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क्या बिंदु हैं जो गर्भ को श्रेष्ठ जीवात्मा के आने योग्य या निकृष्ट जीवात्मा के आने योग्य बनाते हैं?


श्रेष्ठ आत्मा गर्भ में उतर सके इसके लिए क्या— क्या तैयारियां करनी पड़ती हैं? कैसे करनी पड़ती हैं? और बुद्ध महावीर कृष्ण और क्राइस्ट जैसे लोग जिस गर्भ में आए उसकी क्या— क्या विशेषताएं थी सामान्य गर्भों की तुलना में?

बहुत—सी बातें विचार करनी पड़े। एक तो संभोग का क्षण जितनी पवित्रता का क्षण हो, उतनी पवित्र आत्मा को आकर्षित कर सकता है। लेकिन काम की इतनी निंदा की गई है कि संभोग का क्षण मुश्किल से ही पवित्रता का हो पाता है। काम को, यौन को अपवित्र सिद्ध ही कर दिया गया है। वह हमारे चित्त में अपवित्र होकर बैठ ही गया है। पति—पत्नी का जो मिलन है, वह एक पाप की अंधेरी छाया के बीच घटित होता है। वह एक आनंद, एक पवित्रता, एक प्रार्थना के बीच घटित नहीं होता। स्वभावत:, इस छाया के आसपास पवित्र आत्मा का प्रवेश संभव नहीं है। तो पवित्र आत्मा के प्रवेश की पहली तो शर्त है कि पवित्र क्षण हो।

मेरी दृष्टि में, संभोग का क्षण प्रार्थना का क्षण है। और प्रार्थना के बाद ही पति—पत्नी को संभोग में जाना चाहिए। ध्यान के बाद ही जाना चाहिए। इसके दोहरे परिणाम होंगे। इसका एक परिणाम तो यह होगा कि ध्यान के बाद वर्षों तक वे संभोग में जा न सकेंगे। पहला तो परिणाम यह होगा। अगर ध्यान के बाद संभोग में जाने की चेष्टा की, तो ध्यान के बाद पहली तो बात है कि जा न सकेंगे। क्योंकि ध्यान में जैसे ही जाएंगे कि वासना तिरोहित हो जाएगी। तो ध्यान उनके जीवन में ब्रह्मचर्य का मार्ग बन जाएगा। वर्षों बीत जाएंगे।

यह वर्षों की जो पवित्रता है, अनसप्रेस्ट, यह दमन नहीं है। यह कोई लिया हुआ व्रत नहीं है कि पति और पत्नी ताले लगाकर अलग— अलग कमरों में सो रहे हैं, या पति मंदिर में गए हैं सोने कि वे ब्रह्मचर्य का व्रत साध रहे हैं। यह कोई ब्रह्मचर्य का व्रत नहीं है, यह सहज फलित ब्रह्मचर्य है। जो ध्यान के बाद संभव नहीं होता कि संभोग में जाया जा सके। क्योंकि इतने रस, इतने आनंद में चित्त डूब जाता है कि संभोग के लिए कौन उतरे।

तो पति—पत्नी अगर दोनों नियमित रूप से ध्यान कर सकें, तो वर्षों तक संभोग न कर सकेंगे। इसके दोहरे परिणाम होंगे। एक तो ऊर्जा बहुत सक्रिय और सघन हो जाएगी। पवित्र आत्माओं को जन्म देने के लिए अत्यंत शक्तिशाली बिंदु चाहिए। निर्बल बिंदु काम नहीं कर सकते। तो जिस संभोग के पहले वर्षों का ब्रह्मचर्य है, वही संभोग शक्तिशाली आत्मा के लिए प्रवेश देने में समर्थ हो सकता है।

फिर जब वर्षों के ध्यान के बाद किसी दिन कोई संभोग में जा सकेगा, यानी ध्यान आज्ञा देगा कि जा सको, तब स्वभावत: वह क्षण पवित्रता का क्षण होगा। क्योंकि अगर वह अपवित्रता का थोड़ा भी रह गया होता, तो अभी ध्यान ने आशा न दी होती। ध्यान जब आशा देता है कि ध्यान के बाद भी संभोग में जाने की संभावना बनती है, तब उसका अर्थ ही यही है कि अब संभोग ने भी एक पवित्रता ले ली है। उसकी अपनी एक डिवाइननेस, अपनी भगवत्ता हो गई। अब इस भगवत्ता के क्षण में वे दो व्यक्ति जब जाते हैं संभोग में, उचित होगा कि हम कहें कि अब वे शारीरिक तल पर नहीं मिल रहे हैं, अब यह मिलन बहुत आत्मिक है। शरीर भी बीच में है, लेकिन मिलन शारीरिक नहीं है। शरीर भी मिल रहे हैं, लेकिन मिलन गहरा है और आत्मिक है।

तो पवित्र आत्मा को अगर जन्म देना हो, तो वह सिर्फ बायोलाजिकल घटना नहीं है, सिर्फ जैविक घटना नहीं है। दो शरीर के मिलने से तो सिर्फ हम एक शरीर को जन्मने की सुविधा देते हैं। लेकिन जब दो आत्माएं भी मिलती हैं, तब हम एक विराट आत्मा को उतरने की सुविधा देते हैं।

महावीर या बुद्ध के जन्म इसी तरह के जन्म हैं। जीसस का जन्म तो और भी अदभुत है। इनके संबंध में थोड़ी बात समझनी उचित है। महावीर या बुद्ध के जन्म पूर्व घोषित जन्म हैं, जिनकी प्रतीक्षा वर्षों से की जा रही थी। और पूर्व घोषणाओं ने सब सूचनाएं दी हैं। यहां तक सूचना है कि महावीर के जन्म के पहले उनकी मां को कितने स्वप्न आएंगे। पहला स्वप्न क्या होगा, दूसरा क्या होगा, तीसरा क्या होगा, चौथा क्या होगा। यह महावीर का पिछला जन्म घोषित करके गया है। महावीर अपने पिछले जन्म में यह घोषणा करके गए हैं कि मेरा अगला जन्म इतने स्वप्नों के साथ होगा। जहां इतने स्वप्न घटित हों, समझना कि मैं प्रविष्ट हुआ हूं। तो पूरे प्रतीक दे गए हैं। सफेद हाथी दिखाई पड़ेगा या कमल दिखाई पड़ेगा या और कुछ, ये सारे प्रतीक हैं। वे सारे प्रतीक दे दिए गए हैं। उनकी प्रतीक्षा की जा रही थी कि कौन स्त्री कब घोषणा करे कि उसके ये —ये स्वप्न पूरे हो गए।

बुद्ध के लिए भी प्रतीक दिए गए हैं। और जब बुद्ध का जन्म हुआ, तो दूर हिमालय से एक संन्यासी आया। जो कि प्रतीक्षा कर रहा है और बड़ा चिंतित है कि मैं मर न जाऊं। ऐसा न हो कहीं कि बुद्ध पैदा न हो पाएं और मैं मर जाऊं। और जब वह भिक्षा मांगने आया, तो उसने बुद्ध के पिता को कहा कि घर में नया बच्चा आया है, मैं उसके दर्शन करना चाहता हूं। तो पिता तो बहुत हैरान हुए, क्योंकि वह संन्यासी बहुत ख्यातिनाम था। उसकी बड़ी प्रसिद्धि थी, उसके हजारों भक्त थे। उसकी बड़ी ख्याति थी, उसकी बड़ी कीर्ति थी, वह बड़ा दिव्य पुरुष था। उसने कहा, मैं दर्शन करना चाहता हूं। तो पिता तो बहुत हैरान हुए, लेकिन फिर खुश भी हुए। क्योंकि पत्नी ने भी स्वप्न कहे थे कि ये स्वप्न आए हैं और फिर दूसरे दिन यह संन्यासी उपस्थिति हुआ पहले दिन के बच्चे को देखने के लिए।

और पहले दिन का बच्चा संन्यासी के सामने लाया गया, तो संन्यासी छाती पीटकर रोने लगा। तो बुद्ध के पिता तो बहुत घबड़ा गए। उन्होंने कहा कि क्या कोई अपशकुन है? आप रोते हैं? संन्यासी ने कहा, तुम्हारे बेटे के लिए कोई अपशकुन नहीँ है। रोता हूं अपने लिए कि वह आदमी पैदा हो गया जिसके चरणों में बैठने से कल्पों—कल्पों का आनंद मिल सकता था। लेकिन मेरे तो मरने का वक्त आ गया है और अभी तो इसे देर है कि यह बड़ा हो, प्रकट हो। इतनी देर मैं न रुक सकूंगा। मेरे जाने का क्षण आ गया।

जब जीसस का जन्म हुआ, तो सारी दुनिया में प्रतीक्षा की जा रही थी। विशेषकर सारे मध्य एशिया में प्रतीक्षा की जा रही थी। और सूचना थी कि विशेष रूप से चार तारे प्रकट होंगे जब जीसस का जन्म होगा। और जिन लोगों को भी उस सीक्रेट का पता था.. न्। हिंदुस्तान से भी एक आदमी जीसस के जन्म पर बधाई देने गया था। एक आदमी इजिप्ट से गया था। दो आदमी और दूसरे देशों से गए थे। ये चारों आदमी जब इनको चार तारे दिखाई पड़े आकाश में, जिनको इसकी सूचना थी कि इन चार तारों के साथ जीसस का जन्म होने वाला है, तो ये भागे उस बच्चे की तलाश में कि वह बच्चा कहां है। और पहले से यह प्रतीक शइचत किया गया था कि जो इन तारों को पहचान लेंगे, तारे मार्ग दिखाएंगे। तारे आगे भागते गए और यात्री पीछे गए।

हेरोथ को, जो सम्राट था जीसस के वक्त में,,. इजिप्ट से जो ज्ञानी उन तारों की खोज में गया था, वह पहले हेरोथ के पास गया और उसने जाकर सम्राट हेरोथ को कहा कि तुम्हें पता नहीं, सम्राट पैदा हो गया! पर हेरोथ तो समझ ही नहीं सकता था कि यह सम्राट का क्या मतलब है। उसने तो समझा कि उसका कोई दुश्मन पैदा हो गया, उसे कोई समाप्त कर देगा। इसलिए उसने जेरूशलम में जितने बच्चे पैदा हुए थे सब कटवा दिए। लेकिन यह खबर मरियम तक पहुंच गई और वह लेकर भाग गई बच्चे को। यह खबर पहले ही पहुंच गई थी, वह पहले ही भाग गई थी। जीसस का जन्म एक अस्तबल में हुआ, जहां घोड़े बंधे थे और गंदगी पड़ी थी और जहां कोई रोशनी नहीं थी। वहां छिपकर एक अस्तबल में जीसस का जन्म हुआ।

जीसस के जन्म की कथा बुद्ध और महावीर के जन्म की कथा से भी एक अर्थ में विशेष है। और वह विशेषता यह है, जैसे तुम पूछ रहे हो कि ऐसे महान पुरुषों को जन्म देना हो तो क्या करना पड़े। जीसस की आत्मा को जन्म लेना था। मां तो उपलब्ध थी, लेकिन बाप उपलब्ध नहीं था। और बड़ी जिच पैदा हो गई थी। मरियम तो इस योग्य थी कि जीसस को जन्म दे सके, लेकिन मरियम का पति इस योग्य नहीं था कि जीसस को जन्म दे सके। इसलिए आज तक कहा जाता है कि जीसस कुंवारी मरियम से पैदा हुए। उसे कहने का कारण है। बाप बेमानी था, वर्जिन से पैदा हुए, कुंवारी से पैदा हुए। उसे कहने का कारण है।

इसलिए एक अशरीरी आत्मा को जीसस के पिता में प्रवेश करना पड़ा, जिसको वे होली घोस्ट कहते हैं। और जीसस के पिता के माध्यम से एक दूसरी आत्मा जीसस के पिता की जगह मौजूद रही। जीसस के पिता मौजूद नहीं थे, शरीर मौजूद था। जैसा मैंने कहा कि शंकर ने किसी शरीर में प्रवेश किया, ऐसे ही एक आत्मा ने जीसस के पिता में प्रवेश किया और जीसस का जन्म हुआ। इसलिए जीसस का पिता कह सका कि मेरा तो कोई हाथ ही नहीं। उसे तो कोई पता भी नहीं है। कब क्या हुआ, उसे कुछ मालूम नहीं। मरियम कुंवारी ही है उसकी दृष्टि में और कुंवारी को बेटा हुआ है। वह बेहोश था पूरा। उसके शरीर का सिर्फ एक माध्यम की तरह उपयोग किया गया है।

लेकिन क्रिश्चियनिटी को यह सूत्र साफ नहीं है। इसलिए क्रिश्चियन पुरोहित बेचारा किसी तरह सिद्ध करता रहता है कि नहीं, वह वर्जिन से पैदा हुए। लेकिन उसे कुछ पता नहीं कि वर्जिन से पैदा होने का मतलब क्या है। वह सिद्ध कर भी नहीं पाता।

और जीसस के खिलाफ पश्चिम में जो सबसे बड़ी बात कही जाती रही है और जिसका उत्तर

जीसस को माननेवाला नहीं दे पाया, वह यह है कि कुंवारी लड़की से बेटा पैदा कैसे हो सकता है? यह अवैज्ञानिक है। यह बात ठीक है, कुंवारी लड़की से बेटा पैदा नहीं हो सकता, लेकिन यह बेटा कुंवारी लड़की से इस अर्थ में पैदा हुआ था कि इसका पिता गैर मौजूद था, सिर्फ माध्यम था। इसके पिता का कांशसली पिता होना नहीं था इस घटना में। उसे कुछ भी पता नहीं था, उससे सिर्फ एक इंन्यूमेंट का काम लिया गया है और घटना को जुटाना पड़ा है।

बहुत बार ऐसा हुआ है कि बहुत—सी श्रेष्ठ आत्माएं पैदा होना चाहती हैं, लेकिन श्रेष्ठ गर्भ हम नहीं जुटा पाते। और आज तो बहुत मुश्किल हो गया है, श्रेष्ठ गर्भ जुटाना करीब—करीब असंभव हो गया है। क्योंकि गर्भ का विज्ञान ही खो गया है। आज जिसको हम गर्भाधान कह रहे हैं, वह बिलकुल ही पशुओं जैसा है। उस गर्भाधान में कोई विज्ञान नहीं है। अब जिन्होंने इसका सारा खयाल किया था, उन्होंने सारी बात तय की थी। जैसे, घड़ी और पल—पल का हिसाब रखा था। विशेष घड़ियों में, विशेष क्षणों में....... जैसा हमको अंदाज नहीं होता साधारणत:।

आपको शायद पता नहीं होगा कि पूर्णिमा के दिन अधिकतम लोग पागल होते हैं। अमावस के दिन सबसे' कम लोग पागल होते हैं। अभी तक विज्ञान साफ नहीं कर पाता कि बात क्या है। जरूर पूरा चांद हमारे भीतर विक्षिप्तता को लाता है। जैसे वह समुद्र में उठाव लाता है, ऐसे ही कुछ हमारी चित्त की वृत्तियों में भी विक्षिप्तता की तरफ उठाव लाता है। अंग्रेजी में एक शब्द है लूनाटिक, उसका मतलब होता है चांदमारा। कार यानी चांद, और लूनाटिक यानी चांदमारा। चांद का हमला हुआ है, जो आदमी पागल हो गया है उस पर।

प्रत्येक चौबीस घंटे की प्रत्येक घड़ी और पल का हिसाब है कि प्रत्येक घड़ी और पल के बीच इस पृथ्वी पर किस तरह के प्रभाव उपलब्ध हैं। उन विशेष प्रभावों में अगर गर्भाधान होगा, तो परिणाम बहुत भिन्न होंगे। अगर उन विशेष घड़ियों में गर्भाधान नहीं होगा, तो परिणाम बहुत विपरीत हो सकते हैं। सारा ज्योतिष इसी खयाल से निकला कि कब गर्भाधान हुआ है! वह ठीक घड़ी—पल क्या है! क्योंकि उस घड़ी—पल के प्रभाव कुछ खबर दे सकेंगे। कम से कम मोटी—मोटी सूचनाएं मिल सकेंगी कि उस घड़ी—पल में क्या हो सकता है।

तो घड़ी और पल का भी, समय का बोध। संभोग के पहले ध्यान की सामर्थ्य। संभोग के पूर्व वर्षों का ब्रह्मचर्य—मेरी ब्रह्मचर्य की धारणा का खयाल रखना, दबाया हुआ नहीं, रोका हुआ नहीं; आया हुआ, घटा हुआ—फिर प्रार्थनापूर्ण हृदय से संभोग में गति और पवित्र आत्माओं के लिए आमंत्रण। क्योंकि बहुत आत्माएं उपलब्ध हैं और आत्माओं के बीच भी निरंतर गर्भ में प्रवेश के लिए पूरी होड़ है। उसमें आप अगर विशेष आत्माओं को निमंत्रण दे सकते हैं, तो परिणाम ज्यादा सुस्पष्ट हो जाएंगे। फिर नौ महीने तक उस बच्चे को पेट में एक विशेष मानसिक और आध्यात्मिक वातावरण चाहिए।

जैसे महावीर की मां बहुत विशेष हालतों में रखी गयीं। बुद्ध की मां बहुत विशेष हालतों में रखी गयीं। बुद्ध के जन्म के पहले तो यह भी सूचना थी कि वह खड़ी हुई स्त्री से ही पैदा होंगे। घर के भीतर पैदा नहीं होंगे, घर के बाहर पैदा होंगे। यह अजीब—सी बात थी। तो एक साल वृक्ष के नीचे मायके जाती हुई बुद्ध की मा वृक्ष के नीचे खड़ी हैं और बुद्ध का जन्म हुआ, खुले आकाश के नीचे।

आमतौर से बच्चे अंधेरे में पैदा हो रहे हैं। और आमतौर से संभोग जो है वह अंधेरे कक्षों में चोरी से, घबडाए हुए, अपराधपूर्ण भाव से घटित हो रहा है। उसके परिणाम दुखद होने वाले हैं। यानी वह कुछ पाप है, कोई अपराध है, जो चोरी—छिपे कहीं घटित हो रहा है, जिसका किसी को पता न चले। उसके लिए मुक्ति, सरलता, पवित्रता अनिवार्य है।

छोटी —छोटी चीजें परिणाम लाएंगी। कमरे के रंग परिणाम लाएंगे, कमरे की आभा परिणाम लाएगी। कमरे की गंध परिणाम लाएगी। उस सबके लिए पूरा का पूरा विज्ञान है। और गर्भाधान के पूरे विज्ञान का प्रयोग किया जाए, तो मनुष्य की संतति को आमूल रूप से रूपांतरित किया जा सकता है। छोटी—छोटी बातें फर्क लाएंगी।

अभी एक वैज्ञानिक छोटा—सा प्रयोग कर रहा है जो आमूल परिवर्तन ला देगा। उसने एक छोटा —सा बेल्ट बनाया है जो कि गर्भवती स्त्री के पेट पर बांध दिया जाएगा। आकस्मिक, कोई बीमार स्त्री के लिए बेल्ट बांधा गया था किसी कारण से, लेकिन बच्चे पर अभूतपूर्व परिणाम हुआ। उस बेल्ट की वजह से बच्चे का जहां सिर था, उस पर दबाव पड़ा और बच्चे का जो बुद्धि— अंक है, आई. क्यू. है, बहुत ज्यादा बढ़ा हुआ पैदा हुआ। उसका बुद्धि — अंक बहुत बढ़ गया। यह आकस्मिक घटना हो गई थी, मस्तिष्क के किसी खास चक्र पर दबाव पड़ गया। फिर तो अब व्यवस्थित रूप से उसने बहुत—से प्रयोग किए हैं। क्योंकि एक तो सहज भी हो सकता है कि वह बच्चा उतनी बुद्धि का पैदा होने वाला था। लेकिन अब उसने सैकड़ों प्रयोग करके सिद्ध किया है कि मां की गर्भ की अवस्था में पेट के विशेष स्थान पर डाले गए दबाव बच्चे की बुद्धि में परिवर्तन ले आते हैं।

तो बहुत—से आसन हैं जो विशेष दबाव के लिए हैं। बहुत—सी श्वास की प्रक्रियाएं हैं जो विशेष दबाव के लिए हैं। बहुत —से शब्दों के उच्चारण हैं जो विशेष दबाव के लिए हैं। वे सब बच्चे की प्रतिभा को, स्वास्थ्य को, उसकी सामर्थ्य को, उसकी संभावनाओं को पूरा का पूरा प्रकट होने में सहयोगी बनते हैं।

अभी तक आदमी और न जाने कितने उपद्रव की चीजें खोज रहा है, लेकिन जो बहुत जरूरी है कि मनुष्य अपना भविष्य खोजे, वह बहुत कम खोज रहा है। लेकिन यह सब एकदम संभव है। और जैसे ही एक बच्चा मां के भीतर प्रवेश करता है, तो उस बच्चे की क्या—क्या संभावनाएं हो सकती हैं, उसका परिदर्शन मां में भी होना शुरू हो जाता है। यह दोहरी प्रक्रिया है। अगर मां क्रोध करती है इन दिनों में, तो बच्चा क्रोधी होगा। और अगर एक क्रोधी आत्मा भीतर आई हो, तो मां जो कभी क्रोध नहीं करती थी, क्रोध करती मालूम पड़ने लगेगी। यह भी बहुत सूचक है। और इस सूचना को देखकर भी प्रयोग किए जा सकते हैं कि उस बच्चे के क्रोध को अभी से बीज से बदला जाए।

आज भी पृथ्वी पर बहुत —सी आत्माएं जन्म ले सकती हैं जो अजन्मी हैं। बड़ी अजीब हालत हो गई है। कुछ ऐसी हालत हो गई है जैसे कोई युनिवर्सिटी हो और वह कुछ लोगों को बी. ए. तक पढ़ा कर छोड़ देती हो और फिर एम. ए. का कोई कोर्स न हो उस युनिवर्सिटी में और रिसर्च करने के लिए कोई सुविधा न हो। और बहुत से बी ए. हो गए विद्यार्थी घूमते हों कि कहां वे एम. ए. करें, कहां वे रिसर्च करें।

यह हमारी पृथ्वी एक सीमा तक कुछ लोगों की प्रतिभा और आत्मा को विकसित करके छोड़ देती है और उसके बाद के लिए हमारे पास कोई इंतजाम नहीं है। उसके बाद के लिए इंतजाम सुनियोजित रूप से जुटाया जा सकता है। बिलकुल ऐसी संभावनाएं और स्थितियां पैदा की जा सकती हैं जिनमें श्रेष्ठतम आत्माएं प्रवेश पा सकें। दो —चार बुनियादी शब्द दोहरा दूं।

पहली बात, यौन के संबंध में हमारा दृष्टिकोण रुग्ण, बीमार और खतरनाक है। यौन की पवित्रता जब तक स्वीकृत नहीं होगी पृथ्वी पर, तब तक हम बहुत नुकसान पहुंचाते रहेंगे। यौन के पूर्व जब तक ध्यान संयुक्त नहीं होगा, तब तक यौन पाशविक रहेगा, मानवीय नहीं बन सकता। और संभोग के पूर्व जब तक लंबा ब्रह्मचर्य न होगा, तब तक शक्तिशाली वीर्याणु निर्मित नहीं होता, इसलिए शक्तिशाली आत्माओं को जन्म नहीं दिया जा सकता।

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पचास साल के भीतर पृथ्वी पर यदि कृष्ण क्राइस्ट बुद्ध और महावीर जैसे लोग न हुए तो सारी मनुष्यता मृत हो सकती है और विवेकानंद की तरह यह भी कहा कि मैं सौ व्यक्तियों की खोज में हूं जो साहसपूर्वक प्रयोग कर आत्मा की उच्चतम ऊंचाइयों पर जा सके तो इस मुल्क को और पूरी मनुष्यता को बचाना संभव हो सकेगा/-

तुम्हारी ही तैयारी का अर्थ समझाऊं, क्योंकि मेरी तैयारी मुझे करनी है। उससे तो तुम्हें कोई प्रयोजन नहीं। और मुझे कोई तैयारी नहीं करनी है, तैयारी है! तुम्हारी तैयारी क्या है? तीन बातें हैं। एक तो हजारों साल ने हमें विश्वासी बना दिया है, खोजी नहीं। एक बिलीविंग माइंड पैदा हो गया, एक इक्वायरिंग माइंड नहीं। तो हम विश्वास कर लेते हैं, लेकिन खोजते नहीं हैं। और इस जगत में जो भी महत्वपूर्ण है मिलने को, वह बिना खोजे कभी भी नहीं मिलता है। और सब मिल भी जाए, कम से कम स्वयं का होना तो बिना खोजे नहीं मिलता। तो एक तो जिज्ञासा से भरा हुआ चित्त चाहिए। जिज्ञासा से भरा हुआ चित्त पहली तैयारी है।

शायद तुम कहोगे कि जिज्ञासा है। हम पूछते हैं, सवाल पूछते हैं। लेकिन ध्यान रहे ऐसी जिज्ञासाए हैं जो सिर्फ उत्तर की तलाश में हैं। इनको मैं जिज्ञासा नहीं कहता हूं। जिज्ञासा ऐसी चाहिए जो सिर्फ उत्तर की तलाश में नहीं है, जो अनुभव की तलाश में है। उत्तर तो कोई दूसरा दे देगा, अनुभव तो कोई दूसरा नहीं दे सकता। तो लोग हैं, जो पूछते हुए मालूम पड़ते हैं —और ऐसा लगता है कि उनका पूछना धार्मिक है—पूछते हुए मालूम पड़ते हैं कि ईश्वर है या नहीं? मोक्ष है या नहीं? लेकिन ऐसा लगता है कि वे उत्तर खोज रहे हैं। कोई उन्हें उत्तर दे दे। और अगर उत्तर की कोई खोज में है, तो आज नहीं कल विश्वास कर लेगा। क्योंकि उत्तर खोजने वाला ज्यादा कठिनाई उठाने के लिए तैयार नहीं है। वह कहता है, कोई मिल जाए, जिसमें मैं विश्वास कर लूं, तो बस मुझे उत्तर मिल जाए, मैं तृप्त हो जाऊं।

मेरे पास कोई भी उत्तर नहीं है किसी को देने को। और उत्तर में मेरी उत्सुकता नहीं है। और अगर मैं थोड़े —बहुत उत्तर की भाषा में बोलता भी हूं तो वह इसीलिए कि कहीं उत्तर को खोजने वाले बिलकुल भाग ही न जाएं। थोड़ी देर रुके रहें। उनको थोड़ी देर रोक लूं ताकि शायद उनके प्रश्न की और उत्तर पाने की आकांक्षा को तोड़कर उनमें अनुभव पाने की आकांक्षा का बीज भी जगाया जा सके।

लोग तो हैं जो पूछते हैं, लेकिन ऐसे लोग नहीं हैं जो जानना चाहते हैं। उत्तर बड़ी सस्ती चीज है। किताबों में मिल जाता है। गुरुओं के पास लिखा हुआ है। उत्तर बिलकुल बौद्धिक बात है। पूरे जीवन से, टोटल लिविंग से उसका कोई वास्ता नहीं है। अनुभव की तलाश, अनुभव की जिज्ञासा चाहिए। उदाहरण के लिए मैं तुम्हें एक घटना बताऊं।

तिब्बत में एक फकीर हुआ मिलारेपा। जब मिलारेपा अपने गुरु के पास गया, तो नियम था तिब्बत में कि पहले गुरु की तीन परिक्रमा करो, फिर सात बार झुककर नमस्कार करो, फिर शिष्टतापूर्वक एक कोने में बैठो और जब समय आए और गुरु पूछे कि क्या पूछना है, तब पूछो। जब मिलारेपा अपने गुरु के पास गया, तो जाकर उसने सीधे गुरु की गरदन पकड़ ली—न तो तीन चक्कर लगाए, न सात बार झुका, न शिष्टतापूर्वक किसी कोने में बैठा—उसने जाकर गुरू की गरदन पकड़ ली और कहा कि जल्दी बोलो, क्या तुम्हें बोलना है? क्योंकि मुझे तो यह भी पता नहीं है कि मैं क्या पूछूं! कहा कि मुझे तो यह भी पता नहीं है कि मैं क्या पूछूं? लेकिन इतना मुझे पता है कि मुझे कुछ भी पता नहीं है। तुम्हें कुछ बोलना हो, तो बोलो। तो गुरु ने कहा कि थोड़ी शिष्टता का व्यवहार करो। तुम्हें भलीभाति मालूम होगा कि तीन परिक्रमाएं करो, सात बार सिर झुकाओ, कोने में शिष्टतापूर्वक बैठकर पूछो। उसने कहा, वह मैं पीछे करूंगा। अगर मैं सात बार झुकने में और तीन बार चक्कर लगाने में और शिष्टतापूर्वक बैठने में मर गया, तो कौन जिम्मेवार होगा? अगर मैं मर गया, तो तुम जिम्मेवार रहोगे कि मैं जिम्मेवार रहूंगा? अगर तुम वायदा करते हो कि इस बीच मैं नहीं मरूंगा, तो मैं सात नहीं, सात सौ चक्कर लगा सकता हूं। पहले उत्तर दे दो, फिर फुर्सत से यह काम कर लेंगे, शिष्टता पीछे भी निभाई जा सकती है। उसके गुरु ने कहा कि बैठो। तुम ऐसे आदमी आए जिसको उत्तर की खोज नहीं, अनुभव की खोज है। और अच्छा हुआ कि तुमने चक्कर नहीं लगाए। क्योंकि वह चक्कर हमने उन्हीं के लिए रखे हैं, जो लगा सकते हैं। वह उन्हीं के लिए इंतजाम है। जब वे लगाते हैं तभी हम समझ जाते हैं कि बेकार आदमी आ गया, जिसके पास चक्कर लगाने की फुर्सत है।

तो पहला तत्व जो मैं अपेक्षा करता हूं वह है जिज्ञासा अनुभव की—उत्तर की नहीं, फिलासफी की नहीं, दर्शन की नहीं—प्राणों की। सिर्फ जानने की नहीं, पाने की। सिर्फ पाने की भी नहीं, होने की। तो यह तो पहली बात है।

दूसरी बात, जब हम कुछ पाने चले हैं, जब भी हम कुछ पाने को निकलते हैं, तब हमें कुछ खोना पड़ता है। इस जगत में बिना खोए कुछ भी नहीं मिलता है। लेकिन धन खोने से सत्य नहीं मिलेगा, कितना ही धन खो दो। न तो धन के होने से सत्य खरीदा जा सकता है न धन के खोने से खरीदा जा सकता है। कुछ लोग हैं, जो समझते हैं, धन बहुत होगा तो खरीद लेंगे। कुछ लोग हैं, जो समझते हैं, धन का त्याग कर देंगे तो मिल जाएगा। लेकिन दोनों ही सोचते हैं कि धन से खरीद लेंगे। धन से सत्य नहीं मिल सकता। असल में हमारे पास क्या है उसे खोने से सत्य नहीं मिल सकता, जब तक कि हम अपने को खोने को तैयार न हो—हैविग को खोने से नहीं, बीइंग को खोने से मिल सकता है। क्या हमारे पास है, उसको खोने से नहीं मिलेगा। क्या हम हैं, उसको खोने की हिम्मत चाहिए।

तो दूसरा तत्व है कि क्या हम अपने को खोने को, देने को तैयार हैं? और ऐसा नहीं है कि देना पड़ता है, क्योंकि सत्य आपको किसलिए मांगेगा! सिर्फ देने की तैयारी काफी होती है। सिर्फ तैयारी, देना बन जाती है। आप तैयार हैं कि बात खतम हो जाती है। पर आपकी तैयारी पूरी होनी चाहिए कि हम अपने को खो सकें। और जो अपने को नहीं खो सकता है, वह इस महायात्रा पर नहीं निकल सकता।

दूसरा तत्व...... हम और कुछ खोने को सदा तैयार हैं। एक आदमी कहता है कि मैं घर छोड़ दूंगा, एक आदमी कहता है कि मैं मां —बाप को छोड़ दूंगा, पत्नी छोड़ दूंगा, बेटा छोड़ दूंगा, धन छोड़ दूंगा, लेकिन कोई आदमी आकर यह नहीं कहता कि मैं अपने को छोड़ दूंगा। और जब तक कोई नहीं आकर कहता है कि मैं अपने को छोड़ दूंगा, तब तक सत्य के जगत में कोई गति नहीं है। क्योंकि क्या पत्नी आपकी है जिसको आप छोड़ रहे हैं? कोई पति नहीं कह सकता कि पत्नी मेरी है। चौबीस घंटे में चौबीस बार पता चलता है कि मेरी नहीं है। जो मेरा नहीं है, उसे हम छोड़ रहे हैं, हम धोखा दे रहे हैं। किसको धोखा दे रहे हैं? धन आपका है? जो आप कहते हैं, हम छोड़ देंगे। आपके सिवाय आपके पास और है क्या? तो जो है, उसे तो छोड़ने की बात नहीं करते, जो है ही नहीं, उसे छोड़ने की बात करते हैं। उससे नहीं कुछ हो सकता।

दूसरी अपेक्षा है, स्वयं को छोड़ने का साहस। और तीसरी अपेक्षा, तीसरी तैयारी है—प्रतीक्षा, अनंत प्रतीक्षा और धैर्य। असल में यह यात्रा ऐसी है कि यहां जो कोई कहे कि अभी चाहिए, वह जरा बचकानी बात कर रहा है। ऐसा नहीं है कि अभी नहीं मिल सकता। अभी मिल सकता है, लेकिन वह उसी को मिलता है जो अभी नहीं मांगता, जो कहता है कभी मिले, हम राजी हैं। अभी भी मिल जाता है, लेकिन उसको, जो कहता है कभी भी मिला तो हम प्रतीक्षा के लिए राजी हैं। धैर्य चाहिए। और धैर्य बिलकुल नहीं रह गया है।

दुनिया में धर्म के कम होने का और कोई कारण नहीं है, धैर्य का कम हो जाना है। क्योंकि धैर्य धर्म की आधारभूत जड़ है। सिर्फ धैर्यवान ही धार्मिक हो सकता है। क्योंकि इस जगत में और सब चीजें नगद हैं। धर्म बिलकुल ही दिखाई नहीं पड़ता, हाथ से स्पर्श में नहीं आता, तिजोरी में बंद नहीं किया जा सकता, बैंक—बैलेंस में नहीं रखा जा सकता, कोई सेफ डिपाजिट में बंद करके ताला लगाकर घर में आराम से सोया नहीं जा सकता। धर्म एकमात्र ऐसी चीज है कि जिसके पास धैर्य हो, वही उसकी खोज के लिए राजी हो सकता है।

और धर्म के साथ बडी कठिनाई यह है कि वह टुकड़ों में नहीं मिलता है कि अभी एक इंच मिल गया, कल दो इंच मिल गया, तो थोड़ी आशा बंधी रहती है। अधैर्यवान को भी बंधी रहती है कि कोई फिक्र नहीं, आज एक रुपया मिला, तो कल दो भी मिल सकते हैं। कल दो मिले, तो परसों चार भी मिल सकते हैं। जब चार मिलते हैं, तो अरब भी मिल सकते हैं। नहीं, धर्म या तो मिलता है तो मिलता है, नहीं मिलता है तो नहीं मिलता है। दोनों के बीच कोई बंटवारा नहीं होता। जिस दिन मिलता है, एकदम मिल जाता है, विस्फोट हो जाता है उसका। और जब तक नहीं मिला, तब तक कुछ भी नहीं होता। घनघोर अंधकार ही बना रहता है।

उस अंधकार के क्षण में जिनके पास धैर्य नहीं है, वे कुछ और खोजने लगते हैं जो अभी मिल सकता है। वे कंकड़—पत्थर बीनने लगते हैं, जो अभी मिल सकते हैं, यहीं पड़े हैं। धन खोजने लगते हैं, यश खोजने लगते हैं, जो मिल सकता है, जिसकी ज्यादा दूरी नहीं मालूम पड़ती, यह रहा....। और एक सुविधा है जगत की सब चीजों में कि आप उनको फ्रैगमेंट्स में, इंसटालमेंट्स में, हिस्सों में हैं।

पा सकते हैं। धर्म को आप इसटालमेंट्स में नहीं पा सकते।

तो प्रतीक्षा तीसरा तत्व है — अनंत प्रतीक्षा, इनफिनिट पेसेंस, अवेटिंग। कठिन है बहुत, क्योंकि हमारा मन कहता है कि पता नहीं, मिलेगा कि नहीं मिलेगा। पता नहीं, हम व्यर्थ तो नहीं बैठे हैं। पता नहीं, अब तो काफी देर हो गई, अब उठ जाएं। पता नहीं, इतनी देर में हम और क्या कमा लेते, इतनी देर में और क्या कर लेते। वह चूक गया और यहां कुछ मिला नहीं। ऐसा जो अधैर्य से भरा हुआ चित्त है, यह थिर ही नहीं हो पाता। असल में अधैर्य के साथ शांति का कोई संबंध नहीं है। अधैर्य के साथ संतुलन का कोई संबंध नहीं है। अधैर्य का अर्थ है अशांति, अधैर्य का अर्थ है चहल—पहल। अधैर्य का अर्थ है चंचलता, अधैर्य का अर्थ है भाग —दौड़। तो ऐसा चित्त चूक जाएगा।

धैर्य का अर्थ है जैसे सागर ठहर गया है, एक लहर भी नहीं है, दर्पण बन गया है। और मजा यह है कि चांद तो सदा ऊपर है, अगर सागर जरा दर्पण बन जाए तो अभी पकड़ ले। लेकिन सागर है लहरों से भरा, तो चांद को नहीं पकड़ पाता। सत्य तो सदा मौजूद है, परमात्मा चारों तरफ निकट है, अभी और यहीं।

लेकिन हमारा वह जो अधैर्य से भरा हुआ चित्त है —डावांडोल, डोलता हुआ, कापता हुआ वेवरिंग, उसमें कोई पकड़ नहीं बैठ पाती। उसमें प्रतिफलन नहीं बन पाता, वह दर्पण नहीं बन पाता। प्रतीक्षा बना देती है दर्पण चेतना को। और जिस दिन हम दर्पण बन जाते हैं, उसी दिन सब मिल जाता है। क्योंकि सब तो सदा ही मौजूद था, सिर्फ हम मौजूद नहीं थे। दर्पण होकर हम मौजूद हो जाते हैं। और जैसे ही हम दर्पण बने, तो जो मौजूद है वह दिखाई पड़ जाता है।

ये तीन शर्तें आप पूरी करें। ये तीन शर्तें पूरी हों तो बात पूरी हो गई। बाकी जो होना है, वह तो बड़ी सरलता से हो जाएगा। असल में कठिनाई कुछ ऐसी है कि मैं पानी लिये आपके सामने खड़ा हूं और आपसे कह रहा हूं कि जरा आप हाथ दोनों बांध लें कि मैं पानी डालूं तो आपके हाथ में चुल्ल बन सके। आप दोनों हाथ खोले हुए खड़े हैं। थोड़े हाथ बंध जाएं, थोड़े आप ठहर जाएं, खड़े हो जाएं बंधकर एक क्षण को भी, तो वह डाला जा सकता है। और कोई मैं उसे डाल रहा हूं ऐसी भ्रांति में न पड़े। जैसे ही आपका हाथ बंध जाता है, वह उतर आता है। मैं भी उसका एक गवाह ही हो सकता हूं? इससे ज्यादा कुछ नहीं हो सकता। एक साक्षी हो सकता हूं, गवाही दे सकता हूं कि ही, ठीक है, इस आदमी ने हाथ बांधे और घटना घट गई।

सच में इनीसिएशन का इतना ही अर्थ है, दीक्षा का इतना ही अर्थ है। आदमी कैसे किसी दूसरे आदमी को दीक्षा देगा? दीक्षा तो सदा परमात्मा से ही मिलती है। ही, इतना ही हो सकता है कि जो थोड़ा आगे गया है, वह गवाह बन सकता है। वह कह सकता है कि ही, ठीक है, हाथ ठीक से बंध गए हैं, दीक्षा हो जाएगी।

मेरी तरफ किसी खास तैयारी की जरूरत नहीं है। तुम्हारी तैयारी पूरी है, तो मैं गवाह बन सकता हूं। और तुम्हारी तैयारी के तीन सूत्र मैंने कहे। इनको सोचो मत, इनको जीने की कोशिश से ये तीनों सूत्र तत्काल पकड़ लिये जा सकते हैं। सोचा तो खोया, सोचा कि चूके। जरा—सा विचार और हम चूक जाते हैं। सोचो मत। इन तीन सूत्रों को समझ लो कि उत्तर की तलाश तो नहीं है भीतर। अनुभव की तलाश पर ध्यान दो कि मैं सिर्फ कोई बौद्धिक सिद्धात खोजने तो नहीं निकला हूं कि परमात्मा ने दुनिया बनाई या नहीं बनाई! बनाई भी हो तो क्या फर्क पड़ता है, नहीं भी बनाई हो तो क्या फर्क पड़ता है। मैं सच में कोई अनुभव खोजने निकला हूं? इसको साफ कर लो अपने भीतर।

अच्छा होगा, अगर अनुभव खोजने न निकले हो, तो यह भी साफ हो जाना अच्छा होगा कि मुझे सिर्फ उत्तर की ही खोज है, तब भी एक बात साफ होगी और एक आनेस्टी पैदा होगी। तब कम से कम अनुभव की झंझट में हम नहीं पड़ेंगे, उत्तरों को समझ लेंगे, मामला खतम करेंगे।

और ध्यान रहे, जिसको यह भी पता चल जाए कि मैं सिर्फ उत्तर की खोज में निकला हूं, उसको फौरन यह पता चल जाएगा कि मैं बेकार की खोज में निकला हूं। शब्दों में दिए गए उत्तर का करूंगा क्या? शब्दों से न पेट भरता है, न भूख मिटती है, न प्यास बुझती है। शब्दों से कुछ भी नहीं होता। नदी पार करनी है तो नाव चाहिए, शब्दकोश की नाव काम नहीं करेगी। और अगर किताब लेकर नदी के किनारे पहुंच गए, जिसमें लिखा है, नाव और नाव यानी नदी को पार करने वाली चीज, तो किताब भी डूबेगी, आप भी डूबेंगे और नदी हसेगी कि कैसा पागल आदमी है। अगर किताब की नाव से ही पार करना था, तो किताब की नदी में ही कर लेना था। असली नदी में किताब की नाव लेकर नहीं आना चाहिए। तो किताब में नाव भी बना ली होती और किताब में नदी भी बना ली होती, तो काम चल जाता।

तो अगर उत्तर की ही खोज है, तो फिर किताब ही काफी है। फिर जिंदगी में कुछ करने की कोई जरूरत नहीं है। मगर यह अगर साफ हो जाए, तो आज नहीं कल किताब से ऊब पैदा हो जाएगी, आज नहीं कल शब्द बेकार मालूम पड़ने लगेगा, सब सिद्धात कचरा मालूम पड़ने लगेंगे, सब शास्त्र उतारने जैसे लगने लगेंगे कि अब इनको कंधों से नीचे उतारो, और अनुभव की खोज शुरू हो जाएगी। लेकिन ईमानदारी से अपने भीतर साफ कर लेना जरूरी है कि मैं क्या खोज रहा हूं। यह कोई कौतूहल है या जिज्ञासा है? यह सिर्फ जिज्ञासा है या मुमुक्षा है? मुमुक्षा का मतलब, अनुभव की जिज्ञासा।

दूसरी बात कि मैं क्या देने को तैयार हूं। यह अपने भीतर निर्णय करने की बात है। अगर परमात्मा आज सामने खड़ा हो जाए और मुझसे मांगे कि तू क्या—क्या दे सकता है मेरे बदले में, मैं तुझे खुद देने को तैयार हूं। परमात्मा कहे कि मैं तैयार हूं तेरे पास आने को, तू मुझे क्या देने को तैयार है? आप अपने खीसे में से रुपए निकालकर गिनेंगे! अधिक लोग गिनेगे। सोचेंगे, पांच का दें, दस का दें। या आप क्या देना चाहेंगे? क्या ऐसे क्षण में आप अपने को दे सकेंगे और परमात्मा को कह सकेंगे, मेरे पास मेरे सिवाय और क्या है?

अगर यह आपको साफ हो जाए, तौ दूसरा सूत्र आपकी जिंदगी को बदलने वाला हो जाएगा कि मैं अपने को देने को तैयार हूं। यह सिर्फ आपकी सफाई होनी चाहिए, बस काफी है। आपको यह साफ हो जाना चाहिए कि वक्त आए तो मैं अपने को दे सकता हूं। इसमें मैं चूक न जाऊंगा। यह न कहूंगा कि थोड़ी देर ठहरो। मैं घर पूछ आऊं, कि मैं जरा मित्रों से बात कर लूं कि अभी कैसे दे सकता हूं। अभी दो —चार दिन और रुक जाएं। लडके की? शादी हो जाने दें। यह स्पष्ट हो जाए कि मैं अपने को दाव पर लगा सकता हूं!

धर्म से बड़ा कोई जुआ नहीं है। बाकी सब जुए बड़े छोटे हैं। कुछ आप लगाते हैं और हारते हैं, कुछ लगाते हैं, कुछ जीतते हैं। आप सदा बाहर रहते हैं। धर्म के दाव पर आप ही लग जाते हैं। और हार —जीत नहीं होती, क्योंकि जब आप ही लग गए, तो कौन हारेगा, कौन जीतेगा! दाव पर आप हैं। अब कोई जीत—हार का उपाय नहीं है। अब तो गए। तो यह साफ कर लें।

और तीसरा यह साफ कर लें कि इतनी अनंत की खोज पर जब हम निकले हों, तो इसमें बच्चों जैसा अधैर्य काम नहीं करेगा। इसमें अनंत धैर्य चाहिए। और जो अनंत धैर्य के लिए राजी है, उसे

अभी मिल जाता, यहीं मिल जाता।