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क्या है आत्मा के पाँच कोश और पाँच स्तर? क्या पंचकोश भी आपकी अंतर्यात्रा में सहायक या बाधा बन सकते ह


क्या है आत्मा के पाँच कोश और पाँच स्तर?- 16 FACTS;- 1-वेद में सृष्टि की उत्पत्ति, विकास, विध्वंस और आत्मा की गति को पंचकोश के क्रम में समझाया गया है। जीवात्मा के पाँच शरीर बताए गए हैं- जड़, प्राण, मन, विज्ञान और आनंद।ये पंचकोश हैं- 1.अन्नमय, 2.प्राणमय, 3.मनोमय, 4.विज्ञानमय और 5.आनंदमय। उक्त पंचकोश को ही पाँच तरह का शरीर भी कहा गया है। ईश्वर एक ही है किंतु आत्माएँ अनेक। यह अव्यक्त, अजर-अमर आत्मा पाँच कोषों को क्रमश: धारण करती है, जिससे की वह व्यक्त (प्रकट) और जन्म-मरण के चक्कर में उलझ जाती है।यह पंच कोष ही पंच शरीर है। कोई आत्मा किस शरीर में रहती है यह उसके ईश्‍वर समर्पण और संकल्प पर निर्भर करता है।

2-छांदोग्य उपनिषद के अनुसार आत्मा पाँच स्तरों में स्वयं के होने का अनुभव करती है- (1)जाग्रत (2) स्वप्न (3) सुषुप्ति (4) तुरीय अवस्था(5)तुरीयातीत ।इसमें तीन स्तरों का अनुभव प्रत्येक जन्म लिए हुए मनुष्य को अनुभव होता ही है लेकिन चौथे स्तर में वही होता है जो ‍आत्मवान हो गया है या जिसने मोक्ष पा लिया है।वह शुद्ध तुरीय अवस्था में होता है जहाँ न तो जाग्रति है, न स्वप्न, न सु‍षुप्ति ।ऐसे मनुष्य सिर्फ दृष्टा होते हैं-जिसे पूर्ण-जागरण की अवस्था भी कहा जाता है।तुरीय अवस्था निर्विचार और अतीत व भविष्य की कल्पना से परे है। तुरीयातीत अवस्था तुरीय का अनुभव स्थाई हो जाने के बाद आती है। चेतना की इसी अवस्था को प्राप्त व्यक्ति को योगी या योगस्थ कहा जाता है। इस अवस्था में व्यक्ति को शरीर की आवश्यकता नहीं रहती।

3-अनुभूति के पाँच स्तर हैं- जाग्रत, स्वप्न, सु‍षुप्ति तुरीय और तुरीयातीत अवस्था। और व्यक्त (प्रकट) होने के भी पाँच कोश हैं- जड़, प्राण, मन, बुद्धि और आनंद।वेदों की उक्त धारणा

विज्ञान सम्मत है।इस अन्नमय कोश को प्राणमय कोश ने, प्राणमय को मनोमय, मनोमय को विज्ञानमय और विज्ञानमय को आनंदमय कोश ने ढाँक रखा है। यह व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह क्या सिर्फ शरीर के तल पर ही जी रहा है या कि उससे ऊपर के आवरणों में। किसी तल पर जीने का अर्थ है कि हमारी चेतना या जागरण की स्थिति क्या है।जड़ बुद्धि का मतलब ही यही है कि उसे अपने होने का होश हीं नहीं है ..जैसे पत्थर और पशु।

4-पांच भूत,महातत्व, हमारे भीतर के पांच कोषों, शरीरों से संबंधित हैं।पांच भूतों का अर्थ है

...पांच महातत्व—पृथ्वी, अग्नि जल, वायु, आकाश।हमारा पहला शरीर अन्नमय कोश, भोजन -काया से पृथ्वी संबंधित है।दूसरा जल तत्त्व है, यह भी अन्नमय कोश और दूसरे चक्र स्वाधिष्ठान से संबंधित है, इसमें जल का गुण होता है। 7 साल से 14 वर्ष की आयु में बच्चे के अंदर सारी कामनाएं ,वासनाएं प्रकट होने लगती हैं। इसके लिए कुछ प्रयास नहीं करना पड़ता है।भाव का विकास प्रकृति के द्वारा अपने आप हो जाता है।उसके लिए कुछ नहीं करना पड़ता।भावो का निरीक्षण करो,तो अनुभव होता है कि यह सदा नदी के प्रवाह की भांति;गतिशील, गतिमान रहता है।अज्ञान शाश्वत है परंतु ज्ञान के लिए मेहनत करनी पड़ती है।अग्नि तत्त्व हमारे तीसरे चक्र और दूसरे ऊर्जा शरीर, बायो -प्लाज्मा, प्राणमय कोश से संबंधित है।इसमें अग्नि का गुण होता है।यह कारण शरीर कहलाता है क्योकि जैसे ही स्थूल शरीर से प्राण शरीर हटेगा; शरीर छूट जाएगा।ध्यान में हम एस्ट्रल ट्रेवलिंग करते हैं; उसमें भी स्थूल व कारण शरीर ट्रैवल नहीं कर सकते।तीसरे सात वर्षों में सूक्ष्म शरीर विकसित होता है— इक्कीस वर्ष की उम्र तक। दूसरे शरीर में भाव का विकास होता है; तीसरे शरीर में तर्क, विचार और बुद्धि का विकास होता है।

5-तीन कोश... मनोमय, विज्ञानमय,और आनंदमय ;यह तीनों सूक्ष्म/एस्ट्रेल बॉडी के अंतर्गत आते है।मनोमय कोश ''शुद्ध मन'' से और विज्ञानमय ''आत्मिक भाव'' से जुड़ा है।चौथा है वायु तत्त्व, लगभग अदृश्य, तुम उसे देख नहीं सकते, तुम इसे मात्र अनुभव कर सकते हो, यह मेन्टल शरीर-(एस्ट्रल-इथरिक बॉडी)मनोमय कोश और अनाहत चक्र से संबंधित है। वासना जड़ प्रकृति है और प्रेम चैतन्य प्रकृति। जब हम प्रेम तक पहुंचते हैं तब हमारा विकास आरंभ होता है। संसार के 80 परसेंट मनुष्य केवल स्थूल,भाव और कारण शरीर में ही जीवन बिता लेते हैं और दुनिया से चले जाते हैं।कुंडलिनी मन की शक्ति है।कुंडलिनी साधना के द्वारा ही हम अपने मनोमय कोष में पहुंच पाते हैं और वही से हमारे आगे की यात्रा प्रारंभ होती है।

6-और तब आता है आकाश तत्त्व हम इसे अनुभव नहीं कर सकते, यह हवा से भी अधिक सूक्ष्म हो जाता है।यह आत्मिक/स्प्रिचुअल शरीर- (एस्ट्रल-इथरिक बॉडी) विशुद्ध चक्र और विज्ञानमय कोश से संबंधित है।हम इसका श्रद्धा -विश्वास कर सकते है कि यह शुद्ध आकाश है...आनंद है।लेकिन तुम शुद्ध आकाश से शुद्धतर, ‘शुद्ध आकाश से भी सूक्ष्मतर हो।तुम्हारा यथार्थ ऐसा है कि करीब-करीब वह है ही नहीं।क्योंकि यह सारे स्थूल तत्वों से परे है;यह मात्र होना है। इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता है, कोई व्याख्या इसके लिए पर्याप्त नहीं है।

चक्र का अर्थ है कोई गतिशील चीज।चक्र तुम्हारे अस्तित्व में एक गतिशील केंद्र है ..यह अपने चारों ओर एक ऊर्जा क्षेत्र निर्मित करता है।सात चक्रों में पहला और अंतिम दोनो सेतु हैं शेष

पांच चक्र पांच तत्वों और पांच शरीरों से संबंधित हैं।सहस्त्रार, सातवां चक्र तुम्हारे और अतल शून्य,परम के बीच एक सेतु है। ये केवल पांच कोश नहीं , बहुत से शरीर हैं, क्योंकि दो शरीरों के बीच में उनको जोड्ने के लिए एक और चाहिए, और तुम एक प्याज की तरह हो... पर्त दर पर्त, लेकिन ये पांच मुख्य कोश है।

7-क्या है आत्मा का अन्नमय कोश ?...तुम्हारा शरीर भोजन, पृथ्वी से निर्मित है, पृथ्वी पहला तत्व है।वास्तव में , इसका इस धरती से कुछ लेना देना नहीं है। तत्व का अर्थ यह है कि जहां भी पदार्थ है। यह पृथ्वी है; यह पदार्थ पृथ्वी है, यह स्थूल पृथ्वी है। तुममें यह शरीर है; तुम्हारे बाहर सबकी देहें हैं। सितारे भी इसी मिट्टी से बना हैं। जो भी अस्तित्व रखता है मिट्टी से बना है। पहला आवरण पार्थिव है।सम्पूर्ण दृश्यमान जगत, ग्रह-नक्षत्र, तारे और हमारी यह पृथ्वी , आत्मा की प्रथम अभिव्यक्ति है। यह दिखाई देने वाला जड़ जगत जिसमें हमारा शरीर भी शामिल है यही अन्न से बना शरीर अन्नरसमय कहलाता हैं। इसीलिए वैदिक ऋषियों

ने अन्न को ब्रह्म कहा है।यह प्रथम कोश है जहाँ आत्मा स्वयं को अभिव्यक्त करती रहती है।जड़ का अस्तित्व मानव से पहले का है। पहले पाँच तत्वों (अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी , आकाश) की सत्ता ही विद्यमान थी। इस जड़ को ही शक्ति कहते हैं- यही आत्मा की पूर्ण सुप्तावस्था है। यह आत्मा की अधोगति है। फिर जड़ में प्राण, मन और बुद्धि आदि सुप्त है।

8-क्या है आत्मा का प्राणमय कोश ?..जड़ में ही प्राण के सक्रिय होने से अर्थात वायु तत्व के सक्रिय होने से प्राण धीरे-धीरे जाग्रत होने लगा। प्रथम वह समुद्र के भीतर लताओं, वृक्षों और न दिखाई देने वाले जीवों के रूप में फिर क्रमश: जलचर, उभयचर, थलचर और फिर नभचर

प्रणियों के रूप में अभिव्यक्त हुआ।जहाँ भी साँस का आवागमन दृष्टिगोचर होता है, महसूस होता है वहाँ प्राण सक्रिय है। आत्मा ने स्वयं को स्थूल से ऊपर उठाकर 'प्राण' में अभिव्यक्त किया। जब आत्मा ने स्वयं को स्थूल (जड़) में सीमित पाया तब शुरू हुई विकास की प्रक्रिया। इस तरह पृथ्वी में स्थूल का एक भाग जाग्रत या सक्रिय होकर प्राणिक होने लगा।

9-यह प्राण ही है जिसके अवतरण से जड़ जगत में हलचल हुई और द्रुत गति से आकार-प्रकार का युग प्रारम्भ हुआ। प्रकृति भिन्न-भिन्न रूप धारण करती गई। प्राण को ही जीवन कहते हैं। प्राण के निकल जाने पर प्राणी मृत अर्थात जड़ माना जाता है। यह प्राणिक शक्ति ही संपूर्ण ब्रह्मांड की आयु और वायु है अर्थात प्राणवायु ही आयु है, स्वास्थ्य है।पत्थर, पौधे, पशु

और मानव के प्राण में जाग्रति और सक्रियता का अंतर है। देव, मनुष्य, पशु आदि सभी प्राण के कारण चेष्ठावान है। मानव में मन ज्यादा सक्रिय है किंतु जलचर, उभयचर, नभचर और पशुओं में प्राण ज्यादा सक्रिय है, इसीलिए पशुओं को प्राणी भी कहा जाता है।ईर्ष्या, द्वैष,

संघर्ष, वासना, आवेग, क्रोध और इच्छा यह प्राण के स्वाभाविक गुण है। जो मानव इन गुणों से परिपूर्ण है वह प्राणी के अतिरिक्त कुछ नहीं। प्राण को पुष्ट और शुद्ध करने के लिए ही 'प्राणायाम' का प्रावधान है।

10-क्या है आत्मा का मनोमय कोश?- यह मनुष्य प्रकृति की अब तक की शुद्धतम कृति माना गया है। यह प्रकृति के सभी आकारों में अब तक का शुद्ध व ऐसा सुविधाजन आकार है जहाँ 'आत्मा' रहकर अपने को अन्यों से अधिक स्वतंत्र महसूस करती है। दूसरी ओर यह एक

ऐसा आकार है जहाँ 'मन' का अवतरण आसान है।उक्त आकार में अन्य प्राणियों की अपेक्षा 'मन' के अधिक जाग्रत होने से ही मनुष्य को मनुष्य या मानव कहा गया है। यही मनोमय कोश है। जगत के मनोमय कोश में मानव ही में 'मन' सर्वाधिक प्रकट है अन्यों में मन सुप्त है। मन भी कई तरह के होते हैं।आत्मा ने जड़ से प्राण और प्राण से मन में गति की है। सृष्‍टि के विकास में मन एक महत्वपूर्ण घटना थी।

11-मन पाँच इंद्रियों के क्रिया-कलापों से उपजी प्रतिक्रिया मात्र नहीं है।औसत मन

अपने कार्यो में जितना अपने हित, आवेश और पक्षपातों द्वारा संचालित होता है उतना विचारों द्वारा नहीं- यही ऐंद्रिक मन है। 99 प्रतिशत लोग ऐंद्रिक मन में ही जीते हैं। जो किसी भी प्रकार के ऐंद्रिक ज्ञान से उपजे विचारों के प्रति आग्रही हैं वह ऐंद्रिक मन है। ऐंद्रिक मन में स्‍थित आत्मा भी जड़बुद्धि ही मानी गई है। विचार कितना ही महान हो वह ऐंद्रिक मन की ही उपज

है।जिसने इंद्रियों तथा इनसे उपजने वाले भावों से संचालित होना छोड़ दिया है;उसी आत्मा का

मन उच्चतर रूपों में रूपांतरित हो जाता है।इसीलिए मन के क्रिया-कलापों के प्रति जाग्रत रहकर जो विचारों की सुस्पष्टता और शुद्ध अवस्था में स्थित हो पूर्वाग्रहों से मुक्त होता है वही

विज्ञानमय कोश में स्थित हो सकता है।मन को उच्चतर रूपों में रूपांतरित कहने के लिए प्रत्याहार और धारणा को साधने का प्रावधान है। इसके सधने पर ही आत्मा विज्ञानमय कोश के स्तर में स्थित होती है।

12-क्या हैआत्मा का विज्ञानमय कोश? ..सत्यज्ञानमय या विज्ञानमय कोश अर्थात जिसे सांसारिक सत्य का ज्ञान होने लगे और जो माया-भ्रम का जाल काटकर साक्षित्व में स्थित होने लगे या जो जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति के स्तर से मुक्ति पाकर निर्विचार की दशा में होने लगे उसे ही सत्यज्ञान पर चलने वाला कहते हैं।विज्ञान का अर्थ विशेष ज्ञान या विशेष बोध से हैं।

सत्यज्ञानमय कोश बोधपूर्वक जीने से मिलता है।मनोमय कोश से मुक्त होकर विज्ञानमय कोश में स्थित आत्मा को ही हम सिद्ध या संबुद्ध कहते हैं। इस कोश में स्थित आत्माएँ मन से

मुक्त हो चुकी होती है। इस कोश के भी कुछ स्तर माने गए है ।जब मनुष्य को अपने अज्ञान में पड़े रहने का ज्ञान होता है तब शुरू होता है मन पर नियंत्रण। मन को नियंत्रित कर उसे बुद्धि-संकल्प में स्थित करने वाला ही विवेकी कहलाता है। विवेकी में तर्क और विचार की सुस्पष्टता होती है।

13-मन में ही स्थित है विज्ञानमय कोश अर्थात ‍बुद्धि का स्तर। जो विचारशील और कर्मठ है वही विज्ञानमय कोश के स्तर में है। जड़ या अन्नरसमय कोश दृष्टिगोचर होता है। प्राण और मन का अनुभव होता है किंतु जाग्रत मनुष्य को ही विज्ञानमय कोश समझ में आता है। जो विज्ञानमय कोश को समझ लेता है वही उसके स्तर को भी समझता है।इस ‍विज्ञानमय कोश के भी कुछ उप-स्तर है।विवेकी को ही विज्ञानमय कोश का प्रथम स्तर माना जाता है किंतु जो बुद्धि का भी अतिक्रमण कर जाता है उसे अंतर्दृष्टि संपन्न मनस कहते हैं। अर्थात जिसका साक्षित्व गहराने लगा। इसे ही ज्ञानीजन संबोधि का लक्षण कहते हैं, जो विचार से परे

निर्विचार में स्‍थित है।ऐसे अंतरदृष्टि संपन्न'आत्मा' विज्ञानमय कोश के प्रथम स्तर में स्थित होकर सुक्ष्मातित दृष्टिवाला होता है। जब अंतरदृष्टि की पूर्णता आ जाती है तो मोक्ष के द्वार खुलने लगते हैं। इस विज्ञानमय कोश को पुष्ट-शुद्ध करने के लिए ध्यान का प्रावधान है।

14-क्या है आनंदमय कोश ?- विज्ञानमय कोश में ही स्थित है-आनंदमय कोष। यही आत्मवानों की ‍तुरीय अवस्था है। इसी ‍स्तर में जीने वालों को भगवान, अरिहंत या संबुद्ध कहा गया है। इस स्तर में शुद्ध आनंद की अनुभूति ही बच जाती है। जहाँ व्यक्ति परम शक्ति का अनुभव करता है। इसके भी उप-स्तर होते हैं। और जो इस स्तर से भी मुक्त हो जाता है-वही

ब्रह्मलीन कहलाता है।आनन्दमय कोश चेतना का वह स्तर है, जिनमें उसे अपने वास्तविक

स्वरूप की अनुभूति होती रहती है।आनन्दमय कोश की ध्यान धारणा से व्यक्तित्व में ऐसे परिवर्तन आरम्भ होते हैं, जिसके सहारे क्रमिक गति से बढ़ते हुए धरती पर रहने वाले देवता के रूप में आदर्श जीवनयापन कर सकने का सौभाग्य मिलता है।

15-पांचवां शरीर है... ‘आनंदमय कोश ’, आनंद काया। यह वास्तव में पहुंच के पार है। यह शुद्ध आनंद से निर्मित है। भाव का भी अतिक्रमण हो गया है।वास्तव में ,ये पांच मात्र बीज हैं,

इनके पांचों के पार है तुम्हारी वास्तविकता।पहला बहुत स्थूल है, छह फीट के शरीर में तुम लगभग पूरे ही समाए हुए हो। दूसरा उससे बड़ा है, तीसरा और भी बड़ा है, चौथा इससे भी बड़ा, और पांचवां बहुत बड़ा है। लेकिन फिर भी ये बीज- आवरण हैं। सभी सीमित हैं। यदि सारे बीज- आवरण गिरा दिए जाएं और तुम अपनी वास्तविकता में अनावृत खड़े हो, तो तुम असीम हो। यही कारण है कि योग कहता है : तुम परमात्मा हो ..''अहं ब्रह्मास्मि''। तुम्हीं हो वह ब्रह्म! तुम स्वयं ही परम सत्य हो, क्योकि अब सारे अवरोध गिराए जा चुके हैं।

16-वास्तव में ,ये अवरोध तुम्हें वृताकार (Circle) रूप में घेरे हुए हैं।पहला अवरोध अत्याधिक कठोर है। इसके पार जाना बहुत कठिन है।लोग अपनी भौतिक देह में सीमित रहते हैं और सोचते हैं कि यह भौतिक जीवन ही पूर्ण जीवन है।भौतिक शरीर, ऊर्जा शरीर (कॉज़ल/एस्ट्रल बॉडी )के लिए एक सीढ़ी मात्र है। ऊर्जा शरीर भी, मनस शरीर/मेन्टल बॉडी के लिए एक सीढ़ी है।यह स्प्रिचुअल बॉडी भी शरीर के लिए स्वयं में एक चरण है।वह भी कॉस्मिक बॉडी/आनंद-काया के लिए एक सीढ़ी है।और आनंद-काया से तुम छलांग लगाते हो, अब कोई सीढ़ियां नहीं हैं, तुम अपने अस्तित्व के अतल शून्य में, जो शाश्वत और अनंत है, छलांग लगा देते हो।

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मनुष्य के 7 शरीर>>>>7 चक्र>>>>5 एलिमेंट>>>>5 कोश>>>>विकसित करने की उम्र

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1-स्थूल शरीर-फिजिकलबॉडी>>मूलाधार चक्र>>Earthएलिमेंट>>अन्नमय कोश >>1-7

2-भाव शरीर(इमोशन बॉडी)>>स्वाधिष्ठान चक्र>> वाटर एलिमेंट>>अन्नमय कोश>>7-14

3-कारण शरीर-(कॉज़ल बॉडी)>>मणिपुर चक्र>>प्राणमय कोश>>फायर एलिमेंट>>14-21

4-मानस/मेन्टल शरीर-(एस्ट्रल-इथरिक बॉडी)>>अनाहत चक्र>>एयर एलिमेंट>>मनोमय कोश>>21-28

5-आत्मिक/स्प्रिचुअल शरीर- (एस्ट्रल-इथरिक बॉडी)>>विशुद्ध चक्र >>स्पेस एलिमेंट>>विज्ञानमय कोश>>28-35

6-ब्रह्म शरीर -कॉस्मिक बॉडी(एस्ट्रल-इथरिक बॉडी)>>आज्ञा चक्र >>बियॉन्ड एलिमेंट>>आनंदमय कोश>>35-42

7-निर्वाण शरीर-बॉडीलेस बॉडी>>सहस्त्रार चक्र >>बियॉन्ड एलिमेंट>>42 -49

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क्या अन्नमयकोश आपकी अंतर्यात्रा में सहायक या बाधा बन सकता है?-

20 FACTS;-

1-प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में इस जगत का पूरा इतिहास छिपा है। एक छोटे से बीज-कोष में इस अस्तित्व की सारी कथा छिपी है; वह आपका नहीं है, उसकी लंबी परंपरा है। वह बीज-कोष न मालूम कितने मनुष्यों से, कितने पशुओं से, कितने पौधों से, कितने खनिजों से यात्रा करता हुआ आप तक आया है। वह आपकी पहली पर्त है; जिसेअन्नकोष कहते हैं। अन्नकोष इसलिए कहते हैं...कि उसके निर्माण की जो प्रक्रिया है वह भोजन से होती है।

2-प्रत्येक व्यक्ति का शरीर सात साल में बदल जाता है --हड्डी, मांस, मज्जा-सभी कुछ बदल जाती है; एक आदमी सत्तर साल जीता है तो दस बार उसके पूरे शरीर का रूपांतरण हो जाता है। आप प्रतिदिन जो भोजन ले रहे हैं, वह आपके शरीर को बनाता है; और प्रतिदिन आप अपने शरीर से मृत शरीर को बाहर फेंक रहे हैं। जब हम कहते हैं कि किसी व्यक्ति का देहावसान हो गया, तो हम अंतिम देहावसान को कहते हैं...जब उसकी आत्मा शरीर को छोड़ देती है।

3-वैसे व्यक्ति का देहावसान रोज हो रहा है, व्यक्ति का शरीर रोज मर रहा है; आपका शरीर मरे हुऐ हिस्से को रोज बाहर फेंक रहा है। नाखून आप काटते हैं, दर्द नहीं होता, क्योंकि नाखून आपके शरीर का मरा हुआ हिस्सा है। बाल आप काटते हैं, पीड़ा नहीं होती, क्योंकि बाल आपके शरीर के मरे हुए कोष हैं। अगर बाल आपके शरीर के जीवित हिस्से हैं तो काटने से

पीड़ा होगी।आपका शरीर रोज अपने से बाहर फेंक रहा है...एक आश्चर्य की बात है कि अक्सर कब्र में मुर्दे के बाल और नाखून बढ़ जाते हैं; क्योंकि नाखून और बाल का जिंदगी से कुछ लेना-देना नहीं, मुर्दे के भी बढ़ सकते हैं; वे मरे हुए हिस्से हैं , वे अपनी प्रक्रिया जारी रख सकते हैं।

4-भोजन आपके शरीर को रोज नया शरीर दे रहा है, और आपके शरीर से मुर्दा शरीर रोज बाहर फेंका जा रहा है। यह सतत प्रक्रिया है। इसलिए शरीर को अन्नमयकोश कहा है, क्योंकि वह अन्न से ही निर्मित होता है।

और इसलिए बहुत कुछ निर्भर करेगा कि आप कैसा भोजन ले रहे हैं। इस पर बहुत कुछ निर्भर करेगा। आपका आहार सिर्फ जीवन चलाऊ नहीं है, वह आपके व्यक्तित्व की पहली पर्त निर्मित करता है। और उस पर्त के ऊपर बहुत कुछ निर्भर करेगा कि आप भीतर यात्रा कर सकते हैं या नहीं ; क्योंकि सभी भोजन एक जैसा नहीं है।

5-कुछ भोजन हैं जो आपको भीतर प्रवेश करने ही न देंगे, जो आपको बाहर ही दौड़ाते रहेंगे; कुछ भोजन हैं जो आपके भीतर चैतन्य को जन्मने ही न देंगे, क्योंकि वे आपको बेहोश ही करते रहेंगे; कुछ भोजन हैं जो आपको कभी शांत न होने देंगे, क्योंकि उस भोजन की प्रक्रिया में ही आपके शरीर में एक बेचैनी /रेस्टलेसनेस पैदा हो जाती है। रुग्ण भोजन हैं, स्वस्थ भोजन हैं, शुद्ध भोजन हैं, अशुद्ध भोजन हैं।

6-शुद्ध भोजन उसे कहा गया है, जिससे आपका शरीर अंतर की यात्रा में

बाधा न दे। भोजन के थोड़े से फर्क से बुद्धि क्षीण हो जाती है, या प्रगाढ़ हो जाती है, क्योंकि बुद्धि के लिए कुछ अनिवार्य भोजन के तत्व हैं जो पहुंचने चाहिए। अगर वे न पहुंचें तो बुद्धि क्षीण हो जाती है। बुद्धि की क्षमता भी होगी, तो भी बुद्धि प्रकट नहीं हो पाएगी, क्योंकि प्रकट करने के लिए जो अन्नमय कोष की सहायता चाहिए वह नहीं मिल रही है।यह जो हमारा

शरीर, हमारी पहली पर्त है, यह भोजन की ही पर्त है। इसलिए भोजन का विवेक महत्वपूर्ण है-- एक विशुद्ध शाकाहारी आहार शरीर को एक तरह की लोच/फ्लेक्सिब्लिटी देता है; जो मांसाहारी के शरीर को उपलब्ध नहीं होती। मांसाहारी के शरीर की पर्त धीरे- धीरे ठीक जानवरों जैसी हो जाती है।

7-वास्तव में,आप जिन जानवरों का मांस लेते हैं, वह मांस उन जानवरों के शरीर से निर्मिति है,उनका हिस्सा /कांस्टिटयूएंट है। उस मांस को आप सीधा अपने शरीर में ले जाते हैं, तो आप धीरे- धीरे अपने शरीर को उन जानवरों जैसी व्यवस्था भीतर से देना शुरू कर देते हैं। वह व्यवस्था आपको प्रभावित करेगी ;आपके शरीर को पत्थर की दीवाल जैसा बना देगी। शायद जानवर के भीतर जो बुद्धि का विकास नहीं हुआ है, उसका बहुत कुछ कारण उसका अन्नमय कोष है।आपके भीतर जो विकसित विवेक है, वह आप, जानवर का शरीर अपने पास... आस-पास इकट्ठा करके नीचे गिरा लेंगे।

8-बहुत सी छोटी बातें भी क्रांतिकारी परिवर्तन करती हैं; जिनका हमें अंदाज नहीं होता।वैज्ञानिक कहते हैं कि आदमी के मस्तिष्क का विकास हो सका क्योंकि वह दो पैरों पर खड़ा हो गया; अगर वह चारों हाथ-पैर पर चलता रहता, तो उसका मस्तिष्क कभी विकसित नहीं होता।बात इतनी छोटी सी हैं ;परन्तु महत्वपूर्ण हैं।वास्तव में ,दो पैरों पर खड़ा होने से; खून की जो धार थी, वह मस्तिष्क की तरफ कम जाने लगी , क्योंकि मस्तिष्क तक पंप करने के लिए खून को ऊपर चढ़ना पड़ता है।और मस्तिष्क में जब खून की धार कम जाने लगी तो मस्तिष्क सूक्ष्म तंतुओं को विकसित कर पाया। अगर धार तेजी से जाती है तो सूक्ष्म तंतु टूट जाते हैं।

9-जानवर की खून की धार हमेशा एक सी मस्तिष्क की तरफ होती है। इसलिए सूक्ष्म तंतु निर्मित ही नहीं हो पाते। जैसे कि तेज नदी की धारा हो, तो वहां छोटे पौधे ,छोटे से कंकड़ उस धारा में नहीं टिक सकते ;वे सब बह जाएंगे।तो बुद्धि के विकास में बस इतना ही कारण है।इसलिए रात

के बाद जब आप सुबह सोकर उठते हैं तो बुद्धि आपको ताजी मालूम पड़ती है क्योकि दिन भर बुद्धि का उपयोग करते-करते आप थक जाते हैं तो सो जाते हैं; सोकर खून की धार फिर वापस दौड़ने लगती है।

10-तो हमारी और जानवर की नींद में बहुत फर्क नहीं है;केवल हमारे जागरण में फर्क है;इसलिए सुषुप्ति में कोई भेद नहीं किया जा सकता। क्या आपने कभी नोटिस किया कि नींद के लिए आपको तकिया सिर के नीचे रखना पड़ता है।अगर तकिया हटा लें,तो नींद आनी मुश्किल हो जाती है; क्योंकि तकिया हटते से ही आपके सिर में खून की धार तीव्रता से

प्रवाहित हो जाती है।वास्तव में मनुष्य के सिर की बनावट ऐसी है कि अगर वह बिना तकिए के सोए तो पूरे शरीर से सिर नीचे पड़ जाता है, खून की धार सिर की तरफ तेजी से बहने लगती है; वह इतनी तेजी से बहती है कि तंतुओं को विश्राम नहीं करने देती... तो नींद नहीं आ सकती।

11-इसलिए जैसे-जैसे आदमी की बुद्धि विकसित होती है, तकिए बढ़ते चले जाते हैं.. एक की जगह दो ..तीन। उसका कारण है, जितने सूक्ष्म तंतु भीतर पैदा हो जाते हैं, उतना उनको बचाने की जरूरत हो जाती है, अन्यथा सूक्ष्म तंतु इतने जोर से कंपेंगे कि नींद नहीं आ सकेगी।मनुष्य चूंकि सीधा

खड़ा हो गया, इसलिए परिवार का जन्म हुआ, नहीं तो परिवार का भी जन्म नहीं होता।और अगर परिवार न जन्मे, तो न कोई सभ्यता है, न कोई संस्कृति; क्योंकि सभ्यता और संस्कृति परिवार का फैलाव है। लेकिन आप कभी कल्पना भी नहीं कर सकते है कि आदमी के सीधे खड़े होने से परिवार का संबंध हो सकता है।

12-वैज्ञानिक कहते हैं : मनुष्य सीधा खड़ा हुआ इसलिए परिवार, इसलिए प्रेम, इसलिए संस्कृति, इसलिए सभ्यता... ।इतनी छोटी सी बात इतनी महत्वपूर्ण है तो भोजन छोटी नहीं, बड़ी बात है।बाकी सब शरीर तो सभी का एक ही जैसा है, उसमें बहुत फर्क नहीं है;केवल चेहरे ; व्यक्तित्व/ इडिविजुअलिटि के कारण ही भेद हैं।चेहरा आमने-सामने होने से कामवासना प्रेम में परिवर्तित होने लगी... और निजी संबंध निर्मित हुए; परिवार खड़ा होना शुरू हो गया-- धीरे-धीरे बाकी शरीर गौण हो गया और चेहरा महत्वपूर्ण हो गया।पशुओं के लिए चेहरा बिलकुल महत्वपूर्ण नहीं है।क्योकि उनका चेहरे से कभी गहरा संबंध ही निर्मित नहीं होता।

13-मनुष्य के शरीर में कोई सात करोड़ कोष हैं। इसलिए आत्मा के लिए जो शब्द प्रयोग किया गया- , वह है 'पुरुष।' पुरुष का अर्थ होता है :एक बड़े पुर/नगर के बीच में रहने वाला।प्रत्येक मनुष्य के शरीर में एक बड़ी नगरी है। करोड़ों जीवन आपके आस-पास शरीर में हैं।तो आप जो भोजन

दे रहे हैं, वह इन सात करोड़ कोषों को निर्मित कर रहा है, इनकी मांग निर्मित कर रहा है। फिर आपको इनके साथ बंध कर जीना पड़ता है।और यह बंधन भीतर जाने में बाधा बन जाता है।सात्विक भोजन हम उसे कहते रहे हैं, जिससे एडिक्शन पैदा न हो--ऐसा भोजन, जो सिर्फ शरीर को ऊर्जा देता हो, नशा न देता हो।

14-जिस मात्रा में कोई चीज शरीर के लिए मूर्च्छा पैदा करती है, उसी मात्रा में आपका अन्नमय कोष विकृत हो जाता है। पर हम इतना चिंतन नहीं करते, विचार नहीं करते; हम क्या खा या पी रहे हैं; भीड़ जो कर रही

है, हम भी किए चले जाते हैं।मनुष्य की हिंसा/वायलेंस, उसके भीतर निर्मित होते जहरों से आती है।आपके भीतर से खास जहर बाहर कर लिए जाएं, फिर आप हिंसा न कर सकेंगे। इसलिए वैज्ञानिक कहते है कि जो लोग हत्या कर देते हैं, उनको अपराधी करार देना नासमझी है; वे केवल बीमार हैं।उनकी थोड़ी सी ग्रंथियां अलग कर देनी चाहिए, फिर वे हत्या, हिंसा नहीं कर सकेंगे।

15-वैज्ञानिक कहते है कि आपके भोजन को बदलने की जरूरत नहीं; आप जो भोजन करते हैं, करते रहें, लेकिन आपकी ग्रंथि काटी जा सकती है; जहां रस निर्मित होते हैं, वह व्यवस्था तोड़ी जा सकती है--तो आप क्रोध , हिंसा , हत्या नहीं कर सकेंगे--लेकिन उसमें आपकी कोई गुणवत्ता या अंतर्यात्रा भी न होगी।आप केवल एक डमी बन जायेगे।

लेकिन एक और प्रक्रिया है... आप अपने आहार की व्यवस्था को बदल डालें। धीरे- धीरे, धीरे- धीरे आपका शरीर उन जहरों से मुक्त हो जाता है जो आपको पाप में ले जाते हैं ।तब आप ऊपर उठते हैं और ऊर्जा ऊर्ध्वगामी होती है।

16-क्या तुमने कभी इस बात पर गौर किया है कि जब भी तुमने अधिक मात्रा में और भारी भोजन किया हो, तो तुरंत ही तुम्हें एक आलस्य की अनुभूति, एक नींद सी महसूस होने लगती है। तुम्हारा मन सो जाने की मांग करने लगता है, जागरूकता खोने लगती है। जब पहला शरीर बोझिल हो तो तीक्ष्ण बोध का जागना कठिन हो जाता है। अत: सभी धर्मों में अनाहार इतना महत्वपूर्ण हो गया है। लेकिन अनाहार का विज्ञान है और इसे मूढ़तापूर्वक नहीं अपनाया

जाना चाहिए।उपवास से सारा शरीर, समग्र अस्तित्व, अस्तव्यस्त, पूर्णत: अव्यवस्थित हो जाता है।और जब आमाशय ठीक से कार्य न कर पा रहा हो तो सारा शरीर कमजोर हो जाता है। जीवंतता क्षीण होने लगती है और तुम धीरे -धीरे असंवेदनशील और अंततः मृत हो जाते हो।

लेकिन अनाहार महत्वपूर्ण है।