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क्या है जाति-स्‍मरण (पिछले जन्मों के स्मरण की विधि) के गुप्त सूत्रों का रहस्‍य?


क्या अर्थ है जाति-स्‍मरण के प्रयोग का?-

03 FACTS;-

1-आध्यामिक दृष्टिकोण से भारतीय दर्शन में इस पद्धति का उल्लेख "जाति - स्मरण" के नाम से हमारे उपनिषदों में, जैन धर्म शास्त्र एवं बुद्ध धर्म शास्त्रों में भी मिलता है। आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व भगवान महावीर एवं भगवान बुध्द ने ध्यान की विधियों के द्वारा इस पद्धति का प्रयोग स्वयम के लिए और अपने शिष्यों को दीक्षा देने के पूर्व करते थे। कालन्तर में इस पद्धति का लोप हो गया था। परंतु आज हम फिर से इसे Past Life Regression Theraphy के नाम से जानते है।

2-बुद्ध और महावीर, दोनों ने अपने सभी साधकों को पिछले जन्मों में ले जाने का प्रयोग किया।और प्रत्येक व्यक्ति जो उनके निकट आता, उसे जाति-स्मरण के प्रयोग में ले जाते, ताकि वह जान सके कि उसकी पिछली यात्रा क्या है। यहां तक भी वह जान सके कि वह पशु कब था, कैसा पशु था, क्या पशु होने में उसने किया कि वह मनुष्य हो सका। और अगर यह उसे पता चल जाए कि पशु होने में उसने कुछ किया, जो उसे मनुष्य बनाया, तो उसे खयाल में हो सकता है कि मनुष्य होने में कुछ करे तो क्या और ऊपर जा सकता है। कुछ करने से ही वह आया है।

3-अगर कोई बहुत गौर से समझे तो बुद्ध और महावीर का जो सबसे बड़ा दान है वह अहिंसा वगैरह नहीं है। अहिंसा तो बहुत दिन से चलती थी। इन दोनों का जो सबसे बड़ा कीमती दान है, वह जाति स्मरण है, वह विधि है जिसके द्वारा आदमी को उसका पिछला जन्म स्मरण दिलाया जा सके। और जो लाखों लोग भिक्षु और संन्यासी हो गए, वह शिक्षा से नहीं हो गए। वह जैसे ही उनको पिछले जन्म का स्मरण आया कि सब बातें बेकार हो गईं और उनको सिवाय संन्यास के कोई सार्थक बात न रही।

4-लाखों आदमी एक साथ जो संन्यासी हुए, उसका यह कारण नहीं था कि महावीर ने समझा दिया कि संन्यास से मोक्ष मिल जाएगा। उसका कुल कारण इतना था कि उनको उनकी स्मृति की याद दिला देने से उनको यह लगा कि यह सब तो हम बहुत बार कर चुके, इसमें तो कुछ सार नहीं है, इसमें कुछ भी सार नहीं है। यह चक्कर तो बहुत दफे घूम चुका, इसमें कोई भी अर्थ नहीं है।

5-लोगो का पूर्व के जन्मो और पुनर्जन्मों के प्रति बढ़ती उत्सुकता और विश्वाश के कारण ही "Past Life Regression" जैसी Therapy प्रचलित हुई। लोग अपनी वर्तमान समस्या (किसी तरह का अनजाना डर या फोबिया) का हल पूर्वजन्म की घटनाओं में तलाश रहे है । और ऐसे लोगो की संख्या हज़ारो में है, जिनका दावा है कि Past Life Regression Therapy के कारण वे अपनी अनेक परेशानियों से छुटकारा पा चुके है। इस Theraphy मे उत्सुक व्यक्ति को समोहनकर्ता (Hypnotherapist) सम्मोहन अर्थात Hypnosis के तहत उसके बचपन से लेकर जन्म से पहले के कालखंड में पहुचने के लिए प्रेरित करता है।

6-ज्यादतर मामलो में इस प्रक्रिया से गुजर रहा व्यक्ति अपने मौजूदा जीवन से पहले के जीवन या जीवन और मृत्यु के बीच के समय के बारे में बाते करने लगता है जिससे पारलौकिक जीवन के कई रहस्यो से अनायास ही पर्दा उठने लगता है और साथ ही साथ अपनी गम्भीर बीमारी या मनोदशा से छुटकारा भी पा लेता है। पाश्चात्य जगत में, आज से 50-60 वर्षो पूर्व ही Past Life Regression तकनीक पर व्यापक तौर पर शोध हुए जिनमे सुप्रसिध्द मनोचिकित्सक डॉ माइकल न्यूटन भी एक थे, जिन्होंने PLR Threpahy पर अपने जीवन के 30 वर्षों के शोध के बाद कई किताबें लिखी जिनमे से 3 मुख्य है।जिनके नाम निम्नलिखित है .. 1-Life Between Life

2-Journey of Souls

3-Destiny of Souls

स्वास्थय लाभ के साथ साथ अपनी आध्यात्मिक यात्रा की उन्नति के लिए PLR Theraphy मील का पत्थर साबित हो सकती है।

क्या हम अपने अतीत के जन्‍मों को जान सकते है ?-

06 FACTS;-

1-जाति-स्मरण का अर्थ है, पिछले जन्मों के स्मरण की विधि।निश्‍चित ही मनुष्‍य अपने पिछले जन्‍मों को जान सकता है।क्‍योंकि जो भी एक बार चित पर स्‍मृति बन गई है, वह नष्‍ट नहीं होती। वह हमारे चित के गहरे तलों में /अनकांशस हिस्‍सों में सदा मौजूद रहती है। हम जो भी जान लेते है कभी नहीं भूलते।लेकिन अभी तो आप इस जन्‍म को भी नहीं जानते है, अतीत के जन्‍मों को जानना तो फिर बहुत कठिन है।

2-वास्तव में,सम्मोहित अवस्‍था में आपके भीतर की स्‍मृति को बाहर लाया जा सकता है।

लेकिन पहले उसे इसी जन्‍म में पीछे लौटना पड़ेगा।वहां तक पीछे लौटना पड़ेगा, जहां वह मां के पेट में कंसीव हुआ, गर्भ-धारण हुआ। और बाद में फिर दूसरे जन्‍मों की स्‍मृतियों में प्रवेश

किया जा सकता है।लेकिन ध्यान रहे, प्रकृति ने पिछले जन्‍मों की व्‍यवस्‍था आकारण नहीं कर रखी है। कारण बहुत महत्‍व पूर्ण है।और पिछला जन्‍म तो दूर है, अगर आपको इस महीने की भी सारी बातें याद रह जाये, तो आप पागल हो जायेंगे। एक दिन की भी अगर सुबह से सांझ तक की सारी बातें याद रह जाएं तो आप जिंदा नहीं रह सकते।

3-तो प्रकृति की सारी व्‍यवस्‍था यह है कि आपका मन कितने तनाव झेल सकता है। उतनी ही स्‍मृति आपके भीतर शेष रहने दी जाती है। शेष अंधेरे गर्त में डाल दि जाती है। जैसे घर में कबाड़-घर होता है, डालकर दरवाजा बंद कर दिया है। वैसे ही स्‍मृति का एक कलेक्‍टिव हाऊस , एक अनकांशस/अचेतन घर है, जहां स्‍मृति में जो बेकार होता है, जिसे चित में रखने की कोई जरूरत नहीं है, वह सब संग्रहीत होता रहता है। लेकिन अगर कोई आदमी अनजाने, बिना समझे हुए उस घर में प्रविष्‍ट हो जाए तो तत्‍क्षण पागल हो जाएगा। इतनी ज्‍यादा है वे स्‍मृतियां।

4-आत्मा के संबंध में जितनी बातें हैं, वे बिना प्रयोग के कोई भी समझ में

आने वाली नहीं हैं।और कठिनाई तो यह है कि किसी की गहरे प्रयोग करने की तैयारी नहीं है। क्योंकि गहरे प्रयोग खतरनाक भी हैं। क्योंकि आपको अगर पिछले जन्मों की स्मृति आ जाए, तो आप फिर दुबारा वही आदमी कभी नहीं हो सकेंगे जो आप स्मृति के पहले थे।यानी आपकी पूरी, टोटल पर्सनैलिटी फौरन बदल जाएगी। क्योंकि अगर आप अपने बेटे के लिए मरे जा रहे हैं कि इसको यह बनाऊं, इसको वह बनाऊं, और आपको अगर पांच जन्मों की स्मृति आ जाए कि आप ऐसे कई बेटों के साथ मेहनत कर चुके हैं, वह सब बेमानी साबित हुई, और आखिर में मर गए, तो इस बेटे के साथ जो आपका पागलपन है वह एकदम क्षीण हो जाएगा।

5-इक्कीस दिन में गहरा प्रयोग करने से आप बिलकुल दूसरे आदमी हो सकते हैं। आपकी सारी जिंदगी और हो जाए ;जो आप सोचते थे वह चला जाए; जो आप जीते थे वह चला जाए; और दुबारा आप लौट कर कभी

वही न हो सकें।लेकिन बौद्धिक जिज्ञासा से तो कुछ हल होने वाला नहीं है ।

मन और चित्त में अंतर है। चित्त में एक लाख जन्मों की स्मृतियां संग्रहित रहती है।

6-चित्त कभी न नष्ट होने वाली हार्ड डिस्क की तरह होता है। वर्तमान जन्म से पहले का जन्म सबसे ज्यादा स्पष्ट होता है, क्योंकि उस जन्म में मरकर ही हम इस जन्म में आए हैं। ताजा मामला जरा ज्यादा स्पष्ट होता है।

अब सवाल यह उठता है कि यह कैसे संभव होता है कि हमारे पिछले जन्म के हमें संकेत मिलते रहते हैं? यह संकेत समझने वाला ही उस पर गौर करता है और अभ्यास से वह वहां पहुंच जाता है जहां वह पिछले जन्म में रहता था।

क्या है संकेत ?-

06 FACTS;-

1-घटनाए देती है संकेत :-

02 POINTS;-

1-यदि आप पिछले जन्म में बुरी घटनाओं के दौरा से गुजरे हैं तो इस जन्म में आपका स्वभाव किसी होनी-अनहोनी की आशंका से ग्रस्त रहेगा। यह भी कि आपकी पिछले जन्म में मौत स्वाभाविक नहीं हुई है तो निश्चित ही आप किसी अजीब और अनजानी घटना के भय से हमेशा ग्रस्त रहेंगे।

हालांकि डरना एक साधारण और स्वाभाविक बात होती है। लेकिन जब आप बेवजह की चीजों जैसे, कोई निश्चित रंग, संख्या, स्वाद, वस्त्र, गंध, स्थान से भी डरने लगते हैं, जिनसे एक आम इंसान को नहीं डरना चाहिए या उसका भय नहीं सताना चाहिए, तो यह साधारण बात नहीं होती है।

2-इसके अलावा अगर आपको अंधेरे, ऊंचाई या पानी से डर लगता है और किसी खास तरह के कपड़े या टोपी को पसंद या नापसंद करते हैं, तो यह पिछले जन्म का संकेत ही है। किसी-किसी में यह डर इस कदर हावी रहता है कि उसका जीना मुश्किल हो जाता है। हालांकि मनोवैज्ञानिक इसे फोबिया कह सकते हैं लेकिन यह आपके अवचेतन मन में कैसे समाया यह सोचने वाली बात है। आपके साथ जरूर ऐसा कुछ घटा है तभी तो आप उक्त बातों से डरते हैं।

2-जाने पहचाने से स्थान :-

आप किसी शहर, गली,या गांव से गुजर रहे हो और अचानक से आपको लगे कि मैं यहां पहले भी आया हूं या इस जगह में कुछ तो है जो मुझे आकर्षित कर रही है। हो सकता है कि आप इस स्थान पर अपने इस जन्म में पहली बार गए हों लेकिन वो आपको कुछ जाना-पहचाना सा लगने लगता है। कई बार सपनों में भी ऐसी जगहें दिखाई देती है लेकिन हम उस पर गौर नहीं करते।

3-जाने पहचाने से चेहरे :-

अधिकतर लोगों को कुछ अनजाने से लोगों को देखकर लगता है कि मैंने इसे कहीं देखा है। कहां .. यह याद नहीं। हालांकि आप उस व्यक्ति से पहली बार ही मिले हो। यह भी हो सकता है कि किसी पिछले जन्म के व्यक्ति से मिलता-जुलता कोई चेहरा हो, जिसे आप देख रहे हो हो सकता है कि कोई ऐसा चेहरा हो जो आपने पिछले जन्म में देखा हो या जो आपका बहुत करीबी हो।

4-पहली बार मिलकर अजीब-सी फीलिंग :-

आप किसी व्यक्ति से पहली बार मिले हैं लेकिन मिलते ही आपके मन में अजीब सी खुशी और सिरहन होती है। आप गहराई से उसे अचानक ही पसंद करने लगते हैं। यह भी हो सकता है कि कोई ऐसा व्यक्ति दिखाई दे जिसे देखकर ही आपके मन में घृणा उत्पन्न हो। हो सकता है उस व्यक्ति का आपके पिछले जन्म से कोई संबंध हो। भले ही उन लोगों से आपका वर्तमान में किसी भी प्रकार का संबंध न हो लेकिन आपको उनके भीतर से सकारात्मक या नकारात्मक ऊर्जा जैसा आभास होता है।

5-किसी सपने का बार-बार आना :-

03 POINTS;-

1-अक्सर कुछ ऐसे सपने होते हैं जो आपके पिछले जन्म से जुड़े होते हैं। हो सकता है कि आप किसी गली में किसी के साथ घुम रहे हों या कोई घर आपको बार-बार दिखाई देता हो। अक्सर आप उस घर की छत पर या आंगन में खुद को पाते हों। कभी-कभी ऐसे सपने डरावने भी हो सकते हैं।

2-आपने देखा होगा कि आपको उस घर या गली के सपने ज्यादा आते हैं जहां आपने बचपन बिताया है। इसी तरह आपने अपने पिछले जन्म में भी कई घरों में अपना जीवन बिताया है। उन घरों की स्मृतियां आपके अंदर हमेशा मौजूद रहेगी। वे स्मृतियां समय-समय पर जाग्रत होती रहती है। यह आपको पिछले जन्म से जोड़ने की एक कड़ी है।

3-आप इस पर गौर करेंगे तो निश्चित ही अपने सपनों में अपने पिछले जन्म के घर को स्पष्ट रूप से देख पाएंगे। हो सकता है कि आप किसी बोर्ड पर उस शहर का नाम भी देख या पढ़ लें जहां आप पिछले जन्म में रहते थे। कभी कभी अचानक ही ऐसे सपने स्पष्ट रूप से आते हैं लेकिन अधिकतर लोग इस पर ध्यान नहीं देते और सुबह उठते ही सपने भूल जाते हैं या वे उस सपने के बारे में अच्छे से सोच नहीं पाते हैं।

6-पिछले जन्म की अनूठी स्मृतियां : -

02 POINTS;-

1-अक्सर पिछले जन्म की यादें आपका पिछा करती रहती है। कभी-कभी यह लगता है कि वर्तमान में आप जिन घटनाओं का सामने कर रहे हैं वे पहले भी इसी तरह से घट चुकी है। जीवन एक चक्र है। कभी-कभी हमारे साथ एक ही तरह की घटनाएं बार-बार घटती रहती है। निश्चित ही इसमें समय और स्थान के अलावा पिछले जन्म का भी योगदान रहता होगा।

2-कभी-कभी ऐसा भी होता है कि इस जन्म में आपके साथ असल में ऐसी कोई घटना नहीं घटी है जिसकी यादें आपके दिमाग में मौजूद है। आप उसी तरह की घटना किसी ओर के साथ जब घटते हुए देखते हैं तो आपको अजीब-सी अनुभूति होने लगती है। आप उस घटना से जुड़ जाते हैं। कभी-कभी किसी बच्चों को ऐसी घटनाएं याद आ जाती है जो उसके पिछले जन्में घटी है। वह उसका वर्णन करने लगता है लेकिन हम समझते हैं कि यह उल्लू बना रहा है ..बहुत कार्टून देखने लगा है। दरअसल, ये स्थिति बच्चों के साथ अक्सर होती है, जब वे कुछ ऐसा बोलने लगते हैं या याद करने लगते हैं, जिसका संबंध उनके पिछले जन्म से होता है।

पुनर्जन्म क्यों?-

14 FACTS;-

1-महाभारत युद्ध के दौरान भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं- ''हे कुंतीनंदन! तेरे और मेरे कई जन्म हो चुके हैं। फर्क ये है कि मुझे मेरे सारे जन्मों की याद है, लेकिन तुझे नहीं। जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होती है'।यहूदी, ईसाइयत, इस्लाम पुनर्जन्‍म के सिद्धांत

को नहीं मानते हैं। उक्त तीनों धर्मों के समानांतर- हिन्दू, जैन और बौद्ध.. ये तीनों धर्म मानते हैं कि पुनर्जन्म एक सच्चाई है।

2-उत्तर भारत में यह मान्यता है कि जो बच्चे अपने पिछले जन्म के बारे में जानकारी रखते हैं, उनकी मृत्यु छोटी उम्र में ही हो जाती है। इसलिए जो बच्चे पुनर्जन्म की घटनाओं को याद रखते हैं, उनके लिए पालक उसकी इस स्मृति को भुलाने के लिए कई तरह के जतन करते हैं। कई बार तो उसे कुम्हार के चाक पर बैठाकर चाक को उल्टा घुमाया जाता है ताकि उसकी स्मृति का लोप हो जाए। हमारा संपूर्ण जीवन स्मृति-विस्मृति के चक्र में फंसा रहता है। उम्र के साथ स्मृति का घटना शुरू होता है, जो कि एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, अगले जन्म की तैयारी के लिए।

3-एक तो शरीर हमें दिखाई पड़ता है, जो हमारा ऊपर है। एक और शरीर है, ठीक इसके जैसे ही आकृति का, जो इस शरीर में व्याप्त है। उसे सूक्ष्म शरीर कहें, सटल बाडी कहें, कार्मण शरीर कहें, कर्म शरीर कहें––मनो-शरीर कहें,कुछ भी नाम दें सकते है ।ठीक इस शरीर जैसा ही, अत्यंत सूक्ष्म परमाणुओं से निर्मित सूक्ष्म देह है। जब यह शरीर गिर जाता है, तब भी वह देह नहीं गिरती। वह देह आत्मा के साथ यात्रा करती है। उस देह की खूबी है कि आत्मा की जैसी मनोकामना होती है, वह देह वही आकार ग्रहण कर लेती है। पहले वह देह आकार ग्रहण करती है, और तब उस आकार की देह में वह प्रवेश कर सकती है।

4-अगर एक सिंह मरे, तो उसके शरीर के पीछे जो छिपा हुआ सूक्ष्म शरीर है, वह सिंह का होगा, लेकिन वह मनो-काया है। मनो-काया का मतलब यह है कि जैसे हम पानी एक गिलास में डालें, तो उस गिलास का हो जाए रूप उसका, बर्तन में डालें, तो बर्तन जैसा हो जाए, बोतल में भरें, बोतल जैसा हो जाए। हमारी स्थूल देह सख्त है, पत्थर के बर्फ की तरह। और हमारी सूक्ष्म देह तरल, लिक्विड है। वह तत्काल। किसी भी आकार को ग्रहण कर सकती है तो अगर एक सिंह मरे और उसकी आत्मा विकसित होकर मनुष्य बनना चाहे, तो मनुष्य शरीर ग्रहण करने के पहले उसकी सूक्ष्म देह मनुष्य की आकृति को ग्रहण कर लेती है। वह उसकी मनो-आकृति है।

5-सूक्ष्म शरीर जैसे ही देह ग्रहण कर लेता है, मनो-आकृति बन जाता है, वैसे ही उसकी खोज

शुरू हो जाती है गर्भ के लिए।स्त्री और पुरुष के अणुओं का मिलन सिर्फ अवसर/अपरचुनिटी है, जन्म नहीं है; जिसमें एक आत्मा उतर सकती है ।और उस काया को पिघलाने के लिए

जो प्रक्रिया है, वही साक्षी-भाव, सामायिक या ध्यान है। और वह हमारे स्मरण में आ जाए और उसके प्रयोग से हम गुजर जाएं तो फिर कोई पुनर्जन्म नहीं है।पुनर्जन्म रहा है सदा, रहेगा,

अगर हम कुछ न करें। लेकिन ऐसा हो सकता है कि फिर पुनर्जन्म न हो। तब हम विराट जीवन के साथ एक हो जाते हैं।

6-ऐसा नहीं कि हम मिट जाते हैं, समाप्त हो जाते हैं, बस ऐसा ही है जैसे बूंद सागर हो जाती है। मिटती-विटती नहीं, लेकिन बूंद की तरह मिट जाती है, सागर की तरह रह जाती है।

चेतना इस बात का सबूत है कि विकास स्वचालित, आटोमेटिक नहीं हो सकता, उसमें 'चेतना' सक्रिय रूप से भाग लेगी और चेतना भाग ले रही है। इसलिए जो हमें विकास दिख रहा है, जितने पीछे हम उतरते हैं, , उतना ही स्वचालित विकास की मात्रा बढ़ती चली जाती है और सचेष्ट विकास की मात्रा कम होती चली जाती है ।जैसे अमीबा है, आखिरी, पहला

कदम जीवन ने जहां उठाया, तो वहां हम कह सकते हैं कि शायद निन्यानबे प्रतिशत तो आटोमेटिक है, एकाध प्रतिशत विकास स्व-इच्छा से हो सकता है।

7-लेकिन जैसे-जैसे हम ऊपर की तरफ आते हैं, तो मनुष्य के साथ तो मामला ऐसा है कि अगर विकास होगा तो निन्यानबे प्रतिशत स्वेच्छा से होगा, नहीं तो विकास होगा ही नहीं।

और इसीलिए मनुष्य कोई पचास हजार वर्षों से ठहर गया है। यानी मनुष्य में अब कोई आटोमेटिक विकास परिलक्षित नहीं हो रहा है । दस लाख वर्ष के भी जो शरीर मिले हैं, उन शरीरों में भी कोई विकास नहीं हुआ है। दस लाख वर्ष के जो अस्थिपंजर मिले हैं और हमारे अस्थिपंजर में कोई बुनियादी फर्क नहीं पड़ा है। न हमारे मस्तिष्क में कोई बुनियादी फर्क पड़ा है।

8-तो ऐसा प्रतीत होता है कि मनुष्य में तो निन्यानबे प्रतिशत स्वेच्छा पर निर्भर करेगा। कोई बुद्ध, कोई महावीर, यह स्वेच्छा का विकास है। और अगर हम स्वचालित विकास की प्रतीक्षा करते रहें तो एक ही प्रतिशत विकास की संभावना है, जो बहुत धीरे-धीरे घिसटती रहेगी।

मनुष्य तक आते हैं तो स्वेच्छा ज्यादा है, यांत्रिकता कम है। लेकिन निम्नतम स्थिति में भी एक अंश स्वेच्छा का है। वह एक अंश स्वेच्छा का ही उसे चेतन बनाता है, नहीं तो चेतन होने का कोई अर्थ नहीं है। यानी चेतन होने का अर्थ ही यह है कि विकास में हम भागीदार हैं और पतन में हम जिम्मेवार हैं। चेतना का मतलब ही यह है कि जो भी हो रहा है उसमें, 'दायित्व है हमारा', रिस्पांसिबिलिटी है। अंततः हम जिम्मेवार हैं। सारा विकास–चाहे पशु, पक्षी, मछली, कीड़े-मकोड़े, पौधा–कोई भी विकसित हो रहा हो, उसकी भी इच्छा सक्रिय होकर काम रही है।

9-तो विकास किया हुआ है, चेतना श्रम कर रही है विकास में। चेतना जितनी विकसित होती चली जाती है, उतने विकसित शरीर भी निर्माण करती है। इसलिए शरीर में भी जो विकास हो रहा है, वह भी जैसा डार्विन समझता है कि स्वचालित है, आटोमेटिक है, वैसा नहीं है।

जितनी चेतना तीव्र विकास ग्रहण कर लेती है, उतना शरीर के तल पर भी विकास होना अनिवार्य हो जाता है।यानी किसी बंदर का शरीर अगर कभी आदमी का शरीर बनता है तो तभी जब किसी बंदर की आत्मा इसके पूर्व आदमी की आत्मा का चरण उठा चुकी होती है। उस आत्मा की जरूरत के लिए ही पीछे से शरीर भी विकसित होता है।आत्मा का विकास पहले है, शरीर का विकास पीछे है। शरीर सिर्फ अवसर बनता है। जितनी आत्मा विकसित होती चली जाती है, उतना विकसित अवसर शरीर को भी बनना पड़ता है।

10-मनुष्य हो जाना असाधारण घटना है। लंबी प्रक्रियाओं, लंबी चेष्टाओं, लंबे श्रम और लंबी यात्रा से मनुष्य की चेतना की स्थिति उपलब्ध होती है। लेकिन अगर हमने ऐसा मान लिया कि मुफ्त में मिल गई है–और अक्सर ऐसा होता है।कभी भी मनुष्य और भी आगे गति कर सकता है और ऐसी चेतना विकसित हो सकती है, जो मनुष्य से श्रेष्ठतर शरीरों को जन्म दे सके।

इस जन्म में जब हमारी उपलब्धि होती है और तब हमें खयाल भी नहीं रह जाता, और तब हम अक्सर गंवाना शुरू करते हैं।यह धन के बाबत ही नहीं होता, यह पुण्य के बाबत भी , ज्ञान के बाबत भी , और चेतना के बाबत भी यही होता है। फिर हम अवसर का उपयोग नहीं कर पाते। तो जो हो गया है, वहीं हम अटक जाते हैं।

11-इसलिए बहुत लोग एक ही योनि में बार-बार पुनरुक्त होते हैं। लाख बार भी पुनरुक्त हो सकते हैं। नीचे कोई नहीं जाता। नीचे जाने का कोई उपाय नहीं है! पीछे कोई नहीं लौट सकता। लेकिन जहां हैं, वहीं पुनरुक्त हो सकता है या आगे जा सकता है।दो ही उपाय हैं–या

तो आगे जाएं या जहां हैं वहीं भटकते रह जाएं।और जहां हैं, अगर आप वहीं भटकते हैं तो विकास अवरुद्ध हो जाएगा, रुक जाएगा। और अगर आगे जाते हैं तो विकास फलित होगा।विकास चेष्टा निर्भर है, संकल्प निर्भर है, साधना निर्भर है। इसीलिए इतना बड़ा प्राणी-जगत है, लेकिन मनुष्यों की संख्या बहुत कम है। बढ़ती भी है तो बहुत धीमे बढ़ती है। आज हमें लगता भी है कि बहुत जोर से बढ़ रही है, तो भी वह हम सिर्फ मनुष्य को ही सोचते हैं, इसलिए ऐसा लगता है। अगर हम प्राणी-जगत को देखें तो असंख्य प्राणी-जगत में हमारी क्या संख्या है! हमसे ज्यादा छोटी जाति का कोई प्राणी नहीं है इस जगत में।

12-एक घर में इतने मच्छर हो सकते हैं जितनी पूरी मनुष्य-जाति है।हम एक बड़े समुद्र में एक छोटी बूंद से ज्यादा नहीं हैं। लेकिन अगर हम मनुष्यों को देखें तो हमें बहुत ज्यादा मालूम

पड़ता है। पहला जीवन भी जो इस पृथ्वी पर आया है, वह भी वैज्ञानिक नहीं बता पाते कि कैसे आ गया। वैज्ञानिक विकास बता पाते हैं, लेकिन विकास तो बाद की बात है। जीवन आया कहां से? मछली आदमी बन गई ; लेकिन मछली, वह प्राण कहां से आया? कि कोई कहे पौधा मछली बन गया, तो पौधे में वह प्राण कहां से आया? यानी प्राण को कहीं न कहीं से आने की जरूरत है।और दूसरी बात, यह है कि जब एक मां गर्भ के योग्य होती है, तो एक आत्मा उसमें प्रवेश करती है। जब एक पृथ्वी या एक उपग्रह जीवन के योग्य हो जाता है, तो दूसरे ग्रहों-उपग्रहों से जीवन वहां प्रवेश करता है। और कोई उपाय नहीं है। यानी जो पहला जीवाणु है, वह सदा ट्रांस-माइग्रेट करता है।

13-जानने की सीमा इतनी छोटी है कि हमें पता नहीं कि इस अंतहीन विस्तार में, इस पूरे ब्रह्मांड में कितने-कितने लोकों में जीवन है। उस जीवन से भी संबंध स्थापित करने की निरंतर चेष्टाएं की गई हैं। वैज्ञानिक चेष्टा तो अब चल रही है, धार्मिक चेष्टा बहुत पुरानी है। और संबंध स्थापित किए गए हैं। अगर हम स्वयं बाधा न बनें तो वह संभावना खुल सकती है। सिर्फ एक ही यात्रा है इस जगत में, विचार की, जिसमें समय नहीं लगता।गौतम बुद्ध के पूर्व जन्मों की कहानियां जातक कथाओं द्वारा जानी जाती हैं।

14-आठ कारणों से लेती आत्मा पुनर्जन्म:-

1. भगवान की आज्ञा से : भगवान किसी विशेष कार्य के लिए महात्माओं और दिव्य पुरुषों की आत्माओं को पुन: जन्म लेने की आज्ञा देते हैं।

2. पुण्य समाप्त हो जाने पर : संसार में किए गए पुण्य कर्म के प्रभाव से व्यक्ति की आत्मा स्वर्ग में सुख भोगती है और जब तक पुण्य कर्मों का प्रभाव रहता है, वह आत्मा दैवीय सुख प्राप्त करती है। जब पुण्य कर्मों का प्रभाव खत्म हो जाता है तो उसे पुन: जन्म लेना होता है।

3. पुण्य फल भोगने के लिए : कभी-कभी किसी व्यक्ति द्वारा अत्यधिक पुण्य कर्म किए जाते हैं और उसकी मृत्यु हो जाती है, तब उन पुण्य कर्मों का फल भोगने के लिए आत्मा पुन: जन्म लेती है।

4. पाप का फल भोगने के लिए।

5. बदला लेने के लिए : आत्मा किसी से बदला लेने के लिए पुनर्जन्म लेती है। यदि किसी व्यक्ति को धोखे से, कपट से या अन्य किसी प्रकार की यातना देकर मार दिया जाता है तो वह आत्मा पुनर्जन्म अवश्य लेती है।

6. बदला चुकाने के लिए।

7. अकाल मृत्यु हो जाने पर।

8. अपूर्ण साधना को पूर्ण करने के लिए।

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हम पशु-पक्षियों को कैसे जानें कि वे अपनी स्वेच्छा से विकसित होकर और ऊंची योनियों में प्रवेश कर रहे हैं?-

05 FACTS;-

1-हमें पहचानना बहुत मुश्किल हो जाता है ..एक ही सरलतम रास्ता है।और वह यह है कि जो मनुष्य-चेतनाएं आज हैं, अगर हम उन्हें उनके पिछले जन्मों में उतर सकें तो हम इस बात का पता पा जाएंगे कि वे पिछले जन्मों में पशुओं और पौधों से भी होकर आए हैं।उदाहरण के

लिए महावीर स्वामी एक व्यक्ति को समझा रहे थे ;जो राजकुमार है, लेकिन वह नया दीक्षित है। वह जो बीच का रास्ता है धर्मशाला का, उस पर ही सोया हुआ है।पुराने साधुओं को ज्यादा ठीक जगह मिल गई है। रात भर उसे बड़ी तकलीफ हुई है ; एक तो यह भारी अपमान है,कि वह राजकुमार था। कभी जमीन पर चला नहीं था और आज गलियारे में सोना पड़ा है। वृद्ध साधुओं को कमरे मिल गए हैं। वह गलियारे में पड़ा हुआ है। रात भर कोई गलियारे से निकलता है, फिर उसकी नींद टूट जाती है।

2-वह बार-बार सोचने लगा कि ''बेहतर है, मैं लौट जाऊं ;जो था, वही ठीक था। यह क्या पागलपन में मैं पड़ गया हूं! ऐसा गलियारों में पड़े-पड़े तो मौत हो जाएगी। यह तो व्यर्थ की जिंदगी हो गई। यह मैंने क्या गलती कर ली!''सुबह महावीर ने उसे बुलाया और कहा कि

तुझे पता है कि पिछले जन्म में तू कौन था?उसने कहा 'मुझे कुछ पता नहीं'।तो महावीर उससे कहते हैं कि पिछले जन्म में तू हाथी था। और जंगल में आग लगी, सारे पशु, सारे पक्षी भागे, तू भी भागा। जब तू पैर उठा रहा था और सोच रहा था कि किधर को जाऊं, तभी तूने देखा कि एक छोटा सा खरगोश तेरे पैर के नीचे आकर बैठ गया। उसने समझा कि पैर छाया है, बचाव हो जाएगा। और तू इतना हिम्मतवर था कि तूने नीचे देखा कि खरगोश है तो तूने फिर पैर नीचे नहीं रखा। तू फिर पैर ही ऊंचा किए खड़ा रहा।आग लग गई, तू मर गया, लेकिन तूने खरगोश को बचाने की मरते दम तक चेष्टा की। उस कृत्य की वजह से तू आदमी हुआ है। उस कृत्य ने तुझे मनुष्य होने का अधिकार दिया है।और आज तू इतना कमजोर है कि रात भर गलियारे में नहीं सो सका तो भागने की सोचने लगा।