेते है, और उस भोजन को पूरी तरह सक पचा लेते है। उसे आत्‍मसात कर लेते है। तुम्‍हारा भोजन तो पूरी तरह पच नहीं पाता है। इसीलिए आदमी का मल दूसरे जानवरों के लिए भोजन बन जाता है। और वे उसे पचा सकते है। उस मल में बहुत सा भोज्‍य-पदार्थ अभी भी शेष रह जाता है।

7-और समान के द्वारा ही शरीर को ऊष्‍मा भी मिलती है। तिब्‍बत में समान के आधार पर ही शरीर ऊष्‍मा की पूरी पद्धति विकसित कर ली है। वे एक सुनिश्‍चित ढंग से एक सुनिश्‍चित लयबद्धता में श्‍वास लेते है। जिससे समान की ऊष्‍मा निर्मित कर लेते है। वे अपने भीतर एक विशेष ढंग से कार्य कर सकें। और उससे वे काफी ऊष्‍मा निर्मित कर लेते है। वे अपने शरीर में इतनी ऊष्‍मा निर्मित कर लेते है कि चारों और बर्फ गिर रही हो और तिब्‍बती लामा पसीने से भीगा खुले आकाश के नीचे निवस्त्र खड़ा रह सकता है। अगर चारों और बर्फ ही बर्फ हो, तो साधारण आदमी तो ठंड के मारे जमने ही लगेगा। इतनी बर्फ में घर से बाहर भी निकलना संभव नहीं है।

8-तिब्‍बत में चिकित्‍सक को जो परीक्षा जी जाती है, उसमें से यह भी एक परीक्षा का ढंग है। जब तिब्‍बत में कोई चिकित्‍सक बनता है तो पहले उसे एक परीक्षा देनी होती है। जिसमें उसे अपनी शरीर अग्‍नि को निर्मित करना पड़ता है। अगर वह निर्मित नहीं कर सकता है तो उसे डाक्‍टर बनने का सर्टिफिकेट नहीं दिया जाता। वह बहुत कठिन कार्य है। संसार में कोई भी दूसरी चिकित्‍सा प्रणाली चिकित्‍सक से इतनी बड़ी उपेक्षा नहीं रखती है। यह कोई मौखिक परीक्षा ही नहीं है। यह कुछ ऐसा नहीं है कि जिसे किसी तरह से रट लिया और परीक्षा में जाकर लिख दिया।

9-व्‍यक्‍ति को सिद्ध करना होता है कि सच में उसने अपनी शरीर ऊष्‍मा पर काबू पा लिया है। क्‍योंकि फिर जीवन भर उसे अपने मरीजों की ऊष्‍मा ऊर्जा पर कार्य करना होता है। अगर उस ऊष्‍मा पर तुम्‍हारा ही पूरा अधिकार नहीं है, तो कैसे तुम दूसरों पर काम कर सकते हो? इसलिए

पूरी रात गिरती हुई बर्फ में परीक्षार्थी को बाहर खड़े रहना पड़ता है। परी रात में नौ बार परीक्षक आता है और हर बार शरीर को छूकर देखता है कि उसे पसीना आ रहा है या नहीं। अगर वह उतनी शरीर ऊष्‍मा निर्मित कर लेता है तो उस सम्‍मान का मालिक हो जाता है। वह चिकित्‍सक बन सकता है। अब उसके स्‍पर्श से रोगी को चमत्‍कारिक ढंग से ठीक कर देगा।

10-तिब्‍बत में वे चिकित्‍सक को सिखाते है कि जब रोगी के हाथ या नाड़ी को पकड़ो, तो एक खास ढंग से श्‍वास लो; केवल तभी चिकित्‍सक रोगी की श्‍वास प्रक्रिया को ठीक से जान सकेगा। और जब एक बार रोगी की श्‍वास-प्रक्रिया को चिकित्‍सक ठीक से जान लेता है तो वह रोगी की पूरी बीमारी को जान लेता है। और अब चिकित्‍सक को पता होता है कि क्‍या करना चाहिए। साधारण तो डाक्‍टर मरीज के लक्षणों की जांच करते समय स्‍वय उस स्‍थिति में नहीं जाते जिसमे रोगी है। लेकिन तिब्‍बत में—और उनकी पूरी विधि पतंजलि के योग पर आधारित है।

11-पहले तो डाक्टर को स्वयं उस विशेष आयाम में आना होता है जहां वह रोगी को अनुभव कर सके, देख सके कि रोगी की समस्या कहां है, क्या है, कैसी है -रोगी की श्वास प्रक्रिया में कहां पर बाधा है, कहा पर उसकी श्वास अवरुद्ध है, कहां पर आघात करना है, कहां सब से ज्यादा काम करना है।यही बात एक्यूपंक्चर के संबंध में भी सच है।एक्यूपंक्चर ताओवादी योग से विकसित हुआ है। भीतर ऊर्जा की, प्राण की क्रियाएं, गतियों को देखते हुए उन्हें यह ज्ञात हो गया कि शरीर में सात सौ बिंदु हैं। जो कि ऊर्जा बिंदु हैं, और उन बिंदुओं पर दबाव डालने भर से शरीर का पूरा ऊर्जा क्षेत्र परिवर्तित और रूपांतरित हो सकता है।

12-जब तुम्हारे सिर में दर्द हो तो एक्यूपंक्चर करने वाला चिकित्सक शायद तुम्हारा सिर न छू पाए; उसकी कोई जरूरत भी नहीं। वह कहीं और छुएगा, क्योंकि शरीर की ऊर्जा विपरीत ध्रुवता में, ऋणात्मक और धनात्मक में अस्तित्व रखती है। अगर तुम्हारे सिर में दर्द है तो कहीं दूसरी जगह, कहीं विपरीत ध्रुव पर वह बिंदु को खोजकर उसे सुई से भेद देगा।एक्यूप्रेशर में सुई से भेदने की भी जरूरत नहीं होती है। अपने अंगूठे का थोड़ा सा दबाव और सिर का दर्द गायब हो जाता है। और यह चमत्कार है कि ऐसा होता कैसे है? सुई को चुभाने से या हाथ के अंगूठे से दबाने से पूरा ऊर्जा क्षेत्र रूपांतरित हो जाता है। दूसरी जगह पर उसे दबाने से ऊर्जा का प्रवाह जो कि अवरुद्ध हो गया था, वापस प्रारंभ हो जाता है, अब व्यक्ति के पास एक अलग ही ऊर्जा होती है। 13-रूस में एक नए ढंग की फोटोग्राफी खोज ली गई है क्रिलियान फोटोग्राफी। और वे सात सौ बिंदु उस फोटोग्राफी द्वारा उतारे चित्रों से देखने संभव हैं। और ठीक उन्हीं सात सौ बिंदुओं को बिना किसी माध्यम के, बिना किसी फोटोग्राफी के, बिना किसी कैमरे के ताओवादी योगियों ने जाना। उन्हें इन बिंदुओं का पता अपने ही भीतर उतरने पर चला।

14-चौथा है उदान, वाणी और संप्रेषण। जब तुम बोलते हो, तो चौथे प्रकार के प्राण का उपयोग करते हो। और इस प्राण को प्रशिक्षित किया जा सकता है। अगर यह प्राण प्रशिक्षित कर लिया जाए तो व्‍यक्‍ति के बोलने में, भाषण देने में, गीत गाने में एक तरह का सम्‍मोहन होगा।तब वाणी में एक तरह सम्‍मोहन होगा। तब बस, आवाज को सून कर ही चुंबक की तरह

खींचे चले आते है।और ठीक ऐसा ही संप्रेषण के साथ भी होता है। जिन लोगों को संप्रेषण करना कठिन होता है—और बहुत से लोग है जो इसी कठिनाई में है कि दूसरे व्‍यक्‍ति के साथ कैसे संबंधित हों, दूसरे के साथ कैसे खुल सकें , कैसे बात चीत करें, कैसे प्रेम करे, कैसे मैत्री बनाए, कैसे दूसरे के साथ कम्‍यूनिकेट करें, उन सभी की उदान को लेकर ही कोई न कोई कठिनाई है।

15-वे नहीं जानते कि इस प्राण ऊर्जा का उपयोग कैसे करना है। जो कि व्‍यक्‍ति को प्रवाहमान बनाती है।और ऊर्जा को खोल देती है, तब आसानी से दूसरे के साथ संप्रेषण हो सकता है। दूसरे तक पहुंचना हो सकता है। और तब फिर कहीं कोई अवरोध नहीं रहता।उदना उर्जा-प्रवाहिनी को सिद्ध करने से योगी पृथ्‍वी से ऊपर उठ पाता है। और किसी आधार किसी संपर्क के बिना पानी, कीचड़, कांटों को पार कर लेता है।अगर व्‍यक्‍ति स्‍वयं के साथ समस्‍वरता पा लेता है और उदना के नाम से पहचाने जाने वाले प्राण को सिद्ध कर लेता है तो वह हवा में ऊपर उठ सकता है। क्‍योंकि यह उदना ही है जो व्‍यक्‍ति को गुरुत्वाकर्षण के साथ जोड़ कर रखती है।

16-तुम आकाश में पक्षियों को, बड़े-बड़े पक्षियों को उड़ते हुए देखते हो। अभी भी वैज्ञानिकों के लिए यह एक रहस्‍य ही बना हुआ है कि पक्षी इतनी भार के साथ कैसे उड़ते है। ये पक्षी प्रकृति की और से ही उदना के बारे में जानते है। इसलिए उनके लिए उड़ना सहज और स्वभाविक होता है। वह एक विशेष ढंग विशेष श्‍वास लेते है। अगर तुम भी उसी ढंग से श्‍वास को ले सको तो तुम पाओगे कि तुम्‍हारा संबंध गुरुत्वाकर्षण से टूट गया है। गुरुत्वाकर्षण के साथ जो व्‍यक्‍ति का संबंध है।वह उसके अंतर-अस्‍तित्‍व से ही है। वह उसके भीतर से ही है। इसलिए इसे तोड़ा भी नहीं जा सकता है।

17-और पांचवी है, व्‍यान, समन्‍वय और संघटन।पांचवी व्‍यक्‍ति को संघटित रखती है। जब पाँचवीं शरीर को छोड़ देती है। तो व्‍यक्‍ति की मृत्‍यु हो जाती है। तब शरीर विघटित होना शुरू