शक्तिपात का क्या अर्थ है एक साधक का कई व्यक्तियों के माध्यम से शक्तिपात लेना उचित है या हानिप्रद है?


शक्तिपात का अर्थ है— परमात्मा की शक्ति आप में उतर गई। बाद की चर्चा में आपने कहा कि शक्तिपात और ग्रेस में फर्क है। इन दोनों बातों में विरोधाभास सा लगता है। कृपया इसे समझाएं।

दोनों में थोड़ा फर्क है, और दोनों में थोड़ी समानता भी है। असल में, दोनों के क्षेत्र एक—दूसरे पर प्रवेश कर जाते हैं। शक्तिपात परमात्मा की ही शक्ति है। असल बात तो यह है कि उसके अलावा और किसी की शक्ति ही नहीं है। लेकिन शक्तिपात में कोई व्यक्ति माध्यम की तरह काम करता है। अंततः तो वह भी परमात्मा है। लेकिन प्रारंभिक रूप से कोई व्यक्ति माध्यम की तरह काम करता है।

जैसे आकाश में बिजली कौंधी; घर में भी बिजली जल रही है; वे दोनों एक ही चीज हैं। लेकिन घर में जो बिजली जल रही है, वह एक माध्यम से प्रवेश की है घर में—नियोजित है। आदमी का हाथ उसमें साफ और सीधा है। वह भी परमात्मा की है। वर्षा में जो बिजली कौंध रही है वह भी परमात्मा की है। लेकिन इसमें बीच में आदमी भी है, उसमें बीच में आदमी नहीं है। अगर दुनिया से आदमी मिट जाए तो आकाश की बिजली तो कौंधती रहेगी, लेकिन घर की बिजली बुझ जाएगी।

शक्तिपात घर की बिजली जैसा है, जिसमें आदमी माध्यम है; और प्रसाद, ग्रेस आकाश की बिजली जैसा है, जिसमें आदमी माध्यम नहीं है।

व्यक्ति : परमात्म शक्ति का माध्यम:

तो जिस व्यक्ति को ऐसी शक्ति उपलब्ध हुई है, जो परमात्मा से किसी अर्थों में संयुक्त हुआ है, वह तुम्हारे लिए माध्यम बन सकता है; क्योंकि वह ज्यादा अच्छा वीहिकल है, तुमसे ज्यादा अच्छा वाहन है। उस शक्ति के लिए वह आदमी परिचित है, उसके रास्ते परिचित हैं, वह शक्ति उस आदमी से बहुत शीघ्रता से प्रवेश कर सकती है। तुम बिलकुल अपरिचित हो, अनगढ़ हो।

वह आदमी गढ़ा हुआ है। और उसके माध्यम से तुम में प्रवेश करे, तो एक तो वह गढ़ा हुआ वाहन है, इसलिए बड़ी सरलता है, और दूसरा वह तुम्हारे लिए बहुत संकीर्ण द्वार है जहां से तुम्हारी पात्रता के योग्य शक्ति तुम्हें मिल जाएगी। तो घर की बिजली में बैठकर तुम पढ़ सकते हो, आकाश की बिजली के नीचे बैठकर पढ़ नहीं सकते। घर की बिजली एक नियंत्रण में है, आकाश की बिजली किसी नियंत्रण में नहीं है।

तो कभी अगर किसी व्यक्ति के ऊपर आकस्मिक प्रसाद की स्थिति बन जाए, अनायास ऐसे संयोग इकट्ठे हो जाएं कि उसके ऊपर शक्तिपात हो जाए, तो बहुत संभावना है वह व्यक्ति पागल हो जाए, विक्षिप्त हो जाए, उन्मादग्रस्त हो जाए। क्योंकि वह शक्ति इतनी बड़ी हो और उसकी पात्रता सब अस्तव्यस्त हो जाए।

फिर अनजान, अपरिचित सुखद अनुभव भी दुखद हो जाते हैं। जो आदमी वर्षों तक अंधेरे में रहा हो, उसके सामने अचानक सूरज आ जाए, तो उसे प्रकाश दिखाई नहीं पड़ेगा। और भी ज्यादा अंधेरा दिखाई पड़ेगा—जितना अंधेरे में भी दिखाई नहीं पड़ता था। अंधेरे में तो वह थोड़ा देखने का आदी हो गया था; रोशनी में तो उसकी आंख ही बंद हो जाएगी।

तो कभी ऐसा हो जाता है कि ऐसी स्थितियां बन सकती हैं भीतर कि अनायास तुम पर विराट शक्ति का आगमन हो जाए। लेकिन उससे तुम्हें सांघातिक नुकसान पहुंच सकते हैं, क्योंकि तुम तो तैयार नहीं हो; तुम तो चौंककर पकड़ लिए गए हो। तो दुर्घटना हो जाए। ग्रेस भी दुर्घटना बन सकती है।

शक्ति का नियंत्रित संचार:

दूसरी जो शक्तिपात की स्थिति है, उसमें दुर्घटना की संभावना बहुत कम है—नहीं के बराबर है; क्योंकि कोई व्यक्ति माध्यम है। और संकीर्ण माध्यम से एक तो शक्ति का मार्ग बहुत संकरा हो जाता है, फिर वह व्यक्ति नियंत्रण भी कर सकता है, वह तुम तक उतना ही पहुंचने दे सकता है, जितना तुम झेल सको। लेकिन ध्यान रहे कि फिर भी वह व्यक्ति स्वयं शक्ति का मालिक नहीं है, सिर्फ वाहक है। इसलिए कोई कहता हो मैंने शक्तिपात किया, तो वह गलत कहता है।

वह ऐसे ही होगा, जैसे बल्व कहने लगे कि मैं प्रकाश दे रहा हूं। तो वह गलत कहता है। हालांकि बल्व को यह भांति हो सकती है। इतने दिन से रोज—रोज प्रकाश देता है, यह भ्रांति हो सकती है कि प्रकाश मैं दे रहा हूं। बल्व से प्रकाश प्रकट तो हो रहा है, लेकिन बल्व से प्रकाश पैदा नहीं हो रहा; वह उदगम का स्रोत नहीं है, अभिव्यक्ति का माध्यम है। तो जो कोई दावा करता हो कि मैं शक्तिपात करता हूं वह भ्रांति में पड़ गया है, वह बल्व की भ्रांति में पड़ गया है।

शक्तिपात तो सदा परमात्मा का ही है। लेकिन कोई व्यक्ति माध्यम बने तो उसको शक्तिपात कहेंगे, कोई व्यक्ति माध्यम न हो, तो यह आकस्मिक हो सकता है कभी, तो नुकसान पहुंच सकता है। लेकिन किसी व्यक्ति ने बड़ी अनंत प्रतीक्षा की हो, और किसी व्यक्ति ने अनंत धैर्य से ध्यान किया हो, तो भी प्रसाद के रूप में शक्तिपात हो जाएगा। तब कोई माध्यम भी नहीं होगा, लेकिन तब दुर्घटना नहीं होगी। क्योंकि उसकी अनंत प्रतीक्षा, उसका अनंत धैर्य, उसकी अनंत लगन, उसका अनंत संकल्प, उसमें अनंतता को झेलने की सामर्थ्य पैदा करता है। तो दुर्घटना नहीं होगी।

इसलिए दोनों तरह से घटना घटती है। लेकिन तब उसे शक्तिपात मालूम नहीं पड़ेगा, उसको प्रसाद ही मालूम पड़ेगा; क्योंकि कोई माध्यम तो नहीं है; कोई बीच में दूसरा व्यक्ति नहीं है।

अहंशून्य व्यक्ति ही माध्यम:

तो दोनों बातों में समानता है, दोनों बातों में भेद है। मैं इसी पक्ष में हूं कि जहां तक हो सके प्रसाद उपलब्ध हो, जहां तक हो सके ग्रेस उपलब्ध हो, जहां तक हो सके कोई व्यक्ति बीच में माध्यम न बने। लेकिन कई स्थितियों में यह असंभव है; कई लोगों के लिए असंभव है। तो बजाय इसके कि वे अनंत काल तक भटकते रहें, किसी व्यक्ति को माध्यम भी बनाया जा सकता है। लेकिन वही व्यक्ति माध्यम बन सकता है जो व्यक्ति न रह गया हो। तब खतरा बहुत कम हो जाता है। वही व्यक्ति माध्यम बन सकता है जिसमें अब कोई अस्मिता, कोई ईगो शेष न रह गई हो। तब खतरा न के बराबर हो जाता है। खतरा इसलिए न के बराबर हो जाता है कि ऐसा व्यक्ति माध्यम भी बन जाएगा और फिर भी गुरु नहीं बनेगा; क्योंकि गुरु बननेवाला तो अब कोई नहीं रहा।

सदगुरु वही, जो गुरु नहीं बनता:

इस फर्क को ठीक से समझ लेना। जब कोई व्यक्ति गुरु बनता है तो तुम्हारे संबंध में बनता है, और जब माध्यम बनता है तब परमात्मा के संबंध में बनता है; तुमसे कुछ लेना—देना फिर नहीं रह जाता। समझ रहे हो न मेरा फर्क? और परमात्मा के संबंध में कोई भी स्थिति बने, वहां अहंकार नहीं टिक सकता। लेकिन तुम्हारे संबंध में कोई भी स्थिति बने, तो अहंकार टिक जाएगा। तो जिसको ठीक गुरु कहें वह वही है जो गुरु नहीं बनता है। सदगुरु की परिभाषा अगर करनी हो तो यही है सदगुरु की परिभाषा कि जो गुरु नहीं बनता है। इसका मतलब हुआ कि समस्त गुरु बननेवाले लोग गुरु नहीं होने की योग्यता रखते हैं। गुरु बनने के दावे से बड़ी अयोग्यता और कोई नहीं है। यानी वही डिसकालिफिकेशन है; क्योंकि तुम्हारे संबंध में वह एक अहंकार की स्थिति ले रहा है। और खतरनाक हो जाएगा।

अगर अनायास कोई व्यक्ति शून्य हो गया है, अहंकार विलीन हो गया है, और वाहन बन सकता है—बन सकता है, कहना भी शायद गलत है; कहना चाहिए, वाहन बन गया है—तो उसके निकट भी शक्तिपात की घटना घट सकती है। लेकिन तब उसमें दुर्घटना की कोई संभावना नहीं रहती। न तो तुम्हारे व्यक्तित्व को दुर्घटना की संभावना है, और न जिस वाहन से शक्ति तुम तक आई है उसके व्यक्तित्व को दुर्घटना की संभावना है।

फिर भी मौलिक रूप से मैं ग्रेस के पक्ष में हूं। और जब इतनी शर्तें पूरी हो जाएं कि व्यक्ति न हो, अहंकार न हो, तो फिर शक्तिपात ग्रेस के करीब पहुंच गया, बहुत करीब पहुंच गया। और अगर उस व्यक्ति को कोई पता ही नहीं हो, तब फिर वह बहुत ही करीब पहुंच गया। तब उसके पास होने से घटना घट जाए। तो अब यह जो व्यक्ति है, तुम्हें व्यक्ति की तरह दिखाई पड़ रहा है, लेकिन अब यह परमात्मा के साथ एकाकार ही हो गया। कहना चाहिए, परमात्मा का फैला हुआ हाथ हो गया जो तुम्हारे करीब है। अब यह बिलकुल इंस्टूमेंटल है, साधन मात्र है। और ऐसी स्थिति में अगर यह व्यक्ति मैं की भाषा भी बोले, तो भूल हमें हो जाती है बहुत बार; क्योंकि ऐसी अवस्था में जब यह व्यक्ति मैं बोलता है, तो उसका मतलब होता है परमात्मा। लेकिन हमें बड़ी कठिनाई.. .क्योंकि हम तो......

इसलिए कृष्ण कह सकते हैं अर्जुन से—मामेक शरणं ब्रज। मेरी शरण में आ जा तू। और हजारों साल तक हम सोचेंगे कि यह आदमी कैसा रहा होगा, जो कहता है मेरी शरण में आ जा। तब तो अहंकार पक्का है।

लेकिन यह आदमी कह ही इसलिए पाया है कि यह बिलकुल नहीं है। अब यह तो किसी का फैला हुआ हाथ है, और वही बोल रहा है मेरी शरण आ जा—मुझ एक की शरण आ जा। यह शब्द बड़ा कीमती है, मामेकं! मुझ एक की शरण आ जा। 'मैं' तो एक कभी नहीं होता, ' मैं' तो अनेक है। यह किसी ऐसी जगह से बोल रहा है जहां ' मैं ' एक ही होता है। लेकिन अब यह कोई अहंकार की भाषा नहीं है।

लेकिन हम तो अहंकार की भाषा ही समझते हैं। इसलिए हम समझेंगे कि कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं मेरी शरण में आ जा। तब भूल हो जाएगी। इसलिए हमारे प्रत्येक शब्द को देखने के दो मार्ग हैं : एक हमारी तरफ से, जहां से भ्रांति सदा होगी; और एक परमात्मा की तरफ से, जहां कोई भ्रांति का सवाल नहीं है। तो कृष्ण जैसे व्यक्ति से घटना घट सकती है; और उसमें कृष्ण के व्यक्तित्व का कोई लेना—देना नहीं है।

इतने करीब आ जाना चाहिए शक्तिपात प्रसाद के कि तुम जो कहते हो कि आपकी दोनों बातों में विरोध दिखाई पड़ता है...... .दोनों घटनाएं अपनी अति पर बहुत विरुद्ध हैं, लेकिन दोनों घटनाएं अपने केंद्र पर अति निकट हैं। और मैं उसी पक्ष में हूं जहां कि प्रसाद में और शक्तिपात में किंचित फर्क करना मुश्किल हो जाए। वहीं सार्थक है बात, वहीं कीमती है।

चीन में एक संन्यासी बड़ा समारोह मना रहा है। वह अपने गुरु का जन्मदिन मना रहा है। और उस तरह का त्योहार गुरु के जन्मदिन पर ही मनाया जाता है। लेकिन लोग उससे पूछते हैं कि तुम तो कहते थे कि मेरा कोई गुरु नहीं है, तो तुम जन्मदिन किसका मना रहे हो? और तुम तो सदा कहते थे कि गुरु की कोई जरूरत ही नहीं है, तो तुम आज यह उत्सव किसका मना रहे हो? तो वह आदमी कहता है कि मुझे मुश्किल में मत डालो; अच्छा हो कि मैं चुप रहूं। लेकिन जितना वह चुप रहता है उतना लोग और पूछते हैं कि बात क्या है, तुम यह मना क्या रहे हो? क्योंकि यह दिन तो गुरु पर्व है; इस दिन तो गुरु का उत्सव ही मनाया जाता है। तो तुम्हारा कोई गुरु है क्या? तो वह आदमी कहता है, तुम नहीं मानोगे तो मुझे कहना पड़ेगा। मैं आज उस आदमी का स्मरण कर रहा हूं जिसने मेरा गुरु बनने से इनकार कर दिया था; क्योंकि अगर वह मेरा गुरु बन जाता तो मैं सदा के लिए भटक जाता। उस दिन तो मैं बहुत नाराज हुआ था, आज लेकिन उसे धन्यवाद देने का मन होता है.. .कि वह चाहता तो गुरु तत्काल बन सकता था, मैं तो खुद गया था उसको मनाने, लेकिन वह गुरु बनने को राजी नहीं हुआ था।

तो वे लोग पूछते हैं कि फिर धन्यवाद क्या दे रहे हो, जब वह गुरु बनने को राजी नहीं हुआ?

तो वह संन्यासी कहता है, तुम मुझे ज्यादा मुश्किल में मत डालो; अब इतना मैंने कह दिया, यह काफी है। क्योंकि वह आदमी गुरु तो नहीं बना था, लेकिन जो कोई गुरु नहीं कर सकता है, वह आदमी कर गया है। इसलिए ऋण दोहरा हो गया। एक तो वह आदमी गुरु भी बन जाता तो भी लेन—देन हो जाता न दोनों तरफ से! कुछ उसने भी हमें दिया था, हमने भी कुछ उसे दिया था— आदर दिया था, श्रद्धा दी थी, पैर छू लिए थे—निपटारा हो गया था, कुछ हमने भी कर लिया था। लेकिन वह आदमी गुरु भी नहीं बना, उसने आदर भी नहीं मांगा, श्रद्धा भी नहीं मांगी, तो ऋण दोहरा हो गया— बिलकुल इकतरफा हो गया, वह दे गया और हम कुछ धन्यवाद भी नहीं दे पाए; क्योंकि धन्यवाद देने का भी उसने स्थान नहीं छोड़ा था।

शुद्धतम शक्तिपात प्रसाद के निकट:

तो यहां शक्तिपात—ऐसी स्थिति में— और प्रसाद में कोई फर्क नहीं रह जाएगा। और जितना फर्क हो उतना ही शक्तिपात से बचना, और जितना फर्क कम हो उतना ही ठीक है। इसलिए मैं जोर देता हूं प्रसाद पर, ग्रेस पर। और जिस दिन शक्तिपात भी प्रसाद के करीब आ जाए— इतने करीब आ जाए कि तुम डिस्टिग्विश न कर सको, फर्क न कर सको कि दोनों में क्या फर्क है—उस दिन समझ लेना कि बात ठीक हो गई।

तुम्हारे घर की बिजली जिस दिन आकाश की बिजली की तरह स्वच्छंद, सहज और विराट शक्ति का हिस्सा हो जाए, और जिस दिन तुम्हारे घर का बल्व दावा करना छोड़ दे कि मैं हूं शक्ति का स्रोत, उस दिन तुम समझना कि अब शक्तिपात भी हो तो वह प्रसाद ही है। मेरी बात खयाल किए!

विस्फोट : दो शक्तियों का मिलन:

प्रश्न: ओशो आपने समझाया कि आप से शक्ति उठे और परमात्मा से मिल जाए या परमात्मा की शक्ति आए और आप में मिल जाए। प्रथम तो कुंडलिनी का उठना है और दूसरी बात ईश्वर की ग्रेस मिलने की है आगे आपने कहा है कि आपके भीतर सोई हुई ऊर्जा जब विराट की ऊर्जा से मिलती है तब एक्सप्लोजन विस्फोट होता है। तो एक्सप्लोजन या समाधि के लिए कुंडलिनी जागरण और ग्रेस का मिलन आवश्यक है या कुंडलिनी का सहस्रार तक विकास और ग्रेस की उपलब्धि एक बात है?

असल में, विस्फोट एक शक्ति से कभी नहीं होता, विस्फोट सदा दो शक्तियों का मिलन है। एक्सप्लोजन जो है, वह एक शक्ति से कभी नहीं होता। अगर एक शक्ति से होता होता तो कभी का हो जाता।

तुम्हारी माचिस भी रखी है, तुम्हारी माचिस की काड़ी भी रखी है, वह रखी रहे अनंत जन्मों तक— एक इंच के फासले पर, आधा इंच के फासले पर वह रखी है, रखी रहे, तो आग पैदा नहीं होगी। उस विस्फोट के लिए उन दोनों की रगड़ जरूरी है, तो आग पैदा होगी। वह छिपी है दोनों में, लेकिन किसी एक में भी अकेले पैदा होने का उपाय नहीं है। जो विस्फोट है, वह दो शक्तियों के मिलने पर पैदा हुई संभावना है।

तो व्यक्ति के भीतर जो सोई हुई है शक्ति, वह उठे और उस बिंदु तक आ जाए। सहस्रार वह बिंदु है जिसके पहले मिलन बहुत असंभव है। जैसे कि तुम्हारे दरवाजे बंद हैं और सूरज बाहर खड़ा है। रोशनी तुम्हारे दरवाजे पर आकर रुक गई है। तुम अपने घर से चलो, चलो; भीतर से बाहर की तरफ आओ, आओ, दरवाजे तक आकर भी खड़े हो जाओ, तो भी तुम्हारा सूरज की रोशनी से मिलन न हो। दरवाजा खुले और मिलन हो जाए।

सहस्रार पर प्रतीक्षारत परमात्मा:

तो जो हमारा अंतिम चरम बिंदु है कुंडलिनी का, सहस्रार, वह हमारा द्वार है, जहां ग्रेस सदा ही खड़ी हुई है, जिस द्वार पर परमात्मा निरंतर तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है। लेकिन तुम ही अपने द्वार पर नहीं हो, तुम ही अपने द्वार से बहुत भीतर कहीं और हो। तो तुम्हें अपने द्वार तक आना है, वहां मिलन हो जाएगा। और वह मिलन विस्फोट होगा।

विस्फोट इसलिए कह रहे हैं उसे कि उस मिलन में तुम तत्काल विलीन हो जाओगे, एक्सप्लोजन इसलिए है कि उस मिलन के बाद तुम बचोगे नहीं। वह जो काड़ी है वह बचेगी नहीं माचिस की उस विस्फोट के बाद। माचिस तो बचेगी, काड़ी नहीं बचेगी। काड़ी तो जलकर राख हो जाएगी, काड़ी तो निराकार में विलीन हो जाएगी। तो उस घटना में तुम चूंकि मिट जाओगे, टूट जाओगे, बिखर जाओगे, खो जाओगे, तुम बचोगे नहीं, तुम जैसे थे द्वार तक आने के पहले, वैसे तुम नहीं बचोगे। तुम्हारा सब खो जाएगा, तुम मिट जाओगे। जो द्वार पर खड़ा था वही बचेगा, तुम उसी के हिस्से हो जाओगे।

यह घटना तुमसे अकेले नहीं हो सकती। इस विस्फोट के लिए उस विराट शक्ति के पास तुम्हारा जाना जरूरी है। उस शक्ति के पास जाने के लिए, तुम्हारी शक्ति जहां सोई है वहां से उसे उठकर वहां तक जाना पड़ेगा जहां वह शक्ति तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है। तो कुंडलिनी की जो यात्रा है, वह तुम्हारे सोए हुए केंद्र से उस स्थान तक है, उस सीमांत तक, जहां तुम समाप्त होते हो, तुम्हारी जो सीमा है।

शक्तिपात का सही माध्यम:

जो व्यक्ति शक्तिपात में वाहन का काम करे, वह व्यक्ति तो तुम्हें बांधना ही न चाहेगा। अगर शक्तिपात हो रहा है, तो वह व्यक्ति तो तुम्हें बांधना न चाहेगा; क्योंकि अगर वह बांधना चाहता हो तो वह पात्र ही नहीं है कि वह वाहन बन सके। हां, लेकिन तुम बंध सकते हो। तुम बंध सकते हो, तुम उसके पैर पकड़ ले सकते हो कि मैं अब आपको न छोडूंगा, आपने मेरे ऊपर इतना उपकार किया। उस समय सजग होने की जरूरत है। उस समय बहुत सजग होने की जरूरत है कि साधक, जिस पर शक्तिपात हो, वह अपने को बंधन से बचा सके। लेकिन अगर यह खयाल हो, और अगर यह बात साफ हो कि बंधन मात्र आध्यात्मिक यात्रा में भारी पड़ जाते हैं, तो अनुग्रह बांधेगा नहीं, बल्कि अनुग्रह भी खोलेगा। यानी मैं तुम्हारे प्रति कृतज्ञ हो जाऊं, तो यह बंधन क्यों बने? इसमें बंधन होने की क्या बात है? बल्कि अगर मैं कृतशता शापन न कर पाऊं तो शायद भीतर एक बंधन रह जाए कि मैं धन्यवाद भी नहीं दे पाया। लेकिन धन्यवाद देने का मतलब यह है कि बात समाप्त हो गई।

सुरक्षा— भयभीत की खोज:

अनुग्रह बंधन नहीं है, बल्कि अनुग्रह का भाव परम स्वतंत्रता का भाव है। लेकिन हम कोशिश करते हैं बंधने की क्योंकि हमारे भीतर भय है। और हम सोचते हैं अकेले खड़े रह पाएंगे, नहीं खड़े रह पाएंगे? किसी से बंध जाएं। दूसरे की तो बात छोड़ दें, अंधेरी गली में से आदमी निकलता है तो खुद ही जोर—जोर से गाना गाने लगता है; अपनी ही आवाज जोर से सुनकर भी भय कम होता है। अपनी ही आवाज! दूसरे की आवाज भी होती तब भी ठीक था कि कोई दूसरा भी मौजूद है! लेकिन अपनी ही आवाज जोर से सुनकर काफिडेंस बढ़ता मालूम पड़ता है कि कोई डर नहीं। तो आदमी भयभीत है और वह कुछ भी पकड़ने लगता है। और अगर डूबते को तिनका भी मिल जाए, तो वह आंख बंद करके उसको भी पकड़ लेता है। हालांकि इस तिनके से डूबने से नहीं बचता, सिर्फ डूबनेवाले के साथ तिनका भी डूब जाता है। लेकिन भय में हमारा चित्त पकड़ लेना चाहता है। सारी बाइंडिंग फियर की है। तो गुरु हो—यह हो, वह हो—कोई भी, उसको पकड़ लेंगे हम। पकड़कर हम सुरक्षित होना चाहते हैं। एक तरह की सिक्योरिटी है।

असुरक्षा में ही आत्मा का विकास:

और साधक को सुरक्षा से बचना चाहिए। साधक के लिए सुरक्षा सबसे बड़ा मोहजाल है। अगर उसने एक दिन भी सुरक्षा चाही, और उसने कहा कि अब मैं किसी की शरण में सुरक्षित हो जाऊंगा, और किसी की आडू में अब कोई भय नहीं है अब मैं भटक नहीं सकता, अब मैंने ठीक मुकाम पा लिया, अब मैं कहीं जाऊंगा नहीं, अब मैं यहीं बैठा रहूंगा, तो वह भटक गया; क्योंकि साधक के लिए सुरक्षा नहीं है। साधक के लिए असुरक्षा वरदान है; क्योंकि जितनी असुरक्षा है, उतना ही साधक की आत्मा को फैलने, बलवान होने, अभय होने का मौका है; जितनी सुरक्षा है, उतना साधक के निर्बल होने की व्यवस्था है; वह उतना निर्बल हो जाएगा।

बेसहारा होने के लिए ही सहारे का उपयोग:

सहारा लेना एक बात है, सहारा लिए ही चले जाना बिलकुल दूसरी बात है। सहारा दिया ही इसलिए गया है कि तुम बेसहारे हो सको; सहारा दिया ही इसलिए गया है कि अब तुम्हें सहारे की जरूरत न रहे। एक बाप अपने बेटे को चलना सिखा रहा है। कभी खयाल किया है कि जब बाप अपने बेटे को चलना सिखाता है, तो बाप बेटे का हाथ पकड़ता है; बेटा नहीं पकड़ता। लेकिन थोड़े दिन बाद जब बेटा थोड़ा चलना सीख जाता है, तो बाप का हाथ बाप तो छोड़ देता है, लेकिन बेटा पकड़ लेता है। कभी बाप को चलाते देखें, तो अगर बेटा हाथ पकड़े हो तो समझो कि वह चलना सीख गया है, लेकिन फिर भी हाथ नहीं छोड़ रहा है; और अगर बाप हाथ पकड़े हो तो समझना कि अभी चलना सिखाया जा रहा है, अभी छोड़ने में खतरा है, अभी छोड़ा नहीं जा सकता। और बाप तो चाहेगा ही यह कि कितनी जल्दी हाथ छूट जाए; क्योंकि इसीलिए तो सिखा रहा है। और अगर कोई बाप इस मोह से भर जाए कि उसे मजा आने लगे कि बेटा उसका हाथ पकड़े ही रहे, तो वह बाप दुश्मन हो गया। बहुत बाप हो जाते हैं। बहुत गुरु हो जाते हैं। लेकिन चूक गए वे। जिस बात के लिए उन्होंने सहारा दिया था, वही खत्म हो गई। वह तो उन्होंने क्रिपिल्ड पैदा कर दिए जो अब उनकी बैसाखी लेकर चलेंगे। हालांकि उनको मजा आता है कि मेरी बैसाखी के बिना तुम नहीं चल सकते। अहंकार की तृप्ति मिलती है। लेकिन जिस गुरु को अहंकार की तृप्ति मिल रही हो, वह तो गुरु ही नहीं है। लेकिन बेटा पकड़े रह सकता है पीछे भी, क्योंकि बेटा डर जाए कि कहीं गिर न जाऊं! क्योंकि बिना बाप के मैं कैसे चल सकूंगा? तो गुरु का काम है कि उसके हाथ को झिड्के और कहे कि अब तुम चलो। और कोई फिकर नहीं, दों—चार बार गिरो तो ठीक है, उठ आना। आखिर उठने के लिए गिरना जरूरी है। और, गिरने का डर मिटाने के लिए भी कुछ बार गिरना जरूरी है कि अब नहीं गिरेंगे। हमारे मन में यह हो सकता है कि किसी का सहारा पकड़ लें, तो फिर बाइंडिंग पैदा हो जाती है। वह पैदा नहीं करना है। किसी साधक को ध्यान लेकर चलना है कि वह कोई सुरक्षा की तलाश में नहीं है; वह सत्य की खोज में है, सुरक्षा की खोज में नहीं है। और अगर सत्य की खोज करनी है तो सुरक्षा का खयाल छोड़ना पड़ेगा। नहीं तो असत्य बहुत बार बड़ी सुरक्षा देता है— और जल्दी से दे देता है। तो फिर सुरक्षा का खोजी असत्य को पकड़ लेता है। कनवीनिएंस का खोजी सत्य तक नहीं पहुंचता, क्योंकि लंबी यात्रा है। फिर वह यहीं असत्य को गढ़ लेता है और यहीं बैठे हुए पा लेता है। और बात समाप्त हो जाती है।

अंधश्रद्धा क्यों:

इसलिए किसी भी तरह का बंधन…… और गुरु का बंधन तो बहुत ही खतरनाक है, क्योंकि वह आध्यात्मिक बंधन है। और आध्यात्मिक बंधन शब्द ही कट्राडिक्टरी है; क्योंकि आध्यात्मिक स्वतंत्रता तो अर्थ रखती है, आध्यात्मिक गुलामी का कोई अर्थ नहीं होता। लेकिन इस दुनिया में आध्यात्मिक रूप से जितने लोग गुलाम हैं, उतने लोग और किसी रूप से गुलाम नहीं हैं। उसका कारण है; क्योंकि जिस चौथे शरीर के विकास से आध्यात्मिक स्वतंत्रता की संभावना पैदा होगी, वह चौथा शरीर नहीं है। उसके कारण हैं—वें तीसरे शरीर तक विकसित हैं। इसलिए अक्सर देखा जाएगा कि एक आदमी हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस है, किसी युनिवर्सिटी का वाइसचांसलर है, और किसी निपट गंवार आदमी के पैर पकड़े बैठा हुआ है। और उसको देखकर हजार गंवार उसके पीछे बैठे हुए है—कि जब हाईकोर्ट का जस्टिस बैठा है, वाइसचांसलर बैठा है युनिवर्सिटी का, तो हम क्या हैं! लेकिन उसे पता नहीं कि यह जो आदमी है, इसका तीसरा शरीर तो बहुत विकसित हुआ है, इसने बुद्धि का तो बहुत विकास किया था, लेकिन चौथे शरीर के मामले में यह बिलकुल गंवार है; उसके पास वह शरीर नहीं है। और इसके पास चूंकि तीसरा शरीर है केवल, बुद्धि और तर्क का विचार करते—करते यह थक गया और अब विश्राम कर रहा है। और जब बुद्धि थककर विश्राम करती है तो बड़े अबुद्धिपूर्ण काम करती है। कोई भी चीज जब थककर विश्राम करती है तो उलटी हो जाती है। इसलिए यह बड़ा खतरा है। इसलिए आश्रमों में आपको मिल जाएंगे, हाईकोर्ट के जजेज़ वहां निश्चित मिलेंगे। वे थक गए हैं, वे बुद्धि से परेशान हो गए हैं, वे इससे छुटकारा चाहते हैं। वे कोई भी अबुद्धिपूर्ण, इररेशनल, किसी भी चीज में विश्वास करके आंख बंद करके बैठ जाते हैं। वे कहते हैं सोच लिया बहुत, विवाद कर लिया बहुत, तर्क कर लिया बहुत, कुछ नहीं मिला; अब इसको हम छोड़ते हैं। तो वे किसी को भी पकड़ लेते हैं। और उनको देखकर, पीछे जो बुद्धिहीन वर्ग है, वह कहता है जब इतने बुद्धिमान लोग हैं, तो फिर हमको भी पकड़ लेना चाहिए। लेकिन वे जहां तक चौथे शरीर का संबंध है, निपट ना—कुछ हैं। इसलिए चौथे शरीर का किसी व्यक्तित्व में थोड़ा सा भी विकास हुआ हो, तो बडे से बड़ा बुद्धिमान उसके चरणों को पकड़कर बैठ जाएगा; क्योंकि उसके पास कुछ है, जिसके मामले में यह बिलकुल निर्धन है। तो चूंकि चौथा शरीर विकसित नहीं है, इसलिए बाइंडिंग पैदा होती है। ऐसा मन होता है कि किसी को पकड़ लो; जिसका विकसित है, उसको पकड़ लो। लेकिन उसको पकड़ने से विकसित नहीं हो जाएगा; उसको समझने से विकसित हो सकता है। और पकड़ना समझने से बचने का उपाय है—कि समझने की क्या जरूरत है? समझने की क्या जरूरत है, हम आपके ही चरण पकड़े रहते हैं! तो जब आप वैतरणी पार होओगे, हम भी हो जाएंगे। हम आपको ही नाव बनाए लेते हैं; हम उसी में सवार रहेंगे जब आप पहुंचोगे, हम भी पहुंच जाएंगे।

साधना के श्रम से बचने के लिए अंधानुकरण:

समझने में कष्ट है। समझने में अपने को बदलना पड़ेगा। समझना एक प्रयास, एक साधना है। समझना एक श्रम है, समझना एक क्रांति है। समझने में एक रूपांतरण होगा, सब बदलेगा पुराना; नया करना पड़ेगा। इतनी झंझट क्यों करनी! जो आदमी जानता है, हम उसको पकड़ लेते हैं; हम उसके पीछे चले जाएंगे। लेकिन इस जगत में सत्य तक कोई किसी के पीछे नहीं जा सकता, वहां अकेले ही पहुंचना पड़ता है। वह रास्ता ही निर्जन है। वह रास्ता ही अकेले का है। इसलिए किसी तरह का बंधन वहां बाधा है। तो सीखना, समझना, जहां से जो झलक मिले उसे लेना, लेकिन रुकना कहीं भी मत, किसी भी जगह को तुम मुकाम मत बना लेना और उसका हाथ पकड़ मत लेना कि बस अब ठीक, आ गए। हालांकि बहुत लोग मिलेंगे, जो कहेंगे. कहां जाते हो? रुक जाओ मेरे पास! बहुत लोग मिलेंगे जिनको यह दूसरा हिस्सा है। जैसा कि मैंने कहा, भयभीत आदमी बंधना चाहता है किसी से, तो कुछ भयभीत आदमी बांधना भी चाहते हैं किसी को; उनको उससे भी अभय हो जाता है। जिस आदमी को लगता है, मेरे साथ हजार अनुयायी हैं, उसको लगता है— मैं ज्ञानी हो गया, नहीं तो हजार अनुयायी कैसे होते! जब हजार आदमी मुझे माननेवाले हैं, तो जरूर मैं कुछ जानता हूं नहीं तो मानेंगे कैसे! यह बड़े मजे की बात है कि गुरु बनना कई बार तो सिर्फ इसी मानसिक हीनता के कारण होता है— कि दस हजार मेरे शिष्य हैं, बीस हजार! तो गुरु लगे हैं शिष्य बढ़ाने में— कि मेरे सात सौ संन्यासी हैं, मेरे हजार संन्यासी हैं, मेरे इतने शिष्य हैं—वे फैलाने में लगे हैं। क्योंकि जितना यह विस्तार फैलता है, वे आश्वस्त होते हैं कि जरूर मैं जानता हूं नहीं तो हजार आदमी मुझे क्यों मानते! यह तर्क लौटकर उनको विश्वास दिलाता है कि मैं जानता हूं। अगर ये हजार शिष्य खो जाएं, तो उनको लगेगा कि गया। इसका मतलब कि मैं नहीं जानता।

जहां बंधन है, वहां संबंध नहीं है:

बड़े मानसिक खेल चलते हैं। बड़े मानसिक खेल चलते हैं। उन मानसिक खेलों से सावधान होने की जरूरत है—दोनों तरफ से, क्योंकि दोनों तरफ से खेल हो सकता है। शिष्य भी बांध सकता है, और जो शिष्य आज किसी से बंधेका, वह कल किसी को बांधेगा, क्योंकि यह सब श्रृंखलाबद्ध काम है। वह आज शिष्य बनेगा तो कल गुरु भी बनेगा। क्योंकि शिष्य कब तक बना रहेगा! अभी एक को पकड़ेगा, तो कल फिर किसी को खुद को भी पकड़ाएगा। श्रृंखलाबद्ध गुलामिया हैं। मगर उसका बहुत गहरे में कारण वह चौथे शरीर का विकसित न होना है। उसको विकसित करने की चिंता चले तो तुम स्वतंत्र हो सकोगे। फिर बंधन नहीं होगा। इसका यह मतलब नहीं है कि तुम अमानवीय हो जाओगे, कि तुम्हारा मनुष्यों से कोई संबंध न रह जाएगा; बल्कि इसका मतलब ही उलटा है। असल में, जहां बंधन है, वहां संबंध होता ही नहीं। अगर एक पति और पत्नी के बीच बंधन है.. .हम कहते हैं न कि विवाह—बंधन में बंध रहे हैं! निमंत्रण पत्रिकाएं भेजते हैं कि मेरा बेटा और मेरी बेटी प्रणय—सूत्र के बंधन में बंध रहे हैं! जहां बंधन है, वहां संबंध नहीं हो सकता। क्योंकि गुलामी में कैसा संबंध? कभी भविष्य में जरूर कोई बाप निमंत्रण पत्र भेजेगा कि मेरी बेटी किसी के प्रेम में स्वतंत्र हो रही है। वह तो समझ में आती है बात कि अब किसी का प्रेम उसको स्वतंत्र कर रहा है जीवन में; अब उसके ऊपर कोई बंधन नहीं रहेगा, वह मुक्त हो रही है प्रेम में। और प्रेम मुक्त करना चाहिए। अगर प्रेम भी बांध लेता है तो फिर इस जगत में मुक्त क्या करेगा? कौन करेगा?

संबंध वही, जो मुक्त करे:

और जहां बंधन है, वहां सब कष्ट हो जाता है, सब नरक हो जाता है। ऊपर से चेहरे और रह जाते हैं, भीतर सब गंदगी हो जाती है। वह चाहे गुरु—शिष्य का हो, चाहे बाप—बेटे का हो, चाहे पति—पत्नी का हो, चाहे दो मित्रों का हो—जहां बंधन है, वहां संबंध नहीं होता। और अगर संबंध है तो बंधन बेमानी है। लगता तो ऐसा ही है कि जिससे हम बंधे हैं, उसी से संबंध है; लेकिन सिर्फ उसी से हमारा संबंध होता है, जिससे हमारा कोई भी बंधन नहीं। इसलिए कई बार ऐसा हो जाता है कि आप अपने बेटे से वह बात नहीं कह सकते जो एक अजनबी से कह सकते हैं। मैं इधर हैरान हुआ हूं जानकर कि पत्नी अपने पति से नहीं कह सकती और ट्रेन में एक अजनबी आदमी से कह सकती है, जिसको वह बिलकुल नहीं जानती, घंटे भर पहले मिला है। असल में, कोई बंधन नहीं है, तो संबंध के लिए सरलता मिल जाती है। इसलिए तुम एक अजनबी से जितने भले ढंग से पेश आते हो, उतना परिचित से नहीं आते। वहां कोई भी तो बंधन नहीं है, तो सिर्फ संबंध ही हो सकता है। लेकिन परिचित के साथ तुम उतने भले ढंग से कभी पेश नहीं आते, क्योंकि वहां तो बंधन है। वहां नमस्कार भी करते हो तो ऐसा मालूम पड़ता है, एक काम है। इसलिए गुरु—शिष्य का एक संबंध तो हो सकता है। और संबंध सब मधुर हैं। लेकिन बंधन नहीं हो सकता। और संबंध का मतलब ही है कि वह मुक्त करता है।

न बाधनेवाले अदभुत हेन फकीर:

झेन फकीरों की एक बात बड़ी कीमती है कि अगर किसी भी झेन फकीर के पास कोई सीखने आएगा, तो जब वह सीख चुका होगा, तब वह उससे कहेगा कि अब मेरे विरोधी के पास चले जाओ, अब कुछ दिन वहां सीखो। क्योंकि एक पहलू तुमने जाना, अब तुम दूसरे पहलू को समझो। और फिर साधक अलग—अलग आश्रमों में वर्षों घूमता रहेगा। उनके पास जाकर बैठेगा जो उसके गुरु के विरोधी हैं; उनके चरणों में बैठेगा और उनसे भी सीखेगा। क्योंकि उसका गुरु कहेगा कि हो सकता है वह ठीक हो; तुम उधर भी जाकर सारी बात समझ लो। और कौन ठीक है, इसका क्या पता? हो सकता है, हम दोनों से मिलकर जो बनता हो, वही ठीक हो; या यह भी हो सकता है कि हम दोनों को काटकर जो बचता हो, वही ठीक हो। इसलिए जाओ, उसे खोजो। जब कोई देश में आध्यात्मिक प्रतिभा विकसित होती है, तो ऐसा होता है, तब बंधन नहीं बनतीं चीजें। अब यह मैं चाहता हूं ऐसा इस मुल्क में जिस दिन हो सकेगा, उस दिन बहुत परिणाम होंगे—कि कोई किसी को बांधता न हो, भेजता हो लंबी यात्रा पर, कि वह जाए। और कौन जानता है कि क्या होगा अंतिम! लेकिन जो इस भांति भेज देगा, अगर कल तुम्हें उसकी सब बातें भी गलत मालूम पड़े, तब भी वह आदमी गलत मालूम नहीं पड़ेगा। जो इस भांति तुम्हें भेज देगा कि जाओ कहीं और खोजो—हो सकता है मैं गलत होऊं। तो यह हो भी सकता है कि किसी दिन उसकी सारी बातें भी तुम्हें गलत मालूम पड़े, तब भी तुम अनुगृहीत रहोगे; वह आदमी कभी गलत नहीं हो पाएगा। क्योंकि उस आदमी ने ही तो भेजा था तुम्हें। अभी हालतें ऐसी हैं कि सब रोक रहे हैं। एक गुरु रोकता है, किसी दूसरे की बात मत सुन लेना! शास्त्रों में लिखता है कि दूसरे के मंदिर में मत चले जाना! चाहे पागल हाथी के पैर के नीचे दबकर मर जाना, मगर दूसरे के मंदिर में शरण भी मत लेना; कहीं ऐसा न हो कि वहां कोई चीज कान में पड़ जाए! तो भला ऐसे आदमी की सब बातें भी सही हों, तब भी यह आदमी तो गलत ही है। और इसके प्रति अनुग्रह कभी नहीं हो सकता, क्योंकि इसने तुम्हें गुलाम बनाया, कुचल डाला और मार डाला है। यह अगर खयाल में आ जाए तो बंधन का कोई सवाल नहीं है।

शक्तिपात एक दोहरी घटना है-

क्या केवल शक्तिपात के माध्यम से कुंडलिनी सहस्रार तक विकसित हो सकती है? उसके सहस्रार पर पहुंचने पर क्या समाधि का एक्सप्लोजन हो जाता है? यदि शक्तिपात के माध्यम से कुंडलिनी सहस्रार तक विकसित हो सकती है, तो इसका अर्थ यह हो जाएगा कि दूसरे से समाधि उपलब्ध हो सकती है! इसे थोड़ा समझना पड़ेगा। असल बात यह है, इस जगत में, इस जीवन में कोई भी घटना इतनी सरल नहीं है जिसको तुम एक ही तरफ से देखो और समझ लो, उसे बहुत तरफ से देखना पड़े। अब जैसे मैं इस दरवाजे पर जाऊं और जोर से एक हथौड़ा मारूं और दरवाजा खुल जाए, तो मैं यह कह सकता हूं कि मेरे हथौड़े से दरवाजा खुला और यह कहना एक अर्थ में सच भी है, क्योंकि मैं अगर हथौड़ा नहीं मारता तो दरवाजा अभी खुलता नहीं था लेकिन इसी हथौड़े को मैं दूसरे दरवाजे पर मारूं और दरवाजा न खुले, हथौड़ा ही टूट जाए- तब? तब तुम्हें दूसरा पहलू भी खयाल में आएगा कि जब एक दरवाजे पर मैंने हथौड़ा मारा और दरवाजा खुला, तो सिर्फ हथौड़े के मारने से नहीं खुला, दरवाजा भी खुलने के लिए पूरी तरह तैयार था, क्योंकि दूसरा दरवाजा नहीं खुला। किसी भी कारण से तैयार था-कमजोर था, जरा जीर्ण था,पर उसकी तैयारी थी। यानी खुलने में सिर्फ हथौड़ा ही नहीं खोल दिया है उसे, दरवाजा भी खुला, क्योंकि और दूसरे दरवाजों पर हथौड़े की चोट करके देखी है तो हथौड़ा ही टूट गया है कहीं, कहीं हथौड़ा नहीं टूटा, न दरवाजा खुला, कहीं हम थक गए चोट कर-कर के, वह नहीं खुला।

तो इस घटना में जहां शक्तिपात से कुछ घटना घटती है, वहां शक्तिपात से ही घटती है, इस भ्रांति में नहीं पडऩे की जरूरत है। वहां वह दूसरा व्यक्ति भी किसी बहुत आंतरिक तैयारी के एक छोर पर पहुंच गया है, जहां जरा सी चोट सहयोगी हो जाती है। नहीं यह चोट लगती तो शायद थोड़ी देर लग सकती थी। तो इस शक्तिपात से जो हो रहा है वह कुंडलिनी सहस्रार तक नहीं पहुंच रही, इस शक्तिपात से इतना ही हो रहा है कि टाइम एलिमेंट जो है, समय का जो थोड़ा व्यवधान था, वह कम हो रहा है, और कुछ भी नहीं हो रहा। यह आदमी पहुंच तो जाता ही। समझ लो कि मैं इस हथौड़े से चोट नहीं मारता इस दरवाजे पर, और यह जराजीर्ण दरवाजा, यह बिलकुल गिरने को हो रहा है, कल हवा के थपेड़े से गिर जाता। हवा का थपेड़ा भी न आता, क्योंकि दरवाजे का भाग्य- न आए, हवा का थपेड़ा ही न आए उस तरफ- तो क्या तुम सोचते हो, यह दरवाजा खड़ा ही रहता? यह दरवाजा जो एक ही चोट से गिर गया, जो हवा के थपेड़े से डरता था कि गिर जायेगा, यह बिना हवा के थपेड़े के भी एक दिन गिर जाएगा।

जब तुम्हें कारण भी बताना मुश्किल हो जाएगा कि किसने गिराया,तब यह अपने से भी गिर जाएगा, यह गिरने की तैयारी इकट्ठी करता जा रहा है। तो ज्यादा से ज्यादा जो फर्क लाया जा सकता है, वह सिर्फ समय की परिधि का, टाइम गैप का। जो घटना रामकृष्ण के पास अगर विवेकानंद को घटी, उसमें अगर अकेले रामकृष्ण ही जिम्मेवार हैं, तो फिर और किसी को भी घट जाती, बहुत लोग उनके करीब गए। सैकड़ों उनके शिष्य हैं। तो और किसी को नहीं घट गई है और अगर विवेकानंद ही जिम्मेवार थे अकेले, तो वे रामकृष्ण के पहले और बहुत लोगों के पास गए थे, उनके पास वह नहीं घटी थी। समझ रहे हो न? तो विवेकानंद की अपनी एक तैयारी थी, रामकृष्ण की अपनी एक सामथ्र्य थी, यह तैयारी और यह सामर्थ्र्य किसी बिन्दु पर अगर मिल जाएं, तो टाइम गैप कम हो सकता है। विवेकानंद, हो सकता है अगले जन्म में यह घटना घटतीवर्ष भर बाद घटती, दो वर्ष बाद घटती, दस जन्मों बाद घटती- यह सवाल नहीं है, इस व्यक्ति की अपनी भीतरी तैयारी अगर हो रही थी तो घटना घटती। टाइम गैप कम हो सकता है और समझने की बात यह है कि टाइम बड़ी ही फिक्टीशस, बड़ी मायिक घटना है, इसलिए उसका कोई बहुत मूल्य नहीं है। असल में, समय इतनी ज्यादा स्वप्निल घटना है कि उसका कोई बड़ा मूल्य नहीं है। अभी तुम एक झपकी लो और हो सकता है कि घड़ी में एक ही मिनट गुजरे और तुम जागकर कहो कि मैंने इतना लंबा स्वपन देखा कि मैं बच्चा था, जवान था, बूढ़ा हुआ, मेरे लड़के थे, शादी हुई, धन कमाया, सट्टे में हार गया यह सब हो गया! और यहां बाहर हम कहें कि यह तुम कैसी बातें कर रहे हो, इतना हो, इतना लंबा सपना देखने के लिए भी वक्त लगेगा, क्योंकि अभी तुम एक सेंकेंड तुम्हारी आंखें बंद हुई है सिर्फ, तुमने झपकी भर ली है। असल में ड्रीम टाइम जो है, स्वपन का जो समय है, उसकी यात्रा बहुत अलग है।

विवेकानंद को शक्तिपात से नुकसान हुआ ;-

सल में, विवेकानंद को शक्तिपात से तो नुकसान नहीं हुआ, लेकिन शक्तिपात के पीछे जो हुआ उससे नुकसान हुआ; जो और चीजें चलीं। पर नुकसान और हानि की बात भी सपने के भीतर की बात है, बाहर की नहीं। तो जिस भांति रामकृष्‍ण की सहायता से उनको एक झलक मिली—जो झलक शायद उनको अपने ही पैरों पर कभी मिलती, वक्त लग जाता—लेकिन उस झलक के बाद, चूंकि वह झलक दूसरे से मिली थी, दूसरे के द्वारा मिली थी...। जैसे मैंने हथौड़ा मारा दरवाजे पर, दरवाजा टूट गया। लेकिन मैं दरवाजे को फिर खड़ा कर गया, उसी हथौड़े से खीलें ठोंक गया और वापस ठीक कर गया। जो हथौड़ा दरवाजा गिरा सकता है, वह कीलें भी ठोंक सकता है। हालांकि दोनों हालत में एक ही बात हो रही है, पहले भी समय ही थोड़ा कम हुआ था, अब समय ही फिर थोड़ा हो जाएगा।

रामकृष्ण की कुछ कठिनाइयां थीं जिनके लिए उन्हें विवेकानंद का उपयोग करना पड़ा। रामकृष्ण निपट देहाती, अपढ़, अशिक्षित आदमी थे, अनुभव उनको गहरा हुआ था, लेकिन अभिव्यक्ति उनके पास नहीं थी। और जरूरी था कि वे अपनी अभिव्यक्ति के लिए किसी आदमी को साधन बनाएं, वाहन बनाएं। नहीं तो रामकृष्ण का आपको पता ही न चलता। और रामकृष्ण को जो मिला था, यह उनकी करुणा का हिस्सा ही है कि वह किसी आदमी के द्वारा आप तक पहुंचा दें।

मेरे घर में खजाना मिल जाए मुझे, और मेरे पैर टूटे हों, और मैं किसी आदमी के कंधे पर खजाना रखकर आपके घर तक पहुंचा दूं। तो उस आदमी के कंधे का तो मैंने उपयोग किया, उसे थोड़ी तकलीफ भी दी; क्योंकि इतनी दूर वजन तो उसे ढोना ही पड़ेगा। लेकिन उस आदमी को तकलीफ देने का इरादा नहीं है, इरादा वह जो खजाना मुझे मिला है, आप तक पहुंचाने का है। क्योंकि मैं हूं लंगड़ा, और यह खजाना यहीं पड़ा रह जाएगा, और मैं घर के बाहर खबर भी नहीं ले जा सकूंगा।

तो रामकृष्ण को एक कठिनाई थी। बुद्ध को ऐसी कठिनाई नहीं थी। बुद्ध के व्यक्तित्व में रामकृष्ण और विवेकानंद एक साथ मौजूद थे। तो बुद्ध जो जानते थे, वह कह भी सकते थे; रामकृष्ण जो जानते थे, वह कह नहीं सकते थे। कहने के लिए उन्हें एक आदमी चाहिए था जो उनका मुंह बन जाए। तो विवेकानंद को उन्होंने झलक तो दिखा दी, लेकिन तत्काल विवेकानंद से कहा कि अब चाबी मैं रखे लेता हूं अपने हाथ, अब मरने के तीन दिन पहले लौटा दूंगा। अब विवेकानंद बहुत चिल्लाने लगे कि आप यह क्या कर रहे हैं! अब जो मुझे मिला है, छीनिए मत! रामकृष्ण ने कहा, लेकिन अभी तुझे और दूसरा काम करना है; अगर यह तू इसमें डूबा, तो गया। तो अभी मैं तेरी चाबी रखे लेता हूं इतनी तू कृपा कर। और मरने के तीन दिन पहले तुझे लौटा दूंगा। और अब मरने के तीन दिन पहले तक तुझे समाधि उपलब्ध न हो, क्योंकि तुझे कुछ और काम करना है जो समाधि के पहले ही तू कर पाएगा।

और इसका भी कारण यही था कि रामकृष्ण को पता नहीं था कि समाधि के बाद भी लोगों ने यह काम किया है। लेकिन रामकृष्ण को पता हो भी नहीं सकता था, क्योंकि वे समाधि के बाद कुछ भी नहीं कर पाए थे। स्वभावत: हम अपनी ही अनुभूति से चलते हैं। रामकृष्ण की अनुभूति के बाद रामकृष्ण कुछ भी नहीं कह पाते थे, बोल नहीं पाते थे। बोलना तो बहुत मुश्किल था, वे तो इतने.. .कोई कह देता राम— और वे बेहोश हो जाते। यह तो दूसरा कह दे! कोई चला आया है और उसने कहा कि जय राम जी— और वे बेहोश होकर गिर गए! उनके लिए तो राम शब्द भी सुनाई पड़ जाए तो मुश्किल मामला था—उनको याद आ गई उसी जगत की। किसी ने कह दिया अल्लाह, तो वे गए। मस्जिद दिखाई पड़ गई, तो वे वहीं खड़े होकर बेहोश हो गए। कहीं भजन—कीर्तन हो रहा है, वे चले जा रहे हैं अपने रास्ते से—वे गए, वहीं सड़क पर गिर गए। उनकी कठिनाई यह हो गई थी : कहीं से भी जरा सी स्मृति आ जाए उनको उस रस की, कि वे गए। तो अब उनको तो बहुत कठिनाई थी। और उनका अनुभव उनके लिहाज से ठीक ही था कि विवेकानंद को अगर यह अनुभूति हो गई तो फिर क्या होगा! तो उन्होंने विवेकानंद से कहा कि तुझे तो मैं कुछ, एक बड़ा काम है, वह तू कर ले, उसके बाद...

इसलिए विवेकानंद की पूरी जिंदगी समाधि—रहित बीती, और इसलिए बहुत तकलीफ में बीती। तकलीफ लेकिन सपने की! इस बात को खयाल में रखना कि तकलीफ सपने की है; एक आदमी सोया है और बड़ी तकलीफ का सपना देख रहा है। मरने के तीन दिन पहले चाबी वापस मिल गई, लेकिन मरने तक बहुत पीड़ा थी। मरने के पांच—सात दिन पहले तक भी जो पत्र उन्होंने लिखे, वे बहुत दुख के है—कि मेरा क्या होगा, मैं तड़प रहा हूं। और तड़प और भी बढ़ गई, क्योंकि जो देख लिया है एक दफा, उसकी दुबारा झलक नहीं मिली।

अभी उतनी तड़प नहीं है आपको, क्योंकि कुछ पता ही नहीं है कि क्या हो सकता है। उसकी एक झलक मिल जाए....... आप खड़े थे अंधेरे में, कोई तकलीफ न थी, हाथ में कंकड़—पत्थर थे, तो भी बड़ा आनंद था, क्योंकि संपत्ति थी। फिर चमक गई बिजली और दिखाई पड़ा कि हाथ में कंकड़—पत्थर हैं— और सामने दिखाई पड़ा कि रास्ता भी है, और सामने दिखाई पड़ा कि हीरों की खदान भी है। लेकिन बिजली खो गई। और बिजली कह गई कि अभी दूसरा काम तुम्हें करना है वे जो और पत्थर बीन रहे हैं उनसे कहना है कि यहां आगे खदान है। इसलिए अभी तुम्हारे लिए वापस बिजली नहीं चमकेगी। अब तुम ये जो बाकी पत्थर इकट्ठे कर रहे हैं इनको समझाओ।

तो विवेकानंद से एक काम लिया गया है जो रामकृष्ण के लिए सप्लीमेंट्री था, जरूरी था, जो उनके व्यक्तित्व में नहीं था वह दूसरे व्यक्ति से लेना पड़ा। ऐसा बहुत बार हो गया है, बहुत बार हो जाता है, कुछ बात जो नहीं संभव हो पाए एक व्यक्ति से, उसके लिए दो—चार व्यक्ति भी खोजने पड़ते हैं। कई बार तो एक ही काम के लिए दस—पांच व्यक्ति भी खोजने पडते हैं। उन सबके सहारे से वह बात पहुंचाई जा सकती है। उसमें है तो करुणा, लेकिन विवेकानंद के साथ तो...

इसलिए मेरा कहना यह है कि जहां तक बने शक्तिपात से बचना, जहां तक बने वहां तक प्रसाद की फिक्र करना। और शक्तिपात भी वही उपयोगी है जो प्रसाद जैसा हो। जिसकी कोई कंडीशनिंग न हो, जिसके साथ कोई शर्त न हो, जो यह न कहे कि अब हम चाबी रखे लेते हैं। मेरा मतलब समझे न? जो यह न कहे कि अब कोई शर्त है इसके साथ, जो बेशर्त, अनकडीशनल हो; जो आपको हो जाए और वह आदमी कभी आपसे पूछने भी न आए कि क्या हुआ; जो गया तो आपको अगर धन्यवाद भी देना हो तो उसको खोजना मुश्किल हो जाए कि उसे कहां जाकर धन्यवाद दें। उतना ही आपके लिए आसान पड़ेगा। लेकिन कभी रामकृष्ण जैसे व्यक्ति को जरूरत पड़ती है। तो उसके सिवाय कोई रास्ता नहीं था। नहीं तो रामकृष्ण का जानना खो जाता; वे कह नहीं पाते। उनके लिए जबान चाहिए थी जो उनके पास नहीं थी। वह जबान उन्हें विवेकानंद से मिल गई।

इसलिए विवेकानंद निरंतर कहते थे कि जो भी मैं कह रहा हूं वह मेरा नहीं है। और अमेरिका में जब उन्हें बहुत सम्मान मिला, तो उन्होंने कहा कि मुझे बड़ा दुख हो रहा है और मुझे बड़ी मुश्किल पड़ती है, क्योंकि जो सम्मान मुझे दिया जा रहा है वह उस एक और दूसरे ही आदमी को मिलना चाहिए था जिसका आपको पता ही नहीं। और जब उन्हें कोई महापुरुष कहता, तो वे कहते कि जिस महापुरुष के पास मैं बैठकर आया हूं मैं उसके चरणों की धूल भी नहीं हूं।

लेकिन रामकृष्ण अगर अमेरिका में जाते, तो वे किसी पागलखाने में भर्ती किए जाते, और उनकी चिकित्सा की जाती। उनकी कोई नहीं सुनता; वे बिलकुल पागल सिद्ध होते। वे पागल थे। अभी तक हम यह नहीं साफ कर पाए कि एक सेक्युलर पागलपन होता है और एक नॉन—सेक्युलर पागलपन भी होता है। अभी हम फर्क नहीं कर पाए कि एक पागलपन सांसारिक पागलपन, और एक और पागलपन भी है—डिवाइन भी है। वह हमें फर्क तो नहीं हो पाया।

तो अमेरिका में कभी दोनों पागल एक साथ एक से पागलखाने में बंद कर दिए जाते हैं; दोनों की एक चिकित्सा हो जाती है। रामकृष्ण की चिकित्सा हो जाती, विवेकानंद को सम्मान मिला। क्योंकि विवेकानंद जो कह रहे हैं, वह कहने की बात है, वे खुद कोई दीवाने नहीं हैं; वे एक संदेशवाहक हैं, एक डाकिया। चिट्ठी ले गए हैं किसी की, वह जाकर पढ़कर सुना दी है। लेकिन वे अच्छी तरह पढ़कर सुना सकते हैं।

नसरुद्दीन के जीवन में एक बहुत अदभुत घटना है। नसरुद्दीन अपने गांव में अकेला पढ़ा—लिखा आदमी है। और जिस गांव में एक ही अकेला पढा—लिखा हो, वह भी बहुत पढ़ा—लिखा तो होता नहीं! तो चिट्ठी किसी को लिखवानी हो, तो उसी से लिखवानी पड़ती है। तो एक आदमी उससे चिट्ठी लिखवाने आया है। और वह नसरुद्दीन उससे कहता है कि मैं न लिखूंगा, मेरे पैर में बड़ी तकलीफ है।

उस आदमी ने कहा, भई पैर से चिट्ठी लिखने को कहता कौन है! आप हाथ से चिट्ठी लिखिए।

नसरुद्दीन ने कहा कि तुम समझे नहीं, असल में हम चिट्ठी लिखते हैं तो हम ही पढ़ते हैं; हमें दूसरे गांव में जाकर पढ़नी भी पड़ती है। पैर में बहुत तकलीफ है, अभी हमें चिट्ठी लिखने की झंझट में नहीं पड़ना। लिख तो देंगे, पड़ेगा कौन? वह दूसरे गांव में हमीं को जाना पड़ता है न! तो अभी जब तक पैर में तकलीफ है, हम चिट्ठी लिखना बंद ही रखेंगे।

तो रामकृष्‍ण जैसे जो लोग हैं, ये जो चिट्ठी भी लिखेंगे, ये खुद ही पढ़ सकते हैं। ये आपकी भाषा भूल ही गए; आपकी भाषा का इनको कोई पता ही नहीं है। और ये एक और ही तरह की भाषा बोल रहे हैं जो आपके लिए बिलकुल मीनिंगलेस, अर्थहीन हो गई है। हम इनको पागल कहेंगे कि यह आदमी पागल है। तो हमारे बीच में से इन्हें कोई डाकिया पकड़ना पड़े जो हमारी भाषा में लिख सके। निश्चित ही, वह डाकिया ही होगा। इसलिए विवेकानंद से जरा सावधान रहना। उनका कोई अपना अनुभव बहुत गहरा नहीं है। जो वे कह रहे हैं, वह किसी और का है। हां, कहने में वे कुशल हैं, होशियार हैं। जिसका था, वह इतनी कुशलता से नहीं कह सकता था। लेकिन फिर भी वह विवेकानंद का अपना नहीं है।

ज्ञानियों की झिझक और अज्ञानियों का अति आत्मविश्वास:

इसलिए विवेकानंद की बातचीत में ओवरकाफिडेंस मालूम पड़ेगा। जरूरत से ज्यादा वे बल दे रहे हैं। वह बल कमी की पूर्ति के लिए है। उन्हें खुद भी पता है कि वे जो कह रहे हैं, वह उनका अपना अनुभव नहीं है। इसलिए ज्ञानी तो थोड़ा—बहुत हेज़िटेट करता है; वह थोड़ा—बहुत डरता है। उसके मन में पचास बातें होती हैं कि यह कहूं ऐसा कहूं वैसा कहूं गलत न हो जाए। जिसको कुछ पता नहीं है वह बेधड़क जो उसे कहना है, कह देता है; क्योंकि उसे कोई कठिनाई नहीं होती, हेज़िटेशन कभी नहीं होता; वह कह देता है कि ठीक है।

बुद्ध जैसे ज्ञानी को तो बड़ी कठिनाई थी। तो वे तो बहुत सी बातों का जवाब ही नहीं देते थे। वे कहते थे कि मैं जवाब ही नहीं दूंगा, क्योंकि कहने में बड़ी कठिनाई है। कुछ लोग तो कहते, इससे तो हमारे गांव में अच्छे आदमी हैं, वे जवाब तो देते हैं, वे ज्यादा ज्ञानी हैं आपसे! कोई भी चीज पूछो, जवाब दे देते हैं। भगवान है कि नहीं? तो वे कहते तो हैं कि है या नहीं। उनको पता तो है। आपको पता नहीं है क्या? आप क्यों नहीं कहते कि है या नहीं?

अब बुद्ध की बड़ी मुश्किल है। है कहें तो मुश्किल है, नहीं कहें तो मुश्किल है। तो वे हेज़िटेट करेंगे, वे कहेंगे कि नहीं भई, इस संबंध में बात ही मत करो, कुछ और बातें करते हैं। स्वभावत: हम कहेंगे कि फिर पता नहीं है आपको, यही कह दो। यह भी बुद्ध नहीं कह सकते, क्योंकि पता तो है। और हमारी कोई भाषा काम नहीं करती।

इसलिए बहुत बार ऐसा हुआ है कि रामकृष्ण जैसे बहुत लोग पृथ्वी पर अपनी बात को बिना कहे खो गए हैं। वे नहीं कह पाते, क्योंकि यह बहुत रेअर कांबिनेशन है कि एक आदमी जाने भी और कह भी सके। और जब यह घटना घटती है तो ऐसे ही व्यक्ति को हम तीर्थंकर, अवतार, पैगंबर, इस तरह के शब्दों का उपयोग करने लगते हैं। उसका कारण यह नहीं है कि इस तरह के और लोग नहीं होते, इस तरह के और भी लोग हुए हैं, लेकिन कह नहीं सके।

बुद्ध से किसी ने पूछा कि आपके पास ये दस हजार भिक्षु हैं, चालीस साल से आप लोगों को समझा रहे हैं, इनमें से कितने लोग आपकी स्थिति को उपलब्ध हुए? बुद्ध ने कहा, बहुत लोग हैं इनमें। तो उस आदमी ने कहा, आप जैसा कोई पता तो नहीं चलता हमें। बुद्ध ने कहा, फर्क इतना ही है कि मैं कह सकता हूं वे कह नहीं सकते, और कोई फर्क नहीं है। मैं भी न कहूं तो तुम मुझको भी नहीं पहचान सकोगे, बुद्ध ने कहा, क्योंकि तुम बोलना पहचानते हो, तुम जानना थोड़े ही पहचानते हो। यह संयोग की बात है कि मैं बोल भी सकता हूं जानता भी हूं; यह बिलकुल संयोग की बात है।

तो इसलिए वह थोड़ी सी कठिनाई विवेकानंद के लिए हुई जो उनको अगले जन्मों में पूरी करनी पड़े, लेकिन वह कठिनाई जरूरी थी। इसलिए रामकृष्‍ण को लेनी मजबूरी थी। लेनी पड़ी। और नुकसान लेकिन सपने का है। फिर भी मैं कहता हूं सपने में भी क्यों नुकसान उठाना? सपना ही देखना है तो अच्छा क्यों नहीं देखना, क्यों बुरा देखना?

मैंने सुना है कि— ईसप की एक फेबल है—कि एक बिल्ली एक वृक्ष के नीचे बैठी है और सपना देख रही है। एक कुत्ता भी उधर आकर विश्राम कर रहा है। और बिल्ली बड़ा आनंद ले रही है, बहुत ही आनंद ले रही है सपने में। उसकी प्रसन्नता देखकर कुत्ता भी बहुत हैरान है कि क्या देख रही है! क्या कर रही है! जब उसकी आंख खुली तो उसने पूछा कि जाने से पहले जरा बता दे कि क्या मामला था कि इतनी प्रसन्न हो रही थी? उसने कहा कि बड़ा ही आनंद आ रहा था, एकदम चूहे बरस रहे थे आकाश से। तो उस कुत्ते ने कहा, नासमझ! चूहे कभी बरसते ही नहीं। हम भी सपने देखते हैं, हमेशा हड्डियां बरसती हैं। और हमारे शास्त्रों में भी लिखा हुआ है कि चूहे कभी नहीं बरसते, जब बरसती हैं, हड्डियां बरसती हैं। मूरख बिल्ली, अगर सपना ही देखना था तो हड्डी बरसने का देखना था।

कुत्ते के लिए हड्डी अर्थपूर्ण है। कुत्ते काहे के लिए चूहे बरसाए। लेकिन बिल्ली के लिए हड्डी बिलकुल बेकार है। तो वह कुत्ता उससे कहता है, सपना ही देखना था तो कम से कम हड्डी का देखती। यानी एक तो सपना देख रही है, यही बेकार की बात है, फिर वह भी चूहे का देख रही है, और भी बेकार बात है।

तो मैं आपसे कहता हूं सपना ही देखना हो तो दुख का क्यों देखना? और जागना ही है, तो जहां तक बने—जहां तक बने— अपनी सामर्थ्य, अपनी शक्ति, अपने संकल्प का पूरे से पूरा जितना प्रयोग आप कर सकें, वह करें, और रत्ती भर दूसरे की प्रतीक्षा न करें कि वह सहायता पहुंचाएगा। सहायता मिलेगी, वह दूसरी बात है; आप प्रतीक्षा न करें कि सहायता मिलेगी। क्योंकि जितनी आप प्रतीक्षा करेंगे उतना ही आपका संकल्प क्षीण हो जाएगा। आप तो फिकर ही छोड़ दें कि कोई सहायता करनेवाला है, आप तो अपनी पूरी ताकत अकेला समझकर लगाएं कि मैं अकेला हूं। हां, सहायता बहुत तरह से मिल जाएगी, लेकिन वह बिलकुल दूसरी बात है।

साधना में स्वावलंबी बनना सदा उपादेय:

इसलिए मेरा जोर जो है वह निरंतर आपकी पूरी संकल्प शक्ति पर है, ताकि कोई और जरा सी भी बाधा आपके लिए न हो। और जब दूसरे से मिले तो वह आपकी मांगी हुई न हो, और न आपकी अपेक्षा हो, वह ऐसे ही आ जाए जैसे हवा आती है और चली जाए।

इस वजह से मैंने कहा कि नुकसान पहुंचा। और जितने दिन वे जिंदा रहे, उतने दिन बहुत तकलीफ में रहे; क्योंकि जो वे कह रहे थे, उस कही हुई बात की दूसरे की आंखों में तो झलक मालूम पड़ती थी, क्योंकि वह चौंक गया है, खुश हुआ है, लेकिन खुद उन्हें पता था कि यह मुझे नहीं हो रहा है। अब यह बड़ी कठिनाई की बात है न कि मैं आपको मिठाई की खबर लेकर आऊं और मुझे स्वाद भी न हो! बस एक दफे सपने में थोड़ा सा दिखाई पड़ा हो, फिर सपना टूट गया हो, और उसने कहा कि अब सपना ही नहीं आएगा दुबारा तुम्हें। बस अब तुम लोगों तक खबर ले जाओ।

तो विवेकानंद का अपना कष्ट है। लेकिन वे सबल व्यक्ति थे, इस कष्ट को उन्होंने झेला। यह भी करुणा का हिस्सा है। लेकिन इसलिए आपको झेलना चाहिए, यह प्रयोजन नहीं है।

विवेकानंद को समाधि की मानसिक झलक:

विवेकानंद को जो समाधि का अनुभव हुआ था रामकृष्ण के संपर्क मे वह प्रामाणिक अनुभव था समाधि का?

प्राथमिक कहो। प्रामाणिक तो उतना बड़ा सवाल नहीं है—प्राथमिक, अत्यंत प्राथमिक, जिसमें एक झलक उपलब्ध हो जाती है। और वह झलक, निश्चित ही, बहुत गहरी नहीं हो सकती और आत्मिक भी नहीं हो सकती; बहुत गहरी नहीं हो सकती। बिलकुल ही जहां हमारा मन समाप्त होता है और आत्मा शुरू होती है, उस परिधि पर घटेगी वह घटना। साइकिक ही होगी गहरे में, और इसलिए खो गई। और उसको उससे गहरा होने नहीं दिया गया। उससे गहरा हो जाए तो रामकृष्ण डरे हुए थे। उससे गहरा हो जाए तो यह आदमी काम का न रह जाए। और उनको इतनी चिंता थी काम की कि उन्हें यह खयाल ही नहीं था कि यह कोई जरूरी नहीं है कि यह आदमी काम का न रह जाए! बुद्ध चालीस साल तक बोलते रहे हैं, जीसस बोलते रहे हैं, महावीर बोलते रहे हैं, कोई इससे कठिनाई नहीं आ जाती। मगर रामकृष्‍ण का भय स्वाभाविक था, उनको कठिनाई थी। तो जिसको जो कठिनाई होती है, वही उनके खयाल में थी। इसलिए बहुत ही छोटी सी झलक उनको मिली। प्रामाणिक तो है; जितने दूर तक जाती है उतने दूर तक प्रामाणिक है। लेकिन प्राथमिक है, बहुत गहरी नहीं है। नहीं तो लौटना मुश्किल हो जाए।

समाधि का आंशिक अनुभव भी हो सकता है?

आंशिक नहीं है, प्राथमिक है। इन दोनों में फर्क है। आंशिक अनुभव नहीं है यह। और समाधि का अनुभव आंशिक हो ही नहीं सकता। लेकिन समाधि की मानसिक झलक हो सकती है। अनुभव तो आध्यात्मिक होगा, झलक मानसिक हो सकती है। जैसे, मैं एक पहाड पर चढ़कर सागर को देख लूं। निश्चित ही मैंने सागर देखा, लेकिन सागर बहुत फासले पर है। मैं सागर के तट पर नहीं पहुंचा; मैंने सागर को छुआ भी नहीं, मैंने सागर का जल चखा भी नहीं; मैं सागर में उतरा भी नहीं; मैं नहाया भी नहीं, डूबा भी नहीं, मैंने एक पहाड़ की चोटी पर से सागर देखा और वापस चोटी से खींच लिया गया।

तो मेरे अनुभव को सागर का आंशिक अनुभव कहोगे?

नहीं, आंशिक भी नहीं कह सकते, क्योंकि मैंने छुआ भी नहीं—जरा भी नहीं छुआ, एक इंच भी नहीं छुआ, एक बूंद भी नहीं छुई, एक बूंद चखी भी नहीं।

लेकिन फिर भी क्या मेरे अनुभव को अप्रामाणिक कहोगे?

नहीं, देखा तो है! मेरे देखने में तो कोई कमी नहीं है, सागर मैंने देखा। सागर होकर नहीं देखा, डूबकर नहीं देखा, दूर किसी पीक से, किसी दूर शिखर से दिखाई पड़ गया!

तो तुम अपनी आत्मा को कभी अपने शरीर की ऊंचाई पर खड़े होकर भी देख लेते हो। शरीर की भी ऊंचाइयां हैं, शरीर के भी पीक एक्सपीरिएंसेस हैं। शरीर की भी कोई अनुभुति अगर बहुत गहरी हो तो तुम्हें आत्मा की झलक मिलती है। जैसे अगर बहुत वेल—बीइंग का अनुभव हो शरीर में, तुम परिपूर्ण स्वस्थ हो, और तुम्हारा शरीर स्वास्थ्य से लबालब भरा है, तो तुम शरीर की एक ऐसी ऊंचाई पर पहुंचते हो जहां से तुम्हें आत्मा की झलक दिखाई पड़ेगी। और तब तुम अनुभव कर पाओगे कि नहीं, मैं शरीर नहीं हूं मैं कुछ और भी हूं। लेकिन तुम आत्मा को जान नहीं लिए। लेकिन शरीर की एक ऊंचाई पर चढ़ गए।

मन की भी ऊंचाइयां हैं। जैसे कि कोई बहुत गहरे प्रेम में—सेक्स में नहीं, सेक्स शरीर की ही संभावना है। और सेक्स भी अगर बहुत गहरा और पीक पर हो, तो वहां से भी तुम्हें आत्मा की एक झलक मिल सकेगी। लेकिन बहुत दूर की झलक, बिलकुल दूसरे छोर से।

लेकिन प्रेम की अगर बहुत गहराई का अनुभव हो तुम्हें, और किसी को जिसे तुम प्रेम करते हो उसके पास तुम क्षण भर को चुप बैठे हो, सब सन्नाटा है, सिर्फ प्रेम रह गया है तुम्हारे दोनों के बीच डोलता हुआ, और कुछ शब्द नहीं, कोई भाषा नहीं, कुछ लेन—देन नहीं, कुछ आकांक्षा नहीं, सिर्फ प्रेम की तरंगें यहां से वहां पार होने लगी हैं, तो उस प्रेम के क्षण में भी तुम एक ऐसे शिखर पर चढ़ जाओगे जहां से तुम्हें आत्मा की झलक मिल जाए। प्रेमियों को भी आत्मा की झलक मिली है।

एक चित्रकार एक चित्र बना रहा है, और इतना डूब जाए उस चित्र को बनाने में कि एक क्षण में परमात्मा हो जाए, स्रष्टा हो जाए। जब एक चित्रकार चित्र को बनाता है तो वह उसी अनुभूति को पहुंच जाता है कि अगर भगवान ने कभी दुनिया बनाई होगी तो पहुंचा होगा, उस क्षण में। तो उस पीक पर...... .लेकिन वह मन की है ऊंचाई। उस जगह से वह एक क्षण को स्रष्टा है, क्रिएटर है; एक झलक मिलती है उसको आत्मा की। इसलिए कई बार वह उसे समझ लेता है कि पर्याप्त हो गई। वह भूल हो जाती है।

संगीत में मिल सकती है कभी, काव्य में मिल सकती है कभी, प्रकृति के सौंदर्य में मिल सकती है कभी, और बहुत जगह से मिल सकती है, लेकिन हैं सब दूर की चोटियां। समाधि में डूबकर मिलती है। बाहर से तो बहुत शिखर हैं जिन पर चढ़कर तुम झांक ले सकते हो।

तो यह जो अनुभुति है विवेकानंद की, यह भी मन के ही तल की है; क्योंकि मैंने तुमसे कहा कि दूसरा तुम्हारे मन तक आंदोलन कर सकता है। तो एक पीक पर चढ़ा दिया है!

समाधि की मानसिक झलक भी बहुत महत्वपूर्ण:

यानी ऐसा समझो कि एक छोटा बच्चा है, मैंने उसे कंधे पर बिठा लिया, और उसने देखा, और मैंने उसे कंधे से नीचे उतार दिया। क्योंकि मेरा शरीर उसका शरीर नहीं हो सकता। उसके पैर तो जितने बड़े हैं उतने ही बड़े हैं। अपने पैर से तो जब वह खुद बड़ा होगा, तब देखेगा। लेकिन मैंने कंधे पर बिठाकर उसको कुछ दिखा दिया। वह कह सकता है जाकर कि मैंने देखा। फिर भी शायद लोग उसका भरोसा भी न करें। वे कहें, तूने देखा कैसे होगा? क्योंकि तेरी तो ऊंचाई नहीं है इतनी कि तू देख सके! लेकिन किसी के कंधे पर क्षण भर बैठकर देखा जा सकता है।

पर वह है संभावना सब मन की, इसलिए वह आध्यात्मिक नहीं है। इसलिए अप्रामाणिक नहीं कहता हूं लेकिन प्राथमिक कहता हूं। और प्राथमिक अनुभूति शरीर पर भी हो सकती है, मन पर भी हो सकती है। आंशिक नहीं है वह, है तो पूरी, पर मन की पूरी अनुभुति है वह। आत्मा की पूरी अनुभूति नहीं है। आत्मा की पूरी होगी तो वहां से लौटना नहीं है, वहां से कोई चाबी नहीं रख सकता तुम्हारी। और वहां से कोई यह नहीं कह सकता कि जब हम चाबी लौटाएंगे तब होगा। वहां से फिर कोई वश नहीं है। इसलिए वहां अगर किसी को काम लेना हो तो उसके पहले ही उसे रोक लेना पड़ता है। उसे उस तक नहीं जाने देना पड़ता है, नहीं तो फिर कठिनाई हो जाएगी।

है तो प्रामाणिक, लेकिन प्रामाणिकता जो है वह साइकिक है, स्प्रिचुअल नहीं है। वह भी छोटी घटना नहीं है, क्योंकि सभी को वह नहीं हो सकती, उसके लिए भी मन का बड़ा प्रबल होना जरूरी है। वह भी सबको नहीं हो सकती।

विवेकानंद का शोषण किया उन्होंने ऐसा कहा जा सकता है?

कहने में कोई कठिनाई नहीं है। लेकिन शब्द जो है वह बहुत ज्यादा, जिसको कहें सिर्फ शब्द सूचक नहीं है वह, उसमें निंदा भी है। इसलिए नहीं कहना चाहिए। शोषण शब्द में निंदा है, गहरे में उसमें कडेमनेशन है। शोषण नहीं किया; क्योंकि रामकृष्‍ण को कुछ भी नहीं लेना—देना है विवेकानंद से। लेकिन विवेकानंद के द्वारा किसी को कुछ मिल सकेगा, यह खयाल है। इस अर्थ में शोषण किया कि उपयोग तो किया, उपयोग तो किया ही। लेकिन उपयोग और शोषण में बहुत फर्क है। और शोषण शब्द, जहां मैं अहंकेंद्रित, अपने अहंकार के लिए कुछ खींच रहा हूं और उपयोग कर रहा हूं वहां तो शोषण हो जाता है; लेकिन जहां मैं जगत, विश्व, सबके लिए कुछ कर रहा हूं वहां शोषण का कोई कारण नहीं है।

और फिर यह भी तो खयाल में नहीं है तुम्हें कि अगर रामकृष्ण वह झलक न दिखाते तो विवेकानंद को वह भी हो जाती, यह भी थोड़े ही पक्का है। इसी जन्म में हो जाती, यह भी थोड़े ही पक्का है। और इस बात को जो जानते हैं, वे तय कर सकते हैं। जैसे, हो सकता है— जैसी मेरी समझ है, यही है! लेकिन अब इसके लिए कोई प्रमाण नहीं जुटाए जा सकते हैं। रामकृष्ण का यह कहना कि मृत्यु के तीन दिन पहले तुझे चाबी वापस लौटा दूंगा, कुल इसका कारण इतना भी हो सकता है कि रामकृष्ण की समझ में विवेकानंद अपने ही आप प्रयास करते तो मरने के तीन दिन पहले समाधि को उपलब्ध हो सकते थे। रामकृष्ण का ऐसा खयाल है कि अगर यह आदमी अपने आप ही चलता है तो मरने के तीन दिन पहले इस जगह पहुंच जाता। तो उस दिन चाबी लौटा देंगे। वे भी चाबी कैसे लौटाएंगे, क्योंकि रामकृष्ण तो मर गए! रामकृष्‍ण तो मर गए, चाबी लौटानेवाला भी मर गया, लेकिन चाबी लौट गई तीन दिन पहले। तो इसकी बहुत संभावना है। क्योंकि तुम्हारे व्यक्तित्व को जितना तुम नहीं जानते, उतना जो जितनी गहराइयों में गया है उतनी गहराइयों में तुम्हें जान सकता है; और यह भी जान सकता है कि तुम अगर अपने ही मार्ग से चलते रहो...।

स्वभावत:, अगर मैं एक यात्रा पर गया और एक पहाड़ चढ़ गया। पहाड़ का रास्ता मुझे मालूम है, सीढ़ियां मुझे मालूम हैं, समय कितना लगता है वह मुझे मालूम है, कठिनाइयां कितनी हैं वे मुझे मालूम हैं। मैं तुम्हें पहाड़ चढ़ते देख रहा हूं; मैं जानता हूं कि तीन महीने लग जाएंगे; समझ रहे हो न? मैं जानता हूं कि तुम जिस रफ्तार से चल रहे हो, जिस ढंग से चल रहे हो, जिस ढंग से भटक रहे हो, डोल रहे हो, उसमें इतना समय लग जाएगा। तो बहुत गहरे में तो इतना भी शोषण नहीं है। पर मैंने तुम्हें वहीं बीच में आकर, ऊपर उठाकर, पहाड़ के ऊपर जो है उसकी झलक दिखा दी है और तुम्हें उसी जगह छोड़ दिया और कहा कि तीन महीने बाद रास्ता मिल जाएगा; अभी तीन महीने तक रास्ता नहीं मिलेगा।

तो इतना, भीतर इतना सूक्ष्म है बहुत सा और इतना कांप्लेक्स है कि तुम्हें एकदम से ऊपर से नहीं दिखाई पड़ता, खयाल में नहीं आता। अब जैसे अभी कल निर्मल गई वहां वापस, तो उसको किसी ने कहा हुआ है कि त्रेपन वर्ष की उम्र में मर जाएगी; तो मैंने उसकी गारंटी ले ली कि त्रेपन वर्ष में नहीं मरेगी। अब यह गारंटी पूरी मैं नहीं करूंगा, पर यह गारंटी पूरी हो जाएगी। लेकिन अगर वह बच गई त्रेपन वर्ष के बाद, तो वह कहेगी कि मैंने गारंटी पूरी की।

विवेकानंद कहेंगे कि चाबी तीन दिन पहले लौटा दी। बाकी किसको चाबी लौटानी है!

ऐसा भी हो सकता है कि रामकृष्ण जानते रहे हों कि विवेकानंद को साधना की लंबी यात्रा बिना सफलता के करनी है जिसमें उन्हें बहुत दुख भी होगा। इसलिए उन्होंने दुख दूर करने के लिए पहले ही विवेकानंद को समाधि की एक झलक बता दी?

'ऐसा भी हो सकता है', ऐसा करके कभी सोचना ही मत, क्योंकि इसका कोई अंत नहीं है। ' ऐसा भी हो सकता है ', ऐसा करके सोचने का कोई मतलब नहीं होता। इसलिए मतलब नहीं होता कि फिर तुम कुछ भी सोचती रहोगी, और उसका कोई अर्थ नहीं है। इसलिए ऐसा कभी मत सोचना कि ऐसा भी हो सकता है, ऐसा भी हो सकता है, ऐसा भी हो सकता है। जितना हो सकता है पता हो, उतना ही सोचना। ऐज इफ करके नहीं सोचा चाहिए। जहां तक बने नहीं सोचना चाहिए। उससे कोई मतलब नहीं है, क्योंकि वे बिलकुल ही अर्थहीन रास्ते हैं, जिन पर हम कुछ भी सोचते रहें, उससे कुछ होगा नहीं। और उससे एक नुकसान होगा। वह नुकसान यह होगा कि ' जैसा है', उसका पता चलने में बहुत देर लग जाएगी।

इसलिए हमेशा इसकी फिक्र करना कि कैसा है? और जैसा है, उसको जानना हो, तो ऐसा हो सकता है, ऐसा हो सकता है, ऐसा हो सकता है, यह अपने मन से काट डालना बिलकुल। इनको जगह ही मत देना। न मालूम हो तो समझना कि मुझे मालूम नहीं कि कैसा है। लेकिन यह अज्ञान की जो स्थिति है कि मुझे मालूम नहीं है, इसे इस ज्ञान से मत ढांक लेना कि ऐसा भी हो सकता है। क्योंकि हम ऐसे ढांके हुए हैं बहुत सी बातें। हम सब लोग इस तरह सोचते रहते हैं। इससे बची तो हितकर है।

शक्तिपात के नाम पर शोषण:

शक्तिपात के नाम पर साइकिक एक्सप्लायटेशन संभव है क्या? कैसे संभव है और उससे साधक बचे कैसे?

संभव है, शक्तिपात के नाम पर बहुत आध्यात्मिक शोषण संभव है। असल में, जहां भी दावा है, वहां शोषण होगा। और जहां कोई कहता है, मैं कुछ दूंगा, वह लेगा भी कुछ। क्योंकि देना जो है, वह बिना लेने के नहीं हो सकता। जहां कोई कहेगा, मैं कुछ देता हूं वह तुमसे वापस भी कुछ लेगा। कॉइन कोई भी हो—वह धन के रूप में ले, आदर के रूप में ले, श्रद्धा के रूप में ले—किसी भी रूप में ले, वह लेगा जरूर। जहां देना है— आग्रहपूर्वक, दावेपूर्वक—वहां लेना है। और जो देने का दावा कर रहा है, वह जो देगा, उससे ज्यादा लेगा। नहीं तो बाजार में चिल्लाने की उसे कोई जरूरत न थी। असल में, वह दे इसी तरह रहा है, जैसे कोई मछली मारनेवाला कांटे पर आटा लगाता है; क्योंकि मछली कांटे नहीं खाती। हो सकता है, किसी दिन मछलियों को समझाया—बुझाया जा सके, वे सीधा कांटा खा लें। अभी तक कोई मछली सीधा कांटा नहीं खाती। उसके ऊपर आटा लगाना पड़ता है। हां, मछली आटा खा लेती है। और आटे के दावे की वजह से कांटे के पास आ जाती है। आटा मिलेगा, इस आशय में कांटे को भी गटक जाती है। गटकने पर पता चलता है कि आटा तो व्यर्थ था कांटा असली था। लेकिन तब तक कांटा छिद गया होता है।

दावेदार गुञ्चों से बचो:

तो जहां दावा है—कोई कहे कि मैं शक्तिपात करूंगा, मैं ज्ञान दिलवा दूंगा, मैं समाधि में पहुंचा दूंगा, मैं ऐसा करूंगा, मैं वैसा करूंगा—जहां ये दावे हों, वहां सावधान हो जाना। क्योंकि उस जगत का आदमी दावेदार नहीं होता। उस जगत के आदमी से अगर तुम कहोगे भी जाकर कि आपकी वजह से मुझ पर शक्तिपात हो गया, तो वह कहेगा, तुम किसी भूल में पड़ गए; मुझे तो पता ही नहीं, मेरी वजह से कैसे हो सकता है! उस परमात्मा की वजह से ही हुआ होगा। वहां तो तुम धन्यवाद देने जाओगे तो भी स्वीकृति नहीं होगी कि मेरी वजह से हुआ है। वह तो कहेगा, तुम्हारी अपनी ही वजह से हो गया होगा। तुम किस भूल में पड़ गए हो, वह परमात्मा की कृपा से हो गया होगा। मैं कहां हूं! मैं किस कीमत में हूं! मैं कहां आता हूं! जीसस निकल रहे हैं एक गांव से, और एक बीमार आदमी को लोग उनके पास लाए हैं। उन्होंने उसे गले से लगा लिया और वह ठीक हो गया। और वह आदमी कहता है कि मैं आपको कैसे धन्यवाद दूं क्योंकि आपने मुझे ठीक कर दिया है। जीसस ने कहा कि ऐसी बातें मत कर; जिसे धन्यवाद देना है उसे धन्यवाद दे! मैं कौन हूं? मैं कहां आता हूं? उस आदमी ने कहा, आपके सिवाय तो यहां कोई भी नहीं है। तो जीसस ने कहा, हम—तुम दोनों नहीं हैं; जो है, वह तुझे दिखाई ही नहीं पड़ रहा; उससे ही सब हो रहा है। ही हैज हील्ड यू! उसी ने तुझे स्वस्थ कर दिया है! अब यह जो आदमी है, यह कैसे शोषण करेगा? शोषण करने के लिए आटा लगाना पड़ता है कांटे पर। यह तो, कांटा तो दूर, आटा भी मेरा है, यह भी मानने को राजी नहीं है। इसका कोई उपाय नहीं है। तो जहां तुम्हें दावा दिखे—साधक को—वहीं सम्हल जाना। जहां कोई कहे कि ऐसा मैं कर दूंगा, ऐसा हो जाएगा, वहां वह तुम्हारे लिए तैयार कर रहा है; वह तुम्हारी मांग को जगा रहा है; वह तुम्हारी अपेक्षा को उकसा रहा है; वह तुम्हारी वासना को त्वरित कर रहा है। और जब तुम वासनाग्रस्त हो जाओगे, कहोगे कि दो महाराज! तब वह तुमसे मांगना शुरू कर देगा। बहुत शीघ्र तुम्हें पता चलेगा कि आटा ऊपर था, कांटा भीतर है। इसलिए जहां दावा हो, वहां सम्हलकर कदम रखना, वह खतरनाक जमीन है। जहां कोई गुरु बनने को बैठा हो, उस रास्ते से मत निकलना; क्योंकि वहां उलझ जाने का डर है। इसलिए साधक कैसे बचे? बस वह दावे से बचे तो सबसे बच जाएगा। वह दावे को न खोजे, वह उस आदमी की तलाश न करे जो दे सकता है। नहीं तो झंझट में पड़ेगा। क्योंकि वह आदमी भी तुम्हारी तलाश कर रहा है—जो फंस सकता है। वे सब घूम रहे हैं। वह भी घूम रहा है कि कौन आदमी को चाहिए। तुम मांगना ही मत, तुम दावे को स्वीकार ही मत करना। और तब..

पात्र बनो, गुरु मत खोजो:

तुम्हें जो करना है, वह और बात है। तुम्हें जो तैयारी करनी है, वह तुम्हारे भीतर तुम्हें करनी है। और जिस दिन तुम तैयार होओगे, उस दिन वह घटना घट जाएगी; उस दिन किसी भी माध्यम से घट जाएगी। माध्यम गौण है; खूंटी की तरह है। जिस दिन तुम्हारे पास कोट होगा, क्या तकलीफ पड़ेगी खूंटी खोजने में? कहीं भी टल दोगे। नहीं भी खूंटी होगी तो दरवाजे पर टांग दोगे। दरवाजा नहीं होगा, झाड़ की शाखा पर टांग दोगे। कोई भी खूंटी का काम कर देगा। असली सवाल कोट का है। लेकिन कोट नहीं है हमारे पास, खूंटी दावा कर रही है कि इधर आओ, मैं खूंटी यहां हूं! तुम फंसोगे। कोट तो तुम्हारे पास नहीं है, खूंटी के पास जाकर भी क्या करोगे? खतरा यही है कि खूंटी में तुम्हीं न टैग जाओ। क्योंकि कोट तो नहीं है तुम्हारे पास। इसलिए अपनी पात्रता खोजनी है, अपनी योग्यता खोजनी है, अपने को उस योग्य बनाना है कि मैं किसी दिन प्रसाद को ग्रहण करने योग्य बन सकूं। फिर तुम्हें चिंता नहीं लेनी है, वह तुम्हारी चिंता नहीं है। इसलिए कृष्ण जो कहते हैं अर्जुन को, वह ठीक ही कहते हैं। उसका मतलब ही इतना है। वे कहते हैं तू कर्म कर और फल परमात्मा पर छोड़ दे; उसकी तुझे फिकर नहीं करनी है। उसकी तूने फिकर की तो कर्म में बाधा पड़ती है। क्योंकि उसकी फिकर की वजह से ऐसा लगता है कर्म क्या करना, फल की पहले चिंता करो! उसकी वजह से ऐसा लगता है कि क्या करना है मुझे! फल क्या होगा, इसको देखूं! और तब गलती सुनिश्चित हो जानेवाली है। इसलिए कर्म की फिकर ही अकेली फिकर है हमारी; हम अपने को पात्र बनाने योग्य करते रहें। जिस दिन क्षमता हमारी पूरी होगी—ऐसे ही, जैसे जिस दिन बीज की क्षमता फूटने की पूरी होती है, उस दिन सब मिल जाता है। जिस दिन फूल खिलने को पूरा तैयार होता है, कली टूटने को तैयार होती है, सूरज तो निकल ही आता है। उसमें कोई अड़चन नहीं है। सूरज सदा तैयार है। लेकिन हमारे पास कली नहीं है खिलने को, सूरज निकल गया है, होगा क्या? इसलिए सूरज की तलाश मत करो, अपनी कली को गहरा करने की फिकर करो, सूरज सदा निकला हुआ है, वह तत्काल उपलब्ध हो जाता है।

खाली पात्र भर दिया जाता है:

इस जगत में पात्र एक क्षण को भी खाली नहीं रह जाता है; जिस तरह की भी पात्रता हो, वह तत्काल भर दी जाती है। असल में, पात्रता का हो जाना और भर जाना दो घटनाएं नहीं, एक ही घटना के दो पहलू हैं। जैसे हम इस कमरे की हवा बाहर निकाल दें, दूसरी हवा इस कमरे की खाली जगह को तत्काल भर देगी। ये दो हिस्से नहीं हैं। इधर हम निकाल नहीं पाए कि उधर नई हवा ने दौड़ना शुरू कर दिया। ऐसे ही अंतर—जगत के नियम हैं हम इधर तैयार नहीं हुए कि वहां से जो हमारी तैयारी की मांग है, वह उतरनी शुरू हो जाती है। लेकिन कठिनाई हमारी है कि हम तैयार नहीं होते और मांग हमारी शुरू हो जाती है; तब झूठी मांग के लिए झूठी सप्लाई भी हो जाती है। अब इधर मैं बहुत हैरान होता हूं ऐसे लोग हैरानी में डालते हैं। एक आदमी आता है, वह कहता है, मेरा मन बड़ा अशांत है, मुझे शांति चाहिए। उससे आधा घंटा मैं बात करता हूं मैं कहता हूं कि सच में ही तुम्हें शांति चाहिए? तो वह कहता है, शांति तो अभी क्या है कि मेरे लड़के को पहले नौकरी चाहिए, उसी की वजह से अशांति है, नौकरी मिल जाए तो सब ठीक हो जाए। तो अब यह आदमी कहता हुआ आया था कि मुझे शांति चाहिए, वह इसकी जरूरत नहीं है, इसकी असली जरूरत दूसरी है, जिसका शांति से कुछ लेना—देना नहीं है; इसकी जरूरत है कि इसके लड़के को नौकरी चाहिए। अब यह मेरे पास, गलत आदमी के पास आ गया।

धर्म के दुकानदारों का रहस्य:

अब वह जो बाजार में दुकान लेकर बैठा है, वह कहता है, नौकरी चाहिए? इधर आओ! हम नौकरी भी दिलवा देंगे और शांति भी मिल जाएगी। इधर जो भी आते हैं, उनको नौकरी मिल जाती है; इधर जो आते हैं, उनका धन बढ़ जाता है; इधर जो आते हैं, उनकी दुकान चलने लगती है। और उस दुकान के आसपास दस—पांच आदमी आपको मिल जाएंगे, जो कहेंगे, मेरे लड़के को नौकरी मिल गई, मेरी पत्नी मरते से बच गई, मेरा मुकदमा हारते से जीत गया, धन के अंबार लग गए; वे दस आदमी उस दुकान के आसपास मिल जाएंगे। ऐसा नहीं कि वे झूठ बोल रहे हैं! ऐसा नहीं कि वे झूठ बोल रहे हैं, ऐसा भी नहीं कि वे किराए के आदमी हैं, ऐसा भी नहीं कि वे दुकान के दलाल हैं। नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं है। जब हजार आदमी किसी दुकान पर नौकरी खोजने आते हैं, दस को मिल ही जाती है। जिनको मिल जाती है वे रुक जाते हैं, नौ सौ निन्यानबे चले जाते हैं। वे जो रुक जाते हैं, वे खबर करते रहते हैं; धीरे— धीरे उनकी भीड़ बड़ी होती जाती है। इसलिए हर दुकान के पास आथेंटिक हैं वे दावेदार। वे जो कह रहे हैं कि मेरे लड़के को नौकरी मिली, इसमें झूठ नहीं है कोई; यह कोई खरीदा हुआ आदमी नहीं है। यह भी आया था, इसके लड़के को मिली है; जिनको नहीं मिली है, वे जा चुके हैं, वे दूसरे गुरु को खोज रहे हैं कि कहां मिले; जहां मिले वहां चले गए हैं। यहां वे ही रह गए हैं जिनको मिल गई है। वे हर साल लौट आते हैं, हर त्योहार पर लौट आते हैं; उनकी भीड़ बढ़ती चली जाती है। और इस आदमी के आसपास एक वर्ग खड़ा हो जाता है, जो सुनिश्चित प्रमाण बन जाता है कि भई मिली है इतने लोगों को, तो मुझे क्यों न मिलेगी! यह आटा बन जाता है, और कांटा बीच में है। और ये सारे लोग आटे बन जाते हैं। और आदमी फंस जाता है। मांगना ही मत; नहीं तो फंसना निश्चित है। मांगना ही मत; अपने को तैयार करना। और भगवान पर छोड़ देना कि जिस दिन होता होगा, होगा; नहीं होगा तो हम समझेंगे हम पात्र नहीं थे।

प्रामाणिक शक्तिपात के बाद भटकना समाप्त:

एक साधक का कई व्यक्तियों के माध्यम से शक्तिपात लेना उचित है या हानिप्रद है? कंडक्टर बदलने में क्या— क्या हानियां संभव हैं और क्यों?

असल बात तो यह है कि बहुत बार लेने की जरूरत तभी पड़ेगी जब कि शक्तिपात न हुआ हो। बहुत लोगों से लेने की भी जरूरत तभी पड़ेगी जब कि पहले जिनसे लिया हो वह बेकार गया हो, न हुआ हो। अगर हो गया, तो बात खतम है। बहुत बार लेने की जरूरत इसीलिए पड़ती है कि दवा काम नहीं कर पाई, बीमारी अपनी जगह खड़ी है। स्वभावत:, फिर डाक्टर बदलने पड़ते हैं। लेकिन जो बीमार ठीक हो गया, वह नहीं पूछता कि डाक्टर बदलू या न बदलू। वह जो ठीक नहीं हुआ है, वह कहता है कि मैं दूसरे डाक्टर से दवा लूं या क्या करूं! दस—बीस डाक्टर बदल लेता है। तो एक तो अगर शक्तिपात की किरण उपलब्ध हुई जरा भी, तो बदलने की कोई जरूरत नहीं पड़ती है। वह प्रश्न ही नहीं है फिर उसका। नहीं उपलब्ध हुई, तो बदलना ही पड़ता है, और बदलते ही रहते हैं आदमी। और अगर उपलब्ध हुई है कभी एक से, तो फिर किसी से भी उपलब्ध होती रहे, कोई फर्क नहीं पड़ता। वे सब एक ही स्रोत से आनेवाले माध्यम ही अलग हैं, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। रोशनी सूरज से आती, कि दीये से आती, कि बिजली के बल्व से आती, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता; प्रकाश एक का ही है। उससे कोई अंतर नहीं पड़ता। अगर घटना घटी है तो कोई अंतर नहीं पड़ता, और कोई हानि नहीं है। लेकिन इसको खोजते मत फिरना, वही मैं कह रहा हूं इसे खोजते मत फिरना। यह मिल जाए रास्ते पर चलते, तो धन्यवाद दे देना और आगे बढ़ जाना। इसे खोजना मत। खोजोगे तो खतरा है। क्योंकि फिर वे जो दावेदार हैं, वे ही तो तुम्हें मिलेंगे न! वह नहीं मिलेगा जो दे सकता था; वह मिलेगा, जो कहता है, देते हैं। जो दे सकता है वह तो तुम्हें उसी दिन मिलेगा, जिस दिन तुम खोज ही नहीं रहे हो, लेकिन तैयार हो गए हो। वह उसी दिन मिलेगा। इसलिए खोजना गलत है, मांगना गलत है। होती रहे घटना, होती रहे। और हजार रास्तों से प्रकाश मिले तो हर्ज नहीं है। सब रास्ते एक ही प्रकाश के मूल स्रोत को प्रमाणित करते चले जाएंगे। सब तरफ से मिलकर वही…….

मूल स्रोत परमात्मा है:

कल मुझसे कोई कह रहा था.. .किसी साधु के पास जाकर कहा होगा कि ज्ञान अपना होना चाहिए। तो उन साधु ने कहा, ऐसा कैसे हो सकता है! ज्ञान तो सदा पराए का होता है—फलां मुनि ने फलां मुनि को दिया, उन मुनि ने उन मुनि को दिया। खुद कृष्ण गीता में कहते हैं कि उससे उसको मिला, उससे उसको मिला, उससे उसको मिला। तो कृष्ण के पास भी अपना नहीं है। तो मैंने उसको कहा कि कृष्ण के पास अपना है। लेकिन जब वे कह रहे हैं कि उससे उसको मिला, उससे उसको मिला, तो वे यह कह रहे हैं कि यह जो ज्ञान मेरा है, यह जो मुझे घटित हुआ है, यह मुझे ही घटित नहीं हुआ है, यह पहले फलां आदमी को भी घटित हुआ था; और प्रमाण है कि उसको घटित हुआ था, उसने फलां आदमी को बताया भी था; और फलां आदमी को भी घटित हुआ था, उसने उसको भी बताया था। लेकिन बताने से घटित नहीं हुआ था, घटने से बताया था। तो मुझको भी घटित हुआ है, और अब मैं तुम्हें बता रहा हूं—वे अर्जुन से कह रहे हैं। लेकिन मेरे बताने से तुम्हें घटित हो जाएगा, ऐसा नहीं है; तुम्हें घटित होगा तो तुम भी किसी को बता सकोगे, ऐसा है। उसे दूसरे से मांगते ही मत फिरना, वह दूसरे से मिलनेवाली बात नहीं है। उसकी तो तैयारी करना। फिर वह बहुत जगह से मिलेगी, सब जगह से मिलेगी। और एक दिन जिस दिन घटना घटती है, उस दिन ऐसा लगता है कि मैं कैसा अंधा हूं जो चीज सब तरफ से मिल रही थी, वह मुझे दिखाई क्यों नहीं पड़ती थी! एक अंधा आदमी है, वह दीये के पास से भी निकलता है, वह सूरज के पास से भी निकलता है, बिजली के पास से भी निकलता है, लेकिन प्रकाश नहीं मिलता। और एक दिन, जब उसकी आंख खुलती है, तब वह कहता है मैं कैसा अंधा था, कितनी जगह से निकला, सब जगह प्रकाश था और मुझे दिखाई नहीं पड़ा! और अब मुझे सब जगह दिखाई पड़ रहा है। तो जिस दिन घटना घटेगी, उस दिन तो तुम्हें सब तरफ वही दिखाई पड़ेगा; और जब तक नहीं घटी है, तब तक जहां भी दिखाई पड़े, वहां उसको प्रणाम कर लेना; जहां भी दिखाई पड़े, वहां उसे पी लेना। लेकिन मांगते मत जाना, भिखारी की तरह मत जाना; क्योंकि सत्य भिखारी को नहीं मिल सकता। उसे मांगना मत। नहीं तो कोई दुकानदार बीच में मिल जाएगा, जो कहेगा, हम देते हैं। और तब एक आध्यात्मिक शोषण शुरू हो जाएगा। तुम चलना अपनी राह— अपने को तैयार करते, अपने को तैयार करते— जहां मिल जाए, ले लेना, धन्यवाद देकर आगे बढ जाना। फिर जिस दिन तुम्हें पूरा उपलब्ध होगा, उस दिन तुम ऐसा न कह पाओगे. मुझे फलाने से मिला। उस दिन तुम यही कहोगे कि आश्चर्य है! मुझे सबसे मिला; जिनके करीब मैं गया, सभी से मिला! और तब अंतिम धन्यवाद जो है वह समस्त के प्रति हो जाता है, वह किसी एक के प्रति नहीं रह जाता।

दूसरे से आए प्रभाव की सीमा:

यह प्रश्न इसलिए आया था कि शक्तिपात का प्रभाव धीरे— धीरे कम भी तो हो सकता है।

हां—हां, वह कम होगा ही। असल में, दूसरे से कुछ भी मिलेगा तो वह कम होता चला जाएगा; वह सिर्फ झलक है। उस पर तुम्हें निर्भर भी नहीं होना है। उसे तो तुम्हें अपने भीतर ही जगाना है किसी दिन, तभी वह कम नहीं होगा। असल में, सब प्रभाव क्षीण हो जाएंगे, क्योंकि प्रभाव जो हैं वे फारेन हैं, वे विजातीय हैं, वे बाहरी हैं। मैंने एक पत्थर फेंका। तो पत्थर की कोई अपनी ताकत नहीं है। मैंने फेंका, मेरे हाथ की ताकत है। तो मेरे हाथ की ताकत जितनी लगी है, पत्थर उतनी दूर जाकर गिर जाएगा। लेकिन बीच में जब पत्थर हवा चीरेगा, तो पत्थर को खयाल हो सकता है कि अब तो मैं हवा चीरने लगा, अब तो मुझे गिरानेवाला कोई भी नहीं है। लेकिन उसे पता नहीं कि वह प्रभाव से गया है, किसी के धक्के से गया है, दूसरे का हाथ पीछे है। वह एक पचास फीट दूर जाकर गिर जाएगा। गिरेगा ही! असल में, दूसरे से आए प्रभाव की सदा सीमा होगी। वह गिर जाएगा। दूसरे से आए प्रभाव का एक ही फायदा हो सकता है, और वह यह है कि उस प्रभाव की क्षीण झलक में तुम अपने मूल स्रोत को खोज सको, तब तो ठीक। यानी मैंने एक माचिस जलाई, प्रकाश हुआ। पर मेरी माचिस कितनी देर जलेगी? अब तुम दो काम कर सकते हो. तुम यहीं अंधेरे में खड़े रहो और मेरी माचिस पर निर्भर हो जाओ— कि हम इस रोशनी में जीएंगे अब। एक घड़ी, क्षण भर भी नहीं बीतेगा, माचिस बुझ जाएगी, फिर घुप्प अंधेरा हो जाएगा। यह एक बात हुई। मैंने माचिस जलाई, घुप्प अंधेरे में थोड़ी सी रोशनी हुई, तुम एकदम दरवाजा दिखाई पड़ा और बाहर भाग गए। तुम मेरी माचिस पर निर्भर न रहे, तुम बाहर निकल गए; मेरी माचिस बुझे या जले, अब तुम्हें कोई मतलब न रहा; लेकिन तुम वहां पहुंच गए जहां सूरज है। अब कोई चीज थिर हो पाएगी। तो ये जितनी घटनाएं हैं, इनका एक ही उपयोग है कि इससे तुम समझकर कुछ कर लेना अपने भीतर, इसके लिए मत रुक जाना। इसकी प्रतीक्षा करते रहोगे तो यह तो बार—बार माचिस जलेगी, बुझेगी। फिर धीरे— धीरे कंडीशनिंग हो जाएगी। फिर तुम इसी माचिस के मोहताज हो जाओगे। फिर तुम अंधेरे में प्रतीक्षा करते रहोगे— कब जले! फिर जलेगी तो तुम प्रतीक्षा करोगे— अब बुझनेवाली है, अब बुझनेवाली है, अब गए, अब गए, अब फिर अंधेरा हो जाएगा। बस यह एक चक्कर पैदा हो जाएगा। नहीं, जब माचिस जले, तब माचिस पर मत रुकना; क्योंकि माचिस इसलिए जली है कि तुम रास्ता देखो और भागो—निकल जाओ, जितने दूर अंधेरे के बाहर जा सकते हो।

झलक पाकर अपनी राह चल देना:

दूसरे से हम इतना ही लाभ ले सकते हैं। लेकिन दूसरे से हम स्थायी लाभ नहीं ले सकते। पर यह कोई कम लाभ नहीं है। यह कोई थोड़ा लाभ नहीं है, बहुत बड़ा लाभ है; दूसरे से इतना भी मिल जाता है, यह भी आश्चर्य है। इसलिए जो दूसरा अगर समझदार होगा तो तुमसे नहीं कहेगा कि रुको। तुमसे कहेगा—माचिस चल गई, अब तुम भागो! अब तुम यहां ठहरना मत, नहीं तो माचिस तो अभी बुझ जाएगी। लेकिन अगर दूसरा तुमसे कहे कि अब रुको, देखो मैंने माचिस जलाई अंधेरे में! और किसी ने तो नहीं जलाई न, मैंने जलाई! अब तुम मुझसे दीक्षा लो; अब तुम यहीं ठहरो, अब तुम कहीं छोड्कर मत जाना, खाओ कसम! अब यह संबंध रहेगा, अब यह टूट नहीं सकता। मैंने ही माचिस जलाई! मैंने ही तुम्हें अंधेरे में दिखाया! अब तुम किसी और की माचिस के पास तो न जाओगे? अब तुम कोई और प्रकाश तो न खोजोगे? अब तुम किसी और गुरु के पास मत रुकना, सुनना भी मत, अब तुम मेरे हुए! तो फिर, तो फिर खतरा हो गया।

झलक दिखाकर बाधनेवाले तथाकथित गुरु:

इससे अच्छा था यह आदमी माचिस न जलाता। इसने बड़ा नुकसान किया। अंधेरे में तुम खोज भी लेते; किसी तरह टकराते, धक्के खाते, किसी दिन प्रकाश में पहुंच जाते; अब इस माचिस को पकडने की वजह से बड़ी मुश्किल हो गई, अब कहां जाओगे? और तब इतना भी पक्का है कि यह माचिस इस आदमी की अपनी नहीं है, यह किसी से चुरा लाया है। यह कहीं से चुराई गई माचिस है। नहीं तो इसको अब तक पता होता कि बाहर भेजने के लिए है यह, किसी को रोकने के लिए नहीं है, यहां बिठा रखने के लिए नहीं है। यह चोरी की गई माचिस है। इसलिए अब यह माचिस की दुकान कर रहा है; अब यह कह रहा है : जिन— जिनको हम झलक दिखा देंगे, उनको यहीं रुका रहना पड़ेगा; अब वे कहीं जा नहीं सकते। तब तो हइ हो गई! अंधेरा रोकता था, अब यह गुरु रोकने लगा। इससे अंधेरा अच्छा था कि कम से कम अंधेरा हाथ फैलाकर तो नहीं रोक सकता था। अंधेरे का जो रोकना था वह बिलकुल ही पैसिव था। लेकिन यह गुरु तो एक्टिव रोकेगा; यह तो हाथ पकड़कर रोकेगा, छाती अड़ा देगा बीच में, और कहेगा कि धोखा दे रहे हो! दगा कर रहे हो! अभी एक लड़की ने मुझे आकर कहा कि उसके गुरु ने उससे कहा कि तुम उनके पास क्यों गई? यह तो ऐसे ही है, जैसे कोई पत्नी अपने पति को छोड्कर चली जाए! गुरु कह रहा है उससे कि यह तो जैसे पत्नीव्रत और पतिव्रत एक के साथ होता है, ऐसा गुरु को छोड्कर चला जाए कोई दूसरे के पास, तो यह महान पाप है! यह चुराई हुई माचिसवाला अब माचिस से काम चलाएगा। और चुराई जा सकती हैं माचिसें, इसमें कोई कठिनाई नहीं है, शास्त्रों में बहुत माचिसें उपलब्ध हैं, उनको कोई चुरा सकता है।

क्या चुराई हुई माचिस जल सकती है?

जल सकने का मतलब यह है कि……. असल में, अंधेरे में मजा ऐसा है…… अंधेरे में मजा ऐसा है, जिसने प्रकाश देखा ही नहीं, उसको कौन सी चीज जलती हुई बताई जा रही है, यह भी तय करना मुश्किल है। समझे न? जिसने प्रकाश देखा ही नहीं, उसे कौन सी चीज जली हुई बताई जा रही है, यह पक्का करना बहुत मुश्किल है। यह तो प्रकाश के बाद उसको पता चलेगा कि तुम क्या जला रहे थे, क्या नहीं जला रहे थे! वह जल भी रही थी कि नहीं जल रही थी! कि आंख बंद करके समझा रहे थे कि जल गई! वह सब तो तुम्हें प्रकाश दिखाई पड़ेगा, तब तुम्हें पता चलेगा। जिस दिन प्रकाश दिखाई पड़ेगा, उस दिन सौ में से निन्यानबे गुरु अंधेरे के साथी और प्रकाश के दुश्मन सिद्ध होते हैं! पता चलता है कि ये तो बहुत दुश्मन थे, ये सब शैतान के एजेंसीज थे।