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साधना प्राकृतिक विकास है अथवा प्रकृति के विकास— क्रम से बाहर छलांग उसका अतिक्रमण है?


इसमें बहुत—सी बातें हैं। पहली बात तो यह है कि जैसे ही हम मनुष्य को जगत से तोड़ कर देखते हैं अलग, वैसे ही ये सवाल उठने शुरू हो जाते हैं। उदाहरण के लिए हम पानी को सौ डिग्री तक गरम करें, तो सौ डिग्री पर पानी छलांग लगाकर भाप बन जाता है। पानी का भाप बनना एक प्राकृतिक घटना है। पानी का गरम होना भी एक प्राकृतिक घटना है, अप्राकृतिक घटना नहीं है। पानी का गरम होना भी प्राकृतिक घटना है, पानी का छलांग लगाकर भाप बनना भी प्राकृतिक घटना है। अगर प्रकृति में यह नियम न होता कि सौ डिग्री पर पानी छलांग लगाकर भाप बन सके, तो पानी के पास कोई उपाय न था कि वह भाप बन जाए। अगर प्रकृति में यह उपाय न होता कि पानी सौ डिग्री तक गरम हो सके, तो भी पानी की कोई सामर्थ्य न थी कि वह सौ डिग्री तक गरम हो जाए। फिर भी पानी के पास अगर चेतना है, तो पानी अपने को आग से बचा सकता है। और पानी के पास अगर चेतना है, तो वह अपने को आग पर चढ़ा सकता है। और यह भी प्राकृतिक घटना है कि वह अपने को बचाना चाहे या चढ़ाना चाहे—दोनों। यानी मेरा मतलब यह हुआ कि इस जगत में अप्राकृतिक कुछ भी नहीं घट सकता। असल में जो नहीं घट सकता, उसी का नाम अप्राकृतिक है।

इस जगत में जो भी घटता है वह प्राकृतिक ही होता है। अप्राकृतिक के होने का कोई उपाय ही नहीं है। जो भी होता है वह प्राकृतिक होता है। और मनुष्य अगर आध्यात्मिक विकास कर रहा है, तो वह उसकी प्रकृति की संभावना है। अगर छलांग लगा रहा है, तो प्रकृति की संभावना है। लेकिन चुनाव भी प्रकृति की संभावना है कि वह छलांग लगाने की दिशा में चले या छलांग न लगाने की दिशा में चले। वह भी प्राकृतिक संभावना है। इसका मतलब यह हुआ कि प्रकृति में अनंत संभावनाएं हैं, मल्टी पोटेशियलिटीज हैं। असल में जब हम प्रकृति शब्द का उपयोग करते हैं, तो हमें लगता है कि एक संभावना है। उससे भूल हो जाती है।

प्रकृति है अनंत संभावनाओं का संघट। इसमें सौ डिग्री पर पानी गरम होता है, यह भी प्राकृतिक घटना है। और शून्य डिग्री के नीचे बर्फ बनती है, यह भी प्राकृतिक घटना है। इसमें सौ डिग्री पर गरम होकर भाप बनने वाली प्राकृतिक घटना का खंडन नहीं होता, शून्य डिग्री पर बर्फ बनने वाली घटना से। एक प्राकृतिक, एक अप्राकृतिक, ऐसा नहीं है; दोनों प्राकृतिक हैं। इसमें ऊपर भी प्राकृतिक है, इसमें प्रकाश भी प्राकृतिक है। इसमें नीचे उतरना भी प्राकृतिक है, इसमें ऊपर जाना भी प्राकृतिक है। इसमें अनंत संभावनाएं हैं। हम सदा एक चौराहे पर खड़े हैं, जिसके अनंत मार्ग हैं। और मजा यह है कि हम जो चुनाव करेंगे, हमारी चुनाव की क्षमता भी प्रकृति की ही दी हुई क्षमता है। लेकिन हम अगर गलत रास्ता चुनें तो प्रकृति हमें उस गलत रास्ते की पूर्णता तक पहुंचा देगी।

प्रकृति बड़ी सहयोगी है। अगर हम नरक का रास्ता चुनें, तो वह उसी को साफ करने लगेगी कि आओ। वह इनकार नहीं करेगी। अगर हमें पानी का बर्फ बनाना है, तो प्रकृति क्यों इनकार करेगी कि तुम भाप बनाओ; वह बर्फ बनाएगी। अगर आपको नरक जाना है, तो वह नरक का रास्ता साफ करने लगेगी। अगर आपको स्वर्ग जाना है, तो वह स्वर्ग का रास्ता साफ करने लगेगी। अगर आपको जीना है, तो जीने का रास्ता साफ करेगी। अगर आपको मरना है, तो मरने का रास्ता साफ करेगी।

जीना भी प्राकृतिक घटना है और मरना भी प्राकृतिक घटना है और आपकी चुनाव की क्षमता भी प्राकृतिक है। इसको अगर मल्टी डाशमेंशनल, प्रकृति का बहु आयामी होना समझ में आ जाए, तो कठिनाई नहीं रह जाएगी।

दुख भी प्राकृतिक है, सुख भी प्राकृतिक है। अंधे की तरह जीना भी प्राकृतिक है, आख खोलकर जीना भी प्राकृतिक है। जागना भी प्राकृतिक है, सोना भी प्राकृतिक है। प्रकृति में अनंत संभावनाएं हैं। और मजा यह है कि हम कोई प्रकृति से बाहर नहीं हैं, हम प्रकृति के हिस्से हैं। और चुनाव भी प्रकृति की क्षमता है। पर जितना चेतन होता जाता है व्यक्ति, उतनी चुनाव की क्षमता प्रगाढ़ होती जाती है। जितना अचेतन होता है, उतनी चुनाव की क्षमता प्रगाढ़ नहीं होती। जैसे पानी अगर धूप में रखा है और उसको भाप नहीं बनना है, ऐसा उपाय नहीं है उसके पास। वह कठिनाई में पड़ेगा। उसे बनना है कि नहीं बनना है, इसका निर्णय वह नहीं कर सकता है। अगर धूप में पड़ा है तो भाप बनेगा और अगर सर्दी में पड़ा है तो बर्फ बनेगा। यह उसे भोगना पड़ेगा। भोगने का भी उसे पता नहीं चलेगा, क्योंकि चेतना क्षीण है, या नहीं है, या सोई हुई है।

एक वृक्ष अफ्रीका का वृक्ष सैकड़ों फुट ऊपर चला जाएगा। वह धूप की तलाश कर रहा है। अफ्रीका का वृक्ष लंबा हो जाएगा। हिंदुस्तान का वृक्ष उतना लंबा नहीं होगा, क्योंकि उतने घने जंगल नहीं हैं। जब घना जंगल होता है तो वृक्ष को अपनी जिंदगी बचाने के लिए ऊंचाई—ऊंचाई—ऊंचाई खोजनी पड़ती है, ताकि दूसरे वृक्षों के पार जाकर वह सूरज की रोशनी ले सके। अगर वह नहीं खोजता ऊंचाई, तो मर जाएगा। वह उसकी जिंदगी का सवाल है।

तो वृक्ष थोड़ा—सा चुनाव कर रहा है। घना जंगल होगा, तो वृक्ष चौड़े कम होने लगेंगे, लंबे ज्यादा होने लगेंगे, कोनीकल हो जाएंगे। क्योंकि चौड़ा होना खतरनाक है, चौड़े में मर जाएंगे, इधर—उधर के वृक्षों में उलझ जाएंगी शाखाएं और सूरज तक पहुंच ही नहीं पाएंगे। अब सूरज तक पहुंचना है तो शाखाएं मत निकालो, अब तो एक ही पीड़ को लंबा करो। यह भी चुनाव है। यह भी वृक्ष चुन रहा है। इसी वृक्ष को अगर तुम ऐसे मुल्क में ले आओ जहां घने जंगल नहीं हैं, तो उसकी लंबाई कम हो जाएगी।

कुछ वृक्ष थोड़ा—बहुत सरकते भी हैं। साल में दस—पांच फीट सरक जाते हैं। उसका मतलब है, वह कुछ जड़ों को चलाते हैं पैरों की तरह। जिस तरफ उनको जाना है उस तरफ की जड़ों को मजबूत करके पकड़ लेते हैं, और जहां से छोड़ना है वहां की जड़ों को ढीला करके छोड़ देते हैं, तो थोड़ा सा सरक जाते हैं। दलदली जमीन हो तो उनको आसानी मिल जाती है। थोड़ा—सा सरकने लगते हैं।

कुछ वृक्ष और तरह की भी तैयारियां करते हैं, पक्षियों को लुभाते हैं, क्योंकि कुछ वृक्ष मांसाहारी हैं। तो पक्षियों को लुभाते हैं, फंसाते हैं और पक्षी आ जाएं, तो फौरन पत्ते बंद कर लेते हैं। और पक्षियों को लुभाने के उन्होंने बड़े इंतजाम किए हुए हैं। उनके ऊपर थालियों जैसे पत्ते होंगे। थालियों में बड़ा सुगंधित रस होगा। वह रस अपनी थालियों में भरे रहेंगे। स्वभावत: उनका रस दूर—दूर से सुगंध की वजह से पक्षियों को खींचेगा। पक्षी उस रस को पीने आकर बैठे नहीं कि चारों तरफ के पत्ते उस थाली पर बंद होकर पक्षी को दबा लेंगे। उसका खून पी जाएगा वृक्ष। अब नहीं कहा जा सकता कि यह चुनाव नहीं कर रहा है। यह चुनाव कर रहा है। यह अपनी तरफ से कुछ इंतजाम भी कर रहा है। यह अपनी तरफ से कुछ खोज भी कर रहा है।

पशु और भी ज्यादा चुनाव कर रहे हैं, भाग रहे हैं, दौड़ रहे हैं। लेकिन इन सबके चुनाव मनुष्य के चुनाव की दृष्टि से बहुत साधारण हैं।

मनुष्य के सामने और बड़े चुनाव हैं, क्योंकि उसकी चेतना और भी विकसित हो गई है। अब वह शरीर से ही नहीं चुनता है, अब वह मन से भी चुनता है। और अब वह जगत में पृथ्वी की यात्रा ही नहीं चुनता, पृथ्वी के ऊपर वर्टिकल यात्रा भी चुनता है। वह भी उसका चुनाव है। लेकिन है हाथ में सदा।

अब इस संबंध में अभी खोजबीन होनी बाकी है, लेकिन मुझे लगता है कि जिस दिन भी खोजबीन होगी, यह बात पाई जा सकेगी। कुछ वृक्ष हो सकते हैं, जो सुसाइडल हों, जो जीना न चुनें और जहां घना जंगल है, वहां भी छोटे रह जाएं और मर जाएं। अब यह खोजबीन होनी बाकी है। आदमी में तो हमें साफ दिखाई पड़ता है कि कुछ लोग सुसाइडल हैं। वे जीने को नहीं चुनते, मरने को चुनते रहते हैं। उनको जहां भी कांटा दिखाई पड़े, वह बिलकुल दीवाने की तरह काटे की तरफ जाते हैं। फूल दिखाई पड़े, तो उन्हें जंचते ही नहीं। उन्हें जहां हार दिखाई पड़े, वहा वह बिलकुल हिप्नोटाइज होकर सरकते हैं। जहां जीत दिखाई पड़े, वहा वे पच्चीस बहाने बनाते हैं। जहां विकास की संभावना हो, उसके खिलाफ वे हजार तर्क इकट्ठे कर लेते हैं। जहां पतन का सुनिश्चित विश्वास हो उनको, वहां वे बिलकुल बेधड़क बढ़े चले जाते हैं।

यह सब चुनाव है। और यह चुनाव जितना मनुष्य जागरूक होता चला जाएगा उतना ही यह चुनाव आनंद की ओर अग्रसर होने लगेगा। जितना मूर्च्छित होगा, उतना दुख की तरफ अग्रसर होता रहेगा।

तो जब मैं कहता हूं कि चुनना ही पड़ेगा। भाप बनने के उपाय हैं, लेकिन भाप की जगह तुम्हें

पहुंचना पड़ेगा। बर्फ बनने के उपाय हैं, बर्फ की जगह तुम्हें पहुंचना पड़ेगा। जिंदा रहने के उपाय हैं, लेकिन जिंदगी की व्यवस्था खोजनी पड़ेगी। मरने के उपाय हैं, मरने की व्यवस्था खोजनी पड़ेगी। चुनाव तुम्हारा है। और तुम और प्रकृति दो नहीं हो। तुम ही प्रकृति हो।

अब इसका मतलब हुआ कि प्रकृति की जो मल्टी—डायमेशनलिटी है, वह दो तरह की है। महावीर ने एक शब्द का प्रयोग किया है, वह समझने जैसा है। महावीर का एक शब्द है, अनंत अनंत—इनफिनिट इनफिनिटीज। यानी एक तो अनंत शब्द है हमारे पास। अनंत का मतलब होता है, एक दिशा में अनंत। अनंत अनंत का अर्थ होता है अनंत दिशाओं में अनंत। यानी ऐसा नहीं है कि दो दिशाओं पर ही अनंतता है, सभी दिशाओं में अनंतता है। सभी अनंतताओं में अनंतताएं हैं। तो यह जगत जो है इनफिनिट नहीं है, कहना चाहिए इनफिनिट इनफिनिटीज है।

तो यहां मैंने कहा कि एक तो अनंत दिशाएं हैं। और प्रकृति सबका मौका देती है। अनंत चुनाव हैं, उनका भी मौका देती है। और अनंत व्यक्ति हैं, जो प्रकृति के ही अनंत हिस्से हैं। और सबको अपना — अपना स्वतंत्र मौका है कि यह चुने या न चुने। और इन सबका नियोजन ऊपर से नहीं हो रहा है, इन सबका नियोजन भीतर से हो रहा है। यानी यह जो अनंतता है —कहना चाहिए, अनंत अनंतता है—यह भी इस तरह नहीं है जैसे कि एक बैल को कोई आदमी गले में रस्सी बांधकर आगे से खींच रहा हो। इस तरह नहीं है। या कोई उस बैल को पीछे से कोड़े मारकर किसी रास्ते पर धका रहा हो, इस तरह भी नहीं है। यह अनंत अनंतता इस तरह है, जैसे कोई झरना अपनी भीतरी ताकत से फूट पड़ा है और बह रहा है। न उसे कोई आगे से खींच रहा है, न उसे कोई कोड़े मार रहा है, न उसे कोई पुकार रहा है, न कोई उससे कह रहा है कि तुम जाओ। लेकिन उसमें शक्ति है, ऊर्जा है। और ऊर्जा क्या करे? ऊर्जा फूट रही है, ऊर्जा बह रही है। यह इनर एक्सपैंशन है।

अनंत आयाम, अनंत चुनाव, अनंत चुनाव करने वाले अंश और इन सबके ऊपर ऊपर से कोई नियोजन नहीं है, कोई ऊपर नियंता जैसा परमात्मा नहीं है। कोई ऊपर बैठकर मार्गदर्शन देने वाला प्रभु नहीं, कोई इंजीनियर नहीं, बल्कि भीतर की अनंत ऊर्जा ही एकमात्र आधार है, जिसके आधार पर सब फैलता जाता है।

इसमें तीन तल हैं। एक तल, जहां मूर्च्छा है। मूर्च्छा के कारण जो होता है, होता है। चुनाव नहीं के बराबर है। दूसरा तल, जहां चुनाव है —मनुष्य का तल, चेतना का तल। जहां जो भी होता है, हमारे चुनाव से होता है। हम किसी दूसरे को रिस्पासिबल नहीं ठहरा सकते। अगर मैं चोर हूं तो भी मेरा चुनाव है, अगर मैं ईमानदार हूं तो भी मेरा चुनाव है। मैं जो भी हूं, वह अंततः मेरा चुनाव है। यह मनुष्य का तल, जहां जो भी होता है, वहां चुनाव है। क्योंकि अर्द्ध मूर्च्छा है, अर्द्ध जागृति है। और इसलिए कभी—कभी हम ऐसी बातें भी चुन लेते हैं जो हम नहीं चुनना चाहते हैं।

अब यह बड़ी मजेदार घटना है न! यह वाक्य बडा उलटा है। ऐसा कहना कि कभी—कभी हम ऐसी बातें चुन लेते हैं जो हम नहीं चुनना चाहते। लेकिन हम रोज चुनते हैं। तुम क्रोध नहीं करना चाहते हो, लेकिन क्रोध करते हो। इसका मतलब क्या हुआ? इसका मतलब हुआ कि क्रोध तुम्हारे मूर्च्छित हिस्से से आ रहा है। और क्रोध के संबंध में जो विचार हैं, वह तुम्हारे जाग्रत हिस्से से आ रहे हैं। जाग्रत हिस्सा तुम्हारा कहता है, क्रोध नहीं करना है। मूर्च्छित हिस्सा क्रोध करता ही चला जा रहा है। तुम दो हिस्से में बंटे हुए हो। आधा हिस्सा नीचे की दुनिया से जुड़ा हुआ है, जहां पत्थर, पहाड़ों की दुनिया है, जहां सब मूर्च्छा है। आधा हिस्सा जागरूक हो गया है, होश से भर गया है और आगे की दुनिया से जुड़ा हुआ है, पूर्णता की, परमात्मा की दुनिया से, जहां कि सब जागा हुआ है। और आदमी बीच में है। और इसलिए आदमी एक तनाव में है।

कहना चाहिए कि आदमी एक तनाव है। तनाव ही है आदमी, खिंचाव है —इधर आधा, उधर आधा। इसलिए आदमी कोई—ठीक से हम कहें—तो प्राणी नहीं है, अर्द्ध प्राणी है। या कहें कि ठीक से उसका कोई व्यक्तित्व नहीं है, क्योंकि उसमें दोहरे व्यक्तित्व हैं। रात वह सो जाता है और प्रकृति का हिस्सा हो जाता है, सुबह जग जाता है और परमात्मा की यात्रा करने लगता है। क्रोध में होता है तो अंधा हो जाता है, गणित करता है तो बड़े होश में करता है। गणित में कभी कोई आदमी यह कहता हुआ नहीं दिखाई पड़ता है कि मैं दो —दो चार जोड़ना चाहता था, फिर भी मैंने पांच जोड़ा। ऐसा कोई आदमी गणित में कहता हुआ दिखाई नहीं पड़ता। क्या मामला है? लेकिन क्रोध में वह कहता है, मैं क्रोध नहीं करना चाहता था, फिर भी मैंने क्रोध किया। जरूर क्रोध और गणित के फासले हैं। गणित शायद उस हिस्से का हिस्सा है जहां जागरण है, और क्रोध वहा का हिस्सा है जहां निद्रा है।

इसलिए आदमी निरंतर एंग्जाइटी में है —एक चिंता, तनाव, एंग्विश—वह पूरे वक्त संतापग्रस्त है। वह जो कर रहा है, वह नहीं करना चाहता, फिर भी कर रहा है। जो करना चाहता है, वह कर नहीं पा रहा है। वह पूरे वक्त खिंचा हुआ है। वह पूरे वक्त डोल रहा है घड़ी के पेंडुलम की तरह—कभी बाएं, कभी दाएं। उसका भरोसा करने योग्य नहीं है कि तुम उसे बाएं देख गए थे, तो घड़ी भर बाद आओ तो उसे बाएं पाओ। यह कोई पक्का नहीं है, क्योंकि वह घड़ी के पेंडुलम की तरह डोल रहा है।

आगे मनुष्य के पूर्ण जागृति का जगत है, तीसरा तल। वहां भी कोई चुनाव नहीं है। मगर वहां के न चुनाव में और पहले तल के न चुनाव में फर्क है। पहले तल पर मूर्च्छा है, इसलिए चुनने वाला मौजूद नहीं है, चुनने का सवाल नहीं है। एक सोया हुआ आदमी क्या चुनेगा? सोया रहेगा। घर में आग लग जाए, तो भी वह नहीं चुन सकेगा कि बाहर जाऊं कि भीतर रहूं, जब तक जाग न जाए। मूर्च्‍छित जगत जो है, वहा चुनाव नहीं है, क्योंकि चुनाव करने वाला सोया हुआ है।

अमूर्च्छित, जाग्रत जो जगत है, जिसको मैं परमात्मा कह रहा हूं, प्रकृति का जागा हुआ रूप। पूर्ण जागा हुआ जहां जगत है, उसमें जैसे ही कोई व्यक्ति प्रवेश करता है, वहां भी चुनाव नहीं है। वहा इसलिए चुनाव नहीं है कि व्यक्ति पूरी तरह जागा हुआ है। तो जो ठीक है, वह उसे दिखाई ही पड़ता है। इसलिए चुनने का मौका नहीं होता है। चुनने का मौका तभी होता है, जब धुंधला दिखाई पड़ता हो। यानी मुझे ऐसा लगता हो कि यह करूं कि यह करूं, जब कि इदर आर मालूम पड़ता हो। जब मुझे लगता हो कि यह करूं कि यह करूं, इसका मतलब यह है कि मुझे साफ नहीं दिखाई पड़ रहा है, धुंधला दिखाई पड़ रहा है। दोनों करने योग्य भी लग रहे हैं, दोनों नहीं करने योग्य भी लग रहे हैं। इसलिए चुनाव है, इसलिए च्वाइस है।

अगर मुझे बिलकुल ठीक दिख रहा है कि यह करने योग्य है और यह नहीं करने योग्य है, तो चुनाव कहां है फिर। चुनाव खतम हो गया। फिर जो करने योग्य है करता हूं, जो नहीं करने योग्य है नहीं करता हूं। इसलिए उस तल पर कोई यह नहीं कह सकता कि मैं जो नहीं करना चाहता था, वह मैंने कर लिया, वह कोई सवाल उठता नहीं। वह यह भी नहीं कह सकता कि मैंने जो किया, उसके लिए मैं पश्चात्ताप करता हूं, क्योंकि वह भी सवाल उठता नहीं। वह यह भी नहीं कह सकता कि मैंने

भूल की, नहीं करनी थी, यह भी सवाल उठता नहीं। पूरा जागा हुआ आदमी जो करता है, उसमें चुनाव नहीं होता है। वह वही करता है, जो उसे दिखाई पड़ता है, करने योग्य है। वहां करना चाहिए, ऐसा कोई भाव नहीं होता। वहां जो करने योग्य है, वह होता है।

तो न तो पूर्ण जाग्रत तल पर कोई चुनाव है, न पूर्ण मूर्च्‍छित तल पर कोई चुनाव है। चुनाव है मनुष्य के तल पर, जहां आधी मूर्च्छा है और आधा जागरण है। अब यहां तुम्हारे हाथ में निर्भर है कि तुम दोनों तरफ जा सकते हो। बीच सेतु पर, ब्रिज पर खड़े हों—वापस लौट सकते हो, आगे बढ़ सकते हो।

वापस लौटना सदा आसान मालूम पड़ता है। क्यों? क्योंकि जहां हम लौट रहे हैं, वह परिचित भूमि है। वहां से हम आए हैं, वहां डर नहीं है ज्यादा। हमें पता है कि वहा क्या है, क्या नहीं है। आगे बढ़ना हमेशा खतरनाक मालूम पड़ता है, क्योंकि जहां हम जा रहे हैं, वहां का हमें कोई भी पता नहीं है।

इसलिए आदमी शराब पीकर पीछे लौट जाता है। नशा कर लेता है, पीछे लौट जाता है। इन सबमें वह मनुष्य होना छोड़ रहा है। असल में वह यह कह रहा है कि हम यह झंझट चुनाव की छोड़ते हैं। हम तो वहां जाते हैं, जहां कोई चुनाव करना ही नहीं पड़ता। पड़े रहते हैं—नाली में पड़े हैं तो पड़े हैं, सड़क पर पड़े हैं तो पड़े हैं, गाली बक रहे हैं तो बक रहे हैं, नहीं बक रहे हैं तो नहीं बक रहे हैं। जो हो रहा है सो हो रहा है। जहां हमें नहीं चुनना पड़ता। यह चुनाव का तनाव और बोझ हमारे सिर पर जहां नहीं रह जाता है, हम वहां जाते हैं। इसलिए सब नशे आदमी को सेतु से वापस लौटा लेते हैं कि आ जाओ वापस, वहीं ठीक थे।

अगर आगे जाना है तो जागृति बढ़ानी पड़ेगी। क्योंकि जैसे —जैसे आगे बढ़ते हो सेतु पर, वैसे —वैसे ज्यादा जाग्रत होओगे तो ही आगे बढ़ सकते हो। आगे बढ़ने का एक ही मतलब है, और जागो, और जागो, और जागो।

यह भी चुनाव है और तुम्हारे हाथ में है और प्रत्येक के हाथ में है कि क्या चुनते हो। और किसी को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते हो। क्योंकि कोई ऊपर बैठा नहीं है जिससे तुम कह सको कि तुमने गलत चुनाव करवा दिया। वहां कोई है नहीं। आकाश खाली है। वहां कोई देवी—देवता, कोई ईश्वर बैठा हुआ नहीं है जिसको तुम किसी दिन अदालत में खड़ा कर सको कि हम तो ठीक रास्ते पर जा रहे थे, तुमने जरा भटका दिया। कि उससे तुम कह सकोगे कि अगर तुम्हीं कृपा कर देते तो सब ठीक हो जाता। वहां ऐसा कोई मिलेगा नहीं कभी।

इसलिए उसका कोई उपाय ही नहीं है। व्यक्ति अल्टीमेटली रिस्पासिबल है। अंततः हम ही जिम्मेवार हैं —बुरा होगा तो जिम्मेवार, भला होगा तो जिम्मेवार। कोई नहीं है जो उत्तरदायी ठहराया जा सके कि तुम उत्तर दो, ऐसा क्यों हुआ? ऐसा कोई है नहीं।

जो आगे चले गए हैं वे जरूर चिल्ला—चिल्ला कर कहते हैं कि घबड़ा कर लौट मत जाना, क्योंकि आगे बहुत आनंद है। डर कर लौट मत आना, क्योंकि आगे बहुत आनंद है। सब चिंताएं समाप्त हो जाती हैं, सब अशांति समाप्त हो जाती है, सब दुख समाप्त हो जाता है। वह चिल्ला— चिल्ला कर कहते हैं। लेकिन उनकी आवाज भी हमें बड़ी अपरिचित मालूम पड़ती है। क्योंकि जिस जगह से वे बोलते हैं, वह जगह हमें अपरिचित है। हम कहते हैं कि आनंद हो ही कैसे सकेगा। जब यहां तक बढ़े, तो इतना दुख हो गया, और आगे बढे तो कहीं और दुख न हो जाए। तो फिर पीछे लौट चलें, वहां दुख नहीं था।

हर आदमी कहता है, बचपन में दुख नहीं था। अगर लौट सकता हो आदमी, फौरन लौट जाए। वह तो लौट नहीं सकता है, इसलिए रुका रह जाता है। कहता है बचपन में दुख नहीं था। अगर उसका वश चले तो वह कहे कि मां के गर्भ में बिलकुल दुख नहीं था। अगर लौट सके तो लौट जाए, लेकिन लौट नहीं सकता। फिर आगे बढ़ता जाता है। लेकिन जीवन के चुनाव में हम पीछे लौट सकते हैं। हम मूर्च्छा में लौट सकते हैं। हम तरकीबें खोज सकते हैं कि हम मूर्च्छित हो जाएं।

और वह जो दूर से आवाजें आती हैं, उन आवाजों के शब्द भी हमारी समझ में नहीं आते। क्योंकि आनंद हम जानते नहीं कि किस चीज का नाम है! कौन —सी चिड़िया है जिसको आनंद कहें! दुख हम जानते हैं, अच्छी तरह जानते हैं। और हम यह भी जानते हैं कि जितना सुख पाने की कोशिश की, उतना दुख पाया। अब यह भी डर लगता है कि आनंद पाने की कोशिश में कहीं और झंझट में न पड़ जाएं। जितना सुख पाने की कोशिश की उतना दुख पाया, तो यह आनंद हमें सुख का निकटतम मालूम पड़ता है कि कुछ सुख की ही गहन अनुभूति होगी। मगर झंझट से भी डरते हैं, क्योंकि सुख पाने की जितनी कोशिश की उतना दुख पाया, कहीं आनंद पाने की कोशिश में और भी मुसीबत न हो जाए, कहीं कोई महा दुख न मिल जाए। इसलिए सुन लेते हैं, हाथ जोड़ कर नमस्कार कर लेते हैं। उस पार के लोगों को कहते हैं, तुम भगवान हो, तुम अवतार हो, तीर्थंकर हो, बड़े अच्छे हो। हम तुम्हारी पूजा करेंगे, लेकिन हमें पीछे लौटना है।

अज्ञात का भय मालूम पड़ता है। जो थोड़े —बहुत सुख हमने जमा रखे हैं, कहीं वे भी न छूट जाएं। वे सब छूटते मालूम पड़ते हैं आगे बढ़ो तो। क्योंकि हमने उसी सेतु पर जो कि सिर्फ पार होने के लिए था, घर बना लिया है, वहीं रहने लगे हैं। वहीं हमने सब इंतजाम कर लिया है। अपना बैठकखाना जमा लिया है उसी सेतु पर। अब कोई हमें कहता है, आगे आ जाओ, तो हमें डर लगता है कि इस सब का क्या होगा! यह सब छोड़ कर जाना पड़ेगा आगे! तो हम कहते हैं, जरा वक्त आने दो, बूढ़े होने दो, मौत करीब आने दो। जब यह सब छूटने लगेगा, तब हम एकदम से आ जाएंगे, क्योंकि फिर कोई डर नहीं रहेगा।

लेकिन जितनी मौत करीब आती है, उतनी पकड़ गहरी होती है। क्योंकि जितनी मौत करीब आती है उतना डर लगता है कि छूट न जाए, तो मुट्ठी जोर से कसते हैं। इसलिए बूढ़ा आदमी निपट कृपण हो जाता है, जवान आदमी उतना कृपण नहीं होता। उसकी कृपणता बढ़ जाती है बूढ़े की सब तरफ से। वह एकदम जोर से पकड़ता है। वह कहता है, अब जाने का वक्त हुआ, कहीं सब छूट न जाए। अगर ढीला पड़ा, कहीं हाथ न छूट जाए, इसलिए जोर से पकड़ लेता है। यह जोर की पकड़ ही बूढे आदमी को कुरूप कर जाती है, अन्यथा बूढ़े आदमी के सौंदर्य का कोई मुकाबला न हो। हम सुंदर बच्चे जानते हैं, फिर उनसे कम सुंदर जवान जानते हैं, और सुंदर के तो बहुत कम हैं। कभी—कभी घटना घटती है। क्योंकि जैसे—जैसे कृपणता बढ़ती है और पकड़ बढ़ती है, वैसे —वैसे सब कुरूप होता जाता है।

खुले हाथ सुंदर हैं, बंधी हुई मुट्ठी कुरूप हो जाती है। मुक्ति सौंदर्य है और बंधन गुलामी। सोचता तो है कि छोड़ देंगे कल, जब मौका छोड़ने के लिए आ जाएगा तब छोड़ देंगे। लेकिन जो आदमी उस

मौके की प्रतीक्षा करता है कि वह जब उससे छीना जायेगा तब छोड़ेगा, वह आदमी छोड़ना ही नहीं चाहता। और जब छीना जाता है तब पीड़ा आती है, और जब छोडा जाता है तो पीड़ा नहीं आती।

अब यह जो आगे बढ़ने का मामला है, यह चुनाव ही है हमारा। और इस चुनाव के लिए गति दी जा सकती है। इसके भी नियम हैं। सेतु तैयार है। वह भी प्राकृतिक है। मेरी बात खयाल में आ रही है न? आगे जाने के लिए भी सेतु तैयार है, वह कहता है, आओ। यह भी प्रकृति है। पीछे जाने के लिए भी तैयार है। वह कहता है, आओ। यह भी प्रकृति है। प्रकृति तुम्हें हर हालत में स्वागत करने को तैयार है। उसके सब दरवाजे पर वेलकम लिखा हुआ है। यही खतरा भी है। यानी किसी दरवाजे पर यह नहीं लिखा हुआ है कि मत आओ। सब दरवाजे पर, द्वार—द्वार पर—स्वागतम।

इसलिए चुनाव तुम्हारे हाथ में है। और यह प्रकृति की अनुकंपा ही है कि किसी भी द्वार पर तुम्हें इनकार नहीं है, तुम जहां आना चाहो, आ जाओ। मगर नरक के द्वार पर भी लगा हुआ है, स्वर्ग के द्वार पर भी लगा हुआ है। चुनाव अंततः हमारा होगा कि हमने कौन—सा स्वागतम चुना। इसमें हम प्रकृति को जिम्मेवार नहीं ठहरा सकेंगे कि तुमने स्वागतम क्यों लगाया? उसने तो सभी जगह लगा दिया था, उसमें कोई सवाल ही नहीं था, उसने कहीं भी रुकावट न डाली थी।

स्वतंत्रता इस का अर्थ है, स्वागतम का। यानी प्रकृति जो है, वह परम स्वतंत्र है भीतर से। और हम उसके हिस्से हैं, हम परम स्वतंत्र हैं। हम जो करना चाहते हैं, कर रहे हैं। इस करने में सब चीजों में उसका सहारा है। लेकिन चुनाव हमारा ही है। और जब मैं कहता हूं, हमारा ही, तो भ्रांति में मत पड़ जाना। क्योंकि हम भी प्रकृति के हिस्से ही हैं।

अगर इसे परम शब्दों में कहा जाए तो मतलब यह होगा कि प्रकृति की ही अनंत संभावनाएं हैं, प्रकृति के ही अनंत द्वार हैं, प्रकृति ही अपने अनंत द्वारों पर अपने ही अनंत अंशों से खोजती है, चुनती है, भटकती है, पहुंचती है। पर यह बहुत गोल हो जाता है। यह बात जो है बहुत गोल हो जाती है, इसमें कोने नहीं रह जाते।

और कठिनाई यह है कि प्रकृति के सब रास्ते गोल हैं, सरकुलर हैं। उसका कोई भी रास्ता कोने वाला नहीं है। चौखटा कोई रास्ता नहीं है उसका। उसके सब तारे, चांद, ग्रह, उपग्रह, गोल हैं। उन चांद—तारों की परिक्रमाएं गोल हैं। प्रकृति की सारी नियम —व्यवस्था वर्तुलाकार है।

इसलिए बहुत से धार्मिक प्रतीकों में वर्तुल का प्रयोग हुआ है, सर्किल का प्रयोग हुआ है। वह गोल है। और तुम कहीं से भी चलो, कहीं से भी चलकर कहीं भी पहुंच सकते हो। चुनाव सदा तुम्हारा है।

यह अगर खयाल में आ जाए कि चुनाव सदा मेरा है, तो फिर प्रकृति के नियमों का ठीक उपयोग किया जा सकता है। जैसे कि जब मैं रास्ते पर चलता हूं तब भी मैं ग्रेविटेशन के नियम का ही उपयोग करता हूं। अगर जमीन में कशिश न हो, आकर्षण न हो, गुरुत्वाकर्षण न हो, तो तुम चल न सकोगे जमीन पर। क्योंकि जब तक तुम दूसरा पैर उठाते हो, अगर पहला पैर जमीन पर न रह जाए और अपने आप उठ जाए, तो तुम कहां टिकोगे? कहां खड़े रहोगे? जब तुम बायां पैर उठाते हो, तब दायां पैर जमीन पकड़े रखती है। इसलिए तुम बायां पैर उठा पाते हो। तुम्हारे बाएं के उठाने में जमीन की दाएं की पकड़ है। अगर दायां भी उसी वक्त उठ जाए, तो तुम गए। वह दाएं को पकड़े रखती है, तब तक तुम बायां उठा लेते हो। जब तुम बाएं को रखते हो, प्रकृति उसे संभाल लेती है, तब तुम दायां उठा लेते हो। ग्रेविटेशन काम करता है।

लेकिन एक आदमी अपनी छत पर से कूद पड़ता है, उस वक्त भी ग्रेविटेशन काम करता है। उस वक्त भी जमीन इसको खींच लेती है कि आ जाओ। जैसे वह बाएं और दाएं पैर को खींचती थी, इसको भी खींच लेती है। अब हड्डी पड़ जाती है उसके ऊपर। हड्डी टूट जाती है। हम कहते हैं, ऐसी कैसी है प्रकृति, हमारी हड्डी तोड़ दी! प्रकृति अपना जैसा काम कर रही है। वह कहती है, स्वागत है, आओ, हड्डी तुडूवाओ।

वह नियम काम कर रहा है। वही ग्रेविटेशन हड्डी तोड़ देगा। जो ग्रेविटेशन जमीन पर चलाता था, वही लंगड़ा बना देगा। लेकिन फिर भी तुम उसको जिम्मेवार न ठहरा सकोगे, उसने सिर्फ अपना काम किया है। उसका काम बिलकुल परफेक्ट है। उसमें कहीं कोई कमी नहीं है। उसमें भूल —चूक नहीं होती। चाहे तुम पैर चलाओ, चाहे तुम गर्दन तोड़ो। तुम जो भी करना चाहो, उसका नियम अपनी तरह काम करता है। उस नियम को देखकर तुम्हें चुनाव करना है कि तुम हड्डी तोड़ना चाहते हो तो छत पर से कूदो, जमीन पर चलना चाहते हो तो पैर ढंग से उठाओ। तुम्हें ध्यान रखना है कि प्रकृति के नियम के प्रतिकूल तुम न पड़ जाओ।

विज्ञान का मेरी दृष्टि में एक ही अर्थ है। विज्ञान का यह अर्थ नहीं है कि हमने प्रकृति को जीत लिया। प्रकृति को जीतने का कोई उपाय नहीं है। विज्ञान का एक ही अर्थ है कि हमने प्रकृति के अनुकूल चलने की कुछ तरकीबें खोज लीं। और कुछ मतलब नहीं है। जीत तो क्या सकेंगे! जीतेगा कौन किसको? प्रकृति के अनुकूल चलने की हमने तरकीबें खोज ली हैं।

यह प्रकृति तो बहुत दिन पहले से पंखा चलाने को तैयार थी। हम अपने पंखे को ठीक जगह पर न लगा पाए थे। मेरी बात समझे न तुम? हवाएं तो बाहर की हमेशा से बहने को तैयार थीं, लेकिन हमने दीवाल बना रखी थी। हमने कोई खिड़की न बनाई थी। जब हम खिड़की बना लेते हैं, तब क्या तुम कहोगे कि हमने हवाओं पर विजय पा ली? हमने सिर्फ हवाओं के रास्ते खुले छोड़ दिए। हवाएं तो बहने को सदा तैयार हैं। अगर हम बिजली से पंखा चला रहे हैं और प्रकाश जला रहे हैं तो हमने कोई प्रकृति पर विजय नहीं पा ली। हमने सिर्फ प्रकृति के अनुकूल होने का ढंग पा लिया। अब हम अपने बल्व को इस अनुकूलता से लगाते हैं, अपनी बटन को इस अनुकूलता से लगाते हैं, अपने तार को इस अनुकूलता से फैलाते हैं कि बिजली उनमें से बह सकती है। वह तो सदा से बहने को तैयार थी। हम सिर्फ खिड़की खोल रहे हैं।

विज्ञान है प्रकृति की, बाह्य प्रकृति की अनुकूलता के नियमों की खोज। और धर्म है प्रकृति के अंतस नियमों की अनुकूलता की खोज। जैसे बाहर के जगत में प्रकृति के नियम हैं और उनके अनुकूल अगर हम चलें तो प्रकृति सहयोगी हो जाती है, प्रतिकूल चलें तो असहयोगी हो जाती है। प्रकृति सहयोगी होती है या असहयोगी होती है, यह कहना एक अर्थ में गलत है। हम प्रकृति से सहयोग ले पाते हैं कि नहीं ले पाते हैं, यही कहना उचित है। यानी इसे ऐसा कहना चाहिए कि हम अगर इस ढंग से खड़े हों कि प्रकृति सहयोगी हो सके, तो हम प्रकृति से फायदा उठा लेते हैं। हम अगर इस ढंग से खडे हों कि प्रकृति सहयोगी न हो सके, तो हम नुकसान उठा लेते हैं।

अगर तुम छाता लेकर चलते हो और हवा तुम्हारी तरफ बह रही हो और छाता तुम आगे झुका लेते हो तो ठीक है, और छाता पीछे की तरफ तुम कंधे पर कर लेते हो तो हवा उसको उलटा डालती

है। इसमें प्रकृति को तुम कहीं दोष देने न जा सकोगे। तुमने छाता अनुकूल नहीं रखा। बस इतना ही जिम्मा तुम्हारा ही होगा। प्रकृति दोनों वक्त वही काम कर रही है। जब तुम छाता आगे रखते हो, तब भी छाते को दबा रही है, लेकिन तुम्हारी तरफ दबा रही है। जब तुम छाते को कंधे पर रख लेते हो, तब भी दबा रही है, तब वह तुमसे उलटा दबा रही है। इसमें तुम्हारे छाता रखने की बात है।

ऐसे ही प्रकृति के आतरिक नियम भी हैं। अब जो आदमी क्रोध के ढंग से जीता है, वह छाते को कंधे पर रख रहा है। अब वह झंझट में पड़ेगा। उसके भीतरी छाते सब टूट जाएंगे। और जो आदमी प्रेम को फैला रहा है, वह छाते को आगे की तरफ रख रहा है। वह प्रकृति के अनुकूल हो रहा है। तो जो आदमी प्रेम करना सीख लेता है, असल में उसने भीतरी विज्ञान का एक नियम सीखा। उसने यह सीखा कि प्रेम जो है, वह भीतरी जीवन में अनुकूलता ला देता है; और क्रोध जो है, वह भीतरी जीवन के लिए प्रतिकूलताए पैदा कर देता है। यह भी ग्रेविटेशन जैसा ही मामला है। क्रोध में टांग टूट जाती है, प्रेम में जुड जाती है। प्रकृति दोनों वक्त काम करने को तैयार है कि तुम क्या कर रहे हो। क्रोध में आदमी छत से कूद रहा है।

जो अंतस जीवन की अंतिम अनुकूलता है, वह ध्यान है। अंतिम अनुकूलता, जिसे कहें गहरी से गहरी अनुकूलता। ध्यान का मतलब यह है कि भीतर से आदमी अब जीवन के परम नियम के अनुकूल खड़ा हो गया। इसलिए लाओत्से ने उसे जो शब्द दिया है ताओ, वह प्रीतिकर है। ताओ का मतलब होता है, नियम। या वेद के ऋषियों ने जो नाम दिया है, वह ठीक है। वह है ऋत। ऋत का अर्थ होता है, दि ला। ऐसे ही धर्म का मतलब भी यही होता है, नियम। धर्म का मतलब होता है, स्वभाव, दि ला। धर्म का मतलब है कि जैसा तुम करोगे...... ऐसा नियम कि अगर वैसा तुम करोगे तो तुम सुख को उपलब्ध हो जाओगे। अधर्म का मतलब है, ऐसा करना जो कि नियम के प्रतिकूल पड़ेगा तो तुम दुख को उपलब्ध हो जाओगे।

यह आंतरिक विज्ञान की बात है। और ध्यान अंतिम अर्थों में, भीतरी अर्थों में अनुकूल होना है। अनुकूलन कहना चाहिए। सब भांति जो अनुकूल है। जो जीवन से कहीं भी लड़ता नहीं है, जो जीवन से कहीं भी विभाजित नहीं होता। जो सब भांति से जीवन के समस्त नियमों के अनुकूल हो गया है, वह परम सत्य को उपलब्ध हो जाता है, परम जीवन को, परम आनंद को, परम मुक्ति को।

और हम भी उसी नियम के नीचे खड़े हैं, लेकिन हम उसी नियम के विपरीत लड—लडकर परम बंधन को उपलब्ध हो जाते हैं। उसी नियम के विपरीत लड़ —लड़कर। यानी मामला कुछ ऐसा है कि कुछ लोग हैं जो सोने को समझ जाते हैं, तो आभूषण गढ़ लेते हैं। कुछ लोग हैं जो सोने को नहीं समझ पाते, वे जंजीरें गढ़ लेते हैं। सोने का नियम एक है। गढ़ने का नियम एक है। ढालने का नियम एक है। अब तुम आभूषण गढ़ते हो कि जंजीर गढ़ते हो, यह बिलकुल तुम पर निर्भर है।

प्रकृति के नियम के साथ जो पूरी तरह अपना अनुकूलन साध लेता है आंतरिक, वह धर्म को उपलब्ध हो जाता है। जो बाहर साध लेता है अनुकूलन पूरी तरह, वह विज्ञान को उपलब्ध हो जाता है। ये शब्द भी बड़े अच्छे हैं, समझने जैसे हैं।

धर्म से जो मिलता है, उसे हम शान कहते हैं। साइंस से जो मिलता है, उसे हम विज्ञान कहते हैं। ये दोनों शब्द बड़े अर्थपूर्ण हैं। ज्ञान में हम कोई विशेष प्रत्यय नहीं लगा रहे हैं, कोई विशेषण नहीं लगा रहे हैं। विज्ञान का मतलब है, विशेष ज्ञान। और ज्ञान का मतलब है, बस सहज ज्ञान, कोई विशेष नहीं। तो धर्म का अर्थ है, जो जीवन की आंतरिक प्रकृति है, उसके साथ सहज एक हो जाने की समझ। इसलिए सिर्फ ज्ञान है वह। जस्ट नोइंग, स्पेशलाइब्ड नालेज नहीं। विज्ञान जो है, वह स्पेशलाइब्ड नालेज है। विज्ञान है विशेष ज्ञान। क्योंकि एक—एक दिशा में हमें खोजना पड़ता है कि इसके नियम का क्या अनुकूलन होगा, उसके नियम का क्या अनुकूलन होगा। करोड़ों नियम हैं बाहर।

स्वभावत:, जितने भीतर जाएंगे, उतना एक नियम रह जाएगा। जितना बाहर जाएंगे, उतने ज्यादे नियम होते चले जाएंगे। ऐसे ही जैसे हम एक बिंदु के चारों तरफ एक बिंदु से रेखाएं खींचना शुरू करें बाहर की तरफ जाती हुई। तो बिंदु पर तो सभी रेखाएं एक होंगी, पर बिंदु से दूर होते —होते ज्यादा होने लगेंगी। जितनी दूर होती जाएंगी, उतनी ज्यादा और फासले पर होती जाएंगी। जैसे सूरज की किरणें फैल जाती हैं चारों तरफ। सूरज पर तो वे एक होती हैं, पर सूरज से दूर हटते दो होने लगती हैं, चार होने लगती हैं, हजार, करोड़, अरब होने लगती हैं, फैलती चली जाती हैं। फिर उनका फासला बड़ा होता चला जाता है।

विज्ञान जो है, वह विशेष ज्ञान है। एक —एक किरण का ज्ञान है, इसलिए स्पेशलाइब्ड है। कोई एक किरण को पकड़ लेगा विज्ञान की तो फिर उसी किरण को जान लेगा। जैसा मैं कल कह रहा था..... टु नो मोर अबाऊट लेस ऐंड लेस। तो थोड़े और थोड़े और थोड़े के संबंध में, ज्यादा, ज्यादा, जानता चला जाएगा। लेकिन तब किरण और बारीक होती जाएगी, जितना दूर जाएगा और बारीक होती जाएगी, और बारीक होती जाएगी। इसलिए विज्ञान बारीक होता जाएगा, नैरो होता जाएगा, संकीर्ण होता जाएगा। धर्म विस्तीर्ण होता जाएगा, विराट होता जाएगा, निराकार होता जाएगा। अंत में अद्वैत रह जाएगा। वहा कोई दो नहीं रह जाएंगे।

इसलिए मैं कहता हूं, विज्ञान बहुत हो सकते हैं, धर्म बहुत नहीं हो सकते। धर्म एक ही हो सकता है, क्योंकि वह ज्ञान है, विशेष ज्ञान नहीं है।

यह खयाल में आ जाए तो इसका मतलब यह हुआ कि नियम मौजूद हैं, हम मौजूद हैं, अब हम उन नियमों के साथ और अपने साथ क्या करते हैं, इसकी चुनाव की क्षमता भी मौजूद है। जो हम करेंगे उसको भोगने की क्षमता भी मौजूद है। यह स्थिति है। इसमें जो बुद्धिमान है, वह आनंद की दिशा को क्रमश: बढ़ाता चला जाता है। जिसने बुद्धिहीनता के चुनाव लेने का तय कर रखा है, वह आनंद की क्षमता को निरंतर कम करता चला जाता है। और ऊपर कोई जिम्मेवार नहीं है। सारा दायित्व मनुष्य का है।

इसलिए साधना पर मेरा जोर है। और इसलिए तुमसे कहता हूं निरंतर कि लगो, छलांग लो, नियम पक्के हो गए हैं। तुम बिलकुल जंपिंग बोर्ड पर खड़े हो, लेकिन वहीं खड़े हो। नीचे सागर लहरा रहा है। छलांग तुम लगा सकते हो। भारी धूप है, सूरज तप रहा है, पसीना चू रहा है, नीचे शीतल सागर लहरा रहा है। तुम छलांग लगा सकते हो। अभी तुम शीतलता में पहुंच जाओगे। जंपिंग बोर्ड पर खड़े हो। तुम जरा छलांग लो कि बोर्ड भी तुमको छलांग देने में सहयोग देगा। उसमें स्थिंग जड़े हैं। वे तुमको फेंक देंगे उछाल कर।

लेकिन तुम खड़े हो। तो धूप में पसीना बह रहा है। जंपिंग बोर्ड नीचे रो रहा है। उसके स्टिंग रो रहे हैं कि तुम जल्दी छलांग लो, तो वे तुम्हारा साथ दें। लेकिन तुम नहीं ले रहे हो तो जंपिंग बोर्ड शात है। नीचे शीतल सागर है। वह देख रहा है कि पसीना चू रहा है तुम्हारा।

यह सब स्थिति है। इसमें तुम्हें निर्णायक रूप से चुनाव करना पड़े। तुम्हें तय करना पड़े। और मैं मानता हूं कि तुम्हें रुकना है तो रुको, हर्जा नहीं है। लेकिन यह भी चुनाव करके रुको कि मैं रुकता हूं। नहीं शीतलता में मैं आना चाहता हूं। मुझे धूप चाहिए, मुझे पसीना चाहिए। मैं नहीं कूदना चाहता हूं मैं यहीं रुकूंगा। यह तुम चुनाव करके रुको। तो मैं मानता हूं कि तो भी तुम्हारा विकास हुआ। तुमने एक निर्णय तो लिया।

लेकिन हमारी अजीब हालत है। हम कहते हैं, नहीं, कूदना तो है सागर में, जाना तो है शीतलता में। लेकिन क्या करें, पसीना बह रहा है, धूप में खड़े हैं, कूद नहीं सकते अभी। कूदना तो चाहते हैं, छलांग तो लेनी है, लेकिन जरा रुके, इतनी जल्दी कैसे कर सकते हैं। कल करेंगे, परसों करेंगे। तब तुम्हारा विकास नहीं होता, धीरे — धीरे तुम जड़ हो जाते हो इसी जगह में। इस पसीने के भी आदी हो जाते हो, इस धूप के भी आदी हो जाते हो और इस बकवास के भी आदी हो जाते हो कि कूदना तो जरूर है, लेकिन कल कूदेंगे। कल भी तुम यही कहोगे कि कूदना तो जरूर है, कल कूदेंगे। फिर तुम इसके आदी हो जाओगे। फिर तुम यही कहते रहोगे और प्रकृति के सब नियम प्रतीक्षा करेंगे। सूरज धूप देता रहेगा, कहता है स्वागत है तुम्हारा। धूप लेनी है मजे से लो। हम पसीना गिराते रहेंगे। सागर बुलाता रहेगा कि मौज तुम्हारी, आना हो तो आ जाओ, शीतलता तैयार है। जंपिंग बोर्ड कहता रहेगा, हम उछालने को तैयार हैं, लेकिन तुम चुनाव तो करो, उछलो। बस ऐसी स्थिति है।

मैं मानता हूं कि नुकसान इससे ज्यादा नहीं है कि तुम दुख झेल रहे हो। नुकसान इससे ज्यादा है कि तुम दुख निर्णयपूर्वक नहीं झेल रहे हो। निर्णयपूर्वक झेलो—डिसीसिवली—यह भी तुम्हारा डिसीजन होना चाहिए। अगर मुझे चोरी करनी है तो मैं डिसीसिवली चोर होकर करूंगा। मैं कहूंगा कि मुझे चोर ही होना है। और मैं सब साधुओं को कह दूंगा कि अपनी बकवास बंद रखो। तुम्हारी बात मेरे किसी काम की नहीं है। मेरे किसी मतलब की नहीं हैं तुम्हारी बातें। तुम्हें साधु होना है, तुम साधु होओ। मैंने चोर होने का निर्णय किया है।

तो ध्यान रहे, जो साधु बिना निर्णय के साधु हो गया है, उसके मुकाबले जो चोर निर्णयपूर्वक चोर है, वह श्रेष्ठतर जीवन—स्थिति को उपलब्ध हो जाएगा। क्योंकि निर्णय उसकी कांशसनेस को बढ़ाता है, डिसीजन उसके व्यक्तित्व को वजन देता है, डिसीजन उसकी रिस्पासिबिलिटी को बढ़ाता है। जब वह निर्णय लेता है तो दायित्व बनता है। जब वह निर्णय लेता है तो वह स्वयं निर्णायक होने की वजह से, स्वयं का निर्णय और चुनाव होने की वजह से, संकल्प पैदा होता है। और जब संकल्प पैदा होता है तो चेतना जगती है, सोई हुई नहीं रह सकती।

जब तुम निर्णय लोगे तो मूर्च्छा टूटेगी। क्योंकि निर्णय मूर्च्छित के साथ जुड़ नहीं सकता। जब तुम निर्णय न लोगे, ड्रिफ्ट होते रहोगे, ऐसे ही बहते रहोगे इधर—उधर कि जहां ले जाएं धक्के समाज के—बाप एक स्कूल में भेज दे, तो वहां पढ़ना है। मां एक दफ्तर में नौकरी करवा दे, तो वहां नौकरी करनी है। पत्नी शीर्षासन लगाने को कह दे, तो शीर्षासन लगाना है। बस, फिर बच्चे तुमको घेर लेंगे तुम घिरते चले जाओगे। पूरी तरह चारों तरफ धक्के हैं, वह तुम खाते रहना और तुम इनडिसीसिव तो तुम्हारी जिंदगी में मूर्च्छा ही मूर्च्छा घनी हो जाएगी। निर्णय लेना, गलत के लिए ही सही, तो कोई हर्जा नहीं है।

मेरी दृष्टि में एक ही गलती है, निर्णय न लेना। और मेरी दृष्टि में एक ही शुभ है, निर्णायक होना। तो तुम निर्णय लेना। चोर होने का लेना हो, तो भी हर्जा नहीं है, मगर लेना पूरे मन से। तो तुम बहुत जल्दी चोर न रह जाओगे। क्योंकि जो पूरे मन से निर्णय ले सकता है, वह इतनी चेतना को उपलब्ध हो जाता है कि चोरी नहीं कर सकता। वह इतनी समझ को उपलब्ध हो जाता है कि चोरी उसे नामसझी मालूम होने लगती है।

लेकिन हम अगर साधु भी होते हैं तो वह भी धक्का ही है। किसी की पत्नी मर गई है, वह साधु हो गया है, यह भी धक्का है। किसी का पति गुजर गया है, वह साध्वी हो गई है, यह भी धक्का है। किसी का दिवाला निकल गया है, वह भी साधु हो गया है। किसी का बाप साधु हो रहा है और अब बेटे के लिए कोई उपाय नहीं है, तो उसने उसको भी दीक्षा दे दी।

इसका कोई अर्थ नहीं है, इसमें कोई प्रयोजन नहीं है। निर्णय होना चाहिए। और जो आदमी प्रतिपल निर्णय लेकर जी रहा है, चेतना उसकी प्रतिपल बढ़ती रहेगी। और छोटी—छोटी चीजों में निर्णय लेना और अपने निर्णय पर रुकना सीखना। बहुत छोटे—से निर्णय में।

एक छोटी—सी बात, फिर आखिरी बात करें। गुरजिएफ एक छोटी—सी प्रक्रिया करवाता था। बड़ी छोटी —सी प्रक्रिया। लेकिन चेतना को बढ़ाने में बड़ी अदभुत सिद्ध होती थी। उस प्रक्रिया का नाम था स्टाप एक्सरसाइज। जैसे हम यहां इतने लोग बैठे हैं, और गुरजिएफ यहां बोलता रहेगा और बीच में एकदम से कहेगा, स्टाप। उसका मतलब यह है कि अब जो जहां जैसा है, वैसा ही रुक जाए। अगर तुम्हारी आख ऐसी थी, तो ऐसी ही रुक जाए। अगर तुम्हारा हाथ ऐसा था, तो ऐसे ही रुक जाए। अगर किसी की गर्दन ऐसी थी, तो वैसी ही रह जाए। आप यहां सब मूर्तियां हो जाएं। और वह देखता रहेगा, कोई जरा भी हिला, तो वह कहेगा तुम्हारा संकल्प बड़ा कमजोर है। इतना—सा भी तुम संकल्प नहीं साध पाते कि इतनी देर ऐसे ही रह जाओ।

एक दिन ऐसा हुआ कि वह तिफलिस में कुछ साधकों को लेकर प्रयोग कर रहा था। गांव के बाहर एक तंबू में ठहरा हुआ था। और तंबू के पास से ही एक नहर बहती थी। नहर अभी सूखी थी, उसमें पानी अभी चला नहीं था। तीन साधक नहर पार कर रहे थे। अचानक वह तंबू के भीतर से चिल्लाया, स्टाप। तो वे तीनों नहर में खडे हो गए। फिर किसी ने नहर का पानी खोल दिया। अब नहर में पानी आ रहा है, गुरजिएफ तंबू के भीतर है। नहर में जब तक पानी कमर तक था, तब तक साधकों ने हिम्मत बांधी। जब कमर के ऊपर बढ़ने लगा पानी, तो साधकों ने कहा, यह तो मौत हो गई। बोल भी नहीं सकते, क्योंकि चुप हैं, स्टाप रहना है। बोले तो स्टाप टूट जाएगा। गुरजिएफ तंबू के भीतर है, उसको कुछ पता नहीं है कि नहर खुल गई है। उसे शायद यह भी पता नहीं कि कोई नहर में भी है। अब क्या करना है! फिर भी गले तक उन्होंने हिम्मत रखी। फिर जब गले के ऊपर पानी बढ़ने लगा, तब एक ने कहा, यह तो नासमझी है। वह छलांग लगाकर बाहर हो गया। दूसरे ने अभी भी हिम्मत रखी। उसने सोचा कि शायद वह छोड़ दे स्टाप एक्सरसाइज कि खतम करो। तो उसने मुंह और नाक तक प्रतीक्षा की, फिर उसने सोचा कि अब खतरा हुआ जाता है। वह भी छलांग लगाकर बाहर हो गया। तीसरा युवक खड़ा ही रहा। पानी उसके सिर पर से बह गया।

गुरजिएफ तंबू से भागा हुआ बाहर आया, कूदा, उस आदमी को बाहर निकाला। और उस आदमी से पूछा, तेरे भीतर क्या हुआ? उसने कहा, जिसकी मुझे प्रतीक्षा थी वह हो गया। लेकिन हुआ तब जब मैं निर्णय पर अटल रहा। जब ऊपर मेरे सिर पर से पानी बहा, उस वक्त मैंने जिस चेतना को उपलब्ध कर लिया, बस वह परम है। अब मुझे कुछ और सीखना नहीं है। क्योंकि निर्णय डिसीसिव हो गया। आखिरी क्षण मौत के भी मुकाबले उसने निर्णय को कायम रखा। गुरजिएफ ने कहा, यह सब आयोजित था। नहर मैंने खुलवाई थी और देखता था कि हाथ—पैर में ही स्टाप करने को सीखे हो या कुछ और भी कर सकते हो। उन दो को फौरन भगा दिया उसने और कहा कि यहां लौटकर मत देखना, लौट कर देखना ही मत। तुम्हारा यहां क्या काम है?

संकल्प की जितनी गहरी चोट, निर्णय का जितना गहरा भाव हो, उतनी चेतना पूर्ण हो जाती है। अगर तुम पूर्ण संकल्प कर सको एक क्षण के लिए भी, तो तुम उसी क्षण पूर्ण चेतना को उपलब्ध हो जाओगे। सब तैयारी उस पूर्ण चेतना की है और उस पूर्ण संकल्प की तैयारी है।

और इसलिए मैं मानता हूं कि चुनाव है, यह अच्छा है। अगर परमात्मा लोगों को ग्गुड्डे —गुड्डियों की तरह नया रहा है —किसी को पापी बना रहा है, किसी को पुण्यात्मा बना रहा है—तो सब फिजूल हो जाता है मामला। और मामला तो फिजूल होता ही होता है, वह परमात्मा भी बड़ा नासमझ सिद्ध होता है। यह क्या पागलपन कर रहा है? अगर वही सब निर्णायक है और वही किसी को अच्छा बनाता है, किसी को बुरा, किसी को राम, किसी को रावण, तो फिर इसमें अर्थ ही क्या है, सेंस क्या है? तब तो सब नान—सेंस हो गया। सारी बात नासमझी की हो गई। इसमें कोई अर्थ ही नहीं रहा। नहीं, निर्णायक व्यक्ति है। कोई ऊपर से तुम पर थोप नहीं रहा है। भीतर से तुम्हारे निर्णय के जागने के क्षण हैं। इसलिए जो आदमी साधक है, वह चौबीस घंटे इस खोज में रहेगा कि कब मैं छोटे —मोटे भी निर्णय ले सकूं। छोटे —मोटे सही, इससे कोई सवाल नहीं है। छोटे —मोटे निर्णय, बहुत छोटे —से निर्णय की तलाश में रहना चाहिए। चौबीस घंटे सुबह से उठकर इस फिक्र में रहो कि कब मैं कोई निर्णय कर सकूं। और जब भी कोई छोटा —सा भी दिन भर मौके हैं, हर बात के मौके हैं, हर क्षण मौके हैं तुम्हें, अगर तुम प्रतिपल निर्णय का उपयोग करते रहो, तो तुम कुछ ही दिनों में पाओगे कि तुम्हारे भीतर तीर की तरह एक चेतना बढनी शुरू हो गई है। वह रोज बढ़ती जा रही है, रोज स्पीड पकड़ती जा रही है, उसमें गति आती जा रही है। और यह बहुत छोटी—छोटी चीजों से।

जिनको हमने त्याग, तप और न मालूम कहौ —कहां के नासमझी के शब्द दिए हैं, वे सब नासमझी के हैं। उनकी सार्थकता अगर कहीं थी कभी और किसी ने उनको सार्थक रूप से प्रयोग किया था, तो उनकी सार्थकता संकल्प में थी।

एक आदमी ने तय किया कि आज खाना नहीं खाएंगे। इसका जो मूल्य है, वह खाना नहीं खाने में उतना नहीं है, जितना इसके संकल्प में है। लेकिन उसने अगर मन में भी एक दफा खाना खा लिया, तो बात खतम हो गई, बेकार हो गया सब मामला। खाना नहीं खाएंगे, उसका मतलब ही यही है कि खाना नहीं ही खाएंगे, मन में भी नहीं। अगर दिन भर एक आदमी बारह घंटे भी मनपूर्वक बिना खाना खाए रह गया, तो उसने एक बड़ा संकल्प पार किया। इस खाना नहीं खाने का कोई मूल्य नहीं है, यह तो सिर्फ खूंटी है जिस पर उसने संकल्प को टांगा। लेकिन बारह घंटे के बाद इस आदमी की क्वालिटी बदल जाएगी।

और जब मैं देखता हूं कि एक आदमी वर्षों से उपवास कर रहा है, उसकी कोई क्वालिटी नहीं बदली, तो मैं जानता हूं कि वह मन में खाता रहा होगा। क्यालिटी तो बदलनी चाहिए थी। जिंदगी हो गई इसको खाना नहीं खाते, यह उपवास करता है, वह उपवास करता है, लेकिन इसके गुण में कहीं भी कोई अंतर नहीं पड़ा है। यह आदमी वही का वही है। ताला लगाकर जाता है और फिर लौटकर ताला हिला कर देखता है कि बंद है या नहीं।

एक आदमी को मैं जानता हूं। मेरे घर के सामने ही वे रहते हैं। वे उपवास करते हैं, पूजा—पाठ करते हैं, लेकिन संकल्प के ऐसे कमजोर हैं कि मैंने उन्हें कई दफा देखा है कि वे ताला लगाकर गए, दस कदम से वापस लौटे, फिर उन्होंने उसे हिलाया। तो मैंने उनसे पूछा कि आप क्या करते हैं! आप ही ताला लगा कर गए। वे कहते हैं, मुझे कभी—कभी शक हो जाता है कि पता नहीं, मैंने देखा कि नहीं, जरा और देख लें। एक दफा देखने में हर्जा क्या है। उन्होंने कहा, एक दफा लौटकर देख लेने में हर्ज क्या है। मैंने कहा, और दूसरी दफा खयाल नहीं आता कि पता नहीं मैंने एक दफा लौटकर देखा कि नहीं। उन्होंने कहा, आपको यह कैसे पता चला? आता तो है मुझे, लेकिन मैं संकोच के वश लौटता नहीं हूं। मुझे दूसरी दफे क्या, तीसरी दफे भी खयाल आता है कि मैंने देखा कि नहीं।

अब यह एक आदमी है। यह उपवास कर रहा है, यह सब कर रहा है, लेकिन इसे पता ही नहीं है कि उपवास का मतलब क्या था। उसका मतलब इतना ही था कि एक डिसीसिवनेस आ जाए, एक निर्णायक शक्ति आ जाए। आदमी निर्णय ले सके और लौटे नहीं। और जो आदमी भी ऐसा निर्णय ले सकता है, जो प्वाइंट आफ नो रिटर्न सिद्ध हो, जिससे लौटना नहीं होता, तो उस आदमी की जिंदगी में कुछ भी नहीं बचता जो सोया हुआ रह जाए, सब जाग ही जाता है।