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तीन प्रकार के यज्ञ


गीता में क्या सुनकर अर्जुन भीतर मुड़ गया था?

कृष्ण को! जो वह कह रहे थे, उसे सुनकर नहीं, वरन कृष्ण को, जो वे थे, उसे सुनकर। इसीलिए तो गीता तुम पढ़ सकते हो और जैसे उलटे घड़े पर पानी बह जाए, ऐसी गीता तुम पर बह जाएगी; तुम अछूते रह जाओगे। वैसी क्रांति, जैसी अर्जुन को घटी, तुम्हें न घटेगी। क्योंकि एक बात तुम भूल गए हो, कृष्ण मौजूद नहीं हैं।

अर्जुन कृष्ण को सुनकर रूपांतरित हुआ। कृष्ण ने जो कहा, उसको सुनकर अगर रूपांतरित होता, तो गीता पढ़कर तुम भी रूपांतरित हो जाते। क्रांति घटती है कृष्ण जैसे व्यक्ति की मौजूदगी में। एक जलता हुआ दीया बुझे हुए दीए को जला देता है। गीता में तो वही संगृहीत है, जो कृष्ण ने कहा। लेकिन जो कृष्ण थे, उसे तो गीता में संगृहीत करने का कोई उपाय नहीं। उसे तो किसी भी किताब में रखने का कोई उपाय नहीं।

इसीलिए जब शास्ता मौजूद होता है, तब उसके वचन जीवंत होते हैं, वचनों की किसी खूबी के कारण नहीं, उसकी जीवंतता के कारण। शास्ता अपने वचनों में मौजूद होता है। क्योंकि वे वचन आते हैं उसके अंतर—मंदिर से, उसके प्राणों को छूकर, उसके भीतर की सुगंध को लेकर। उसके भीतर का नृत्य थोड़ा—सा उन शब्दों में भी झनकता हुआ तुम्हारे पास तक पहुंच जाता है। उसकी मौजूदगी रूपांतरित करती है।

इसलिए सदगुरु न मिले, तो ही शास्त्र का उपयोग है। सदगुरु मिल जाए, तो शास्त्र को नासमझ पकड़ता है। उसका कोई मूल्य ही नहीं है। जब तुम्हें जीवंत शास्त्र मिल गया, तो शास्त्र का कोई अर्थ नहीं है। शास्त्र तो जब जीवंत शास्त्र मौजूद न हो, तब उसकी उपादेयता है। और उसकी उपादेयता बड़ी संदिग्ध है। क्योंकि तुम उसकी क्या व्याख्या करोगे, वह तो तुम पर निर्भर करेगा।

जब कृष्ण मौजूद होते हैं, तब कृष्ण ही अपनी व्याख्या कर रहे हैं। उनकी मौजूदगी ही उनकी व्याख्या बन रही है। जब कृष्ण मौजूद नहीं हैं, तुम गीता पढ़ोगे, गीता से जो अर्थ निकालोगे, वह तुम्हारा अपना होगा।

ऐसा समझो कि गुरु को तो मैं कहता हूं जला हुआ दीया। तुम उसके पास भर सरकते जाओ, एक न एक दिन तुम्हारी बुझी हुई बाती में लौ पकड़ जाएगी। तुम बस पास आते चले जाओ। पास आने से ज्यादा तुम्हें कुछ भी नहीं करना है।

हम अपने परम शास्त्रों को उपनिषद कहे हैं। उपनिषद शब्द का अर्थ होता है, गुरु के पास आते जाना, उसके पास बैठना। जितना तुम पास आते जाओगे, बस उतना ही तुम्हें करना है। शेष अपने से हो जाएगा। तुम दूर भर मत रहना; तुम फासला बनाकर मत खड़े रहना; तुम अपने को बचाना मत। तुम अपने को उंडेल देना बिना हिसाब के, बिना डर के; बिना सुरक्षा का इंतजाम किए पास आ जाना। तुम अपने चारों तरफ कवच मत ओढ़ना। बस, तुम्हारा पास आना काफी है, लपट पकड़ लेगी।

शास्त्र कैसे हैं? गुरु तो जलते हुए दीए जैसा है। शास्त्र तो दियासलाई हैं। उनमें आग तो छिपी है, लेकिन उसे प्रकट तो तुम्हें करना पड़ेगा।

और तुम ऐसे अज्ञानी हो कि दियासलाई लिए बैठे रहोगे और दियासलाई की ऐसी—ऐसी व्याख्याएं कर लोगे कि तुम्हें यह कभी याद ही न आएगी कि उसमें छिपी हुई सलाई में आग है; रगड़ने की जरूरत है और आग पैदा हो जाएगी।

वचनों में आग है, लेकिन उसे निकालना पड़ेगा। वह प्रकट नहीं है, वह छिपी है। निकालेगा कौन? तुम्हीं निकालोगे। और तुम्हारे अंधकार में भरोसा नहीं किया जा सकता कि तुम निकाल पाओगे। तुम दियासलाई की पूजा करोगे, यह मुझे पक्का पता है। तुम दियासलाई पर चंदन—तिलक लगाओगे; फूल चढाओगे। धीरे—धीरे तुम इतनी चीजें चढ़ा दोगे कि उन्हीं में दियासलाई ढंक जाएगी और तुम भूल ही जाओगे कि पीछे दियासलाई भी थी।

तुम उस दियासलाई के चरणों में सिर झुकाओगे। कोई तुम्हारी दियासलाई के खिलाफ कुछ कहेगा, तो लड़ने—मरने को उतारू हो जाओगे। तुम दियासलाई के लिए मरने को तो राजी रहोगे, लेकिन दियासलाई के अनुसार जी न सकोगे। वह आग बंद ही पड़ी रहेगी। शास्त्र तो दियासलाई जैसे हैं। सदगुरु जलती हुई आग है। उसके तुम्हें सिर्फ पास आना है, कुछ करना नहीं है। निकट होने की क्षमता, बस पर्याप्त पात्रता है। पास आते—आते बुझी लौ जली लौ के साथ एक हो जाती है।

कृष्ण को सुनकर नहीं अर्जुन बदला, नहीं तो कोई भी बदल लेगा, गीता मौजूद है। कृष्ण की उपस्थिति, कृष्ण का व्यक्तित्व, कृष्ण के भीतर जो घटा है, जो ज्योति जली है।

कृष्ण ने इतनी बातें कहीं अर्जुन को, क्या तुम सोचते हो, इसलिए कहीं कि कृष्ण को यह पता नहीं कि बातों से कुछ भी न होगा। कृष्ण को भलीभांति पता है कि बातों से कुछ भी न होगा। सिर्फ एक बात घटेगी कि बातों से भरोसा बढ़ेगा; अर्जुन करीब आने की हिम्मत जुटा लेगा।

तुमसे मैं रोज बातें किए चला जाता हूं। क्या मैं समझता हूं कि तुम सुन—सुनकर ज्ञानी हो जाओगे? या तुम मेरी बातों को समझ लोगे, तो तुम्हारे जीवन में क्रांति आ जाएगी?

नहीं, बातें तो सिर्फ भुलावा हैं। वह चर्चा तो तुम्हें उलझाने की है। वह तो थोड़ी देर को तुम अपनी सुरक्षा को भूल जाओ, और मेरे पास आ जाओ। बस, इतना ही। बातचीत तो खेल—खिलौनों जैसी है। जिसमें तुम उलझ जाओ और तुम्हारे अहंकार को घडीभर को भूल जाओ, और पास सरक आओ।

मेरी बात को पकड़ने से कुछ न होगा। मेरी बात में अगर तुम डूब गए, लीन हो गए और पास आ गए उस लीनता में, तो क्रांति घट जाएगी। तब तुम भी हसोगे कि इतनी बातें करने की क्या जरूरत थी। पास ही क्यों न ले लिया!

लेकिन वह संभव न था। अगर तुम्हें पास लेने की कोशिश की जाए, तुम दूर भागोगे। तुम्हें बुलाया जाए, तुम डरोगे। तुम समझोगे कि कोई फंदा है, कोई जाल है।

तुम्हें सीधे बुलाया नहीं जा सकता, तुम ऐसी उलटी दशा में हो। तुम्हें बुलाना भी हो, तो परोक्ष; तुम्हें निमंत्रण भी भेजना हो, तो सीधा नहीं भेजा जा सकता कि आ जाओ। क्योंकि तुम हजार बहाने करोगे। और तुम डरोगे भी, कि बुलावा क्यों है? जरूर कोई स्वार्थ होगा। बुलाया है, तो जरूर कोई मतलब होगा। बिना मतलब कोई किसी को बुलाता है? तुम किसी को नहीं बुलाते बिना मतलब। तो तुम अपनी सुरक्षा करके आओगे, कवच बांधकर आओगे, मन को बंद करके आओगे। तब, तब जलता हुआ दीया भी कुछ न कर सकेगा। तुम्हारी बाती अगर छिपी हो अस्त्र—शस्त्रों में, तो कोई उपाय नहीं।

सब चर्चा फुसलाने की है। पूरी गीता सिर्फ जाल है अर्जुन को पास आने के लिए, कि तू पास आ जा, तुझे भरोसा आ जाए। और तुम सिवाय शब्दों के और किसी चीज से भरोसा नहीं करते। जीवन से तो तुम्हारा संबंध टूट गया है। अस्तित्व से तुम्हारा कोई नाता नहीं रहा है। तुम सिर्फ शब्दों में जीते हो। सब शब्दों का जाल है। प्रेम तुम्हारे लिए एक शब्द है। परमात्मा तुम्हारे लिए एक शब्द है। सत्य तुम्हारे लिए एक शब्द है। प्रार्थना तुम्हारे लिए एक शब्द है।

तो तुम्हें अगर खींचना हो, तो शब्दों का ही व्यूह रचना पड़ेगा। कृष्ण ने गीता कहकर शब्दों का व्यूह रचा। जैसे मकड़ी जाला रचती है। मकड़ी का जाला तो दिखाई भी पड़ता है, शब्दों का जाला तो उतना भी दिखाई नहीं पड़ता।

शब्दों से बंधे तुम खिंचे चले आते हो; शब्दों से सम्मोहित तुम पास चले आते हो। और एक घड़ी जब तुम इतने पास आ जाते हो, जहां ज्योति छलांग ले सकती है और तुम्हारी बुझी बाती को पकड़ सकती है, वहा घटना घट जाती है।

कृष्ण अर्जुन को सुनाने—समझाने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। कृष्ण अर्जुन को पास बुलाने की कोशिश कर रहे हैं कि तू मत घबड़ा अर्जुन, पास आ जा, मामेकं शरणं वज, सब छोड़ मेरी शरण आ जा। उसके लिए सारा उपाय है।

जिस क्षण वह पास सरक आया होगा, उसी क्षण भीतर मुड़ गया। जिस क्षण पास आ गया होगा, उसी क्षण अर्जुन कृष्ण हो गया। पास आकर दूरी मिट जाती है, द्वैत मिट जाता है, एकता सध जाती है।

दूसरा प्रश्न : आपने कल कहा कि भक्त भगवान को बाहर खोजता है। क्या ज्ञानी भगवान को भीतर खोजता है?

ज्ञानी खोजता ही नहीं, क्योंकि सब खोज बाहर है। खोज का मतलब ही बाहर है।

इसे थोड़ा समझो, यह थोड़ा जटिल है। क्योंकि हम सोचते हैं कि बाहर खोज होती है, ऐसे ही भीतर खोज होती है। भीतर तो तुम अकेले हो, खोजोगे क्या? किसको खोजोगे? वहां तो गली बहुत संकरी है, ता में दो न समाय। वहां तो दो समा नहीं सकते। खोजेगा कौन किसको?

सब खोज बाहर है। जब तक खोजते हो, बाहर रहोगे। जब बाहर की खोज व्यर्थ हो जाएगी, खोज—खोजकर थक जाओगे, हार जाओगे, पराजित हो जाओगे, जब देख लोगे कि सब तरफ खोज लिया, कहीं पाया नहीं, थककर बैठ जाओगे, उसी क्षण भीतर की खोज घट गई। जैसे ही बाहर की खोज बंद होती है, तुम भीतर पहुंच जाते हो। भीतर की कोई खोज थोड़े ही है। बाहर उलझे हो, इससे भीतर नहीं पहुंच पाते। बाहर अटके हो, इससे भीतर आना नहीं हो पाता।

बाहर कोई खोज न रही। जब बुद्ध को ज्ञान हुआ बोधि—वृक्ष के नीचे, तो क्या तुम सोचते हो, भीतर वे कुछ खोज रहे थे? कुछ भी नहीं। खोज बंद हो गई थी। खोज—खोजकर देख लिया, कुछ न पाया; राख हाथ लगी, सब खोज व्यर्थ हो गई। उस रात उन्होंने सब खोज छोड़ दी, खोजना ही छोड़ दिया।

अब यह बहुत रहस्य की बात है, जैसे ही तुम खोज छोड़ते हो, वैसे ही खोजने वाला मिट जाता है। क्योंकि खोज के बिना खोजने वाला कहां बचेगा? वह तो खोज में ही जीता है; खोज से ही बनता है। इसलिए जितना बड़ा खोजी, उतना बड़ा अहंकार। जब खोज ही न रही, अहंकार भी गिर जाता है। जब पाने को ही न रहा कुछ, तो पाने वाला कौन?

जब खोज न रही, तो भविष्य मिट जाता है। क्योंकि खोज के लिए भविष्य चाहिए, समय चाहिए नहीं तो खोजोगे कैसे? जब तक फल की आकांक्षा है, तब तक भविष्य रहेगा, समय रहेगा। जब खोज मिट जाती है, फल का सवाल ही न रहा। भविष्य विसर्जित हो गया, समय टूट गया, समय की धारा विलीन हो गई। खोजी मिट गया, समय मिट गया।

और जब खोज मिट जाती है, तो अतीत को किसलिए सम्हालोगे? आदमी पिछले साल के खाते—बही सम्हालकर रखता है, क्योंकि अगले साल भी धंधा करना है। अभी भविष्य कायम है, इसलिए अतीत की हम व्यवस्था रखते हैं, स्मृति रखते हैं, कहां है, क्या है, कैसा है? हम क्या थे? इसको हम सम्हालकर रखते हैं, क्योंकि हमें कुछ होना है। अपना पता—ठिकाना तो होना चाहिए। अतीत और भविष्य संयुक्त हैं। भविष्य जब तक है, तब तक तुम अतीत को बचाओगे; क्योंकि उसी के आधार पर तो भविष्य का भवन खड़ा होगा। अतीत है बुनियाद, भविष्य है शिखर। जब भविष्य ही न रहा, जब दुकान ही बंद कर दी, तो खाते—बही तुम सम्हाले फिरोगे? आग लगा दोगे, फेंक दोगे सड़क पर, कूड़ा—कर्कट है, अब क्या करना है? जब कुछ मिलने को ही न रहा आगे, जब भवन बनाना ही नहीं, तो बुनियाद की अब तुम क्या रक्षा करोगे?

जब खोज बंद होती है बाहर की, खोजी खो जाता है, भविष्य खो जाता है, अतीत खो जाता है। रह जाता है यह वर्तमान का निपट क्षण, निष्कलुष, अतीत से गंदा नहीं, भविष्य से बेचैन नहीं, शांत, निर्मल, निस्तरंग। सब खोज खो गई, रह जाता है वर्तमान का क्षण और तुम्हारे भीतर की गहन शांति, क्योंकि खोज के साथ सब वासना चली गई, सब लहरें चली गईं। अब कुछ पाना नहीं है। इस क्षण में शाश्वत के द्वार खुल जाते हैं, इस क्षण में वह जो अनादि—अनंत है, कालातीत है, वह तुममें झांकता है। पहली दफे तुम्हारी इस शून्यता में परमात्मा की छवि उभरती है; पहली दफा तुम्हारे मंदिर में उसका पदार्पण होता है।

ज्ञानी खोजता नहीं, जो खोज छोड़ देता है, वही ज्ञानी है। और खोज का छोड़ देना ही अंतखोंज है। अंतखोंज कोई नई खोज नहीं है। खोज का बंद हो जाना है, रुक जाना है।

सब दौड़ बाहर है। भीतर भी तुम दौड़ सकते हो? कैसे दौड़ोगे? स्थान कहां? अवकाश कहा जहां भीतर तुम दौड़ोगे? जब सब दौड़ बंद हो जाती है, तुम बैठ गए वृक्ष के तले, कोई दौड़ न रही, निदौड़। उस दशा में कोई भी वृक्ष के नीचे बैठो, वही बोधि—वृक्ष हो जाएगा, वहीं बुद्धत्व फलित हो जाएगा।

तुम बुद्ध हो, लेकिन बाहर हो। कभी धन खोज रहे हो, कभी पद खोज रहे हो। कभी परमात्मा भी खोजते हो, उसको भी बाहर खोजते हो।

अगर तुम मुझसे पूछो, तो मैं तुमसे कहूंगा, खोजना संसार है, न खोजना मोक्ष है।

लेकिन शायद तब तुममें जो तामसी हैं, वे कहेंगे, तब हम भले। हम खोज ही नहीं रहे।

नहीं, तामसी उसे न पा सकेगा। क्योंकि तामसी ने तो अभी बाहर भी नहीं खोजा। खोज के रुकने का तो सवाल ही तब उठता है, जब बाहर खोज हुई हो। तामसी तो बाहर भी नहीं गया, भीतर क्या जाएगा! भीतर जाने के लिए बाहर जाना कदम है। अपने घर आने के लिए बड़ी यात्रा करनी पड़ती है। अभी तामसी यात्रा पर ही नहीं गया, अपने घर कैसे लौटेगा?

तो तामसी यह न सोचे कि हम जहां बैठे हैं, वहीं बुद्धत्व है। वहां तो अभी यात्रा ही शुरू नहीं हुई है।

इसे ध्यान रखो। बाहर की यात्रा भीतर की यात्रा का प्रशिक्षण है; वह पाठशाला है। वह बिलकुल अनिवार्य है। अन्यथा लोग पड़े—पड़े मोक्ष को उपलब्ध हो जाते।

इसलिए तामसी को पहले राजसी बनना होता है, दौड़ना पड़ता है बाहर की दुनिया में। तब राजसी सात्विक बनता है, बाहर की दुनिया में दौड़—दौड़कर थक जाता है। शूद्र को क्षत्रिय बनना पड़ता है, क्षत्रिय को ब्राह्मण। और समाज ऐसा तरल होना चाहिए, जिसमें तामसी को राजसी बनने की सुविधा हो, राजसी को सात्विक बनने की सुविधा हो।

हिंदुओं ने बड़ी गहरी बातें खोजी, लेकिन समाज जड़ बना लिया। उस जड़ समाज के कारण सब गडबड़ हो गया। यहां शूद्र को क्षत्रिय बनने का उपाय न रहा। तो तामसी कैसे राजसी बनेगा? यहां क्षत्रिय को ब्राह्मण बनने का उपाय न रहा। तो कैसे राजसी सात्विक बनेगा?

वस्तुत: प्रत्येक को यात्रा शूद्र के तल से करनी पडेगी। इसलिए जो गहन शास्त्र हैं, वे कहते हैं, हर आदमी शूद्र पैदा होता है। और हर आदमी शूद्र ही मर जाए, तो जीवन व्यर्थ गया। हर आदमी शूद्र पैदा होता है और हर आदमी को ब्राह्मण मरना चाहिए। तो यात्रा संगत रही, तो यात्रा व्यवस्थित हुई, तो बीज फल तक पहुंच गया, तो मार्ग मंजिल बना।

समाज तरल होना चाहिए, जिसमें सबको सब होने की सुविधा हो, उठने की, चलने की। शूद्र को रोक दिया हिंदुओं ने कि वह आ नहीं सकता दूसरे मार्ग पर। तो यह पूरा जीवन उसे शूद्र ही रहना है। तो करोड़ों लोग शूद्र रह गए। उनके लिए जिम्मेवार कौन है फिर?

हिंदू व्यवस्था ने बड़ा पाप किया है। हिंदुओं ने बड़े गहरे सूत्र खोजे, लेकिन सूत्रों का ठीक उपयोग नहीं हो पाया। जैसे आइंस्टीन ने एटम का सूत्र खोज दिया, लेकिन उपयोग यह हुआ कि हिरोशिमा—नागासाकी जले। और सारी दुनिया भयभीत है कि कभी भी तीसरा महायुद्ध हो जाए।

ऐसे ही हिंदू मनीषियों ने बड़ा गहरा सूत्र खोजा त्रिगुणों का। उसके आधार पर वर्ण—व्यवस्था बना ली लोगों ने। ज्ञान का सूत्र अज्ञानियों के हाथ में पड़ गया। अन्यथा सारी समझ इस कोशिश में लगनी चाहिए थी कि शूद्र तो सभी पैदा हुए हैं, वह सबकी स्वाभाविक दशा है, आलस्य। रजस की तरफ उठना है। तमस से उठना है ऊपर रजस की तरफ। दौड़ शुरू करनी है।

अपने में बंद पड़ा है तामसी। राजसी दौड़ रहा है संसार में, बडी महत्वाकांक्षाएं हैं। सात्विक फिर घर लौट आया। लेकिन इस लौट आने में और तामसी के घर ही पड़े रहने में बड़ा अंतर है।

तामसी का कोई अनुभव नहीं है बाहर का। बिना बाहर के अनुभव के भीतर का अनुभव नहीं हो सकता। तामसी ऐसा ही है, जैसे सफेद दीवार पर किसी ने सफेद लकीर खींच दी। या काले ब्लैकबोर्ड पर किसी ने काली लकीर खींच. दी, कुछ दिखाई नहीं पड़ता। विपरीत नहीं है, तो अनुभव नहीं बनता। विपरीत न हो, तो ज्ञान का जन्म नहीं होता। काले ब्लैकबोर्ड पर सफेद रेखा खींचनी चाहिए, तब दिखाई पड़ती है।

सात्विक ऐसा व्यक्ति है, जिसने संसार के काले ब्लैकबोर्ड पर अपने जीवन की, अपनी चेतना की सफेद रेखा खींच दी। अब उसे आत्मा उभरकर दिखाई पड़ती है, कंट्रास्ट।

बाहर की यात्रा तुम्हारे जीवन में कंट्रास्ट, विपरीत को पैदा कर देती। है। उसमें आत्मा उभरकर दिखाई पड़ती है।

तामसी को आत्मा दिखाई ही नहीं पड़ती। वह शरीर की तरह ही पड़ा रहता है। अभी उसने शरीर की दौड़ ही नहीं की। पहले तो शरीर दिखाई पड़ेगा। शरीर के अनुभव से गुजर—गुजरकर, छन—छनकर, निखर—निखरकर आत्मा दिखाई पड़ेगी।

तो तुम ऐसा समझो, तामसी व्यक्ति शरीर में जीता, राजसी मन में जीता, सात्विक आत्मा में जीना शुरू करता है। और तीनों के जो पार हो गया, वह परमात्मा हो जाता है।

बाहर खोजना जरूरी है, लेकिन सदा खोजते रहना जरूरी नहीं है। बाहर खोजो भी और छोड़ो भी फिर। पकड़ो भी, त्यागो भी। पकड़कर जब तुम त्यागोगे, तब तुम्हें हाथ में जो स्वतंत्रता अनुभव

होगी, वह उसको नहीं हो सकती अनुभव, जिसने कभी पकड़ा नहीं।

तुम कभी कारागृह गए हो? अगर नहीं गए हो, तो जाने जैसा है। कारागृह के बाहर जब तुम आओगे, हथकड़ियां खुलेंगी, द्वार के सींकचे खुलेंगे, संतरी तुम्हें बाहर जाने की आज्ञा देगा, जब तुम खुले आकाश के नीचे खड़े होओगे, तो तुम्हारे पूरे प्राणों से आवाज निकलेगी, अहा!

यहां तुम पहले भी थे, जाने के पहले यहीं थे तुम, लेकिन कभी अहा की आवाज नहीं उठी थी, कभी आकाश इतना विराट उन्मुक्त न मालूम हुआ था। कभी खुले हाथों में ऐसी गति न मालूम हुई थी। दीवारों के बाहर आकर तुम्हें पहली दफा पता चलता है कि कैसी स्वतंत्रता है जीवन में।

विपरीत जीवन को समृद्ध करता है। इसीलिए तो परमात्मा द्वंद्व में तुम्हें डालता है।

लोग मुझसे पूछते हैं कि अगर निर्द्वंद्व ही होना है, तो परमात्मा हमें निर्द्वद्व ही क्यों नहीं बनाता?

बना सकता है। लेकिन तब तुम बिलकुल बेकार रहोगे। तुममें धार ही न होगी। तुम बिना धार की तलवार रहोगे। साग—सब्जी काटने के काम आ जाओ तो बहुत। युद्ध के काम के न रह जाओगे। तुम ऐसा इस्पात रहोगे, जो अग्नि से नहीं गुजरा। क्योंकि इस्पात जब अग्नि से गुजरता है, जितनी बड़ी अग्नि से गुजरता है, उतना ही टेंपर, उतनी ही त्वरा और शक्ति इस्पात में पैदा होती है। बड़ी भट्टियां चाहिए। कच्चे लोहे में क्या रखा है? ऐसा हाथ से तोड़ दो। पका लोहा क्या है? आग से गुजरा हुआ लोहा है। उसमें शक्ति है। आग शक्ति देती है, अनुभव देती है।

संसार आग है, संसार यज्ञ है; उससे अगर तुम होशपूर्वक गुजरी, तुम इस्पात होकर बाहर निकलोगे। कच्चे लोहे की तरह भीतर गए थे, इस्पात होकर बाहर आओगे। कच्चे सोने की तरह भीतर गए थे, जिसमें मिट्टी और कूड़ा—कर्कट सब मिला था। सोना दिखाई ही न पड़ता था, केवल पारखी को दिखाई पड़ सकता था। साधारण तो उसे ऐसा ही मिट्टी—पत्थर जानकर गुजर जाता। किसी जौहरी को दिखाई पड़ सकता था।

तुम्हारा सोना तुम्हें नहीं दिखाई पड़ता, मुझे दिखाई पड़ता है। तुम तो कहते हो, मुझमें और सोना? सिवाय कूड़ा—कर्कट के और कुछ भी नहीं है! तुम आग से नहीं गुजरे हो। आग कूड़ा—कर्कट को जला देगी। तब तुम लौटोगे घर, खालिस सोना। तब तुम्हारी बात और होगी, तुम्हारी सुगंध, तुम्हारा रस और होगा।

ज्ञानी खोजता है, खोज को छोड़ता है। अज्ञानी या तो खोजता ही नहीं या खोज को ही पकड़कर अटक जाता है।

भीतर की कोई खोज नहीं है। बाहर खोजो और बाहर की खोज की व्यर्थता को समझ जाओ। और जल्दी मत करना; क्योंकि कच्चे घर न लौट सकोगे। कच्चे की कोई स्वाकृति परमात्मा के पास नहीं है। पकोगे तो ही लौट सकोगे।

बहुत—से लोगों को मैं कच्चा घर लौटते देखता हूं। वे ऐसे ही हैं, जैसे स्कूल से फेल होकर घर चेले आ रहे हैं। स्कूल गए थे माना, लेकिन उत्तीर्ण नहीं हुए। कोई प्रमाणपत्र लेकर नहीं आ रहे हैं। परमात्मा का घर इनके लिए बंद रहेगा।

संसार में भेजा इसलिए कि उत्तीर्ण हो जाओ। संसार को जान लेना जरूरी है, इसके पहले कि तुम परमत्‍मा को समझ सको। व्यर्थ को पहचान लेना जरूरी है, इसके पहले कि सार्थक का आविर्भाव हो। असार को समझ लेना जरूरी है, इसके पहले कि सार से तुम्हारा मिलन हो। असत्य को असत्य की तरह जानने वाला ही सत्य को सत्य की तरह जान पाता है।

तीसरा प्रश्न : हम अधूरे हैं। हम बाहर या भीतर कितनी ही खोज करें, हमें पूरा कैसे दिखेगा? पूरा कैसे मिलेगा?

ठीक बात है। अधूरे हो तुम, तुम्हारी सब खोज अधूरी रहेगी। लेकिन अखोज पूरी हो सकती है।

तुम जो भी खोजोगे, तुम्हीं खोजोगे, —तुम्हारे हाथ की ही खोज होगी, तुम्हारे जैसी ही रहेगी। तुम जो भी बनाओगे, उसमें तुम्हारी ही छाप होगी। तुम जो भी निर्मित करोगे, सृजन करोगे, वह अधूरा ही होगा। क्योंकि अधूरा बनाने वाला है, तो कृति कैसे पूरी हो सकती है? बिलकुल ठीक बात है।

तुम जो भी सोचोगे, वह अधूरा होगा। तुम जो भी विचार करोगे, वह खंडित होगा। तुम जो भी निष्कर्ष लोगे, वह कभी संपूर्ण और समग्र नहीं हो सकता। तुम श्रद्धा करोगे, तो अधूरी, तुम संदेह करोगे, तो अधूरा। तुम संसार में जाओगे, तो आधे—आधे, तुम मंदिर में प्रवेश करोगे, तो आधे— आधे। क्योंकि तुम अधूरे हो। बात ठीक है।

तो क्या फिर कोई उपाय नहीं है? क्योंकि परमात्मा तो पूरा है और तुम अधूरे हो। और तुम जो भी करोगे, वह सब अधूरा होगा—प्रार्थना भी अधूरी, साधना भी अधूरी, समाधि भी अधूरी। तो तुम पूरे परमात्मा को कैसे पाओगे?

पा सकते हो। क्योंकि एक उपाय है। विचार तो तुम करोगे, अधूरा होगा। लेकिन निर्विचार कैसे अधूरा होगा! क्योंकि वह कोई कृत्य तो नहीं है। विचार अधूरा होगा। इसलिए तो विचार से कोई परमात्मा को नहीं पा सकता। अधूरे से पूरे को पाओगे कैसे? लेकिन निर्विचार? निर्विचार तो अधूरा नहीं होगा, क्योंकि वह तुम्हारा कोई कृत्य नहीं है। निर्विचार तो तुम्हारे कर्ता के हट जाने का नाम है, वह तो अभाव है। अभाव तो पूरा हो सकता है।

तुम मौजूद हो, तो अधूरे रहोगे। लेकिन तुम गैर—मौजूद हो, तब तो पूरे हो सकते हो। अहंकार अधूरा होगा; निरअहंकार पूरा हो सकता है। विचार अधूरा, शून्य पूरा हो सकता है। खोजोगे, तो अधूरा रहेगा; नहीं खोजोगे, तो? खोज छोड्कर वृक्ष के नीचे बैठे हो, कुछ नहीं खोज रहे, उस क्षण में तो तुम पूरे हो जाओगे। तुम्हारी दौड़ .तो अधूरी रहेगी, लेकिन तुम बैठे हो, दौड़ ही नहीं रहे, तो तुम्हारा बैठना कैसे अधूरा होगा? वह तो पूरा हो सकता है।

इसलिए अक्रिया पर इतना जोर है, शून्य पर इतना जोर है, ध्यान का इतना आग्रह है। क्योंकि वही एक संभावना है तुम्हारे भीतर, जिससे पूरा तुम्हारे भीतर उतर सकता है।

तुम शून्य हो जाओ। शून्‍य अधूरा होता ही नहीं। या तो होता है या नहीं होता। या तो तुम शून्य हो ही न पाओगे, तब शून्य है नहीं। या शून्य होगा, तो पूरा होगा। शून्य अधूरा कभी नहीं होता।

तुमने आधा वर्तुल सुना है, हाफ सर्किल? होता ही नहीं। वर्तुल का मतलब ही पूरा होता है। आधा हुआ, तो वह सर्किल है ही नहीं। उसको वर्तुल कैसे कहोगे?

तुमने आधे जिंदे आदमी देखे होंगे, तुमने आधा मरा हुआ आदमी देखा है? तुम्हें लगेगा कि यह बात तो एक ही है। चाहे इसको आधा जिंदा कहो, चाहे आधा मरा!

नहीं, बात एक नहीं है। आधा जिंदा आदमी होता है। सच में सभी लोग आधे जिंदा हैं। लेकिन आधा मुरदा तुमने देखा है? आधा मुरदा कोई कैसे हो सकता है? आधा मुरदे का तो मतलब हुआ, अभी जिंदा है, अभी आशा है, अभी फिर उठ सकता है। आधे मुरदे को अस्पताल से डाक्टर तुम्हें ले जाने न देंगे। वे कहेंगे, रुको। अभी आक्सीजन लगाते हैं, अभी इंजेक्शन देते हैं; अभी तो यह आदमी आधा ही मरा है। आधा मरा है, मर नहीं गया है।

जब कोई मरता है, तो पूरा मरता है। आधे तुम जी सकते हो, क्योंकि जीना तुम्हारे हाथ में है। आधे तुम मर नहीं सकते, क्योंकि मरना परमात्मा के हाथ में है।

इसे थोड़ा समझो।

ध्यान एक मृत्यु है। वहा तुम मर जाते हो। तुम सब परमात्मा पर छोड़ देते हो। वहा तुम मिट जाते हो। एक खाली जगह रह जाती है हृदय में। वह खाली जगह सदा पूरी है। वहा कुछ भी नहीं है। उस खाली में ही उतरता है प्रीतम, उस खाली मंदिर में ही प्यारा आता है। जब तक तुम हो, तब तक वह आ न सकेगा। तुम भरे हो जगह को। तुम नही होओगे, वह आ जाएगा। तुम्हारा न होना परमात्मा के होने की विधि है।

चौथा प्रश्न : आपने बताया कि परमात्मा उनको ही स्वीकार करता है, जो अखंड उसके पास पहुंचते हैं। लेकिन कुब्जा, जिसके सब अंग विकृत हैं, वह भी कृष्ण की प्रिय गोपी है। वह किस गुण के कारण कृष्ण को पाने में सफल हुई?

उसका प्रेम पूरा है। और प्रेम भी जब होता है ., तो पूरा होता है; आधा नहीं होता। इसलिए तो मैं कहता हूं? प्रेम प्रार्थना है। जीसस ने तो कहा, प्रेम परमात्मा है। अप्रेमी शरीर देखता है, प्रेमी शरीर को देखता ही नहीं। अगर शरीर दिखता रहे, तो समझना कि कामवासना है, प्रेम नहीं। तो फिर कृष्ण ने भी देखा होता, यह कुब्जा, यह तो सब तरफ से विकृत है, अपंग है, आड़ी—तिरछी है। यह तो बहुत कुरूप लगी होती।

लेकिन कृष्ण तो शरीर को देख ही नहीं रहे हैं। शरीर तो ऊपर की खोल है। जैसे तुम्हारे वस्त्रों को देखकर कोई तुम्हें इनकार कर दे। वस्त्र तो तुम नहीं हो, शरीर भी तुम नहीं हो। जिसने तुम्हारे शरीर को देखकर इनकार किया है या शरीर को देखकर अंगीकार किया है, उसने तुम्हें तो अभी देखा ही नहीं।

यही तो संसार में प्रेमियों का कष्ट है। प्रेमी एक—दूसरे से कहते ही रहते हैं कि तुम मुझे अभी समझे नहीं, निरंतर कहते हैं। वर्षों साथ रहते हैं और यही कहते हैं कि तुम मुझे समझे नहीं। क्या

अड़चन है? समझने में ऐसी मुश्किल क्या है?

मुश्किल यही है कि प्रेमी चाहता है कि तुम मेरे शरीर को मत देखो, मुझे देखो। शरीर मैं नहीं हूं। प्रेयसी भी यही चाहती है कि तुम मुझे मत देखो, मेरे शरीर को मत देखो। यह मैं नहीं हूं। मुझसे जरा पार उठो, जो तुम्हें दिखाई पड़ रहा है, उससे जरा भीतर आओ। वही मेरा असली होना है। तुम बाहर मत अटको।

लेकिन वह देखती है, पति का प्रेम शरीर से है। पति देखता है, पत्नी का प्रेम भी शरीर से है, मोह भी शरीर से है, लगाव भी शरीर से है। भीतर को तो कोई देखता नहीं है, इसलिए तड़फ पैदा होती है। और जब तक तुमने भीतर को नहीं देखा, तब तक बिलकुल स्वाभाविक पीड़ा है, क्योंकि तब तक प्रेम तो पैदा होता ही नहीं। शरीर का संबंध है, काम। मन का संबंध है, मोह। आत्मा का संबंध है, प्रेम। और परमात्मा का संबंध है, प्रार्थना।

तो कुब्जा पूरी ही आई थी। तुम्हें दिखाई पड़ती है कि उसके सब अंग विकृत हैं, क्योंकि तुम्हारे पास और गहरे देखने की आंख नहीं है।

बड़ी मीठी कथा है, कि जनक ने एक बड़ी शास्त्रार्थ—सभा बुलाई थी। बड़े—बड़े पंडितों को निमंत्रण दिया था। वे सब विवाद के लिए आ गए थे। एक ब्राह्मण को निमंत्रण नहीं दिया गया था, क्योंकि वह सभा के योग्य न था।

हमारे पास शब्द है, सभ्य या सभ्यता। वह सभा से ही बना है। सभ्य का मतलब होता है, सभा में बैठने योग्य। और सभ्यता का मतलब होता है, जो सभा में बैठने योग्य है, वह सभ्यता को उपलब्ध हो गया।

एक ब्राह्मण भर को राजधानी में छोड़ दिया था, निमंत्रण न दिया था। वह था अष्टावक्र। उसका शरीर आठ जगह से तिरछा था। अब आठ जगह से तिरछे आदमी को सभा में बुलाकर क्या और हंसी करवानी? वह चलता, तो लोग हंसने लगते। उसका सारा व्यक्तित्व एक व्यंग्य था। वह कार्टून ज्यादा रहा होगा, बजाय आदमी के। आठ जगह से तिरछा! एकाध जगह से तिरछा होना ही काफी उपद्रव कर देता है, आठ स्थानों से तिरछा था। कैसे चलता था, वह भी एक चमत्कार रहा होगा। उसकी चाल ऊंट जैसी रही होगी। उस पर अगर तुम सवारी करते, तो मुश्किल में पड़ जाते। जैसा ऊंट पर बैठना मुश्किल हो जाता है। बड़े अभ्यास की जरूरत हैं।

लेकिन उसे तो कुछ पता ही नहीं था कि यह सभा हो रही है और विवाद हो रहा है। उसे तो कुछ काम आ गया और पिता को कुछ बात कहनी थी। खोजा, तो पिता घर में न मिले। पूछा, तो पता चला, वे राज—दरबार गए हैं। तो वह पिता को मिलने राज—दरबार पहुंच गया। ऐन वक्त पर उसको छोड़ दिया था, वह ऐन वक्त पर हाजिर हो गया। संयोग की बात।

बड़ा विवाद चल रहा था, ब्रह्मज्ञान की चर्चा चल रही थी। सब रुक गई। लोग हंसने लगे। जैसे ही वह राज—दरबार में प्रविष्ट हुआ, जनक तक को हंसी आ गई। और लोग तो मुंह रोक लिए। उस अष्टावक्र ने चारों तरफ देखा और वह भी खिलखिलाकर हंसा। वह आदमी गजब का था। उस जैसे गजब के आदमी जमीन पर बहुत थोडे हुए हैं, अंगुलियों पर गिने जा सकें।

उसके हंसने से सन्नाटा छा गया दरबार में। क्योंकि किसी ने यह न सोचा था कि वह हंसेगा। जनक ने पूछा, हम क्यों हंसते हैं, वह तो साफ है। तुम क्यों हंस रहे हो? उसने कहा, मैं इसलिए हंसता हूं कि मैंने घर में सुना, मां ने कहा कि पंडितों की बड़ी सभा है, ब्राह्मणों की, ब्रह्मज्ञानियों की। यहां सब चमार इकट्ठे हैं। क्योंकि जिनको चमडी दिखाई पड़ती है, वे चमार हैं। इनमें से आत्मा किसी को दिखाई नहीं पडती। मेरा शरीर आठ जगह से झुका है, यह सच है। लेकिन इनमें एक भी ब्रह्मज्ञानी नहीं है। इन मूढ़ों के साथ क्यों समय खराब कर रहे हो! अगर इनमें एक भी ब्रह्मज्ञानी होता, तो वह मुझे देखता, मेरे शरीर को नहीं।

जनक चरणों पर गिर पड़े अष्टावक्र के। और बात सच थी। ज्ञानी कहीं शास्त्रार्थ के लिए सभाओं में इकट्ठे होते हैं? कि विवाद करने आते हैं? कि प्रतियोगिता जीतने आते हैं? ज्ञानी को अब जीतने को कुछ बचा? और ज्ञानी को कोई पुरस्कार शेष रहा जो जनक दे सकते हैं? जनक के पास क्या रखा है? जिनको दिखाई पड़ता है जनक के पास कुछ है, वे अज्ञानी हैं, तभी दिखाई पड़ता है।

अष्टावक्र तो चला गया, लेकिन जनक के मन में एक आग की लपट छोड़ गया। अष्टावक्र का पीछा किया जनक ने। और जनक की जिज्ञासाओं से इस पृथ्वी पर एक श्रेष्ठतम ग्रंथ का जन्म हुआ, वह है अष्टावक्र—गीता। कृष्ण की गीता भी फीकी है। उसको मैं महागीता कहता हूं। तुम जैसे—जैसे तैयार हो जाओगे, वैसे—वैसे उस पर मैं तुमसे बात करूंगा।

कृष्ण की गीता फीकी है। अष्टावक्र की गीता का कोई मुकाबला। ही नहीं। कारण है, क्योंकि कृष्ण तो एक अज्ञानी से बात कर रहे हैं, अर्जुन से। लेकिन अष्टावक्र ने जो बात की है, वह जनक से है। वह अर्जुन से बहुत ऊंची अवस्था का व्यक्ति है। तभी तो पंडितों की सभा छोड्कर अष्टावक्र के चरणों का दास हो गया। बात समझ में आ गई, एक क्षण में समझ में' आ गई। एक बिजली कौंधी और दृश्य दिखाई पड़ गया कि बात सच है। सब चमार इकट्ठे हैं। फिजूल इनके साथ समय गंवा रहा हूं। बोध जग गया।