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तंत्र का केंद्रीय विषय क्या है?


तंत्र क्यों महत्वपूर्ण है?

14 FACTS;-

1-भारत में वैदिक, वैष्णव, शैव, शाक्त, स्मार्त संप्रदाय हैं… लेकिन हिंदू संत समाज मुख्यत दो भागों में विभाजित है वैष्णव और शैव… और इस विभाजन का कारण आस्था और साधना पद्धतियाँ हैं, लेकिन दोनों ही सम्प्रदाय वेद और वेदांत पर एकमत है।हमारे तीन शरीर है-स्थूल,सूक्ष्म और कारण ।हमारा स्थूल शरीर ब्रह्मा है। कारण श्री विष्णु है और सूक्ष्म शरीर शिव।वैष्णव पद्धति हमें स्थूल शरीर का ज्ञान देती है और शैव पद्धति सूक्ष्म का।कोई स्थूल

शरीर के ज्ञान में फँस गया तो कोई सूक्ष्म शरीर के ज्ञान में में फँस गया। दोनों ही अधूरे हो गये।वास्तव में, कोई भी पद्धति इनफीरियर या सुपीरियर नहीं है।बात केवल साम्यावस्था की है।

2-विष्णु केवल शिव के कारण अथार्त जनकल्याण से प्रसन्न होते हैं तो हम स्थूल शरीर को वैष्णव पद्धति का ज्ञान दें।परंतु सूक्ष्म का ज्ञान जाने बिना विष्णु प्रसन्न नहीं होंगे।जब तक हमअपने सूक्ष्म शरीर को नहीं जानेंगे ;हम हरिहर को नहीं मिला पाएंगे।हरिहर को मिलाने के बाद ही हमें आत्मा का ज्ञान होता है।इसलिए कोई हरि में फंसा है तो कोई हर में फंसा है और

दोनों ही रो रहे हैं।दोनों ही अधूरे हैं और जब तक दोनों को नहीं मिलाया जाएगा, अधूरे ही

रहेंगे।ना वैष्णव पद्धति अच्छी है ना तंत्र पद्धति ;और दोनों ही अच्छे हैं क्योंकि एक हमें शरीर

को सही ढंग से रखना बताती है।तो दूसरी हमें सूक्ष्म का ज्ञान कराती है।हमें दोनों ही पद्धतियां

चाहिए।वैष्णव पद्धति स्वच्छता पर आधारित है और स्वच्छता का ज्ञान भी आवश्यक है। परंतु जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है। हम यह नियम पालन नहीं कर पाते।हमारा पूरा जीवन सूक्ष्म को जाने बिना अधूरा हो जाता है।

3-वास्तव में हम एक अंधकार से ही आए हैं और एक अंधकार में ही जाना है।केवल बीच में ही हम प्रकट हैं।तो फिर हमें उस अंधकार का ज्ञान क्यों नहीं करना चाहिए? वरना जैसे ही शरीर छूटेगा। हमारा रोना प्रारंभ हो जाएगा।तो सूक्ष्म का ज्ञान हमें केवल तंत्र से ही हो सकता है।इसलिए दोनों ही पद्धतियां अनिवार्य है। अब यह हमारा निर्णय है कि हम एबीसीडी ही

पढ़ते रहें या डिग्री कॉलेज में भी जाएं।चाहे ज्योतिष हो या वास्तु ..दोनों ही 360-डिग्री के भचक्र पर आधारित है ।एक 180 डिग्री पर है वैष्णव पद्धति और दूसरी 180 डिग्री पर है तंत्र पद्धति।जिसने मिर्च नहीं खाई उसे मिठाई का स्वाद भी पता नहीं चलेगा। कड़वा खाने के बाद ही मीठा अच्छा लगता है।तो दोनों साइड्स की 180 डिग्री को जानना जरूरी है।अन्यथा ना तो तुम पूरे 360-डिग्री को जान पाओगे और ना ही सेंटर में आ पाओगे। सेंटर का अर्थ है मध्य में होना ;साम्यावस्था प्राप्त करना ।दोनों ही पद्धतियों को जानकर /समझ कर, हम साम्यावस्था प्राप्त कर सकते हैं।

4-दोनों ही पद्धतियां नाम जप सुमिरन ,ध्यान आदि पर विश्वास करती हैं।वैष्णव पद्धति में ईश्वर

को भावपूर्ण ढंग से नहलाना ,खिलाना,भोग लगाना आदि विधियां हैं।शैव पद्धति में यही

मानसिक ध्यान के द्वारा किया जाता है।दोनों ही पद्धतियों में हवन होते हैं।दोनों ही पद्धतियों में ईश्वर से प्रेमाभक्ति की विधियां है।वैष्णव पद्धति और तंत्र पद्धति में साधना विधि, पूजा का प्रकार, न्यास सभी कुछ लगभग एक जैसा ही होता हैं, बस अंतर होता हैं, तो दोनों के मंत्र विन्यास में, तांत्रोक्त मंत्र अधिक तीक्ष्ण होता हैं! जीवन की किसी भी विपरीत स्थिति में तंत्र अचूक और अनिवार्य विधा हैं। महानिर्वाण तंत्र में भगवान भोलेनाथ माता पार्वती से कहते हैं कि कलयुग में तंत्र ही एकमात्र मोक्ष प्राप्त का रास्ता होगा।अशुद्धता के कारण वैष्णव मंत्र विषहीन सर्प की भांति फलित नहीं होंगे।इसलिए आज के युग में तंत्र ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।वैष्णव पद्धति में गोपी प्रेम है अथार्त गोपी बनकर प्रेम करने का ढंग है जैसे मीरा।

5-परंतु शैव पद्धति में भैरव- भैरवी साधना का इस्तेमाल किया जाता है।केवल यहीं पर एक अंतर आता है और यही सबसे बड़ी समस्या का कारण है।मीरा की पद्धति में समाज को कोई परेशानी नहीं है।परंतु इस पद्धति (भैरवी साधना)से समाज में समस्याएं उत्पन्न होती है और यही कारण है कि राजा भोज ने एक लाख तांत्रिक जोड़ियों की हत्या करवा दी थी ;तो हमें इस

पद्धति की समस्या को समझना पड़ेगा।हमारे शास्त्रों (शिव पुराण) में दिया गया है कि देवी सती ने शिव को पाने के लिए नृत्य ,संगीत का सहारा लिया और उन्हें भैरव रूप में पा लिया।

हमने इस बात को अच्छी तरह समझ लिया और सब इसी का पालन करने लगे। परंतु हम यह भूल गए कि जब देवी पार्वती ने संगीत का , रुद्राक्ष का सहारा लिया तो शिव ने नेत्र भी नहीं खोला ।और जब उन्होंने भैरवी रूप धारण किया और कामदेव की सहायता ली ...तो परिणाम सभी को मालूम है।

6-शिव का तीसरा नेत्र खुल गया ;कामदेव को भस्म होना पड़ा और देवी पार्वती को हजारों साल तपस्या करनी पड़ी।शिव भी चाहते थे कि देवी शिव तत्व का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करें। तब कहीं जाकर देवी ,भगवन शिव तक पहुंच पाई। हमने देवी पार्वती को नहीं समझा और देवी सती को फॉलो करने लगे और यही हमारे लिए सबसे बड़ी भूल बन गई।शिव तक ना तो हम संगीत से और ना ही रुद्राक्ष आदि से पहुंच सकते है।देवी सती को शिव का ज्ञान नहीं था।वह बहुत ही इनोसेंट थी।परंतु देवी पार्वती को शिवज्ञान था, इसलिए शिव उन्हें उस विधि से नहीं मिले। हमें देवी पार्वती की ज्ञानविधि को समझना पड़ेगा।

7-तांत्रिक जोड़ों ने भैरव- भैरवी साधना विधि के द्वारा शिव तक पहुंचने की कोशिश की।बहुत से गुरुओं ने भी यह कोशिश की। परिणाम यह हुआ कि वे अपमानित हुए ;जेल गए आदि-

आदि।भैरव- भैरवी साधना विधि का सिर्फ इतना ही अर्थ है कि गृहस्थ जीवन में भी हम पति-पत्नी कामवासना को प्रेम में ट्रांसफार्म कर दें और ईश्वर तक पहुंच जाएं। तंत्र साधना में शक्तियों के लालच में यह क्रिया की गई और शिव का तीसरा नेत्र खुला।बड़े-बड़े ज्ञानी गुरुओं

ने भी यह गलती की।तो हम यह समझ ले कि हम शिव को भैरव- भैरवी साधना विधि के द्वारा नहीं पा सकते और यदि हमने ऐसा करने का प्रयास किया तो शिव का तीसरा नेत्र खुलेगा।

इसमें कोई दो राय नहीं है।अब हमें यह जानना है कि शिव तक पहुंचने का रास्ता क्या है। वास्तव में 'एलिमेंट्स आर नेक्स्ट टू गॉड' और इसलिए हमें एलिमेंट को समझना पड़ेगा।सभी त्रिदोष- त्रिगुण (6) में हमें शिव को देखना पड़ेगा और साम्यावस्था बनानी पड़ेगी तो शिव तक पहुंच जाएंगे।

8-क्या अर्थ है 'एलिमेंट्स आर नेक्स्ट टू गॉड' का.....

06 POINTS;-

1-मनुष्य केवल दृश्य और अदृश्य पदार्थो का मेल है । फिर भी प्रत्येक मनुष्य का स्वभाव, बर्ताव और कार्य भिन्न भिन्न होते है। इसका कारण है प्रकृति के तीन एलिमेंट ;जिनके कम और अधिक मात्रा के समन्वय से मनुष्य का स्वभाव बनता है। कोई व्यक्ति जल-तत्व प्रधान है,कोई अग्नि-तत्व प्रधान है,तो कोई वायु-तत्व प्रधान है।हमारे दिमाग रूपी कम्प्यूटर में जो चिप लगायी गयी.. हमारा स्वभाव और बर्ताव वैसा ही होगा जो अपरिवर्तिनीय है।हम इसे केवल विकृत ही कर सकते है...परिवर्तित नही कर सकते।प्रत्येक मनुष्य अपने तत्व के अनुसार ही बर्ताव कर रहा है।परंतु हम परेशान हैं कि वह ऐसा क्यों कर रहा है, उसने ऐसा क्यों किया था?.. वगैरह-वगैरह।

2-प्रत्येक एलिमेंट का एक पॉजिटिव है और एक नेगेटिव! उदाहरण के लिए फायर एलिमेंट का पॉजिटिव एग्जांपल है अर्जुन और नेगेटिव एग्जांपल है दुर्योधन।एयर एलिमेंट का पॉजिटिव एग्जांपल है युधिष्ठिर और नेगेटिव एग्जांपल है शकुनी! वाटर एलिमेंट का पॉजिटिव एग्जांपल है भीम और नेगेटिव एग्जांपल है दुशासन! और माया तो षट चक्रों में ही तक चलती है। माया के 6 चक्रों को जाने बिना अथार्त उसके 6 एलिमेंट को स्वीकार किये बिना हम शिव तक नहीं पहुंच सकते।यह कहना कि हमने किसी को माफ कर दिया है ;हमें अहंकार में फंसा देता है इसलिए हमें किसी भी एलिमेंट को उसी के स्वरूप में स्वीकार करना होगा।

3- त्रिगुण ..जो वर्तमान में हैं, वही भविष्य में है,जो भविष्य में है, वही भूत में भी हैं।ये तीनों ही काल एक दूसरे के विरोधी हैं ,परन्तु आत्मतत्व स्वरुप से एक ही हैं।इसलिए एक उपासक के लिए अनिवार्य है कि वह सभी 3 तत्व के मनुष्यों से अपना संतुलन बनाए।ऐसा करके ही हम भौतिक जगत और आध्यात्मिक जगत दोनों में ही संतुलन स्थापित कर सकते हैं, सफलता प्राप्त कर सकते हैं ; शिवत्व तक पहुंच सकते हैं।शिव पर बेलपत्र और शमी पत्र चढ़ता है।बेलपत्र का अर्थ है..त्रिगुण को सम्मान देना।और शमी पत्र का अर्थ है..सभी छह एलिमेंट में सम हो जाना। सारी साधना का अर्थ ही है साम्यवस्था।ना बैरागी सफल है ना गृहस्थ और ना रागी सफल है ना बैरागी। सारी विधा साम्यावस्था की है।

4-यदि वाटर एलिमेंट पैर है ..आधार देता है तो फायर एलिमेंट चेहरा है। एयर एलिमेंट चेहरे और पैर दोनों को जोड़ता है तो आप हीं बताइए .. क्या बगैर तीनों के आप कुछ कर सकते हैं? बगैर तीनों के मिले किसी भी काम में सफलता नहीं मिल सकती।भारत में परिवारों का विघटन हुआ अथार्त त्रिगुण के सांख्य का विघटन हुआ।और यही कारण है सभी दुखी हैं और

दुखी ही रहेंगे जब तक अपना सांख्य पूरा नहीं कर लेंगे।तभी हम इस संसार में भी सफल हो सकते हैं और शिव शक्ति के उपासक भी बन सकते हैं ...निर्णय हमारा है।प्रत्येक मनुष्य का स्वभाव, बर्ताव और कार्य अपने एलिमेंट के अनुसार ही है;हमें ये स्वीकार करना होगा।और हम किसी का स्वभाव या बर्ताव बदल भी नहीं सकते।यहां तक ..हम अपने एलिमेंट को भी नहीं बदल सकते हैं।प्रत्येक एलिमेंट की साधना भी तीन प्रकार की होती है अथार्त साधना के दौरान की गति (स्थित) तीन तरह की होती है—(1) पक्षी गति... एयर एलिमेंट (2) वानर गति... फायर एलिमेंट (3) पिपीलिका(चींटी ) गति....वाटर एलिमेंट।

5-वास्तव में, अपने एलिमेंट के अनुसार व्यवहार करने से ही हमारी उन्नति हो सकती है।सत्य तो यह है कि हमारी मृत्यु के पश्चात भी हमारा एलिमेंट हमारी शरीर की राख में विद्यमान रहता हैं।और पुनर्जन्म होने पर भी वही एलिमेंट हमें प्राप्त होता है। सांख्य विकासवादी दर्शन

है।प्रत्येक तत्व के दो रूप होते हैं, एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म। सूक्ष्म ही विकसित होकर स्थूल बनता है। सांख्य दर्शन के अनुसार प्रत्येक तत्व का अपना गुण है। आकाश का गुण शब्द है। वायु का विकास आकाश से ही हुआ लेकिन आकाश बना रहा। उसके बाद वाले तत्वों में भी पूर्ववर्ती सभी तत्वों के गुण आये। महाभारत में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यही सांख्य समझाया था।

6-हमें यह भी समझना पड़ेगा कि शिव तक पहुंचने के लिए कोई भी डायरेक्ट सीधा/ मार्ग नहीं है।देवी शक्ति ही हमें उन तक पहुंचा सकती है परंतु देवी शक्ति भी हमें तभी पहुंचाती है जब हमारा कारण पर्सनल ना होकर जनकल्याण का होता है।वैष्णव पद्धति में षोडशोपचार पूजन होता है, लेकिन तंत्र में पंचोपचार पूजन होता है।फिर हम पांच तत्वों से त्रिगुण में ,द्वैत में और अंत में हम अद्वैत तक पहुंच जाते हैं।वैष्णव पद्धति हमें स्थूल का ज्ञान करा देती है अथार्त तंत्र हमें सूक्ष्म से सूक्ष्मतर अथार्त 16 से 5; 5 से 3; 3 से 2 और अंत में अद्वैत की ओर ले जाता हैं।

9-कुंडलिनी साधना को उल्टी यात्रा क्यों कहते हैं ?-

04 POINTS;-

1-वास्तव में तीनों एलिमेंट का लव ट्रायंगल हैं। उदाहरण के लिए शिव 'ज्ञान और ट्रांसफॉर्मेशन 'के देवता हैं अथार्त एयर एलिमेंट! उनके आराध्य हैं श्रीविष्णु ; जो वाटर एलिमेंट

हैं अथार्त ज्ञान का संचय और पालन करते हैं। श्रीविष्णु के आराध्य हैं ब्रह्मा..जो फायर एलिमेंट हैं।वह उस ज्ञान से सृष्टि का निर्माण करते हैं और लाभ उठाते हैं।परंतु समस्या यह है कि ब्रह्मा जब लाभ उठाते हैं तब उनको अहंकार आ जाता है ।ब्रह्मा के आराध्य हैं शिव और अहंकार है शिव का भोजन।तब शिव अहंकार का विनाश कर देते हैं।जब सर्किल शुरू होता है ;शिव ज्ञान का प्रतीक है।लेकिन सर्किल के अंत में ,जब ब्रह्मा शिव की आराधना करते हैं और श्रीविष्णु के संचित ज्ञान का प्रयोग लाभ में करके अहंकारी हो जाते हैं ;तब डिस्ट्रक्शन होता है। सारी दुनिया ऐसे ही चल रही है।यह सीधा सर्किल हैं!इस प्रकार एयर एलिमेंट भागता है ..वाटर एलिमेंट के पीछे ;वाटर एलिमेंट भागता है ..फायर एलिमेंट के पीछे और फायर एलिमेंट भागता है ..एयर एलिमेंट के पीछे अथार्त लव ट्रायंगल।

2-एयर एलिमेंट ज्ञान दे रहा है। वाटर एलिमेंट ज्ञान का संचय कर रहा है। फायर एलिमेंट उस ज्ञान से लाभ उठा रहा है।और फायर एलिमेंट का स्वभाव है लाभ के पीछे भागना और अहंकारी होना।अहंकार हमेशा पर्सनल ही होता है।और इसीलिए दुनिया में समस्याएं फैली हुई है।यह उल्टा सर्किल कैसे और कब शुरू होगा? यह तब शुरू होगा जब शिव के ज्ञान को विष्णु संचय करें और ब्रह्मा लाभ उठाये।परन्तु ब्रह्मा शिव की तरफ ना मुड़कर विष्णु की तरफ मुड़ जाएं।अथार्त फायर एलिमेंट पालन की तरफ रुख मोड़ ले ।जब ब्रह्मा लाभ लेने के बाद पालनहार विष्णु की तरफ बढ़ेंगे तो विष्णु शिव की तरफ जाएंगे।अथार्त पालन का ज्ञान आगे बढ़ेगा। यही उल्टा सर्किल है कि जैसे आया था वैसे ही वापस कर दो।इसी को कबीरदास कहते हैं ''बहुत जतन से ओढ़ी चदरिया, और ज्यों की त्यों धरि दीन्हीं''।

3-इसका उदाहरण है 'श्री राम' जो फायर एलिमेंट का प्रतीक है।उन्होंने वाटर एलिमेंट के संचित ज्ञान को लाभ में बदला और पुनः उस ज्ञान को पालनहार विष्णु की तरफ ही मोड़ दिया।उन्होंने ज्ञान का लाभ स्वयं ना लेकर पूरे संसार को दिया।पूरे संसार में डेमोक्रेसी का ज्ञान श्री राम के द्वारा ही आया और संसार का कल्याण हुआ।तो जब फायर एलिमेंट पालन की तरफ अथार्त विष्णु (वाटर एलिमेंट) की तरफ टर्न करेगा तो संसार का पालन करेगा और संसार में पालन का ज्ञान ही विस्तार करेगा।लेकिन अगर फायर एलिमेंट पर्सनल लाभ के लिए संचित ज्ञान का इस्तेमाल करेगा तो शिव विनाशकर्ता के रूप में ही सामने आएंगे...ज्ञान के रूप में नहीं।

4-फायर एलिमेंट जो इस संसार में केवल 2% ही है उसके ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है।इस संसार में फायर एलिमेंट का रोल गलत होने के कारण ही दुनिया में विनाश हो रहा है।एयर एलिमेंट ज्ञान देगा और विनाश भी करेगा। वाटर एलिमेंट ज्ञान का संचय करेगा और पालन करेगा।फायर एलिमेंट उस संचित ज्ञान को लाभ में बदलेगा। यहीं पर ध्यान देने की बात है। लाभ पर्सनल है या संसार का है? पर्सनल लाभ में वह विनाश की ओर बढ़ जाएगा।क्योंकि शिव तो जनकल्याण की ही बात करते हैं और पर्सनल लाभ का विनाश कर देते हैं। जैसे ही वह लाभ संसार के लिए होता है;वह ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी ट्रांसफर हो जाता है।तो फायर एलिमेंट को राजा होने के साथ-साथ पालन की तरफ रुख मोड़ना पड़ेगा।और तब इस दुनिया में परिवर्तन आएगा और हमारी साधना भी पूर्ण हो जाएगी। यही अर्थ है उल्टे चक्र का।

10-तंत्र एक प्रक्रिया है जिससे हम अपनी आत्मा और मन को बंधन मुक्त करते हैं।इस प्रक्रिया से शरीर और मन शुद्ध होता है, और ईश्वर का अनुभव करने में सहायता होती है। तंत्र की प्रक्रिया से हम भौतिक और आध्यात्मिक जीवन की हर समस्या का हल निकाल सकते हैं। ऐसी मान्यताएं हैं कि एक व्यक्ति तंत्र की सही प्रक्रिया से मष्तिष्क का पूरा इस्तेमाल कर पाता है और अद्भुत शक्तियों के स्वामी बन जाता है।तन्त्र का सामान्य अर्थ है 'विधि' या 'उपाय'। विधि या उपाय कोई सिद्धान्त नहीं है। सिद्धान्तों को लेकर मतभेद हो सकते हैं। विग्रह और विवाद भी हो सकते हैं, लेकिन विधि के सम्बन्ध में कोई मतभेद नहीं है। डूबने से बचने के लिए तैरकर ही आना पड़ेगा। बिजली चाहिए तो कोयले, पानी का अणु का रूपान्तरण करना ही पड़ेगा। दौड़ने के लिए पाँव आगे बढ़ाने ही होंगे। पर्वत पर चढ़ना है तो ऊँचाई की तरफ कदम बढ़ाये बिना कोई चारा नहीं है। यह क्रियाएँ 'विधि' कहलाती हैं।

11-तन्त्र अथवा आगम में व्यवहार पक्ष ही मुख्य है। तन्त्र की दृष्टि में शरीर प्रधान निमित्त है। उसके बिना चेतना के उच्च शिखरों तक पहुँचा ही नहीं जा सकता। इसी कारण से तन्त्र का तात्पर्य ‘तन’ के माध्यम से आत्मा का ’त्राण’ या अपने आपका उद्धार भी कहा जाता है। यह अर्थ एक सीमा तक ही सही है। वास्तव में तन्त्र साधना में शरीर, मन और काय कलेवर के सूक्ष्मतम स्तरों का समन्वित उपयोग होता है। यह अवश्य सत्य है कि तन्त्र शरीर को भी उतना ही महत्त्व देता है जितना कि मन, बुद्घि और चित को।कर्मकाण्ड और पूजा-उपासना के तरीके सभी धर्मों में अलग-अलग हैं, पर तन्त्र के सम्बन्ध में सभी एकमत हैं। सभी धर्मों का मानना है मानव के भीतर अनन्त ऊर्जा छिपी हुई है, उसका पाँच-सात प्रतिशत हिस्सा ही कार्य में आता है, शेष भाग बिना उपयोग के ही पड़ा रहता है। सभी धर्म–सम्प्रदाय इस बात को एक मत से स्वीकार करते हैं व अपने हिसाब से उस भाग का मार्ग भी बताते हैं।

12-उन धर्म-सम्प्रदायों के अनुयायी अपनी छिपी हुई शक्तियों को जगाने के लिए प्रायः एक समान विधियां ही काम में लाते हैं।तन्त्रोक्त मतानुसार मन्त्रों के द्वारा यन्त्र के माध्यम से भगवान की उपासना की जाती है।तन्त्र के सभी ग्रन्थ शिव और पार्वती के संवाद के अन्तर्गत ही प्रकट हैं। देवी पार्वती प्रश्न करती हैं और शिव उनका उत्तर देते हुए एक विधि का उपदेश करते हैं। अधिकांश प्रश्न समस्याप्रधान ही हैं। सिद्धान्त के सम्बन्ध में भी कोई प्रश्न पूछा गया हो तो भी शिव उसका उत्तर कुछ शब्दों में देने के उपरान्त विधि का ही वर्णन करते हैं।आगम शास्त्र के अनुसार 'करना' ही जानना है, अन्य कोई 'जानना' ज्ञान की परिभाषा में नहीं आता। जब तक कुछ किया नहीं जाता, साधना में प्रवेश नहीं होता, तब तक कोई उत्तर या समाधान नहीं है।

13-इस शास्त्र का सिद्धान्त है कि कलियुग में वैदिक मंत्रों, जपों और यज्ञों आदि का कोई फल नहीं होता । इस युग में सब प्रकार के कार्यों की सिद्धि के लिये तंत्राशास्त्र में वर्णित मंत्रों और उपायों आदि से ही सहायता मिलती है।यह शास्त्र प्रधानतः शाक्तों का ही है और इसके मंत्र प्रायः एकाक्षरी हुआ करते हैं । जैसे,— ह्नीं, क्लीं, श्रीं, स्थीं, शूं, क्रू आदि ।तंत्र अहंकार को समाप्त कर द्वैत के भाव को समाप्त करता है, जिससे मनुष्य, सरल हो जाता है और चेतना के स्तर पर विकसित होता है। सरल होने पर ईश्वर से संबंध सहजता से बन जाता है। तंत्र का उपयोग इईश प्राप्ति की लिए सद्भावना के साथ करना चाहिए।तांत्रिक पद्धति में योनी तंत्र का विशेष महत्व है। इस ग्रन्थ में, दस महाविद्या (देवी के दस तांत्रिक विधिओं से उपासना) वर्णित है ।यह एक विडम्बना रही है, कि भारतीय ज्ञान का यह उज्ज्वलतम पक्ष अर्थात तन्त्र से समाज भयभीत है|

14-परन्तु सचाई यह है कि तन्त्र एक पूर्ण शुद्ध एवं सात्विक विद्या है।तंत्र को शारीरिक आनंद के साथ जोड़ना अनुचित है।यदपि तंत्र में काम शक्ति का रूपांतरण, दिव्य अवस्था प्राप्ति की लिए किया जाता है;परंतु केवल गृहस्थ के लिए।वैष्णव पद्धति ब्रह्मचर्य पर विश्वास करती है।इस प्रकार से ,केवल सन्यासी ही साधना कर सकते हैं।परंतु तंत्र पद्धति सन्यासी और गृहस्थ दोनों को ही समान रूप से महत्व देती है।गृहस्थ होना कुंडलनी साधक के लिए हेल्पफुल है;प्रॉब्लम नहीं।महानिर्वाण तंत्र में भगवान शिव ने साधना के लिए शैव-विवाह की विधि भी बताई है।

तो जो अनमैरिड लोग हैं ;वे उस पद्धति का इस्तेमाल कर सकते हैं।

परंतु तंत्र विद्यामें सब कुछ एक सिस्टम में हैं।लोग तंत्र विद्या का दुरुपयोग करते हैं।शारीरिक आनंद के साथ तंत्र को जोड़ना महा-मूर्खता है।इसके लिए माया जगत है।आप वहां खूब सुख प्राप्त करें ;अपनी सभी इच्छाओं की पूर्ति करिए। परंतु अध्यात्म के नाम पर ऐसा करना दंडनीय है।

15-वैष्णव पद्धति गृहस्थ को साधना करने की अनुमति नहीं देती देती है।

परंतु शैव पद्धति देती है;क्योंकि बहुत प्रैक्टिकल है।परंतु इसका अर्थ यह नहीं हुआ क्या कि आप दुराचार करें।कम से कम साधना के नाम पर तो दुराचार नहीं करें ..पति पत्नी मिलकर साधना करें या अविवाहित लोग शैव-विवाह की विधि इस्तेमाल कर सकते हैं।परंतु एक सिस्टम में रहे।वैष्णव पद्धति अगर फल नहीं देती है तो दंड भी नहीं देती।परंतु शैव पद्धति तुरंत दंड देती है।शिव तो सो जाने पर माता पार्वती को भी क्षमा नहीं करते। उन्हें भी मत्स्या के रूप में जन्म लेना पड़ता है।तो सभी अन्य लोगों को क्यों क्षमा करेंगे?... तंत्र दुराचार का सर्टिफिकेट नहीं है। कृपया यह समझ कर आगे का लेख पढ़ें।

’तंत्र का केंद्रीय विषय क्या है?-

05 FACTS;-

1-तुम ही तंत्र के केंद्रीय विषय हो। तुम जैसे अभी हो और जो तुम्हारे भीतर छिपा है वही तो विकसित हो सकता है अथार्त जो तुम हो और जो तुम हो सकते हो। अभी इस समय तुम काम की ही एक इकाई हो। और जब तक इकाई को गहराई से न समझ लिया जाए तुम आध्यात्मिक इकाई नहीं हो सकते। कामुकता और आध्यात्मिकता एक ही ऊर्जा के

दो छोर हैं।”तंत्र” तुम जैसे हो वहीं से शुरू करता है और ''योग'' तुम हो सकते हो वहां से शुरू करता है। योग अंत के साथ शुरू करता है तंत्र आरंभ के साथ शुरू करता है। और आरंभ के साथ शुरू करना अच्छा है क्योंकि अगर अंत ही आरंभ है तब तुम व्यर्थ अपने लिए दुख पैदा कर रहे हो। तुम केवल आदर्श ही नहीं हो। तुम्हें देवता होना है और अभी तुम सिर्फ पशु हो। और यह पशु देवता के आदर्श के कारण पागल हो जाता है।

2-तंत्र कहता है ”देवता को भूल जाओ। ” अगर तुम पशु हो तो इस पशु को उसकी समग्रस्ता में समझो। उस समझ में ही देवता का जन्म होगा। और अगर उस समझ से भी देवता का जन्म न हो पाए तो भूल जाओ इसे, उसका जन्म संभव ही नहीं है। आदर्श तुम्हारी संभावनाओं को प्रकट नहीं कर सकते, केवल वास्तविकता का ज्ञान ही तुम्हारी मदद कर सकता है। इसलिए तुम ही तंत्र का केंद्रीय विषय हो–जैसे तुम हो और जैसे हो सकते हो तुम्हारी वास्तविकता और तुम्हारी संभावना... वे ही विषय-वस्तु हैं।कोई भी 'काम' की चर्चा न

हीं करना चाहता है क्योंकि तुम बच्चे को जन्म दे सकते हो अत: समझते हो कि तुम जानते हो.. हालांकि काम सबकी समस्या है। कोई प्रेम की चर्चा नहीं करना चाहता क्योंकि हर कोई समझता है कि वह तो महान प्रेमी है ही।तंत्र उनकी चर्चा करता है जिनसे तुम्हें वितृष्णा होती है तुम उनकी बात भी नहीं करना चाहते।

3-विज्ञान भैरव तंत्र में ध्यान की ऊर्ध्वगमन सम्बन्धी पाँच विधियां है।

48वे सूत्र में भगवान शिव कहते है--''प्रेम--आलिंगन में आरंभ में उसकी आरंभिक अग्‍नि पर अवधान दो, और ऐसा करते हुए अंत में उसके अंगारे से बचो।'’अथार्त जब तुम लबालब भरे हो मुक्त होने की बात ही मत सोचो। बाहर बहने को आतुर इस ऊर्जा के साथ बने रहो। वीर्य-स्खलन की जल्दी मत करो। उसे बिल्कुल ही भूल जाओ! उस ऊष्मा भरी आरंभिक स्थिति के साथ पूरी तरह हो जाओ।एक वर्तुल निर्मित करो

4-इसकी तीन संभावनाएं हैं। पति-पत्नी का मिलन रेखा गणित की तीन आकृतियां बना सकता है। एक आकृति चतुर्भुज है दूसरी त्रिकोण और तीसरी वर्तुलाकार। साधारणत: काम -कृत्य में चार कोण होते हैं.. दो नहीं–यह चतुर्भुज है। चार कोण होते हैं क्योंकि तुम दो खंडों में विभाजित हो–विचारखंड और भाव खंड–तुम्हारा सहभागी भी दो खंडों में विभाजित है।उस समय वहां दो व्यक्तियों का नहीं चार खंडों का मिलन होता है। यह एक भीड़ है। और वास्तव में ऐसे मिलन में कोई गहराई नहीं होती।जहां चार कोण हैं वहां मिलन संभव नहीं क्योंकि तुम्हारा कुछ गहनतर अंश छिपा हुआ है और तुम्हारी पत्नी का भी गहनतर अंश छिपा हुआ है। केवल दो दिमागों का मिलन हो रहा है अथार्त केवल दो विचार-प्रक्रियाओं का मिलन हो रहा है। दो भाव-प्रक्रियाओं का नहीं। वे तो छिपी हुई हैं।

5-दूसरे प्रकार का मिलन त्रिभुज की तरह हो सकता है। तुम दो हो-आधार के दो कोण। अचानक किसी क्षण में तुम एक हो जाते हो, त्रिकोण के तीसरे कोण की भांति। लेकिन अचानक एक क्षण के लिए… द्वैत खो जाता है और तुम एक हो जाते हो। यह चतुर्भुजाकार मिलन से बेहतर है क्योंकि कम से कम एक क्षण के लिए तो ऐक्य घटित होता है। वह ऐक्य तुम्हें स्वास्थ्य एवं शक्ति प्रदान करता है। तुम पुन: जीवंत और युवा अनुभव करते हो।

लेकिन तीसरे प्रकार का मिलन सबसे अच्छा है ..तंत्र-मिलन है: तुम एक वर्तुल बन जाते हो। तब कोई कोण नहीं होते, और मिलन अल्पकाल ,केवल एक क्षण के लिए ही नहीं होता उसमें समय बचता ही नहीं। और यह तभी संभव है जब तुम यह नहीं चाहते कि स्खलन हो। अगर तुम स्खलन ही चाहते हो, तो यह त्रिकोण-मिलन ही होगा-क्योंकि जैसे ही वीर्य-स्खलन होगा, मिलन-बिंदु खो जाएगा।

क्या महत्व है लयबद्ध श्वास का ?-

02 FACTS;-

1-तंत्र ने कामवासना के रूपांतरण के लिए श्वास की लय बदलने की बहुत सी विधियां विकसित की हैं।अगर कोई पति -पत्नी एक दूसरे से प्रेम करते है, तो वे ऊर्जावान होने में मदद करते हैं क्योंकि वे विपरीत ऊर्जाएं हैं।तब तुम ऊर्जा खोते नहीं हो बल्कि इसके विपरीत तुम्हें ऊर्जा प्राप्त होती है।यदि श्वास को लयबद्ध, समस्वर रख सकें, दोनों की लय वही बनी रहे, तो कोई स्खलन नहीं होगा।क्योंकि स्खलन केवल तभी होता है,जब श्वास लयबद्ध नहीं होती; केवल तभी शरीर ऊर्जा बाहर फेंक सकता है।

2-यदि श्वास लयपूर्ण है, तो शरीर ऊर्जा को आत्मसात कर लेता है; वह उसे

बाहर नहीं फेंकता।जब विपरीत ऊर्जाएं मिलती हैं और एक विद्युत धारा निर्मित करती हैं, तो वे एक दूसरे को उद्दीप्त करती हैं;वरना तो ऊर्जा खो जाती है और तुम एक्सहॉस्टटेड अनुभव करते हो। ।

'आरंभिक अवस्था में रुके रहो अंत की ओर गति मत करो''। आरंभ में कैसे रुके रहें?-

16 FACTS;-

1-बहुत सी बातें ध्यान में रखनी होंगी।पहली बात,काम- कृत्य को इस तरह मत लो जैसे कि कहीं और पहुंचना है। इसे साधन की भांति मत लो—यह अपने में ही साध्य है। इसका कोई लक्ष्य नहीं यह कोई माध्यम नहीं। दूसरी बात भविष्य की मत सोचो, वर्तमान में स्थित रहो। अगर तुम काम-कृत्य के आरंभिक भोग में वर्तमान में नहीं हो सकते तो तुम कभी भी वर्तमान में नहीं टिक सकते, क्योंकि इस कृत्य की प्रकृति ही ऐसी है कि तुम वर्तमान में फेंक दिए जाते

हो।वर्तमान में स्थित रहो। दो शरीरों ,दो आत्माओं के मिलन का सुख भोगो और एक दूसरे में लीन हो जाओ… एक दूसरे में पिघल जाओ। भूल जाओ कि तुम्हें कहीं पहुंचना है। उस क्षण में स्थित रहो कहीं जाना नहीं है पिघल जाओ। प्रेम की उष्मा पिघल कर एक दूसरे में विलीन हो जाने की परिस्थिति बनाओ।

2-इसी कारण अगर प्रेम नहीं है तो काम -कृत्य शीघ्रता में किया गया एक कृत्य है। तुम दूसरे का उपयोग कर रहे हो ..दूसरा साधन मात्र है। और दूसरा तुम्हारा उपयोग कर रहा है। तुम दोनों एक दूसरे का शोषण कर रहे हो एक दूसरे में विलीन नहीं हो रहे। प्रेम में तुम एक दूसरे में खो जाते हो। प्रारंभ में यह एक दूसरे में खो जाना एक नई दृष्टि देगा।अगर तुम इस

कृत्य को समाप्त कर देने की जल्दी में नहीं हो तो धीरे-धीरे यह कृत्य कामुक कम, और आध्यात्मिक अधिक हो जाता है। दो शारीरिक ऊर्जाओं के बीच एक घनिष्ठ सहभागिता स्थापित हो जाती है और घंटों तुम्हारा साथ बना रह सकता है। जैसे-जैसे समय बीतता है इस साथ में और-और गहराई आती जाती है। लेकिन सोच-विचार में मत पड़ना। उस क्षण के साथ रहो उसकी गहराई में डूब जाओ। वह क्षण परमानंद बन जाता है समाधि बन जाता है। अगर तुम उसे स्पष्ट अनुभव कर सको ,तो तुम्हारे चित्त की कामुकता-विलीन हो जाएगी। और उसके माध्यम से ब्रह्मचर्य उपलब्ध हो सकेगा।

3-यह विरोधाभासी प्रतीत होता है क्योंकि हम हमेशा इस ढंग से सोचते रहे हैं कि अगर किसी व्यक्ति को ब्रह्मचारी ही बने रहना है तो उसे अपने विपरीत यौन की तरफ आंख उठाकर भी नहीं चाहिए ।उससे किसी प्रकार का संबंध नहीं बनाना चाहिए… उससे बचो, भाग जाओ! तब एक झूठा ब्रह्मचर्य घटता है। मन विपरीत यौन , के बारे में निरंतर सोचता रहता है। और जितना तुम दूसरे से भागते हो उतना ही ज्यादा तुम उसके बारे में सोचने के लिए विवश हो जाते हो, क्योंकि वह तुम्हारी बुनियादी गहरी जरूरत है।तंत्र कहता है ”पलायन की चेष्टा मत

करो–पलायन संभवन नहीं। बल्कि इससे पार होने के लिए प्रकृति का उपयोग करो। संघर्ष मत करो। अतिक्रमण के लिए प्रकृति को स्वीकार करो।बस,आरंभ में ठहरकर पति या पत्नी से तुम्हारा यह संपर्क बिना अंत के अगर इसे लंबाया जा सके …। उत्तेजना शक्ति है। तुम इसे गंवा सकते हो तुम शिखर तक पहुंच सकते हो और फिर ऊर्जा नष्ट हो जाती है और पीछे आती है एक कमजोरी, एक खिन्नता। तुम इसे एक प्रकार की विश्रांति, रिलैक्सेशन की तरह ले सकते हो- यह नकारात्मक है।’’

4-तंत्र तुम्हें उच्चतर विश्रांति का एक आयाम प्रदान करता है जो सकारात्मक है। दोनों जीवनसाथी एक दूसरे में खो जाते है एक दूसरे को प्राणदाई शक्ति देते हैं ..वे एक वर्तुल बन जाते हैं और उनकी ऊर्जा एक वर्तुल में संचारण करने लगती है। वे दोनों एक दूसरे को जीवन की नव-शक्ति देते हैं कोई ऊर्जा नष्ट नहीं होती बल्कि और शक्ति प्राप्त होती है क्योंकि विपरीत यौन, के संपर्क से तुम्हारी प्रत्येक कोशिका को चुनौती मिलती है प्रत्येक कोशिका उत्तेजित हो जाती है। और अगर तुम उस उत्तेजना को शिखिर तक पहुंचने से रोककर उसमें विलीन हो सको; आरंभ में स्थिर रह सको, अग्नि को भड़कने न दो, ऊष्मा बनाए रखते हो.. तो दो उष्माओं का मिलन होगा।

5-तुम इस काम-कृत्य को, दीर्घकालिक बना सकते हो।बिना ऊर्जा को बाहर फेंके यह कृत्य ध्यान बन जाता है। और इसके द्वारा तुम्हारा खंडित व्यक्तित्व अखंडित हो जाता है।सभी

प्रकार के स्नायु-तनाव का कारण व्यक्तित्व का खंड-खंड हो जाना है।अगर ये खंड पुन: जुड़ जाएं तो तुम फिर एक निर्दोष बच्चे हो सकते हो। एक बार जब तुम निर्दोष्ता को पहचान लेते हो तुम जैसा समाज को व्यवहार चाहिए तुम करते जाते हो, लेकिन अब यह व्यवहार केवल अभिनय है ,एक नाटक है। तुम इसमें उलझे नहीं हो। यह एक जरूरत है इसलिए तुम करते हो, लेकिन तुम उसमें नहीं हो। तुम सिर्फ अभिनय कर रहे हो। तुम्हें नकली चेहरे लगाने ही पड़ेंगे, तुम एक ऐसी दुनिया में रहते हो जो झूठ है; नहीं तो यह दुनिया तुम्हें कुचल

डालेगी ।

6-तंत्र जीवन के बुनियादी प्रश्न पूछता है। इसी कारण तंत्र की काम और प्रेम में इतनी रुचि है–ये आधारभूत हैं। तुम इन्हीं के माध्यम से आए हो तुम इनका ही अंश हो।तुम काम-ऊर्जा

का ही खेल हो, और कुछ नहीं हो। और जब तक तुम इस ऊर्जा को जानोगे नहीं इसका अतिक्रमण नहीं कर लोगे तब तक तुम कुछ और नहीं हो सकते। तुम अभी इस समय काम-ऊर्जा के सिवाय और कुछ नहीं हो। तुम इससे कुछ ज्यादा हो सकते हो। लेकिन अगर तुम इसे जानते नहीं इसका अतिक्रमण नहीं करते, तो तुम इससे ज्यादा कभी नहीं हो सकते। बीज ही बने रहने की संभावना है।

7-इसलिए तंत्र का रस काम, प्रेम और नैसर्गिक जीवन में है। तंत्र कहता है अगर तुम संघर्षशील प्रवृत्ति के व्यक्त्ति हो तो तुम कुछ भी नहीं जान सकते तब तुम ग्रहणशील नहीं होते। क्योंकि तब तुम जूझ रहे हो अत: रहस्य तुम पर प्रकट नहीं हो स