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कुंडलिनी जागरण में साधक के शरीर में स्थित कुंड से ही शक्ति ऊपर उठती है तो क्या कुंड अलग— अलग हैं


सा है, जैसे एक कुएं से तुम पानी भरो। तो तुम्हारे घर का कुआं अलग है, मेरे घर का कुआं अलग है, लेकिन फिर भी कुएं के भीतर के जो झरने हैं वे सब एक ही सागर से जुड़े हैं। तो अगर तुम अपने कुएं के ही झरने की धारा को पकड़कर खोदते ही चले जाओ, तो उस मार्ग में मेरे घर का कुआं भी पड़ेगा, औरों के घर के कुएं भी पड़ेंगे, और एक दिन तुम वहां पहुंच जाओगे जहां कुआं नहीं, सागर ही होगा। जहां से शुरू होती है यात्रा वहां तो व्यक्ति है, और जहां समाप्त होती है यात्रा वहां व्यक्ति बिलकुल नहीं है, वहां समष्टि है; इंडिविजुअल से शुरू होती है और एकोल्युट पर खतम होती है।

तो अगर यात्रा का प्रारंभिक बिंदु पकड़ोगे, तब तो तुम अलग हो, मैं अलग हूं; और अगर इस यात्रा का चरम बिंदु पकड़ोगे, तो न तुम हो, न मैं हूं। और जो है, हम दोनों उसके ही हिस्से और टुकड़े हैं। तो जब तुम्हारे भीतर कुंडलिनी का आविर्भाव होगा तो वह पहले तो तुम्हें व्यक्ति की ही मालूम पड़ेगी, तुम्हारी अपनी मालूम पड़ेगी। स्वभावत:, कुएं पर तुम खड़े हो गए हो। लेकिन जब कुंडलिनी का आविर्भाव बढ़ता चला जाएगा, तब तुम धीरे— धीरे पाओगे कि तुम्हारा कुआं तुम्हारा ही नहीं है, वह औरों से भी जुड़ा है। और जितनी तुम्हारी यह गहराई बढ़ती जाएगी उतना ही तुम्हारा कुआं मिटता जाएगा और सागर होता जाएगा। अंतिम अनुभव में तुम कह सकोगे कि यह कुंड सबका था। तो इसी अर्थ में मैंने कहा कि...... .इसी भांति हम व्यक्ति की तरह अलग—अलग मालूम हो रहे हैं।

आत्मा से परमात्मा में छलांग:

ऐसा समझो कि एक वृक्ष का एक पत्ता होश में आ जाए, तो उसे पडोस का जो पत्ता लटका हुआ दिखाई पड़ रहा है, वह दूसरा मालूम पड़ेगा। उसी वृक्ष की दूसरी शाखा पर लटका हुआ पत्ता उसे स्वयं कैसे मालूम पड़ सकता है कि यह मैं ही हूं! दूसरी शाखा भी छोड़ दें, उसी शाखा पर लगा हुआ दूसरा पत्ता भी उस वृक्ष के पत्ते को कैसे लग सकता है कि मैं ही हूं! उतनी दूरी भी छोड़ दें, उसी के बगल में, पड़ोस में लटका हुआ जो पता है, वह भी दूसरा ही मालूम पड़ेगा; क्योंकि पत्ते का भी जो होश है, वह व्यक्ति का है।

फिर पत्ता अपने भीतर प्रवेश करे, तो बहुत शीघ्र वह पाएगा कि मैं जिस डंठल से लगा हूं उसी डंठल से मेरे पड़ोस का पत्ता भी लगा है, और हम दोनों की प्राणधारा एक ही डंठल से आ रही है। वह और थोड़ा प्रवेश करे, तो वह पाएगा कि मेरी शाखा ही नहीं, पड़ोस की शाखा भी एक ही वृक्ष के दो हिस्से हैं और हमारी जीवनधारा एक है। वह और थोड़ा नीचे प्रवेश करे और वृक्ष की रूट्स पर पहुंच जाए, तो उसे लगेगा कि सारी शाखाएं और सारे पत्ते और मैं, एक ही के हिस्से हैं। वह और वृक्ष के नीचे प्रवेश करे और उस भूमि में पहुंच जाए जिस भूमि से पड़ोस का वृक्ष भी निकला हुआ है, तो वह अनुभव करेगा कि मैं, मेरा यह वृक्ष, मेरे ये पत्ते, और यह पडोस का वृक्ष, ये हम एक ही भूमि के पुत्र हैं, और एक ही भूमि की शाखाएं हैं। और अगर वह प्रवेश करता ही जाए, तो यह पूरा जगत अंततः उस छोटे से पत्ते के अस्तित्व का अंतिम छोर होगा। वह पत्ता इस बड़े अस्तित्व का एक छोर था! लेकिन छोर की तरह होश में आ गया था तो व्यक्ति था, और समग्र की तरह होश में आ जाए तो व्यक्ति नहीं है।

तो कुंडलिनी के पहले जागरण का अनुभव तुम्हें आत्मा की तरह होगा और अंतिम अनुभव तुम्हें परमात्मा की तरह होगा। अगर तुम पहले जागरण पर ही रुक गए, और तुमने घेराबंदी कर ली अपने कुएं की, और तुमने भीतर खोज न की, तो तुम आत्मा पर ही रुक जाओगे।

इसलिए बहुत से धर्म आत्मा पर ही रुक गए हैं। वह परम अनुभव नहीं है; वह अनुभव की आधी ही यात्रा है। और थोड़ा आगे जाएंगे तो आत्मा भी विलीन हो जाएगी और तब परमात्मा ही शेष रह जाएगा। और जैसा मैंने तुमसे कहा कि और अगर आगे गए तो परमात्मा भी विलीन हो जाएगा, और तब निर्वाण और शून्य ही शेष रह जाएगा—या कहना चाहिए, कुछ भी शेष नहीं रह जाएगा।

तो परमात्मा से भी जो एक कदम आगे जाने की जिनकी संभावना थी, वे निर्वाण पर पहुंच गए हैं; वे परम शून्य की बात कहेंगे। वे कहेंगे वहां जहां कुछ भी नहीं रह जाता। असल में, सब कुछ का अनुभव जब तुम्हें होगा, तो साथ ही कुछ नहीं का अनुभव भी होगा। जो एबसोल्युट है, वह नथिंगनेस भी है।

शून्य और पूर्ण : एक के ही दो नाम:

इसे ऐसा हम समझें....... .शून्य और पूर्ण एक ही चीज के दो नाम हैं, इसलिए दोनों कनवटेंबल हैं। शून्य पूर्ण है। तुमने अधूरा शून्य न देखा होगा। आधा शून्य तुम नहीं कर सकते हो। अगर तुमसे हम कहें कि शून्य को आधा कर दो, दो टुकड़े कर दो! तो तुम कहोगे, यह कैसे हो सकता है? एक के दो टुकड़े हो सकते हैं, दो के दो टुकड़े हो सकते हैं, शून्य के दो टुकड़े नहीं हो सकते। शून्य के टुकड़े ही नहीं हो सकते। और जब तुम कागज पर एक शून्य बनाते हो तो वह सिर्फ प्रतीक है; वह तुम्हारे बनाते ही शून्य नहीं रह जाता, क्योंकि तुम रेखा बांध देते हो।

इसलिए यूक्लिड से पूछोगे तो वह कहेगा कि शून्य हम उसे कहते हैं, जिसमें न लंबाई है, न चौड़ाई है। लेकिन तुम तो कितना ही छोटा सा बिंदु भी बनाओगे, तो उसमें भी लंबाई—चौड़ाई होगी। इसलिए वह सिर्फ सिबालिक है, वह असली बिंदु नहीं है, क्योंकि असली बिंदु में तो लंबाई—चौड़ाई नहीं हो सकती। लंबाई—चौड़ाई होगी तो फिर बिंदु नहीं रह जाएगा।

इसलिए उपनिषद कह सके कि शून्य से तुम निकाल लो शून्य भी, तो भी पीछे शून्य ही शेष रह जाता है। उसका मतलब यह है कि तुम निकाल नहीं सकते उसमें से कुछ। तुम अगर पूरे शून्य को भी लेकर भाग जाओ तब भी पीछे पूरा शून्य ही शेष रह जाएगा। तुम आखिर में पाओगे, चोरी बेकार गई; तुम उसे लेकर भाग नहीं सके, वह वहीं शेष रह गया। लेकिन जो शून्य के संबंध में सही है, वही पूर्ण के संबंध में भी सही है। असल में, पूर्ण की कोई कल्पना सिवाय शून्य के और नहीं हो सकती।

पूर्ण का मतलब है जिसमें अब और आगे विकास नहीं हो सकता। शून्य का मतलब है जिसमें अब और नीचे पतन नहीं हो सकता। शून्य के और नीचे उतरने का उपाय नहीं, पूर्ण के और आगे जाने का उपाय नहीं। तुम पूर्ण के भी खंड नहीं कर सकते; तुम शून्य के भी खंड नहीं कर सकते। पूर्ण की भी कोई सीमा नहीं हो सकती; क्योंकि जब भी किसी चीज की सीमा होगी तब वह पूर्ण नहीं हो सकेगा। क्योंकि उसका मतलब हुआ कि सीमा के बाहर फिर कुछ शेष रह जाएगा। और अगर कुछ बाहर शेष रह गया तो पूर्णता कैसी? फिर यह अपूर्णता हो जाएगी।

जहां मेरा घर खतम होता है, तुम्हारा घर शुरू हो जाता है। मेरे घर की सीमा पर मेरा घर समाप्त होता है और तुम्हारा शुरू होता है। अगर मेरा घर पूर्ण है, तो तुम्हारा घर मेरे घर के बाहर नहीं हो सकता। तो पूर्ण की कोई सीमा नहीं हो सकती, क्योंकि कौन उसकी सीमा बनाएगा? सीमा बनाने के लिए हमेशा नेबर चाहिए; सीमा बनाने के लिए कोई पड़ोसी चाहिए। और पूर्ण है अकेला, उसका कोई पड़ोसी नहीं है, जिससे उसकी सीमा इंगित हो सके।

सीमा दो बनाते हैं, एक नहीं—यह खयाल रखना; सीमा बनाने के लिए दो चाहिए। जहां मैं समाप्त होऊं और कोई शुरू हो, वहां सीमा बनेगी। अगर कोई शुरू ही न हो तो मैं समाप्त भी न हो सकूंगा। और अगर मैं समाप्त ही न हो सकूं, हो ही न सकूं समाप्त, तो फिर मेरी कोई सीमा न बनेगी। पूर्ण की कोई सीमा नहीं है, क्योंकि कौन उसकी सीमा बनाए? शून्य की कोई सीमा नहीं है, क्योंकि जिसकी सीमा हो जाती है, वह कुछ हो गया, वह शून्य कैसे रहा? तो अगर इसे बहुत ठीक से समझोगे तो शून्य और पूर्ण जो हैं, वे एक ही चीज को कहने के दो ढंग हैं।

ब्रह्म और शून्य : दो ओर से यात्रा:

तो धर्म भी दो तरफ से यात्रा कर सकता है या तो तुम पूर्ण हो जाओ, या तुम शून्य हो जाओ। दोनों स्थितियों में तुम वही हो जाओगे जो होने की बात है। तो जो पूर्ण की यात्रा करनेवाला है, या पूर्ण शब्द को प्रेम करता है, पाजिटिव को प्रेम करता है, वह कहेगा—अहं ब्रह्मास्मि! मैं ब्रह्म हूं! वह यह कह रहा है कि मैं ही ब्रह्म हूं। यह सब जो है, यह मैं ही हूं। और मेरे अतिरिक्त कोई तू नहीं है; सब तू मैंने अपने मैं में घेर लिए हैं। अगर यह हो सके तो यह बात हो जाएगी।

लेकिन अंतिम चरण में मैं को भी खोना पड़ेगा, क्योंकि जब कोई तू नहीं है तो तुम कैसे कहोगे कि मैं ही ब्रह्म हूं? क्योंकि मैं की उदघोषणा तू की मौजूदगी पर ही सार्थक है। और जब तुम ही ब्रह्म हो, तो यह कहना भी बहुत अर्थ का नहीं रह जाएगा कि मैं ब्रह्म हूं। क्योंकि इसमें भी दो की स्वीकृति है—ब्रह्म की और मेरी। तो अंत में मैं भी व्यर्थ हो जाएगा, ब्रह्म भी व्यर्थ हो जाएगा और चुप हो जाना पड़ेगा।

दूसरा एक मार्ग है कि तुम कहो...... .इतने मिट जाओ तुम कि तुम कह सको, मैं हूं ही नहीं। एक जगह तुम कह सके, मैं ब्रह्म हूं अर्थात मैं सब हूं। दूसरी यात्रा है जिसमें तुम कह सको कि मैं हूं ही नहीं, कुछ भी नहीं है; सब परम शून्य है। लेकिन इससे भी तुम वहीं पहुंच जाओगे। और पहुंचकर तुम यह भी न कह सकोगे कि मैं नहीं हूं। क्योंकि मैं नहीं हूं यह कहने के लिए भी मैं का होना जरूरी है। तो मैं खो जाएगा। तुम यह भी न कह सकोगे कि सब शून्य है; क्योंकि यह कहने के लिए भी सब भी होना चाहिए और शून्य भी होना चाहिए। तब तुम फिर चुप हो जाओगे।

तो यात्रा चाहे कहीं से हो—चाहे वह पूर्णता की तरफ से हो, चाहे शून्यता की तरफ से हों—लेकिन वह परम मौन में ले जाएगी, जहां बोलने को कुछ भी नहीं बचेगा। इसलिए कहां से कोई जाता है, यह बड़ा सवाल नहीं है; कहां पहुंचता है, यह जांचने की बात है। उसकी अंतिम मंजिल पकड़ी जा सकती है, पहचानी जा सकती है। अगर वह यहां पहुंच गया तो वह जहां से भी गया हो, ठीक ही रास्ते से गया है। कोई रास्ता गलत नहीं है, कोई रास्ता ठीक नहीं है—इस अर्थ में कि जो पहुंचा दे वह ठीक है। और पहुंचना यहां है। लेकिन प्राथमिक अनुभव कहीं से भी मैं से ही शुरू होगा, क्योंकि हमारी वह स्थिति है; वह गिवेन सिचुएशन है, जहां से हमको चलना है।

तो चाहे हम कुंडलिनी को जगाए, तो भी वह व्यक्तिगत मालूम पड़ेगी; चाहे ध्यान में जाएं, तो भी वह व्यक्ति—गत मालूम पड़ेगा; चाहे शांत हों तो व्यक्तिगत होगा, जो कुछ भी होगा वह व्यक्तिगत होगा, क्योंकि अभी हम व्यक्ति हैं। लेकिन जैसे—जैसे इसमें प्रवेश करोगे, भीतर जितने गहरे उतरोगे, व्यक्ति मिटता जाएगा। और अगर बाहर गए, तो व्यक्ति बढ़ता चला जाएगा।

व्यक्ति का अंतिम छोर:

जैसे समझ लो कि एक आदमी कुएं पर खड़ा है। अगर वह कुएं में भीतर जाए, तो एक दिन सागर में पहुंच जाएगा। और अनुभव करे कि कुआं तो नहीं था... असल में कुआं है क्या? जस्ट ए होल सागर को झांकने के लिए। और क्या है? कुएं का और अर्थ क्या है? एक छेद है जिससे तुम सागर को झांक लेते हो। अगर तुम पानी को कुआं समझते हो तो गलती समझते हो, पानी तो सागर ही है। हां, वह छेद जिससे तुमने झांका है, वह है कुआं। तो वह जो छेद है, वह जितना बड़ा होता जाए, सागर उतना बड़ा दिखाई पड़ने लगेगा।

लेकिन अगर तुम कुएं के भीतर प्रवेश न किए और कुएं से दूर हटते चले गए, तो तुम्हें कुएं का पानी भी दिखाई पड़ना थोड़ी देर में बंद हो जाएगा। फिर तो वह जो कुएं का छेद है और पाट है, वही दिखाई पड़ेगा। और उसका सागर से कभी तुम तालमेल न कर पाओगे। एकदम तुम सागर के किनारे भी पहुंच जाओ, तो भी तुम यह तालमेल न बिठा पाओगे कि वह जो कुएं में झांका था वह और यह सागर एक हो सकता है।

अंतर्यात्रा तो तुम्हें एकता पर ले जाएगी, बहिर्यात्रा तुम्हें अनेकता पर ले जाएगी। लेकिन सभी अनुभव का प्रारंभिक छोर व्यक्ति होगा, कुआं होगा; अंतिम छोर अव्यक्ति होगा—या परमेश्वर कहो— सागर होगा। इस अर्थ में मैंने कहा अगर तुम गहरे जाओगे तो कुंड जो है तुम्हारा नहीं रह जाएगा; कुछ भी तुम्हारा नहीं रह जाएगा। कुछ भी नहीं रह जा सकता है।

पीड़ा कुएं की, आनंद सागर का:

प्रश्न: ओशो अगर शून्य को ही उपलब्ध होना है तो कड़ंलिनी जगाने की जरूरत क्या है? और साधना की जरूरत क्या है?

यह जो बात है न, क्योंकि तुम्हें समझ में आ रहा है कि शून्य यानी कुछ भी नहीं, इसलिए साधना की क्या जरूरत? कुछ हो तो जरूरत है। तुम्हें खयाल में आ रहा है कि शून्य यानी ना—कुछ हो गए। तो साधना की क्या जरूरत? साधना की जरूरत तो तब लगती है, जब कुछ हम हो जाएं। लेकिन तुम्हें यह पता नहीं कि शून्य का मतलब है पूर्ण; शून्य का मतलब है सब कुछ। शून्य का मतलब कुछ नहीं नहीं, सब कुछ।

लेकिन अभी तुम्हारे खयाल में नहीं आ सकता कि शून्य यानी सब कुछ का क्या मतलब होता है। एक कुआं भी कह सकता है कि अगर सागर की तरफ जाने का मतलब इसी बात का पता चलना है कि मैं हूं ही नहीं, तो मैं जाऊं ही क्यों? यह ठीक कह रहा है कुआं। यह कहे कि अगर मैं सागर की तरफ जाऊं और आखिर में यही पता चलना है कि मैं हूं ही नहीं, तो मैं जाऊं क्यों? लेकिन तुम्हारे न जाने से फर्क नहीं पड़ता है। तुम नहीं हो, एक बात; तुम्हारे जाने, न जाने का सवाल नहीं। न जाओ, कुएं पर ही रुके रहो, कुएं ही बने रहो, लेकिन तुम हो नहीं कुआं। यह झूठ है सरासर। यह झूठ तुम्हें दुख देता रहेगा। यह झूठ तुम्हें पीड़ा देता रहेगा। यह झूठ तुम्हें बांधे रहेगा। इस झूठ में आनंद की कोई संभावना नहीं है।

कुआं मिटेगा जरूर सागर तक जाकर, लेकिन मिटते ही उसकी सारी चिंता, दुख, सब मिट जाएगा; क्योंकि वह उसके कुएं और व्यक्ति होने से बंधा था, उसकी ईगो और अहंकार से बंधा था। और हमें तो ऐसा लगेगा कि कुआं जाकर सागर में मिट गया, कुछ भी नहीं हुआ। लेकिन कुएं को थोड़े ही ऐसा लगेगा। कुआं तो कहेगा कि मैं सागर हो गया। कौन कहता है, मैं मिट गया! यह तो जो नहीं गया कुआं, पड़ोस का जो कुआं नहीं गया वह उससे कहेगा, पागल! कहां जाता है? वहां तो मिट ही जाना है, तो जाना क्यों? लेकिन जो गया है, वह कहेगा : कौन कहता है, मिट जाना है! मैं तो मिटूगा एक अर्थ में—कुएं के अर्थ में, लेकिन सागर के अर्थ में हो भी जाऊंगा।

इसलिए चुनाव कुआं बने रहने का या सागर होने का है सदा, क्षुद्र से बंधे रहने का या विराट के साथ एक हो जाने का है। लेकिन वह अनुभव की बात है। और अगर कुएं ने कहा कि मैं मिटने से डरता हूं तो फिर तो उसको सागर से सब संबंध छोड़ लेने पड़ेंगे; क्योंकि उन संबंधों में सदा भय है कि कभी भी पता न चल जाए कि मैं सागर हूं। तो उसको सब अपने झरने तोड़ लेने पड़ेंगे, क्योंकि वे झरने सब सागर तक जाते हैं। या उसे झरने की तरफ से आख मोड़ लेनी पड़ेगी। वह सदा बाहर देखता रहे, भीतर न देखे भूलकर; क्योंकि भीतर देखने से कभी भी संभावना है कि उसे पता चल जाए कि अरे, मैं नहीं हूं सागर ही है। तो फिर वह बाहर देखे। और झरने जितने छोटे हों, उतने अच्छे; क्योंकि उनसे भीतर जाना कम आसान रह जाएगा। जितने सूखे हों, उतने अच्छे; बिलकुल सूख जाएं तो और भी अच्छे।

लेकिन तब कुआं मरेगा। समझेगा कि मैं बचा रहा हूं अपने को, लेकिन मरेगा।

मिटना बहुत आनदपूर्ण है:

जीसस का वचन है कि जो अपने को बचाएगा, वह मिटेगा, और जो मिटाएगा, वही केवल बच सकता है।

तो यह तो हमारे मन में सवाल उठता ही है कि मिट जाएंगे, वहां जाएं क्यों? वहां जाएं क्यों, मिट जाएंगे! तो अगर यह... अगर मिटना ही हमारा सत्य है, तो ठीक है। और बचाने से कैसे बचेंगे? अगर सागर में पहुंचकर मिटना होता है तो कुएं बने रहकर कितने दिन बच सकोगे? इतना बड़ा सागर होकर भी मिटना हो जाता है तो इतने से कुएं को कैसे बचाओगे? कितने दिन बचाओगे? जल्दी इसकी ईटं गिर जाएंगी, जल्दी इस पर मिट्टी गिरेगी, जल्दी इसका पानी सूख जाएगा। जब सागर में भी न बच सकोगे, तो कुएं में कैसे बचोगे? और कितनी देर बचोगे?

इसी से मृत्यु का भय पैदा होता है। वह कुएं का भय है। सागर से मिलना नहीं चाहता, क्योंकि उसमें डर है मिटने का, इसलिए सागर से अपने को दूर कर लेता है और कुआं बन जाता है। और फिर मौत का भय सताने लगता है, क्योंकि सागर से जैसे ही टूटा कि मरने की स्थिति करीब आने लगी, क्योंकि सागर से जुड़कर जीवन है।

तो इसलिए हम सब मृत्यु से भयभीत हैं, डरे हुए हैं कि कहीं मर न जाएं। मरना पड़ेगा। और दो ही तरह के मरने हैं या तो तुम सागर में कूदकर मर जाओ। वह मरना बहुत आनंदपूर्ण है; क्योंकि मरोगे नहीं, सागर हो जाओगे। और एक यह कि तुम कुएं को जोर से पकड़े बैठे रहो—सूखोगे, सडोगे, मिट जाओगे। हमारा मन कहता है कोई प्रलोभन चाहिए—क्या, मिलेगा क्या जिसकी वजह से हम सागर में जाएं? क्या मिलेगा जिससे हम समाधि को खोजें, शून्य को खोजें? मिलेगा क्या? हम पहले पूछते हैं, मिलेगा क्या? हम इसको पूछते ही नहीं कि इस मिलने की दौड़ में हमने अपने को खो दिया है। सब तो मिल गया है—मकान मिल गया है, धन मिल गया है—वह सब मिल गया है और हम खो गए हैं; हम बिलकुल नहीं हैं वहां।

तो अगर मिलने की भाषा में पूछते हो तो मैं कहूंगा कि अगर खोने को तैयार हो जाओ तो तुम तुमको मिल जाओगे। अगर खोने को तैयार नहीं हो, बचाने की कोशिश की, तो तुम खो जाओगे और सब बच जाएगा; और बहुत सी चीजें बच जाएंगी, बस तुम खो जाओगे।

तीव्र श्वास से प्राण—ऊर्जा में वृद्धि:

प्रश्न: ओशो आपने कहा था कि डीप ब्रीदिंग लेने से आक्सीजन और कार्बन डाइआक्साइड का अनुपात बदल जाता है तो इस अनुपात के बदलने का कुंडलिनी जागरण के साथ कैसे संबंध है?

बहुत संबंध है। एक तो हमारे भीतर जीवन और मृत्यु दोनों की संभावनाएं हैं। उसमें जो आक्सीजन है वह हमारे जीवन की संभावना है, और जो कार्बन है वह हमारी मृत्यु की संभावना है। जब आक्सीजन क्षीण होते—होते—होते—होते समाप्त हो जाएगी और सिर्फ कार्बन रह जाएगी तुम्हारे भीतर, तो तुम लाश हो जाओगे। ऐसे ही, जैसे कि हम एक लकड़ी को जलाते हैं। जब तक आक्सीजन मिलती है, जलती चली जाती है। आग होती है, जीवन होता है। फिर आक्सीजन चुक गई, आग चुक गई, फिर कोयला, कार्बन पड़ा रह जाता है पीछे। वह मरी हुई आग है। वह जो कोयला पड़ा है पीछे, वह मरी हुई आग है।

तो हमारे भीतर दोनों का काम चल रहा है पूरे समय। भीतर हमारे जितनी ज्यादा कार्बन होगी, उतनी ही लिथार्जी होगी, उतनी सुस्ती होगी। इसलिए दिन में नींद लेना मुश्किल पड़ता है, रात में आसान पड़ता है; क्योंकि रात में आक्सीजन की मात्रा कम हो गई है और कार्बन की मात्रा बढ़ गई है। इसलिए रात में हम सरलता से सो जाते हैं और दिन में सोना इतना सरल नहीं पड़ता, क्योंकि आक्सीजन बहुत मात्रा में है। आक्सीजन हवा में बहुत मात्रा में है। सूरज के आ जाने के बाद आक्सीजन का अनुपात पूरी हवा में बदल जाता है। सूरज के हटते ही से आक्सीजन का अनुपात नीचे गिर जाता है।

इसलिए अंधेरा जो है, रात्रि जो है, वह प्रतीक बन गया है सुस्ती का, आलस्य का, तमस का। सूर्य जो है वह तेजस का प्रतीक बन गया है, क्योंकि उसके साथ ही जीवन आता है। रात सब कुम्हला जाता है—फूल बंद हो जाते, पत्ते झुक जाते, आदमी सो जाता—सारी पृथ्वी एक अर्थों में टेम्प्रेरी डेथ में चली जाती है, एक अस्थायी मृत्यु में समा जाती है। सुबह होते ही से फिर फूल खिलने लगते, फिर पत्ते जीवित हो जाते, फिर वृक्ष हिलने लगते, फिर आदमी जगता, पक्षी गीत गाते— सब तरफ फिर पृथ्वी जागती है, वह जो टेम्प्रेरी डेथ थी, वह जो अस्थायी मृत्यु थी रात के आठ—दस घंटे की, वह गई; अब जीवन फिर लौट आया है।

तो तुम्हारे भीतर भी ऐसी घटना घटती है कि जब तुम्हारे भीतर आक्सीजन की मात्रा तीव्रता से बढ़ती है, तो तुम्हारे भीतर जो सोई हुई शक्तियां हैं वे जगती हैं, क्योंकि सोई हुई शक्तियां को जगने के लिए सदा ही आक्सीजन चाहिए—किसी भी तरह की सोई हुई शक्तियों को जगने के लिए। अब एक आदमी मर रहा है, मरने के बिलकुल करीब है, हम उसकी नाक में आक्सीजन का सिलिंडर लगाए हुए हैं। उसे हम दस—बीस घंटे जिंदा रख लेंगे। उसकी मृत्यु घट गई होती दस—बीस घंटे पहले, लेकिन हम उसे दस—बीस घंटे खींच लेंगे। वर्ष, दो वर्ष भी खींच सकते हैं, क्योंकि उसकी बिलकुल क्षीण होती शक्तियों को भी हम आक्सीजन दे रहे हैं तो वे सो नहीं पा रहीं। उसकी सब शक्तियां मौत के करीब जा रही हैं, डूब रही हैं, डूब रही हैं, लेकिन हम फिर भी आक्सीजन दिए जा रहे हैं।

तो आज यूरोप और अमेरिका में तो हजारों आदमी आक्सीजन पर अटके हुए हैं। और सारे अमेरिका और यूरोप में एक बड़े से बड़ा सवाल है अथनासिया का—कि आदमी को स्वेच्छा—मरण का हक होना चाहिए। क्योंकि डाक्टर अब उसको लटका सकता है बहुत दिन तक। बड़ा भारी सवाल है, क्योंकि अब डाक्टर चाहे तो कितने ही दिन तक एक आदमी को न मरने दे। अच्छा, डाक्टर की तकलीफ यह है कि अगर वह उसे जानकर मरने दे तो वह हत्या का आरोपण उस पर हो सकता है; वह मर्डर हो गया। यानी वह अभी आक्सीजन देकर इस अस्सी साल के मरते हुए बूढ़े को बचा सकता है। अगर न दे, तो यह हत्या के बराबर जुर्म है। तो वह तो इसे देगा; वह इसे आक्सीजन देकर लटका देगा। अब उसकी जो सोती हुई शक्तियां हैं वे कार्बन की कमी के कारण नहीं सो पाएंगी। समझ रहे हो न मेरा मतलब?

अधिक प्राण से अधिक जागृति:

ठीक इससे उलटा प्राणायाम और भस्त्रिका और जिसे मैं श्वास की तीव्र प्रक्रिया कह रहा हूं उसमें होता है। तुम्हारे भीतर तुम इतनी ज्यादा जीवनवायु ले जाते हो, प्राणवायु ले जाते हो कि तुम्हारे भीतर जो सोए हुए तत्व हैं वह तो जगने की क्षमता उनकी बढ़ जाती है, तत्काल वे जगने शुरू हो जाते हैं; और तुम्हारे भीतर जो सोने की प्रवृत्ति है, भीतर वह भी टूटती है।

तुम तो हैरान होओगे, अभी मेरे पास कोई चार वर्ष पहले सीलोन से एक बौद्ध भिक्षु आया। वह तीन साल से सो नहीं सका। सब तरह के इलाज किए, वे काम नहीं किए। वे काम कर नहीं सकते थे, क्योंकि वह एक अनापानसती योग का प्रयोग कर रहा था श्वास का—चौबीस घंटे गहरी श्वास पर ध्यान रख रहा था। अब जिसने उसे बता दिया था उसे कुछ पता नहीं होगा कि चौबीस घंटे गहरी श्वास पर अगर ध्यान रखा जाएगा तो नींद बिलकुल विदा हो जाएगी; नींद को लाया ही नहीं जा सकता।

तो इधर तो वह चौबीस घंटे श्वास पर ध्यान रख रहा है और उधर उसको दवाइयां दिलवाए जा रहे हैं। तो उसकी बड़ी तकलीफ खड़ी हो गई; क्योंकि उसके शरीर में कांफ्लिक्ट पैदा हो गई। दवाइयां उसको सुला रही हैं, और वह गहरी श्वास का जो प्रयोग चौबीस घंटे जारी रखे हुए है, वह उसकी शक्तियों को जगा रहा है। तो उसके भीतर ऐसी जिच पैदा हो गई, जैसे कि कोई कार में एक्सीलरेटर और ब्रेक दोनों एक साथ दबाता हो। समझे न? तो वह तो बहुत परेशानी में था। किसी ने मेरा उसको कहा तो वह मेरे पास आया।

मैं उसको देखकर समझा कि वह तो पागलपन में पड़ा है, यह तो कभी हो ही नहीं सकता। तो मैंने उससे कहा कि अनापानसती योग बंद करो। तो उसने कहा, इससे क्या संबंध है? तो उसे खयाल ही नहीं है कि अगर श्वास का इतना ज्यादा प्रयोग करोगे कि आक्सीजन इतनी मात्रा में हो जाए कि शरीर सो ही न सके, तो फिर कैसे सोओगे! और या फिर, मैंने उससे कहा कि सोने का खयाल छोड़ दो और ये दवाइयां लेना बंद कर दो। और तुम्हें कोई जरूरत नहीं है नींद की। नींद नहीं आएगी तो हर्ज नहीं है। अगर यह प्रयोग जारी रखते हो तो नींद नहीं आने से कोई हर्ज नहीं होगा।

एक आठ दिन उसने प्रयोग बंद किया है कि उसे नींद आनी शुरू हो गई, कोई दवा की जरूरत न रही।

अधिक कार्बन से अधिक मूर्च्छा:

तो हमारे भीतर सोने की संभावना बढ़ती है कार्बन के बढ़ने से। इसलिए जिन—जिन चीजों से हमारे भीतर कार्बन बढ़ती है, वे सभी चीजें हमारे भीतर सोई हुई शक्तियों को और सुलाती हैं। उतनी हमारी मूर्च्छा बढ़ती चली जाती है।

जैसे दुनिया में जितनी संख्या आदमी की बढ़ रही है उतनी मूर्च्छा का तत्व ज्यादा होता चला जाएगा; क्योंकि जमीन पर आक्सीजन कम और आदमी ज्यादा होते चले जाएंगे। कल एक ऐसी हालत हो सकती है कि हमारे भीतर जागने की क्षमता कम से कम रह जाए। इसलिए तुम सुबह ताजा अनुभव करते हो; एक जंगल में जाते हो, ताजा अनुभव करते हो, समुद्र के तट पर तुम ताजा अनुभव करते हो। बाजार की भीड़ में सुस्ती छा जाती है, सब तमस हो जाता है; वहां बहुत कार्बन है।

प्रश्न: क्या नया आक्सीजन नहीं बनता है?

निरंतर बन रहा है। लेकिन हमारी भीड़, हमारी भीड़ में रहने की आदतें, वे सारी आक्सीजन को पीए चली जाती हैं। तो इसलिए जहां भी आक्सीजन ज्यादा है वहां तुम प्रफुल्ल अनुभव करोगे—वह चाहे बगीचा हो, चाहे नदी का किनारा हो, चाहे पहाड़ हो—जहां भी आक्सीजन ज्यादा है, वहां तुम एकदम प्रफुल्लित हो जाओगे, स्वस्थ हो जाओगे। जहां भीड़ है, भड़क्का है, सिनेमागृह हैं—चाहे मंदिर हो— वहां तुम एकदम से सुस्त हो जाओगे; वहां मूर्च्छा पकड़ेगी।

तीव्र परिवर्तन से देखना सुगम:

तो तुम्हारे भीतर आक्सीजन को बढाने का प्रयोजन है। उससे तुम्हारे भीतर का संतुलन बदलता है—तुम सोने की तरफ उन्मुख न रहकर जागने की तरफ उन्मुख होते हो। और अगर यह मात्रा तेजी से और एकदम बढ़ाई जा सके, तो तुम्हारे भीतर संतुलन में एकदम से इतना फर्क होता है जैसे तराजू का एक पल्ला जो नीचे लगा था, एकदम ऊपर चला गया; ऊपर का तराजू का पल्ला बिलकुल नीचे आ गया। अगर झटके के साथ तुम्हारे भीतर का संतुलन बदला जा सके, तो उसका तु