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क्या Golden Ratio / Fibonacci Sequence ब्रह्मांडीय आंकड़ा (UNIVERSAL NUMBER) पूरे ब्रह्माण्ड में ब

यन्त्र क्या है?-

05 FACTS;- 1-एक यंत्र आमतौर पर एक विशेष देवता के साथ जोड़ा जाता है और इसका उपयोग ध्यान, पूजा, तंत्र, साधना और सफलता के आकर्षण जैसे विभिन्न उद्देश्यों के लिए किया जाता है। यन्त्र से मंत्रों के साथ ज्यामितीय आकृतियों और चित्रों की संख्या तथा लगभग सभी यंत्रों का केंद्र एक छोटा लाल बिंदु होता है। त्रिकोण भी शिव और शक्ति का प्रतिनिधित्व करने वाले महत्वपूर्ण प्रतीक हैं। संकेंद्रित वृत्त अभिव्यक्ति को दर्शाता है।

2-यंत्र ध्यान हमें हमारी चेतना की सामग्री को साफ करने में मदद करता है, इसलिए बिना व्याख्या किए यह एक शुद्ध दर्पण बन सकता है। यह शून्यता में असीम रूप से मौजूद है। इन यंत्रों को स्थायी रूप से चट्टानों पर, मंदिरों के प्रवेश द्वारों पर, दीवारों पर, योग साधना के स्थानों पर बनाया जाता है।यंत्र ऊर्जा विज्ञान का एक शक्तिशाली माध्यम है। यंत्र विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए निर्मित किये जाते हैं।

3-यंत्रों के संक्षिप्त शब्द एवं अंक वास्तव में देवी और देवता होते हैं जैसे कि विज्ञान का विद्यार्थी जानता है कि भ्2व् का अर्थ है अर्थात पानी जबकि सामान्यजन नहीं जान पाते हैं इसी प्रकार यंत्रों में उल्लिखित शब्द ह्रीं, क्रीं, श्रीं और क्लीं का क्या अर्थ है एक ज्योतिषी या तांत्रिक ही जान सकता है यह सब देवी के संक्षिप्त नाम हैं जैसे ह्रीं का अर्थ बगलामुखी देवी, क्रीं का अर्थ महाकाली से, श्रीं का अर्थ महालक्ष्मी से, क्लीं का अर्थ भगवती दुर्गा से है। इसी प्रकार से यंत्रों के निर्माण में प्रयुक्त होने वाले चिह्न बिंदु का अर्थ ब्रह्म से, त्रिकोण का अर्थ है शिव एवं भूपूर का अर्थ भगवती से होता है।

4-ध्यान में सहायता के रूप में, यंत्र देवता का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसका उद्देश्य ध्यान है। ये यंत्र केंद्रीय-बिंदु, अर्थात बिंदु से निकलते हैं। यंत्र में सामान्य रूप से केंद्र से संकेन्द्रित रूप से फैलती हुई अनेक ज्यामितीय आकृतियाँ, जैसे त्रिकोण, वृत्त, षट्भुज, अष्टभुज और कमल की प्रतीकात्मक पंखुड़ियाँ शामिल होती हैं। बाहर हिस्से में अक्सर चार मुख्य दिशाओं का प्रतिनिधित्व करने वाला वर्ग शामिल होता है, जिनमें से प्रत्येक एक दरवाजा-युक्त होता हैं। यंत्र का एक लोकप्रिय रूप श्री चक्र, या श्री यंत्र है, जो त्रिपुरा सुंदरी के रूप में अपने देवी का प्रतिनिधित्व करता है। श्री चक्र में शिव का प्रतिनिधित्व भी शामिल है, और इसका निर्माण ब्रह्मांड के साथ उपयोगकर्ता की अपनी एकता के साथ-साथ सृजन और अस्तित्व की समग्रता दिखाने के लिए किया गया है।

5-यह माना जाता है कि जब कोई व्यक्ति मंत्रों द्वारा अभिमंत्रित यंत्र पर अपना ध्यान केन्द्रित करता है तो उसका मष्तिष्क एवं शरीर उस यंत्र की आकार शक्ति से प्रभावित होता है और धीरे-धीरे व्यक्ति को संबंधित शक्तियों की कृपा एवं आशिर्वाद प्राप्त होने लगता है। इस प्रकार यंत्र एवं मंत्र ब्रह्मांड में स्थित विभिन्न शक्तियों तक पहुंचने का या उनका आवाहन करने का एक सशक्त माध्यम है।

श्री यन्त्र का हिन्दू धर्म में महत्व:-

04 FACTS;- 1-श्री यंत्र एक संस्कृत शब्द है, जहां श्री का अर्थ है धन और यंत्र का अर्थ है साधन। श्री यंत्र, जिसे श्री चक्र कहा जाता है जो कि सभी यंत्रों की मां है। तीन आयामी रूप में, यह ब्रह्मांड के केंद्र में मेरु का प्रतिनिधित्व करता है। यह गणितीय रूप से एक जटिल संरचना है जिसका आधार स्वर्ण अनुपात है। श्री यंत्र का देवत्व से सीधा संबंध है; इसलिए इसमें किसी की भी इच्छा को पूरा करने के लिए अपार ब्रह्मांडीय ऊर्जा है।

2-पौराणिक ग्रंथों में सामान्यतः ‘श्रीयंत्र’ की अधिष्ठात्री देवी त्रिपुर सुन्दरी को माना जाता है। शंकराचार्य से लेकर अनेक ऋषियों ने इसका उल्लेख भी किया है। ‘श्रीयंत्र’ को समृद्धि का प्रतीक भी माना जाता है। श्री यंत्र एक तांत्रिक यंत्र है जिसका उपयोग आदिकालीन ऊर्जा की पूजा में किया जाता है जो ब्रह्मांड के निर्माण, रखरखाव और विनाश का कारण है। इस प्राचीन चित्र में बहुत मजबूत ब्रह्मांडीय शक्तियां हैं और आपकी इच्छाओं को पूरा करने के लिए अपनी ऊर्जा और इच्छाओं को केंद्रित करने की क्षमता है। "श्री यंत्र" का आशय है आपके जीवन में भौतिक और आध्यात्मिक प्रचुरता पैदा करना। एक श्री यंत्र ज्यामितीय पैटर्न के साथ एक प्रकार का मंडला है, जो ब्रह्मांड के तत्वमीमांसा का प्रतिनिधित्व करता है।

3-श्री यंत्र के संदर्भ में एक कथा का वर्णन मिलता है। उसके अनुसार एक बार आदि शंकराचार्यजी ने कैलाश मान सरोवर पर भगवान शंकर को कठिन तपस्या कर प्रसन्न कर दिया। भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर उनसे वर मांगने के लिए कहा। आदि शंकराचार्य ने विश्व कल्याण का उपाय पूछा। भगवान शंकर ने शंकराचार्य को साक्षात लक्ष्मी स्वरूप श्री यंत्र की महिमा बताई और कहा- यह श्री यंत्र मनुष्यों का सर्वथा कल्याण करेगा। श्री यंत्र परम ब्रह्म स्वरूपिणी आदि प्रकृतिमयी देवी भगवती महा त्रिपुर सुदंरी का आराधना स्थल है क्योंकि यह चक्र ही उनका निवास और रथ है। श्री यंत्र में देवी स्वयं मूर्तिवान होकर विराजती हैं इसीलिए श्री यंत्र विश्व का कल्याण करने वाला है।

4-यह ‘श्रीयंत्र’ अथवा ‘श्रीचक्र’ भारत एवं दक्षिण-पूर्व एशिया के अनेक मंदिरों में स्थापित है। चेन्नई का कामाक्षी मंदिर, कलिकम्बल मंदिर, श्रीरंगपट्टनम का निमिशाम्बा मंदिर, अमरकंटक का श्रीयंत्र मंदिर, जयपुर का काली मंदिर इत्यादि में यह देखा जा सकता है। इन सभी में अत्यंत शास्त्रीय पद्धति से ‘श्रीयंत्र पर स्थापित’ जो मंदिर है, वह है शंकराचार्य की आद्य पीठ अर्थात श्रृंगेरी मठ में।बेंगलूरू से 335 किलोमीटर दूर श्रिंगेरी मठ में एक श्रीयंत्र या श्रीचक्र संरक्षित है। यह आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित पहला मठ है।माना जाता है कि 2डी में मौजूद श्रीयंत्र का पोस्टर सौभाग्य में वृद्धि करता है, व्यवसाय में बढ़ोत्तरी करता है और नकारात्मक ऊर्जा को खत्म करता है।

‘श्रीयंत्र’ का गूढ़ रहस्य;-

10 FACTS;- 1-श्री यंत्र रहस्यमय आरेख का एक रूप है, जो एक तांत्रिक अनुष्ठान चित्र है जिसका उपयोग ध्यान और एकाग्रता के लिए किया जाता है।श्री यंत्र मंडल में एक केंद्रीय बिंदु होता है जहाँ से अन्य सभी आकृतियाँ निकलती हैं। यह बिन्दू ब्रह्मांड का एक प्रारंभिक बिंदु स्वरुप होता है। पुल्लिंग और स्त्री-लिंग ऊर्जा का प्रतिनिधित्व त्रिकोण द्वारा किया जाता है।मंत्रमुग्ध आरेख में नौ त्रिकोण होते हैं जो विभिन्न बिंदुओं पर 43 छोटे त्रिकोण बनाते हैं।

2-नौ में से पांच अधोमुखी त्रिकोण नीचे की ओर इंगित करते हैं और शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो कि स्त्री शक्ति है। शेष चार उर्ध्वमुखी त्रिभुज /ऊपर की ओर इंगित होते है और पुल्लिंग अर्थात शिव का प्रतिनिधित्व करते हैं।त्रिकोण संकेंद्रित घेरे से घिरे होते हैं जो अनंत ब्रह्मांड का प्रतिनिधित्व करते हैं। कमल के फूल चक्र के चारों ओर बनाये जाते है, जो चमक और आकर्षक ऊर्जा का प्रतीक है।

3-श्रीयंत्र’ के मध्यभाग में (नीचे की दिशा में) एक त्रिकोण है। इस त्रिकोण की तीनों भुजाएँ कुल 54 बिंदुओं को स्पर्श करती हैं। यह संयोग ही है कि संस्कृत में भी मूल अक्षर 54 ही हैं। श्रीयंत्र’ की विशेषता इतनी ही नहीं है। इसके अंदर जो त्रिकोण आकृतियाँ हैं, इनमें ‘फाईबोनेची संख्या के सूत्र’ और ‘गोल्डन रेश्यो’ मिलते हैं। ‘गोल्डन रेश्यो’ संख्याओं का एक अनुपात है. इसका मान 1.61803 है।

4-इजिप्त के पिरामिडों की रचना में इस स्वर्ण अनुपात का उपयोग किया गया है। विशेष बात यह है कि ‘श्रीयंत्र’ में जो त्रिकोण निर्मित होते हैं, उन त्रिकोण की भुजाओं में भी यह स्वर्ण अनुपात अर्थात 1.61803 मिलता है ।कुल मिलाकर यह सब अदभुत और रहस्यमयी है। एक अत्यंत व्यामिश्र एवं गणितीय रचना से ‘श्रीयंत्र’ तैयार होता है। अत्यंत जटिल ज्यामितीय गुणों के अलावा, श्री यंत्र की व्याख्या बहुत गहरी, विस्तृत ब्रह्माण्ड संबंधी व्याख्या है।

5-श्री यंत्र भी Golden Ratio के आधार पर एक बहुत ही सटीक रूप से निर्मित अल्पना है, जो एक निरंतर समीकरण है जो सभी सृजन में मान्य है। श्री यंत्र को ब्रह्मांड और मानव शरीर के सूक्ष्म स्तर का प्रतिनिधित्व करने के लिए भी माना जाता है। यन्त्र में सात बिंदु होते हैं जहाँ एक त्रिकोण का शीर्ष दूसरे त्रिकोण के आधार को छूता है। इन बिंदुओं को मानव शरीर में चक्रों से संबंधित माना जाता है। श्री यंत्र पर ध्यान केंद्रित करके, आप तुरंत खुद को तनावमुक्त पा सकते हैं। यह ध्यान के लिए एक बहुत शक्तिशाली केंद्र बिंदु है।

6 -श्रीयंत्र न केवल इस ब्रह्मांड का सुक्ष्म रूप है, बल्कि मानव शरीर का

भी।श्रीयंत्र की प्रत्येक परिधि मानव शरीर के एक चक्र को परिलक्षित करता है। और सतत घूमने वाला और विस्तारशील श्रीयंत्र इस ब्रह्मांड का

प्रतिनिधित्व करता है।यह चक्र पांच नीचे की तरफ जाने वाले त्रिकोणों और चार ऊपर की तरफ जाने वाले त्रिकोणों के आरोपण से निर्मित होता है, जो

स्त्री और पुरुष का सम्मिश्रण होता है।नीचे की तरफ जाने वाले त्रिकोण स्त्री के विशिष्ट तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। जैसे कि शक्ति। और ऊपर जाने वाले त्रिकोण पुरुष के विशिष्ट तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। जैसे कि शिव।

7-सभी 9 अन्तःपाशी त्रिकोणों से 43 छोटे त्रिकोणों की रचना होती है, और इनमें से प्रत्येक त्रिकोण एक देवता का प्रतिनिधित्व करता है।श्रीचक्र के

बारे में कहा जाता है कि यह न केवल देवी की असीमित शक्ति का प्रतीक है, बल्कि यह देवी का ज्यामितिय रूप है।यह किसी के प्रज्ञा की रचना,

या वेदान्त के केन्द्रीय उपदेशों का प्रतीक भर नहीं है। बल्कि यह माना जाता है कि इस ज्यामितिय स्वरूप का आभास योगियों को समाधि के दौरान होता है।

8-श्रीयंत्र की पूजा-अर्चना तीन प्रकारों- एक 2डी रूप में और दो 3डी

रूप में की जाती है।किसी भी योगी के लिए श्रीयंत्र एक धार्मिक यात्रा सरीखा है, जो आधार से शुरू होकर एक के बाद एक पग बढ़ाता हुआ केन्द्र की तरफ बढ़ता हैऔर फिर ब्रह्मांड से मिल जाता है।यह एक आध्यात्मिक यात्रा है जो साधकों को आत्मज्ञान की तरफ ले जाता है।

9 -श्रीयंत्र की यह ज्यामितिय गणना इस कदर जटिल है कि गणितज्ञ इसे देख चकित होते रहते हैं। गणितज्ञ इस बात से आश्चर्यचकित हैं कि आधुनिक गणित का ज्ञान न होने के बावजूद वैदिक काल के लोगों ने कैसे

इसकी रचना की होगी।आज की तारीख में कम्प्यूटर से इस तरह की आकृति की रचना आसानी से की जा सकती है। लेकिन अगर किसी को कागज पर लिखकर इसकी रचना करना पड़े तो शायद पूरा जीवन भी कम पड़े। श्रीयंत्र की परिशुद्ध आकृति पर आज के कुछ गणितज्ञ बस इतना ही कहते हैं, वैदिक काल में भारतीय अपनी कल्पनाशीलता का उपयोग बेहतर करते थे। यह उसी का नतीजा है।

10 -श्रीयंत्र या श्रीचक्र साधकों को ब्रह्मांडीय चेतना से मिलाने की कोशिश करता है। माना जाता है कि श्रीचक्र एक ऐसा यंत्र है जो खुद में ब्रह्मांडीय ऊर्जा को समेटे हुए है। यह ब्रह्मांड में मौजूद पवित्र ध्वनियों का ज्यामितिय रूप है।श्री यंत्र एक व्यक्ति के जीवन में सौभाग्य, धन और समृद्धि लाता है। श्री यंत्र ध्यान का नियमित अभ्यास व्यक्ति के दिमाग को शांत करता है और मानसिक स्थिरता लाता है। यदि हम श्री यंत्र के प्रत्येक तत्व पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो यह हमें विशेष रूप से धार्मिकता पर गहरा ज्ञान प्रदान करता

है।पूर्णतः गणितीय एवं वैज्ञानिक सिद्धांतों के आधार पर निर्मित श्रीयंत्र अत्यंत प्राचीन है। परन्तु दुर्भाग्य से अब यह नकली बाबाओं और व्यवसायियों के चंगुल में फँस गया है, इस कारण इसकी असली शक्ति दुनिया के सामने पहुंच नहीं रही है। श्रीयंत्र से यह भी सिद्ध होता है कि हमारा भारतीय प्राचीन ज्ञान अत्यंत समृद्ध था।

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श्री यंत्र मे प्रयुक्त विभिन्न आकृतियां एवं उनका महत्व ;-

03 FACTS;-

1-श्रीयंत्र के चतुर्दिक् तीन परिधियां खींची जाती हैं। ये अपने आप में तीन शक्तियों की प्रतीक हैं। इसके नीचे षोडश पद्मदल होते हैं तथा इन षोडश पद्मदल के भीतर अष्टदल का निर्माण होता है, जो कि अष्ट लक्ष्मी का परिचायक है। अष्टदल के भीतर चतुर्दश त्रिकोण निर्मित होते हैं, जो चतुर्दश शक्तियों के परिचायक हैं तथा इसके भीतर दस त्रिकोण स्पष्ट देखे जा सकते हैं, जो दस सम्पदा के प्रतीक हैं। दस त्रिकोण के भीतर अष्ट त्रिकोण निर्मित होते हैं, जो अष्ट देवियों के सूचक कहे गए हैं। इसके भीतर त्रिकोण होता है। इस त्रिकोण के भीतर एक बिन्दु निर्मित होता है। 2-श्री यंत्र का रूप ज्योमितीय होता है। इसकी संरचना में बिंदु, त्रिकोण या त्रिभुज, वृत्त, अष्टकमल का प्रयोग होता है। तंत्र के अनुसार श्री यंत्र का निर्माण दो प्रकार से किया जाता है- एक अंदर के बिंदु से शुरू कर बाहर की ओर जो सृष्टि-क्रिया निर्माण कहलाता है और दूसरा बाहर के वृत्त से शुरू कर अंदर की ओर जो संहार-क्रिया निर्माण कहलाता है।यंत्रों में मुख्यत: जिन 5 प्रकार की आकृतियों का प्रयोग किया गया है वे हैं बिन्दु, वृत, ऊर्ध्वमुखी त्रिकोण, अधोमुखी त्रिकोण एवं वर्ग जो कि क्रमश: आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी का प्रतिनिधित्व करते हैं।

3-श्रीयंत्र में सर्वप्रथम धुरी में एक बिन्दु और चारो तरफ त्रिकोण है, इसमें पांच त्रिकोण बाहरी और झुकते है जो शक्ति का प्रदर्शन करते हैं और चार ऊपर की तरफ त्रिकोण है, इसमें पांच त्रिकोण बाहरी और झुकते हैं जो शक्ति का प्रदर्शन करते है और चार ऊपर की तरफ शिव को दर्शाते है। अन्दर की तरफ झुके पांच-पांच तत्व, पांच संवेदनाएँ, पांच अवयव, तंत्र और पांच जन्म बताते है। ऊपर की ओर उठे चार जीवन, आत्मा, मेरूमज्जा व वंशानुगतता का प्रतिनिधत्व करते है। चार ऊपर और पांच बाहरी ओर के त्रिकोण का मौलिक मानवी संवदनाओं का प्रतीक है। यह एक मूल संचित कमल है। आठ अन्दर की ओर व सोलह बाहर की ओर झुकी पंखुड़ियाँ है। ऊपर की ओर उठी अग्नि, गोलाकर, पवन,समतल पृथ्वी व नीचे मुडी जल को दर्शाती है। ईश्वरानुभव, आत्मसाक्षात्कार है। यही सम्पूर्ण जीवन का द्योतक है।

06 POINTS;-

1-बिंदु:-

यंत्रों के केंद्र-बिंदु में एक बिंदु या पॉइंट होता है, जो यंत्र से जुड़े मुख्य देवता का प्रतिनिधित्व करता है। देवता के परिचरों को अक्सर केंद्र के चारों ओर ज्यामितीय भागों में दर्शाया जाता है। एक यंत्र में बिंदु को एक डॉट या छोटे वृत्त द्वारा प्रतिनिधित्व किया जा सकता है, या यह अदृश्य रह सकता है। यह उस बिंदु का प्रतिनिधित्व करता है जहाँ से सभी सृजन उत्पन्न होते हैं। कभी-कभी, लिंग भैरवी यंत्र के मामले में, बिंदु को लिंग के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है ।बिंदु आकाश तत्व का द्योतक है। बिंदु प्रत्येक आकार का आधार एवं आरंभ इंगित करता है। दूसरे शब्दों में बिंदु के बिना किसी आकार का आरंभ व अंत निश्चित करना कठिन ही नहीं वरन् असंभव है।

बिंदु के अंदर नैसर्गिक गतिशीलता होती है जिसके आधार पर यह प्रत्येक

आकार एवं तत्व में अनुप्रविष्ठ होता है।बिंदु को आकाश की संज्ञा दी जाती है क्योंकि पृथ्वी पर स्थित समस्त चर अचर जगत का आरंभिक बिंदु या जड़ आकाश ही है। बिंदु एक प्रकार की शक्ति है जो कि ऊर्जा प्रवाहित करती है। ये बिंदु किसी भी यंत्र का केंद्र होती है। तंत्र शास्त्र में बिंदु को साक्षात शिव की संज्ञा दी गई है जो कि समस्त शक्तियों का स्रोत है। किसी भी यंत्र के मध्य में स्थित बिंदु विभिन्न रेखाचित्रों से घिरी रहती है ये रेखाचित्र विभिन्न दैवीय शक्तियों को दर्शाते हैं तथा बिंदु इनकी शक्ति के स्रोत के रूप में दिखाई जाती है।

2-सरल रेखा:-

एक बिंदु को जब दूसरे बिंदुओं से मिलाते हैं तो सरल रेखा बनती है।वस्तुतः रेखाएं बिंदु

पथ ही है। ये दो बिंदु परमात्मा एक जीवात्मा, सुख-दुख, रात्री दिवस आदि को इंगित करते हैं। इस प्रकार सरल रेखा इंगित करता है कि जीवात्मा एवं परमात्मा, सुख दुख आदि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं तथा इन्हें अलग नहीं किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में सरल रेखा यह इंगित करती है कि जीवात्मा परमात्मा का ही अंश है।

3-वृत्त: -

वृत की कल्पना करते ही एक चक्राकार आकृति आंखों के सामने उभर कर आती है। जब एक बिंदु के चारो ओर दूसरी बिदु को घुमाया जाए तो उसकी चक्राकार गति होती है। इस चक्राकार गति को प्राकृतिक जगत में घूर्णन क्रिया कहते हैं।अतः वृत वायु तत्व का

प्रतिनिधित्व करता है।

4-त्रिकोण:-

त्रिकोण को वैदिक साहित्य में अत्यधिक महत्ता दी गई है। देखा जाए तो त्रिकोण वह पहला द्वि आयामी रेखाचित्र है जो कि एक स्थान को घेरता है।त्रिकोण अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करता है।

4-1-उघ्र्व मुखी त्रिकोण ;—–

अग्नि तत्व का बोध कराता है क्योंकि अग्नि की गति सदैव अघ्र्वमुखी होती है। यह त्रिकोण उन्नति एवं प्रगति का द्योतक है। वैदिक साहित्य में इसे शिव की संज्ञा दी जाती है। इसका ऊपर से संकरा तथा नीचे से फैला होना ये इंगित करता है कि जीवात्मा का जड़ आकाश में है तथा इसका विस्तार पृथ्वी पर होता है।

4-2-अधोमुखी त्रिकोण:—-

जल तत्व का प्रतिनिधित्व करता है। जल के बिना जीवन असंभव है। जल की गति अधोमुखी होती है। इसका नीचे से संकरा तथा ऊपर से फैला होना जीवात्मा का पांच तत्वो के माध्यम से पृथ्वी पर फैलाव एवं इसका सांसारिक जगत में बहुत गहरे तक उलझना इंगित करता है।

5-चतुर्भुज वर्ग:—-

किसी भी यंत्र की बाहरी सीमा आम तौर पर वर्गाकार होती है तथा इसका आरंभ मध्य बिंदु से होता है। इस प्रकार प्रत्येक यंत्र ब्रह्मांड के विकास को सूक्ष्म रूप में प्रस्तुत करता है जो कि आकाश से आरंभ होकर पृथ्वी पर पूर्ण विकसित होता है। वर्गाकार रेखाचित्र पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधित्व करता है क्योंकि विस्तार पृथ्वी का गुण है या दूसरे शब्दों में आकाश से आई ऊर्जा का विकास पृथ्वी पर ही होता है। अतः चतुर्भुज बिंदु का चारों दिशाओं में फैलाव पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधित्व करता है।

6-षटकोण:—

उध्र्वामुखी एवं अधोमुखी त्रिकोण से मिलकर बनने वाला षटकोण शिव एवं शक्ति दोनों के संयोग को प्रदर्शित करता है। इसके बिना संसार की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। इन षटकोणों के मध्य में स्थित खाली स्थानों को यंत्रों में शिव एवं शक्ति का क्रीडा स्थल माना जाता है। इसी कारण इन खाली स्थानों में विभिन्न अंक या मंत्र इस प्रकार लिखे जाते हैं जिससे कि इन दोनों की कृपा एवं आशिर्वाद प्राप्त किया जा सके।

श्रीयंत्र का वर्णन;-

06 FACTS;-

1-यह सर्वाधिक लोकप्रिय प्राचीन यन्त्र है,इसकी अधिष्टात्री देवी स्वयं श्रीविद्या अर्थात त्रिपुर सुन्दरी हैं,और उनके ही रूप में इस यन्त्र की मान्यता है। यह बेहद शक्तिशाली ललितादेवी का पूजा चक्र है,इसको त्रैलोक्य मोहन अर्थात तीनों लोकों का मोहन यन्त्र भी कहते है। यह सर्व रक्षाकर सर्वव्याधिनिवारक सर्वकष्टनाशक होने के कारण यह सर्वसिद्धिप्रद सर्वार्थ साधक सर्वसौभाग्यदायक माना जाता है।

2-श्रीयंत्र बिंदु, त्रिकोण, वसुकोण, दशार-युग्म, चतुर्दशार, अष्ट दल, षोडसार, तीन वृत तथा भूपुर से निर्मित है। इसमें 4 ऊपर मुख वाले शिव त्रिकोण, 5 नीचे मुख वाले शक्ति त्रिकोण होते हैं। इस तरह त्रिकोण, अष्टकोण, 2 दशार, 5 शक्ति तथा बिंदु, अष्ट कमल, षोडश दल कमल तथा चतुरस्त्र हैं।ये आपस में एक-दूसरे से मिले हुए हैं। यह यंत्र मनुष्य को अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष देने वाला है।

3-श्री यंत्र में 9 त्रिकोण या त्रिभुज होते हैं जो निराकार शिव की 9 मूल प्रकृतियों के द्योतक हैं। मुख्यतः दो प्रकार के श्रीयंत्र बनाए जाते हैं – सृष्टि क्रम और संहार क्रम। सृष्टि क्रम के अनुसार बने श्रीयंत्र में 5 ऊध्वर्मुखी त्रिकोण होते हैं जिन्हें शिव त्रिकोण कहते हैं। ये 5 ज्ञानेंद्रियों के प्रतीक हैं। 4 अधोमुखी त्रिकोण होते हैं जिन्हें शक्ति त्रिकोण कहा जाता है। ये प्राण, मज्जा, शुक्र व जीवन के द्योतक हैं। संहार क्रम के अनुसार बने श्रीयंत्र में 4 ऊर्ध्वमुखी त्रिकोण शिव त्रिकोण होते हैं और 5 अधोमुखी त्रिकोण शक्ति त्रिकोण होते हैं।

4-श्री यंत्र में 4 त्रिभुजों का निर्माण इस प्रकार से किया जाता है कि उनसे मिलकर 43 छोटे त्रिभुज बन जाते हैं जो 43 देवताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। मध्य के सबसे छोटे त्रिभुज के बीच एक बिंदु होता है जो समाधि का सूचक है अर्थात यह शिव व शक्ति का संयुक्त रूप है। इसके चारों ओर जो 43 त्रिकोण बनते हैं वे योग मार्ग के अनुसार यम 10, नियम 10, आसन 8, प्रत्याहार 5, धारणा 5, प्राणायाम 3, ध्यान 2 के स्वरूप हैं।

5-प्रत्येक त्रिकोण एवं कमल दल का महत्व;—

इन त्रिभुजों के बाहर की तरफ 8 कमल दल का समूह होता है जिसके चारों ओर 16 दल वाला कमल समूह होता है। इन सबके बाहर भूपुर है। मनुष्य शरीर की भांति ही श्री यंत्र की संरचना में भी 9 चक्र होते हैं जिनका क्रम अंदर से बाहर की ओर इस प्रकार है- केंद्रस्थ बिंदु फिर त्रिकोण जो सर्वसिद्धिप्रद कहलाता है। फिर 8 त्रिकोण सर्वरक्षाकारी हैं। उसके बाहर के 10 त्रिकोण सर्व रोगनाशक हैं।

6-फिर 10 त्रिकोण सर्वार्थ सिद्धि के प्रतीक हैं। उसके बाहर 14 त्रिकोण सौभाग्यदायक हैं। फिर 8 कमलदल का समूह दुःख, क्षोभ आदि के निवारण का प्रतीक है।उसके बाहर 16 कमलदल का समूह इच्छापूर्ति कारक है। अंत में सबसे बाहर वाला भाग त्रैलोक्य मोहन के नाम से जाना जाता है। इन 9 चक्रों की अधिष्ठात्री 9 देवियों के नाम इस प्रकार हैं – 1. त्रिपुरा 2. त्रिपुरेशी 3. त्रिपुरसुंदरी 4. त्रिपुरवासिनी, 5. त्रिपुरात्रि, 6. त्रिपुरामालिनी, 7. त्रिपुरसिद्धा, 8. त्रिपुरांबा और 9. महात्रिपुरसुंदरी।

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