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श्रीकृष्ण ने गोपियों को समझाने के लिए उद्धव को वृंदावन भेजा था, पर वे सफल क्यों न हो पाए?


भक्त जब भगवान को मिलता है, तब उसे पुलक और आनंद का अनुभव होता है। क्या भगवान को भी उस क्षण वैसी ही पुलक और आनंद का अनुभव होता है?

भगवान कोई व्यक्ति नहीं जिसको भक्त जैसी पुलक और आनंद का अनुभव हो सके। भगवान तो पूरा ही अस्तित्व है। इसलिए पुलक और आनंद की घटना तो घटती है, लेकिन वहां कोई अनुभव करने वाला नहीं है। जैसे भक्त के छोटे—से हृदय में आनंद गज जाता है, वैसा कोई हृदय परमात्मा का नहीं है, जहां आनंद गंज जाए। परमात्मा तो पूरा अस्तित्व है, इसलिए पूरा अस्तित्व ही पुलक से भर जाता है। इतना फर्क है। पुलक तो घटेगी ही, क्योंकि भटका हुआ घर लौट आया। दूर गया पास आ गया। खो गया था, वापस मिल गया। अस्तित्व की तरफ जिसकी पीठ थी, उसने मुंह कर लिया। तो आनंद की घटना तो घटेगी ही। लेकिन भगवान कोई व्यक्ति नहीं है, वहां कोई व्यक्ति के भीतर छिपा हुआ हृदय नहीं है। इसलिए जैसा अनुभव भक्त को होगा, वैसा कोई अनुभव करने वाला भगवान में नहीं है। वह तो परम शून्यता है।

पुलक होगी; वह पुलक बादलों में सुनी जाएगी; वह पुलक नदियों में गूंजेगी; वह पुलक फूलों से खिलेगी; वह पुलक चांद—तारों में ज्योति देगी। लेकिन कोई हृदय नहीं है, जो अनुभव करेगा। या तुम ऐसा कहो—वह भी कहना ठीक है—कि ह्रदय ही हृदय है; सारा अस्तित्व उसका हृदय है। सारा अस्तित्व एक सिहरन से, एक आनंद की मधुर घड़ी से भर जाएगा।

इसे भक्त ही जान पाएगा; तुम न पहचान पाओगे। तुम्हें भक्त का आनंद तो दिखाई पड़ेगा, क्योंकि भक्त तुम्हारे जैसा ही व्यक्ति है। उससे तुम्हारा 'थोड़ा तालमेल है। वह कितना ही भिन्न हो गया हो, उसकी यात्रा बदल गई हो, उसने परमात्मा की तरफ मुंह कर लिया हो, तुमने पीठ कर रखी है, तो भी वह तुम्हारे जैसा है, व्यक्ति है। उसके हृदय में कुछ घटेगा; आंसू बहेंगे, तो तुम आंसुओ को पहचान सकते हो। वह नाचने लगेगा, तो तुम नाच को समझ सकते हो। उसके चेहरे पर अहोभाव की छाया पड़ेगी, तो पूरा न समझ सको, तो भी थोड़ा तो समझ ही लोगे। वह भाषा तुमसे परिचित है। लेकिन परमात्मा में जो पुलक घट रही है, वह तुम न देख पाओगे; वह तुम न समझ पाओगे।

इसलिए तो बहुत—सी कथाएं हैं, जो कथाएं जैसी मालूम होने लगी है; वे सत्य घटनाएं है। कि बुद्ध को परम ज्ञान हुआ और वृक्षों में फूल खिल गए, बिना ऋतु के। ये फूल दूसरों ने देखे हों, यह संदिग्ध है। ये फूल बुद्ध ने ही देखे होंगे। ये फूल साधारण फूल न थे, जो रोज ऋतु में खिलते हैं और गिरते हैं। ये तो वृक्ष के अंतर्भाव के फूल थे। इन्हें तुम बाजार में न बेच सकते थे, इन्हें तुम तोड़ भी न सकते थे, इन्हें तुम देख भी न सकते थे। ये तो अदृश्य के फूल थे, जो बुद्ध को दिखाई पड़े होंगे।

कहते हैं, मोहम्मद को जब ज्ञान हुआ, तो रेगिस्तान की तपती दुपहरियों में बादल उन्हें छाया देने लगे। मगर ये बादल किसी और को दिखाई न पड़े होंगे। ये बादल जो छतरियां बन गए और मोहम्मद के ऊपर मंडराने लगे, यह मोहम्मद ने ही खबर की होगी औरों को। तुम्हारी आंखें इतनी सूक्ष्म घटना को न देख पाएंगी। वस्तुत: कोई बादल बने भी, यह भी जरूरी नहीं है। लेकिन छाया मोहम्मद को मिलने लगी, यह पक्का है। तपती दुपहरी में भी सूरज जलाता नहीं, भयंकर रेगिस्तान में भी कंठ में प्यास नहीं जगती, ऐसी शीतलता मोहम्मद को मिलने लगी। एक संवाद शुरू हो गया अस्तित्व के साथ।

निश्चित ही, जब तुम प्यार से भरोगे अस्तित्व के प्रति, तो अस्तित्व भी अपने प्यार को तुम्हारी तरफ लुटाका। अस्तित्व जड़ नहीं है, यही तो मतलब है कहने का कि अस्तित्व परमात्मा है। अगर जड़ होता, तो तुम रोओ, तो पत्थर रोएगा नहीं; उसमें कोई संवेदना नहीं है। तुम हंसो, तो पत्थर हंसेगा नहीं। पत्थर से कोई प्रत्युत्तर न मिलेगा। यही तो मतलब है पत्थर होने का।

तो हम कभी कहते हैं कि उस आदमी का हृदय पाषाण है। उसका क्या मतलब होता है? इतना ही मतलब होता है। कहीं पाषाण के हृदय होते हैं! इतना ही मतलब होता है कि उसमें से प्रतिसवेदन नहीं उठता। वह तुम्हें दुखी देखकर दुखी न होगा। तुम्हारी गीली आंखें उसके हृदय को गीला न करेंगी। तुम्हारा नाच उसे छुएगा नहीं। तुम्हारे भाव तुम्हारे ही रहेंगे; वह कोई प्रत्युत्तर न देगा। उसका हृदय पाषाण है।

इस अस्तित्व को परमात्मा कहने का अर्थ है कि यहां पाषाण कुछ भी नहीं है। पाषाण झूठा शब्द है। यहां पत्थर भी आंदोलित होते हैं। क्योंकि सभी तरफ सचेतन, सभी तरफ चैतन्य का विस्तार है।

तो प्रतिसवेदना होगी। लेकिन इतनी सूक्ष्म है वह घटना कि भक्त ही जान पाएगा कि भगवान को क्या हो रहा है, साधारणजन न पहचान पाएंगे। क्योंकि वे करीब—करीब अंधे हैं, बहरे हैं। न तो उनके पास कान हैं उस अमृत—नाद को सुनने के, न उनके पास आंखें हैं उस अरूप को देखने की।

इसलिए तुम्हें मीरा नाचती हुई दिखाई पड़ेगी और तुम्हें मीरा थोड़ी पागल भी मालूम पड़ेगी। क्योंकि जिसके साथ वह नाच रही है, वह तुम्हें दिखाई नहीं पड़ता। मीरा तो अपने कृष्ण के साथ नाच रही है। वह कृष्ण कोई व्यक्ति नहीं है। हवाओं के झोंके में भी वही कृष्ण हैं; हवा छूती है मीरा को, तो कृष्ण के हाथ ही छूते हैं। और मैं तुमसे कहता हूं कि निश्चित जब तुम्हारे पास मीरा का हृदय होगा, तो हवा तुम्हें और ढंग से छुएगी। छूने—छूने में कितना फर्क है!

राह से तुम चलते हो और एक आदमी से शरीर छू जाता है; फिर तुम्हारी प्रेयसी तुम्हें छूती है या तुम्हारी मां तुम्हारे सिर को छूती है या तुम अपने बेटे को छूते हो। दोनों छूना एक—से हैं। अगर हम शरीरशास्त्री से पूछें कि जांच करके बताओ कि दोनों तरह के स्पर्श में कोई फर्क है?

वह कोई फर्क न बता पाएगा। वह कहेगा, दोनों स्थितियों में चमड़ी चमड़ी को छूती है। थोड़े—से ताप का आदान—प्रदान होता है। गरमी एक शरीर से दूसरे शरीर में थोड़ी—सी जाती है। बस, इतना ही। मां छुएगी, तो भी यही होता है। राह पर चलता राहगीर छू लेगा, तो भी इतना ही होता है। कोई प्रेम से थपथपाएगा, तो भी यही होता है। कोई क्रोध से मारेगा, तो भी यही होता है। जहां तक शरीरशास्त्री की पकड़ है, दोनों एक—सी घटनाएं हैं।

हवा का झोंका तुम्हें भी छूता है, मुझे भी छूता है, मगर तुम्हें ऐसे ही छूता है जैसे राह पर कोई अजनबी से धक्का लग गया। मीरा को भी छूता है, लेकिन वह प्रेमी का हाथ है। उस झोंके में कुछ आया है। उस झोंके में सिर्फ स्पर्श नहीं है, स्पर्श के पीछे छिपा हुआ राज है, एक भाव—दशा है।

वृक्षों में फूल तुम्हें भी खिलते हैं, तुम भी देख लेते हो उनके रंग—रूप को। मीरा भी देखती है, लेकिन वहां वृक्षों में उसका प्रेमी ही खिल रहा है। आषाढ़ आता है, मोर नाचते हैं। तुम भी देख लेते हो, पर मीरा के लिए उसका कृष्ण ही नाचता है। असल में मीरा के लिए सारा अस्तित्व कृष्ण—रूप हो गया.। इसलिए अब जो भी होता है, वह कृष्ण में ही हो रहा है। और पूरी भाषा बदल जाती है, पूरे अर्थ बदल जाते हैं।

अगर मनोवैज्ञानिकों को कहो कि मीरा के पदों का विश्लेषण करो, तो तुम बहुत धक्का खाओगे। क्योंकि मनोवैज्ञानिक जो बातें कहेंगे, उनका तुम्हें भरोसा भी न आएगा। चाहे भरोसा न आए, लेकिन तुम्हारा भी भीतर भरोसा वही है।

जब मीरा कृष्ण की बात कहती है और कहती है, सेज सजा ली है, फूल बिछा दिए हैं, अब तुम आओ। तो मनोवैज्ञानिक कहेगा, यह तो कुछ काम—दमन मालूम पड़ता है; यह तो सेक्स सप्रेशन है। यह तो कृष्ण में पति को ही खोज रही है। ऐसा लगता है, राणा से मन नहीं भर पाया। ऐसा लगता है, कुछ बात चूक गई; काम अतृप्त रह गया। वह जो शरीर की वासना थी, वह प्रकट नहीं हो पाई, वह दब गई। और अब वही शरीर की वासना नए भ्रम बन रही है। तो कृष्ण को पति मान रही है, सेज सजा रही है।

यह सेज का सजाना और बुलाना, यह कामवासना मालूम पड़ेगी मनसविद को। वह तो मनोवैज्ञानिकों ने अभी मीरा पर कृपा नहीं की है। उनको मीरा का ज्यादा पता नहीं है, क्योंकि मनोविज्ञान का जन्म पश्चिम में हो रहा है। यहां भी मनोवैज्ञानिक हैं, लेकिन वे अधकचरे हैं और वे, पश्चिम में जो होता है, उनके पीछे चलते हैं। वे सीधे कुछ करते नहीं।

लेकिन उन्होंने जीसस की काफी खोज—खबर ली है। और मीरा जैसी स्त्रियां पश्चिम में हुई हैं, उनकी उन्होंने काफी खोज—खबर ली है। संत थेरेसा हुई है पश्चिम में। मनोवैज्ञानिकों ने उसका विश्लेषण किया है। वह ठीक मीरा है पश्चिम की। और उसके प्रतीक तो सब कामवासना के हैं। करोगे भी क्या! मनुष्य के पास जितने भी मधुर शब्द हैं, सभी कामवासना के हैं। जब वह परम मधुरिमा घटती है, तो कौन से शब्दों का उपयोग करोगे?

दो ही तरह की भाषाएं हैं तुम्हारे पास। या तो बाजार की भाषा है, वह बहुत ही क्षुद्र है। उस भाषा में तो परमात्मा को पकड़ा नहीं जा सकता। और या फिर दो प्रेमियों की स्वात की भाषा है। वह जरा कम क्षुद्र है, लेकिन है तो क्षुद्र ही, क्योंकि वे प्रेमी भी बाजार के ही रहने वाले लोग हैं।

और जब मीरा जैसी घटना घटती है या थेरेसा जैसी, तो वह क्या करे? भाषा कहां से लाए? तुम्हारे बाजार की भाषा का उपयोग करे, तो बिलकुल ही व्यर्थ मालूम होती है। क्या कहे कि परमात्मा के झोंके में लाखों रुपये आ गए! क्या कहे कि पूरा रिजर्व बैंक उलटा दिया परमात्मा के झोंके में!

वह भी भद्दा लगेगा; वह भी कुछ सार्थक न मालूम पड़ेगा। तुम उसे भी न पकड़ पाओगे। ज्यादा से ज्यादा इतना ही होगा कि इनकम टैक्स आफिसर मीरा के पीछे पड़ जाएंगे कि कहां हैं? वे करोड़ों रुपये कहां हैं?

दूसरी भाषा प्रेम की है, जो प्रेमी एक—दूसरे से बोलते हैं। वह बड़ी निजी है। लेकिन उसमें कामवासना की धुन पकड़ में आती है। तड़पते हैं प्रेमी, राह देखते हैं, मिलन होता है, अहोभाव से भरते हैं। वही भाषा समझ में आती है। मीरा उसका उपयोग करती है, थेरेसा ने भी उसका उपयोग किया है।

पश्चिम के मनोवैज्ञानिकों ने बड़ी छीछालेदर की है थेरेसा की। वही वे मीरा के साथ करेंगे। उनको मीरा का पता नहीं है। वे कहते हैं, यह तो कामवासना है। वे तो हर चीज में कामवासना खोज लेते हैं, क्योंकि दूसरी तो किसी चीज का पता ही नहीं है।

यह सेज सजी है, पिया घर नहीं आए। ये फूल बिछा रखे हैं, मैं तुम्हारी राह देखती हूं। तुम आओ, सुहागरात के लिए तैयारी है। अब यह सारी भाषा तो प्रेम की है। या तो हम कहेंगे कि मीरा का मन कामवासना से ग्रस्त है, इसलिए परमात्मा के नाम पर वही वासना निकल रही है। या हम समझेंगे, मीरा पागल है। क्योंकि हम मीरा की बिछी हुई सेज देख सकते हैं, पड़े हुए फूल देख सकते हैं, मीरा बैठकर रोती है, किसी की प्रतीक्षा करती है, यह भी देख सकते हैं। लेकिन वह कभी आता है? कभी आया है? कभी आएगा? उसकी हम द्वार पर दस्तक भी नहीं सुनते।

मीरा को फिर हम कभी रोते भी देखते हैं कि उसका विरह हो गया है और कभी नाचते भी देखते हैं कि मिलन हो गया। न तो हमें विरह के क्षण में कोई उसके घर से जाता दिखाई पड़ता, और न मिलन के क्षण में कोई घर आता दिखाई पड़ता।

मीरा पागल है। लोग खूब हंसे होंगे मीरा पर। इसलिए तो मीरा कहती है, सब लोक—लाज खोई। इज्जत सब चली गई। राणा ने जो बार—बार मीरा को जहर के प्याले भेजे, वह इसीलिए कि उसकी भी इज्जत इसके पीछे डूबती थी।

यह किस प्रेमी की बात कर रही है? यह किस कृष्ण के पीछे दीवानी है? लोग इसको तो पागल समझते या रुग्ण समझते या मनोविकार से ग्रस्त समझते। पति भी मुश्किल में पड़ा हुआ था। हमने जहर तो आते देखा, हमने मीरा को जहर पीते भी देखा, लेकिन मीरा पर हमने उस जहर का असर होते नहीं देखा। तब जरा हम बेचैन हुए। यह तो अनूठी बात है। यह कैसे असर न हुआ? अगर तुम मनसविद से पूछोगे, उसके पास इसके लिए भी व्याख्या है। वह कहता है, यह भी आत्म—सम्मोहन है। अगर मीरा को पक्का भरोसा है कि यह जहर नहीं है या परमात्मा की कृपा से यह अमृत हो जाएगा, तो इस भरोसे के कारण ही जहर शरीर में प्रवेश नहीं कर पाता। मनोवैज्ञानिक उसके लिए भी कुछ न कुछ तो व्याख्या खोजेगा!

हम परमात्मा से बचने को इस तरह आतुर हैं कि हम सब मान सकते हैं, व्यर्थ से व्यर्थ बात मान सकते हैं, परमात्मा को नहीं मान सकते।

मनोवैज्ञानिक कहता है कि यह तो मन का इतना प्रगाढ़ रूप से भाव है कि यह जहर नहीं है, इसलिए शरीर में जहर प्रवेश नहीं करता, मन के कारण ही। कोई कृष्ण थोड़े ही जहर को अमृत में बदल रहे हैं!

जहर भी अमृत में बदल जाए, तो भी हम अंधे हैं; तो भी हम कोई व्याख्या अपनी ही खोज लेंगे। इतनी बड़ी घटना भी हमें तृप्त नहीं कर पाएगी। उसका कारण है, हमें वह कृष्ण दिखाई नहीं पड़ता। और अनदेखे को हम कैसे मान लें? इतने मूढ़ हम कैसे हो जाएं?

घटना तो घटती है। जब भक्त भगवान को मिलता है, तो जितनी पुलक भक्त में घटती है, अगर तुम मुझ से ठीक पूछो, तो उससे अनंत गुना पुलक भगवान में घटती है। घटनी ही चाहिए; क्योंकि अनंत गुना है भगवान भक्त से। भक्त तो एक बूंद है, भगवान तो एक सागर है। अगर बूंद इतनी नाचती है, तो तुम सोचो, सागर कितना नाचता होगा!

लेकिन वह कोई व्यक्ति नहीं है। यह सारी समष्टि वही है। इसलिए वह सब रूपों में नाचता है, सब रूपों में हंसता है, सब रूपों में पुलकित होता है। हरियाली में और हरा हो जाता है। रंग में और रंगीन हो जाता है। इंद्रधनुष में और गहरा हो जाता है। लेकिन वह दिखाई पड़ता है उसी को, जिसके हृदय में अहोभाव भरा है, जो नाच रहा है आज। उसे परमात्मा साथ ही नाचता हुआ दिखाई पड़ता है।

यही तो अर्थ है कि सोलह हजार गोपियां नाचती हैं और प्रत्येक गोपी को लगता है कृष्ण उसके साथ नाच रहे हैं। कृष्ण अगर व्यक्ति हों, तो एक ही गोपी के साथ नाच सकते। कृष्ण कोई व्यक्ति नहीं हैं। कृष्ण तो एक तत्व का नाम है। वह तत्व सर्वव्यापी है। जब तुम नाचते हो और तुम नाचने की क्षमता जुटा लेते हो, तब तुम अचानक पाते हो कि सारा अस्तित्व तुम्हारे साथ नाच रहा है।

फिर अस्तित्व बहुत बड़ा है, वह दूसरों के साथ भी नाच रहा है। इसलिए भक्त को कोई ईर्ष्या पैदा नहीं होती। अन्यथा तुम सोच सकते हो कि सोलह हजार स्त्रियों ने क्या गति कर दी होती कृष्ण की! अगर यह बात साधारण संसार की बात हो, जैसा कि इतिहासविद मानते हैं.।

और यह कठिन नहीं है, सोलह हजार स्त्रियां हो सकती हैं; उस जमाने में हुआ करती थीं। अभी निजाम हैदराबाद मरा, तब उसकी पांच सौ स्त्रियां थीं। बीसवीं सदी में अगर पांच सौ हो सकती हैं, तो सोलह हजार कोई ज्यादा तो नहीं हैं। सिर्फ बत्तीस गुनी। कोई बहुत बड़ा गणित नहीं है। आज से पाच हजार साल पहले सोलह हजार स्त्रियां हो सकती थीं। सम्राटों के पास होती थीं। जितनी सुंदर स्त्रियां होतीं, वे सब इकट्ठी कर लेते पूरे राज्य से। यह कठिन नहीं है।

लेकिन सोलह हजार स्त्रियां! अगर तुम्हें एक भी स्त्री का अनुभव है, तो तुम समझ सकते हो। कृष्ण की हत्या कर दी होती, अगर कृष्ण कोई व्यक्ति हैं। सोलह हजार स्त्रियां कितनी भयंकर ईर्ष्या से न भर गई होतीं। और कृष्ण एक के साथ नाच सकते, कोई एक राधा हो जाती और बाकी पिछड़ जातीं। उपद्रव खड़ा होता। लेकिन कोई ईर्ष्या पैदा न हुई।

यह बड़ी मीठी कथा है कि गोपियों में कोई ईर्ष्या पैदा न हुई। उनका विरह भी साथ—साथ था, उनका मिलन भी साथ—साथ था। क्योंकि कृष्ण कोई व्यक्ति नहीं हैं, तत्व की बात है। सारा अस्तित्व है, जहां भी तुम नाचो, अस्तित्व तुम्हें घेरे हुए है। कृष्ण के हाथ तुम्हारे गले में पड़े हैं। आलिंगन है—हवा में, धूप में।

सब तरफ से कृष्ण तुम्हें घेरे हुए हैं। वे तुम्हारे साथ नाचने को तैयार हैं। बस, तुम्हारे पैरों के उठने की कमी है। तुम जरा नाच सीख लो, परमात्मा नाचने को राजी है। तुम जरा हंसना सीख लो, परमात्मा हंसने को राजी है। तुम रोओगे, तो अकेले रोओगे; तुम हंसोगे, तो सारा अस्तित्व तुम्हारे साथ हंसेगा। क्योंकि परमात्मा रो नहीं सकता। इसे थोड़ा समझ लो।

परमात्मा दुखी नहीं हो सकता। इसलिए जब मैं कहता हूं कि जब भक्त आनंदित होता है, तो पूरा अस्तित्व आनंदित होता है। लेकिन तुम यह मत सोचना कि जब भक्त रोता है, तो पूरा अस्तित्व रोता है। पूर्ण रोना जानता ही नहीं। पूर्ण की कोई पहचान ही रोने से, रुदन से, उदासी से नहीं है। पूर्ण का कोई संबंध ही दुख—पीड़ा से नहीं है। कहावत है कि जब तुम हंसते हो, तब सारा अस्तित्व तुम्हारे साथ हंसता है। जब तुम रोते हो, तब तुम अकेले रोते हो। रोना निजी है, व्यक्तिगत है।

इसलिए तो जब तुम रोना चाहते हो, तो तुम अकेले होना चाहते। हो। द्वार—दरवाजा बंद कर लेते हो। तुम नहीं चाहते कोई आए। तुम। नहीं चाहते कि पत्नी भी भीतर आए। तुम चाहते हो, अकेला छोड़ दो, बिलकुल अकेला छोड़ दो। क्योंकि रोना निजी घटना है।

लेकिन जब तुम हंसते हो, तब तुम पास—पड़ोस के लोगों को बुला लेते हो। जब तुम हंसते हो, तब तुम निमंत्रण भेज देते हो। जब तुम आनंद में होते हो, तब तुम भोज का आयोजन कर लेते हो, कि आएं मित्र, पड़ोसी, संबंधी, हम सब साथ ही नाचे, हम सब साथ ही प्रसन्न हों।

प्रसन्नता निजी नहीं है, फैलती है, विस्तीर्ण होती है। दुख निजी है, सिकुड़ता है, सड्ता है। तुम अकेले ही दुखी रह जाते हो। और अचानक तुम पाते हो कि सारे जगत से तुम्हारा तालमेल टूट गया। जितने तुम ज्यादा दुखी हो, उतना ही परमात्मा से दूर। या उलटा चाहो तो उलटा कहो, जितने तुम परमात्मा से दूर, उतने ज्यादा दुखी। वे दोनों एक ही बातें हैं। जितने तुम परमात्मा के पास, उतने तुम सुखी। दूसरी बात भी सही है, जितने तुम सुखी, उतने तुम परमात्मा के पास।

इसलिए मेरी शिक्षा आनंद की है। मैं तुम्हें उदास नहीं बनाना चाहता कि तुम आंखें बंद करके ध्यान लगाकर उदास होकर, मुरदा होकर बैठ जाना लंबे चेहरे करके; कि तुम कोई बहुत बड़ा काम कर रहे हो, कि तुम जैसे परमात्मा पर कोई अनुग्रह कर रहे हो, कि तुम्हारी बड़ी कृपा है कि घंटे भर तुम चेहरा बनाकर, हाथ में माला लेकर और पत्थर की तरह बैठे रहते हो। नहीं, पत्थर बहुत हैं। तुम्हारे और पत्थर होने की जरूरत नहीं है। तुम नाचो।

मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं, ये आपके ध्यान कैसे हैं? क्योंकि हम तो यही सोचते थे कि आख बंद करके पद्यासन जमाकर और शांत होकर बैठ जाना है। नाचना! संगीत! यह ध्यान कैसा?

मैं उनसे कहता हूं कि तुमने कभी परमात्मा को ऐसा बैठा देखा है उदास? चारों तरफ देखो, पक्षी गीत गा रहे हैं, हवा नाच रही है, वृक्षों की पुलक का क्या कहना! समारंभ चल रहा है, उत्सव चल रहा है। तुम इसके भागीदार होना चाहते हो? नाचो! नाचो कि मोर फीके पड़ जाएं। गाओ कि पक्षी चुप होकर सुनने लगें। पुलकित हो उठो कि हवाएं झेंप जाएं। तभी तुम परमात्मा के निकट आओगे। जो आनंदित है, वह निकट आ जाता है; जो निकट आ जाता, वह महा आनंद से भर जाता। जैसे—जैसे तुम निकट आते हो, वैसे—वैसे तुम पाते हो कि यह उत्सव तुम्हारा नहीं है, यह उत्सव तो सब का है।

धर्म उत्सव है। और मंदिर दुष्टों के हाथ में पड़ गए हैं; वे उदास लोगों के हाथ में पड़ गए हैं। कुछ कारण हैं।

उदास लोग आक्रामक हो जाते हैं। और आक्रामक लोग बकवासी हो जाते हैं। आक्रामक लोग दूसरों पर कब्जा करने लगते हैं। आक्रामक लोग दूसरों को रास्ता बताने लगते हैं। जो उदास हैं, वे दूसरों को उदास करने में रस लेने लगते हैं।

लेकिन महावीर उदास नहीं हैं, न बुद्ध उदास हैं। कृष्ण तो बिलकुल ही नहीं; उनके होंठों पर बांसुरी रखी है। लेकिन मैं तुमसे कहता हूं बुद्ध के होंठों पर भी बांसुरी रखी है। अदृश्य है, तुम्हें दिखाई नहीं पड़ती। मैंने देखी है, इसलिए कहता हूं।

जब भी कोई बुद्ध हुआ है, होंठ पर बांसुरी जरूर रही है, दिखाई पड़े, न दिखाई पड़े। कृष्ण की बांसुरी दिखाई पड़ती है; बुद्ध की बांसुरी दिखाई नहीं पड़ती। लेकिन उस बोधि—वृक्ष के नीचे भी वेणु बज रही है, गीत उठ रहा है। बुद्ध को तुमने शांत बैठे देखा है। वह तुम्हारी भांति है। तुम अगर गौर से देखते, तो तुम उस भीतर के नाच को देख लेते। जब भी कोई परमात्मा को पाया है, नाचा है। और जब भी कोई नाचा है, तो परमात्मा तो नाच ही रहा है, वह तत्‍क्षण तुम्हारे साथ हो जाता है; उसकी गलबहियां तुम्हारे कंधों पर पड़ जाती हैं।

लेकिन परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं है, इसे खयाल रखना। परमात्मा यानी समष्टि।

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हो ही न सकते थे, बात ही संभव न थी। उद्धव थे ज्ञानी, और ज्ञान कब प्रेमियों को समझा पाया है? कृष्ण ने मजाक किया होगा। ज्ञानी को भेजकर मजाक किया। ज्ञानी कभी प्रेमी को नहीं समझा सकता, क्योंकि ज्ञानी के पास होते हैं शब्द कोरे। पंडित थे उद्धव; बड़े पंडित होगे, कुशल होंगे समझाने में। लेकिन उन्होंने जिनको समझाया होगा तब तक, वे गोपियां नहीं थीं, जिनको प्रेम का रस लग गया था।

पंडित तभी तक तुम्हें सार्थक मालूम होगा, जब तक तुम्हें प्रेम का रस नहीं लगा। प्रेम के काटे को पंडित नहीं झाडू सकता। पंडित उन्हीं को झाड़ सकता है, जो प्रेम के काटे नहीं हैं। पंडित उनके काम का है, जिनकी प्यास ही नहीं जगी। पंडित उनको बडा महापंडित मालूम होता है, कितनी जानकारी लाता है! लेकिन जिसको प्यास जग गई, और प्रेम की भनक पड़ गई, और जिसके हृदय में कोई धुन बजने लगी अशांत की, पंडित कूड़ा—कर्कट है। उद्धव व्यर्थ थे।

मेरी जो समझ है, वह यह है कि उन्होंने उद्धव को गोपियों को समझाने भेजा ही नहीं था; उद्धव को समझने भेजा था गोपियों को। ऐसा किसी ने कभी कहा नहीं, लेकिन मेरी यही समझ है। वह उद्धव को मूर्ख बनाया, उसको अकल दी, कि तू जरा जा! यहां तू बड़ा पंडित हुआ जा रहा है। क्योंकि जिनको तू समझा रहा है, उनको प्रेम का रस ही नहीं लगा है, उनकी प्यास ही नहीं जगी है। तो तू ज्ञान की बातें कर, वे सिर हिलाते हैं। जब प्रेमी मिलेगा, तब तुझे अड़चन आएगी, तब तेरी ज्ञान की बातें जरा भी काम न आएंगी। जिसको प्यास लगी है, तुम पानी का शास्त्र समझाओगे, क्या फल होगा? वे कहेंगे, पानी चाहिए।

गोपियों ने कहा, कृष्ण चाहिए, तुम किसलिए आए हो? उद्धव बड़े बुद्ध बने। जाना ही नहीं था, अगर थोड़ी अकल होती। लेकिन पंडित में अकल होती ही नहीं। पंडित से ज्यादा बेअकल आदमी नहीं होता। जाना ही नहीं था, पहले ही हाथ जोड़ लेना था, कि गोपियों के? मैं जाने वाला नहीं। क्योंकि वहां हम व्यर्थ ही सिद्ध होंगे।

वे कृष्ण को मांगती थीं, उद्धव को नहीं। संदेशवाहक नहीं चाहिए; चिट्ठी—पत्री लाने से क्या होगा! बुलाया था प्रेमी को, आ गया पोस्टमैन! इनसे क्या लेना—देना है? उन्होंने उद्धव को बैरंग भेज दिया वापस।

वह उद्धव को समझाने के लिए ही कृष्ण ने खेल किया होगा। इतना तो पक्का था कि गोपियां नहीं समझाई जा सकतीं, कृष्ण तो समझते हैं कि नहीं समझाई जा सकतीं। कृष्ण से कम पर वे राजी न होंगी।

प्रेमी का अर्थ है, परमात्मा से कम पर जो राजी न होगा। तुम परमात्मा के संबंध में समझाओ, प्रेमी कहेगा, क्यों व्यर्थ की बातें कर रहे हो? परमात्मा के संबंध में नहीं जानना है उसे। उसे परमात्मा को जानना है।

परमात्मा के संबंध में वेद क्या कहते हैं, उपनिषद क्या कहते हैं, शास्त्रों में क्या लिखा है, क्या नहीं लिखा है! वह कहेगा, बंद करो यह बकवास। मुझे परमात्मा चाहिए। परमात्मा मिल गया, तो मुझे वेद मिल गए। परमात्मा ही मेरा वेद है।

लेकिन पंडित कहता है, वेद भगवान! पंडित वेद को भगवान! बतलाता है। प्रेमी को भगवान ही वेद है। और बड़ा फर्क है; जमीन—आसमान का फर्क है। तुम मांगते हो भगवान को, वह ले आता है वेद की पोथियों को। वह कहता है, सब इसमें लिखा है।

यह ऐसे ही है, जैसे कोई भूखा मर रहा हो और तुम जाकर पाक—शास्त्र का ग्रंथ सामने रख दो और कहो कि सब तरह के भोज—मिष्ठान्न, सब इसमें लिखे हैं। वह तुम्हारे पाक—शास्त्र को उठाकर फेंक देगा भूखा आदमी। ही, भरा पेट होगा, तो विश्राम से बैठकर पाक—शास्त्र को पड़ेगा। लेकिन भूखे को पाक—शास्त्र का क्या अर्थ है?

जिसको परमात्मा की भूख लग गई है, वेद व्यर्थ है, उपनिषद बकवास है, गीता असार है। वह परमात्मा को चाहता है; उससे कम पर वह राजी नहीं है। और गोपियां न केवल परमात्मा को चाहती थीं, बल्कि उनको परमात्मा का स्वाद भी लग गया था, वे परमात्मा को जान भी चुकी थीं।

हां, जिसने न जाना हो परमात्मा को, उसको प्यास भी लगी हो, तो शायद थोड़ी—बहुत देर पंडित उसको भरमा ले। क्योंकि उसके पास कोई कसौटी तो नहीं है अनुभव की। इसलिए अज्ञानी को पंडित भरमा लेता है। लेकिन जिसको ध्यान की जरा—सी भी भनक आ गई, फिर पंडित उसको नहीं भरमा सकता।

ये गोपिया कृष्ण के साथ नाच चुकी थीं; वह उनकी स्मृति में संजोया हुआ मंदिर था। वह स्मृति भूलती नहीं थी, बिसरती नहीं थी। वह तो निशि—वासर, दिन—रात भीतर कौंधती रहती थी। एक दफा जिसने चख लिया कृष्ण का साथ, नाच लिया कृष्ण के साथ वृक्षों के तले पूर्णिमा की रातों में, अब इसे पंडित धोखा नहीं दे सकता, भरमा नहीं सकता।

उद्धव खूब समझाए होंगे, ज्ञान की बातें की होंगी। गोपियों ने उनकी जरा भी न सुनी। बल्कि गोपिया नाराज हुईं कि कृष्ण ने यह कैसा मजाक किया! यह बरदाश्त के बाहर है। और प्रेमी परमात्मा से नाराज हो सकता है, सिर्फ प्रेमी! पंडित कभी नहीं नाराज हो सकता। पंडित तो डरता है। प्रेमी थोड़े ही डरता है, प्रेम तो अभय है। गोपियां नाराज हुईं। यह मजाक बरदाश्त के बाहर है। इस उद्धव को किसलिए भेजा? इससे क्या लेना—देना है? आना हो, कृष्ण आ जाएं; कम से कम पंडितों को तो न भेजें। परमात्मा चाहिए, शास्त्र नहीं; ज्ञान नहीं, अनुभव चाहिए। गोपिया बहुत नाराज हुईं। प्रेमी नाराज हो सकते हैं।

मैंने यहूदी फकीर झुसिया का जीवन पढ़ा है। वह प्रार्थना करने जाता—बड़ा फकीर था; बड़े उसके भक्त थे, अनूठा आदमी था—वह जब यहूदी मंदिर में प्रार्थना करता, तो कभी—कभी लोगों से कह देता, अब तुम बाहर हो जाओ, सुनने वालों से। इस परमात्मा के बच्चे को ठीक करना ही पड़ेगा। तुम बाहर हो जाओ। एक सीमा है बरदाश्त की।

लोग बाहर हो जाते, तब उसका झगड़ा शुरू होता। वह परमात्मा से सीधी—सीधी बातें करता। झगड़ा ऐसा होता कि मौका आ जाए, तो मार—पीट हो जाए। अगर गॉव में कोई भूखा मर रहा है, तो वह गुस्से में आ जाता। वह कहता कि तेरे रहते यह कैसे हो रहा है? तेरा प्रेमी भूखा मर रहा है, यह हम बरदाश्त नहीं कर सकते। हम तेरी सब पूजा—पत्री बंद कर देंगे।

कहते हैं, झुसिया जैसा आदमी यहूदी परंपरा में नहीं हुआ। कैसा उसका गहन प्रेम रहा होगा कि परमात्मा से लड़ने को राजी है। कलह हो जाए; कई दिन तक मंदिर ही न जाए फिर वह। कि पड़ा रहने दो उसको वहीं; कोई पूजा मत करो, कोई प्रार्थना मत करो। जब हमारी नहीं सुनी जा रही है, हम भी क्यों उसकी सुनें!

झुसिया ने कहा है अपनी प्रार्थनाओं में कि देख, तू एक बात ठीक से समझ ले; हमें तेरी जरूरत है, वह पक्का; तुझे भी हमारी जरूरत है! इसलिए तू यह मत समझ कि तू हम पर कोई अनुग्रह कर रहा है। हमारे बिना तू भगवान न होगा। भक्त के बिना भगवान कैसे होगा? माना कि हम भक्त न होंगे, वह भी ठीक। लेकिन तू भी भगवान न होगा। जितनी हमें तेरी जरूरत है, उतनी तुझे हमारी जरूरत है। इसका सदा खयाल रख; इसको भूल मत जा।

प्रेमी लड़ सकता है, प्रेमी ही लड़ सकता है, भय नहीं है। पंडित तो डरता है, कंपता है। पंडित तो देखता है, कहीं क्रियाकांड में कोई भूल न हो जाए; कि शास्त्र में जैसी विधि लिखी है, वैसी पूरी होनी चाहिए। उसमें कहीं भूल—चूक न हो जाए। पता नहीं परमात्मा नाराज हो जाए।

इसने परमात्मा को जाना नहीं। परमात्मा कहीं नाराज होता है? यह पहचाना ही नहीं। यह मूढ़ है। इसे पता ही नहीं कि परमात्मा नाराज होता ही नहीं। नाराज होने जैसी घटना परमात्मा में घटती ही नहीं। और उस घड़ी में, जब कोई झुसिया जैसा भक्त परमात्मा को कहता होगा कि बंद कर देंगे तेरी प्रार्थना, तो परमात्मा नाचता होगा कि जरूर कोई प्रेमी मौजूद है।

गोपियां बहुत नाराज हुईं उद्धव पर। और उन्होंने उनको बैरंग ही भेज दिया कि तुम जाओ, तुम्हें किसने बुलाया? और वे खूब हंसी उद्धव पर, उनकी ज्ञान की बातों पर। पंडित खूब बुद्ध बना होगा। पंडित सदा ही प्रेमी के पास आकर मुश्किल में पड़ जाएगा। यह कथा बड़ी प्रतीकात्मक है।

पंडित कभी भी सफल नहीं हो सकता प्रेमी के सामने। अगर वह सफल होता दिखाई पड़ता है, तो उसका कुल कारण इतना है कि प्रेमी मौजूद नहीं है; परमात्मा को कोई खोज नहीं रहा है। इसलिए पंडित तुम्हें सब तरफ सिंहासनों पर बैठे दिखाई पड़ते हैं।

तुम जिस दिन परमात्मा को खोजोगे, उसी दिन पंडित सिंहासनों से नीचे उतर जाएंगे; उनकी कोई जगह नहीं है। तब तो तुम उसे सिंहासन पर विराजमान करोगे, जो ज्ञान नहीं, अनुभव दे सकता है; जो तुम्हें परमात्मा के संबंध में नहीं बताता, जो तुम्हें परमात्मा बता सकता है। उसको ही हमने गुरु कहा है।

इसलिए कबीर कहते हैं, गुरु गोविंद दोई खड़े, काके लागू पाय। दोनों सामने खड़े हैं। बड़ी मुश्किल में पड़ गए हैं कबीर, किसके पैर लगै? क्योंकि अगर परमात्मा के पैर लगै, उचित न होगा। अगर गुरु के पैर लग, तो भी अड़चन मालूम पड़ती है। परमात्मा सामने खड़े थे, पहले मैं गुरु के पैर लगा! पद बड़ा मधुर है और उसके दो अर्थ हो सकते हैं।

गुरु गोविंद दोई खड़े, काके लागू पाय।

बलिहारी गुरु आपकी, जो गोविंद दियो बताय।।

इसके दो अर्थ संभव हैं। एक अर्थ तो यह है कि शिष्य को अड़चन में पड़ा देखकर गुरु ने गोविंद की तरफ इशारा कर दिया कि तू गोविंद के पैर लग।

यह अर्थ से मैं राजी नहीं। यह मुझे जंचता नहीं। मुझे तो दूसरा अर्थ जंचता है। वह दूसरा अर्थ कभी किया नहीं गया। वह दूसरा अर्थ मुझे यह लगता है कि—

गुरु गोविंद दोई खड़े, काके लागू पाय।

मुश्किल में पड़ गए हैं कबीर। किसके पैर पडूं? दोनों सामने खड़े हैं। तब वे गुरु के पैर पर गिर पड़े, क्योंकि उन्होंने जाना, सोचा—

बलिहारी गुरु आपकी, जो गोविंद दियो बताय।।। तुमने ही गोविंद बताया, नहीं तो गोविंद को हम देख ही कैसे पाते! इसलिए तुम्हारे पैर पहले छू लेते हैं।

गुरु का अर्थ है, जिसने जाना हो और जो तुम्हें जना दे। जिसने देखा हो और जो तुम्हें दिखा दे। जिसने चखा हो और जो तुम्हें चखा दे। शब्द यह न कर पाएंगे।

गुरु भी शब्दों का उपयोग करता है, लेकिन निशब्द की तरफ ले जाने के लिए; शास्त्र का सहारा लेता है, तुम्हें कभी बेसहारा कर देने के लिए; समझाता है, तुम्हारे मन को उस घड़ी में ले जाने के लिए, जहां सब सम