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क्या है सूक्ष्‍म शरीर,एवं ध्यान -साधना के कुछ गुप्‍त आयाम?PART-02


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एक बार तेजस /सूक्ष्म शरीर बाहर हुआ तो वह कभी भी ठीक से पूरी तरह भीतर प्रविष्ट नहीं हो पाता और उनके बीच तालमेल और सामंजस्य बिगड़ जाता है। इसलिए योगी लोग हमेशा रुग्ण रहे हैं ...कम उम्र में मरते रहे हैं । क्या रूग्‍णता की संभावनाएं घटायी नहीं जा सकती हैं?

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24 FACTS;-

1-इस संबंध में भी पहली बात तो यह है कि शरीर की जो प्राकृतिक व्यवस्था है, जैसे ही हमारा सूक्ष्म शरीर शरीर के बाहर जाता है, उसकी प्राकृतिक व्यवस्था में व्यवधान पड़ेगा ही। वह घटना अप्राकृतिक है, बियांड नेचर है तो जब भी कोई प्रकृति से विभिन्न, प्रकृति के ऊपर कोई घटना घटेगी, तो प्रकृति का जो व्यवस्थित तालमेल था, वह अस्तव्यस्त हो जाएगा।

इस अस्तव्यस्तता से अगर बचना हो, तो बहुत तैयारियों की जरूरत है। योगासन,मुद्राएं उस तैयारी में बड़े सहयोगी हैं।

2- हठयोग की सारी प्रक्रियाएं उस दिशा में सहयोगी हैं लेकिन फिर शरीर को उतनी बड़ी अप्राकृतिक घटना को झेलने के लिए योग्य लोह तत्व देना जरूरी है। साधारण शरीर नहीं

, फिर असाधारण शरीर चाहिए।अब जैसे राममूर्ति के पास एक शरीर था। इस शरीर में और हमारे शरीर में कोई बुनियादी भेद नहीं है। लेकिन राममूर्ति को एक शरीर की ट्रिक का बोध हो गया। वह साध ली गई।आप रोज देखते हैं कि एक मोटर का टायर-ट्यूब हवा को भरे हुए इतना वजन ढो लेता है। उस टायर में से हवा कम कर दें, तो वह वजन नहीं ढो पाएगा।तो उस वजन को ढोने के लिए हवा का एक विशेष अनुपात चाहिए।

3-तो प्राणायाम की एक विशेष प्रक्रिया में सीने में इतनी हवा भरी जा सकती है कि ऊपर हाथी खड़ा हो जाए। तब जो सीना है ..टायर -ट्यूब की तरह काम कर रहा है। हवा का एक विशेष अनुपात...। एक हाथी के वजन को झेलने के लिए हवा का कितना आयतन फेफड़े के भीतर चाहिए अगर इसका ठीक पता हो, तो कोई कठिनाई नहीं है। राममूर्ति के पास भी फेफड़ा वही है जो हमारे पास है। वह जो टायर के भीतर रबर का ट्यूब पड़ा हुआ है, वह कोई बहुत मजबूत लोहे की चीज नहीं है। उसमें कोई ताकत नहीं है। उसका तो सिर्फ इतना ही उपयोग है कि इतनी हवा को वह आयतन में समा लेता है ।बस इतनी हवा वहां रह जाए तो काम पूरा हो जाए।

4-जैसे जब तुम पानी में,तेजी से नाव चलाते हो तो नाव के पीछे एक गड्डा बन जाता है। वह गड्डा ही असल में चलने में सहयोगी होता है। अगर पानी तरकीब सीख ले और गड्डा न बनाए, तो नाव नहीं चल सकती। उस गड्डे की वजह से आसपास का पानी उस गड्डे को भरने को भागता है। पानी के भागने की वजह से नाव को धक्का लगता है, नाव आगे चली जाती है। बस, पूरे वक्त यही ट्रिक है। वह पानी के पीछे नाव की जगह खाली होती है।जब पानी भरने को भागता है, तो नाव को गति आगे मिल जाती है।

5-हठयोग ने बहुत सी प्रक्रियाएं खोजी हैं जो शरीर को एक विशेष इंतजाम दे देती हैं। अगर वह इंतजाम दे दिया गया है तब तो फर्क पड़ जाएगा। इसलिए हठयोगी कभी कम उम्र में नहीं मरता। साधारण राजयोगी मरता है।स्वामी विवेकानंद मरते हैं, आदि शंकराचार्य मरते हैं, हठयोगी नहीं मरता। उसका कारण है। उसने शरीर को पूरा इंतजाम दिया है। इसके पहले कि घटना घटे, उसने शरीर के लिए तैयारी कर ली है।अब शरीर अप्राकृतिक स्थिति को झेलने के लिए तैयार है।

6-इसलिए हठयोगी बहुत सी अप्राकृतिक प्रक्रियाएं करता है। जैसे जब धूप पड़ रही होगी, तब वह कंबल ओढ़ कर बैठ जाएगा। सूफी फकीर कंबल ओढ़े रहते हैं। सूफ का मतलब होता है ऊन। और जो आदमी हमेशा ऊन ओढे रहता है उसको कहते हैं सूफी।तो अरब में,सारे सूफी फकीर. जहां कि आग बरस रही है, कंबल ही ओढ़ कर जीते हैं। आग बरस रही है और वह कंबल ओढ़े हैं। अब वे बड़ी अप्राकृतिक स्थिति खड़ी कर रहे हैं।चारों तरफ आग दिखाई पड़ती है, कहीं कोई हरियाली नहीं दिखाई पड़ती। वहां एक आदमी कंबल ओढ़े बैठा है। वह अपने शरीर को राजी कर रहा है अप्राकृतिक स्थितियों के लिए।

7-तिब्बत में एक लामा निर्वस्त्र बर्फ पर बैठा हुआ है और उसके शरीर से पसीना चू रहा है। अब यह लामा एक तैयारी कर रहा है कि गिरती हुई बर्फ में शरीर से पसीना चुआया जा सके।

ऐसी बहुत सी अप्राकृतिक तैयारियां हैं। इन तैयारियों से अगर शरीर गुजर गया हो, तो उस अप्राकृतिक घटना को झेलने में समर्थ हो जाता है। फिर तो शरीर को कोई नुकसान

नहीं पहुंचता।लेकिन साधारणत: ये तैयारियां वर्षों का काम है। और बाद में राजयोग ने तय किया कि आखिर इतनी उम्र को बचाने की जरूरत भी क्या है। कोई एक आदमी हठयोग की तैयारी करे तो बीस और तीस साल से कम में तो कुछ भी नहीं हो सकता। तीस साल कम से कम समझना चाहिए।

8-अब एक आदमी अगर पंद्रह साल की उम्र में काम शुरू करे, तो पचास साल की उम्र तक तो वह तैयारी कर पाएगा। तो राजयोग ने यह तय किया कि शरीर की इतनी फिक्र की जरूरत भी क्या है। अगर स्थिति उपलब्ध हो गई और शरीर छूट गया, तो क्या करना है बचा कर।

इसलिए वे तैयारियां छोड़ दी गईं। इसलिए आदि शंकराचार्य तैंतीस साल में मर गए। उसका कारण यह है कि इतनी बड़ी घटना घटी, उसके लिए शरीर तो तैयार नहीं था। और फिर जिसको बचाने के लिए पैंतीस साल मेहनत करनी पड़े, अगर उससे पैंतीस साल और बच सकते हों तो हिसाब बहुत ज्यादा फायदे का न रहा। उसका कुछ अर्थ नहीं है।

7-तो अगर आदि शंकराचार्य से कोई कहे कि आप हठयोग करके बच सकते थे सत्तर साल तक, तो वे कहेंगे कि बच सकता था, लेकिन चालीस साल मुझे उसमें मेहनत लगानी पड़ती। वह मेहनत अकारण है। मैं तैंतीस साल में मरना पसंद करता हूं। इसमें कोई हर्जा नहीं है।

इसलिए धीरे -धीरे हठयोग पिछड़ गया। उसके पिछड़ जाने का कारण उसकी इतनी लंबी प्रक्रियाएं थीं। लेकिन अगर विज्ञान का पूरा उपयोग किया जाए, तो इतना समय खोने की जरूरत नहीं है। और समय बचाया जा सकता है। लेकिन वैज्ञानिक हठयोग के पैदा होने में

अभी समय है।आदि शंकराचार्य को यह कहा जा सकता है कि माना कि आपके लिए कोई उपयोग नहीं है, लेकिन अगर आप पैंतीस साल और बच जाते हैं, तो और बहुत लोगों के लिए उपयोग है। इसी रास्ते से हठयोग वापस आ सकता है, अन्यथा नहीं आ सकता।

8-शरीर का जो ऐडजेस्टमेंट टूट जाता है। वह करीब -करीब ऐसे ही मामला है जैसे कि कार का इंजन एक बार खोल लो, फिर दोबारा भी कस जाता है, लेकिन कार की लाइफ तो कम हो ही जाती है। इसलिए कार खरीदने वाला पहले पूछता है कि इंजन खोला तो नहीं गया। क्योंकि इंजन बिलकुल ठीक जुड़ गया हो, फिर भी लाइफ तो कम हो ही जाती है । क्योंकि वह ठीक वही नहीं हो सकता, जो था। उसमें किंचित अंतर भी फर्क ले आता है।फिर हमारे शरीर

में कुछ तत्व ऐसे हैं, जो बहुत शीघ्रता से मर जाते हैं, कुछ तत्व ऐसे हैं, जो मरने में देर लेते हैं। कुछ तत्व तो आदमी मर जाता है उसके बाद भी नहीं मरते।कब्र में गड़ाए हुए आदमी के बालों का, नाखून का बढ़ना जारी रहता है। वह आदमी मर गया, लेकिन नाखून और बाल मरने में इतनी जल्दी राजी नहीं होते। वे अपना काम जारी रखते हैं। उनको मरने में बहुत वक्त लगता है।

9-तो शरीर जब मरता है, तो उसमें मरने में कई तलों पर मृत्यु घटित होती है। असल में शरीर में बहुत तरह के संस्थान आटोमेटिक हैं जिनके लिए आपकी आत्मा की मौजूदगी भी जरूरी

नहीं है। तो हमारे शरीर में दो तरह के इंतजाम हैं। एक हमारी चेतना के हटते से ही खतम हो जाएगा। और दूसरा हमारी चेतना के हटने पर भी थोड़ी देर काम करता रहेगा।और हमारे

भीतर कुछ तत्व हैं जो छह सेकेंड में मर जाते हैं।जैसे एक आदमी को हार्ट -अटैक होता है। हृदय के दौरे से जो आदमी मरता है, अगर छह सेकेंड के भीतर उसको सहायता पहुंचाई जा सके, तो वह बच भी सकता है। क्योंकि असल में हार्ट अटैक कोई मृत्यु नहीं है, सिर्फ स्ट्रक्चरल भूल है।लेकिन छह सेकेंड से अगर ज्यादा देर लग जाए, तो कुछ तत्व तब तक खतम हो जाएंगे, उनको फिर दोबारा जिंदा करना मुश्किल हो जाएगा।जैसे हमारे मस्तिष्क के

जितने भी डेलीकेट हिस्से हैं, वे बहुत जल्दी मरते हैं, एकदम मर जाते हैं।

10-तो अगर तेजस शरीर बहुत देर बाहर रह जाए, तो इस शरीर की सुरक्षा करनी बहुत जरूरी है, नहीं तो इसमें से कुछ हिस्से मर जाएंगे। हालांकि तुम अंदाज नहीं लगा सकते कि कितनी देर तेजस शरीर बाहर रहा, क्योंकि दोनों का टाइम स्केल अलग है। यानी जैसे कि सूक्ष्म शरीर बाहर निकल जाए, तो लगेगा कि वह सालों बाहर रहा और जब लौट कर आएगा , तब पता चलेगा कि घड़ी में सिर्फ एक सेकेंड ही बीता है। उदाहरण के लिए एक आदमी

को झपकी लग जाए और झपकी में वह एक सपना देखे। सपने में उसकी शादी हो रही है, बारात निकल रही है और बच्चे हो गए और बच्चों की शादी हो रही है। और नींद खुले और वह कहे, ''मैंने इतना लंबा सपना देखा कि मेरी शादी हो गई, फिर मेरे बच्चे हो गए, फिर बच्चों की शादी हो रही थी''। और हम उससे कहें कि अभी तो केवल एक मिनट हुआ तुम्हें झपकी लिये। एक मिनट में इतना लंबा सपना कैसे हो सकता है?

11-टाइम स्केल अलग है। एक मिनट में इतना लंबा सपना हो सकता है। क्योंकि सपने का जो समय -माप है, वह हमारे जागरण के समय -माप से बहुत भिन्न है, बहुत त्वरित है, बहुत स्पीडी है। तो तेजस शरीर एक सेकेंड को बाहर रहे तो तुम्हें लग सकता है कि तुम सालों बाहर घूमे। इससे अंदाज नहीं लगता कि तुम कितनी देर बाहर रहे।इस शरीर को सुरक्षित रखना

बहुत जरूरी है। इसकी सुरक्षा की बड़ी कठिनाइयां हैं। और इसको अगर सुरक्षित रखने का इंतजाम पूरा हो, तो बहुत देर तक बाहर रहा जा सकता है।

12-उदाहरण के लिए आदि शंकराचार्य के जीवन की एक घटना है जो समझने जैसी है। वे हमारे टाइम -स्केल से ,छह महीने बाहर रहे,। तेजस शरीर के टाइम -स्केल से कितनी देर

बाहर रहे, उसकी कोई बात करनी बेकार है।मंडन मिश्र से उनका विवाद हुआ और मंडन हार गए। लेकिन उनकी पत्नी ने एक बड़ा तर्क दिया कि अभी सिर्फ आधे मंडन मिश्र हारे, आधी तो मैं अभी जिंदा हूं, अर्धांगिनी। तो जब तक मैं भी न हार जाऊं, तब तक पूरे मंडन मिश्र हार गए, ऐसा आप नहीं कह सकेंगे।''

13-आदि शंकराचार्य भी मुसीबत में पड़ गए। बात तो ठीक ही थी, हालांकि बेमानी थी। लेकिन भारती मिश्र भी विवाद के योग्य थी। बहुत कम विदुषी स्त्रियां उस हैसियत की हुईं। और आदिशंकरा ने सोचा कि चलो यह भी ठीक है, एक आनंद रहेगा। और जब मंडन ही हार गए, तो भारती कितनी देर टिकेगी। लेकिन भूल हो गई।आदि शंकरा ने सोचा कि ब्रह्म आदि

की बात होगी, लेकिन उस भारती ने ब्रह्म की कोई बात नहीं की, क्योंकि वह तो देख ही चुकी थी कि मंडन मिश्र दिक्कत में पड़ गए। ब्रह्म और माया नहीं चलेगी! उसने आदिशंकरा से कहा कि मुझे कामशास्त्र के संबंध में कुछ बताइए।आदिशंकरा मुश्किल में पड़ गए और कहा कि 'मैं निष्णात ब्रह्मचारी हूं।कृपा करके कामशास्त्र के संबंध में मुझसे कुछ मत पूछिये।'

14-पर उसने कहा कि अगर कामशास्त्र के संबंध में आप कुछ भी नहीं जानते, तो और क्या जान सकते हैं। जब इतना—सा पता नहीं, तो ब्रह्म, माया वगैरह क्या जानते होंगे! और जिसको आप माया कह रहे हैं, जिस जगत को, उसकी उत्पत्ति जहां से है, उसके संबंध में कुछ बात करनी पड़ेगी। मैं तो उसी पर विवाद करूंगी। तो आदिशंकरा ने कहा, छह महीने की मुहलत मुझे दे दो। मैं सीखकर आऊं। क्योंकि इसे मैंने कभी सीखा नहीं, यह मैंने कभी जाना नहीं, यह राज मुझे पता नहीं।

15-तो आदिशंकरा को अपना शरीर छोड्कर दूसरे शरीर में प्रवेश करना पड़ा। इस शरीर से भी वे जान सकते थे, लेकिन इस शरीर की पूरी धारा अंतर्प्रवाहित हो चुकी थी। उसका बाहर लौटाना मुश्किल था। इस शरीर की धारा को बाहर प्रवाहित करना छह महीने से भी लंबा काम था। वह आसान घटना न थी, वह बहुत मुश्किल मामला था। एक दफा बाहर से भीतर ले जाना बहुत आसान है, भीतर से बाहर लाना बहुत ही मुश्किल है। कंकड़ छोड्कर हीरे उठा लेना बहुत आसान है, लेकिन हीरे छोड्कर कंकड़ उठाना बहुत मुश्किल है।वे मुश्किल में

पड गए। इस शरीर से कुछ भी न हो सकता था। तो उन्होंने मित्रों को भेजा कि पता लगाओ कि कोई शरीर तत्काल मरा हो, तो मैं उसमें प्रवेश कर जाऊं। लेकिन जब तक मैं लौटू तब तक मेरे शरीर को सुरक्षित रखना। छह महीने तक वे एक राजा के शरीर में प्रवेश करके जीए और वापस लौटे।

16-यह छह महीने आदिशंकरा का शरीर सुरक्षित रखा गया। यह सुरक्षा बड़ी कठिन है। इसमें जरा सी भूल चूक हुई कि वापस लौटना मुश्किल हो जाए। इसको सुरक्षित रखने में बड़े डिवोटेड आदमियों ने काम किया, जिनके समर्पण का हम अंदाज भी नहीं कर सकते कि

उन्होंने क्या किया होगा।जैसे तिब्बत का साधक प्रयोग करता है, कि बैठा है सर्दी में और पसीना चू रहा है। यह सिर्फ संकल्प से होता है। संकल्प से वह इस तथ्य को झुठलाता है कि सर्दी पड़ रही है।वह कहता है, झूठ है यह बात कि बर्फ पड़ रही है। मैं तो मानता हूं कि सूरज निकला है और धूप पड़ रही है। और इस मान्यता को वह गहरे से गहरे संकल्प में प्रवेश कराता है। एक घड़ी आती है कि उसकी श्वास -श्वास, उसका रोआं -रोआं, उसके प्राण का कण -कण जानता है कि धूप पड़ रही है। फिर पसीना कैसे नहीं निकलेगा? पसीना निकलना शुरू हो जाता है। परिस्थिति दबा दी गई,मनस्थिति प्रभावी हो गई।

17-सब योग एक अर्थ में परिस्थिति को दबा कर मनस्थिति को ऊपर लाने का है। और सब सांसारिकता एक अर्थ में परिस्थिति के नीचे मनस्थिति को दबाकर जीने का नाम है।

तो आदिशंकरा के जिन मित्रों को उस शरीर को सुरक्षित रखना पड़ा , यह बात कभी ठीक से लिखी भी नहीं गई कि उन्होंने किया क्या।छह महीने तक एक मित्रों का वर्ग इस शरीर को घेरे ही बैठा रहा। वह घेराअखंड था।उसमें एक निश्चित संख्या पूरे वक्त मौजूद रहनी चाहिए। उसमें से कोई बीच में बदलता था, लेकिन चौबीस घंटे सजग। एक विशेष स्थिति में वह वातावरण उस गुफा का रहना चाहिए। और निश्चित तरंगें वहां पहुंचती रहनी चाहिए।

18-ये सारे लोग ..करीब सात लोग—वहां बैठकर इस भाव में होने चाहिए कि हम श्वास नहीं ले रहे हैं, श्वास शंकर का शरीर ले रहा है। हम नहीं जी रहे हैं, शंकर का शरीर जी रहा है। और इन सबों के शरीर की विद्युत धाराएं शंकर के शरीर में दौड़ती रहनी चाहिए। इन सारे सातों व्यक्तियों के हाथ शंकर के सातों चक्रों पर होने चाहिए। उनके सारे शरीर की विद्युत धाराएं सातों चक्रों में उडेली जानी चाहिए, तो यह शरीर छह महीने तक......।और यह सतत

होगा। इसमें एक क्षण की भी चूक और धारा टूट जाएगी। और धारा टूटने पर शरीर की उष्णता खो जाएगी। वह शरीर उष्ण रहना चाहिए जैसा जीवित आदमी का है। यह विशेष तापमान उसका वही बना रहना चाहिए जो जीवित आदमी का है। उसमें तापमान का जरा—सा भी फर्क न पड़ जाए।

19-और यह तापमान किसी आग से ,किसी और तरकीब से नहीं पैदा किया जा सकता है। सिवाय इसके कि सात लोग अपनी पूरी जीवन -ऊर्जा को /अपनी पूरी मैग्नेटिक फोर्स को उसके सातों चक्रों से भीतर डालते रहें। और उसके शरीर को कभी पता न चल पाए कि वह आदमी जो मौजूद था अब नहीं है। क्योंकि उस आदमी से जो मिलता था वह ये सात आदमी

दे रहे हैं।इसके सातों चक्र से सातों शरीरों की ऊर्जा इसको मिलती रहती है। वह ट्रांसमीशन सेंटर्स इसको देते रहते हैं। यह जिंदा रहता है।यदि चूक हो जाती है, तो यह मरने की तैयारी कर लेता है।

20-तो आदिशंकरा को छह महीने बचाकर रखना एक बहुत अदभुत प्रयोग था। और छह महीने निरंतर किन्हीं व्यक्तियों का सतत एक आदमी बदले, तो दूसरा तत्काल रिप्लेस हो ..सात वहां मौजूद रहने ही चाहिए। आदिशंकरा की वापसी छह महीने के बाद हुई और शंकर उत्तर दे सके। वे जो नहीं जानते थे, वह जान सके।इसे एक तरकीब से और जाना जा सकता

था, लेकिन आदिशंकरा को उस तरकीब का पता नहीं था। अगर यह घटना महावीर की जिंदगी में घटती तो महावीर दूसरे के शरीर में प्रवेश नहीं करते, महावीर अपने पिछले जन्मों की स्मृति में प्रवेश कर जाते।

21-एक दूसरा स्रोत था, लेकिन जाति -स्मरण का प्रयोग जैनों और बौद्धों में ही सीमित रहा, वह हिंदुओं तक कभी नहीं पहुंच सका। तो अगर महावीर से कोई ऐसा सवाल करता, तो महावीर किसी के शरीर में घुसने की कोशिश न करते।वे अपने ही पिछले शरीरों की याद में चले जाते। और अपने ही पिछले संबंधों को स्मरण कर लेते और जान लेते। और तब छह महीने न लगते। लेकिन आदिशंकरा के पास इसकी कोई साइंस न थी। लेकिन आदिशंकरा के पास एक और साइंस थी, जो एक दूसरा साधकों का वर्ग विकसित करता रहा था। वह साइंस थी दूसरे के शरीर में प्रवेश करने की।

22-अध्यात्म की भी बहुत सी साइंसेज हैं। और अभी तक किसी धर्म के पास सारे साइंसेज के पूरे सूत्र नहीं हैं। किसी एक धर्म ने एक विशेष प्रक्रिया को विकसित कर लिया है, वह उससे तृप्त है। किसी दूसरे धर्म ने किसी दूसरी प्रक्रिया को विकसित कर लिया है और उससे वह तृप्त है। लेकिन अब तक दुनिया में कोई भी ऐसा धर्म नहीं निर्मित हो पाया है, जिसके पास सारे धर्मों की समस्त संपदा हो। और वह तब तक नहीं हो पाएगा, जब तक हम सारे धर्मों को दुश्मन की तरह देखते हैं। ये सारे धर्म मित्र की तरह एक -दूसरे के निकट आ जाएं और ये सारे धर्म अपनी संपदा को दूसरी संपदा के लिए खोल दें और अपनी संपदा और दूसरी संपदा की मालकियत को साझीदार बना लें, तो सारे अनंत— अनंत स्रोतों से एक विज्ञान विकसित हो पाए।

23- जिन्होंने पिरामिड्स बनाए थे, उनके पास कुछ था, जो हिंदुस्तान में किसी के पास नहीं है। जिन्होंने तिब्बत की मोनास्ट्रीज में काम किया है, उनके पास कुछ था, वह हिंदुस्तान में नहीं है। जो हिंदुस्तान के पास है, वह तिब्बत के पास नहीं है। और जो इनके पास है वह उनके पास नहीं है। और सब को यह खयाल है कि अपने -अपने फ्रैगमेंट को, अपने -अपने टुकड़े को पूर्ण समझकर बैठ गए हैं। इससे बड़ी कठिनाई हो गई।अब जाति-स्मरण बहुत आसान

प्रयोग है, दूसरे के शरीर में प्रवेश बहुत कठिन प्रयोग है.. खतरों से खाली नहीं है।

24-लेकिन उसका आदिशंकरा को कोई स्मरण नहीं था। और चूंकि अपनी पूरी जिंदगी आदिशंकरा ने जैनों और बौद्धों से विवाद करने में बिताई, इसलिए उनका द्वार भी बंद था।वह दुश्मन की तरह सारी प्रक्रियाएं चलती रहीं, इसलिए कुछ दरवाजे बंद थे। उस तरफ से सूरज की किरणें आएं, तो आदिशंकरा राजी न होते। वे अपने दरवाजे से ही सूरज की किरण को

लेने को राजी होते हैं।हमें यह पता नहीं चलता, लेकिन किसी भी दरवाजे से जो किरण आती है, वह एक ही सूरज की है। लेकिन हम अपने -अपने दरवाजे के दावेदार हैं, अपने -अपने

दरवाजे पर बैठे हैं।अब यह हमें दिखाई नहीं पड़ता कि अरब में जो आदमी ऊन का कंबल ओढ़कर जो काम कर रहा है, वही तिब्बत में निर्वस्त्र होकर काम कर रहा है। उन दोनों के काम बिलकुल एक से हैं, इनमें जरा भी फर्क नहीं है ।ये दोनों प्रयोग बिलकुल उलटे हैं, लेकिन बिलकुल एक से हैं।काम वही हो रहा है, सूत्र वही हैं।

जो मीडियम होते हैं उनमें कैसे प्रवेश होता है?-

06 FACTS;-

1-मीडियम की जो प्रक्रिया है, वह रिसेप्टिव प्रक्रिया है।इसमें मीडियम सिर्फ रिसेप्टिव होगा और किसी को अपने भीतर बुला लेगा, आमंत्रित कर लेगा। और मीडियम जिनको बुलायेगा, आमतौर से अशरीरी आत्माएं होंगी, सशरीरी आत्माएं मुश्किल से होंगी।

और आत्माएं बिना शरीर के हमारे चारों तरफ घूम रही हैं।अभी हम जहां बैठे हुए हैं वहां इतने ही लोग नहीं बैठे हुए हैं, और लोग भी बैठे हुए हैं। मगर उनके पास शरीर नहीं है, इसलिए हम उनसे बिलकुल निश्चित हैं। हमें उनकी मौजूदगी से कोई मतलब नहीं होता।वह वैसे ही

मौजूद हैं जैसे एक कम्प्यूटर रखा हुआ है, और हम इंटरनेट आँन कर दें।

2-जब हमने कम्प्यूटर आँन नहीं किया था, तो आप समझते हैं,इंटरनेट से निकलने वाली धाराएं यहां से नहीं गुजर रही थीं? तब भी गुजर रही थीं, लेकिन हमें कोई पता नहीं था। क्योंकि हमारे और उनके बीच कोई माध्यम नहीं था जो जोड़ बना दे।कम्प्यूटर एक माध्यम का काम कर रहा है। जो गुजर रहा है यहां से, उसे वह हमसे संबंधित कर देगा।जो व्यक्ति मृत

आत्माओं के लिए माध्यम का काम कर सकते हैं , वे भी कम्प्यूटर का ही काम कर रहे हैं। एक तरह की टधूनिंग का काम कर रहे हैं। उनकी मौजूदगी के कारण जो आत्माएं हमारे चारों तरफ सदा मौजूद हैं, उनमें से कोई आत्मा प्रवेश कर सकती है।

3-लेकिन ये अशरीरी आत्माएं हैं। और अशरीरी आत्मा सदा ही शरीर में प्रवेश करने को आतुर होती है।उसके कारण होते हैं। बड़ा कारण तो यह होता है कि अशरीरी आत्मा -जिसको हम प्रेत कहें— की इच्छाएं तो वही होती हैं जो शरीरधारी की होती हैं, लेकिन शरीर उसके पास नहीं होता। और अशरीरधारी की कोई भी वासना बिना शरीर के पूरी नहीं

होती।अगर वह किसी शरीर के पास आए, तो आर -पार निकल जाता है। वह कहीं रुकता नहीं। हमारा शरीर उसके शरीर को व्यवधान नहीं बनता ।उसको तो शरीर चाहिए । वह तो शरीर मिलने की आकांक्षा से भरा हुआ है । कभी कोई भयभीत व्यक्ति अगर अपने भीतर सिकुड़ जाए, तो वह प्रवेश कर जाता है।

4-भय में आदमी सिकुड़ जाता है।आपका अपना शरीर जितना आपको घेरना चाहिए उतना आप भय में नहीं घेरते, सिकुड़ कर छोटे हो जाते हैं। शरीर में बहुत सी जगह खाली रह जाती है ..वैक्यूम बन जाता है। उस वैक्यूम में, भय 'में वह घुस जाता है। लोग समझते हैं कि भय की वजह से भूत पैदा हो जाते हैं, वह पैदा नहीं हो जाते। लोग समझते हैं कि भय ही भूत है, वह भी ठीक बात नहीं है। भूत का अपना अस्तित्व है। भय में सिर्फ उसे प्रकट होने की सुविधा मिल जाती है। तो भय में तो कोई भी आदमी मीडियम बन सकता है, लेकिन उस मीडियम में प्रेतात्मा ही प्रवेश कर रही है, इसलिए परेशानी ही खड़ी होगी।

5-स्वेच्छा से किसी ने अपने भीतर की जगह खाली की है और निमंत्रण दिया है तो मीडियम की कला कुल इतनी ही है कि आप अपने भीतर की जगह खाली कर सकें और आसपास कोई आत्मा हो, तो उसको निमंत्रण दे सकें कि तुम आ जाओ। लेकिन चूंकि यह जान -बूझ कर स्वेच्छा से किया जाता है, इसलिए कोई भय नहीं है और चूंकि इसके आने का रास्ता पता है और इसके वापस भेजने के रास्ते का भी पता है। लेकिन यह रिसेप्टीविटी से होगा। और सिर्फ साधारण अशरीरी आत्माओं पर ही हो पाएगा।

6-अगर शरीरधारी आत्मा को बुलाना हो, तो खतरे बढ़ जाते हैं। क्योंकि अगर किसी शरीरधारी आत्मा को किसी माध्यम पर बुलाया जाये , तो उस आदमी का शरीर वहां मूर्च्छित होकर गिर जाएगा। बहुत बार जब लोग मूर्च्छित होकर गिरते हैं, तो हम समझते हैं वह

साधारण मूर्च्छा है।कई बार वह साधारण मूर्च्छा नहीं होती और उस व्यक्ति की आत्मा कहीं बुला ली गई होती है। और इसलिए उस वक्त उसका इलाज करना खतरे से खाली नहीं है। उस वक्त उसके साथ कुछ न किया जाये, यही हितकर है। मगर अभी तक साइंस उसके लिए साफ पता नहीं कर पाई कि कब मूर्च्छा साधारण मूर्च्छा है और कब उसकी मूर्च्छा आत्मा का बाहर चला जाना है। घटना वही है, लेकिन बहुत दूसरे प्रकार की है। यहां हम बुलाते हैं, वहां हम जाते हैं।

....SHIVOHAM....