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होश और बेहोशी में जीवात्मा की चेतना की कौन— सी स्थिति होती है?


मूर्च्छा और जागृति, इन दोनों को समझने के लिए पहली बात तो यह समझ लेनी जरूरी है कि ये दोनों विपरीत अवस्थाएं नहीं हैं। साधारणत: दोनों विपरीत अवस्थाएं समझी जाती हैं। असल में जीवन को हम द्वैत में तोड़कर ही देखते हैं। अंधकार और प्रकाश को बांट लेते हैं और सोचते हैं, अंधकार और प्रकाश दो चीजें हैं। जैसे ही हमने यह समझा कि अंधकार और प्रकाश दो चीजें हैं, बुनियादी भूल हो गई। अब इस बुनियादी मूल के बाद जो भी चिंतन खड़ा होगा, वह भ्रांत होगा, वह ठीक कभी भी नहीं हो सकेगा। अंधकार और प्रकाश एक ही चीज की तारतम्यताएं हैं। अंधकार और प्रकाश एक ही चीज के रूप हैं, अंधकार और प्रकाश एक ही चीज की सीढ़ियां हैं।

जिसे हम अंधकार कहते हैं, उचित होगा कहें कि वह थोड़ा कम प्रकाश है। ऐसा प्रकाश, जिसे हमारी आंखें नहीं पकड़ पाती हैं। जिस प्रकाश को हमारी आंखें नहीं पकड़ पाती हैं, वह हमें अंधकार प्रतीत होता है। प्रकाश को हम कहें कि वह थोड़ा कम अंधकार है। ऐसा अंहग्कार, जिसे हमारी आंखें पकड़ पाती हैं। अंधकार और प्रकाश ऐसी दो विपरीत चीजें नहीं हैं जो अलग— अलग हैं। अंधकार और प्रकाश एक ही चीज की डिग्रीज हैं, मात्राएं हैं।

और जो अंधकार और प्रकाश के संबंध में सच है, वही जीवन के समस्त द्वंद्वों में सच है। मूर्च्छा और चेतना भी ऐसी ही बात है। मूर्च्छा को समझ लें अंधकार, चेतना को समझ लें प्रकाश। असल में मूर्च्छित से मूर्च्छित वस्तु भी बिलकुल मूर्च्छित नहीं है। पत्थर भी शइrच्छत नहीं है, वह भी चेतना की ही एक अवस्था है, लेकिन इतनी कम कि हमारी पकड़ के बाहर है।

एक आदमी सो रहा है, एक आदमी जाग रहा है। जागना और सोना दो चीजें नहीं हैं। एक ही आदमी सोने और जागने के बीच में यात्रा कर रहा है। जिसको हम सोना कहते हैं, वह भी बिलकुल सोना नहीं है। क्योंकि सोते वक्त हम जोर से बोलते हैं, राम! पांच सौ आदमी सोए हुए हैं तो चार सौ निन्यानबे आदमी नहीं सुनते हैं, जिसका नाम राम है, वह आंख खोलकर कहता है कि कौन मेरी नींद खराब कर रहा है, कौन मुझे बुला रहा है! यह आदमी अगर बिलकुल सोया था, तो इसे सुनाई नहीं पड़ना चाहिए था कि इसका नाम बुलाया गया। और यह आदमी अगर बिलकुल सोया था तो इसे यह पहचान में नहीं आना चाहिए था कि मेरा नाम राम है। इसकी यह नींद भी जागने की ही एक कम अवस्था थी। जागना थोड़ा फीका, मद्धिम हो गया था। जागना थोड़ा धुंधला हो गया था।

फिर एक आदमी के घर में आग लगी है। वह रास्ते से भागा चला जा रहा है। आप उसको नमस्कार करते हैं। वह आपको देखता है, फिर भी नहीं देखता। वह आपको सुनता है, फिर भी नहीं सुनता। दूसरे दिन आप उससे पूछते हैं कि कल मैंने नमस्कार किया, आपने उत्तर नहीं दिया। वह आदमी कहता है, मेरे मकान में आग लगी थी। मुझे उस वक्त सिवाय मकान के और कुछ भी नहीं दिखाई पड़ रहा था। मेरे मकान में आग लगी थी, मुझे सिवाय मकान के आसपास, मकान में आग लगी है, इस आवाज के सिवाय कोई आवाज सुनाई नहीं पड़ रही थी। आपने नमस्कार किया होगा जरूर। आप मिले होंगे जरूर। लेकिन न मैं देख पाया, न मैं सुन पाया। यह आदमी जागा हुआ था या सोया हुआ था? यह आदमी सब अर्थों में जागा हुआ था। फिर भी इस आदमी के लिए करीब —करीब सोया हुआ था। उस आदमी से भी ज्यादा सोया हुआ था, जिसने नींद में सुन लिया था कि राम, यह उस आदमी से भी ज्यादा सोया हुआ था।

सोना और जागना क्या है? पहली बात मैं यह कहना चाहता हूं कि ये दो विपरीत चीजें नहीं हैं। पदार्थ और परमात्मा दो विपरीत चीजें नहीं हैं। नींद और जागरण दो विपरीत चीजें नहीं हैं। प्रकाश और अंधकार दो विपरीत चीजें नहीं हैं। शैतान और ईश्वर दो विपरीत चीजें नहीं हैं। बुरा और भला दो विपरीत चीजें नहीं हैं। लेकिन हमारी बुद्धि हर चीज को तत्काल दो में तोड लेती है। असल में बुद्धि ने सवाल उठाया कि उसने दो में तोड़ा नहीं। बुद्धि ने सोचा कि उसने दो में तोड़ा नहीं।

सोचना और दो में तोड़ना एक ही चीज के दो नाम हैं। जैसे ही तुम सोचोगे, तुम विभाजन करोगे। सोचना विभाजन की प्रक्रिया है। तुम तत्काल दो टुकड़े में कर लोगे। और जितना सोचने वाला आदमी होगा उतना ज्यादा टुकड़े करता जाएगा। फिर टुकड़े ही टुकड़े रह जाएंगे और वह जो द होल, वह जो पूरा है, वह खो जाएगा। और उस पूरे में ही हर सवाल का जवाब है।

इसलिए बुद्धि किसी सवाल का जवाब कभी भी नहीं खोज पाती। ही, बुद्धि हर जवाब में से पच्चीस सवाल जरूर खोज लेती है। कितना ही महत्वपूर्ण जवाब दिया गया हो, बुद्धि तत्काल उसमें से पच्चीस सवाल खोज लेगी, लेकिन बुद्धि कभी भी किसी चीज का जवाब नहीं खोज पाती। उसका कारण है। क्योंकि जवाब है पूरे में और बुद्धि की अपनी मजबूरी है, क्योंकि वह बिना तोड़कर चल नहीं सकती।

ऐसा ही हम समझें कि मैं यहां बैठा हूं, मैं बोल रहा हूं? मैं यहां मौजूद हूं? आप मुझे सुन भी रहे हैं, आप मुझे देख भी रहे हैं। जिसे आप देख रहे हैं और जो बोल रहा है वह दो आदमी नहीं है। लेकिन जहां तक आपका संबंध है—देख रहे हैं आप आंख से और सुन रहे हैं आप कान से। आपने मुझे दो हिस्सों में तोड़ लिया है। अगर आप मेरे पास बैठें और आपको मेरे शरीर की गंध आ रही है तो आपने मुझे तीन हिस्सों में तोड़ लिया। फिर आप इन तीन हिस्सों को जोड़कर मेरी प्रतिमा बना रहे हैं। वह मेरी प्रतिमा नहीं है, वह आपका जोड़ है। और वह जोड़ हमेशा भ्रांत होगा, क्योंकि किन्हीं भी अंशों को जोड़कर पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। पूर्ण तो वही है जो अंशों के तोड्ने के पहले था।

तो जैसे ही हम पूछते हैं जागृति और मूर्च्छा, वैसे ही हमने तोड़ना शुरू कर दिया। मैं मानता हूं कि एक ही है। लेकिन जब मैं कहता हूं, एक ही है, तब मैं यह नहीं कह रहा हूं कि जागृति ही मूर्च्छा है, मूर्च्छा ही जागृति है। यह मैं नहीं कह रहा हूं। जब मैं कहता हूं अंधकार और प्रकाश एक ही है, तब भी मैं यह नहीं कह रहा हूं कि अंधेरा है तो आप चले जाएं तो उसी तरह चले जाएंगे जिस तरह प्रकाश में जा सकते हैं। जब मैं कह रहा हूं कि अंधेरा और प्रकाश एक है, तो मैं यह कह रहा हूं कि अस्तित्व एक ही चीज की मात्राओं का है। कम और ज्यादा का फर्क है, होने और न होने का फर्क नहीं है। कम और ज्यादा का फर्क है।

यह कौन—सी चीज है जो कम —ज्यादा होकर मूर्च्छा बन जाती है और जागृति बन जाती है? अब मुझे समझना आसान हो जाएगा। यह कौन —सी चीज है जो ज्यादा होती है तो जागृति मालूम पड़ती है, और कम हो जाती है तो मूर्च्छा हो जाती है। इस एक तत्व का नाम ही ध्यान है, अटेंशन है। जितना ध्यान प्रगाढ़ और तीव्र होता है, उतनी जागृति हो जाती है, जितना ध्यान प्रगाढ़ और तीव्र नहीं होता, उतनी मूर्च्छा हो जाती है। मूर्च्छा और जागृति ध्यान की सघनताओं के नाम हैं, डेंसिटीज आफ अटेंशन। कितनी प्रगाढ़ है ध्यान की स्थिति, उतना जागरण हो जाएगा। कितनी विरल है ध्यान की स्थिति, उतनी मूर्च्छा हो जाएगी। असल में पत्थर और हमारे बीच जो फर्क है, वह इतना ही है कि पत्थर के पास किसी भी दिशा में सघन ध्यान नहीं है। जिस दिशा में सघन ध्यान हो जाता है, उस दिशा में जागृति हो जाती है। जिस दिशा में ध्यान की सघनता कम हो जाती है, उस दिशा में मूर्च्छा हो जाती है।

जैसे कि अगर हम किरणों को, सघन करनेवाले कांच के टुकड़े में से किरणों को निकालें तो तत्काल आग पैदा हो जाती है। प्रकाश सघन हो जाए तो आग बन जाता है। आग अगर विरल हो जाए तो प्रकाश रह जाती है। एक अंगारे में आग है, क्योंकि प्रकाश बहुत सघन है। जहां भी प्रकाश सघन हो जाता है, वहां आग पैदा हो जाती है। जहां प्रकाश विरल हो जाता है, उसकी डेंसिटी कम हो जाती है, वहां आग भी प्रकाश रह जाती है। और जितनी सघनता कम होती जाती है, उतना अंधकार बढ़ता जाता है। जितनी सघनता बढ़ती जाती है, उतना प्रकाश बढ़ता जाता है। अगर हम सूरज की तरफ यात्रा करें तो प्रकाश बढ़ता जाएगा, क्योंकि सूरज से आने वाली किरणें सूरज पर बहुत सघन हैं। जैसे ही हम सूरज से दूर हटते जाएंगे, वैसे—वैसे प्रकाश कम होता जाएगा। सूरज से बहुत बड़ी दूरी पर अंधकार रह जाएगा। वह अंधकार सिर्फ प्रकाश की सघनता के कम हो जाने के कारण है। ठीक ऐसे ही मैं मूर्च्छा और जागृति को लेता हूं। ध्यान है मूल तत्व, जिसकी तरलता, जिसकी सघनता, विरलता, जिसका ठोसपन तय करता है कि आपको जाग्रत कहें या आपको सोया हुआ कहें; आपको मूर्च्छित कहें कि आपको होश में कहें।

और जब भी हम इन शब्दों का प्रयोग करेंगे, तब ध्यान में रखना कि ये सारे शब्द रिलेटिव, सापेक्ष अर्थों में प्रयुक्त होते हैं। जैसे हम जब कहते हैं कि कमरे में प्रकाश है तो उसका कुल मतलब इतना होता है कि बाहर जितना प्रकाश है उससे ज्यादा है। इतना ही मतलब होता है। अभी इस कमरे में प्रकाश है, क्योंकि बाहर अंधकार है। बाहर अगर सूरज निकला हो और तीव्र प्रकाश हो तो यह कमरा अंधेरा मालूम पड़ने लगेगा। तो जब हम कहते हैं कि कोई चीज जाग्रत है या कोई सोया है, तब भी हमारा मतलब इतना ही होता है कि किसी की तुलना में। लेकिन भाषा में बड़ी कठिनाई है। क्योंकि अगर हम बार—बार तुलना करें तो कहना बहुत मुश्किल हो जाएगा। इसलिए भाषा में हम शब्दों का प्रयोग एकोल्युट अर्थों में करते हैं, जो कि ठीक नहीं है। ठीक तो हमेशा रिलेटिविटी ही होती है। हम यहां इतने लोग बैठे हैं। एक अर्थ में हम सब जागे हुए हैं, लेकिन यह बात बहुत ठीक नहीं है। यहां जितने लोग बैठे हैं उतनी मात्राओं में लोग जागे हुए होंगे। यहां हर आदमी एक—सा जागा हुआ नहीं है। इसलिए हो सकता है कि तुम्हारा पड़ोसी तुम्हारे अर्थों में सोया हुआ हो और तुम्हारा दूसरा पड़ोसी तुम्हारी तुलना में जागा हुआ हो।

जागरण और मूर्च्छा के बीच जो तत्व यात्रा करता है, वह ध्यान है। इसलिााऊ हम ध्यान को समझ लें तो इन दोनों को भी हम समझ जाएंगे। ध्यान का मतलब है किसी चीज का बोध, अवेयरनेस, किसी चीज का पता चलना, किसी चीज का काशसनेस में प्रतिबिंब बनना। और यह प्रतिपल ऐसा ही है हमारा, कि ऐसा भी नहीं है कि चौबीस घंटे अगर कोई आदमी जागा हुआ है तो वह एक—सा जागा हुआ रहता है, ऐसा भी नहीं है।

आंख की पुतली के संबंध में थोड़ा समझना उचित होगा। जब तुम बाहर रोशनी में जाते हो तो आंख की पुतली सिकुड़ जाती है, छोटी हो जाती है, क्योंकि उतनी ज्यादा रोशनी भीतर जाने की कोई जरूरत नहीं है। कम रोशनी से भी दिखाई पड़ सकेगा, तो आंख का फोकस छोटा हो जाता है। जब तुम प्रकाश से अंधेरे में आते हो तो आंख फैल जाती है, उसका फोकस बड़ा हो जाता है, क्योंकि अब अंधेरे में ज्यादा भीतर जायेगा तो ही तुम देख सकोगे। जैसे कैमरे में हम पूरे वक्त फोकस बदलते हैं कि कितना लेंस खुला रहे, ठीक ऐसे ही आंख पूरे वक्त प्रकाश और रोशनी की तारतम्यताओं में अपने को बदलती है।

जैसे हमारी आंख प्रतिपल फ्लेक्सिबल है, लोचपूर्ण है, ऐसे ही हमारा ध्यान भी प्रतिपल लोचपूर्ण है। तुम रास्ते पर चले जा रहे हो। अगर यह रास्ता परिचित है, तो तुम्हारा ध्यान विरल होगा। अगर यह रास्ता अपरिचित है, तो तुम्हारा ध्यान सघन होगा। अगर यह रास्ता रोज—रोज वाला है, जिस पर तुम रोज आते हो और जाते हो, तो तुम्हें जागने की कोई जरूरत नहीं, तुम मूर्च्छित ही गुजरोगे। अगर यह रास्ता बिलकुल अपरिचित है जिस पर तुम कभी भी नहीं गुजरे हो, तो तुम जागे हुए गुजरोगे। क्योंकि अपरिचित होने की वजह से तुम्हारे ज्यादा ध्यान की मांग होगी।

इसलिए जो आदमी जितनी सुरक्षा में जीएगा, उतना मूर्च्छित जीएगा। क्योंकि सुरक्षा में सब परिचित है। जो आदमी जितनी असुरक्षा में, इनसिक्योरिटी में जीएगा, उतना जागा हुआ जीएगा। इसलिए साधारणत: ऐसा समझें कि खतरे के क्षणों को छोड्कर हम कभी जागते नहीं हैं, हम सोए ही होते हैं। अगर मैं तुम्हारी छाती पर एक छुरा रख दूं अभी, तो तुम जाग जाओगे बहुत और अर्थों में, जैसे कि तुम अभी जागे हुए नहीं हो। क्योंकि तुम्हारी छाती पर छुरा रखा जाएगा तो इतनी इमरजेंसी, इतने संकट की अवस्था पैदा हो जाएगी, इतनी आपात्कालीन घड़ी होगी कि उस वक्त सोने को अफोर्ड नहीं किया जा सकता। नहीं, उस वक्त तुम सोए—सोए नहीं रह सकते, क्योंकि इतने खतरे में अगर सोए रहे तो मरने का डर हो जाएगा। इतने खतरे में तुम्हारा सारा प्राण सघन हो जाएगा, तुम्हारा सारा ध्यान सघन हो जाएगा। एक छुरा ही रह जाएगा तुम्हारे ध्यान में और तुम छुरे के प्रति पूरी तरह जाग जाओगे। हो सकता है यह एक ही सेकेंड को हो। खतरे के क्षणों में ही हमारा ध्यान साधारणत: सघन होता है। खतरा निकल जाता है, हम फिर वापस अपनी जगह पर लौट आते हैं, फिर सो जाते हैं।

शायद इसीलिए खतरे का आकर्षण भी है। खतरा हम उठाना चाहते हैं। एक जुआरी जुआ खेलता है। शायद ही हमें खयाल हो कि जुआरी के जुआ खेलने में कौन—सा रस है। खतरे का रस है। दाव के क्षण में वह जाग जाता है, जितना वह कभी जागा हुआ नहीं होता है। एक जुआरी ने लाख रुपये दांव पर रख दिये हैं, पांसे फेंकने को है, यह क्षण बड़े संकट का है। और इस क्षण में लाख इस तरफ या लाख उस तरफ हो जाने वाले हैं। इस क्षण में सोया हुआ नहीं रहा जा सकता है। इस क्षण में जागना ही पड़ेगा। एक क्षण को, दांव का जो क्षण है, वह ध्यान को प्रगाढ़ कर जाएगा। अब तुम हैरान होओगे कि मेरी समझ में जुआरी भी ध्यान खोज रहा है। उसे पता हो या न हो, यह दूसरी बात है।

एक आदमी विएवाह करके ले आया है। फिर जिस पत्नी से वह रोज—रोज परिचित हो जाता है, उसके प्रति सो जाता है। बंधा हुआ रास्ता है। उसी पर वह रोज—रोज आता—जाता है। पड़ोस की स्त्री एकदम आकर्षक मालूम होती है। कुछ और बात नहीं है। पड़ोस की स्त्री ध्यान को जगाती है। अपरिचित है। उसको देखते वक्त ध्यान को सघन होना पड़ता है। आंख का फोकस फौरन बदल जाता है। असल में पत्नी को देखने के लिए आंख में किसी फोकस की जरूरत ही नहीं होती, न पति को देखने में होती है। असल में पति, पत्नी को शायद ही कोई कभी देखता हो। ऐसा हम आंख बचाकर चलते हैं कि पत्नी, पति को दिखाई न पड़ जाए। इस तरह चलते हैं, इस तरह जीते हैं। वहा कोई ध्यान देने की जरूरत नहीं रह जाती। इसलिए दूसरी स्त्री में दूसरे पुरुष का जो आकर्षण है, मेरे हिसाब से ध्यान का ही आकर्षण है। उस एक क्षण में, पुलक में, एक क्षण को चित्त जागता है और जागना पड़ता है। हम किसी को देख पाते हैं।

पुराने मकान की जगह नए मकान की दौड़ है। पुराने कपड़ों की जगह नए कपड़ों की दौड़ है। पुराने पद की जगह नए पदों की दौड़ है। यह सारी की सारी दौड़ बहुत गहरे में ध्यान के सघन होने की आकांक्षा है। और जीवन में जितना भी आनंद है वह आनंद, ध्यान जितना सघन हो, इस पर निर्भर करता है। आनंद के क्षण ध्यान की सघनता के क्षण हैं। इसलिए जिन्हें आनंद पाना हो, उन्हें जागना अनिवार्य है। सोए—सोए आनंद नहीं पाया जा सकता।

धर्म भी ध्यान की तलाश है और जुआ भी। और जो आदमी युद्ध के मैदान में तलवार लेकर लड़ने गया है, वह भी ध्यान की तलाश में गया है। और जो आदमी जंगल में शेर का शिकार करने चला गया है, वह भी ध्यान की तलाश में गया है। और जो आदमी गुफा में बैठकर आंख बंद करके आशा चक्र पर श्रम कर रहा है, वह भी ध्यान की तलाश में गया हुआ है। ये तलाश शुभ और अशुभ हो सकती हैं, लेकिन यह तलाश एक है। कोई तलाश वांछनीय और कोई अवांछनीय हो सकती है, लेकिन तलाश एक है। और कोई तलाश असफल हो सकती है और कोई सफल हो सकती है, लेकिन तलाश की आकांक्षा एक है।

ध्यान का अर्थ है कि मेरे भीतर जो जानने की शक्ति है, वह पूरी प्रकट हो। उसमें कोई भी हिस्सा मेरे भीतर पोर्टेट न रह जाए, बीज—रूप न रह जाए। मेरे भीतर जितनी भी क्षमता है जानने की, वह पोटेंशियल न रह जाए, एक्‍चूअल हो जाए, वास्तविक हो जाए।

तो जिस क्षण में कोई व्यक्ति पूरी तरह जागता है, उस क्षण में वह पूरी तरह होता भी है। दोनों एक साथ घटनाएं घटती हैं। जैसे एक बीज है। एक बीज में वृक्ष छिपा हुआ है, लेकिन पोटेशियली, संभावना है सिर्फ। बीज बिना उसको प्रकट किए भी मर सकता है। जरूरी नहीं कि बीज से वृक्ष पैदा हो ही। हो सकता है। यह सिर्फ एक संभावना है, यह वास्तविकता नहीं है अभी। फिर बीज वृक्ष हो जाए, यह भी बीज की ही दूसरी अवस्था है, प्रकट। ऐसा कहें कि बीज जो है वह वृक्ष की अप्रकट अवस्था है, तो गलत न होगा। ऐसा कहें कि वृक्ष जो है वह बीज की प्रगट अवस्था है, तो गलत न होगा। क्योंकि वृक्ष में वही तो प्रकट हो गया है, जो बीज में छिपा था। तो यदि हम ऐसा कहें कि निद्रा जागृति की अप्रकट अवस्था है, तो गलत न होगा। मूर्च्छा जागृति की अप्रकट अवस्था है, तो गलत न होगा। या हम ऐसा कहें कि जागृति मूर्च्छा की प्रकट अवस्था है, तो गलत न होगा।

और कौन इसमें से यात्रा कर रहा है जो बीज में भी था और वृक्ष में भी? क्योंकि एक तो कोई होना चाहिए, नहीं तो बीज और वृक्ष को जोड़ेगा कौन! बीज अगर वृक्ष बनता है तो बीच में कोई सेतु होगा, और बीच में कोई यात्रा करनेवाला होगा, जो बीज में भी था और वृक्ष में भी है। वह मध्य का कौन है जो दोनों के बीच यात्रा कर रहा है? जो बीज में छिपा था और वृक्ष में प्रकट हुआ है, वह कौन है? वह न तो बीज हो सकता है, न वृक्ष हो सकता है।

इसको थोड़ा समझ लेना। वह जो तीसरी ताकत है जो बीज में छिपी थी और वृक्ष में प्रकट है, अगर वह बीज ही होती, तो कभी वृक्ष नहीं हो पाती। और अगर वृक्ष ही होती तो फिर बीज में कैसे होती? वह दोनों में थी। वह जो प्राण —शक्ति है, वह तीसरी है। तो जागना और मूर्च्छा तो दो स्थितियां हैं। इनके बीच जो यात्रा कर रहा है तत्व, उसका नाम ध्यान है। वह प्राण—शक्ति तीसरी है। तो तुम कितने ध्यानपूर्ण हो, उतने ही जागे हुए हो। और तुम कितने ध्यान—रिक्त हो, उतने ही सोए हुए हो।

पत्थर सोया हुआ परमात्मा है। पूरी तरह से सोया हुआ। बिलकुल बीज है। कहीं से भी अंकुर नहीं टूट रहा है। आदमी वृक्ष नहीं है, टूटा हुआ बीज है। थोड़ा—सा अंकुर टूट गया है। वृक्ष भी नहीं हो गया है, पत्थर भी नहीं है। दोनों के बीच में कहीं यात्रा पर है। आदमी यात्रा पर है, या और भी ठीक होगा कहना कि आदमी यात्रा है या आदमी यात्रा का एक पड़ाव है। बीज वृक्ष होने की यात्रा पर निकला है। बीच में वह अंकुर भी होता है। बस, आदमी अंकुर है, अंकुरित बीज है। जिसको हम जागना कह रहे हैं, वह भी अंकुरित ही है अभी। अत्यंत धूमिल है।

जिसे हम जागना कह रहे हैं, वह भी बहुत धूमिल है, वह भी बहुत सोया—सोया है, स्लीपी। करीब—करीब हम जागते हुए जैसा जीते हैं, सड़क पर चलते हैं, दफ्तर में काम करते हैं, वह सोमनाबुलिज्म से ज्यादा भिन्न बात नहीं है। जैसे कोई आदमी रात सपने में उठ आता है, चौके में जाकर पानी पी आता है, या अपनी टेबुल पर बैठकर एक पत्र लिख देता है और वापस सो जाता है। और सुबह कहता है, मुझे पता नहीं, मैं तो उठा नहीं। उसने रात सपने में ही यह सब किया। उसकी आंख खुली थी, वह रास्ता ठीक से गया, दरवाजा ठीक से खोला, उसने पत्र भी लिखा है। लेकिन फिर भी वह सोया हुआ था, सारा हिस्सा सोया हुआ था। कोई एक जरा—सा कोना जाग गया होगा। वह इतना छोटा कोना था कि उसकी स्मृति भी पूरे मन को पता नहीं चल पाई। इसलिए सुबह वह आदमी कहता है कि मुझे पता नहीं है।

हमारा जिसको हम जागना कहते हैं वह भी करीब—करीब ऐसा ही नींद में जाग कर काम करने वालों जैसा है। अगर मैं तुमसे पूछूं कि एक जनवरी उन्नीस सौ पचास में तुमने क्या किया था, तो तुम कुछ भी न कह सकोगे। तुम कहोगे, एक जनवरी उन्नीस सौ पचास हुई तो जरूर थी, कुछ किया भी था। लेकिन क्या किया था, कुछ भी पता नहीं। लेकिन तुम हैरान होओगे, अगर तुम्हें हिप्नोटाइज किया जा सके और तुम्हें अगर बेहोश किया जा सके और फिर तुमसे पूछा जाए कि एक जनवरी उन्नीस सौ पचास को तुमने क्या किया, तो तुम सब बता दोगे, सब वापस दोहरा दोगे। तुम्हारे मन के किसी एक कोने ने तो संग्रह कर लिया, लेकिन तुमको भी पूरी तरह से पता नहीं है। तुम्हारे एक हिस्से ने तो रेकार्ड कर लिया, लेकिन तुम्हें भी खुद पता नहीं है पूरी तरह से। वह रेकार्ड हो गया और रख गया है। इसी तरह हमारे पिछले जन्मों की स्मृतियां भी रखी हुई हैं। हमें पूरी तरह से उनका भी पता नहीं है। हमारा कोई और हिस्सा पिछले जन्म में जागा रहा था, उस हिस्से ने काम कर लिया था। वह सो गया है, अब एक दूसरा कोना जाग रहा है। उसको कुछ पता नहीं है कि दृस्रा कोना जाग कर काम बहुत कर चुका है। एक अंकुर फूट चुका था बीज में पिछले जन्म में, फिर वह मर गया। अब दूसरा अंकुर फूट गया है। उसे कुछ पता नहीं कि इसमें पहले भी एक चेष्टा हो चुकी है। उसे कुछ पता नहीं कि अनंत चेष्टाएं हो चुकीं। और अगर पिछले जन्मों की स्मृतियों में जाओगे तो बहुत हैरान हो जाओगे।

पिछले जन्मों की स्मृतियां सिर्फ मनुष्य—जन्मों की स्मृतियां नहीं हैं। उनमें जाना तो बहुत आसान है, बहुत कठिन नहीं है। लेकिन मनुष्यों के कई जन्मों के पहले के जन्म पशुओं के भी थे। उनमें जाना जरा कठिन है, क्योंकि वे और भी गहन तल में छिप गए हैं। और पशुओं के पहले बहुत—से जन्म वृक्षों के भी थे। उनमें जाना और भी मुश्किल है, क्योंकि वे और भी गहन तल में छिप गए हैं। और वृक्षों के पहले बहुत—से जन्म पत्थरों के और खनिजों के भी थे। वे और भी गहरे छिप गए हैं। उनमें जाना और भी मुश्किल है।

अब तक जाति—स्मरण के जो भी प्रयोग हैं, वे ज्यादा से ज्यादा पशुओं तक जा सके। बुद्ध या महावीर ने भी जो प्रयोग किए, वे पशुओं से आगे नहीं जा सके। वृक्ष होने की स्मृति अभी जगायी जाने को है। और खनिज होने की स्मृति तो और दूर पर है, लेकिन वह सब संगृहीत है। लेकिन उसका संग्रह जरूर किसी तंद्रा की अवस्था में हुआ है, अन्यथा हमारे पूरे मन को पता होता।

हमें जो बातें याद रह जाती हैं, कभी तुमने खयाल न किया होगा कि जो बातें हमें कभी नहीं भूलतीं, क्यों नहीं भूलतीं? हो सकता है तुम पांच वर्ष की उम्र के थे और किसी ने तुम्हें एक चांटा मार दिया था, वह तुम्हें आज भी भलीभांति याद है और जिंदगी भर न भूल सकोगे। बात क्या है? जिस क्षण तुम्हें चांटा मारा गया, तुम्हारा अटेंशन बहुत जागा हुआ होगा। इसलिए वह बहुत गहरे तक पकड़ सका। असल में चांटा जब मारा जाएगा, तो स्वभावत: ध्यान पूरा जागा हुआ सघन होगा। इसलिए आदमी अपमान के क्षणों को कभी नहीं भूल पाता, दुख के क्षणों को कभी नहीं भूल पाता, सुख के क्षणों को कभी नहीं भूल पाता। ये सब तीव्र क्षण हैं। इन क्षणों में वह इतना होश से भरा होता है कि इनकी स्मृति उसकी पूरी चेतना में व्यापक हो जाती है। साधारण चीजों को वह भूलता चला जाता है।

यह जो ध्यान है, इसको हम कैसे समझें कि यह क्या है! अनुभव है, इसलिए थोड़ी कठिनाई तो है। अगर मैं तुम्हारे हाथ में एक आलपीन चुभाऊं, तो तुम्हारे भीतर क्या घटना घटती है? तत्काल तुम्हारे ध्यान की धाराएं उस आलपीन के बिंदु पर भागने लगती हैं। वह आलपीन का बिंदु एकदम महत्वपूर्ण हो जाता है। कहना चाहिए कि तुम्हारी सारी आत्मा उस आलपीन के बिंदु पर खड़ी हो जाती है। कहना चाहिए कि उस क्षण में तुम अपने शरीर में सिर्फ उसी बिंदु के प्रति जागे रह जाते हो जहां आलपीन चुभ रही है।

तुम्हारे भीतर कौन —सी घटना घटी? आलपीन नहीं चुभ रही थी, तब भी तुम्हारे शरीर का वह हिस्सा था। लेकिन तुम्हें पता नहीं था, तुम्हें होश नहीं था उस जगह का। तुम्हें खयाल भी नहीं था कि वैसी भी कोई जगह हाथ पर है। लेकिन अचानक एक आलपीन ने संकट पैदा कर दिया और तुम्हारे ध्यान की सारी किरणें उस बिंदु की तरफ दौड़ने लगीं जहां आलपीन चुभ रही है। तुम्हारे भीतर कौन—सी चीज दौड रही है? क्या हो रहा है तुम्हारे भीतर? क्या फर्क हो रहा है? घड़ी भर पहले इस बिंदु पर कौन —सी चीज नहीं थी और अब इस बिंदु पर कौन—सी चीज है? घड़ी भर पहले इस बिंदु पर चेतना नहीं थी, होश नहीं था। यह बिंदु है भी या नहीं, यह बराबर था। इसके होने न होने का कोई पता नहीं था। इसके होने न होने में कोई फासला न था। अचानक पता चला कि यह बिंदु भी है। और अब इसके होने और न होने में बड़ा फर्क है। अब यह है। अब इसका एक्सिस्टेंशियल, इसका अस्तित्व बोध तुम्हारे सामने खड़ा हो गया है। ध्यान जो है, वह बोध है, अवेयरनेस है। अब ध्यान के दो रूप हो सकते हैं। इसे समझ लेना जरूरी होगा। क्योंकि तुम्हारे सवाल को समझने में वह भी उपयोगी है।

ध्यान के दो रूप होते हैं। एक को जिसे हम कंसन्ट्रेशन कहें, एकाग्रता कहें। और एकाग्रता को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि जब एक बिंदु पर तुम्हारा ध्यान एकाग्र हो जाता है, तो शेष सारे बिंदुओं पर तुम सो जाते हो। अभी मैंने तुमसे कहा कि तुम्हारे हाथ में एक आलपीन चुभा दी गई है तो जब आलपीन जिस जगह पर चुभ रही है वहां तुम्हारी चेतना पहुंचेगी, तुम्हें शेष सारे शरीर का बोध भूल जाएगा। असल में बीमार आदमी सिर्फ उन्हीं अंगों में जीने लगता है जो बीमार होते हैं। बाकी उसका शरीर समाप्त हो जाता है। जिसका सिर दुख रहा है, वह सिर ही हो जाता है। बाकी उसका शरीर नहीं रह जाता। जिसका पेट दुख रहा है, वह पेट ही रह जाता है। जिसके पैर में कांटा चुभा है, उस कांटे की जगह ही उसका सब हो जाता है। यह ध्यान की एकाग्रता है।

तुमने अपनी सारी चेतना को एक बिंदु पर अटका दिया। स्वभावत: जब सारी चेतना एक बिंदु पर अटकती है और एक बिंदु की तरफ दौड़ती है, तो शेष सारे बिंदु शून्य हो जाते हैं, अंधेरे में हो जाते हैं। जैसा मैंने कहा कि एक आदमी के घर में आग लग गई है। बस, उसको अब एक ध्यान है कि आग लग गई है। बाकी की तरफ उसका सारा ध्यान समाप्त हो गया है। अब उसे और कुछ भी पता नहीं चल रहा है। सारी दुनिया की तरफ वह सो गया है। बस, एक मकान जिसमें आग लगी हुई है, वहीं उसका जागरण रह गया। तो ध्यान का एक रूप है एकाग्रता। लेकिन एकाग्रता में एक बिंदु पर तुम एकाग्र हो जाते हो और शेष अनंत बिंदुओं पर सो जाते हो। इसलिए एकाग्रता ध्यान की सघनता तो है, लेकिन साथ ही मूर्च्छा का फैलाव भी है। दोनों बातें एक साथ घट रही हैं।

ध्यान का दूसरा रूप है जागरूकता, एकाग्रता नहीं। जागरूकता, कंसन्ट्रेशन नहीं, अवेयरनेस। जागरूकता का मतलब है ऐसा ध्यान जिसका कोई बिंदु नहीं है। यह जरा समझना और थोड़ा कठिन है, क्योंकि बिंदु वाले ध्यान का हमें पता है। पैर में कांटा भी गड़ा है, सिर में दर्द भी हुआ है, मकान में आग भी लगी है, परीक्षा भी दी है, सब किया है। तो हमें पता है कि बिंदु वाला ध्यान क्या है। एकाग्रता का हम सबको पता है। लेकिन एक और ध्यान है जहां कोई बिंदु नहीं होता। क्योंकि जब तक बिंदु होगा ध्यान के लिए, तब तक शेष बिंदुओं पर मूर्च्छा होगी।

तो अगर हम समझें कि परमात्मा है, तो निश्चित ही परमात्मा जागा हुआ होगा, पूर्ण जागा हुआ होगा। लेकिन परमात्मा की पूर्ण जागृति का बिंदु क्या होगा? अगर उसकी जागृति का कोई बिंदु होगा तो शेष सबकी तरफ वह सो गया होगा। इसलिए परमात्मा की जागृति का कोई बिंदु, कोई आब्जेक्ट, कोई सेंटर नहीं हो सकता। अवेयरनेस विदाउट सेंटर। जागृति है, लेकिन कोई केंद्र नहीं है। तब जागृति अनंत हो जाती है, तब सब तरफ फैल जाती है।

यह जो सब तरफ फैल गई जागृति है, यह परम अवस्था है, ऊंची से ऊंची जो संभव है। इसलिए परमात्मा के स्वरूप की व्याख्या में जब हम सच्चिदानंद कहते हैं, तो उसमें चित शब्द का यह अर्थ है। चित का अर्थ चेतना नहीं। चित का अर्थ चेतना आमतौर से लोग समझ लेते हैं। क्योंकि चेतना तो होती ही किसी चीज की है। चेतना का मतलब ही होता है कि उसका कोई आब्जेक्ट होगा। कांशसनेस इज आलवेज स्काउट। अगर तुम कहो कि मैं चेतन हूं तो तुमसे पूछा जा सकता है, किस चीज के, किसके प्रति चेतन हो? चित का मतलब होता है, आब्जेक्टलेस कांशसनेस। किसी के प्रति नहीं, बस चेतन। इसलिए चित का अर्थ चेतना नहीं है। चित का अर्थ चैतन्य है।

फर्क समझ लेना। चेतना तो, सदा आब्जेक्ट सेंटर्ड होगी, कोई वस्तु केंद्रित होगी। और चैतन्य आत्मविकीर्ण होगा अनंत की ओर। कहीं रुकता नहीं, कहीं ठहरता नहीं, सब तरफ फैलता है। ऐसा कोई बिंदु नहीं है जहां इसके कारण मूर्च्छा पकड़नी पड़ती हो। यह परम अवस्था हुई। इसको कहें पूर्ण जागृति। इससे ठीक उलटी दूसरी अवस्था होगी जिसको कहें, पूर्ण सुषुप्ति, पूरा सोया होना। उसका मतलब यह है.. इसको भी समझ लेना जरूरी है।

एकाग्रता में एक बिंदु है, शेष बिंदुओं पर मूर्च्छा है। एक बिंदु पर जागृति है। पूर्ण जागरूकता में कोई बिंदु नहीं है जागरण का, सब तरफ जागृति है। या कहना चाहिए सिर्फ जागृति है, जस्ट अवेयरनेस, किसी चीज की नहीं है। आब्जेक्ट खो गया है पूर्ण जागरूकता में, सिर्फ सब्जेक्ट रह गया। सिर्फ जाननेवाला रह गया है और जो जाना जाता है, वह नहीं रह गया। जाननेवाला रह गया है और जानने की शक्ति अनंत में फैली रह गई है और जानने को कुछ भी शेष नहीं रहा है।

क्योंकि जहां भी कुछ जाना जाएगा, हमेशा किसी चीज की कीमत पर जाना जाएगा। अगर तुम्हें कुछ जानना है तो कुछ जानने से तुम्हें बचना पड़ेगा। ध्यान रखना, जानने की कीमत सदा अज्ञान से चुकानी पड़ती है। इसलिए आदमी जितनी चीजों को जानता जाता है उतनी बहुत—सी चीजों के प्रति उसे अज्ञानी होना पड़ता है। अब जैसे वैज्ञानिक सबसे ज्यादा जानने वाला आदमी है। लेकिन अगर वह केमिस्ट है तो उसे फिजिक्स का कोई भी पता नहीं हो सकता। अगर वह गणितज्ञ है तो उसे केमिस्ट्री का कोई पता नहीं हो सकता है। अगर गणित के संबंध में उसे बहुत जानना है तो उसे बहुत से संबंधों में न जानने को राजी होना पड़ेगा। यह चुनाव करना पड़ेगा। असल में अगर किसी चीज का इतनी बनना है तो बहुत चीजों के प्रति अज्ञानी होने के लिए हिम्मत रखनी पड़ेगी।

इसलिए महावीर और बुद्ध इन अर्थों में ज्ञानी नहीं थे। उनका ज्ञान स्पेशलाइज्‍ड नहीं है। उनका शान जो है, वे किसी चीज के एक्सपर्ट नहीं हैं। इसलिए एक तरफ हम कहते हैं कि महावीर सर्वज्ञ हैं, लेकिन साइकिल का पंक्चर जोड्ने की तरकीब भी नहीं बता सकते हैं। वह विशेषश नहीं हैं। क्योंकि जिसको साइकिल का पंक्चर जोड्ने की तरकीब बतानी हो, उसे बहुत —सी चीजों को जानने से बचना पड़ेगा। चेतना को केंद्रित होना पड़ेगा। बहुत—सी चीजें अंधेरे में छूट जाएंगी। साइंस का मतलब ही यह है कि कम से कम चीज के संबंध में ज्यादा से ज्यादा जानना। जितना ज्यादा जानना होने लगता है, उतना जानने का बिंदु कम से कम होने लगता है। आखिर में एक बिंदु ही जानने का रह जाता है, शेष सारी दिशाओं में अज्ञान भर जाता है।

इसलिए वैज्ञानिक तरह का आदमी, जो हो सकता है हाइड्रोजन बम बनाए, लेकिन बाजार में एक साधारण—सा दुकानदार उसको धोखा दे दे, इसमें कोई कठिनाई नहीं है। क्योंकि वह इतनी थोडी —सी चीज के बाबत जानता है कि बाकी का उसे कुछ पता नहीं है। बाकी के संबंध में वह बिलकुल ग्रामीण है। ग्रामीण से भी ज्यादा गया बीता है। ग्रामीण बहुत—सी बातें जानता है। वह विशेषज्ञ नहीं है। इसलिए अक्सर पुराने ढंग का आदमी बहुत—सी चीजें जानता है। नए ढंग का आदमी बहुत—सी चीजें नहीं जानता है। उसे चुनाव करना पड़ा है। एक चीज के संबंध में बहुत जानने के लिए बहुत—सी चीजों के संबंध में जानने का त्याग करना पड़ा है।