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कुंडलिनी जागरण में खतरा है तो कौन सा खतरा है? और यदि खतरा है तो फिर उसे जाग्रत ही क्यों किया जाए?


खतरा तो बहुत है। असल में, जिसे हमने जीवन समझ रखा है, उस पूरे जीवन को ही खोने का खतरा है। जैसे हम हैं, वैसे ही हम कुंडलिनी जाग्रत होने पर न रह जाएंगे; सब कुछ बदलेगा—सब कुछ—हमारे संबंध, हमारी वृत्तियां, हमारा संसार; हमने कल तक जो जाना था वह सब बदलेगा। उस सबके बदलने का ही खतरा है।

लेकिन अगर कोयले को हीरा बनना हो, तो कोयले को कोयला होना तो मिटना ही पड़ता है। खतरा बहुत है। कोयले के लिए खतरा है। अगर हीरा बनेगा तो कोयला मिटेगा तो ही हीरा बनेगा। शायद यह आपको खयाल में न हो कि हीरे और कोयले में जातिगत कोई फर्क नहीं है; कोयला और हीरा एक ही तत्व हैं।

कोयला ही लंबे अरसे में हीरा बन जाता है। हीरे और कोयले में केमिकली कोई बहुत बुनियादी फर्क नहीं है। लेकिन कोयला अगर हीरा बनना चाहे तो कोयला न रह सकेगा। कोयले को बहुत खतरा है। और ऐसे ही मनुष्य को भी खतरा है—परमात्मा होने के रास्ते पर कोई जाए, तो मनुष्य तो मिटेगा।

नदी सागर की तरफ दौड़ती है। सागर से मिलने में बड़ा खतरा है। नदी मिटेगी; नदी बचेगी नहीं। और खतरे का मतलब क्या होता है? खतरे का मतलब होता है, मिटना।

तो जिनकी मिटने की तैयारी है, वे ही केवल परमात्मा की तरफ यात्रा कर सकते हैं। मौत इस बुरी तरह नहीं मिटाती जिस बुरी तरह ध्यान मिटा देता है। क्योंकि मौत तो सिर्फ एक शरीर से छुडाती है और दूसरे शरीर से जुड़ा देती है। आप नहीं बदलते मौत में। आप वही के वही होते हैं जो थे, सिर्फ वस्त्र बदल जाते हैं। इसलिए मौत बहुत बड़ा खतरा नहीं है। और हम सारे लोग तो मौत को बड़ा खतरा समझते हैं। तो ध्यान तो मृत्यु से भी ज्यादा बड़ा खतरा है; क्योंकि मृत्यु केवल वस्त्र छीनती है, ध्यान आपको ही छीन लेगा। ध्यान महामृत्यु है।

पुराने दिनों में जो जानते थे, वे कहते ही यही थे ध्यान मृत्यु है; टोटल डेथ। कपड़े ही नहीं बदलते, सब बदल जाता है। लेकिन जिसे सागर होना हो जिस सरिता को, उसे खतरा उठाना पड़ता है। खोती कुछ भी नहीं है, सरिता जब सागर में गिरती है तो खोती कुछ भी नहीं है, सागर हो जाती है। और कोयला जब हीरा बनता है तो खोता कुछ भी नहीं है, हीरा हो जाता है। लेकिन कोयला जब तक कोयला है तब तक तो उसे डर है कि कहीं खो न जाऊं, और नदी जब तक नदी है तब तक भयभीत है कि कहीं खो न जाऊं। उसे क्या पता कि सागर से मिलकर खोएगी नहीं, सागर हो जाएगी। वही खतरा आदमी को भी है।

और वे मित्र पूछते हैं कि फिर खतरा हो तो खतरा उठाया ही क्यों जाए?

यह भी थोड़ा समझ लेना जरूरी है। जितना खतरा उठाते हैं हम, उतने ही जीवित हैं; और जितना खतरे से भयभीत होते हैं, उतने ही मरे हुए हैं। असल में, मरे हुए को कोई खतरा नहीं होता। एक तो बड़ा खतरा यह नहीं होता कि मरा हुआ मर नहीं सकता है अब। जीवित जो है वह मर सकता है। और जितना ज्यादा जीवित है, उतनी ही तीव्रता से मर सकता है।

एक पत्थर पड़ा है और पास में एक फूल खिला है। पत्थर कह सकता है फूल से कि तू नासमझ है! क्यों खतरा उठाता है फूल बनने का? क्योंकि सांझ न हो पाएगी और मुरझा जाएगा। फूल होने में बड़ा खतरा है, पत्थर होने में खतरा नहीं है। पत्थर सुबह भी पड़ा था, सांझ जब फूल गिर जाएगा तब भी वहीं होगा। पत्थर को ज्यादा खतरा नहीं है, क्योंकि पत्थर को ज्यादा जीवन नहीं है। जितना जीवन, उतना खतरा है।

इसलिए जो व्यक्ति जितना जीवंत होगा, जितना लिविंग होगा, उतना खतरे में है।

ध्यान सबसे बड़ा खतरा है, क्योंकि ध्यान सबसे गहरे जीवन की उपलब्धि में ले जाने का द्वार है।

नहीं, वे मित्र पूछते हैं कि खतरा है तो जाएं ही क्यों? मैं कहता हूं र खतरा है इसलिए ही जाएं। खतरा न होता तो जाने की बहुत जरूरत न थी। जहां खतरा न हो वहां जाना ही मत, क्योंकि वहां सिवाय मौत के और कुछ भी नहीं है। जहां खतरा हो वहां जरूर जाना, क्योंकि वहां जीवन की संभावना है।

लेकिन हम सब सुरक्षा के प्रेमी हैं, सिक्योरिटी के प्रेमी हैं।

इनसिक्योरिटी, असुरक्षा है, खतरा है, तो भागते हैं भयभीत होकर, डरते हैं, छिप जाते हैं। ऐसे—ऐसे हम जीवन खो देते हैं। जीवन को बचाने में बहुत लोग जीवन खो देते हैं। जीवन को तो वे ही जी पाते हैं जो जीवन को बचाते नहीं, बल्कि उछालते हुए चलते हैं। खतरा तो है। इसीलिए जाना, क्योंकि खतरा है। और बड़े से बड़ा खतरा है। और गौरीशंकर की चोटी पर चढ़ने में इतना खतरा नहीं है। और न चांद पर जाने में इतना खतरा है। अभी यात्री भटक गए थे, तो बड़ा खतरा है। लेकिन खतरा वस्त्रों को ही था। शरीर ही बदल सकते थे। लेकिन ध्यान में खतरा बड़ा है, चांद पर जाने से बड़ा है।

पर खतरे से हम डरते क्यों हैं? यह कभी सोचा कि खतरे से हम इतने डरते क्यों हैं? सब तरह के खतरे से डरने के पीछे अज्ञान है। डर लगता है कि कहीं मिट न जाएं। डर लगता है कहीं खो न जाएं। डर लगता है कहीं समाप्त न हो जाएं। तो बचाओ, सुरक्षा करो, दीवाल उठाओ, किला बनाओ, छिप जाओ। अपने को बचा लो सब खतरों से।

मैंने सुनी है एक घटना। मैंने सुना है कि एक सम्राट ने एक महल बना लिया। और उसमें सिर्फ एक ही द्वार रखा था कि कहीं कोई खतरा न हो। कोई खिड़की—दरवाजे से आ न जाए दुश्मन। एक ही दरवाजा रखा था, सब द्वार—दरवाजे बंद कर दिए थे। मकान तो क्या था, कब बन गई थी। एक थोड़ी सींकमी थी कि एक दरवाजा था। उससे भीतर जाकर उससे बाहर निकल सकता था। उस दरवाजे पर भी उसने हजार सैनिक रख छोड़े थे।

पड़ोस का सम्राट उसे देखने आया, उसके महल को। सुना उसने कि सुरक्षा का कोई इंतजाम कर लिया है मित्र ने, और ऐसी सुरक्षा का इंतजाम किया है जैसा पहले कभी किसी ने भी नहीं किया होगा। तो वह सम्राट देखने आया। देखकर प्रसन्न हुआ। उसने कहा कि दुश्मन आ नहीं सकता, खतरा कोई हो नहीं सकता। ऐसा भवन मैं भी बना लूंगा।

फिर वे बाहर निकले। भवन के मालिक ने बड़ी खुशी विदा दी। और जब मित्र सम्राट अपने रथ पर बैठता था तो उसने फिर दुबारा—दुबारा कहा बहुत सुंदर बनाया है, बहुत सुरक्षित बनाया है; मैं भी ऐसा ही बना लूंगा; बहुत—बहुत धन्यवाद। लेकिन सड़क के किनारे बैठा एक भिखारी जोर से हंसने लगा। तो उस भवनपति ने पूछा कि पागल, तू क्यों हंस रहा है?

तो उस भिखारी ने कहा कि मुझे आपके भवन में एक भूल दिखाई पड रही है। मैं यहां बैठा रहता हूं यह भवन बन रहा था तब से। तब से मैं सोचता हूं कि कभी मौका मिल जाए आपसे कहने का तो बता दूं : एक भूल है। तो सम्राट ने कहा, कौन सी भूल? उसने कहा, यह जो एक दरवाजा है, यह खतरा है। इससे और कोई भला न जा सके, किसी दिन मौत भीतर चली जाएगी। तुम ऐसा करो कि भीतर हो जाओ और यह दरवाजा भी बंद करवा लो, ईटं जुड़वा दो। तुम बिलकुल सुरक्षित हो जाओगे। फिर मौत भी भीतर न आ सकेगी।

उस सम्राट ने कहा, पागल, आने की जरूरत ही न रहेगी। क्योंकि अगर यह दरवाजा बंद हुआ तो मैं मर ही गया; वह तो कब बन जाएगी। उस भिखारी ने कहा, कब तो बन ही गई है, सिर्फ एक दरवाजे की कमी रह गई है। तो तुम भी मानते हो, उस भिखारी ने कहा कि एक दरवाजा बंद हो जाएगा तो यह मकान कब हो जाएगा? उस सम्राट ने कहा, मानता हूं। तो उसने कहा कि जितने दरवाजे बंद हो गए, उतनी ही कब्र हो गई है; एक ही दरवाजा और रह गया है।

उस भिखारी ने कहा, कभी हम भी मकान में छिपकर रहते थे। फिर हमने देखा कि छिपकर रहना यानी मरना। और जैसा तुम कहते हो कि अगर एक दरवाजा और बंद करेंगे तो कब हो जाएगी, तो मैंने अपनी सब दीवालें भी गिरवा दीं, अब मैं खुले आकाश के नीचे रह रहा हूं। अब—जैसा तुम कहते हो, सब बंद होने से मौत हो जाएगी—सब खुले होने से जीवन हो गया है। मैं तुमसे कहता हूं कि सब खुले होने से जीवन हो गया है। खतरा बहुत है, लेकिन सब जीवन हो गया है।

खतरा है, इसीलिए निमंत्रण है; इसीलिए जाएं। और खतरा कोयले को है, हीरे को नहीं, खतरा नदी को है, सागर को नहीं, खतरा आपको है, आपके भीतर जो परमात्मा है उसको नहीं। अब सोच लें अपने को बचाना है तो परमात्मा खोना पड़ता है, और परमात्मा को पाना है तो अपने को खोना पड़ता है।

जीसस से किसी ने एक रात जाकर पूछा था कि मैं क्या करूं कि उस ईश्वर को पा सकूं जिसकी तुम बात करते हो? तो जीसस ने कहा, तुम कुछ और मत करो, सिर्फ अपने को खो दो, अपने को बचाओ मत। उसने कहा, कैसी बातें कर रहे हैं आप! खोने से मुझे क्या मिलेगा? तो जीसस ने कहा, जो खोता है, वह अपने को पा लेता है; और जो अपने को बचाता है, वह सदा के लिए खो देता है।

कुंडलिनी जाग्रत हो तो कभी— कभी किन्हीं केंद्रों पर अवरोध हो जाता है? रुक जाती है। तो उसके रुक जाने का कारण क्या है? और गति देने का उपाय क्या है?

कारण कुछ और नहीं सिर्फ एक है कि हम पूरी शक्ति से नहीं पुकारते और पूरी शक्ति से नहीं जगाते। हम सदा ही अधूरे हैं और आशिक हैं। हम कुछ भी करते हैं तो आधा—आधा, हाफ हाटेंडली करते हैं। हम कुछ भी पूरा नहीं कर पाते। बस इसके अतिरिक्त और कोई बाधा नहीं है। अगर हम पूरा कर पाएं तो कोई बाधा नहीं है।

लेकिन हमारी पूरे जीवन में सब कुछ आधा करने की आदत है। हम प्रेम भी करते हैं तो आधा करते हैं। और जिसे प्रेम करते हैं उसे घृणा भी करते हैं। बहुत अजीब सा मालूम पड़ता है कि जिसे हम प्रेम करते हैं, उसे घृणा भी करते हैं। और जिसे हम प्रेम करते हैं और जिसके लिए जीते हैं, उसे हम कभी मार डालना भी चाहते हैं। ऐसा प्रेमी खोजना कठिन है जिसने अपनी प्रेयसी के मरने का विचार न किया हो। ऐसा हमारा मन है, आधा—आधा। और विपरीत आधा चल रहा है। जैसे हमारे शरीर में बायां और दायां पैर है, वे दोनों एक ही तरफ चलते हैं, लेकिन हमारे मन के बाएं—दाएं पैर उलटे चलते हैं। वही हमारा तनाव है। हमारे जीवन की अशांति क्या है? कि हम हर जगह आधे हैं।

अब एक युवक मेरे पास आया, और उसने मुझे कहा कि मुझे बीस साल से आत्महत्या करने का विचार चल रहा है। तो मैंने कहा, पागल, कर क्यों नहीं लेते हो? बीस साल बहुत लंबा वक्त है। बीस साल से आत्महत्या का विचार कर रहे हो तो कब करोगे? मर जाओगे पहले ही, फिर करोगे? वह बहुत चौंका। उसने कहा, आप क्या कहते हैं? मैं तो आया था कि आप मुझे समझाएंगे कि आत्महत्या मत करो। मैंने कहा, मुझे समझाने की जरूरत है? बीस साल से तुम कर ही नहीं रहे हो! और उसने कहा कि जिसके पास भी मैं गया वही मुझे समझाता है कि ऐसा कभी मत करना। मैंने कहा, उन समझाने वालों की वजह से ही न तो तुम जी पा रहे हो और न तुम मर पा रहे हो; आधे—आधे हो गए हो। या तो मरो या जीओ। जीना हो तो फिर आत्महत्या का खयाल छोड़ो, और जी लो। और मरना हो तो मर जाओ, जीने का खयाल छोड़ दो।

वह दो—तीन दिन मेरे पास था। रोज मैं उससे यही कहता रहा कि अब तू जीवन का खयाल मत कर, बीस साल से सोचा है मरने का तो मर ही जा। तीसरे दिन उसने मुझसे कहा, आप कैसी बातें कर रहे हैं? मैं जीना चाहता हूं। तो मैंने कहा, मैं कब कहता हूं कि तुम मरो। तुम ही पूछते थे कि मैं बीस साल से मरना चाहता हूं।

अब यह थोडा सोचने जैसा मामला है. कोई आदमी बीस साल तक मरने का सोचे, तो यह आदमी मरा तो है ही नहीं, जी भी नहीं पाया है। क्योंकि जो मरने का सोच रहा है, वह जीएगा कैसे? हम आधे—आधे हैं। और हमारे पूरे जीवन में आधे—आधे होने की आदत है। न हम मित्र बनते किसी के, न हम शत्रु बनते, हम कुछ भी पूरे नहीं हो पाते।

और आश्चर्य है कि अगर हम पूरे भी शत्रु हों तो आधे मित्र होने से ज्यादा आनंददायी है।

असल में, पूरा होना कुछ भी आनंददायी है। क्योंकि जब भी व्यक्तित्व पूरा का पूरा उतरता है, तो व्यक्तित्व में सोई हुई सारी शक्तियां साथ हो जाती हैं। और जब व्यक्तित्व आपस में बंट जाता है, स्जिट हो जाता है, दो टुकड़े हो जाता है, तब हम आपस में भीतर ही लड़ते रहते हैं। अब जैसे कुंडलिनी जाग्रत न हो, बीच में अटक जाए, तो उसका केवल एक मतलब है कि आपके भीतर जगाने का भी खयाल है, और जग जाए, इसका डर भी।

आप चले भी जा रहे हैं मंदिर की तरफ, और मंदिर में प्रवेश की हिम्मत भी नहीं है। दोनों काम कर रहे हैं। आप ध्यान की तैयारी भी कर रहे हैं और ध्यान में उतरने का, ध्यान में छलांग लगाने का साहस भी नहीं जुटा पाते हैं। तैरने का मन है, नदी के किनारे पहुंच गए हैं, और तट पर खड़े होकर सोच रहे हैं। तैरना भी चाहते हैं, पानी में भी नहीं उतरना चाहते! इरादा कुछ ऐसा है कि कहीं कमरे में गद्दा—तकिया लगाकर, उस पर लेटकर हाथ—पैर फड़फड़ाकर तैरने का मजा मिल जाए तो ले लें।

नहीं, पर गद्दे—तकिए पर तैरने का मजा नहीं मिल सकता। तैरने का मजा तो खतरे के साथ जुड़ा है।

आधापन अगर है तो कुंडलिनी में बहुत बाधा पड़ेगी। इसलिए अनेक मित्रों को अनुभव होगा कि कहीं चीज जाकर रुक जाती है। रुक जाती है तो एक ही बात ध्यान में रखना, और कोई बहाने मत खोजना। बहुत तरह के बहाने हम खोजते है—कि पिछले जन्म का कर्म बाधा पड़ रहा होगा, भाग्य बाधा पड़ रहा होगा, अभी समय नहीं आया होगा। ये हम सब बातें सोचते हैं ये सब बातें कोई भी सच नहीं हैं। सच सिर्फ एक बात है कि आप पूरी तरह जगाने में नहीं लगे हैं। अगर कहीं भी कोई अवरोध आता हो, तो समझना कि छलांग पूरी नहीं ले रहे हैं। और ताकत से कूदना, अपने को पूरा लगा देना, अपने को समग्रीभूत छोड़ देना। तो किसी केंद्र पर, किसी चक्र पर कुंडलिनी रुकेगी नहीं। वह तो एक क्षण में भी पार कर सकती है पूरी यात्रा, और वर्षों भी लग सकते हैं। हमारे अधूरेपन की बात है। अगर हमारा मन पूरा हो तो अभी एक क्षण में भी सब हो सकता है।

कहीं भी रुके तो समझना कि हम पूरे नहीं हैं, तो पूरा साथ देना, और शक्ति लगा देना। और शक्ति की अनंत—अनंत सामर्थ्य हमारे भीतर है। हमने कभी किसी काम में कोई बड़ी शक्ति नहीं लगाई है। हम सब ऊपर—ऊपर जीते हैं। हमने अपनी जड़ों को कभी पुकारा ही नहीं। इसीलिए बाधा पड़ सकती है। और ध्यान रहे, और कोई बाधा नहीं है।