तंत्र का केंद्रीय विषय क्या है?


तंत्र क्यों महत्वपूर्ण है?

14 FACTS;-

1-भारत में वैदिक, वैष्णव, शैव, शाक्त, स्मार्त संप्रदाय हैं… लेकिन हिंदू संत समाज मुख्यत दो भागों में विभाजित है वैष्णव और शैव… और इस विभाजन का कारण आस्था और साधना पद्धतियाँ हैं, लेकिन दोनों ही सम्प्रदाय वेद और वेदांत पर एकमत है।हमारे तीन शरीर है-स्थूल,सूक्ष्म और कारण ।हमारा स्थूल शरीर ब्रह्मा है। कारण श्री विष्णु है और सूक्ष्म शरीर शिव।वैष्णव पद्धति हमें स्थूल शरीर का ज्ञान देती है और शैव पद्धति सूक्ष्म का।कोई स्थूल

शरीर के ज्ञान में फँस गया तो कोई सूक्ष्म शरीर के ज्ञान में में फँस गया। दोनों ही अधूरे हो गये।वास्तव में, कोई भी पद्धति इनफीरियर या सुपीरियर नहीं है।बात केवल साम्यावस्था की है।

2-विष्णु केवल शिव के कारण अथार्त जनकल्याण से प्रसन्न होते हैं तो हम स्थूल शरीर को वैष्णव पद्धति का ज्ञान दें।परंतु सूक्ष्म का ज्ञान जाने बिना विष्णु प्रसन्न नहीं होंगे।जब तक हमअपने सूक्ष्म शरीर को नहीं जानेंगे ;हम हरिहर को नहीं मिला पाएंगे।हरिहर को मिलाने के बाद ही हमें आत्मा का ज्ञान होता है।इसलिए कोई हरि में फंसा है तो कोई हर में फंसा है और

दोनों ही रो रहे हैं।दोनों ही अधूरे हैं और जब तक दोनों को नहीं मिलाया जाएगा, अधूरे ही

रहेंगे।ना वैष्णव पद्धति अच्छी है ना तंत्र पद्धति ;और दोनों ही अच्छे हैं क्योंकि एक हमें शरीर

को सही ढंग से रखना बताती है।तो दूसरी हमें सूक्ष्म का ज्ञान कराती है।हमें दोनों ही पद्धतियां

चाहिए।वैष्णव पद्धति स्वच्छता पर आधारित है और स्वच्छता का ज्ञान भी आवश्यक है। परंतु जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है। हम यह नियम पालन नहीं कर पाते।हमारा पूरा जीवन सूक्ष्म को जाने बिना अधूरा हो जाता है।

3-वास्तव में हम एक अंधकार से ही आए हैं और एक अंधकार में ही जाना है।केवल बीच में ही हम प्रकट हैं।तो फिर हमें उस अंधकार का ज्ञान क्यों नहीं करना चाहिए? वरना जैसे ही शरीर छूटेगा। हमारा रोना प्रारंभ हो जाएगा।तो सूक्ष्म का ज्ञान हमें केवल तंत्र से ही हो सकता है।इसलिए दोनों ही पद्धतियां अनिवार्य है। अब यह हमारा निर्णय है कि हम एबीसीडी ही

पढ़ते रहें या डिग्री कॉलेज में भी जाएं।चाहे ज्योतिष हो या वास्तु ..दोनों ही 360-डिग्री के भचक्र पर आधारित है ।एक 180 डिग्री पर है वैष्णव पद्धति और दूसरी 180 डिग्री पर है तंत्र पद्धति।जिसने मिर्च नहीं खाई उसे मिठाई का स्वाद भी पता नहीं चलेगा। कड़वा खाने के बाद ही मीठा अच्छा लगता है।तो दोनों साइड्स की 180 डिग्री को जानना जरूरी है।अन्यथा ना तो तुम पूरे 360-डिग्री को जान पाओगे और ना ही सेंटर में आ पाओगे। सेंटर का अर्थ है मध्य में होना ;साम्यावस्था प्राप्त करना ।दोनों ही पद्धतियों को जानकर /समझ कर, हम साम्यावस्था प्राप्त कर सकते हैं।

4-दोनों ही पद्धतियां नाम जप सुमिरन ,ध्यान आदि पर विश्वास करती हैं।वैष्णव पद्धति में ईश्वर

को भावपूर्ण ढंग से नहलाना ,खिलाना,भोग लगाना आदि विधियां हैं।शैव पद्धति में यही

मानसिक ध्यान के द्वारा किया जाता है।दोनों ही पद्धतियों में हवन होते हैं।दोनों ही पद्धतियों में ईश्वर से प्रेमाभक्ति की विधियां है।वैष्णव पद्धति और तंत्र पद्धति में साधना विधि, पूजा का प्रकार, न्यास सभी कुछ लगभग एक जैसा ही होता हैं, बस अंतर होता हैं, तो दोनों के मंत्र विन्यास में, तांत्रोक्त मंत्र अधिक तीक्ष्ण होता हैं! जीवन की किसी भी विपरीत स्थिति में तंत्र अचूक और अनिवार्य विधा हैं। महानिर्वाण तंत्र में भगवान भोलेनाथ माता पार्वती से कहते हैं कि कलयुग में तंत्र ही एकमात्र मोक्ष प्राप्त का रास्ता होगा।अशुद्धता के कारण वैष्णव मंत्र विषहीन सर्प की भांति फलित नहीं होंगे।इसलिए आज के युग में तंत्र ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।वैष्णव पद्धति में गोपी प्रेम है अथार्त गोपी बनकर प्रेम करने का ढंग है जैसे मीरा।

5-परंतु शैव पद्धति में भैरव- भैरवी साधना का इस्तेमाल किया जाता है।केवल यहीं पर एक अंतर आता है और यही सबसे बड़ी समस्या का कारण है।मीरा की पद्धति में समाज को कोई परेशानी नहीं है।परंतु इस पद्धति (भैरवी साधना)से समाज में समस्याएं उत्पन्न होती है और यही कारण है कि राजा भोज ने एक लाख तांत्रिक जोड़ियों की हत्या करवा दी थी ;तो हमें इस

पद्धति की समस्या को समझना पड़ेगा।हमारे शास्त्रों (शिव पुराण) में दिया गया है कि देवी सती ने शिव को पाने के लिए नृत्य ,संगीत का सहारा लिया और उन्हें भैरव रूप में पा लिया।

हमने इस बात को अच्छी तरह समझ लिया और सब इसी का पालन करने लगे। परंतु हम यह भूल गए कि जब देवी पार्वती ने संगीत का , रुद्राक्ष का सहारा लिया तो शिव ने नेत्र भी नहीं खोला ।और जब उन्होंने भैरवी रूप धारण किया और कामदेव की सहायता ली ...तो परिणाम सभी को मालूम है।

6-शिव का तीसरा नेत्र खुल गया ;कामदेव को भस्म होना पड़ा और देवी पार्वती को हजारों साल तपस्या करनी पड़ी।शिव भी चाहते थे कि देवी शिव तत्व का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करें। तब कहीं जाकर देवी ,भगवन शिव तक पहुंच पाई। हमने देवी पार्वती को नहीं समझा और देवी सती को फॉलो करने लगे और यही हमारे लिए सबसे बड़ी भूल बन गई।शिव तक ना तो हम संगीत से और ना ही रुद्राक्ष आदि से पहुंच सकते है।देवी सती को शिव का ज्ञान नहीं था।वह बहुत ही इनोसेंट थी।परंतु देवी पार्वती को शिवज्ञान था, इसलिए शिव उन्हें उस विधि से नहीं मिले। हमें देवी पार्वती की ज्ञानविधि को समझना पड़ेगा।

7-तांत्रिक जोड़ों ने भैरव- भैरवी साधना विधि के द्वारा शिव तक पहुंचने की कोशिश की।बहुत से गुरुओं ने भी यह कोशिश की। परिणाम यह हुआ कि वे अपमानित हुए ;जेल गए आदि-

आदि।भैरव- भैरवी साधना विधि का सिर्फ इतना ही अर्थ है कि गृहस्थ जीवन में भी हम पति-पत्नी कामवासना को प्रेम में ट्रांसफार्म कर दें और ईश्वर तक पहुंच जाएं। तंत्र साधना में शक्तियों के लालच में यह क्रिया की गई और शिव का तीसरा नेत्र खुला।बड़े-बड़े ज्ञानी गुरुओं

ने भी यह गलती की।तो हम यह समझ ले कि हम शिव को भैरव- भैरवी साधना विधि के द्वारा नहीं पा सकते और यदि हमने ऐसा करने का प्रयास किया तो शिव का तीसरा नेत्र खुलेगा।

इसमें कोई दो राय नहीं है।अब हमें यह जानना है कि शिव तक पहुंचने का रास्ता क्या है। वास्तव में 'एलिमेंट्स आर नेक्स्ट टू गॉड' और इसलिए हमें एलिमेंट को समझना पड़ेगा।सभी त्रिदोष- त्रिगुण (6) में हमें शिव को देखना पड़ेगा और साम्यावस्था बनानी पड़ेगी तो शिव तक पहुंच जाएंगे।

8-क्या अर्थ है 'एलिमेंट्स आर नेक्स्ट टू गॉड' का.....

06 POINTS;-

1-मनुष्य केवल दृश्य और अदृश्य पदार्थो का मेल है । फिर भी प्रत्येक मनुष्य का स्वभाव, बर्ताव और कार्य भिन्न भिन्न होते है। इसका कारण है प्रकृति के तीन एलिमेंट ;जिनके कम और अधिक मात्रा के समन्वय से मनुष्य का स्वभाव बनता है। कोई व्यक्ति जल-तत्व प्रधान है,कोई अग्नि-तत्व प्रधान है,तो कोई वायु-तत्व प्रधान है।हमारे दिमाग रूपी कम्प्यूटर में जो चिप लगायी गयी.. हमारा स्वभाव और बर्ताव वैसा ही होगा जो अपरिवर्तिनीय है।हम इसे केवल विकृत ही कर सकते है...परिवर्तित नही कर सकते।प्रत्येक मनुष्य अपने तत्व के अनुसार ही बर्ताव कर रहा है।परंतु हम परेशान हैं कि वह ऐसा क्यों कर रहा है, उसने ऐसा क्यों किया था?.. वगैरह-वगैरह।

2-प्रत्येक एलिमेंट का एक पॉजिटिव है और एक नेगेटिव! उदाहरण के लिए फायर एलिमेंट का पॉजिटिव एग्जांपल है अर्जुन और नेगेटिव एग्जांपल है दुर्योधन।एयर एलिमेंट का पॉजिटिव एग्जांपल है युधिष्ठिर और नेगेटिव एग्जांपल है शकुनी! वाटर एलिमेंट का पॉजिटिव एग्जांपल है भीम और नेगेटिव एग्जांपल है दुशासन! और माया तो षट चक्रों में ही तक चलती है। माया के 6 चक्रों को जाने बिना अथार्त उसके 6 एलिमेंट को स्वीकार किये बिना हम शिव तक नहीं पहुंच सकते।यह कहना कि हमने किसी को माफ कर दिया है ;हमें अहंकार में फंसा देता है इसलिए हमें किसी भी एलिमेंट को उसी के स्वरूप में स्वीकार करना होगा।

3- त्रिगुण ..जो वर्तमान में हैं, वही भविष्य में है,जो भविष्य में है, वही भूत में भी हैं।ये तीनों ही काल एक दूसरे के विरोधी हैं ,परन्तु आत्मतत्व स्वरुप से एक ही हैं।इसलिए एक उपासक के लिए अनिवार्य है कि वह सभी 3 तत्व के मनुष्यों से अपना संतुलन बनाए।ऐसा करके ही हम भौतिक जगत और आध्यात्मिक जगत दोनों में ही संतुलन स्थापित कर सकते हैं, सफलता प्राप्त कर सकते हैं ; शिवत्व तक पहुंच सकते हैं।शिव पर बेलपत्र और शमी पत्र चढ़ता है।बेलपत्र का अर्थ है..त्रिगुण को सम्मान देना।और शमी पत्र का अर्थ है..सभी छह एलिमेंट में सम हो जाना। सारी साधना का अर्थ ही है साम्यवस्था।ना बैरागी सफल है ना गृहस्थ और ना रागी सफल है ना बैरागी। सारी विधा साम्यावस्था की है।

4-यदि वाटर एलिमेंट पैर है ..आधार देता है तो फायर एलिमेंट चेहरा है। एयर एलिमेंट चेहरे और पैर दोनों को जोड़ता है तो आप हीं बताइए .. क्या बगैर तीनों के आप कुछ कर सकते हैं? बगैर तीनों के मिले किसी भी काम में सफलता नहीं मिल सकती।भारत में परिवारों का विघटन हुआ अथार्त त्रिगुण के सांख्य का विघटन हुआ।और यही कारण है सभी दुखी हैं और

दुखी ही रहेंगे जब तक अपना सांख्य पूरा नहीं कर लेंगे।तभी हम इस संसार में भी सफल हो सकते हैं और शिव शक्ति के उपासक भी बन सकते हैं ...निर्णय हमारा है।प्रत्येक मनुष्य का स्वभाव, बर्ताव और कार्य अपने एलिमेंट के अनुसार ही है;हमें ये स्वीकार करना होगा।और हम किसी का स्वभाव या बर्ताव बदल भी नहीं सकते।यहां तक ..हम अपने एलिमेंट को भी नहीं बदल सकते हैं।प्रत्येक एलिमेंट की साधना भी तीन प्रकार की होती है अथार्त साधना के दौरान की गति (स्थित) तीन तरह की होती है—(1) पक्षी गति... एयर एलिमेंट (2) वानर गति... फायर एलिमेंट (3) पिपीलिका(चींटी ) गति....वाटर एलिमेंट।

5-वास्तव में, अपने एलिमेंट के अनुसार व्यवहार करने से ही हमारी उन्नति हो सकती है।सत्य तो यह है कि हमारी मृत्यु के पश्चात भी हमारा एलिमेंट हमारी शरीर की राख में विद्यमान रहता हैं।और पुनर्जन्म होने पर भी वही एलिमेंट हमें प्राप्त होता है। सांख्य विकासवादी दर्शन

है।प्रत्येक तत्व के दो रूप होते हैं, एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म। सूक्ष्म ही विकसित होकर स्थूल बनता है। सांख्य दर्शन के अनुसार प्रत्येक तत्व का अपना गुण है। आकाश का गुण शब्द है। वायु का विकास आकाश से ही हुआ लेकिन आकाश बना रहा। उसके बाद वाले तत्वों में भी पूर्ववर्ती सभी तत्वों के गुण आये। महाभारत में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यही सांख्य समझाया था।

6-हमें यह भी समझना पड़ेगा कि शिव तक पहुंचने के लिए कोई भी डायरेक्ट सीधा/ मार्ग नहीं है।देवी शक्ति ही हमें उन तक पहुंचा सकती है परंतु देवी शक्ति भी हमें तभी पहुंचाती है जब हमारा कारण पर्सनल ना होकर जनकल्याण का होता है।वैष्णव पद्धति में षोडशोपचार पूजन होता है, लेकिन तंत्र में पंचोपचार पूजन होता है।फिर हम पांच तत्वों से त्रिगुण में ,द्वैत में और अंत में हम अद्वैत तक पहुंच जाते हैं।वैष्णव पद्धति हमें स्थूल का ज्ञान करा देती है अथार्त तंत्र हमें सूक्ष्म से सूक्ष्मतर अथार्त 16 से 5; 5 से 3; 3 से 2 और अंत में अद्वैत की ओर ले जाता हैं।

9-कुंडलिनी साधना को उल्टी यात्रा क्यों कहते हैं ?-

04 POINTS;-

1-वास्तव में तीनों एलिमेंट का लव ट्रायंगल हैं। उदाहरण के लिए शिव 'ज्ञान और ट्रांसफॉर्मेशन 'के देवता हैं अथार्त एयर एलिमेंट! उनके आराध्य हैं श्रीविष्णु ; जो वाटर एलिमेंट

हैं अथार्त ज्ञान का संचय और पालन करते हैं। श्रीविष्णु के आराध्य हैं ब्रह्मा..जो फायर एलिमेंट हैं।वह उस ज्ञान से सृष्टि का निर्माण करते हैं और लाभ उठाते हैं।परंतु समस्या यह है कि ब्रह्मा जब लाभ उठाते हैं तब उनको अहंकार आ जाता है ।ब्रह्मा के आराध्य हैं शिव और अहंकार है शिव का भोजन।तब शिव अहंकार का विनाश कर देते हैं।जब सर्किल शुरू होता है ;शिव ज्ञान का प्रतीक है।लेकिन सर्किल के अंत में ,जब ब्रह्मा शिव की आराधना करते हैं और श्रीविष्णु के संचित ज्ञान का प्रयोग लाभ में करके अहंकारी हो जाते हैं ;तब डिस्ट्रक्शन होता है। सारी दुनिया ऐसे ही चल रही है।यह सीधा सर्किल हैं!इस प्रकार एयर एलिमेंट भागता है ..वाटर एलिमेंट के पीछे ;वाटर एलिमेंट भागता है ..फायर एलिमेंट के पीछे और फायर एलिमेंट भागता है ..एयर एलिमेंट के पीछे अथार्त लव ट्रायंगल।

2-एयर एलिमेंट ज्ञान दे रहा है। वाटर एलिमेंट ज्ञान का संचय कर रहा है। फायर एलिमेंट उस ज्ञान से लाभ उठा रहा है।और फायर एलिमेंट का स्वभाव है लाभ के पीछे भागना और अहंकारी होना।अहंकार हमेशा पर्सनल ही होता है।और इसीलिए दुनिया में समस्याएं फैली हुई है।यह उल्टा सर्किल कैसे और कब शुरू होगा? यह तब शुरू होगा जब शिव के ज्ञान को विष्णु संचय करें और ब्रह्मा लाभ उठाये।परन्तु ब्रह्मा शिव की तरफ ना मुड़कर विष्णु की तरफ मुड़ जाएं।अथार्त फायर एलिमेंट पालन की तरफ रुख मोड़ ले ।जब ब्रह्मा लाभ लेने के बाद पालनहार विष्णु की तरफ बढ़ेंगे तो विष्णु शिव की तरफ जाएंगे।अथार्त पालन का ज्ञान आगे बढ़ेगा। यही उल्टा सर्किल है कि जैसे आया था वैसे ही वापस कर दो।इसी को कबीरदास कहते हैं ''बहुत जतन से ओढ़ी चदरिया, और ज्यों की त्यों धरि दीन्हीं''।

3-इसका उदाहरण है 'श्री राम' जो फायर एलिमेंट का प्रतीक है।उन्होंने वाटर एलिमेंट के संचित ज्ञान को लाभ में बदला और पुनः उस ज्ञान को पालनहार विष्णु की तरफ ही मोड़ दिया।उन्होंने ज्ञान का लाभ स्वयं ना लेकर पूरे संसार को दिया।पूरे संसार में डेमोक्रेसी का ज्ञान श्री राम के द्वारा ही आया और संसार का कल्याण हुआ।तो जब फायर एलिमेंट पालन की तरफ अथार्त विष्णु (वाटर एलिमेंट) की तरफ टर्न करेगा तो संसार का पालन करेगा और संसार में पालन का ज्ञान ही विस्तार करेगा।लेकिन अगर फायर एलिमेंट पर्सनल लाभ के लिए संचित ज्ञान का इस्तेमाल करेगा तो शिव विनाशकर्ता के रूप में ही सामने आएंगे...ज्ञान के रूप में नहीं।

4-फायर एलिमेंट जो इस संसार में केवल 2% ही है उसके ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है।इस संसार में फायर एलिमेंट का रोल गलत होने के कारण ही दुनिया में विनाश हो रहा है।एयर एलिमेंट ज्ञान देगा और विनाश भी करेगा। वाटर एलिमेंट ज्ञान का संचय करेगा और पालन करेगा।फायर एलिमेंट उस संचित ज्ञान को लाभ में बदलेगा। यहीं पर ध्यान देने की बात है। लाभ पर्सनल है या संसार का है? पर्सनल लाभ में वह विनाश की ओर बढ़ जाएगा।क्योंकि शिव तो जनकल्याण की ही बात करते हैं और पर्सनल लाभ का विनाश कर देते हैं। जैसे ही वह लाभ संसार के लिए होता है;वह ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी ट्रांसफर हो जाता है।तो फायर एलिमेंट को राजा होने के साथ-साथ पालन की तरफ रुख मोड़ना पड़ेगा।और तब इस दुनिया में परिवर्तन आएगा और हमारी साधना भी पूर्ण हो जाएगी। यही अर्थ है उल्टे चक्र का।

10-तंत्र एक प्रक्रिया है जिससे हम अपनी आत्मा और मन को बंधन मुक्त करते हैं।इस प्रक्रिया से शरीर और मन शुद्ध होता है, और ईश्वर का अनुभव करने में सहायता होती है। तंत्र की प्रक्रिया से हम भौतिक और आध्यात्मिक जीवन की हर समस्या का हल निकाल सकते हैं। ऐसी मान्यताएं हैं कि एक व्यक्ति तंत्र की सही प्रक्रिया से मष्तिष्क का पूरा इस्तेमाल कर पाता है और अद्भुत शक्तियों के स्वामी बन जाता है।तन्त्र का सामान्य अर्थ है 'विधि' या 'उपाय'। विधि या उपाय कोई सिद्धान्त नहीं है। सिद्धान्तों को लेकर मतभेद हो सकते हैं। विग्रह और विवाद भी हो सकते हैं, लेकिन विधि के सम्बन्ध में कोई मतभेद नहीं है। डूबने से बचने के लिए तैरकर ही आना पड़ेगा। बिजली चाहिए तो कोयले, पानी का अणु का रूपान्तरण करना ही पड़ेगा। दौड़ने के लिए पाँव आगे बढ़ाने ही होंगे। पर्वत पर चढ़ना है तो ऊँचाई की तरफ कदम बढ़ाये बिना कोई चारा नहीं है। यह क्रियाएँ 'विधि' कहलाती हैं।

11-तन्त्र अथवा आगम में व्यवहार पक्ष ही मुख्य है। तन्त्र की दृष्टि में शरीर प्रधान निमित्त है। उसके बिना चेतना के उच्च शिखरों तक पहुँचा ही नहीं जा सकता। इसी कारण से तन्त्र का तात्पर्य ‘तन’ के माध्यम से आत्मा का ’त्राण’ या अपने आपका उद्धार भी कहा जाता है। यह अर्थ एक सीमा तक ही सही है। वास्तव में तन्त्र साधना में शरीर, मन और काय कलेवर के सूक्ष्मतम स्तरों का समन्वित उपयोग होता है। यह अवश्य सत्य है कि तन्त्र शरीर को भी उतना ही महत्त्व देता है जितना कि मन, बुद्घि और चित को।कर्मकाण्ड और पूजा-उपासना के तरीके सभी धर्मों में अलग-अलग हैं, पर तन्त्र के सम्बन्ध में सभी एकमत हैं। सभी धर्मों का मानना है मानव के भीतर अनन्त ऊर्जा छिपी हुई है, उसका पाँच-सात प्रतिशत हिस्सा ही कार्य में आता है, शेष भाग बिना उपयोग के ही पड़ा रहता है। सभी धर्म–सम्प्रदाय इस बात को एक मत से स्वीकार करते हैं व अपने हिसाब से उस भाग का मार्ग भी बताते हैं।

12-उन धर्म-सम्प्रदायों के अनुयायी अपनी छिपी हुई शक्तियों को जगाने के लिए प्रायः एक समान विधियां ही काम में लाते हैं।तन्त्रोक्त मतानुसार मन्त्रों के द्वारा यन्त्र के माध्यम से भगवान की उपासना की जाती है।तन्त्र के सभी ग्रन्थ शिव और पार्वती के संवाद के अन्तर्गत ही प्रकट हैं। देवी पार्वती प्रश्न करती हैं और शिव उनका उत्तर देते हुए एक विधि का उपदेश करते हैं। अधिकांश प्रश्न समस्याप्रधान ही हैं। सिद्धान्त के सम्बन्ध में भी कोई प्रश्न पूछा गया हो तो भी शिव उसका उत्तर कुछ शब्दों में देने के उपरान्त विधि का ही वर्णन करते हैं।आगम शास्त्र के अनुसार 'करना' ही जानना है, अन्य कोई 'जानना' ज्ञान की परिभाषा में नहीं आता। जब तक कुछ किया नहीं जाता, साधना में प्रवेश नहीं होता, तब तक कोई उत्तर या समाधान नहीं है।

13-इस शास्त्र का सिद्धान्त है कि कलियुग में वैदिक मंत्रों, जपों और यज्ञों आदि का कोई फल नहीं होता । इस युग में सब प्रकार के कार्यों की सिद्धि के लिये तंत्राशास्त्र में वर्णित मंत्रों और उपायों आदि से ही सहायता मिलती है।यह शास्त्र प्रधानतः शाक्तों का ही है और इसके मंत्र प्रायः एकाक्षरी हुआ करते हैं । जैसे,— ह्नीं, क्लीं, श्रीं, स्थीं, शूं, क्रू आदि ।तंत्र अहंकार को समाप्त कर द्वैत के भाव को समाप्त करता है, जिससे मनुष्य, सरल हो जाता है और चेतना के स्तर पर विकसित होता है। सरल होने पर ईश्वर से संबंध सहजता से बन जाता है। तंत्र का उपयोग इईश प्राप्ति की लिए सद्भावना के साथ करना चाहिए।तांत्रिक पद्धति में योनी तंत्र का विशेष महत्व है। इस ग्रन्थ में, दस महाविद्या (देवी के दस तांत्रिक विधिओं से उपासना) वर्णित है ।यह एक विडम्बना रही है, कि भारतीय ज्ञान का यह उज्ज्वलतम पक्ष अर्थात तन्त्र से समाज भयभीत है|

14-परन्तु सचाई यह है कि तन्त्र एक पूर्ण शुद्ध एवं सात्विक विद्या है।तंत्र को शारीरिक आनंद के साथ जोड़ना अनुचित है।यदपि तंत्र में काम शक्ति का रूपांतरण, दिव्य अवस्था प्राप्ति की लिए किया जाता है;परंतु केवल गृहस्थ के लिए।वैष्णव पद्धति ब्रह्मचर्य पर विश्वास करती है।इस प्रकार से ,केवल सन्यासी ही साधना कर सकते हैं।परंतु तंत्र पद्धति सन्यासी और गृहस्थ दोनों को ही समान रूप से महत्व देती है।गृहस्थ होना कुंडलनी साधक के लिए हेल्पफुल है;प्रॉब्लम नहीं।महानिर्वाण तंत्र में भगवान शिव ने साधना के लिए शैव-विवाह की विधि भी बताई है।

तो जो अनमैरिड लोग हैं ;वे उस पद्धति का इस्तेमाल कर सकते हैं।

परंतु तंत्र विद्यामें सब कुछ एक सिस्टम में हैं।लोग तंत्र विद्या का दुरुपयोग करते हैं।शारीरिक आनंद के साथ तंत्र को जोड़ना महा-मूर्खता है।इसके लिए माया जगत है।आप वहां खूब सुख प्राप्त करें ;अपनी सभी इच्छाओं की पूर्ति करिए। परंतु अध्यात्म के नाम पर ऐसा करना दंडनीय है।

15-वैष्णव पद्धति गृहस्थ को साधना करने की अनुमति नहीं देती देती है।

परंतु शैव पद्धति देती है;क्योंकि बहुत प्रैक्टिकल है।परंतु इसका अर्थ यह नहीं हुआ क्या कि आप दुराचार करें।कम से कम साधना के नाम पर तो दुराचार नहीं करें ..पति पत्नी मिलकर साधना करें या अविवाहित लोग शैव-विवाह की विधि इस्तेमाल कर सकते हैं।परंतु एक सिस्टम में रहे।वैष्णव पद्धति अगर फल नहीं देती है तो दंड भी नहीं देती।परंतु शैव पद्धति तुरंत दंड देती है।शिव तो सो जाने पर माता पार्वती को भी क्षमा नहीं करते। उन्हें भी मत्स्या के रूप में जन्म लेना पड़ता है।तो सभी अन्य लोगों को क्यों क्षमा करेंगे?... तंत्र दुराचार का सर्टिफिकेट नहीं है। कृपया यह समझ कर आगे का लेख पढ़ें।

’तंत्र का केंद्रीय विषय क्या है?-

05 FACTS;-

1-तुम ही तंत्र के केंद्रीय विषय हो। तुम जैसे अभी हो और जो तुम्हारे भीतर छिपा है वही तो विकसित हो सकता है अथार्त जो तुम हो और जो तुम हो सकते हो। अभी इस समय तुम काम की ही एक इकाई हो। और जब तक इकाई को गहराई से न समझ लिया जाए तुम आध्यात्मिक इकाई नहीं हो सकते। कामुकता और आध्यात्मिकता एक ही ऊर्जा के

दो छोर हैं।”तंत्र” तुम जैसे हो वहीं से शुरू करता है और ''योग'' तुम हो सकते हो वहां से शुरू करता है। योग अंत के साथ शुरू करता है तंत्र आरंभ के साथ शुरू करता है। और आरंभ के साथ शुरू करना अच्छा है क्योंकि अगर अंत ही आरंभ है तब तुम व्यर्थ अपने लिए दुख पैदा कर रहे हो। तुम केवल आदर्श ही नहीं हो। तुम्हें देवता होना है और अभी तुम सिर्फ पशु हो। और यह पशु देवता के आदर्श के कारण पागल हो जाता है।

2-तंत्र कहता है ”देवता को भूल जाओ। ” अगर तुम पशु हो तो इस पशु को उसकी समग्रस्ता में समझो। उस समझ में ही देवता का जन्म होगा। और अगर उस समझ से भी देवता का जन्म न हो पाए तो भूल जाओ इसे, उसका जन्म संभव ही नहीं है। आदर्श तुम्हारी संभावनाओं को प्रकट नहीं कर सकते, केवल वास्तविकता का ज्ञान ही तुम्हारी मदद कर सकता है। इसलिए तुम ही तंत्र का केंद्रीय विषय हो–जैसे तुम हो और जैसे हो सकते हो तुम्हारी वास्तविकता और तुम्हारी संभावना... वे ही विषय-वस्तु हैं।कोई भी 'काम' की चर्चा न

हीं करना चाहता है क्योंकि तुम बच्चे को जन्म दे सकते हो अत: समझते हो कि तुम जानते हो.. हालांकि काम सबकी समस्या है। कोई प्रेम की चर्चा नहीं करना चाहता क्योंकि हर कोई समझता है कि वह तो महान प्रेमी है ही।तंत्र उनकी चर्चा करता है जिनसे तुम्हें वितृष्णा होती है तुम उनकी बात भी नहीं करना चाहते।

3-विज्ञान भैरव तंत्र में ध्यान की ऊर्ध्वगमन सम्बन्धी पाँच विधियां है।

48वे सूत्र में भगवान शिव कहते है--''प्रेम--आलिंगन में आरंभ में उसकी आरंभिक अग्‍नि पर अवधान दो, और ऐसा करते हुए अंत में उसके अंगारे से बचो।'’अथार्त जब तुम लबालब भरे हो मुक्त होने की बात ही मत सोचो। बाहर बहने को आतुर इस ऊर्जा के साथ बने रहो। वीर्य-स्खलन की जल्दी मत करो। उसे बिल्कुल ही भूल जाओ! उस ऊष्मा भरी आरंभिक स्थिति के साथ पूरी तरह हो जाओ।एक वर्तुल निर्मित करो

4-इसकी तीन संभावनाएं हैं। पति-पत्नी का मिलन रेखा गणित की तीन आकृतियां बना सकता है। एक आकृति चतुर्भुज है दूसरी त्रिकोण और तीसरी वर्तुलाकार। साधारणत: काम -कृत्य में चार कोण होते हैं.. दो नहीं–यह चतुर्भुज है। चार कोण होते हैं क्योंकि तुम दो खंडों में विभाजित हो–विचारखंड और भाव खंड–तुम्हारा सहभागी भी दो खंडों में विभाजित है।उस समय वहां दो व्यक्तियों का नहीं चार खंडों का मिलन होता है। यह एक भीड़ है। और वास्तव में ऐसे मिलन में कोई गहराई नहीं होती।जहां चार कोण हैं वहां मिलन संभव नहीं क्योंकि तुम्हारा कुछ गहनतर अंश छिपा हुआ है और तुम्हारी पत्नी का भी गहनतर अंश छिपा हुआ है। केवल दो दिमागों का मिलन हो रहा है अथार्त केवल दो विचार-प्रक्रियाओं का मिलन हो रहा है। दो भाव-प्रक्रियाओं का नहीं। वे तो छिपी हुई हैं।

5-दूसरे प्रकार का मिलन त्रिभुज की तरह हो सकता है। तुम दो हो-आधार के दो कोण। अचानक किसी क्षण में तुम एक हो जाते हो, त्रिकोण के तीसरे कोण की भांति। लेकिन अचानक एक क्षण के लिए… द्वैत खो जाता है और तुम एक हो जाते हो। यह चतुर्भुजाकार मिलन से बेहतर है क्योंकि कम से कम एक क्षण के लिए तो ऐक्य घटित होता है। वह ऐक्य तुम्हें स्वास्थ्य एवं शक्ति प्रदान करता है। तुम पुन: जीवंत और युवा अनुभव करते हो।

लेकिन तीसरे प्रकार का मिलन सबसे अच्छा है ..तंत्र-मिलन है: तुम एक वर्तुल बन जाते हो। तब कोई कोण नहीं होते, और मिलन अल्पकाल ,केवल एक क्षण के लिए ही नहीं होता उसमें समय बचता ही नहीं। और यह तभी संभव है जब तुम यह नहीं चाहते कि स्खलन हो। अगर तुम स्खलन ही चाहते हो, तो यह त्रिकोण-मिलन ही होगा-क्योंकि जैसे ही वीर्य-स्खलन होगा, मिलन-बिंदु खो जाएगा।

क्या महत्व है लयबद्ध श्वास का ?-

02 FACTS;-

1-तंत्र ने कामवासना के रूपांतरण के लिए श्वास की लय बदलने की बहुत सी विधियां विकसित की हैं।अगर कोई पति -पत्नी एक दूसरे से प्रेम करते है, तो वे ऊर्जावान होने में मदद करते हैं क्योंकि वे विपरीत ऊर्जाएं हैं।तब तुम ऊर्जा खोते नहीं हो बल्कि इसके विपरीत तुम्हें ऊर्जा प्राप्त होती है।यदि श्वास को लयबद्ध, समस्वर रख सकें, दोनों की लय वही बनी रहे, तो कोई स्खलन नहीं होगा।क्योंकि स्खलन केवल तभी होता है,जब श्वास लयबद्ध नहीं होती; केवल तभी शरीर ऊर्जा बाहर फेंक सकता है।

2-यदि श्वास लयपूर्ण है, तो शरीर ऊर्जा को आत्मसात कर लेता है; वह उसे

बाहर नहीं फेंकता।जब विपरीत ऊर्जाएं मिलती हैं और एक विद्युत धारा निर्मित करती हैं, तो वे एक दूसरे को उद्दीप्त करती हैं;वरना तो ऊर्जा खो जाती है और तुम एक्सहॉस्टटेड अनुभव करते हो। ।

'आरंभिक अवस्था में रुके रहो अंत की ओर गति मत करो''। आरंभ में कैसे रुके रहें?-

16 FACTS;-

1-बहुत सी बातें ध्यान में रखनी होंगी।पहली बात,काम- कृत्य को इस तरह मत लो जैसे कि कहीं और पहुंचना है। इसे साधन की भांति मत लो—यह अपने में ही साध्य है। इसका कोई लक्ष्य नहीं यह कोई माध्यम नहीं। दूसरी बात भविष्य की मत सोचो, वर्तमान में स्थित रहो। अगर तुम काम-कृत्य के आरंभिक भोग में वर्तमान में नहीं हो सकते तो तुम कभी भी वर्तमान में नहीं टिक सकते, क्योंकि इस कृत्य की प्रकृति ही ऐसी है कि तुम वर्तमान में फेंक दिए जाते

हो।वर्तमान में स्थित रहो। दो शरीरों ,दो आत्माओं के मिलन का सुख भोगो और एक दूसरे में लीन हो जाओ… एक दूसरे में पिघल जाओ। भूल जाओ कि तुम्हें कहीं पहुंचना है। उस क्षण में स्थित रहो कहीं जाना नहीं है पिघल जाओ। प्रेम की उष्मा पिघल कर एक दूसरे में विलीन हो जाने की परिस्थिति बनाओ।

2-इसी कारण अगर प्रेम नहीं है तो काम -कृत्य शीघ्रता में किया गया एक कृत्य है। तुम दूसरे का उपयोग कर रहे हो ..दूसरा साधन मात्र है। और दूसरा तुम्हारा उपयोग कर रहा है। तुम दोनों एक दूसरे का शोषण कर रहे हो एक दूसरे में विलीन नहीं हो रहे। प्रेम में तुम एक दूसरे में खो जाते हो। प्रारंभ में यह एक दूसरे में खो जाना एक नई दृष्टि देगा।अगर तुम इस

कृत्य को समाप्त कर देने की जल्दी में नहीं हो तो धीरे-धीरे यह कृत्य कामुक कम, और आध्यात्मिक अधिक हो जाता है। दो शारीरिक ऊर्जाओं के बीच एक घनिष्ठ सहभागिता स्थापित हो जाती है और घंटों तुम्हारा साथ बना रह सकता है। जैसे-जैसे समय बीतता है इस साथ में और-और गहराई आती जाती है। लेकिन सोच-विचार में मत पड़ना। उस क्षण के साथ रहो उसकी गहराई में डूब जाओ। वह क्षण परमानंद बन जाता है समाधि बन जाता है। अगर तुम उसे स्पष्ट अनुभव कर सको ,तो तुम्हारे चित्त की कामुकता-विलीन हो जाएगी। और उसके माध्यम से ब्रह्मचर्य उपलब्ध हो सकेगा।

3-यह विरोधाभासी प्रतीत होता है क्योंकि हम हमेशा इस ढंग से सोचते रहे हैं कि अगर किसी व्यक्ति को ब्रह्मचारी ही बने रहना है तो उसे अपने विपरीत यौन की तरफ आंख उठाकर भी नहीं चाहिए ।उससे किसी प्रकार का संबंध नहीं बनाना चाहिए… उससे बचो, भाग जाओ! तब एक झूठा ब्रह्मचर्य घटता है। मन विपरीत यौन , के बारे में निरंतर सोचता रहता है। और जितना तुम दूसरे से भागते हो उतना ही ज्यादा तुम उसके बारे में सोचने के लिए विवश हो जाते हो, क्योंकि वह तुम्हारी बुनियादी गहरी जरूरत है।तंत्र कहता है ”पलायन की चेष्टा मत

करो–पलायन संभवन नहीं। बल्कि इससे पार होने के लिए प्रकृति का उपयोग करो। संघर्ष मत करो। अतिक्रमण के लिए प्रकृति को स्वीकार करो।बस,आरंभ में ठहरकर पति या पत्नी से तुम्हारा यह संपर्क बिना अंत के अगर इसे लंबाया जा सके …। उत्तेजना शक्ति है। तुम इसे गंवा सकते हो तुम शिखर तक पहुंच सकते हो और फिर ऊर्जा नष्ट हो जाती है और पीछे आती है एक कमजोरी, एक खिन्नता। तुम इसे एक प्रकार की विश्रांति, रिलैक्सेशन की तरह ले सकते हो- यह नकारात्मक है।’’

4-तंत्र तुम्हें उच्चतर विश्रांति का एक आयाम प्रदान करता है जो सकारात्मक है। दोनों जीवनसाथी एक दूसरे में खो जाते है एक दूसरे को प्राणदाई शक्ति देते हैं ..वे एक वर्तुल बन जाते हैं और उनकी ऊर्जा एक वर्तुल में संचारण करने लगती है। वे दोनों एक दूसरे को जीवन की नव-शक्ति देते हैं कोई ऊर्जा नष्ट नहीं होती बल्कि और शक्ति प्राप्त होती है क्योंकि विपरीत यौन, के संपर्क से तुम्हारी प्रत्येक कोशिका को चुनौती मिलती है प्रत्येक कोशिका उत्तेजित हो जाती है। और अगर तुम उस उत्तेजना को शिखिर तक पहुंचने से रोककर उसमें विलीन हो सको; आरंभ में स्थिर रह सको, अग्नि को भड़कने न दो, ऊष्मा बनाए रखते हो.. तो दो उष्माओं का मिलन होगा।

5-तुम इस काम-कृत्य को, दीर्घकालिक बना सकते हो।बिना ऊर्जा को बाहर फेंके यह कृत्य ध्यान बन जाता है। और इसके द्वारा तुम्हारा खंडित व्यक्तित्व अखंडित हो जाता है।सभी

प्रकार के स्नायु-तनाव का कारण व्यक्तित्व का खंड-खंड हो जाना है।अगर ये खंड पुन: जुड़ जाएं तो तुम फिर एक निर्दोष बच्चे हो सकते हो। एक बार जब तुम निर्दोष्ता को पहचान लेते हो तुम जैसा समाज को व्यवहार चाहिए तुम करते जाते हो, लेकिन अब यह व्यवहार केवल अभिनय है ,एक नाटक है। तुम इसमें उलझे नहीं हो। यह एक जरूरत है इसलिए तुम करते हो, लेकिन तुम उसमें नहीं हो। तुम सिर्फ अभिनय कर रहे हो। तुम्हें नकली चेहरे लगाने ही पड़ेंगे, तुम एक ऐसी दुनिया में रहते हो जो झूठ है; नहीं तो यह दुनिया तुम्हें कुचल

डालेगी ।

6-तंत्र जीवन के बुनियादी प्रश्न पूछता है। इसी कारण तंत्र की काम और प्रेम में इतनी रुचि है–ये आधारभूत हैं। तुम इन्हीं के माध्यम से आए हो तुम इनका ही अंश हो।तुम काम-ऊर्जा

का ही खेल हो, और कुछ नहीं हो। और जब तक तुम इस ऊर्जा को जानोगे नहीं इसका अतिक्रमण नहीं कर लोगे तब तक तुम कुछ और नहीं हो सकते। तुम अभी इस समय काम-ऊर्जा के सिवाय और कुछ नहीं हो। तुम इससे कुछ ज्यादा हो सकते हो। लेकिन अगर तुम इसे जानते नहीं इसका अतिक्रमण नहीं करते, तो तुम इससे ज्यादा कभी नहीं हो सकते। बीज ही बने रहने की संभावना है।

7-इसलिए तंत्र का रस काम, प्रेम और नैसर्गिक जीवन में है। तंत्र कहता है अगर तुम संघर्षशील प्रवृत्ति के व्यक्त्ति हो तो तुम कुछ भी नहीं जान सकते तब तुम ग्रहणशील नहीं होते। क्योंकि तब तुम जूझ रहे हो अत: रहस्य तुम पर प्रकट नहीं हो सकेंगे। तुम उन्हें ग्रहण करने

के लिए खुले नहीं हो।और जब तुम संघर्ष कर रहे हो ;जूझ रहे हो तो तुम सदा बाहर हो। अगर तुम काम-वासना से लड़ रहे हो तो तुम बाहर हो। अगर तुम काम-वासना को समर्पित हो जाते हो, तो तुम उसके अंतरतम में प्रवेश कर जाते हो और बहुत–सी बातें तुम्हें ज्ञात हो जाती हैं।

तुमने काम को भोगा है लेकिन उसके पीछे हमेशा संघर्ष की वृत्ति रही है। इसलिए उसके बहुत–से रहस्यों को तुम जान नहीं पाए।

8-उदाहरण के लिए तुम्हें काम की जीवन दायिनी शक्तियों का पता नहीं है। क्योंकि उनको

जानने के लिए अंतर्मुखता चाहिए।अगर तुम सच में काम-ऊर्जा के साथ बह रहे हो उसके आगे समग्र-समर्पण है तो देर-अबेर तुम उस बिंदु पर पहुंच जाओगे जब तुम्हें यह ज्ञात होगा कि काम केवल एक नये जीव को ही जन्म नहीं दे सकता, बल्कि और अधिक जीवन-शक्ति भी

प्रदान कर सकता है। पति-पत्नी के लिए काम जीवन-शक्ति बन सकता है लेकिन उसके लिए समर्पण चाहिए। और अगर एक बार समर्पण कर दिया, तो अनेक आयाम बदल जाते हैं।

उदाहरण के लिए तंत्र और ताओ कहते हैं कि'' वीर्य-स्खलन इसलिए होता है क्योंकि तुम संघर्ष कर रहे हो लेकिन इसकी जरूरत नहीं है।अगर व्यक्ति काम -कृत्य में उतावला न हो,

केवल गहरे विश्राम में ही शिथिल हो ,तो वह एक हजार वर्ष जी सकता है''।

9-अगर स्त्री और पुरुष एक दूसरे के साथ गहरे विश्राम में हो ,एक दूसरे में डूबे हों कोई जल्दी न हो, कोई तनाव न हो, तो बहुत कुछ घट सकता है रासायनिक चीजें घट सकती हैं। क्योंकि उस समय दोनों के जीवन-रसों का मिलन होता है दोनों की शरीर-विद्युत, दोनों की जीवन-ऊर्जा का मिलन होता है। और केवल इस मिलन से–क्योंकि ये दोनों एक दूसरे से विपरीत हैं–एक पॉजिटिव है एक नेगेटिव है। ये दो विपरीत ध्रुव हैं–सिर्फ गहराई में मिलन से वे एक दूसरे को और जीवतंता प्रदान करते हैं।वे बिना वृद्धावस्था को प्राप्त हुए लंबे समय तक जी

सकते हैं। लेकिन यह तभी जाना जा सकता है जब तुम संघर्ष नहीं करते। यह बात विरोधाभासी प्रतीत होती है। जो कामवासना से लड़ रहे हैं उनका वीर्य स्खलन जल्दी हो जाएगा, क्योंकि तनाव ग्रस्त चित्त तनाव से मुक्त होने की जल्दी में होता है।

10-नई खोजों ने कई आश्चर्य चकित करने वाले तथ्यों को उद्धाटित किया है कि गहन काम-कृत्य में क्या-क्या घटित होता है। उन्हें यह पता चला कि पचहत्तर प्रतिशत पुरुषों का समय से पहले ही वीर्य-स्खलन हो जाता हैऔर काम-कृत्य समाप्त हो जाता है।और नब्बे प्रतिशत स्त्रियां काम के आनंद-शिखर तक पहुंचती ही नहीं।इसी कारण स्त्रियां इतनी चिड़चिड़ीऔर क्रोधी

होती हैं और वे ऐसी ही रहेंगी। कोई ध्यान , कोई दर्शन, कोई धर्म, कोई नैतिकता आसानी से उनकी सहायता नहीं कर सकता।वह परिवार के लिए एक समस्या ही बनी रहेगी। वह हमेशा झगड़ने के लिए तैयार होगी।और क्योंकि स्त्रियां काम संवेग तक नहीं पहुंचती, वे काम-विरोधी हो जाती हैं। वे इसके लिए तैयार भी नहीं होतीं क्योंकि उन्हें कभी इससे कोई सुख भी तो प्राप्त नहीं होता।उलटे, उन्हें तो ऐसा लगता है कि उन्हें इस्तेमाल किया गया है ,वस्तु की भांति उपयोग कर उन्हें फेंक दिया गया है।

11-पतिपुरुष संतुष्ट है और तब वह करवट लेता है और सो जाता है और पत्नी रोती है। उसका उपयोग किया गया है और यह प्रतीति उसे किसी भी रूप में तृप्ति नहीं देती। इससे उसका पति तो छुटकारा पाकर हल्का हो गया लेकिन उसके लिए यह कोई संतोषप्रद अनुभव न था।

तंत्र कहता है ”जब तुम उत्तेजित हो तब कभी काम- भोग मत करना।” यह बात बहुत असंगत प्रतीत होती है क्योंकि तुम तभी काम- भोग करना चाहते हो.. जब तुम उत्तेजित हो। और दोनों साथी काम- भोग के लिए एक दूसरे को उत्तेजित करते हैं।लेकिन तंत्र कहता है ”उत्तेजना में तुम अपनी शक्ति का व्यर्थ व्यय करते हो।”जब तुम शांत, गंभीर और ध्यान में हो-तब प्रेम करो। पहले ध्यान करो फिर प्रेम करो। और काम- भोग करते समय भी मर्यादा में रहो। मर्यादा से अभिप्राय है ..सीमा के बाहर मत जाओ। उत्तेजित और हिंसात्मक मत होओ ताकि तुम्हारी ऊर्जा बिखर न जाए।

12-अगर तुम व्यक्तियों को प्रेम करते देखो तो लगेगा कि वे लड़ रहे हैं। यह बड़ा हिंसात्मक प्रतीत होता है यह लड़ाई जैसा दिखाई देता है। यह निश्चय ही अधिक संगीतात्मक लयबद्ध और हारमोनियस होना चाहिए। ऐसा प्रतीत होना चाहिए जैसे दोनों नृत्य कर रहे हैं लड़ नहीं रहे–एक मधुर धुन गा रहे हैं एक ऐसा वातावरण निर्मित कर रहे हैं जिसमें वे एक दूसरे में डूब सकें विलीन हो सकें ,एकाकार हो सकें। और फिर शांति हो जाएं। तंत्र का यही अर्थ है।तंत्र का कामुकता से नहीं काम से संबंध है। और यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि प्रकृति अपने रहस्यो को इन्हीं शांत और विश्राम के क्षणों में तुम पर प्रकट करती है। तब तुम जो कुछ भी घट रहा है उसके प्रति होशपूर्ण होने लगते हो। इस होशपूर्ण अवस्था में कई रहस्यों का उदघाटन तुम्हारे मन में होने लगता है।

13-जब कोई चिंता नहीं, और अगर प्रेम गहरा है तो दोनों शरीर एक दूसरे को शक्ति प्रदान कर सकते है तथा वीर्य स्खलन पूरी तरह रोका जा सकता है। दो प्रेमी एक दूसरे में वर्षों तक मिल सकते हैं, बिना स्खलन के, बिना शक्ति खोए। वे एक दूसरे के साथ विश्राम में हो सकते हैं। उनके शरीर मिलते हैं और शिथिल हो जाते हैं और देर-अबेर काम उत्तेजना नहीं रहती। अभी वह उत्तेजना है। तब वह उत्तेजना नहीं विश्रांति है रिलैग्जेशन है; एक गहन समर्पण। अंग्रेजी में जिसके लिए सटीक शब्द है– ”लेट गो”।

लेकिन यह तभी संभव है जब पहले तुमने स्वयं को इस प्राण-ऊर्जा को समर्पित कर दिया है।

14-पहली बात, काम जीवनदायी हो जाता है। अभी तो जैसा है मृत्युदायी है। इसके द्वारा तुम सिर्फ मुत्यु को ही प्राप्त हो रहे हो;स्वयं को व्यर्थ खो रहे हो। दूसरी बात यह नैसर्गिक गहनतम ध्यान बन जाता है। तुम्हारे विचार पूर्ण रूप से रुक जाते हैं। जब तुम अपने प्रेमी के साथ पूरी तरफ विश्रांति में होते हो तुम्हारे विचार रुक जाते हैं। बुद्धि वहां नहीं होती केवल तुम्हारा हृदय धड़कता है। वह प्राकृतिक ध्यान बन जाता है।अगर तुम्हें ध्यान में उतरने के लिए प्रेम सहायता नहीं कर सकता तो और कुछ भी सहायता करने में समर्थ नहीं है।प्रेम अपने में

ध्यान है। लेकिन तुम्हें प्रेम का पता नहीं तुम्हें केवल 'काम' का पता है। और तुम्हें ऊर्जा को व्यर्थ गंवाने की पीड़ा का पता है। और बाद में तुम एक खिन्नता एक उदासी अनुभव करते हो। तब तुम ब्रह्मचर्य का व्रत लेने का निर्णय करते हो। यह व्रत तुम निराशा और उदासी के क्षणों में लेते हो ;क्रोध में लेते हो ;कुंठित मन से लेते हो। यह सहायक सिद्ध नहीं होगा।

15-यह व्रत तभी सहायक हो सकता है अगर गहन विश्राम, और ध्यान की अवस्था में लिया जाए–नहीं तो तुम केवल अपने क्रोध, और कुंठा के सिवाय और कुछ भी प्रगट नहीं कर रहे। और तुम अपनी प्रतिज्ञा को चौबीस घंटे की भीतर ही भूल जाओगे। ऊर्जा फिर निर्मित हो जाएगी और फिर उसी पुरानी चर्चा के कारण तुम्हें इससे छुटकारा पाने के लिए विवश होना

पड़ेगा।इसलिए 'काम' तुम्हारे लिए एक छींक से ज्यादा नहीं है। तुम एक उत्तेजना अनुभव करते हो और छींक की भांति बाहर फेंककर राहत महसूस करते हो।तंत्र कहता है ''काम

बहुत गहरा है क्योंकि यह जीवन है।” लेकिन तुम गलत कारणों से इसमें रुचि रखते हो। तंत्र में गलत कारणों से आकिर्षत मत होना ; तब तंत्र जीवन रूपांतरण कर

देगा।इन विधियों का योग में भी प्रयोग होता रहा है लेकिन शत्रु-भाव से। तंत्र उन्हीं विधियों का

प्रयोग करता है... लेकिन मित्र-भाव से, प्रेम-भाव से। इससे विधि में गुणात्मक अंतर पड़ जाता है क्योंकि पूरी पृष्ठभूमि ही बदल जाती है।

क्या काम- कृत्य में किसी विशेष आसन के अभ्यास की आवश्यकता है?-

06 FACTS;-

1-आसन का कोई महत्व नहीं। आसन की बात ही असंगत है। असली बात तो चित्त की अवस्था है–शरीर की नहीं लेकिन यदि तुम अपने मन में परिवर्तन करते हो तो हो सकता है तुम आसन भी बदलना चाहो। ये दोनों एक दूसरे से जुड़े हैं लेकिन बुनियादी नहीं हैं।

उदाहरण के लिए काम- कृत्य में पुरुष हमेशा स्त्री के ऊपर होता है। यह अहंकारी व्यक्ति का आसन है। क्योंकि पुरुष हमेशा यह सोचता है कि वह स्त्री से अधिक योग्य है ,उच्च है ,श्रेष्ठ है अत: वह स्त्री के नीचे कैसे हो सकता है? लेकिन पूरी दुनिया के आदिवासी समाजों में स्त्री पुरुष के ऊपर लेटती है।

2-इसलिए अफ्रीका में इसे 'मिशनरी पोस्चर'/ ''धर्मदूत का आसन'' कहते हैं–क्योंकि पहली बार जब ईसाई धर्म प्रचारक अफ्रीका पहुंचे आदिवासी समझ ही न पाए कि ”ये लोग क्या कर रहे हैं? ये औरत को मार ही डालेगे।”अफ्रीका में इसे मिशनरी पोस्चर कहते हैं।

वहां के आदिवासी इसे हिंसात्मक मानते हैं। स्त्री नाजुक और कमजोर है उसे पुरुष के ऊपर होना चाहिए। लेकिन पुरुष के लिए ऐसा सोचना भी मुश्किल है कि वह स्त्री से नीचा है और वह स्त्री के नीचे हो।

3-अगर तुम्हारी मनःस्थिति में कुछ परिवर्तन आता है तो बहुत कुछ बदल जाएगा। बहुत–से कारणों से यह उचित है कि स्त्री पुरुष के ऊपर हो। क्योंकि अगर स्त्री पुरुष के ऊपर है…वह निष्क्रिय है वह अधिक हिंसात्मक नहीं हो सकती।वह केवल शिथिल होगी और उसके नीचे लेटा पुरुष कुछ ज्यादा नहीं कर सकता। यह अच्छी बात है।अगर वह ऊपर हो तो निश्चित ही हिंसात्मक हो जाएगा। तंत्र के लिए तुम्हें निश्चेष्ट और शिथिल होना पड़ेगा इसलिए यह उचित है कि स्त्री ऊपर लेटी है। वह पुरुष से कहीं ज्यादा शांत और शिथिल हो सकती है क्योंकि वह स्वभाव से ही निष्क्रिय /पैसिव है।

4-आसन बदल जाएगा, लेकिन इसकी अधिक फिक्र मत करो। पहले अपनी चित्त-दशा को बदलो। जीवन-ऊर्जा के प्रति समर्पित हो जाओ इसके साथ बहो। अगर कहीं सच में ही समर्पित हो गए तो तुम्हारे शरीर उस क्षण स्वत: ही उस अवस्था में आ जाएंगे जिसकी आवश्यकता है। अगर दोनों साथियों का समर्पण गहरा है तब उनके शरीर ठीक उस आसन में आ जाएंगे जिसकी उस घड़ी जरूरत है।और प्रतिदिन परिस्थितियां बदल जाती हैं

इसलिए पहले से ही इसको निर्धारित करने की जरूरत नहीं। यही भूल है कि तुम पहले से ही निश्चित करना चाहते हो। जब भी तुम कुछ पहले से निश्चित करना चाहते हो तो स्मरण रहे यह निश्चय तुम्हारा मन ही करता है। इसका अर्थ हुआ कि तुम समर्पण नहीं कर रहे।

5-अगर तुम समर्पण करते हो तो चीजों को अपने ढंग से घटने दो।और तब एक आश्चर्यजनक समस्वरता /हारमनी घटित होती है ।जब दोनों साथी समर्पण कर देते हैं। वे कई आसन बदलेंगे या फिर वैसे ही पड़े रहेंगे शांत और शिथिल। लेकिन, यह सब बुद्धि द्वारा पहले से किए गए निश्चयों पर नहीं बल्कि जीवन-उर्जा पर निर्भर करता है। पहले कुछ भी निश्चित करने की जरूरत नहीं। यह निश्चय ही समस्या है।प्रेम करने से पहले तुम सब तय कर लेना चाहते हो।

प्रेम करने के लिए तुम पुस्तकें पढ़ते हो। ऐसी पुस्तकें भी हैं जो सिखाती हैं कि कैसे प्रेम किया जाए। इससे यही स्पष्ट होता है कि हमने कैसी मानवीय बुद्धि का विकास किया है–कैसे प्रेम करे! तब प्रेम मस्तिष्क का विषय हो जाता है तुम उसके विषय में सोचते हो मन ही मन उसका रिहर्सल करते हो और फिर इसे कृत्य का रूप देते हो। वह कृत्रिम है वास्तविक नहीं जब तुम रिहर्सल करते हो तो यह अभिनय हो जाता है अप्रामाणिक हो जाता है।

6-बस, समर्पित हो जाओ और ऊर्जा के साथ-साथ बहो, और फिर वह तुम्हें कहीं भी ले जाए। अपने जीवनसाथी के साथ भी यदि तुम निर्भय नहीं हो सकते, तब कहां, किसके साथ निर्भय हो सकोगे? और एक बार तुम्हें यह अनुभव हो जाए कि जीवन-उर्जा स्वत: ही सहायता करती है और उचित मार्ग, जो अपेक्षित है, पर ले जाती है, तब तुम्हें जीवन को देने की गहल अंतदृष्टि उपलब्ध होगी। तब तुम अपना सारा जीवन उस परम सत्ता /परमात्मा के हाथों पर छोड़ सकते

हो।तब तुम सोचते नहीं और योजनाएं नहीं बनाते, तुम भविष्य को बलपूर्वक अपने अनुसार बनाने की चेष्टा नहीं करते हो।

लेकिन काम-कृत्य को ध्यान कैसे बनाया जाए?-

04 FACTS;-

1-समर्पण मात्र से ही ऐसा हो जाता है। उसके विषय में सोचो मत, उसे होने दो। तुम शांत और शिथिल पड़े रहो, और आगे कुछ मत करो। मन के साथ यही समस्या है। वह हमेशा आगे की सोचता है, हमेशा परिणाम की सोचता है और परिणाम भविष्य में है। इसलिए कृत्य में तुम स्वयं कभी उपस्थित नहीं होते। फलाकांक्षा के कारण तुम हमेशा भविष्य में होते हो। फल की आकांक्षा सब गड़बड़ कर देती, सब बिगाड़ देती है।केवल कृत्य में ही रहो। भविष्य को

भूल जाओ। वह आयेगा ही, उसकी चिंता करने की जरूरत नहीं। चिंता करके तुम उसे ला नहीं सकते। वह आ ही रहा है, वह आ ही गया है। तुम उसकी चिंता मत करो। तुम बस, यहां और अभी ”हेयर एंड नाओ” बने रहो।

2-यहां और अभी होने के लिए काम एक गहरी अंतदृष्टि बन सकता है।सब भूल जाओ।

उस क्षण में बहो और तुम्हारे शरीर भली भांति जानते हैं, उनकी अपनी समझ है। तुम्हारे शरीर काम-कोशिकाओं से बने हैं। इनके भीतर सब कार्य पहले से निर्धारित हैं, तुमसे कुछ भी नहीं पूछा गया। बस, सब शरीर पर छोड़ दो; और यह सब छोड़ देना, यह ”लेट गो” स्वत:

ध्यान बन जायेगा।और अगर तुम ''काम-'' में ध्यान का अनुभव पा सको, तो एक बात तुम्हें समझ आ जाएगी कि जब भी तुम समर्पण कर पाते हो, तुम्हें वही अनुभूति होती है। फिर तुम्हारा सिर खाली हो जाएगा, तुम विचार शून्य हो जाओगे। तुम ध्यानावस्था में होओगे।अब तुम समर्पण करना जानते हो, बस यही पर्याप्त है।

3-तुम आकाश के प्रति समर्पित हो सकते हो–तुम वृक्ष के आगे समर्पण कर सकते हो…और क्योंकि हम समर्पण करना नहीं जानते;इसीलिए यह मूर्खतापूर्ण लगता है। हम किसी आदिवासी या ग्रामीण को देखते हैं, वह नदी पर जाता है, नदी को समर्पित होता है, उसे देवी मां कहता है या ऊगते सूर्य के प्रति समर्पण करता है और उसे महान देवता कहता है या पेड़ के पास जाता है; सिर झुकाता है और समर्पित हो जाता है।हमारे लिए वह अंधविश्वास है,

तुम उसे कहते कि यह क्या मूर्खता कर रहे हो? पेड़ क्या कर सकता है? नदी क्या कर सकती है? और सूर्य क्या करेगा? देवी-देवता नहीं हैं। अगर तुम समर्पण कर सको तो कुछ भी देवता बन सकता है। अत: तुम्हारा समर्पण ही उसे दिव्य बना देता है। कुछ भी दिव्य नहीं है केवल तुम्हारा समर्पण करने वाला मन ही दिव्य बना देता है।

4-अपनी पत्नी के प्रति समर्पित हो जाओ और वह दिव्य हो जाती है; अपने पति के प्रति

समर्पण करो, वह दिव्य हो जाता है।दिव्यता समर्पण के माध्यम से प्रकट होती है। पत्थर के प्रति समर्पण होते ही वह पत्थर नहीं रह जाता–पत्थर एक मूर्ति, एक सजीव मूर्ति हो जाता है।

तुम्हारे पास प्रेम में समर्पित होने की प्राकृतिक संभावना है। समर्पित हो जाओ और इसे अनुभव करो। और तब अपने पूरे जीवन पर इसे छा जाने दो।

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क्या त्याग दूसरे को यातना देने की चाल है?-

11 FACTS;-

1-नकली व्यक्तित्व हमेशा भोग के विरुद्ध है। वह हमेशा तुम्हारे विरुद्ध है। तुम्हें प्रसन्न नहीं होना चाहिए। वह हमेशा त्याग के पक्ष में है–स्वयं का त्याग करो दूसरों के लिए अपना त्याग करो। ऊपर से देखने पर यह बात बहुत सुंदर मालूम होती है क्योंकि हम ऐसी ही मान्यताओं के साथ बड़े हुए है : ”दूसरों के लिए अपना त्याग करो—यह परोपकार है। अगर तुम स्वयं को खुश करने का प्रयत्न करते हो तो यह स्वार्थ है।” और जैसे ही कोई कहता है कि यह स्वार्थ है पाप की भावना पैदा हो जाती है।

2-किन तंत्र का ढंग मूल रूप से भिन्न है। तंत्र कहता है ”जब तक तुम स्वयं प्रसन्न नहीं हो आनंदित नहीं हो दूसरों को प्रसन्न करने में, आनंदित होने में मदद नहीं कर सकते। जब तक तुम वास्तव में अपने से संतुष्ट नहीं हो, तुम दूसरों की सेवा नहीं कर सकते; तुम दूसरों को संतुष्ट होने में सहायक नहीं हो सकते। जब तक तुम स्वयं आनंद से परिपूर्ण नहीं, तुम समाज के लिए खतरा हो, क्योंकि जो आदमी हमेशा दूसरों के लिए त्याग करता है वह आत्मपीड़ित बन जाता है। ”अगर तुम्हारी मां निरंतर यही कहती रहे कि ”मैंने तुम्हारे लिए कितना त्याग किया है” तो तुम्हारे लिए वह यातना बन जाएगी। अगर पति पत्नी से यही कहता रहे कि ”मैं त्याग कर रहा हूं तो वह आत्मपीड़ा से अपनी पत्नी को सता रहा है।

त्याग दूसरे को यातना देने की चाल है।

3-इसलिए जो हमेशा त्याग कर रहे हैं वे बहुत खतरनाक हैं। उनसे बचना और त्याग मत करना। यह शब्द ही भद्दा है। स्वयं को प्रसन्न करो उत्सव मनाओ -आनंद से भर जाओ और जब तुम आनंद से इतना भर जाओ कि वह छलकने लगे, तब वह आनंद दूसरों तक पहुंच ही जाएगा। लेकिन यह त्याग नहीं होगा। तुमने किसी का उपकार नहीं किया, किसी को तुम्हें धन्यवाद देने की जरूरत नहीं; बल्कि तुम उन सबके प्रति कृतज्ञता प्रकट करोगे, क्योंकि वे तुम्हारे आनंद में भागीदार बने। त्याग, सेवा, कर्तव्य जैसे शब्द कुरूप हैं हिंसक हैं।

तंत्र कहता है ”जब तक तुम स्वयं प्रकाश से नहीं भर जाते तुम दूसरों को प्रकाशित होने में कैसे सहायक होओगे?” स्वार्थी हो जाओ–तभी, केवल तभी परार्थी हो सकोगे; नहीं तो परार्थ, परोपकार की धारणा मूर्खतापूर्ण है। आनंदित होओ–तभी तुम दूसरों को आनंदित होने में सहायता दे सकोगे। अगर तुम उदास हो दुखी हो, कड़वाहट से भरे हो, तुम निश्चित ही दूसरे के प्रति हिंसक हो जाओगे और दूसरों के लिए दुख पैदा करोगे।”

4-तुम महात्मा बन सकते हो, यह बहुत कठिन नहीं है। लेकिन अपने साधु-माहात्मओं को जरा देखो। वे अपने पास आने वालों को हर तरह से सताने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन उनके सताने का ढंग ऐसा है कि तुम धोखा खा जाते हो। वे तुम्हें सताते हैं तुम्हारे लिए; वे तुम्हें यातना देते हैं तुम्हारी भलाई के लिए। क्योंकि वे स्वयं को जो यातना दे रहे हैं। तुम यह कहने की हिम्मत नहीं कर सकते कि आप हमें उसकी शिक्षा दे रहे हैं जिसका आप स्वयं अनुसरण नहीं करते। वे पहले ही से अपने को सता रहे हैं ,पीड़ा दे रहे हैं ;अब वे तुम्हें भी यातना दे सकते हैं। और जब वह यातना तुम्हें तुम्हारी भलाई के लिए दी जा रही है तब वह बहुत खतरनाक है–तुम उससे बच नहीं सकते।

5-स्वयं को प्रसन्न रखने में क्या बुराई है? सुखी होने में क्या बुराई है? अगर कुछ बुराई है तो वह तुम्हारे दुखी होने में है क्योंकि दुखी व्यक्ति अपने चारों ओर दुख की तरंगें निर्मित कर लेता

है। तंत्र कामुकता नहीं सिखाता। वह तो केवल यही कहता है कि काम महासुख का स्रोत हो सकता है। एक बार जब तुम्हें उस महासुख का पता चल जाता है तो तुम आगे बढ़ सकते हो, क्योंकि अब तुम सत्य की भूमि पर खड़े हो। व्यक्ति को सदा काम में नहीं अटके रहना है।बल्कि काम का तालाब में कूदने के लिए जंपिंग बोर्ड की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। तंत्र का यही अभिप्राय है: ”तुम इसे जंपिंग बोर्ड समझो।” और जब एक बार तुम्हें काम-सुख का अनुभव हो जाए तुम समझ सकोगे कि रहस्यदर्शियों किस की बात करते रहे हैं–एक परम, एक ब्रह्मांडीय काम-कृत्य की।

6-मीरा नाच रही है। तुम उसे समझ न पाओगे। तुम उसके गीतों को भी समझ न पाओगे। वे कामुकता पूर्ण हैं–उनमें काम-प्रतीक हैं। ऐसा होगा ही, क्योंकि आदमी के जीवन में काम-कृत्य ही एक ऐसा कृत्य है जिसमें अद्वैत की प्रतीति होती जिसमें तुम एक गहन-ऐक्य अनुभव करते हो, जिसमें अतीत मिट जाता है और भविष्य खो जाता है और बचता केवल वर्तमान–

केवल सत्य वास्तविक क्षण।इसलिए उन सभी रहस्यदर्शियों ने जिन्हें परमात्मा के साथ संपूर्ण अस्तित्व के साथ एक हो जाने की अनुभूति हुई है उन्होंने अपनी अनुभूति को अभिव्यक्त करने के लिए काम-प्रतीकों का उपयोग किया है। और कोई भी प्रतीक इतने निकट नहीं हैं।

काम केवल प्रारंभ है अंत नहीं। लेकिन अगर तुम प्रारंभ को ही चूक गए तो अंत को भी चूक जाओगे। और तुम अंत तक पहुंचने के लिए आरंभ से बच नहीं सकते।

7-तंत्र कहता है ”जीवन को उसके प्राकृतिक रूप में, सत्य रूप में ग्रहण करो। अप्राकृतिक झूठ मत होओ। काम-वासना एक गहनतम संभावना है, उसका उपयोग करो।वास्तव में, सभी नैतिकताएं प्रसन्नता-विरोधी हैं। कोई व्यक्ति प्रसन्न है तो तुम्हें लगता है कि जरूर कहीं कुछ गलत है। जब कोई उदास है तब सब ठीक है। हम एक स्नायु-रोग-ग्रस्त समाज में जीते है जहां हर व्यक्ति उदास है। जब तुम उदास हो ,दुखी हो, तब सब प्रसन्न है; क्योंकि अब सबको तुमसे सहानुभूति प्रकट करने का अवसर मिलेगा। जब तुम प्रसन्न हो तो उनको समझ नहीं आएगा कि वे क्या करें? जब कोई तुमसे सहानुभूति प्रकट करता है तब उसका चेहरा देखना। एक सूक्ष्म चमक चेहरे पर आ जाती है। वह सहानुभूति दिखाते समय प्रसन्न है। अगर तुम खुश हो, तब कोई संभावना नहीं–तुम्हारी प्रसन्नता दूसरों को उदास कर देती है। यह स्नायुरोग न्यूरोसिस है।इसका आधार ही पागलपन है।

8-तंत्र कहता है ”तुम जो हो, प्रामाणिक रूप से वही हो जाओ। तुम्हारी प्रसन्नता बुरी नहीं अच्छी है। वह पाप नहीं। केवल उदासी पाप है केवल दुखी होना पाप है। प्रसन्न होना पुण्य है क्योंकि एक प्रसन्न और प्रफुल्लित व्यक्ति ही दूसरों के लिए दुख पैदा नहीं करेगा। केवल प्रफुल्लित और प्रसन्न व्यक्ति ही दूसरों की प्रसन्नता के लिए भूमि तैयार कर सकता है।”

तंत्र विज्ञान है। तंत्र कहता है ”पहले जानो कि यथार्थ क्या है वास्तविकता क्या है आदमी क्या है? और पहले से मूल्य निर्धारित मत करो और आदर्श मत स्थापित करो पहले उसे जानो जो है। जो होना चाहिए उसके संबंध में मत सोचो, जो है केवल उसके संबंध में सोचो।” और जब एक बार उसे जान लिया जाता है जो है तब तुमउ से रूपांतरित भी कर सकते हो। अब तुम रहस्य समझ गए।

9-उदाहरण के लिए तंत्र कहता है ”काम के विरुद्ध जाने की चेष्टा मत करो क्योंकि अगर तुम काम के विरुद्ध जाकर ब्रह्मचर्य को, पवित्रता को साधने की कोशिश करते हो तो यह असंभव है। यह मात्र जादू की भांति है। बिना यह जाने कि काम-ऊर्जा क्या है बिना यह जाने कि काम-वासना की उत्पत्ति किस प्रकार होती है बिना उसकी प्रकृति की गहराई में गए बिना उसके रहस्य को जाने, तुम ब्रह्मचर्य का एक आदर्श अवश्य स्थापित कर सकते हो लेकिन तुम क्या करोगे?” तुम केवल दमन करोगे। और जो व्यक्ति इसका दमन करता है वह उस व्यक्ति से अधिक कामुक है जो इसका भोग करता है; क्योंकि भोग से ऊर्जा शांत हो जाती है क्योंकि दमन से वह तुम्हारे शरीर-तंत्र में निरंतर संचार करती रहती है।

10-जो व्यक्ति काम, को दबाना शुरू कर देता है उसे सर्वत्र काम ही काम दिखाई देने लगता है।अब वह प्रक्षेपण करता है।उसे सब जगह काम ही दिखाई पड़ेगा। क्योंकि वह स्वयं को धिक्कार रहा है वह हर किसी को धिक्कारने लगेगा ,सबकी निंदा करने लगेगा। ऐसा करना उसे अच्छा लगता है उसके अहंकार की पुष्टि होती है। लेकिन हर कोई गलत क्यों है? क्योंकि सबमें उसे वही दिखाई देता है जिसका उसने दमन किया है। उसका चित्त और-और कामुक होता जाएगा और वह और-और भयभीत होता जाएगा। यह ब्रह्मचर्य विकृति है अप्राकृतिक है।

तंत्र का अनुसरण करने वाले साधक पर भिन्न प्रकार के गुणों से युक्त एक भिन्न प्रकार का ब्रह्मचर्य घटित होता है। लेकिन उसकी प्रक्रिया बिल्कुल इसके विपरीत है।

11-तंत्र पहले यह सिखाता है कि ''काम '' में किस प्रकार गति करनी है, कैसे इसे जानना है, कैसे इसे महसूस करना है और कैसे उसकी अप्रकट गहनतम संभावनाओं को प्रकट करना है कैसे इसकी चरम सीमाओं तक पहुंचना है–किस प्रकार इसमें छिपे अनिवार्य सौंदर्य , सुख और आनंद की खोज करनी है।एक बार जब उसका रहस्य जान लेने पर तुम उसके पार

हो सकते हो क्योंकि वास्तव में गहन ''कामकृत्य ''के क्षणों में जो आनंद मिलता है वह काम-वासना के कारण नहीं मिलता, वह बिल्कुल ही दूसरे कारण से प्राप्त होता है ।काम-वासना मात्र एक परिस्थिति है। वह कुछ और ही है जिससे तुम्हें महासुख मिल रहा है। वह कुछ तीन तत्वों में बांटा जा सकता है।काम के इन तीन मूलभूत तत्वों के कारण तुम आनंद के उस क्षण तक पहुंचते हो।

क्या तीन मूलभूत तत्वों के कारण तुम आनंद के उस क्षण तक पहुंचते हो?-

04 FACTS;-

वे तीन तत्व है;-

1-पहला समय-शून्यता/टाइमलेसनेस...

तुम समय का पूरी तरह अतिक्रमण कर जाते हो तुम समय के पार हो जाते हो। वहां कोई समय नहीं। तुम समय को बिल्कुल भूल जाते हो, तुम्हारे लिए समय रुक जाता है। ऐसा नहीं कि समय रुक जाता है तुम्हारे लिए रुक जाता है। तुम समय में नहीं हो। कोई अतीत नहीं कोई भविष्य नहीं। इस क्षण में, यहीं और अभी, सारा अस्तित्व सिमट गया है। यही क्षण वास्तविक हो जाता है। अगर तुम इस क्षण बिना काम के वास्तविक क्षण बना सको तब काम-भोग की कोई आवश्यकता नहीं। ध्यान से ऐसा हो सकता है।

2-दूसरा. काम में पहली बार तुम्हारा अहंकार खो जाता है तुम निरंहकार हो जाते हो। इसलिए वे सभी जो महा अहंकारी हैं वे काम के बहुत विरुद्ध हैं क्योंकि काम में उन्हें अपना अहंकार छोड़ना पड़ता है। न तुम वहां हो और न ही दूसरा वहां है। तुम और तुम्हारा प्रेमी दोनों ही किसी और में ही खो जाते हैं। एक नया सत्य सामने आता है ;एक नई इकाई अस्तित्व में आती है;जिसमें पुराने दो खो जाते हैं–पूरी तरह मिट जाते हैं। अहंकार भयभीत है। तुम वहां बचे ही नहीं। अगर बिना काम के तुम उस क्षण को जहां तुम नहीं हो–पा सकते हो, तब काम की कोई जरूरत नहीं।

3-और तीसरा: पहली बार काम में तुम प्राकृतिक हो पाते हो। नकली खो जाता है मुखौटा उतर जाता है समाज, संस्कृति, सभ्यता सब खो जाते हैं। तुम प्रकृति के अंश हो–जैसे पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, चांद-तारे हैं।तुम किसी महान विश्व व्यवस्था में हो; ताओ में हो। तुम इसमें बह रहे हो। तुम इसमें तैर भी नहीं सकते, तुम हो ही नहीं। तुम बस बह रहे हो; धारा तुम्हें बहाए

लिए जाती है।यही तीन तत्व तुम्हें परम सुख देते हैं। काम तो केवल एक परिस्थिति है जिसमें यह सहज-स्वाभाविक रूप से घटित होता है। एक बार जब तुम इसे जान लेते हो ;तुम इन तत्वों का अनुभव कर लेते हो ;तुम बिना काम के स्वतंत्र रूप से इन्हें निर्मित कर सकते हो। सभी ध्यान निश्चित रूप से बिना काम के काम का अनुभव है।लेकिन तुम्हें इससे गुजरना होगा।यह तुम्हारा अनुभव होना चाहिए न कि सिद्धांत या विचार।

4-तंत्र काम के पक्ष में नहीं, तंत्र इसके अतिक्रमण के पक्ष में है। लेकिन तुम केवल अनुभव से इसका अतिक्रमण कर सकते हो-अनिवार्य रूप से अनुभव के द्वारा– सिद्धांतों के द्वार नहीं। केवल तंत्र के माध्यम से ही ब्रह्मचर्य उपलब्ध होता है। यह विरोधाभासी प्रतीत होता है लेकिन ऐसा नहीं है। केवल बोध से अतिक्रमण किया जा सकता है। अज्ञान अतिक्रमण करने में सहायक नहीं हो सकता केवल पाखंडी होने में सहायता कर सकता है।

क्या तंत्र, घाटी का कामोत्ताप है .. शिखर का अनुभव नहीं?-

15 FACTS;-

1-साधारण काम-कृत्य में तुम दो उत्तेजित प्राणियों की भांति मिलते हो जो तनाव से भरे हैं ;उत्तेजित है ,स्वयं को भार मुक्त करने में प्रयत्न शील हैं। साधारण काम-कृत्य पागलपन लगता है। तांत्रिक काम-कृत्य एक गहरा तनावशून्य ध्यान है।इसमें कोई शक्ति नष्ट नहीं होती, बल्कि

शक्ति प्राप्त होती है।तुम्हें इस बात का ख्याल भी नहीं होगा लेकिन यह एक जैविक जीव-ऊर्जा का एक तथ्य है कि स्त्री और पुरुष दो विपरीत शक्तियां हैं–धन और ऋण; यिन और यैग, या जो कुछ भी तुम उन्हें नाम दो। वे दोनों एक दूसरे के लिए चुनौती हैं और जब वे दोनों गहन शिथिलता में मिलते हैं तो एक दूसरे को पुन: जीवन-शक्ति प्रदान करते हैं। वे दोनों एक दूसरे में जीवन संचार करते हैं वे दोनों और युवा हो जाते हैं वे दोनों और अधिक सजीवता अनुभव करते हैं वे दोनों नव-शक्ति से कांतिमय हो जाते हैं। और नष्ट कुछ भी नहीं होता। दो विपरीत ध्रुवों के मिलन से नव शक्ति का संचार होने लगता है।

2-तांत्रिक काम कृत्य उतना किया जा सकता है जितना तुम करना चाहते हो। साधारण काम कृत्य उतना नहीं किया जा सकता जितना तुम करना चाहते हो क्योंकि उसमें तुम्हारी ऊर्जा नष्ट हो रही है और तुम्हारे शरीर को उसे पुन: प्राप्त करने के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती है। और जब फिर प्राप्त होगी तभी तुम उसे फिर गंवा सकते हो। यह बात अजीब-सी लगती है सारा जीवन इसे खर्च करने और फिर प्राप्त करने में ही व्यतीत हो जाता है। यह केवल ग्रस्तता/ आब्सेशन है।

3-दूसरी बात जो स्मरण रखने योग्य है। तुमने इस बात पर गौर नहीं किया होगा कि अगर तुम पशु-पक्षियों को देखो तो तुम उन्हेंकाम-कृत्य का आनंद लेते कभी न पाओगे। बंदरों, कुत्तों या किसी भी पशु को देखो–तुम ऐसा कभी नहीं देखोगे कि वे काम-कृत्य करते हुए हर्षित हो रहे हैं ,आनंदित हो रहे हैं। उनके लिए यह एक यांत्रिक कृत्य है.. कोई प्राकृतिक शक्ति उन्हें इस कर्म में धकेल रही है। उनके चेहरे देखो। वहां कोई आनंद की झलक नहीं–जैसे कुछ हुआ ही नहीं। जब ऊर्जा विवश करती है ;जब ऊर्जा अतिशय हो जाती है वे बाहर फेंक देते हैं।

पशु कभी इसका आनंद नहीं उठा सकते–केवल मनुष्य ही इसका आनंद ले सकता है। और जितनी गहराई से आनंद उठा सकते हो उतनी ही तुममें मानवता का जन्म होता है। और अगर कहीं काम कृत्य ध्यान बन जाए तो तुम उच्चतम शिखर को छूने में समर्थ हो जाते हो।

4-लेकिन याद रखो, तंत्र, घाटी का कामोत्ताप है। यह शिखर का अनुभव नहीं है यह घाटी का अनुभव है।तुम उत्तेजना में शिखर की ओर बढ़ते हो और फिर धड़ाम से नीचे गिर जाते हो और फिर हाथ आती है खिन्नता। तुम ऊंचे शिखर से गिर पड़ते हो। तंत्र-काम कृत्य में तुम ऐसा कभी अनुभव नहीं करते। तुम नीचे नहीं गिर रहे। तुम और इसके आगे नीचे नहीं गिर सकते–तुम घाटी में ही थे। बल्कि तुम ऊपर उठ रहे हो।तुम्हें ऐसा लगता है जैसे तुम ऊर्जा से भर गए हो ।तुम और सजीव, ओजस्वी, कांतिमय हो गए हो। और वह आनंद कई घंटों तक यहां तक कि कई दिनों तक बना रहेगा। यह सब इस बात पर आश्रित है कि तुम इस कृत्य में कितना गहरे जा पाए थे।

5-और अगर तुम देर-अबेर इसमें गति कर सको तो तुम जान सकोगे कि वीर्य-स्खलन से ऊर्जा नष्ट होती है। इसकी आवश्यकता ही नहीं है–जब तक तुम्हें बच्चों की आवश्यकता नहीं है। और सारा दिन तुम एक गहन शिथिलता, एक गहन विश्रांति महसूस करोगे।और कई दिनों तक तुम्हें एक ऐसे सुख का अनुभव होगा जैसे तुम घर पहुंच गए हो तुम्हें अहिंसा, अविरोध, अखिन्नता की मीठी प्रतीति होगी। ऐसा व्यक्ति दूसरों के लिए कभी कोई खतरा नहीं बन सकता। अगर संभव होगा तो वह दूसरों को प्रसन्न रखने में सहायक होगा। अगर वह ऐसा नहीं कर सकेगा तो कम से कम किसी को दुख न देगा।

6-केवल तंत्र ही नये मनुष्य का निर्माण कर सकता है। एक ऐसा मनुष्य जिसने समय -शून्यता, निरहंकारिता का जान लिया है और अब अस्तित्व के साथ गहरा अद्वैत विकसित होगा। एक दूसरा आयाम खुल गया है। अब वह घड़ी दूर नहीं जब काम-वासना तिरोहित हो जाएगी। जब काम वासना अनजाने ही विलीन हो जाती है तब अचानक एक दिन तुम्हें ज्ञात होता है कि काम-वासना तिरोहित हो गई है और तब ब्रह्मचर्य का जन्म होता है। लेकिन गलत शिक्षा के कारण कठिन और दुःसाध्य लगती है। और तुम भयभीत भी हो अपने मन के संस्कारों के कारण।

7-हम दो चीजों से बहुत भयभीत हैं–काम और मृत्यु। लेकिन ये दोनों ही बुनियादी हैं और एक वास्तविक अर्थों में सत्यान्वेष इन दोनों में प्रवेश करेगा। वह काम-वृत्ति को समझने के लिए इसमें प्रवृत्त होगा क्योंकि काम-वृत्ति को समझना जीवन को समझना है। और वह यह भी जानना चाहेगा कि मृत्यु क्या है? क्योंकि जब तक तुम यह न जानोगे कि मृत्यु क्या है? तुम

शाश्वत जीवन को नहीं जान सकते।सत्यान्वेष के लिए काम और मृत्यु दोनों बुनियादी हैं लेकिन साधारण मनुष्यता के लिए ये दोनों वर्जनाएं हैं–उनकी चर्चा ही मत करो। और दोनों बुनियादी हैं और दोनों एक -दूसरे से जुड़ी हैं। उनका परस्पर संबंध इतना घनिष्ठ है कि काम में प्रवेश करते समय तुम एक प्रकार की मृत्यु में ही प्रविष्ट होते हो; क्योंकि तुम मर रहे हो। अहंकार मिट रहा है समय विलीन हो रहा है तुम मर रहे हो। काम भी एक सूक्ष्म मृत्यु है।

8-अगर तुम यह जान सको कि काम एक सूक्ष्म मृत्यु है तो मृत्यु एक महान काम-कृत्य, बन

जाएगा।कोई सुकरात मृत्यु में प्रवेश करते समय भयभीत नहीं होता। उलटे वह मौत को जानने के लिए अत्यधिक उत्साहित है ;रोमांचित है ,उतावला है। उसके हृदय में मौत के लिए स्वागत का एक गहरा भाव है। क्योंकि अगर तुम ने काम में घटित होने वाली छोटी मृत्यु को जान लिया है और इसके पीछे-पीछे आने वाले आनंद को जान लिया है तो तुम उस महान मृत्यु को जानना चाहोगे–उसके पीछे एक महा-आनंद छिपा है। लेकिन हमारे लिए तो ये दोनों ही वर्जनाएं हैं। तंत्र के लिए ये दोनों ही खोज के मूलभूत आयाम है। इसमें से गुजरना अनिवार्य है।

9-अपने प्रेमी के प्रगाढ़ आलिंगन में बद्ध तुम यह भूल सकते हो कि दूसरा है। वास्तव में तुम केवल तभी दूसरे को भुला पाते हो। पुरुष भूल जाता है कि कोई स्त्री है और स्त्री भूल जाती है कि कोई पुरुष है। केवल प्रगाढ़ आलिंगन में ही दूसरा नहीं बचता और जब दूसरा नहीं बचा तम्हारी ऊर्जा सरलता से प्रवाहित हो सकती है नहीं तो दूसरा उसे नीचे की ओर खींचता रहता

है।इसलिए योग और साधारण विधियां विपरीत यौन से पलायन है। उन्हें बचना ही पड़ेगा सावधान रहना पड़ेगा, निरंतर संघर्ष और दमन करना पड़ेगा। लेकिन अगर तुम काम-विरोधी हो तो यह विरोध ही तुम्हारे लिए निरंतर तनाव बना रहता है और निरंतर तुम्हें नीचे की ओर खींचता रहता है।तंत्र कहता है ”किसी तनाव की जरूरत नहीं। दूसरे के साथ तनाव शून्य विश्राम में रहो। उस शिथिलता के क्षण में दूसरा विलीन हो जाता है और तुम्हारी ऊर्जा ऊपर की ओर बह सकती है। लेकिन वह तभी ऊर्ध्वगमन करती है जब तुम घाटी में हो। वह तभी नीचे की ओर बहती है जब तुम शिखर पर होते हो।”

10-जब तंत्र कहता है ” धीरे-धीरे करते हुए उसका उसी तरह आनंद उठाओ जैसे कि तुम प्रात: भ्रमण कर रहे हो” और जब तुम प्रात: भ्रमण के लिए निकलते हो तुम्हें कोई जल्दी नहीं; क्योंकि तुम्हें कहीं पहुंचना नहीं है। तुम सिर्फ जा रहे हो। कोई जल्दी नहीं कोई उतावलापन नहीं कोई मंजिल नहीं। तुम कहीं से भी लौट सकते हो।यह जल्दी का न होना ही घाटी बनाता

है नहीं तो शिखर निर्मित हो जाएगा। और जब ऐसा कहा जाता इसका अर्थ यह नहीं कि तुम्हें अपनी उत्तेजना पर नियंत्रण नहीं रखना है कयोंकि वे परस्पर विरोधी है। तुम उत्तेजना को नियंत्रित नहीं कर सकते। अगर तुम उस पर अकुंश लगाते हो तो तुम दुगुनी उत्तेजना उत्पन्न कर रहे हो। बस सब ढीला छोड़ दो, इसे खेल की भांति लो- किसी मंजिल किसी अंत

की मत सोचो। आरंभ ही पर्याप्त है।

11-काम कृत्य करते समय अपनी आंखों बंद कर लो दूसरे के शरीर को महसूस करो, दूसरे की ऊर्जा को अपनी ओर बहते हुए महसूस करो और उसमें डूब जाओ पिघलो, द्रवित हो जाओ। आरंभ में ऐसा करना कठिन-सा लगेगा, पुरानी आदत है इतनी जल्दी नहीं छूटेगी। हो सकता है कुछ दिन पीछा न छोड़े मजबूर करे…चली जाएगी। लेकिन उसको विदा करने में शक्ति मत गंवाओ। बस, शिथिल शिथिल और शिथिल होते जाओ। और अगर वीर्य-स्खलित न हो, तो ऐसा मत सोचना कि कुछ गलत हो रहा है क्योंकि पुरुष सोचने लगता है कि कुछ गलत हो गया है। कुछ भी गलत नहीं हुआ है। और ऐसा भी मत सोचो कि तुम कुछ चूक गए हो। तुमने कुछ भी नहीं खोया है।शुरू-शुरू में कुछ कमी सी महसूस होगी क्योंकि उत्तेजना और शिखर वहां न होंगे।

12-और इससे पहले कि घाटी आए तुम्हें ऐसा प्रतीत होगा जैसे कि कुछ कमी है तुम कुछ खो रहे हो लेकिन यह सिर्फ पुरानी आदत है। कुछ समय के भीतर एक महीना या कुछ सप्ताह के भीतर घाटी प्रकट होने लगेगी। और जब घाटी दिखाई देने लगेगी तुम अपने शिखरों को भूल जाओगे। तब कोई शिखर मूल्यवान न रहेगा। लेकिन तुम्हें प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। और उसके साथ जबदरस्ती मत करना–और उस पर काबू पाने की कोशिश मत करना। बस शिथिल पड़े रहो।

13-शिथिलता रिलैक्सेशन एक समस्या है- क्योंकि जब हम कहते हैं शिथिल हो जाओ बुद्धि इसका यही अर्थ करती है कि कुछ प्रयत्न करना होगा। ऐसा हमारी भाषा के कारण प्रतीत

होता है। भाषा एक समस्या है। कुछ चीजों को भाषा हमेशा गलत ढंग से व्यक्त करती है। उदाहरण के लिए–शिथिलता, रिलैक्सेशन।अगर तुम पूछते हो, ”कैसे शिथिल हों?” कैसे पूछते ही तुम असली बात से चूक जाते हो। तुम विधि पूछ रहे हो। विधि चेष्टा को जन्म देगी चेष्टा तनाव पैदा करेगी। इसलिए कुछ भी मत करो। बस, सब ढीला छोड़ दो। बस, लेट जाओ और प्रतीक्षा करो। कुछ भी मत करो। तुम जो भी करोगे वह सब अवरोधपूर्वक होगा, वह बाधा

उत्पन्न करेगा।केवल शिथिल हो जाओ। एक दूसरे के साथ रहो। एक दूसरे की उपस्थिति में प्रसन्नता अनुभव करो।

14-जब तुम काम-कृत्य करते हो, लेकिन तुम काम-कृत्य के बारे में सोच रहे हो या मन कहीं सोच रहा होता है कि कैसे इसे खत्म करे। तब क्रीडा झूठी है;तुम वहां नहीं हो ;तुम्हारा मन कहीं भविष्य में है।।यह हमेशा तुम से आगे निकल जाना चाहता है। इसे ऐसा मत करने दो। केवल क्रीडा-रत रहो, भूल जाओ काम-कृत्य को। वह तो घटित होगा ही। इसे घटित होने दो। तब शिथिल होना आसान हो जाएगा।

15-कुछ नकारात्मक में किया जा सकता है। उदाहरण के लिए–जब तुम उत्तेजित होने लगते हो तुम्हारी सांस तेजी से चलने लगती है क्योंकि उत्तेजना के लिए तेज सांस की आवश्यकता है। शिथिलता के लिए अच्छा है कि तुम धीमी गति से.. गहरी सांस लो या सांस सहजतापूर्वक और सरलतापूर्वक लो। तब काम-कृत्य के समय को बढ़ाया जा सकता है।कुछ भी मत कहो,

कुछ भी बात मत करो क्योंकि इससे बाधा पड़ती है।बुद्धि का उपयोग मत करो शरीरों का उपयोग करो। केवल यह महसूस करने के लिए कि क्या घट रहा अपने मन का उपयोग करो। जो ऊष्मा प्रवाहित हो रही है जो प्रेम प्रवाहित हो रहा है जिस ऊर्जा से मिलन हो रहा है सिर्फ

इसके साथ बहना-अचेष्टित। तब केवल तब घाटी प्रकट होती है। और एक बार घाटी दिख जाए तुम इसके पार हो गए।एक बार उस घाटी को ,शिथिल काम-संवेग को अनुभव कर लेना ,पहचान लेना ही अतिक्रमण है। वहां काम नहीं। अब वह एक ध्यान बन गया है।

KEY NOTES;-

1- ''ओंम मणि पद्ये हुम् फट् ''।

अगर इस पूरे मंत्र को आप दोहराएं , तो आप पाएंगे कि इसमें शरीर के शरीर के अलग -अलग हिस्से तक इसका प्रवेश है।ओंम जैसे गले के ऊपर ही घूम कर रह जाता है। मणि हृदय तक चला जाता है।पद्ये नाभि तक चला जाता है। हुम् काम -सेंटर तक चला जाता है।

अब ''ओंम मणि पद्ये हुम् फट् '' अगर इस हुम् का बहुत प्रयोग किया जाए, तो काम- सेंटर जो है, वह बाहर की तरफ प्रवाहित होना बंद हो जाता है। इतनी बड़ी चोट लगती है हुम् की।अगर इस हुम् का बार -बार उपयोग किया जाए, तो आदमी की कामुकता विदा हो जाती है।फट् शब्द का मतलब है बाण छोड़ना। 'महावीर ने जिन साधुओं को नग्न होने की आज्ञा दी थी, वे सिर्फ वे ही साधु थे जो हुम् का गहरा प्रयोग कर चुके थे।

2-हुम् एक ध्वनि है जिसको mantra के अंत मे बोलने से हमारे आसपास एक कवच बन जाता है।हुम् का मतलब है..हमारी रक्षा हो।जब हम तांत्रिक प्रयोग या मंत्र करते है तो हमारी खुद की रक्षा करना भी जरूरी हो जाता है ।किसी ध्येय को प्राप्त करने या किसी इन्सान को नज़र मे रख के कोई मंत्र पढ़ा जाता हो तो अंत मे फट् बोला जाता है ।फट् बोलने से वो मंत्र सीधा उस इन्सान या वस्तु की तरफ जाता है ।अंत मे अगर ' हुम् फट् ' बोला जाय तो उसका मतलब है .... मैं अपनी रक्षा करते हुए उसकी तरफ ये मंत्र छोड़ता हूं ।यहां पर इसका यह अर्थ है कि हम अपने हम अपनी उर्जा को सहस्त्रार की ओर पहुंचा रहे हैं ,अथार्त सहस्त्रार की ओरबाण छोड़ रहे हैं। !

...SHIVOHAM...

....SHIVOHAM...

पड़ता है। विधि में गुणात्मक अंतर पड़ जाता है क्योंकि पूरी पृष्ठभूमि ही बदल जाती है।