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भक्त के सामने साक्षात भगवान हैं, फिर भी विरह कम क्यों नहीं हो रहा है?


जैसे—जैसे भगवान की प्रतीति होती है, विरह बढ़ता है। जैसे—जैसे निकट आते हैं, वैसे—वैसे दूरी खलती है। जितने पास आते हैं, उतनी ही पीड़ा होती है। क्योंकि पास आने पर ही पहली दफा पता चलता है कि अब तक सारा जीवन व्यर्थ ही गंवाया। और पास आने पर ही पता चलता है कि इतनी थोड़ी—सी दूरी भी अब बहुत दूरी है।

जिसे स्वाद लग गया, उसे ही तो पीड़ा होती है। जिसे स्वाद ही न लगा, उसे पीड़ा भी कैसे होगी? तुमने जिसे थोड़ा जान लिया, उसी को तो जानने की प्यास पैदा होती है। जिसे तुमने बिलकुल नहीं जाना, उसकी खोज भी कैसे पैदा होगी?

जब तुम्हें परमात्मा बिलकुल सामने दिखाई पड़ने लगे, तभी तुम्हारी विरह की अग्नि अपनी प्रगाढ़ता में जलेगी। इसलिए तो भक्त रोते हैं, अभक्त थोड़े ही रोते हैं! अभक्त तो प्रफुल्लित दिखाई पड़ते हैं। संसार में, बाजार में, दुकान पर, तुमने अभक्तों को रोते देखा? वे तो तुम्हें हंसते हुए मुस्कुराते हुए मिल जाएंगे। उन्हें तो उस पीड़ा का कोई पता ही नहीं, जो परमात्मा के द्वार पर अनुभव होती है।

प्रेमियों को रोते देखा जाता है, अप्रेमियों को नहीं। प्रेम रुलाता है, क्योंकि प्रेम निखारता है। और आंसुओ को दुर्भाग्य मत समझना, वे सौभाग्य के लक्षण हैं। और परमात्मा की पीड़ा जब तुम्हें जलाने लगे, मंथने लगे, मारने लगे, तब समझना कि सौभाग्य की आखिरी घड़ी करीब आ गई। क्योंकि परमात्मा जब तुम्हें मार ही डालेगा तुम्हारे विरह में, तभी तुम्हारे भीतर उसका प्रवेश हो सकेगा। जब तुम अपनी ही विरह की अग्नि में पूरे जलकर भस्मीभूत हो जाओगे, तभी उस भस्म से नए का आविर्भाव होगा। वह फिर तुम्हारे भीतर भी भगवान का रूप है।

भक्त मिटता है, तो भगवान पूरी तरह उपलब्ध होता है। तुम्हारे मिटने में ही संभावना है।

लेकिन स्वभावत: प्रश्न उठता है कि भगवान सामने हो, तो विरह समाप्त हो जाना चाहिए। लेकिन विरह भगवान के सामने होने से समाप्त नहीं होता। जब तुम भगवान को पी ही जाओगे, जब वह सामने न होगा, तुम्हारे भीतर हो जाएगा। जैसे कोई प्यासा नदी के किनारे आ गया। किनारे पर खड़े होने से थोड़े ही प्यास बुझती है, नदी में उतरना पड़ेगा। नदी में उतरने से भी प्यास नहीं बुझती, नदी को अपने भीतर उतारना पड़ेगा।

तो जैसे—जैसे नदी दिखाई पड़ने लगेगी, वैसे—वैसे प्यास प्रगाढ़ होने लगेगी। अब तक तो किसी तरह सम्हाला, अब सम्हाले भी न सम्हलेगी। जैसे—जैसे नदी पास आने लगेगी, वैसे—वैसे तुम्हारा कंठ और भी जोर से आकुल होने लगेगा। पानी को पास देखकर दबी हुई प्यास उभरकर उठ आएगी। पानी को पास देखकर अब तक किसी तरह मन को समझाया था, अब समझाया न जा सकेगा। अब तक किसी तरह बांध—बूंधकर चल लिए थे, अब सब व्यवस्था टूट जाएगी। अब तो पागल की तरह दौड़ शुरू होगी।

लेकिन ठीक किनारे पर भी आकर तो प्यास नहीं बुझती। नदी में खड़े होकर भी तो प्यास नहीं बुझती। जब तक कि परमात्मा और तुम एक ही न हो जाओ, कि पानी तुम्हारे खून में न बहने लगे; कंठ में नहीं, तुम्हारे हृदय में न उतर जाए, तब तक प्यास नहीं बुझती। परमात्मा और तुम्हारे बीच जब तक इंचभर का भी फासला है, तब तक तुम जलोगे। उतना फासला भी अनंत फासला है। और पास आकर ही दूरी पता चलती है। तुम इसे विरोधाभास मत समझना। दूरी जब रहती है, तब तो पता ही नहीं चलती। क्योंकि तुम्हें यही पता नहीं कि कोई परमात्मा है, किसी की खोज करनी है। रोओगे किसके लिए?

रोने के पहले थोड़ा स्वाद लग जाना जरूरी है, थोड़ी भनक पड़ जानी जरूरी है। रोने के पहले उसकी याद आ जानी जरूरी है।

लेकिन याद कैसे आएगी अगर उसे बिलकुल न जाना हो? दूर से ही देखी हो उसकी छवि, लेकिन तुम्हारे सपनों में समा जानी चाहिए। फिर तुम सो न सकोगे; फिर तुम जाग न सकोगे, फिर दिन और रात बेचैनी से भर जाएंगी।

कबीर ने कहा है कि वह परमात्मा का प्यासा निशि—बासर जागे। वह न सो सकता है, न जाग सकता है। उसकी बेचैनी का हिसाब नहीं है। विरह की अग्नि भयंकर हो जाती है। एक ही पुकार उठने लगती है। सारा प्राण एक ही पुकार से भर जाता है। प्यास कंठ में ही नहीं होती, रोएं—रोएं में समा गई होती है।

इसलिए भक्तों को ही रोते देखा गया है, परम भक्तों को ही विरह से जार—जार देखा गया है। लेकिन वह सौभाग्य का क्षण है। उन आंसुओ को तुम दुर्भाग्य समझ लोगे, तो भूल हो जाएगी। उन आंसुओ की गलत व्याख्या मत कर लेना, क्योंकि बहुत गलत व्याख्या करके वापस भी लौट जाते हैं। क्योंकि ऐसी नदी से क्या लेना—देना, जिसके पास जाकर प्यास बढ़ती हो। हम तो इसी खयाल से नदी के पास आए थे कि प्यास बुझ जाएगी। ऐसे जल को क्या करना; जिसके पास आने से आग बढ़ती हो। भय पकड़ ले सकता है। और भय यह भी कह सकता है कि जिस जल के पास आने से प्यास बढ़ रही है, उसे भूलकर पी मत लेना। नहीं तो लपटें ही लपटें हो जाएंगी। भाग जाओ।

बहुत लोग परमात्मा के द्वार से लौट गए हैं। उन्होंने आंखें बंद कर लीं। उन्होंने अपने को किसी तरह सम्हाल लिया। गिरने को ही थे, मिलने को ही थे, जरा—सा ही फासला था, एक कदम काफी हुआ होता, लेकिन वे लौट गए। फिर जन्मों—जन्मों तक भटकते हैं। इसलिए ठीक—ठीक व्याख्या बड़ी अर्थपूर्ण है, जब कोई घटना घटे। और गुरु का मूल्य इन्हीं सब आयामों में है कि वह तुम्हें ठीक व्याख्या दे सकेगा। जब तुम्हारे पैर उखड़ रहे होंगे, तब वह उन्हें जमा सकेगा। जब तुम भागने की तैयारी कर लोगे, वह तुमसे कहेगा, जरा और, और सुबह होने के करीब है। मंजिल पास है, और तू भागा जा रहा है!

उस वक्त जरा—सा सहारा चाहिए कि कोई तुम्हें पकड़ ले, कोई तुम्हारे पैरों को रोक दे। लौट न पड़ो तुम कहीं। कहीं तुम गलत व्याख्या न कर लो।

और तुमसे गलत व्याख्या की ही संभावना है। सही व्याख्या तुम कर कैसे सकोगे? तुम्हारा तर्क तो यही कहेगा कि हट जाओ ऐसी जगह से। जहां पास जाने से आग बढ़ती हो, यहां से दूर ही हो जाओ।

मेरे पास बहुत लोग आते हैं, वे कहते हैं, इतनी अशांति ध्यान के पहले न थी!

अशांति का भी पता तभी चलता है, जब तुम थोड़े शांत होने लगते हो। अशांति को जानेगा कौन? सारी दीवाल काली हो, तो जरा—सी भी सफेद रेखा खींच दो, तो सफेद रेखा भी उभरकर दिखाई पड़ती है और दीवाल भी उभरकर दिखाई पड़ती है। क्योंकि विपरीत में प्रतीति होती है।

तुम अशांत ही रहे हो, अशांति तुम्हारा स्वभाव हो गई है, अशांति के अतिरिक्त तुमने कभी कुछ जाना नहीं, इसलिए अशांति को भी कैसे जानोगे? विपरीत चाहिए। कंट्रास्ट चाहिए। कुछ और तुम जानी, तो तुलना हो सके। इसलिए ध्यान करते ही अशांति बढ़ती है।

लोग चकित होते हैं, क्योंकि वे ध्यान की खोज में आए थे सोचकर कि शांति बढ़ेगी। शांति नहीं बढ़ती, शुरू में तो अशांति बढ़ती है। कहना ठीक नहीं है कि अशांति बढ़ती है। अशांति तो थी, पहले उसका पता न चलता था, अब पता चलता है। और जैसे—जैसे शांति बढ़ेगी, वैसे—वैसे पता चलेगा। जैसे—जैसे तुम जागोगे, वैसे—वैसे पता चलेगा कि कितने सोए रहे!

सोए आदमी को पता ही नहीं चलता कि वह सो रहा है, जागे को पता चलता है। सुबह जिसकी नींद टूटने लगी, जो करवट बदलने लगा, और जिसे भनक पड़ने लगी आस—पास की जागती दुनिया की—बरतन बजने लगे, दूध वाले दूध बेचने लगे, सड़क चलने लगी—जिसे थोड़ी भनक भी पड़ने लगी, अब जो सोया भी नहीं है, जागा भी नहीं है, जो बीच में खड़ा है, संध्याकाल आ गया, उसे पता चलता है कि रातभर सोए रहे।

जागते क्षण में पता चलता है नींद का, शांत होने पर पता चलता है अशांति का। आनंद जब उतरने के करीब होगा, तब तुम जानोगे कि कैसे महादुख से तुम आए हो। स्वर्ग के द्वार पर तुम्हें पता चलेगा कि अब तक की यात्रा नरक में हुई। स्वर्ग के द्वार पर ही पता चलेगा। उसके पहले पता न चलेगा; क्योंकि विपरीत जरूरी है।

परमात्मा के करीब पहुंचकर तुम्हें अपने सारे अस्तित्व का सारा संताप सघनीभूत होकर पता चलता है; इसलिए विरह बढ़ता है। उस विरह में गलत व्याख्या मत करना। वह सौभाग्य है। उस सौभाग्य के क्षण को, उन आंसुओ को, विरह को आंनदभाव से, अहोभाव से स्वीकार करना। रोना, लेकिन नाचना बंद मत करना।

आंसू टपके, लेकिन पैर नाचे। आंखें विरह से भरी हों, लेकिन हृदय मिलन की आकांक्षा से, मिलन की आशा से। कंठ में प्यास हो, लेकिन हृदय में भरोसा हो कि नदी करीब आ गई। क्षणभर की देर और है।

और जब इतनी प्रतीक्षा कर ली, तो यह क्षण भी बीत जाएगा। अनंत कल्प बीत गए, सृष्टियां बनीं और उजड़ी और तुम प्यासे बने रहे, उतना सह लिया, जन्मों—जन्मों इतनी यात्रा की, मंजिल कभी करीब न आई; भटकते ही रहे, वह सब हो गया, अब क्षणभर के लिए क्या घबड़ाहट है! हृदय आश्वासन से भरा रहे। वहीं तुम्हारी आस्था काम आएगी; वहीं तुम्हारी श्रद्धा का पता चलेगा। क्योंकि उस क्षण में बहुत लोग भाग गए हैं।

गुरु के बिना इसीलिए कठिनाई है। गुरु के बिना भी कभी—कभी कोई उपलब्ध हो जाता है, पर कभी—कभी। उसको हम अपवाद मान ले सकते हैं। अन्यथा गुरु के बिना कोई उपलब्ध नहीं होता। क्योंकि ऐसे पड़ाव आते हैं, जहां कौन तुम्हें भरोसा दे? ऐसे पड़ाव आते हैं, जहां कौन तुम्हारा हाथ पकड़कर तुम्हें रोक ले? ऐसे पड़ाव आते हैं, जहां कि क्षणभर भी अगर ठीक व्याख्या न मिले, तो अनंत काल के लिए भटकाव पुन: शुरू हो जाएगा। और जो व्यक्ति एक बार परमात्मा के मंदिर से वापस लौट आता है, वह सदा—सदा के लिए उस मंदिर की यात्रा को बंद कर देता है। उस तरफ जाने से भय लगता है।

मेरी अपनी प्रतीति यही है कि इस संसार में जिनको तुम नास्तिक मानते हो, वे वे ही लोग हैं, जो कभी परमात्मा के मंदिर के पास से वापस लौट गए हैं। अब वे नास्तिक हो गए हैं। अब वे कहते हैं, परमात्मा है ही नहीं। वे किसी और को नहीं समझा रहे हैं; वे अपने को ही समझा रहे हैं। वह जो उपद्रव उन्होंने परमात्मा के पास अनंत काल की यात्रा में कभी जाना होगा, वह जो विरह, उसने उन्हें इतना घबड़ा दिया है कि उस घबड़ाहट में अब सिर्फ एक ही बचाव है कि वे अपने को समझा लें कि परमात्मा है ही नहीं, इसलिए खोज किसकी करनी है? उसका मंदिर है कहां? यही संसार सब कुछ है। कहीं जाना नहीं है।

वे दूसरों को नहीं समझा रहे हैं। जब नास्तिक तर्क देता है और कहता है कि ईश्वर नहीं है, तो वह तुम्हें नहीं समझा रहा है, वह अपने को समझा रहा है कि कहीं पैर फिर से उस रास्ते पर न मुड़ जाएं। वह डरा हुआ है अपने से कि कहीं फिर कोई वह आग न जला दे, कहीं फिर कोई छू न दे उस घाव को पुन:, फिर कहीं वह विरह न पैदा हो जाए; और फिर कहीं मैं उस तरफ न चल पडुं जहां से भाग आया हूं।

रवींद्रनाथ की एक छोटी—सी कविता है, कि मैं खोजते —खोजते एक दिन परमात्मा के द्वार पर पहुंच गया। अनंत काल तक खोजा। जब तक नहीं पाया था, तब तक बड़ी खोज थी। कितना भटका, कितने श्रम किए, कितने साधन किए! और फिर आज जब द्वार पर खड़ा हो गया, तो मन एकदम उदास हो गया। हाथ में सांकल उठा ली थी, बजाने को था, दस्तक देने को ही था कि तत्क्षण खयाल आया, फिर क्या करोगे? जब परमात्मा मिल जाएगा, फिर क्या करोगे?

भय पकड़ गया, रोआं—रोआं कैप गया। फिर क्या करेंगे? अपना अब तक जो भी करने का जाल था, वह सब व्यर्थ हो जाएगा। अपनी यात्रा समाप्त हो गई। फिर करोगे क्या? फिर कुछ करने को बचता नहीं। परमात्मा का अर्थ है वैसी दशा, जिसके पार पाने को कुछ नहीं, करने को कुछ नहीं, होने को कुछ नहीं। परमात्मा का अर्थ है, पूर्ण विराम।

मन घबड़ा गया। वही मन, जो खोजता था, खोजने के लिए राजी था। क्योंकि काम—धंधा था, व्यस्तता थी और अहंकार को एक तृप्ति भी थी कि खोज रहा हूं परमात्मा को। और दूसरे तो मूढ़ हैं, धन को खोज रहे हैं। दूसरे नासमझ हैं, पद को खोज रहे हैं। दूसरे अज्ञानी हैं, व्यर्थ को खोज रहे हैं, असार को खोज रहे हैं। मैं सार की खोज पर निकला हूं; मैं परम गुह्य की खोज पर निकला हूं; मैं रहस्यों के लोक में जा रहा हूं। अहंकार बड़ा तृप्त था, संतुष्ट था।

द्वार पर खड़े होकर परमात्मा के घबड़ाहट आ गई, पैर कंप गए कि यह तो खतरा है! खोज समाप्त हो जाएगी! करने को कुछ बचेगा नहीं! अहंकार के लिए कोई जमीन न रह जाएगी खड़े होने को! रवींद्रनाथ ने बड़ा अदभुत गीत लिखा है, किसी ने कभी नहीं लिखा। इसलिए रवींद्रनाथ में बड़ी अनुभूतियां थीं, बड़ी सूझें थीं। यह आदमी असाधारण था। यह आदमी सिर्फ कवि नहीं था; यह आदमी ऋषि था। जैसे उपनिषद के ऋषि हैं।

रवींद्रनाथ के वचन वैसे ही समझे जाने चाहिए, जैसे उपनिषद के वचन। रवींद्रनाथ नया उपनिषद है। उनको साधारण कवि मत समझ लेना, जो कवि सम्मेलनों में कविता कर रहा है और तालियां सुन रहा है। उनको तुम कोई काका हाथरसी मत समझ लेना। वे ऋषि हैं। बड़े गहरे प्रगाढ़ अनुभव से उनकी प्रतीति निकली है।

रवींद्रनाथ ने कहा है कि यह देखकर मैं भाग खड़ा हुआ। मैं इतना डर गया कि मैंने सांकल भी धीरे से छोड़ी कि कहीं अनजान में बज न जाए। और मैं इतना डर गया कि मैंने जूते, जिनको पहने हुए मैं मंदिर की सीढ़िया चढ़ गया था, हाथ में ले लिए; कि कहीं पदचाप भीतर सुनाई न पड़ जाए; कहीं वह द्वार खोल ही न दे और कहे, आओ। कहीं वह आलिंगन कर ही ले, तो मिटे। फिर कोई बचाव न रहेगा। और फिर उसको सामने खड़ा देखकर भागना भी अशोभन मालूम होगा।

गीत का आखिरी पद कहता है कि उस दिन से जो भागा हूं, तो बस उस मंदिर की राह को छोड्कर सब राहों पर घूमता हूं। फिर मेरी खोज जारी है। लोगों को कहता हूं परमात्मा खोज रहा हूं योग कर रहा हूं ध्यान कर रहा हूं। और मुझे पक्का पता है कि वह कहां है। उस जगह को भर छोड्कर सब जगह खोजता हूं।

नास्तिक मेरे लिए वही आदमी है, जिसको कोई बहुत गहन पीड़ा का अनुभव किसी जन्म में हो गया। वह पीड़ा इतनी भयंकर थी कि वह दोबारा उसको पुनरुक्त नहीं करना चाहता। वह अपने को समझाता है, परमात्मा है ही नहीं। वह अपने को तर्क देता है। वह अपने चारों तरफ तर्क का एक जाल निर्मित करता है। वह अपने ही खिलाफ षड्यंत्र रचता है। वह किसी दूसरे का धर्म बिगाड़ने को नहीं है, न तुमसे उसे कुछ मतलब है।

अन्यथा तुम सोचो, ऐसे नास्तिक हैं जो जीवनभर, ईश्वर नहीं है, यह सिद्ध करने में समय व्यतीत करते हैं। है ही नहीं जो, उसके लिए तुम अपना जीवन क्यों खराब कर रहे हो? तुम कुछ और कर लो। ईश्वर तो है ही नहीं, बात खतम हो गई। लेकिन जीवनभर व्यतीत करते हैं!

मेरी अपनी प्रतीति यह है कि कभी—कभी भक्तों को भी वे मात कर देते हैं। भक्त भी इतनी संलग्नता से जीवन व्यतीत नहीं करता परमात्मा के लिए, जितना नास्तिक करते हैं। लिखते हैं, सोचते हैं, तर्क जुटाते हैं, समझाते हैं, शास्त्र लिखते हैं बड़े—बड़े कि ईश्वर नहीं है।

इस सब के पीछे कुछ मनोविज्ञान होना चाहिए। जो है ही नहीं, उसकी कौन फिक्र करता है? कोई तो सिद्ध नहीं करता कि आकाश—कुसुम नहीं होते। कोई तो सिद्ध नहीं करता कि गधे को सींग नहीं होते। इसको क्या सिद्ध करना है! और जो सिद्ध करे, वह गधा। क्योंकि इसको क्या प्रयोजन है? गधे को सींग नहीं होते, यह जाहिर बात है, खतम हो गई। इसको कोई भी सिद्ध करने की जरूरत नहीं है।

लेकिन ईश्वर नहीं है, अगर ईश्वर भी ऐसा है जैसे कि गधे के सींग नहीं हैं, तो क्या पागलपन कर रहे हो! किसको सिद्ध कर रहे हो? किसके लिए लड़ रहे हो? क्या प्रयोजन है? सिद्ध भी कर लोगे, तो क्या सार है? जो था ही नहीं, उसको तुमने सिद्ध कर लिया कि वह नहीं है, क्या पाया? कहीं और जीवन ऊर्जा को लगाते, कहीं और खोजते।

लेकिन नास्तिक के पीछे एक ग्रंथि है। वह ग्रंथि यह है कि अगर वह सिद्ध न करे कि ईश्वर नहीं है, तो डर है कि कहीं फिर कदम उसी तरफ न उठने लगें। यह बड़ी अचेतन प्रक्रिया है। यह उसके अनकांशस में है। उसे भी पता नहीं है।

इसलिए जब भी कोई नास्तिक मेरे पास आ जाता है, तो मैं उसमें रस लेता हूं। क्योंकि मैं जानता हूं यह कभी करीब तक पहुंचा हुआ आदमी है। इसकी यात्रा बस पूरे होने के करीब थी। यह दया के योग्य है। इस पर नाराज मत होना। यह करुणा के योग्य है। और यह वहां पहुंचा है, जहां बहुत—से आस्तिक कभी नहीं पहुंचे हैं। एक छलांग, एक क्षण और, और सुबह हो गई होती। इस पर श्रम करने जैसा है। यह लड़ने जैसा नहीं है। इसका विरोध करने जैसा नहीं है। इसकी आलोचना करने जैसी नहीं है। इसे तो पूरे प्रेम में ले लेने जैसा है। किसी भांति इसे फिर से याद आ जाए, तो एक क्षण में यह फिर वहीं खड़ा हो सकता है, जहां से भागा था।

क्योंकि जो भी हमने अनंत जन्मों में पाया है, उसे हम भूल जाएं, खो नहीं सकते। वह जीवन का नियम ही नहीं है। जो तुमने जान लिया है, उसे तुम भूल सकते हो, खो नहीं सकते। उसकी विस्मृति कर सकते हो, उसे छिपा सकते हो भीतर गहन में, गहन अचेतन में दबा सकते हो कि तुम्हें भी दिखाई न पड़े, तुम ऐसा छिपा सकते हो कि भीतर रोशनी भी लेकर जाओ, तो उसका पता न चले। लेकिन तुम उसे मिटा नहीं सकते। जो जान लिया गया, वह जान लिया गया। वह चेतना का अमिट अंग हो जाता है।

इसलिए नास्तिक क्षणभर में आस्तिक हो सकता है। आस्तिक को आस्तिक होने में बहुत समय लगता है। अभी इसे ईश्वर का भय तो समाया ही नहीं। अभी यह कुतूहल में ही है। एक जिज्ञासा उठी है कि शायद ईश्वर हो; शायद ईश्वर से आनंद मिलता हो। नास्तिक ऐसा आदमी है, जिसके बाबत गांव में प्रचलित कहावत सही है कि दूध का जला छाछ भी फूंक—फूंककर पीता है। वह दूध का जला है, अब वह छाछ भी फूंक—फूंककर पी रहा है। आस्तिक ऐसा आदमी है, जो छाछ ही पीता रहा है। वह गर्म दूध को भी, जलते—उबलते दूध को भी छाछ की तरह पी जाएगा। जलेगा, तभी उसे पता चलेगा। फिर शायद वह भी छाछ को भी फूंक—फूंककर पीने लगे।

इसलिए भगवान के जैसे—जैसे तुम करीब आओगे, जैसे—जैसे तुम भक्त बनोगे।

भक्त का अर्थ मेरे लिए यही है, जो भगवान के करीब आने लगा, जिसे विरह की पीड़ा सताने लगी, जिसका रोआं—रोआं जलने लगा। जो अब ज्वरग्रस्त है, जिसे प्रेम का बुखार है। जो अब विक्षिप्त है, जिसे प्रेम की विक्षिप्तता ने पकड़ लिया।

इसलिए तो कबीर अपने को कहते हैं, कहे कबीर दीवाना। पागल! सारी दुनिया के लिए पागल। कोई उसकी बात सुनने को राजी नहीं। लोग समझते हैं मतवाला। और लोग उसकी पीड़ा भी नहीं समझ सकते। लोग उसके आंसू भी नहीं समझ सकते। लोग तो दूर, वह खुद ही नहीं समझ पाता कि क्या हो रहा है।। अघट घटता है, अनहोना होता है, अनजान से संबंध बनते हैं। सारा जाना—माना जाल टूट जाता है।

नहीं, इसमें कुछ विरोध नहीं है। भक्त के सामने जब साक्षात भगवान होते हैं, तभी विरह पहली दफा जगता है। उस समय चाहिए गुरु, कि रोक ले, हाथ पकड़ ले, सहारा दे, भरोसा दे। कहीं तुम भाग न जाओ मंदिर से। थोड़ी ही देर की बात है। और एक बार तुम कूद गए नदी में और नदी को ले लिया तुमने अपने में, यात्रा पूरी हो गई। और तभी मिलन के आनंद की वर्षा होती है। पहले तो विरह की पीड़ा है, विरह का रेगिस्तान है, फिर मिलन की वर्षा है। और यह भी तुमसे मैं कह दूं कि जितनी बड़ी होगी तुम्हारी विरह की जलन, उतनी ही गहन होगी तुम्हारी मिलन की शांति और मिलन का आनंद। इसलिए अगर तुम्हें कोई शार्टकट बताता हो, कि कहता हो कि हम ऐसा रास्ता बताते हैं कि बिना विरह के तुम पहुंच जाओगे। कोई तुम्हें कहता हो कि नदी जाने की क्या जरूरत! हम पाइप लाइन बिछाए देते हैं, तुम्हारे घर में ही टोंटी से पानी टपकने लगेगा परमात्मा का। तुम उसकी मत सुनना। क्योंकि बिना विरह के अगर परमात्मा मिल जाए. मिल नहीं सकता, यह आदमी धोखा दे रहा है।

लेकिन इसका धोखा धंधा बन सकता है। पंडित, पुरोहित, पुजारी वही कर रहे हैं। वे कहते हैं, हम सस्ता रास्ता बताए देते हैं। तुम क्यों विरह में मरते हो? तुम घर बैठो। हम तुम्हारे लिए पूजा करते हैं। वे कहते हैं, तुम्हें कोई यज्ञ करने की जरूरत नहीं है। हम कर देंगे; तुम सिर्फ पैसा चुका दो। तुम चिंता मत करो; हम जो कहते हैं, वैसा करो। बाकी सब फिक्र हम कर लेंगे। ये मध्यस्थ जो हैं, वे यह कह रहे हैं कि हम तुम्हें पीड़ा से बचा देंगे विरह की। हम तुम्हारे लिए रो लेंगे, हम तुम्हारे लिए हंस लेंगे, तुम घर बैठे रहो; तुम अपना धंधा करते रहो।

भूलकर भी इस भांति में मत पड़ना। क्योंकि वह अगर ऐसा हो भी जाए—जो हो नहीं सकता, मान लें हो जाए—तो वह ऐसा ही होगा, जैसे बिना भूख लगे किसी आदमी के पेट में हम भोजन डाल दें। कोई तृप्ति न होगी। तृप्ति तो नहीं, उलटे वमन हो जाएगा, उलटी हो जाएगी। जिसे प्यास न लगी हो, उसके कंठ में हम पानी उंडेल दें। उससे पेट की भले सफाई हो जाए, लेकिन तृप्ति न होगी।

यह तो ऐसे ही है कि जिसने कभी विरह नहीं जाना, उसके द्वार पर अगर प्रेम भी आकर खड़ा हो जाए, तो वह कैसे पहचानेगा? विरह की आंखें चाहिए। जितनी पीड़ा भूख की, उतनी ही तृप्ति, उतना ही स्वाद का रस। अगर तुम्हारी भूख की पीड़ा इतनी गहन हो कि उससे आगे पीड़ा में जाना संभव न हो, तो रूखी रोटी तुम खाओगे और उपनिषद के वचन तुम्हारे हृदय में गंज जाएंगे, अन्न ब्रह्म! अन्न ब्रह्म है! अगर भूख इतनी गहरी हो, तो भोजन परमात्मा हो जाएगा। प्यास गहरी हो, तो जल के कणों में, साधारण से जल में, अमृत की छाया पड़ने लगेगी।

जो साधारण जीवन में घटता है, वही उस असाधारण जीवन में भी घटता है। नियम तो वही है।

परमात्मा के लिए रोओ, ताकि कभी तुम उसके आनंद से हंस भी सकी। उसके लिए आंसुओ को गिरने दो, तभी तुम्हारे पैर शर बांधकर किसी दिन नाच भी सकेंगे। विरह का जितना गहन तीर तुम्हारे हृदय में छिदेगा, उतना ही अमृत का झरना फूटेगा। विरह का अनुपात ही मिलन के आनंद का अनुपात है।

इसलिए तुम घाटे में न रहोगे। रोने से डरना मत। आंसुओ को रोकना मत। पीड़ा को झेलना, पीड़ा से बचने के उपाय मत करना। पीड़ा से बचने के बहुत उपाय हैं। लेकिन जो पीड़ा से बच गया, वह फिर परमात्मा से भी बच जाएगा। वह फिर आनंद से भी बच जाएगा।

अगर तुम इस सूत्र को ठीक से खयाल में रख सकोगे, तो जब विरह आएगा, तब तुम सौभाग्य समझोगे। तुम समझोगे कि परमात्मा निकट है, इसलिए विरह आया। उसकी छाया कहीं मेरे ऊपर पड़ने लगी। वह कहीं आस—पास है। अन्यथा ये आंसू कैसे बहते? यह हृदय कैसे रोता? यह मेरा रोआं—रोआं कैसे तड़फता? यह आग कैसे जलती?

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शरणागति की यात्रा किसके द्वारा होती है?

शरणागति कोई यात्रा नहीं है। अहंकार नहीं रह जाता, शरणागति फलित होती है। दीया जलाते हो तुम घर में, घर में जो घिरा हुआ अंधकार था, क्या वह द्वार—दरवाजों से बाहर जाता है? उसकी कोई यात्रा होती है? तुमने कभी अंधेरे को बाहर निकलते देखा? कि घर में दीया जल गया, अंधेरा बाहर जा रहा है! खड़े रहो द्वार पर, अंधेरा बाहर जाता न दिखाई पड़ेगा।

अंधेरा कुछ है थोड़े ही, जो बाहर जाता है। अंधेरा तो अभाव है, दीए के न होने की अवस्था है, अनुपस्थिति है। अंधेरा कुछ है थोड़े ही। अंधेरा है ही नहीं; उसका कोई अस्तित्व नहीं है।

अहंकार अंधेरा है। उसे कहीं जाना थोड़े ही है। वह जा नहीं सकता। उसका कोई अस्तित्व नहीं है। वह कोई तत्व थोड़े ही है! इसलिए तो हम उसे झूठ कहते हैं, सपना कहते हैं। असली सवाल है, दीए का जल जाना।

शरणागति कोई यात्रा नहीं है। क्योंकि यात्रा अगर होगी, तो अहंकार मौजूद रहेगा। शरणागति छलांग है, यात्रा नहीं; एक क्षण में घटी घटना है। शरणागति सडेन, तल्ला घटी घटना है! जैसे दीया जला, प्रकाश हुआ, अंधेरा मिटा। एक क्षण की देरी नहीं होती। शरणागति की यात्रा कौन करता है?

यात्रा तो है ही नहीं, पहली बात। जैसे ही अहंकार गिरता है, वैसे ही शरणागति हो जाती है, उसी क्षण।

अहंकार के भीतर छिपे तुम जो हो, तुम अहंकार ही अगर होते, तो परमात्मा से मिलने का कोई उपाय न था। परमात्मा से तुम मिल सकते हो, क्योंकि तुम परमात्मा से ही हो। समान ही समान से मिल सकता है। तुम परमात्मा से मिल सकते हो, क्योंकि किसी अर्थ में तुम अभी भी परमात्मा हो। पता न हो। विपरीत का तो मिलन कैसे होगा! अहंकार के गिरते ही तत्‍क्षण तुम पाते हो, मिल गए। यात्रा नहीं होती, मंजिल आ जाती है।

तो असली सवाल है, अहंकार कैसे गिरे?

तुम्हारी चेष्टा से न गिरेगा, क्योंकि सभी चेष्टाएं अहंकार की हैं। यही जटिल जाल है। तुम अगर कोशिश करोगे, तो अहंकार ही कोशिश करेगा, गिरेगा नहीं। यह भी हो सकता है कि तुम ठोंक—ठाककर अपने को विनम्र बना लो। तो भीतर से अहंकार नई घोषणा करेगा कि मुझसे ज्यादा विनम्र कोई भी नहीं। देखो, मेरी विनम्रता। कैसे फूल लगे हैं विनम्रता के! दुनिया में हैं और लोग, लेकिन मुझसे ज्यादा विनम्र कोई भी नहीं। बस, मैं आखिरी हूं विनम्रता में, चोटी पर हूं।

यही तो अहंकार है, जो चोटी पर होने की घोषणा करता है। पहले धन के आधार पर करता था, पद के आधार पर करता था, बल के आधार पर करता था। अब त्याग के आधार पर करता है, विनम्रता के आधार पर करता है, साधुता के आधार पर करता है, संतत्व के आधार पर करता है। घोषणा वही है।

चेष्टा से अहंकार न जाएगा। अहंकार जाता है अहंकार को देखने से। चेष्टा नहीं, सिर्फ जांचने से, परखने से, पहचानने से, साक्षी— भाव से।

साक्षी— भाव का परिणाम है शरणागति। तुम सिर्फ देखते रहो अहंकार का खेल, कुछ करो मत। करने की कोई जरूरत नहीं है। क्योंकि भीतर जो तुम्हारे छिपा है, वह कर्ता है ही नहीं, वह साक्षी है। तुम सिर्फ देखो। तुम जरा अहंकार के खेल देखो; लीला देखो। कैसी लीला रचता है! और कैसी सूक्ष्म लीला रचता है!

रास्ते पर तुम जा रहे हो अकेले, और देखा कि पास के मकान से दो आदमी निकल आए। भीतर कुछ बदल गया। परखो इसे, जांचो दूर खड़े, क्या हुआ?

अभी ये दो आदमी रास्ते पर नहीं थे, तो तुम और ढंग से चल रहे थे। कोई देखने वाला न था, तो तुम्हारा चेहरा और था, तुम एक गीत गुनगुना रहे थे; एक मस्ती थी, सरल थे, छोटे बच्चे की तरह थे। अचानक दो आदमी पास के मकान से निकल आए, कोई चीज भीतर बदल गई। अकड़ गए, बचपना चला गया, सरलता खो गई, चाल बदल गई, अहंकार आ गया।

तुम घर में अकेले बैठे हो, कोई नहीं है, तब तुम और हो। नौकर कमरे से गुजर गया। पता भी नहीं चलता, शरीर हिलता भी नहीं, और भीतर सब हिल जाता है। जांचो, परखो।

कोई आदमी आया, कहने लगा, आप जैसा बुद्धिमान आदमी कभी नहीं देखा। भीतर एक छलांग लग गई। तुम एक पहाड़ की चोटी पर चढ़ गए। जरा भीतर देखते रहो, क्या हो रहा है! इस आदमी ने चार शब्द कहे। शब्दों में क्या है? हवा में उठे बबूले हैं। इसने कहा कि तुम बड़े सुंदर, कि तुम बड़े बुद्धिमान, कि आप जैसा त्यागी नहीं देखा। भीतर एक छलांग लग गई। अभी खड़े थे जमीन पर, अचानक एवरेस्ट पर पहुंच गए। गौरीशंकर विजय कर लिया! एक आदमी आया, आलोचना करने लगा, निंदा करने लगा; कहने लगा, तुमसे ज्यादा निम्न और बेईमान कोई भी नहीं है। भयंकर चोट लग गई, घाव हो गया। अहंकार तड़फने लगा बदला लेने को। क्रोध में आ गए। इस आदमी को अब तक मित्र समझा था, यह दुश्मन हो गया। कहा कि बाहर निकल जाओ, अन्यथा उठवाकर फिंकवा दूंगा। धक्का देकर इस आदमी को बाहर कर दिया।

जांचते रहो! अनेक—अनेक रूपों में, अनेक—अनेक परिस्थितियों में, अनेक—अनेक घटनाओं में सिर्फ देखते रहो, क्या हो रहा है खेल! कब अहंकार बनता, कब चोट खाता, कब गिर पड़ता, कब उठकर खड़ा हो जाता; किस—किस ढंग से यह खेल चलता है। तुम सिर्फ देखो। बस, द्रष्टा होना काफी है।

अगर तुम्हारी दृष्टि किसी दिन सध जाएगी.। और सधते— सधते ही सधेगी। कोई अचानक तुम न देख पाओगे। क्योंकि देखना बड़ी से बड़ी कला है।

इसलिए तो जिन्होंने जान लिया, उनको हमने द्रष्टा कहा है, देखने वाले कहा है। जिन्होंने जान लिया, उनके वचनों को हमने दर्शन कहा है कि उन्होंने देख लिया, जान लिया। क्या देख लिया? देख लिया, अहंकार का खेल।

जिस दिन देखना पूरा हो जाता है, अहंकार तल्ला गिर जाता है। उसी क्षण शरणागति हो जाती है। उसी क्षण तुम बचे ही नहीं। समर्पण करना नहीं होता, होता है। समर्पण करोगे, तो झूठा रहेगा। वह करने वाला हमेशा अहंकार रहेगा।

जो समर्पण किया गया है, उसे तुम वापस भी ले सकते हो। उसका मूल्य ही क्या है? लेकिन जो समर्पण होता है, उसे तुम वापस न ले सकोगे। लेने वाला नहीं बचा, करने वाला नहीं बचा, सिर्फ देखने वाला बचा है। तुम सिर्फ देखोगे कि ऐसा हो रहा है। शरणागति देखी जाती है कि हो गई।

अहंकार को देखते—देखते—देखते अचानक एक दिन तुम पाते हो कि उस दर्शन के प्रवाह में ही, उस दर्शन की ज्योति में ही अहंकार का अंधकार खो गया। तुम अपने को पाते हो, मिट गए शून्य हो गए। समर्पण हो गया, शरणागति हो गई। उतर गए तुम नदी की धार में, उतर गई नदी की धार तुममें। अब तुममें और परमात्मा में कोई फासला न रहा। उतने ही अहंकार का फासला था। कर्ता है परमात्मा और जान लिया था तुमने अपने को कर्ता, वही दूरी थी। एक मात्र कर्ता है परमात्मा, वही कर रहा है, सब करना उसका है। तुमने अपने को कर्ता मान लिया था, यही आति थी। वह भांति छूट गई।

जैसे—जैसे तुम जांचोगे, भीतर भांति छूटती जाएगी। तुम पाओगे, तुम कुछ भी तो नहीं कर रहे हो, सब हो रहा है। भूख लगती है, प्यास लगती है, तो पानी की खोज शुरू हो जाती है। नींद आती है, तो बिस्तर तैयार होने लगता है। जवानी आती है, तो कामवासना घेर लेती है। बुढ़ापा आता है, कामवासना धुएं की तरह दूर निकल जाती है।

छोटे बच्चे थे, पता न था काम का। तितलियों के पीछे दौड़ते थे, फूलों को पकड़ते थे, कंकड़—पत्थर बीन लाते थे घर में। घर के लोग कहते थे, फेंको। तुम बड़ा मूल्यवान समझते थे। वह भी हो रहा था। फिर जवानी आई, नया पागलपन आया। अब तुम साधारण तितलियों के पीछे नहीं भागते। अब भी तितलियों के पीछे भागते हो, लेकिन अब उन तितलियों का नाम स्त्री है, धन है, पद है। अभी भी कंकड़—पत्थर इकट्ठा करते हो, पुराने नहीं। अब उनका नाम कोहिनूर है, हीरे—जवाहरात हैं, उनको इकट्ठे करते हो। खेल जारी है। कोई करवा रहा है। और तुम पूरे वक्त सोच रहे हो कि मैं कर रहा हूं।

क्रोध होता है। तुमने कभी किया? प्रेम होता है। तुमने कभी किया? तुम पैदा हुए हो या कि तुमने अपने को पैदा कर लिया है? तुम मरोगे या कि तुम अपने को मारोगे? जो आत्महत्या करते हैं, वे भी अपने को नहीं मारते; वह भी घटती है। वे भी बच नहीं सकते। वह भी होता है। क्या करोगे? आत्महत्या का विचार पकड़ लेता है। वह तुमने थोड़े ही पैदा किया है।

अगर तुम ठीक से विश्लेषण करोगे, तो तुम पाओगे, सब हो रहा है। और अकारण ही तुमने कर्ता को बना लिया कि मैं कर्ता हूं। बस, देखने की क्षमता आ जाए, कर्ता— भाव खो जाता है। करने वाला एक है।

साक्षी शरणागति है। साक्षी समर्पण है। साक्षी तुम्हारा विसर्जन है। और जहां तुम नहीं हो, वहां परमात्मा है।

...SHIVOHAM...