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क्या पदार्थ की खोज में जो स्थान संदेह का है, धर्म की खोज में वही स्थान श्रद्धा का है।


मूल स्वभाव यानी श्रद्धा को उपलब्ध होने के लिए क्या करे ?

संदेह पर संदेह करें, तभी संदेह पूरा होता है। अभी संदेह की यात्रा पूरी नहीं हुई। एक संदेह करने को बाकी रह गया है। वह है, संदेह पर संदेह। और यह आश्चर्य की बात है कि जो लोग हर चीज पर संदेह करते हैं, वे संदेह पर संदेह क्यों नहीं करते? दीया तले अंधेरा रह जाता है। जिस दिन तुम संदेह पर भी संदेह कर सकोगे, उसी दिन श्रद्धा का सूत्रपात हो जाएगा। संदेह को दबाने से श्रद्धा नहीं आती, संदेह को पूरा कर लेने से ही आती है।संदेह के विपरीत नहीं है श्रद्धा, संदेह से आगे है, संदेह से ऊपर है। संदेह की यात्रा को भरपूर पूरा कर लो, उसे अधूरा मत छोड़ना। उससे अगर बचकर चले, अधूरा छोड़ा, कुछ बचा रहा, तो वह लौट—लौटकर श्रद्धा को खंड करेगा, भग्न करेगा।जो भी अनुभव अधूरा रह जाएगा, वह अनेक—अनेक रूपों में वापस लौटता है। अनुभव को पूरा किए बिना कोई उपाय नहीं है। डरो मत।मैं उन आस्तिकों जैसा नहीं हूं जो तुमसे कहते हैं, संदेह मत करो। मैं तुमसे कहता हूं, पूरा संदेह कर लो। क्योंकि मेरी श्रद्धा संदेह से टूटती नहीं, नष्ट नहीं होती। श्रद्धा विराट है। तुम्हारे संदेह से श्रद्धा को कोई भी भय नहीं है। तुम कर ही डालों उसे पूरा। और तुम पाओगे, जैसे—जैसे संदेह पूरा होता है, वैसे—वैसे एक जीवंत प्रकाश श्रद्धा का तुम्हारे भीतर आना शुरू हो जाता है।संदेह कोई बड़ी महत्वपूर्ण बात नहीं है। संदेह है इसलिए, क्योंकि तुम भयभीत हो। संदेह भय का लक्षण है। कैसे भरोसा करें? कहीं दूसरा धोखा न दे दे! कहीं दूसरा कोई चालबाजी न करता हो! कहीं कोई षड्यंत्र न चल रहा हो तुम्हारे चारों तरफ! कोई तुम्हें धोखा देने, डुबाने की, मिटाने की कोशिश में न लगा हो! संदेह का अर्थ है, भयभीत आदमी की सुरक्षा। जितना भयभीत आदमी होता है, उतना संदेह करता है, जितना कायर आदमी होता है, उतना ज्यादा संदेह करता है। इसलिए संदेह कोई बहुत बलशाली बात नहीं है, वह तो कमजोर का लक्षण है।पर तुम संदेह कर लो और संदेह करके तुम देख लो ठीक तरह कि संदेह से कोई सुरक्षा नहीं होती। संदेह से भला तुम दूसरे से बच जाते हो, लेकिन संदेह ही तुम्हें खा जाता है। तुम दूसरे से संदेह कर लेते हो, तो हो सकता है, दूसरा तुम्हें नुकसान न पहुंचा सके।लेकिन दूसरा नुकसान क्या पहुंचा सकता था? हो सकता था, तुम्हारी जेब काट लेता, पांच पैसे लेने थे, वहां दस पैसे ले लेता। हो सकता था, तुम सड़क के भिखारी हो जाते, अगर तुम लोगों पर भरोसा करते। और अभी तुम महल में बैठे हो। लेकिन तुम यह भूले जा रहे हो कि संदेह तुमसे कुछ छीने ले रहा है, जो बहुत मूल्यवान है। रक्षक भक्षक हुआ जा रहा है। वह तुमसे तुम्हारी आत्मा छीने ले रहा है, वह तुमसे तुम्हारी परमात्मा की संभावना छीने ले रहा है। बचा रहे हो दो कौड़ी, खो रहे हो सब कुछ।जब तुम पूरा संदेह करोगे, तब तुम्हें यह भी दिखाई पड़ेगा। तब तुम संदेह से भी सावधान हो जाओगे, कि संदेह भी कुछ छीने ले रहा है, मिटाए डाल रहा है।जीवन में जो भी मूल्यवान है, संदेह सभी को मिटा देता है। तुम प्रेम नहीं कर सकते संदेह के साथ। तुम मित्रता नहीं कर सकते संदेह के साथ। संदेह करने वाले का कहीं कोई मित्र होता है? कैसे हो सकता है? कहीं संदेह करने वाला किसी को प्रेम कर सकता है? कैसे कर सकता है? संदेह की दीवाल सदा बीच में खड़ी रहेगी। संदेह करने वाला डरा हुआ, कंपता हुआ जीएगा। संदेह नरक है। उसमें तुम भयभीत ही रहोगे, उसमें कभी तुम अभयपूर्वक खड़े न हो सकोगे। न तुम्हारे जीवन में मित्रता की गंध आएगी, न प्रेम का प्रकाश आएगा। तुम्हारा जीवन कीड़े—मकोड़े की तरह होगा। संदेह से छिपे हो अपनी खोल में, डरे हो, कंप रहे हो, बाहर निकल नहीं सकते, फैल नहीं सकते।कछुए को देखा है! भयभीत हो जाता है, तो सब हाथ—पैर सिकोड़कर भीतर छिप जाता है। ऐसे ही तुम सिकुड़ गए हो अपनी देह में, जैसे कछुआ अपनी देह में छिप जाता है। और देह में जो छिप गया है, वह कैसे परमात्मा को जानेगा? वह कैसे स्वयं को जानेगा? भयभीत के लिए कोई ज्ञान नहीं है। भयभीत लाख उपाय करे, तो भी ज्ञान को न जान सकेगा। ज्ञानियों ने अभय को ज्ञान का पहला कदम माना है। जो व्यक्ति अभय को उपलब्ध हो जाता, उसके ही जीवन में सुबह होती है, अन्यथा रात घिरी रहेगी। रात संदेह की है, सुबह श्रद्धा की।रात से पार हो जाओ, रात के अंधेरे को छिपाकर मत बैठे रहो। बहुत—से लोग यही कर रहे हैं। संदेह तो मौजूद है और ऊपर से श्रद्धा कर लिए हैं, इससे बड़ी दुविधा में पड़ गए हैं। ऊपर—ऊपर श्रद्धा है, भीतर— भीतर संदेह है। हाथ जोड़कर मंदिर में खड़े हैं, हाथ झूठे जुड़े हैं, क्योंकि हृदय में संदेह सरक रहा है। प्रार्थना कर रहे हैं, आकाश की तरफ चेहरा उठाया हुआ है। बस, चेहरा ही उठा है, आत्मा नहीं उठी है। क्योंकि भीतर तो संदेह है। पक्का है नहीं कि परमात्मा है।लोग कहते हैं, पिता कहते हैं, मां कहती है, पूर्वज कहते हैं, शास्त्र कहते हैं, गुरु कहते हैं, जब इतने कहते हैं, तो होगा। लेकिन तुम्हारी कोई प्रतीति नहीं है, तुम्हारा कोई भरोसा नहीं है। और जब इतने लोग कहते हैं, तो पूजा कर लेनी ठीक ही है। कौन झंझट में पड़े; कहीं हो ही। कहीं बाद में पता चले कि है।तो तुम बड़ी कुशलता कर रहे हो। तुम परमात्मा के साथ भी गणित से चल रहे हो। तुम्हारा प्रेम भी हिसाब—किताब है। तुम्हारी प्रार्थना भी खाते—बही में लिखी है। तुम कर क्या रहे हो?तुम यह कर रहे हो कि कहीं मरने के बाद पता चला कि परमात्मा है, तो यह तो कह सकूंगा कि मैंने श्रद्धा की थी, मंदिर गया था, मस्जिद—गुरुद्वारा, तेरी पूजा—प्रार्थना की थी।लेकिन परमात्मा न तुम्हारी पूजा—प्रार्थना से राजी होता है, न तुम्हारे मंदिर—मस्जिद जाने से। जिस दिन श्रद्धा का मंदिर तुम्हारे भीतर उठता है, जिस दिन श्रद्धा का कलश तुम्हारे भीतर उठता है, बस उसी दिन परमात्मा राजी होता है। उसके पहले तो तुम कुछ और कर रहे थे। तुमने न तो प्रेम किया, न तुमने परमात्मा को चाहा, न पुकारा।झूठी है तुम्हारी श्रद्धा, अगर संदेह के ऊपर तुमने उसको रंग—रोगन की तरह लगा लिया है। किससे छिपा रहे हो? किससे बचा रहे हो? अगर संदेह है, तो मैं कहता हूं उसे तुम मवाद की तरह समझो, उसे निकल जाने दो। उसके निकल जाने से तुम स्वस्थ हो जाओगे।झूठे आस्तिक मत बनना। सच्चा नास्तिक झूठे आस्तिक से बेहतर है। कम से कम सच्चा तो है, कम से कम यह तो कहता है कि मुझे भरोसा नहीं है, तो मैं कैसे प्रार्थना करूं? इतनी प्रामाणिकता तो है। कहता है, मैंने किसी परमात्मा को जाना नहीं, तो मैं कैसे हाथ जोडू? किसके लिए हाथ जोडूं? मुझे कोरे आकाश के अतिरिक्त कोई दिखाई नहीं पड़ता। मंदिर जाता हूं तो पत्थर की मूर्तियां दिखाई पड़ती हैं।झुकने की झूठी बात नास्तिक नहीं कर पाता। और मैं तुमसे कहता हूं नास्तिक ही कभी ठीक अर्थों में आस्तिक हो पाते हैं। झूठे आस्तिक तो झूठे ही बने रहते हैं। आस्तिक तो होना ही मुश्किल है उनके लिए, अभी वे नास्तिक भी नहीं हुए!नास्तिकता यानी संदेह, आस्तिकता यानी श्रद्धा। नास्तिक आस्तिक के विपरीत नहीं है, जैसे संदेह श्रद्धा के विपरीत नहीं है। आस्तिक नास्तिक के आगे है, जैसे श्रद्धा संदेह के आगे है। जहां संदेह समाप्त होता है, वहा श्रद्धा शुरू होती है। जहां नास्तिकता समाप्त होती है, वहा आस्तिकता शुरू होती है। लेकिन नास्तिकता से गुजरना जरूरी है।दुनिया में इतना अधर्म है, वह इसीलिए है कि यहां झूठे धार्मिक हैं। यहां सच्चे नास्तिक भी नहीं हैं। यहां प्रार्थना भी पाखंड है। यहां प्रेम भी ऊपर की बकवास है। यहां पूजा भी ढोंग है। यहां सारा व्यवहार पाखंड है, हिपोक्रेसी है, धोखा है।और तुम जानते हो भलीभांति। क्योंकि तुम तो जानोगे ही कि तुमने जब हाथ जोड़े थे, तो भीतर तुम्हारी आत्मा नहीं जुड़ी थी। और तुमने जब सिर झुकाया था, तो तुम नहीं झुके थे। और जब तुमने कहा था कि हा, भरोसा करता हूं तब तुम्हारी बुद्धि तो कह रही थी, तुम्हारा हृदय अनम्य था, नहीं झुका था, जरा भी पिघला नहीं था। ऊपर—ऊपर तुमने श्रद्धा ओढी थी, वस्त्रों की भांति थी; आत्मा तो तुम्हारी संदेह से भरी थी।मैं तुम्हें आस्तिक बनने को नहीं कहता। क्योंकि आस्तिक तो तुम बन कैसे सकोगे? वह तो ऊपर की सीढ़ी है। कम से कम नास्तिक तो बन जाओ। पहली सीढ़ी तो पार कर लो। ऊपर की सीढ़ी तो अपने आप आ जाती है। जिस दिन नीचे की सीढ़ी पूरी होती है, अचानक द्वार खुल जाता है, ऊपर की सीढ़ी आ गयी।संदेह करो, परिपूर्ण आत्मा से संदेह करो। संदेह मार्ग है। लेकिन अधूरे में मत रुक जाना, संदेह पूरा कर लेना। जिस दिन तुम संदेह पूरा करोगे, एक नई विधा खुलती है, वह हैं, संदेह पर संदेह। और संदेह पर संदेह ही संदेह को काट देता है, जैसे कांटे को काटा निकाल लेता है। संदेह ही संदेह को काट देता है। और जिस दिन दोनों कांटे बाहर हो जाते हैं, अचानक तुम पाते हो कि श्रद्धा की बाढ़ आ गई।और जब श्रद्धा की बाढ़ आती है, तो उसका यह अर्थ नहीं होता कि तुम परमात्मा में भरोसा करते हो; उसका इतना ही अर्थ होता है कि तुम भरोसा करते हो। उसका यह अर्थ नहीं होता कि तुम मंदिर की मूर्ति में भरोसा करते हो, उसका इतना ही अर्थ होता है कि भरोसा पैदा हुआ। अब मस्जिद में भी भरोसा है, मंदिर में भी भरोसा है, कुरान में भी, वेद में भी; चोर में भी, साधु में भी।बड़ी प्रकांड क्रांति है श्रद्धा की। उससे बड़ी कोई क्रांति नहीं है। तुम श्रद्धा करते हो। अब तुम जानते हो कि संदेह कर—करके देख लिया, कुछ पाया नहीं, कुछ बचा नहीं, सिर्फ गंवाया, कौड़िया इकट्ठी कीं, हीरे खो दिए। अब तुम पूरी तरह बदल जाते हो। अब तुम कहते हो, कौड़िया जिनको ले जानी हों, वे ले जाएं। हम कौड़ियों को पकड़ने में अब हीरों को न खोएंगे। अब तुम कहते हो, हम श्रद्धा का हीरा बचाएंगे।जिसको मीरा या कबीर कहते हैं, ऐ री मैंने राम—रतन धन पायो। वह श्रद्धा का नाम है, राम—रतन धन। अब सब भ्रम टूट गया, सब संदेह टूटा; राम—रतन धन पाया। मिला है, कोहिनूर हीरा मिल गया, अब कौन कंकड़—पत्थर बीनता है!और जब तुम्हारी आस्तिकता नास्तिकता का अतिक्रमण होगी, ट्रांसेंडेंस होगी, और जब तुम्हारी श्रद्धा संदेह को पूरा जीने से आएगी, तब तुम्हारी श्रद्धा को कोई भी न तोड़ सकेगा। तोड्ने की संभावनाएं तो तुम पहले ही पार कर चुके। अब तुम्हारी नास्तिकता दोबारा नहीं आ सकती। तुम उसे जी लिए, तुमने उसे चुका दिया, तुम उसे मरघट तक पहुंचा आए, तुम उसे चिता पर जला आए। अब वह बची ही नहीं, राख हो गई। अब तुम्हारी आस्तिकता को कोई डांवाडोल न कर सकेगा। हजार नास्तिक इकट्ठे हों और हजार—हजार तर्क दें, तो भी आस्तिक का रोआं नहीं कंपता।लेकिन अभी तो तुम डरे हुए हो। और तुम जिन धर्मों में पले हो, पाले गए हो, वे धर्म तक डरे हुए हैं। वे तुम्हें समझाते हैं कि नास्तिक को सुनना मत, कान बंद कर लेना।तुमने एक आदमी की कहानी सुनी होगी, घंटाकर्ण की, कि उसने अपने कानों में घंटे लटका लिए थे। क्योंकि वह राम का भक्त था और गांव के लड़के शैतानी करते थे, आवारा लड़के। और धीरे— धीरे पूरा गांव उसका मजा लेने लगा। तो लोग उसके कान के पास आकर कृष्ण का नाम ले देते।पुरानी कहानी है, नहीं तो मोहम्मद का लेते। वह और घबड़ा जाता। कृष्ण से भी घबड़ाता था। क्योंकि वह राम का भक्त था और कृष्ण का नाम पड़ जाए, गलत नाम पड़ गया! श्रद्धा बड़ी कमजोर रही होगी। इतनी छोटी श्रद्धा कि राम में चुक जाए और कृष्ण तक भी न पहुंचे।ऐसी छोटी श्रद्धा से कहीं पार होओगे? ऐसी छोटी डोंगी से भवसागर पार करना चाहते हो? महायान चाहिए। श्रद्धा ऐसी चाहिए कि सब मंदिर—मस्जिद समा जाएं। राम, कृष्ण, बुद्ध, सब उसमें पड़ जाएं और छोटे हो जाएं और श्रद्धा का आकाश बड़ा हो, सबके लिए खुली जगह हो। हजार—हजार राम उठे और करोड़—करोड़ कृष्ण, तो भी श्रद्धा के आकाश में कमी न पड़े।श्रद्धा कोई आयन थोड़े ही है तुम्हारा कि उसके आस—पास चारदीवारी है। श्रद्धा खुला आकाश है, नीला आकाश है, जिसकी कोई सीमा नहीं।घंटाकर्ण घबड़ा गया कि यह रोज—रोज गाव मजाक करता है; इनकी तो मजाक है, मेरी जान मुसीबत में है। ऐसा दुश्मन का नाम सुन—सुनकर भ्रष्ट हो जाऊंगा। और कृष्ण का नाम सुनते ही से श्रद्धा डगमगाती है कि पता नहीं, कृष्ण ठीक हों।अब कृष्ण और राम बड़े विपरीत प्रतीक हैं। सत्य में दोनों समाए हैं, क्योंकि सत्य में सभी विरोधाभास समा जाते हैं। लेकिन अगर तुम राम और कृष्ण को सीधा—सीधा सोचो, तो बड़े विपरीत हैं। कहां राम, मर्यादा! और कहां कृष्ण, इनसे ज्यादा अमर्यादा तुम कहीं खोज पाओगे! कहां राम, एक पत्नी व्रती। और कहां कृष्ण, जिनकी गोपियों की कोई संख्या नहीं; जो दूसरों की स्त्रियां भी चुरा लाए। कहां राम, जिनके वचन का भरोसा किया जा सकता है। कहां कृष्ण, जिनके वचन का कोई भरोसा नहीं किया जा सकता। कहें कुछ, करें कुछ! कहा था कि युद्ध में भाग न लेंगे। फिर युद्ध के मैदान पर उतर पड़े। धोखा दे दिया; वचनभंग हो गया। कहं। राम.......!तुम सोच सकते हो राम को कि स्त्रियों के कपड़े चुराकर झाड़ पर बैठे हैं! असंभव है। यह बात ही सोच में नहीं आती। लेकिन कृष्ण को कोई अड़चन नहीं है। कृष्ण को कोई अड़चन ही नहीं है, कोई मर्यादा नहीं है, कोई नियम नहीं है। कृष्ण पूरे अराजक, राम अनुशासित। वह मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। और कृष्ण को अगर नाम देना हो, तो वह अमर्यादा पुरुषोत्तम हैं। कोई नियम नहीं मानते, कोई व्रत नहीं मानते, कोई संयम नहीं मानते। वे बाढ़ की तरह हैं। राम तो नहर हैं, सीमा में बंधे, लकीर में चलते हैं। कृष्ण तो गंगा में आई बाढ़ हैं, सब कूल—किनारा तोड़ देते हैं।तो स्वाभाविक था कि घंटाकर्ण घबड़ाता हो कृष्ण के नाम से। यह घबड़ाने वाला है। सभी धार्मिकों को घबड़ाना चाहिए इस नाम से। यह नाम खतरनाक है। यह तो अराजक नाम है। इससे बड़ा कोई अनार्किस्ट कभी हुआ? इससे बड़ा कोई अराजकतावादी नहीं हुआ। इससे ज्यादा समाज, तंत्र, व्यवस्था, राज्य का कोई विरोधी नहीं हुआ।तो इन दोनों का कोई ताल—मेल तो नहीं बैठता। लेकिन खुले आकाश में दोनों साथ—साथ हैं। और जिन्होंने खुला आकाश देखा है, वे कहते हैं, ये दोनों ही एक के ही अवतार हैं। राम—आशिक, सीमा—बद्ध। कृष्ण—पूर्ण, सीमा तोड़कर।लेकिन जो राम में सीमा में प्रकट हुआ है, वही क्या की असीमा में प्रकट हुआ है। जो गंगा का जल नहर में बह रहा है, वही बाढ़ में आया है। और स्वभावत:, बाढ़ का जल खतरनाक है; सभी के काम का नहीं है। खेतों को उजाड़ देगा, घरों को मिटा देगा।इसलिए कृष्ण के साथ तो खतरे का संबंध है। काम तो नहर से ही लिया जाएगा; वह सींचेगी, खेतों को भरपूर करेगी, लोगों की प्यास बुझाकी। राम की उपयोगिता है। कृष्ण के साथ तो जिनको खतरे का अभियान करना हो, वे जाएं। लेकिन अधिक लोग तो कृष्ण के साथ न जा सकेंगे। अधिक लोगों को तो राम के साथ ही जाना पड़ेगा।घंटाकर्ण घबड़ा गया होगा कि यह तो अराजकतत्व लोग चिल्लाने लगे। और इनकी तो मजाक है, मेरी जान मुसीबत में है। इनका खेल है और मैं मर मिला। ये मेरी श्रद्धा को डगमगाते हैं। तो उसने दोनों कान में घंटे बांध लिए। घंटे बजते रहते, लोग लाख चिल्लाएं कृष्ण का नाम, आवाज भीतर न पहुंचती।जैसा मैं देखता हूं ऐसा किसी आदमी ने कभी किया हो या न किया हो, लेकिन सौ में से निन्यानबे आस्तिकों के कानों में घंटे लटके देखता हूं। वे घंटाकर्ण हैं; वे डरे हुए लोग हैं। भीतर भी भय है, बाहर भी भय है। संदेह से पीड़ित हैं। और नास्तिक की बात से डरते हैं। नास्तिक उन्हें कंपा देता है, घबड़ा देता है, क्योंकि उनके भीतर ही संदेह है। नास्तिक उन्हें जगा देता है, उकसा देता है। जैसे किसी ने राख को हिला दिया हो और अंगारा बाहर आ गया। ऐसा नास्तिक उन्हें उकसा देता है। वे डरते हैं; वे दूसरे का शास्त्र नहीं पढ़ते, वे दूसरे की किताब नहीं सुनते, वे दूसरे का वचन नहीं सुनते। वे अपने गुरु की ही सुनते हैं। और कानों में घंटे लटकाए हुए हैं।जैन हिंदू की सुनने नहीं जाता, हिंदू जैन की सुनने नहीं जाता; मुसलमान गीता नहीं पढ़ता, हिंदू कुरान नहीं पढ़ता। बड़ा डर है। कैसी आस्तिकता है? नपुंसक आस्तिकता है।आस्तिक तो विराट है, वह सब को सुन सकता है; कोई उसे हिला नहीं सकता। लेकिन यह तो तभी होगा, जब तुम नास्तिकता को पार कर चुके होओ। अगर नास्तिकता भीतर रह गई, तो डर रहेगा।ऐसा ही समझो कि एक छोटा बच्चा है; खेल—खिलौनों में इसको रस है। इसका शरीर तो बड़ा हो गया, लेकिन इसकी बुद्धि बचकानी रह गई। अब यह सम्हालकर चलता है कि कहीं खेल—खिलौने दिखाई न पड़ जाएं! क्योंकि दिखाई पड़ जाएं, तो यह लोभ संवरण न कर सकेगा। और तब बड़ी हंसी होगी कि लोग कहेंगे, जवान आदमी और तू गुड़िया लिए फिर रहा है!तो इसने गुड़ियों को छिपा दिया है घर में। दूसरे भी गुड़िया लिए इसके आस—पास घूमें, छोटे बच्चे भी, तो यह घबड़ाता है। क्योंकि इसका रस तो अभी भी गुड़िया में है। अभी भी यह चाहता है कि गुड़िया का विवाह रचा ले। अब भी यह चाहता है कि फिर खेल खेल ले। भीतर यह बचकाना रह गया है, भीतर का बच्चा समाप्त नहीं हुआ। यह प्रौढ़ हुआ ही नहीं है, सिर्फ शरीर से दिखाई पड़ रहा है, ऊपर से दिखाई पड़ रहा है। भीतर! भीतर बाल—बुद्धि है।तुम भीतर तो नास्तिक हो, संदेह से भरे हो और ऊपर से तुम आस्तिक हो। तुम्हारी प्रौढ़ता सही नहीं है। तुम डरे हुए हो, कहीं कोई यह न कह दे कि ईश्वर नहीं है, क्योंकि तुम्हें भी शक तो है ही। कहीं कोई यह न कह दे कि पत्थर की मूर्ति को क्या पूज रहे हो? यहां क्या है? डरे तो तुम हो ही।दयानंद के जीवन में घटना है। उस घटना को इस भांति तो कभी समझा नहीं गया है। घटना है कि वे पूजा को बैठे हैं। उन्होंने जो मिष्ठान्न चढ़ाए हैं मूर्ति के सामने, एक चूहा ले भागा। एक चूहा! हो सकता है गणेशजी की मूर्ति रही हो। और चूहा तो उनका वाहन है। या शंकरजी की मूर्ति रही हो, वे गणेशजी के पिता हैं; थोड़ा दूर का संबंध है चूहे से।चूहा मिष्ठान्न ले भागा। दयानंद के मन में संदेह पैदा हो गया कि जो भगवान अपनी रक्षा चूहे से नहीं कर सकता, वह मेरी रक्षा क्या करेगा? उन्होंने मूर्ति—बूर्ति फेंक दी। उसी दिन से वे अमर्तिवादी हो गए। उस चूहे के द्वारा मिठाई का ले जाना ही आर्यसमाज का जन्म है, उसी दिन आर्यसमाज पैदा हुआ।लेकिन थोड़ा सोचने जैसा है कि मूर्ति में दयानंद का भरोसा था क्या? अगर भरोसा था, तो एक चूहा भरोसे को तोड़ सकता है? तो चूहा दयानंद से ज्यादा बड़ा महर्षि मालूम होता है।एक चूहा दयानंद की श्रद्धा को तोड़ दिया। श्रद्धा थी? अगर श्रद्धा होती, तो कौन तोड़ सकता है? श्रद्धा थी ही नहीं, पहले स्थान पर। ऐसे ही झूठी पूजा चल रही थी। लेकिन दयानंद को यह दिखाई नहीं पड़ा कि मेरी श्रद्धा झूठी थी। दयानंद को दिखाई पड़ा, मूर्ति व्यर्थ है। इसे थोड़ा सोचने जैसा है।अगर दयानंद निश्चित ही आत्म—खोजी होते, तो उनको यह दिखाई पड़ता कि एक चूहे ने श्रद्धा तोड़ दी। मेरे पास श्रद्धा ही नहीं है। और हो सकता है, वह शरारत गणेशजी की ही रही हो कि चूहा ले जा मिठाई, इसकी झूठी श्रद्धा तोड़।लेकिन उस दिन से वे मूर्ति—विरोधी हो गए। वे मूर्ति के प्रेमी कब थे? उनका मूर्ति—विरोध तो समझ में आता है। लेकिन वे प्रेमी कब थे, यह मेरी समझ में नहीं आता। प्रेमी इतनी जल्दी छोड़ देता है प्रेम? प्रेम इतना कमजोर और कच्चा धागा है? प्रेम कोई कच्चे कांच की चूड़ी है? कि ऐसे चूहा गिरा दे और तोड़ दे!अगर दयानंद की जगह सच में कोई आस्तिक हुआ होता, तो उसने राणेशजी में तो भगवान देखा ही था, चूहे में भी भगवान देखा होता। श्रद्धा का आकाश बड़ा है। और उसने कहा होता, अरे, चूहा भगवान! तो तुम मिठाई ले चले। तो जिसको चढ़ाई थी, पहुंच गई। हम तो सोचते थे, मूर्ति मुरदा है। लेकिन मूर्ति मुरदा नहीं है। मूर्ति ने चूहे की तरफ से हाथ फैलाया और मिठाई ले ली।अगर श्रद्धा होती, तो ऐसा दिखता। और तब यह मुल्क आर्यसमाज के दुर्भाग्य से बच जाता। लेकिन वह नहीं हो सका। चूहा आर्यसमाज को पैदा करवा गया। संदेह था भीतर।दयानंद तर्कवादी हैं, आस्तिक नहीं हैं। और कभी आस्तिक नहीं हो पाए। तर्क ही रहा; श्रद्धा कभी न हो पाई। तर्क का ही सब जाल रहा। मरते दम तक भी श्रद्धा पैदा नहीं हो सकी। वे पहले कदम पर ही चूक गए।उस दिन उन्हें तय करना था कि मेरी नास्तिकता अभी मरी नहीं है, मेरा संदेह अभी मरा नहीं, अभी मैं पूजा के योग्य नहीं। उन्होंने समझा कि यह शंकरजी या गणेशजी पूजा के योग्य नहीं। जानना था कि मैं अभी पूजा का अधिकारी नहीं। अभी इस मंदिर में प्रवेश के मैं योग्य नहीं हुआ; अभी मुझे श्रद्धा खोजनी पड़ेगी।अगर ठीक आख होती, तो चूहे ने बता दिया होता कि तुम्हारी श्रद्धा ऊपर—ऊपर है, पतले कागज की तरह चढ़ी है; भीतर संदेह विराजमान है तुम्हारे मंदिर में। चूहा कुछ पैदा कर सकता है जो तुम्हारे भीतर नहीं?सब संदेह चूहों की तरह तुम्हें कुतर देते हैं, क्योंकि तुम्हारी श्रद्धा कपड़ों जैसी है, वह तुम्हारी आत्मा नहीं है। इसलिए फिर तुम डरते हो कि कहीं कोई ऐसी बात न कह दे, जिससे तुम्हारी श्रद्धा डगमगा जाए।मैं ग्‍वालियर की महारानी के घर मेहमान था। उन्होंने पहले मुझे कभी सुना नहीं था। पता नहीं किस भूल—चूक से मुझे बुला लिया। सुनकर वे घबड़ा गईं, बहुत बेचैन हो गईं। साधारण श्रद्धालु जन, जिनकी श्रद्धा में कोई बल नहीं है, कोई बुनियाद नहीं है। शिष्टाचारवश, उनकी आने की भी हिम्मत मेरे पास न रही। उनके ही महल में मैं मेहमान हूं लेकिन शिष्टाचारवश..। शिष्टाचार वाली महिला हैं।वे दूसरे दिन मुझे मिलने आईं और कहा कि मेरी हिम्मत नहीं रही आने की आपके पास। जो सुना, उससे मैं तो घबड़ा गई। आप तो हमारी श्रद्धा नष्ट कर देंगे!मैंने कहा, जो श्रद्धा तुम्हारी मेरे बोलने से नष्ट हो जाए उसका तुम मूल्य कितना आंकती हो? शब्दों से जो श्रद्धा मिट जाए, वह पानी के बबूलों जैसी कमजोर होगी। शब्द हवा में बने बबूले हैं। मैंने कुछ कहा, तुम्हारी श्रद्धा टूट गई! श्रद्धा है या मजाक कर रखा है? उन्होंने कहा, जो भी हो, लेकिन अब आप और कुछ मत कहें। मेरा लड़का भी आपसे मिलने आना चाहता था। लेकिन मैंने उसे रोक दिया। क्योंकि वह तो अभी जवान है। हो सकता है, आप उसको बिलकुल डगमगा दें।अब यह मां न तो यह देख पा रही है कि इसकी श्रद्धा दो कौड़ी की है। और न यह देख पा रही है कि जिस दो कौड़ी की श्रद्धा पर यह अपने बेटे को बचा रही है, उसका कितना मूल्य हो सकता है! उससे तुम नाव बनाओगे? उससे तुम भवसागर पार करोगे?सोना आग से गुजरता है, तो डरता नहीं; कचरा गुजरता है, तो डरता है। कचरा जुलेगा।मैं तुमसे कहता हूं कि संदेह से गुजरकर जो बच जाए, वही श्रद्धा है। संदेह में जो मर जाए, तुम उसे कचरा समझना, वह सोना था ही नहीं। अच्छा हुआ मर गया। संदेह को धन्यवाद देना। क्योंकि संदेह ने तुम्हें कचरे को बचाने से बचाया, कचरे को सम्हालने से बचाया, नहीं तुम कचरे को तिजोड़ी में रखे बैठे रहते।इस अस्तित्व में कुछ भी व्यर्थ नहीं है, श्रद्धा भी सार्थक है, संदेह भी सार्थक है। जो जानता है, वह संदेह को भी स्वीकार करता है। लेकिन संदेह पर ही अटक नहीं जाता, आगे जाता है। संदेह महत्वपूर्ण है, सब कुछ नहीं है। एक अंग और है जीवन का, जो श्रद्धा है।जैसे दो पंखों से पक्षी उड़ता है, जैसे दो पैरों से तुम चलते हो, जैसे दो आंखों से तुम देखते हो, ऐसे ही संदेह और श्रद्धा दोनों आंखें हैं, दोनों से देखा जाता है। और संदेह की आख से जब तुम सब देख लेते हों—सबका मतलब है, जब संदेह भी देख लेते हो—तब दूसरी आख खुलती है। अब तुम श्रद्धा के योग्य हुए पात्र बने। संदेह तुम्हें निखारता है, संदेह तुम्हें जलाता है, शुद्ध करता है। संदेह सहयोगी है, मित्र है।नास्तिकता मेरे लिए आस्तिक की दुश्मन नहीं है। नास्तिकता मेरे लिए आस्तिक की तैयारी है; वह आस्तिक का विद्यापीठ है। वहां आस्तिक निर्मित होता है। और जब कोई धर्म संदेह से डरने लगता है, तब समझ लेना कि वह धर्म मुरदा है।जब महावीर जिंदा होते हैं, तो वे संदेह से भयभीत नहीं करते अपने शिष्यों को। वे कहते हैं, लाओ तुम्हारे संदेह; पूछो, प्रश्न उठाओ, जो भी तुम्हारे भीतर छिपा है, प्रकट करो; क्योंकि मैं मौजूद हूं जला दूंगा।बुद्ध जब जिंदा होते हैं, तो वे किसी के होंठ को बंद नहीं करते, होंठ को सीते नहीं। वे कहते हैं, पूछो, जिज्ञासा करो, संदेह करो! क्योंकि कैसे तुम आगे बढ़ोगे! मैं मौजूद हूं मैं तुम्हें तुम्हारे संदेह के पार ले चलूंगा।यही मैं भी तुमसे कहता हूं। तुम्हारे पास जितने संदेह हों, सब ले आओ।तुम्हारा कोई संदेह श्रद्धा का दुश्मन न है, न हो सकता है। संदेह जैसी चीज कहीं श्रद्धा की दुश्मन हो सकती है! संदेह तो अंधेरे जैसा।तुमने देखा, अंधेरा कितना ही घना हो, एक छोटे—से दीए को भी बुझा नहीं सकता है। अंधेरे की ताकत क्या? तुमने कभी सोचा यह कि अंधेरा गिर पड़े पहाड़ की तरह और छोटे—से दीए को बुझा दे। असंभव! सारी पृथ्वी पर अंधकार भरा हो और तुम्हारे घर में एक छोटा दीया जलता हो, तो अंधकार उसे बुझा नहीं सकता। अंधेरे की, अंधकार की ताकत क्या?लेकिन अगर झूठा दीया जला हो, जला ही न हो, आख बंद करके तुम सोच रहे हो कि दीया जला है, तो फिर दीया बुझाया जा सकता है। जो जला ही नहीं है, वह बुझ जाएगा; वह बुझा ही हुआ था। आख बंद करके तुम सपना देख रहे थे।दयानंद को जिस दिन चूहे ने डगमगा दिया, खाक दयानंद रहे होंगे! उस दिन वे किसी अंधेरे में दीए के होने की कल्पना कर रहे थे। वह चूहे ने फूंक मार दी, दीया बुझा दिया।और फिर उनकी चूहे पर ऐसी श्रद्धा हो गई कि वह कभी न मिटी। फिर दोबारा उन्हें कभी संदेह चूहे पर न आया, न अपने पर आया। जिंदगीभर फिर उसी भरोसे में रहे, वह जो उस दिन उदघाटन हो गया; जैसे वह कोई बुद्धत्व था। और आर्यसमाजी सोचते हैं कि उस दिन बड़े ज्ञान की घटना घट गई जगत में।दयानंद पंडित थे, पंडित ही रहे। और चूहे से जिस श्रद्धा का भ्रम टूट गया था, उस संदेह को मिटाने के लिए उन्होंने कभी फिर कुछ न किया। फिर वे तर्कनिष्ठ ही बने रहे। कितना ही विचार उन्होंने वेदों का किया, उपनिषदों का किया, लेकिन उस सब विचार में तर्क ही आधार रहा।इसलिए तुम आर्यसमाजियों को पाओगे बड़े कुतर्की। उनसे बकवास करोगे, तो मुश्किल में पड़ोगे, बकवासी हैं। क्योंकि पूरा ही आंदोलन बकवासियों का है। उसका धर्म से कोई लेना—देना न रहा।धर्म का तर्क से कोई संबंध नहीं है। धर्म का संबंध श्रद्धा से है। और अगर तुम संदेह से भरे हो, तो तुम धर्म से भी जो संबंध बनाओगे, वह भी तर्क का होगा। तब तुम सिद्ध करोगे तर्क से कि वेद सही हैं। और तब ऐसे—ऐसे तर्क उठाओगे.......। लेकिन वेद सही हैं, यह तुम्हारे हृदय की श्रद्धा का आविर्भाव न होगा; यह तर्क ही होगा। और तर्क से ही तुम अपने को समझाते रहोगे।तर्क का अर्थ ही यह है कि संदेह भीतर मौजूद है, जिसे तुम तर्क से झुठला रहे हो। श्रद्धा का कोई तर्क नहीं है। श्रद्धा स्वयं—सिद्ध है। यह उसका स्वभाव है। इसके लिए किसी प्रमाण की कोई जरूरत नहीं है। वह स्वत: प्रमाण है, सेल्फ—एविडेंट है, वह कोई गवाह नहीं मांगती।इसलिए तुम आस्तिक को गलत कर ही नहीं सकते। क्योंकि जिस ढंग से तुम उसे गलत कर सकते हो, उस ढंग से सही होने का वह दावा ही नहीं करता। उसके सही होने का दावा ही और है।वह यह नहीं कहता कि मैंने किन्हीं प्रमाणों से जान लिया कि परमात्मा है। वह कहता है कि मैंने देख लिया। वह कहता है कि मैं हो गया। वह कहता है, मैंने चख लिया। अब तुम लाख कहो कि परमात्मा नहीं है, मैं कैसे मानूं! मेरी प्यास बुझ गई और तुम कहते हो, पानी है नहीं। और मैं देखता हूं कि तुम प्यास में तड़प रहे हो। और तुम कहते हो, पानी है नहीं। और मेरी प्यास बुझ गई। मैं कैसे मानूं कि परमात्मा नहीं है! तुम्हें मैं दुख में देखता हूं और तर्क में देखता हूं संदेह में देखता हूं। मेरा दुख मिट गया, मेरे भीतर आनंद बरस गया। मैं कैसे मानूं कि आनंद नहीं है!तुम किसी और को डिगा सकते हो। जिसके भीतर आनंद न बरसा हो, तुम उसमें संदेह पैदा कर सकते हो। मुझमें तुम संदेह पैदा नहीं कर सकते। कोई उपाय ही न रहा। एक ही उपाय है कि किसी भांति अगर तुम मेरा आनंद छीन लो, तो शायद संदेह पैदा हो सके।लेकिन कोई किसी का आनंद कहीं छीन सकता है? तुम मेरा शरीर मुझसै छीन सकते हो, मेरी आत्मा तो नहीं छीन सकते! तुम मुझे मार डाल सकते हो, लेकिन भीतर तो कोई है, जहां शस्त्र छिदते नहीं, जहां आग जाती नहीं, उसे तुम छू भी न पाओगे। तो शरीर को काट देने से कुछ प्रमाणित न होगा, बल्कि मैं जो कहता था वही प्रमाणित होगा, कि मैं फिर भी हूं। तुम मेरे शरीर को काटकर भी इतना ही सिद्ध कर पाओगे। जो मेरी श्रद्धा थी, उसी को सिद्ध कर पाओगे।श्रद्धा को खंडित करने का उपाय नहीं है, क्योंकि वह अनुभव है। इसलिए मैं कहूंगा, संदेह को पूरा करो। इतना पूरा करो कि संदेह पर संदेह आ जाए। फिर संदेह लड़खड़ाकर खुद ही गिर पड़ता है। उसके गिर जाने पर, उसके गिर जाने पर ही पहली दफा श्रद्धा का उन्मेष होता है, तुम्हारे भीतर तरंग उठती है।श्रद्धा एक अनुभव है, बुद्धि की मान्यता नहीं। श्रद्धा कोई मान्यता, धारणा नहीं है, एक अनुभव है। जैसे प्रेम, ऐसी ही श्रद्धा है।तुम्हारा लड़का है, वह एक लड़की के प्रेम में पड़ गया है। तुम लाख समझाते हो कि नासमझ, पहले गौर से तो देख, इसका बाप चरित्रवान नहीं है। वह लड़का कहता है, बाप से लेना—देना क्या?तुम कहते हो, इसके घर में पैसा नहीं है। वह कहता है, पैसे के थोड़े ही मैं प्रेम में पड़ा हूं! तुम कहते हो, इसके कुल का तो विचार कर। वह लड़का कहता है, कुल से थोड़े ही विवाह करके आना है। बाप कहता है, यह लड़की काली—कलूटी है, दुबली है, बीमार है; हजार तर्क खोजता है। लेकिन वह लड़का कहता है, मेरी आख से जरा देखने की कोशिश करें। मुझे इससे सुंदर कोई दिखाई ही नहीं पड़ता।प्रेम के लिए तुम किसी भी तर्क से खंडित नहीं कर सकते। और अगर कर लो, तो समझना प्रेम था नहीं। अगर लड़का मान जाए कि बात तो ठीक है, घर में धन नहीं है, दहेज क्या खाक मिलेगा! तो वह लड़का प्रेम में था ही नहीं। असल में वह लड़का लड़का ही नहीं है। वह लड़का होने के पहले बाप हो गया। यह जिंदगी से चूकेगा। यह बूढ़ा हो चुका है।सिर्फ का आदमी सोचता है पैसे की। जवान आदमी पैसे की सोचे, उसकी जवानी संदिग्ध है। जवान को भरोसा होना चाहिए—दहेज पर थोड़े ही, अपने पर—कि कमा लेंगे, पैदा कर लेंगे। लेकिन जवान आदमी भी सोचता है, दहेज कितना? वह जवान न रहा। वह गणित में पड़ गया; वह हिसाब लगा रहा है; वह तर्क की दुनिया में उलझ गया, उसे प्रेम का कोई पता ही नहीं है। और श्रद्धा तो महा प्रेम है, वह तो प्रेम है अस्तित्व के साथ, वह तो बड़ा पागलपन है। और पागलों को कहीं तुम तर्क से समझा सकते हो?दयानंद जैसे लोग पागल कभी हुए नहीं। कभी नाचे नहीं मस्ती से। बस बैठकर तर्क जुटाते रहे, टीकाएं लिखते रहे वेद की और सिद्ध करते रहे कि वेद भगवान है।और भगवान को सिद्ध करने का कोई उपाय नहीं है। न वेद को सिद्ध करने का कोई उपाय है। सिद्ध करने की बात ही संदेह की दुनिया की बात है। भगवान सिद्ध है, श्रद्धा का आविर्भाव होते ही दिखाई पड़ता है, आख खुलते ही उसका सूरज उगा हुआ मिलता है। बस, आख खोलने की बात है।अंधे को कोई तर्क देने की जरूरत नहीं कि प्रकाश है; उससे इतनी ही प्रार्थना करनी है कि आख खोल ले। और वह कहता है, अभी आख कैसे खोलूं! भीतर बहुत सपने देख रहा हूं; बड़ा मजेदार सपना चल रहा है। तो हम उससे कहते हैं, खूब देख ले। जितना बन सके, सपना देख ले। इतनी गौर से सपने को देख कि तुझे खुद ही दिखाई पड़ जाए कि यह सपना है। तो धीमा—धीमा मत देख; पूरी प्रगाढ़ता से देख, गौर से देख, आख गड़ाकर देख।क्योंकि जब तेरा सपना भीतर टूटेगा, आख तू खोलेगा, तभी तुझे सूरज का प्रकाश अनुभव हो सकता है।