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क्या साधक ध्यान में अपनी रीढ़ में ऊर्ध्वगमन करती कुंडलिनी शक्ति को अनुभव करता है ?


क्या है ध्यान में अपनी रीढ़ में ऊर्ध्वगमन करती कुंडलिनी शक्ति के अनुभव का रहस्य ?-

20 FACTS;-

1-कुंडलिनी शक्ति कहते हैं– ऊर्ध्व-गमन करती हुई तुम्हारी काम-ऊर्जा।अगर तुम्हारी शक्ति ऊर्ध्व गमन करती है तुम्हारी कुंडलिनी शक्ति को जगाती और मस्तिष्क की ओर गति करती है तो तुम्हें साधारण काम-संवेग नहीं हो सकता। और अगर कोशिश करोगे, तो तुम्हारे भीतर एक गहन संघर्ष पैदा हो जाएगा; क्योंकि ऊर्जा ऊर्ध्वगमन कर रही और तुम बलपूर्वक उसे नीचे की ओर ले जाने की कोशिश कर रहे हो।भोग में वह नीचे की ओर गमन करती है। योग कहेगा ”ब्रह्मचारी बनो, क्योंकि अगर तुम दोनों एक साथ कर रहे हो तुम अपनी शरीर-व्यवस्था में सब गड़बड़ कर रहे हो।

2-एक तरफ तो तुम ऊर्जा को ऊपर उठा रहे हो और दूसरी तरफ तुम नीचे खींच रहे हो सब गड़बड़ हो जाएगा। इसीलिए योग विधियां काम-विरोधी हैं।”लेकिन तंत्र काम-विरोधी नहीं है क्योंकि तंत्र में एक भिन्न प्रकार का काम-संवेग है घाटी-काम-संवेग, जो तुम्हारा सहयोगी हो सकता है। कोई अव्यवस्था नहीं कोई संघर्ष नहीं। उलटे वह तुम्हारी मदद करेगा। अगर तुम पलायन कर रहे हो–अगर तुम पुरुष हो और स्त्री से भाग रहे हो या अगर तुम स्त्री हो और पुरुष से बच रही हो–तुम कुछ भी करो मन में दूसरा तो बना ही रहता है और तुम्हें नीचे की ओर खींचने में लगा रहता है। यह विरोधभासी लगता है पर सत्य है। उसे महसूस करो। इसके प्रति सचेत रहो और इसे तनाव मत बना लेना।

3-तीव्र श्वास और कुंडलिनी का संबंध:

असल में, श्वास से ही हमारी आत्मा और शरीर का जोड़ है, श्वास सेतु है। इसलिए श्वास गई कि प्राण गए। मस्तिष्क चला जाए तो चलेगा, आंखें चली जाएं तो चलेगा, हाथ-पैर कट जाएं तो चलेगा। श्वास कट गई कि गए; श्वास से जोड़ है हमारी आत्मा और शरीर का। और आत्मा और शरीर के मिलन का जो बिंदु है, वहीं कुंडलिनी है -उसी बिंदु पर! वहीं वह शक्ति है जिसको कुंडलिनी कहते हैं। नाम कुछ भी दिया जा सकता है। वह ऊर्जा वहीं है।और इसलिए कुंडलिनी ऊर्जा के दो रूप हैं।अगर वह कुंडलिनी की ऊर्जा शरीर की तरफ बहे, तो

काम-शक्ति बन जाती है और अगर वह ऊर्जा आत्मा की तरफ बहे, तो वह कुंडलिनी बन जाती है, या कोई और नाम दें। शरीर की तरफ बहने से वह अधोगामी हो जाती है और आत्मा की तरफ बहने से ऊर्ध्वगामी हो जाती है। पर जिस जगह वह है, उस जगह पर चोट श्वास से पड़ती है।

4- श्वास और वासना का घनिष्ठ संबंध...इसलिए कामातुर होते ही चित्त श्वास को तेज कर लेगा, क्योंकि उस बिंदु पर चोट श्वास करेगी तभी वहां से काम -शक्ति बहनी शुरू होगी। श्वास की चोट के बिना काम -कृत्य भी असंभव है और श्वास की चोट के बिना समाधि भी असंभव है। समाधि उसके ऊर्ध्वगामी बिंदु का नाम है और काम -कृत्य उसके अधोगामी बिंदु का नाम है। पर श्वास की चोट तो दोनों पर पडेगी।तो अगर चित्त काम से भरा हो, तब श्वास को धीमा

करना, श्वास को शिथिल करना। जब चित्त में कामवासना घेरे, या क्रोध घेरे, या और कोई वासना घेरे, तो श्वास को शिथिल करना और कम करना और धीमी लेना। तो काम और क्रोध दोनों विदा हो जाएंगे, टिक नहीं सकते; क्योंकि जो ऊर्जा उनको चाहिए वह श्वास की बिना चोट पड़े नहीं मिल सकती।

5-इसलिए श्वास को धीमे लेकर कोई आदमी क्रोध नहीं कर सकता। और करे तो वह चमत्कार है , साधारण घटना नहीं है। श्वास धीमी हुई कि क्रोध गया ;श्वास शांत हुई कि कामोत्तेजना

गई।तो जब कामोत्तेजित हो या मन क्रोध से भरे , तब श्वास को धीमी रखना, और जब ध्यान की अभीप्सा से भरे मन, तो श्वास की तीव्र चोट करना। क्योंकि जब ध्यान की अभीप्सा भीतर हो और श्वास की चोट पड़े, तो जो ऊर्जा है वह ध्यान की यात्रा पर निकलनी शुरू हो जाती है।

6-तीव्र श्वास की चोट से शक्ति जागरण..

तो कुंडलिनी पर गहरी श्वास का बहुत परिणाम है। प्राणायाम अकारण ही नहीं खोज लिया गया था। वह बहुत लंबे प्रयोग और अनुभवों से शात होना शुरू हुआ कि श्वास की चोट से बहुत कुछ किया जा सकता है; श्वास का आघात बहुत कुछ कर सकता है। और यह आघात जितना तीव्र हो, उतनी त्वरित गति होगी। और हम सब साधारणजनों में, जिनकी कुंडलिनी जन्मों -जन्मों से सोई है, उसको बड़े तीव्र आघात की जरूरत है; घने आघात की जरूरत है; सारी शक्ति इकट्ठी करके आघात करने की जरूरत है।तो श्वास से तो कुंडलिनी पर चोट पड़नी

शुरू होती है,मूल केंद्र पर चोट पड़नी शुरू होती है। और जैसे-जैसे तुम्हें अनुभव होना शुरू होगा, तुम बिलकुल आंख बंद करके देख पाओगे कि श्वास की चोट कहां पड़ रही है।

7-इसलिए अक्सर ऐसा हो जाएगा कि जब श्वास की तेज चोट पड़ेगी तो बहुत बार कामोत्तेजना भी हो सकती है। वह इसलिए हो सकती है कि तुम्हारे शरीर का श्वास तेज पड़ने का एक ही अनुभव है,और उस ऊर्जा पर चोट पड़ने का एक ही अनुभव है— काम का। तो जो अनुभव है उस लीक पर शरीर फौरन काम करना शुरू कर देता है। इसलिए बहुत साधकों को, साधिकाओं को एकदम तत्काल काम- केंद्र पर चोट पड़नी शुरू हो जाती है।श्वास तो गहरा परिणाम लानेवाली है, कुंडलिनी के लिए।

8-जागी हुई कुंडलिनी से चक्र सक्रिय...

और सारे चक्र कुंडलिनी के यात्रा-पथ के स्टेशन समझो; जहां-जहां से कुंडलिनी होकर गुजरेगी, वे स्थान। ऐसे तो बहुत स्थान हैं, इसलिए कोई कितने ही चक्र गिन सकता है, लेकिन बहुत मोटे विभाजन करें तो जहां कुंडलिनी थोड़ी देर ठहरेगी, विश्राम करेगी, वे स्थान हैं।

तो सब चक्रों पर परिणाम होगा। और जिस व्यक्ति का जो चक्र सर्वाधिक सक्रिय है, उस पर सबसे पहले परिणाम होगा। जैसे कि अगर कोई व्यक्ति मस्तिष्क से ही दिन-रात काम करता है, तो तेज श्वास के बाद उसका सिर एकदम भारी हो जाएगा। क्योंकि उसका जो मस्तिष्क का चक्र है, वह सक्रिय चक्र है। श्वास का पहला आघात सक्रिय चक्र पर पड़ेगा। उसका सिर एकदम भारी हो जाएगा।

9-कामुक व्यक्ति है तो उसकी कामोत्तेजना बढ़ जाएगी; बहुत प्रेमी व्यक्ति है तो उसका प्रेम बढ़ जाएगा; भावुक व्यक्ति है तो भावना बढ़ जाएगी। उसका जो अपने व्यक्तित्व का केंद्र बहुत सक्रिय है, पहले उस पर चोट होनी शुरू हो जाएगी।लेकिन तत्काल दूसरे केंद्रों पर भी

चोट शुरू होगी। और इसलिए व्यक्तित्व में रूपांतरण भी तत्काल अनुभव होना शुरू हो जाएगा कि मैं बदल रहा हूं ।जब दूसरा चक्र हमारे भीतर खुलता है तो हमें लगता है कि हमारा व्यक्तित्व गया; अब हम वह आदमी नहीं हैं जो कल तक थे।तो तुम्हारे जिन-जिन केंद्रों

पर चोट होगी, वहां-वहां से व्यक्तित्व का नया आविर्भाव होगा। और जब सारे केंद्र एक साथ सक्रिय होते हैं , उसका मतलब है कि तब पहली दफे तुम अपने पूरे व्यक्तित्व में जीते हो। हममें से कोई भी अपने पूर व्यक्तित्व में साधारणत: नहीं जीता। और हमारे ऊपर के केंद्र तो अछूते रह जाते हैं। तो श्वास से इन केंद्रों पर भी चोट पड़ेगी।

10-चोट करने के विभिन्न उपाय..

श्वास फिजियोलाजिकल चोट है, और ‘ मैं कौन हूं यह मेंटल चोट है। यह तुम्हारी माइंड एनर्जी से चोट पहुंचाना है, और वह तुम्हारी बॉडी एनर्जी से चोट पहुंचाना है। और अगर ये दोनों चोट पूरे जोर से पड़ जाएं.. तो तुम्हारे पास सामान्यतया दो ही रास्ते हैं ..वहां तक चोट पहुंचाने के । और तरकीबें भी हैं, लेकिन वे जरा उलझी हुई हैं।जब तुम श्वास गहरी लेते हो; और जब तुम पूछते हो, ‘ मैं कौन हूं?’ तब यह मेंटल है। और अगर तुम एक ऐसे व्यक्ति के पास बैठे हो, जिससे कि तुम्हारे सूक्ष्म शरीर/एस्ट्रल को चोट पहुंच सके, तो एक तीसरी यात्रा शुरू हो जाती

है। पर तुम्हारे पास साधारणत: दो सीधे उपाय हैं शरीर का और मन का। तो ‘ मैं कौन हूं ‘ गहरी चोट करेगा, श्वास से भी गहरी करेगा। श्वास से इसलिए हम शुरू करते हैं कि वह शरीर की है; उसे करने में ज्यादा कठिनाई नहीं है। ‘मैं कौन हूं’ थोड़ा कठिन है, क्योंकि मन का है। 11-शरीर से शुरू करते हैं और जब शरीर पूरी तरह से वाइब्रेट होने लगता है, तब तुम्हारा मन भी इस योग्य हो जाता है कि पूछने लगे। फिर पूछने की एक ठीक सिचुएशन चाहिए।

सब सवालों के लिए भी ठीक स्थितियां चाहिए, जब वे पूछे जा सकते हैं। जैसे कि जब तुम्हारा पूरा शरीर कंपने लगता है और डोलने लगता है, तब तुम्हें खुद ही सवाल उठता है कि यह हो क्या रहा है? यह मैं कर रहा हूं? यह मैं तो नहीं कर रहा हूं-यह सिर मैं नहीं घुमा रहा हूं; यह पैर मैं नहीं उठा रहा हूं यह नाचना मैं नहीं कर रहा हूं-लेकिन यह हो रहा है। और अगर यह हो रहा है तो तुम्हारी जो सदा की आइडेंटिटी है कि' यह शरीर मैं हूं' वह ढीली पड़ गई। अब तुम्हारे सामने एक नया सवाल उठ रहा है कि फिर मैं कौन हूं? अगर यह शरीर कर रहा है और मैं नहीं कर रहा, तो अब एक नया सवाल है कि कर कौन रहा है? फिर तुम कौन हो अब?-तो यह ठीक सिचुएशन है जब तुम्हारा ‘ मैं कौन हूं’ का प्रश्न गहरा उतर सकता है।

12 -कुंडलिनी जागरण पर अतींद्रिय अनुभव....

इन दोनों की चोट से कुंडलिनी जगेंगी। और उसका जागरण जब होगा तो अनूठे अनुभव शुरू हो जाएंगे। क्योंकि उस कुंडलिनी के साथ तुम्हारे समस्त जन्मों के अनुभव जुड़े हुए हैं— जब तुम वृक्ष थे, तब के भी, और जब तुम मछली थे, तब के भी, और जब तुम पक्षी थे, तब के भी। तुम्हारे अनंत-अनंत योनियों के अनुभव उस पूरे यात्रा-पथ पर पड़े हैं। तुम्हारी उस कुंडल

शक्ति ने उन सब को आत्मसात किया है।इसलिए बहुत तरह की घटनाएं घट सकती हैं। उन अनुभवों के साथ तादात्म्य जुड़ सकता है।और इतने सूक्ष्म अनुभव तुममें जुड़े हैं….. .

13-अपनी किसी जीवन -यात्रा में तुम कभी वृक्ष भी रहे हो। और अगर कुंडलिनी उस अनुभूति के पास पहुंचेगी,जहां वह संगृहीत है, तो तुम अचानक पाओगे कि वर्षा हो रही है और तुम वह जान रहे हो जो वृक्ष जान रहा है। तब तुम बहुत घबड़ा जाओगे कि यह क्या हो रहा है! तब तुम समझ पाओगे कि जो सागर अनुभव कर रहा है , जो हवाएं अनुभव कर रही हैं वह तुम अनुभव कर पाओगे। इसलिए तुम्हारी एस्थेटिक की न मालूम कितनी संभावनाएं खुल जाएंगी जो तुम्हें कभी भी खयाल में नहीं थीं ।

14-जैसे कि गोगा ,गुरुगोरखनाथ के परमशिष्य; का एक चित्र है ...एक वृक्ष है और आकाश को छू रहा है! तारे नीचे रह गए हैं और वृक्ष बढ़ता ही चला जा रहा है! चांद नीचे पड़ गया है, सूरज नीचे पड़ गया है, छोटे-छोटे रह गए हैं, और वृक्ष ऊपर चलता जा रहा है। तो किसी ने कहा कि तुम पागल हो गए हो! वृक्ष कहीं ऐसे होते हैं? चांद-तारे नीचे पड़ गए हैं और वृक्ष ऊपर चला जा रहा है! तो गोगा ने कहा कि तुमने कभी वृक्ष को जाना ही नहीं, तुमने कभी वृक्ष के भीतर नहीं देखा। मैं उसको भीतर से जानता हूं। नहीं बढ़ पाता चांद—तारों के पार, यह बात दूसरी है, बढ़ना तो चाहता है ,अभीप्सा तो यही है। उसने कहा, मैं तो कभी सोच ही नहीं सकता.. मजबूरी है।,लेकिन भीतर प्राण तो सब चांद-तारे पार करते चले जाते हैं।

15-तो गोगा कहते थे कि वृक्ष जो है वह पृथ्वी की आकांक्षा /डिजायर है.. आकाश को छूने की।पृथ्वी अपने हाथ-पैर बढ़ा रही है आकाश को छूने के लिए। पर वैसा सब नही देख पाएंगे।और जो हम रहे हैं, वह तो अनुभव में आएगा;कल जो हम हो सकते हैं , उसकी संभावनाएं

भी आनी शुरू हो जाएंगी।और तब कुंडलिनी के यात्रा-पथ पर प्रवेश करने के बाद हमारी कहानी एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, समस्त चेतना/ कांशसनेस की कहानी हो जाती है। तब तुम अकेले नहीं हो , और तुममें अनंत हैं । एक बीज जो खुलता ही जा रहा है और मेनिफेस्ट होता चला जा रहा है, और जिसका कोई अंत नहीं दिखाई पड़ता। और जब इस तरह ओर—छोर हीन तुम अपने विस्तार को देखोगे-पीछे अनंत और आगे अनंत-तब स्थिति और हो जाएगी; तब सब बदल जाता है। और वे सब के सब कुंडलिनी पर छिपे हैं।

16-बहुत से रंग खुल जाएंगे जो तुमने कभी नहीं देखे। असल में, इतने रंग बाहर नहीं हैं जितने रंग तुम्हारे भीतर तुम्हें अनुभव में आ सकते हैं। क्योंकि वे रंग तुमने कभी जाने हैं, और तरह से जाने हैं। जब एक चील आकाश के ऊपर मंडराती है तो रंगों को और ढंग से देखती है; हम और ढंग से देखते हैं। अभी तुम जाओगे वृक्षों के पास से तो तुम्हें सिर्फ हरा रंग दिखाई पड़ता है; लेकिन जब एक चित्रकार जाता है तो उसे हजार तरह के हरे रंग दिखाई पड़ते हैं।हमको तो सिर्फ हरा रंग दिखाई पड़ता है। हरा रंग, बात खतम हो गई। एक मोटी धारणा है हमारी, बात खतम हो गई। हरा रंग एक रंग नहीं है, हरा रंग हजार रंग हैं—हर रंग में हजार रंग हैं। और जितनी उसकी बारीक से.. ….जब तुम भीतर प्रवेश करोगे तो वहां तुमने हजारों बारीक अनुभव किए हैं।

17-सूक्ष्म अनुभवों का लोक...

मनुष्य इंद्रियों की दृष्टि से बहुत कमजोर प्राणी है, सारे पशु-पक्षी बहुत शक्तिशाली हैं; उनकी अनुभूति और उनके अनुभव की गहराइयां—ऊंचाइयां बहुत हैं। कमी है कि उनको सबको पकड़कर वे चेतन में विचार नहीं कर पाते। लेकिन उनकी अनुभूतियां , उनके संवेदन बहुत

गहरे हैं।अब जापान में एक चिड़िया है— आम चिड़िया— जो भूकंप के चौबीस घंटे पहले गांव छोड़ देगी। बस वह चिड़िया नहीं दिखाई पड़ेगी गांव में, समझो कि चौबीस घंटे के भीतर भूकंप आया। अभी हमारे पास जो यंत्र हैं, वे भी छह घंटे के पहले नहीं खबर दे पाते। और फिर भी बहुत सुनिश्चित नहीं है वह खबर। लेकिन उस चिड़िया का मामला तो सुनिश्चित है। और इतनी आम चिड़िया है कि गांव भर को पता चल जाए कि चिड़िया आज दिखाई नहीं पड़ रही, तो चौबीस घंटे के भीतर भूकंप पड़नेवाला है। उसका मतलब है कि भूकंप से पैदा होनेवाले अतिसूक्ष्म वाइब्रेशंस उस चिड़िया को किसी न किसी तल पर अनुभव होते हैं; वह गांव छोड़ देती है।

18-अब तुम कभी अगर यह चिड़िया रहे हो, तो तुम्हारी कुंडलिनी के यात्रा-पथ पर तुम्हें ऐसे वाइब्रेशंस होने लगेंगे जो तुम्हें कभी नहीं हुए। मगर तुम्हें कभी हुए हैं, तुम्हें पता नहीं हैं।

तुम्हें ऐसे रंग दिखाई पड़ने लगेंगे जो तुमने कभी नहीं देखे हैं; तुम्हें ऐसी ध्वनियां सुनाई पड़ने लगेंगी, जिसको कबीर कहते हैं 'नाद'। कबीर कहते हैं, अमृत बरस रहा है, साधुओं, नाचो! तो वे साधु पूछते हैं, कहां अमृत बरस रहा है? और वह अमृत कहीं बाहर नहीं बरस रहा है। और कबीर कहते हैं, सुना? नाद बज रहे हैं, बड़े नगाड़े बज रहे हैं। पर साधु पूछते हैं, कहां बज रहे हैं? और कबीर कहते हैं, तुम्हें सुनाई नहीं पड़ रहे?

19-अब वह कबीर को जो सुनाई पड़ रहा है, वे नाद तुम्हें सुनाई पड़ेंगे, ध्वनियां सुनाई पड़ेगी। ऐसे स्वाद आने शुरू होंगे जो तुम्हें कभी कल्पना में नहीं कि ये स्वाद हो सकते हैं।

तो सूक्ष्म अनुभूतियों का बड़ा लोक कुंडलिनी के साथ जुड़ा है, वह सब जग जाएगा, और सब तरफ से तुम पर हमला बोल देगा। और इसलिए अक्सर ऐसी स्थिति में आदमी पागल मालूम पड़ने लगता है। क्योंकि जब हम सब गंभीर बैठेते है ;तब वह हंसने लगता है, क्योंकि उसे कुछ दिखाई पड़ रहा है जो हमें दिखाई नहीं पड़ रहा; कि जब हम सब हंस रहे थे तब वह रोने लगता है, क्योंकि कुछ उसे हो रहा है जो हमें नहीं हो रहा।

20-शक्तिपात से ऊर्जा का नियंत्रित अवतरण...

10 POINTS;-

1-सामान्य मनुष्य के पास चोट करने के दो उपाय हैं, और असामान्य रूप से जिसको शक्तिपात कहें, वह तीसरा उपाय है; वह एस्ट्रल है। उसमें कोई माध्यम चाहिए। उसमें दूसरा व्यक्ति सहयोगी हो, तो तुम्हारे भीतर तीव्रता बढ़ जा सकती है। और उस स्थिति में दूसरा व्यक्ति कुछ करता नहीं, सिर्फ उसकी मौजूदगी काफी है। वह सिर्फ एक मीडियम बन जाता है। अनंत शक्ति चारों तरफ पड़ी हुई है। अब जैसे कि हम घर के ऊपर लोहे की सलाख लगाए हुए हैं कि बिजली गिरे तो घर के नीचे चली जाए। सलाख न हो तब भी बिजली गिर सकती है, तब पूरे घर को तोड़ जाएगी। लेकिन सलाख अभी हमको खयाल में आई है, बिजली बहुत पहले से गिरती रही है; बिजली का शक्तिपात बहुत दिनों से हो रहा है।

2-तो मनुष्य के चारों तरफ अनंत शक्तियां हैं , उसके आध्यात्मिक विकास में उनका भी उपयोग किया जा सकता है ।लेकिन कोई माध्यम हो। तुम खुद भी माध्यम बन सकते हो। लेकिन प्राथमिक रूप से माध्यम बनना खतरनाक हो सकता है। क्योंकि इतना बड़ा शक्तिपात हो सकता है कि तुम उसे न झेल पाओ, क्योंकि शक्ति का एक वोल्टेज है, और वह तुम्हारे सहने की क्षमता के अनुकूल होना चाहिए। तो दूसरे व्यक्ति के माध्यम से तुम्हारे अनुकूल बनाने की सुविधा हो जाती है कि अगर एक दूसरा व्यक्ति उन शक्तियों का तुम्हारे ऊपर अवतरण कराना चाहता है, तो उस पर अवतरण हो चुका है, तभी। तब वह उतनी धारा में तुम तक पहुंचा सकता है जितनी धारा में तुम्हें जरूरत है।और इसके लिए कुछ भी नहीं करना होता है; इसके लिए सिर्फ मौजूदगी जरूरी है बस।

3-शक्ति जागरण और शक्तिपात में अंतर..

वह वह कुछ करता नहीं है सिर्फ एक कैटेलेटिक एजेंट की तरह काम करता है।। इसलिए कोई अगर कहता हो कि मैं शक्तिपात करता हूं तो वह गलत कहता है । लेकिन हां, किसी की

मौजूदगी में शक्तिपात हो सकता है।इसमें कोई कठिनाई नहीं है। किसी को करने की कोई जरूरत नहीं है, वह होने लगेगा। बस तुम अचानक पाओगे कि तुम्हारे भीतर कुछ और तरह की शक्ति प्रवेश कर गई है जो कहीं बाहर से आ गई है, जिसका कि तुम.. .तुम्हारे भीतर से

नहीं आई।तुम्हें कुंडलिनी का जब भी अनुभव होगा, तो तुम्हारे भीतर से उठता हुआ मालूम होगा; और जब तुम्हें शक्तिपात का अनुभव होगा, तो तुम्हारे बाहर से, ऊपर से आता हुआ मालूम होगा। यह इतना ही साफ होगा, जैसा कि ऊपर से आपके पानी गिरे और नीचे से पानी बढ़े-नदी में खड़े हैं और पानी बढ़ता जा रहा है, और नीचे से पानी ऊपर की तरफ आता जा रहा है, और आप डूब रहे हो।

4-तो कुंडलिनी का अनुभव सदा डूबने का होगा-नीचे से कुछ बढ़ रहा है और तुम उसमें डूबे जा रहे हो, कुछ तुम्हें घेरे ले रहा है। लेकिन शक्तिपात का जब भी तुम्हें अनुभव होगा तो वर्षा का होगा। वह जो कबीर कह रहे हैं कि अमृत बरस रहा है, साधुओ! पर वे साधु पूछते हैं, कहां बरस रहा है? वह ऊपर से गिरने का होगा। और तुम उसमें भीगे जा रहे हो। और ये दोनों अगर एक साथ हो सकें तो गति बहुत तीव्र हो जाती है- ऊपर से वर्षा हो रही है और नीचे से नदी बढ़ी जा रही है। इधर नदी का पूर आता है, इधर वर्षा बढ़ती जा रही है— और दोनों तरफ से तुम डूबे जा रहे हो और मिटे जा रहे हो। यह दोनों तरफ से हो सकता है, इसमें कोई कठिनाई नहीं है।

5-शक्तिपात निजी संपदा नहीं है...

शक्तिपात जो है, वह सिर्फ सहयोगी हो सकता है,कभी भी मूल नहीं बन सकता। तुम्हारे भीतर जो रहा है वही मूल बनेगा।तुम्हारी असली संपत्ति वही है। शक्तिपात से तुम्हारी संपत्ति नहीं बढ़ेगी,लेकिन तुम्हारी संपत्ति के बढ़ने की जो गति है,फैलाव की जो गति है, वह तीव्र हो जाएगी।इस फर्क को ठीक से समझना है । दीर्घकालीन तो तुम्हारे भीतर जो उठ रहा है

उसका ही होगा। इसलिए शक्तिपात तुम्हारी संपदा नहीं है।

6-शक्तिपात से अंतर्यात्रा में प्रोत्साहन:

एक दफा तुम्हें अनुभव हो जाए, बिजली चमक जाए .. .बिजली चमकने से तुम्हें कोई रास्ता प्रकाशित नहीं हो जाता; हाथ में दीया नहीं बन जाता है ;सिर्फ एक झलक मिल जाती हैं। लेकिन झलक बड़ी कीमत की हो जाती है-तुम्हारे पैर मजबूत हो जाते हैं, इच्छा प्रबल हो जाती है, पहुंचने की कामना तय हो जाती है, रास्ता दिखाई पड़ जाता हैं - तुम यूं ही अंधेरे में नहीं भटक रहे हो। सिर्फ एक बिजली की झलक में तुम्हें रास्ता दिख जाता है, दूर मंदिर दिख जाता

है.. तुम्हारी मंजिल का।फिर बिजली खो गई, फिर घुप्प अंधेरा हो गया, लेकिन अब तुम दूसरे आदमी हो। वहीं खड़े हो जहां थे, लेकिन दौड़ तुम्हारी बढ़ जाएगी। मंजिल पास है, रास्ता साफ है-अंधेरे में न भी दिखाई पड़ता हो , तो भी है। अब तुम आश्वस्त हो। तुम्हारा आश्वासन बढ़ जाता है। और तुम्हारे आश्वासन का बढ़ना तुम्हारे संकल्प को बढ़ा देता है।

7-तो इनडायरेक्ट परिणाम हैं। और इसलिए बार -बार जरूरत पड़ती है, एक बार से हल नहीं होता। बिजली दुबारा चमक जाए तो और फायदा होगा, तिबारा चमक जाए तो और फायदा होगा। पहली बार कुछ चूक गया होगा, न दिखाई पड़ा होगा, दूसरी बार दिख जाए, तीसरी बार दिख जाए! और इतना तो है कि आश्वासन गहरा होता जाएगा।तो शक्तिपात सेअंतिम परिणाम हल नहीं होता, अंतिम परिणाम तक तुम्हें पहुंचना है। और शक्तिपात के बिना भी पहुंच सकोगे। थोड़ी देर -अबेर होगी, इससे ज्यादा कुछ होना नहीं है।अंधेरे में आश्वासन कम होगा, चलने में ज्यादा हिम्मत जुटानी पड़ेगी, ज्यादा बल लगाना पड़ेगा - भय पकड़ेगा, संकल्प -विकल्प पकड़ेंगे; पता नहीं, रास्ता है या नहीं- यह सब होगा, लेकिन फिर भी पहुंच जाओगे।लेकिन शक्तिपात सहयोगी बन सकता है। 8-जब कभी कोई सदगुरु अपने किसी शिष्य की मदद करना चाहता है, उसके ऊर्जा के प्रवाह को, मार्ग को निर्बाध करना चाहता है —अगर शिष्य की ऊर्जा का प्रवाह अवरुद्ध हो गया है—तो सदगुरु उस पर उतर आता है, उस पर छा जाता है। और सदगुरु की विराट ऊर्जा, जो शुद्ध और असीम होती है, शिष्य की ऊर्जा में प्रवाहित होने लगती है। और शिष्य की ऊर्जा जो अवरुद्ध हो गई थी, वह फिर से प्रवाहित होने लगती है। तब शिष्य की ऊर्जा अपने से गतिमान होने लगती है। यही है शक्तिपीत की. संपूर्ण कला। अगर शिष्य सच में सद्गुरु के प्रति समर्पित हो, तो सदगुरु शिष्य पर छा जाता है, उसे अपनी ऊर्जा से चारों ओर से .घेर लेता है, उस पर आविष्ट हो जाता है। 9-और अगर एक बार शिष्य में सदगुरु की ऊर्जा प्रवाहित हो जाती है, सदगुरु के ’प्राण’ शिष्य के आसपास छा जाते हैं, शिष्य में उतर आते हैं, तो फिर शिष्य की यात्रा बहुत आसान हो जाती है। जो काम वह वर्षों में नहीं कर सकता, जिस काम को करने में उसे कई वर्ष लग जाएंगे, क्योंकि काम कठिन है, मार्ग में बहुत से अवरोध हैं, बहुत सी बाधाएं हैं; वे कई —कई जन्मों से एकत्रित होती जा रही हैं; और ऊर्जा बहुत ही अल्प है, थोड़ी सी बूंदें ही हैं। वे ऊर्जा की बूंदें इस विराट रेगिस्तान में फिर -फिर खो जाती हैं। वह ऊर्जा बार-बार अवरुद्ध हो जाती है। लेकिन अगर सदगुरु शिष्य में निर्झर की तरह प्रवेश कर जाए, तो बहुत सी चीजें अपने से ही बह जाती हैं। और जब सदगुरु शिष्य से बाहर आ जाता है, तो शिष्य एकदम बदल जाता है। फिर शिष्य का थोड़ा सा प्रयास, और वह बुद्धत्व को उपलब्ध हो सकता है। 10-ऐसी कुछ विधियां हैं ’ उन विधियों को सिद्धों की विधियां कहा जाता है। वे अपने शिष्यों को किसी विशेष विधि पर कार्य नहीं करने देते हैं। सिद्ध शिष्य को केवल अपने निकट बैठने और प्रतीक्षा करने के लिए कहते हैं। उनका भरोसा सत्संग में होता है।और यह बहुत ही अदभुत और शक्तिशाली विधि है, लेकिन सत्संग के लिए श्रद्धा और समर्पण की आवश्यकता होती है। अगर थोड़ा सा भी, रंच मात्र भी संशय भीतर है तो सत्संग नहीं हो सकता। उसके लिए व्यक्ति को पूरी तरह से खुला हुआ और ग्राहक होना चाहिए। व्यक्ति को चंद्र-भाव में होना चाहिए, केवल तभी सदगुरु अपना कार्य कर सकता है।

...SHIVOHAM...

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